दिल्ली-औराई शाताब्दी एक्सप्रेस शुरू

नई दिल्ली. रेल यात्रियों की सुविधा के मद्देनजर रेलवे दो दैनिक स्पेशल ट्रेनों का संचालन करने जा रही है. उत्तर पश्चिम रेलवे (North Western Railway) की ओर से एक ट्रेन नई दिल्ली-दौराई-नई दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस प्रतिदिन स्पेशल ट्रेन सेवा का संचालन किया जाएगा.

उधर, जयपुर-दिल्ली सराय रोहिल्ला-जयपुर के बीच भी प्रतिदिन स्पेशल ट्रेन का संचालन भी किया जाएगा जो कि वाया दौसा, अलवर, रेवाड़ी व गुड़गांव होकर संचालित होगी. यह ट्रेन पूर्णतया आरक्षित रहेगी. यात्रियों को सफर के दौरान कोरोना रोकथाम के लिए लागू की गईं गाइडलाइन का अनुपालन करना अनिवार्य होगा.

उत्तर पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसम्पर्क अधिकारी गौरव गौड के अनुसार गाडी संख्या 04051, नई दिल्ली-दौराई शताब्दी एक्सप्रेस प्रतिदिन स्पेशल रेलसेवा 10 अप्रैल से आगामी आदेशों तक नई दिल्ली से 06.10 बजे रवाना होकर जयपुर 10.45 बजे आगमन व 10.50 बजे प्रस्थान कर 13.15 बजे दौराई पहुंचेगी.

इसी प्रकार गाडी संख्या 04052, दौराई-नई दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस प्रतिदिन स्पेशल रेलसेवा 10 अप्रैल से आगामी आदेशों तक दौराई से 15.15 बजे रवाना होकर जयपुर 17.45 बजे आगमन व 17.50 बजे प्रस्थान 22.40 बजे नई दिल्ली पहुंचेगी. यह रेलसेवा मार्ग में दिल्ली कैंट, गुडगांव, रेवाड़ी, अलवर, बांदीकुई, गांधीनगर जयपुर, जयपुर, किशनगढ व अजमेर स्टेशनों पर ठहराव करेगी.एक अप्रैल से शुरू होगी जयपुर-दिल्ली सराय रोहिल्ला दैनिक त्यौहार स्पेशल इसके अलावा यात्रियों की सुविधा के मद्देनजर जयपुर-दिल्ली सराय रोहिल्ला-जयपुर प्रतिदिन त्यौहार स्पेशल रेलसेवा का संचालन भी किया जा रहा है.

सिवान-थावे रेल सेवा शुरू

गोरखपुर, जेएनएन। होली में पूर्वांचल के लोगों के लिए राहत भरी खबर है। 27 मार्च से पैसेंजर ट्रेनों (सवारी गाडिय़ां) के बाद पूर्वोत्तर रेलवे प्रशासन ने डीजल से चलने वाली (डेमू) तथा इलेक्ट्रिक से चलने वाली (मेमू) ट्रेनों को भी हरी झंडी दे दी है। गोरखपुर से बढऩी और सिवान तथा सिवान-छपरा रूट पर डेमू ट्रेनें चलेगी। भटनी- वाराणसी रूट पर मेमू चलाई जाएगी। इसके अलावा भटनी से बरहज बाजार के बीच दो जोड़ी पैसेंजर ट्रेनों का संचालन भी शुरू हो जाएगा।

सवारी गाडिय़ों की तरह डेमू व मेमू में भी लगेगा एक्सप्रेस का किराया

स्थानीय यात्रियों को राहत तो मिलेगी, लेकिन उन्हें सवारी गाडिय़ों की तरह डेमू और मेमू ट्रेनों में भी एक्सप्रेस का ही किराया देना पड़ेगा।

मुख्य जनसंपर्क अधिकारी पंकज कुमार सिंह के अनुसार कोविड-19 को ध्यान में रखकर इन ट्रेनों को भी अनारक्षित एक्सप्रेस में रूप में चलाया जाएगा।

05033 गोरखपुर-बढऩी अनारक्षित डेमू एक्सप्रेस 30 मार्च से प्रतिदिन सुबह 09.00 बजे रवाना होगी। नकहा जंगल, पीपीगंज, कैंपियरगंज, आनंदनगर और सिद्धार्थनगर के रास्ते दोपहर 12.55 बजे बढऩी पहुंचेगी।

05034 बढऩी-गोरखपुर दैनिक अनारक्षित डेमू एक्सप्रेस 30 मार्च से प्रतिदिन अपराह्न 03.20 बजे रवाना होगी। यह ट्रेन शोहरतगढ़, सिद्धार्थनगर, आनंदनगर, कैंपियरगंज और पीपीगंज के रास्ते शाम 06.40 बजे गोरखपुर पहुंचेगी।

05153 सिवान- गोरखपुर दैनिक अनारक्षित डेमू एक्सप्रेस 27 मार्च सुबह 07.55 बजे रवाना होगी। हथुआ, थावे, तमकुही रोड, दुदही, पडरौना, कप्तानगंज, पिपराइच, उनौला होते हुए दोपहर 01.25 बजे गोरखपुर पहुंचेगी।

05154 गोरखपुर- सिवान दैनिक अनारक्षित डेमू एक्सप्रेस 30 मार्च से प्रतिदिन शाम 07.15 बजे रवाना होगी। यह ट्रेन, कैंट, उनौला, पिपराइच, कप्तानगंज, पडरौना, तमकुही रोड और थावे के रास्ते रात 12.10 बजे सिवान पहुंचेगी।

05147 भटनी-वाराणसी सिटी अनारक्षित मेमू एक्सप्रेस 28 मार्च से प्रतिदिन (शुक्रवार को छोड़कर) सुबह 06.00 बजे रवाना होगी। यह ट्रेन सलेमपुर से 06.16 बजे से, लार रोड से 06.27 बजे से छूटकर बेल्थरा, इंदारा, मऊ, औडि़हार, सारनाथ होते हुए 10.05 बजे वाराणसी सिटी पहुंचेगी।

05148 वाराणसी सिटी-भटनी अनारक्षित मेमू एक्सप्रेस 27 मार्च से प्रतिदिन (गुरुवार को छोड़कर) अपराह्न 03.25 बजे रवाना होगी। यह ट्रेन सारनाथ, औडि़हार, मऊ, इंदारा, बेल्थरा रोड, लार रोड के रास्ते शाम 07.30 बजे भटनी पहुंचेगी।

शान्ति के लिए

वटवृक्ष




घर में वातावरण को शांतिमय बनाने के लिए एक कप दूध में मीठा मिलाकर वटवृक्ष की जड़ में प्रतिदिन अर्पित करें और उस स्थान की जरा-सी गीली मिट्टी लेकर माथे या नाभि पर लगा लें। यह क्रिया सोमवार से शुरू करें और 43 दिन तक प्रतिदिन करते रहें, लाभ होगा।





नाभि का हटना

नाभिचक्र के अस्थायी रोग (नाभि का टलना)

परिचय-

इस रोग के कारण रोगी के पेट में बहुत तेज दर्द होता है। व्यक्ति को भूख कम लगती है तथा उसका जी घबराने लगता है। नाभिचक्र जब अपने स्थान से ऊपर की ओर हट जाता है तो व्यक्ति में कब्जियत जैसी अवस्था पैदा हो जाती है तथा नाभिचक्र जब अपने स्थान से नीचे की ओर हट जाता है तो वायु के दबाब के कारण दस्त जैसी अवस्था पैदा हो जाती है। यह रोग कभी भी दवाईयों द्वारा ठीक नहीं किया जा सकता है।

लक्षण-

        नाभिचक्र अपने स्थान पर है या नहीं यह पहचान करने के लिए व्यक्ति को सुबह के समय में शौचक्रिया के बाद पीठ के बल सीधा लेट जाना चाहिए और हाथों को बगल में शरीर के साथ सीधा रखना चाहिए। फिर दूसरे व्यक्ति को एक धागा लेकर रोगी की नाभि से लेकर छाती के एक तरफ के निप्पल तक नापना चाहिए। ठीक इसी तरह की क्रिया दूसरे निप्पल के साथ भी करें और पता करें कि दोनों तरफ के निप्पलों के साथ धागे की समान दूरी है या नहीं। यदि यह दूरी समान नहीं है तो समझ लेना चाहिए कि नाभिचक्र अपने स्थान से हट गया है और यदि दूरी समान है तो नाभिचक्र अपने स्थान पर है।

कारण-

        चलने-फिरने में असावधानी, अत्यधिक कूदने-फांदने, अधिक वजन उठाने वाले कार्य करने या किसी प्रकार से ऊंची-नीची जमीन पर अचानक पैर पड़ जाने से झटका आदि लग जाने के कारण यह रोग हो जाता है।

नाभिचक्र के रोग का एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा उपचार-

  • इस रोग का इलाज करने में एक्यूप्रेशर चिकित्सा का एक प्रमुख स्थान है। यदि किसी व्यक्ति का नाभिचक्र अपने स्थान से हट जाता है तो वह व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं रहता है। नाभिचक्र ही शरीर में पाए जाने वाले डायाफ्राम के नीचे अव्यवस्थित समस्त अंगों को नियंत्रित करता है।
  • किसी व्यक्ति का नाभिचक्र अपने स्थान से हट जाने पर उस व्यक्ति को पीठ के बल सीधा लिटा दें तथा इसके बाद अपने दाहिने हाथ की पांचों अंगुलियों को मिलाकर नाभिचक्र पर एक्यूप्रेशर चिकित्सा के अनुसार धीरे-धीरे दबाव डालें। यदि रोगी की धड़कन शुरु हो जाए तो उस समय यह क्रिया बंद कर देनी चाहिए। इसके अलावा किसी खाली गिलास को रोगी के नाभिचक्र पर उल्टा रखकर हल्का दबाब डालने से भी नाभिचक्र अपने स्थान पर वापस आ जाता है तथा रोगी को बहुत आराम मिलता है।
  • नाभिचक्र को ठीक करने का एक उपाय यह भी है कि पीठ के बल लेटने पर पैर का जो अंगूठा नीचे है उसे हाथ के साथ ऊपर की ओर खींचकर दूसरे के बराबर करें। यह क्रिया 2-3 बार करने पर नाभिचक्र अपने स्थान पर आ जाता है।

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नपुंसकता

नपुंसकता

परिचय-

          जब कोई व्यक्ति यौन संम्बन्ध नहीं बना पाता है या संभोगक्रिया के समय जल्द ही शिथिल हो जाता है तो कहा जाता है कि वह व्यक्ति नपुंसकता के रोग से पीड़ित है। इस रोग का सम्बंध ज्ञानेन्द्रियों से होता है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति अपनी इस समस्या को किसी को भी बताने में संकोच करता है जिसके कारण उसका यह रोग बढ़ता ही चला जाता है। यह रोग अधिक उम्र वाले व्यक्तियों में अधिक पाया जाता है। संभोगक्रिया के समय इस रोग से पीड़ित व्यक्ति का लिंग उत्तेजित तो हो जाता है लेकिन फिर भी उसके लिंग से वीर्य नहीं निकलता है।

 कारण-

नपुंसकता रोग होने के 3 कारण होते हैं-

1. शारीरिक- नपुंसकता रोग शरीर की कमजोरी के कारण होता है। ज्यादा मेहनत करने वाले व्यक्ति को जब पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता तो वह शारीरिक रूप से कमजोर हो जाता। जिसके कारण उसे नपुंसकता रोग हो जाता है।

2. मानसिक- नपुंसकता रोग ज्यादा चिंता और तनाव में रहने से भी हो सकता है। लिंग के उत्तेजित न होने का सबसे प्रमुख कारण तो मानसिक ही होता है। कोई व्यक्ति जब ज्यादा थक जाता है या तनावग्रस्त होता है या किसी कारण से चिंतित हो या किसी समस्या के कारण व्यक्ति का आत्मविश्वास बुरी तरह से टूट चुका हो तो उस व्यक्ति को नपुंसकता रोग हो सकता है। हस्तमैथुन या ज्यादा काम-वासना में लगे रहने वाले नवयुवक नपुंसकता के शिकार हो सकते हैं। ऐसे नवयुवकों में संभोग की इच्छा कम हो जाती है। कभी-कभी तो बैर-भाव, गुस्सा या पश्चाताप भी लिंग के उत्तेजित न होने का एक कारण हो सकता है या वह डरता है कि कहीं उसकी पत्नी गर्भवती न हो जाए या किसी तरह से पत्नी को चोट न पहुंच जाए जिसके कारण उस व्यक्ति को मानसिक तनाव होता है।

3. अपराध-बोध- कभी-कभी बेहद मुश्किल माहौल में परवरिश या अपने बचपन में यौन दुराचार का शिकार होने के कारण भी सेक्स के बारे में मन में नकारात्मक भावनाएं पैदा हो जाती हैं जिसके कारण नपुंसकता रोग हो जाता है।

     

लक्षण-

        पुरुष का लिंग संभोग करने के योग्य न रहना नपुंसकता का मुख्य लक्षण है। पुरुषों के लिंग में थोड़े समय के लिए कामोत्तेजना होना या थोड़े समय के लिए ही लिंगोत्थान होना इसका दूसरा लक्षण है। पुरुषों में संभोग अथवा ज्यादा संभोग के कारण उत्पन्न ध्वजभंग नपुंसकता में लिंग पतला, टेढ़ा और छोटा भी हो जाता है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति का लिंग कभी-कभी थोड़े समय के लिए ही उत्तेजित रहता है तथा जब रोगी स्त्री के साथ संभोग क्रिया करता है तो कुछ समय के बाद ही उसके लिंग की उत्तेजना खत्म हो जाती है और वह संभोग क्रिया करने में असमर्थ हो जाता है। इसके कारण रोगी की पत्नी अपने पति से बहुत नाराज हो जाती है तथा उनके आपसी सम्बंधों में मन-मुटाव हो जाता है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा नपुंसकता रोग का उपचार-

          नपुंसकता रोग का इलाज करने के लिए रोगी की पत्नी की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि रोगी की पत्नी अपने पति के साथ अच्छा बर्ताव करे तथा वह अपनी पति का इलाज कराने में मदद करें तो रोगी जल्दी ठीक हो सकता है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को भी अपनी पत्नी को विश्वास दिलाना चाहिए कि उसे प्यार करना और प्यार पाना बहुत ही अच्छा लगता है।

(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)

        इस च को अपनज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से नपुसंकता से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है

मोतियाबिंद

 

मोतियाबिन्द

परिचय-

आंख को स्वच्छमण्डल के द्वारा देखने की शक्ति मिलती है तथा आंख में परितारिका की बनावट गोल और काली होती है। ये पटलों के प्रभावों का समायोजन करती है तथा प्रकाश, मनोवेग आदि अनेकों प्रभावों के उद्दीपन के अनुसार ढीली हो सकती है या फैल सकती है। आंखों में एक पतली सी झिल्ली भी पाई जाती है जिसे नेत्र-श्लेष्मला कहते हैं। यह नेत्र-श्लेष्मला ही आंखों के स्वच्छमण्डल और पलकों को अन्दर की ओर ढककर रखती है। इसके अलावा आंख के पिछले भाग पर एक दृष्टिपटल (रेटिना) होता है जिसके अन्दर नेत्रबिम्ब पाया जाता है।

आंखों में निम्नलिखित भाग पाए जाते हैं-

  • लेन्स
  • कपाट
  • प्रभावग्राही चित्र

मोतियाबिन्द-

          मोतियाबिन्द से पीड़ित रोगी को अपनी आंखों के आगे धुंआ दिखाई देने लगता है। मोतियाबिन्द रोग से पीड़ित व्यक्ति की आंखों से देखने की क्षमता में दोषपूर्ण अवस्था पैदा हो जाती है तथा उसे धुंधलापन दिखाई देने लगता है। इस प्रकार की अवस्था हो जाने को ही मोतियाबिन्द कहते हैं। इस रोग के कारण आंखों के लैंस धूमिल या पारभासी हो जाते हैं जिसके कारण आंखों को देखने की शक्ति नहीं मिल पाती है। इस लैंस के पारभासिता के कारण ही मनुष्य अन्धा हो जाता है।

          मोतियाबिन्द रोग से पीड़ित रोगी को कुछ भी दिखाई नहीं देता है। रोगी की आंखों के नेत्रपटल में भूरापन या सफेदी आ जाती है। यदि मोतियाबिन्द रोग की शुरुआत में ही चिकित्सा की जाए या फिर रोग होने के कारणों से बचाव किया जाये तो इस रोग को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है।

मोतियाबिन्द होने का कारण-

        बुढ़ापे के समय में मोतियाबिन्द होना आम बात है। वैसे यह रोग आंखों की आयु बढ़ने से होता है। इंसान जैसे-जैसे बूढ़ा होता जाता है वैसे-वैसे उसकी आंखों के लेंस की आयु भी बढ़ती जाती है जिसके कारण उसकी आंख का लेंस पारदर्शी होता चला जाता है। लेकिन इस लेंस का पारदर्शी होना अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग होता है। मोतियाबिन्द रोग होने के और भी कई कारण होते हैं जैसे- आंखों में किसी प्रकार का संक्रमण रोग होना, आंखों पर किसी तरह की चोट लगना, मधुमेह रोग होना, औषधियों का अधिक इस्तेमाल करना, चमड़ी पर किसी प्रकार की बीमारियां होना, आंखों में तेज खुजली होना तथा बिजली के तेज झटके लगना आदि। यह रोग जन्मजात भी हो सकता है जो मां-बाप से उसके बच्चों को हो सकता है। कुछ विशेष प्रकार की दवाईयों के प्रयोग से भी मोतियाबिन्द हो सकता है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा मोतियाबिन्द रोग का उपचार-

          मोतियाबिन्द का एक मात्र इलाज शल्य चिकित्सा है लेकिन बहुत सारे लोगों की सर्जरी इस रोग में इसलिए नहीं की जाती है क्योंकि कुछ रोगियों का मोतियाबिन्द छोटा होता है करीबन एक धूल जितना। यदि मोतियबिन्द बड़ा हो तो उसकी सर्जरी की जा सकती है। वैसे एक्यूप्रेशर चिकित्सक भी मोतियाबिन्द का इलाज कर सकता है। 




मसूड़ो के रोग

मसूढ़ों के रोग

परिचय-

    मसूढ़ों में किसी तरह का संक्रमण हो जाने से रोगी में दांतों का ढीलापन, मसूढ़ों से पीब निकलना और जिंजीवाइटिस जैसे लक्षण प्रकट हो जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति इस रोग से पीड़ित हो और वह अपने मसूढ़ों पर दबाव डालता है या ब्रुश करता है तो उसके मसूढ़ों से खून निकलने लगता है तथा उनमें तेज दर्द होने लगता है।

कारण-

        मसूढ़ों के रोग अधिकतर प्लाक जमने और मुंह की अच्छी तरह से सफाई न करने की वजह से होते हैं। जब दांतों पर पीली परत जम जाती है तो उसे प्लाक कहते हैं। यह प्लाक लार, बैक्टीरिया और भोजन के मिश्रण से बनता है और दांतों को ढक देता है। शुरू-शरू में यह प्लाक नर्म होता है तथा इसे उसी समय आसानी से छुड़ाया जा सकता है लेकिन दांतों के कुछ भाग ऐसे होते हैं जो सफाई के दौरान साफ नहीं हो पाते हैं जैसे- दांतों का निचला हिस्सा, दांतों के बीच का भाग और पिछले दांत आदि। यदि प्लाक समय रहते साफ नहीं होता है तो यह सख्त होकर टार्टर में बदल जाता है और दांत के निचले भाग को घेर लेता है। यह प्लाक बहुत से बैक्टीरिया के प्रजनन और प्रसार के लिए एक अच्छा स्थान साबित होता है। इन बैक्टीरिया के कारण ही जिंजीवाइटिस जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं। जब प्लाक की पलक मोटी हो जाती है तो यह दांतों को मजबूती देने वाले ऊतकों पर हमला बोलने लगते हैं। इसके कारण दांतों की हड्डी भी टूट जाती है तथा दांतों में बहुत तेज दर्द होता है। कुछ समय के बाद मसूढ़े सिकुड़ते जाते हैं और दांत ढीले हो जाते हैं।

लक्षण-

       मसूढ़ों के रोग हो जाने पर रोगी व्यक्ति के दांत में दर्द होने लगता है, दांतों के पास के मसूढ़ों से खून निकलने लगता है, मसूढ़े सूज जाते हैं और दांत हिलने लगते हैं। ब्रश से दांतों की सफाई करने पर दांतों में दर्द तथा दांतों से खून निकलने लगता है, मसूढ़ों में सूजन आ जाती है, दांत मसूढ़ों से ढीलें हो जाते हैं तथा मुंह से बदबू आने लगती है


 मसूढ़ों के रोग से पीड़ित रोगी के शरीर के प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर दबाव देने से मसूढ़ों के रोग तथा दांत दर्द में लाभ मिलता है। रोगी को यह क्रिया अपने शरीर पर 5 से 15 मिनट तक करनी चाहिए तथा इसके साथ-साथ उसे अपने दांतों की सफाई पर भी ध्यान देना चाहिए।


मसूढ़ों के रोगों को जल्दी ठीक करने के कुछ उपाय-

  • रोगी को अपने दांतों की सफाई पर उचित ध्यान देना चाहिए।
  • रोगी को अपने दांतों पर जमे प्लाक को हटाने के लिए बेहतर ब्रशिंग (सफाई) का उपाय करना चाहिए।
  • दांतों को साफ करने के लिए नाइलॉन टूथब्रश का प्रयोग करना चाहिए। ब्रश का सिरा छोटा होना चाहिए ताकि उसे आसानी से मुंह में इधर-उधर घुमाया जा सके।
  • रोगी को अपने दांतों का पिछला हिस्सा अच्छी तरह से साफ करना चाहिए।
  • दांतों को साफ करने के बाद शीशे में देखे कि कहीं दांत पर जमे प्लाक बचे तो नहीं है। अगर प्लाक बचे हों तो उन्हे फिर से सही ढंग से साफ करना चाहिए  



गैस्ट्रो

गैस्ट्रोएंट्रोंइटिस

परिचय-

जब बड़ी आंत और आमाशय में कोई संक्रमण होता है तो उसे गैस्ट्रोएंट्राइटिस कहते हैं। इस संक्रमण के कारण रोगी व्यक्ति का पेट खराब हो जाता है।

कारण-

गैस्ट्रोएंट्राइटिस रोग वायरस के कारण होता है। ये वायरस आसानी से किसी भी व्यक्ति के शरीर में पहुंचकर छोटी-मोटी महामारी का रूप ले लेते हैं।

यह रोग बैक्टीरिया आदि सूक्ष्मजीवियों द्वारा संक्रमित किए हुए भोजन या पेय पदार्थों से भी हो सकता है। इससे फूड पॉयजनिंग हो जाती है। ऐसी स्थिति अक्सर भोजन पकाते समय साफ-सफाई का पूरी तरह से ध्यान न रखने के कारण पैदा हो जाती है।

एंटीबायोटिक दवाईयां, आहार में तेजी से बदलाव या किसी बड़े गंभीर रोग के होने पर भी गैस्ट्रोएंट्राइटिस का रोग हो सकता है।

लक्षण-

गैस्ट्रोएंट्राइटिस रोग में रोगी को जी मिचलाने तथा दस्त लगने की शिकायत हो जाती है। कभी-कभी स्थिति कुछ ज्यादा गंभीर भी हो जाती है जिसमें रोगी को पेट दर्द, पेट में ऐंठन की शिकायत, उल्टी, पतले दस्त और बुखार तथा कमजोरी जैसी शिकायत भी हो सकती है।

चिकित्सा-

इस रोग में रोगी को अपने शरीर को पूरा आराम देना चाहिए। उसे नमक-चीनी या ओ.आर.एस का घोल पिलाते रहना चाहिए। रोगी को फलों का रस पिलाना चाहिए और दूध का सेवन नहीं कराना चाहिए। इस रोग का संक्रमण बड़ी आसानी से एक से दूसरे व्यक्ति के शरीर में फैल सकता है। इस रोग में साफ-सफाई का खासतौर पर ध्यान रखना होगा,

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एक्यूप्रेशर चिकित्सा

स्वास्थ्य और सौन्दर्य का एक्यूप्रेशर चिकित्सा के साथ सम्बन्ध

परिचय-

एक्यूप्रेशर चिकित्सा वह चिकित्सा है जिसमें अपने ही शरीर में पाये जाने वाले बिन्दुओं पर दबाव देकर विभिन्न प्रकार के रोगों का उपचार किया जाता है अर्थात इस चिकित्सा में अपनी अंगुलियों और अंगूठों की सहायता से एक विशेष प्रकार की विधि के द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों से जुडे विशेष संवेदनशील स्थान या प्रतिबिम्ब केन्द्र (शरीर के ऊर्जा नियंत्रक) बिन्दुओं पर दबाव देकर अनेकों रोगों को ठीक किया जाता है। इस चिकित्सा के द्वारा बिना किसी दवाई के रोगों को ठीक किया जाता है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा में निपुणता हासिल करना कोई आम बात नहीं है।

        रोजाना 10 मिनट तक अपनी बाईं हथेली पर सरसों का तेल लगाकर दाएं पैर के तलुवे की मालिश और दाईं हथेली पर सरसों का तेल लगाकर बाएं पैर के तलुवे की मालिश करने से अनेक रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसा करने से शरीर की रोगों से लड़ने की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है तथा शरीर में ऐसी भी शक्तियां आ जाती हैं जो रोगों को ठीक कर देती है।

        यदि कोई मनुष्य सुबह के समय में रोजाना व्यायाम करता है तो उसके शरीर में रोगों से लड़ने की शक्ति आ जाती है तथा उसकी रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। लेकिन व्यायाम करने के लिए भी कुछ नियम होते है जैसे- व्यायाम हमेशा सुबह के समय में करना चाहिए, खाना खाकर तुरन्त व्यायाम नहीं करना चाहिए तथा व्यायाम हमेशा खाली पेट करना चाहिए।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा के लाभ निम्नलिखित है-

  • इस चिकित्सा के द्वारा हाथ-पैरों की ऐंठन तथा दर्द दूर हो जाता है और स्वास्थ्य तथा सौन्दर्य में वृद्धि होती है।
  • इस चिकित्सा की सहायता से पैरों और तलुवों पर मालिश करने से बहुत लाभ मिलता है।
  • इस चिकित्सा के द्वारा शरीर के अंगों के कई रोग ठीक हो सकते हैं।
  • एक्यूप्रेशर चिकित्सा का रोजाना शरीर पर प्रयोग करने से शरीर में बहुत समय के लिए यौवन शक्ति बनी रहती है।
  • इस चिकित्सा के द्वारा पाचनशक्ति में सुधार हो जाता है।
  • मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) तथा कई प्रकार की हडि्डयों के दर्द से छुटकारा मिल जाता है।
  • त्वचा के रोग भी इस चिकित्सा के द्वारा ठीक हो सकते हैं।
  • इस चिकित्सा के द्वारा स्रावी ग्रंथियों की कार्य-प्रणाली में सुधार तथा उसमें होने वाले रोगों का उपचार हो सकता है।
  • इस चिकित्सा के द्वारा दिल का दौरा, लकवा, सायटिका, गठिया, रक्तचाप तथा मधुमेह रोगों का उपचार हो सकता है।
  • एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा मूत्र-प्रणाली में भी सुधार हो सकता है।
  • इस चिकित्सा के द्वारा मस्तिष्क से सम्बन्धित रोग भी ठीक हो सकते हैं।
  • एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा हृदय रोग का उपचार भी आसानी से किया जा सकता है।
  • स्त्रियों के मासिकधर्म के दौरान होने वाले रोगों का उपचार भी एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा किया जा  सकता है।
  • इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक्यूप्रेशर चिकित्सा एक प्रकार की ऐसी चिकित्सा है जिससे मनुष्यों के रोगों का उपचार बिना किसी शुल्क तथा बिना किसी परेशानी के किया जा सकता है और इस उपचार का फायदा भी बहुत अधिक होता है।

मन की सुन्दरता-

        मनुष्य के तन और मन की सुन्दरता के द्वारा ही मनुष्य की जीवनशैली का विकास होता है। यदि किसी मनुष्य के मन में कोई गलत धारणा हो जाती है या वह मनुष्य किसी के प्रति भेद-भाव, ईर्ष्या, जलन रखता है तो उस मनुष्य का मन और तन स्वच्छ नहीं होता है क्योंकि ऐसे मनुष्य अपने आपको हानि तो पहुंचाते ही हैं साथ ही दूसरों का भी नाश करते हैं। इसलिए सभी मनुष्यों को अपने तन और मन को स्वच्छ रखना चाहिए।

        प्रत्येक व्यक्ति को अपने मन और तन की सुन्दरता को बनाये रखने के साथ-साथ कई प्रकार के गुणों को भी अपने अन्दर संजोकर रखना चाहिए जैसे-त्याग, सहनशीलता, क्षमा, सेवा, हृदय की सुन्दरता, स्नेह, करुणा, मानवता तथा समर्पण आदि। यदि किसी मनुष्य में इस प्रकार के गुण नहीं होते हैं तो उस मनुष्य के तन और मन की सुन्दरता का विकास नहीं हो सकता है। इसलिए तन और मन की सुन्दरता के लिए सभी मनुष्यों को इन सभी गुणों का अपने अन्दर समावेश करना चाहिए 

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संपर्क करें - mr ranjan sir- 9771017201

सोराइसिस

साइनुसाइटिस

परिचय-

जब किसी व्यक्ति की नाक के अन्दर के ऊपरी भाग की हड्डी वाले खोल में अर्थात साइनस में पाई जाने वाले श्लेष्मा झिल्ली में संक्रमण तथा सूजन हो जाती है तो उसे साइनुसाइटिस रोग कहते हैं।

लक्षण-

       साइनुसाइटिस रोग के कारण रोगी की नाक के साइनस वाले भाग में बहुत तेज दर्द होता है। इस दर्द के कारण रोगी के गाल और माथे में भी दर्द होने लगता है। यदि किसी प्रकार से रोगी के एक से अधिक साइनसों में रोग हो जाए तो इसके कारण रोगी के दोनों गालों की हडि्डयों में दर्द होने लगता है। इस रोग के कारण रोगी को चेहरा भरा-भरा और काफी भारी सा हो जाता है तथा जब रोगी नीचे की ओर झुकता है तो उसे और भी तेज दर्द होता है। इस रोग से ग्रस्त रोगी का चेहरा काफी संवेदनशील हो जाता है लेकिन फिर भी इसमें सूजन नहीं होती है। कभी-कभी इस रोग के कारण रोगी की नाक भी बहने लगती है। नाक बहने पर रोगी की नाक से गाढ़ा पीले रंग का पदार्थ निकलने लगता है।

कारण-

       नाक के साइनस में वायु के अलावा कुछ भी नहीं पाया जाता है। लेकिन फिर भी जब किसी व्यक्ति को तेज जुकाम होता है तो उसकी नाक के अन्दर श्लेष्मा का भारी जमाव हो जाता है जिसके कारण उसकी नाक बंद हो जाती है। इस अवस्था के कारण श्लेष्मा रोग ग्रस्त हो जाता है और रोगी को साइनुसाइटिस रोग हो जाता है।

        जिन व्यक्तियों को अधिकतर जुकाम रहता है उन्हें इस रोग के हो जाने का ज्यादा खतरा होता है। कभी-कभी किसी व्यक्ति को किसी चीज से एलर्जी होती है जिसके फलस्वरूप रोगी को बहुत तेज जुकाम हो जाता हैं और इस जुकाम के कारण रोगी की नाक बंद हो जाती है और नाक बंद हो जाने के कारण रोगी के सिर में दर्द तथा कभी-कभी गालों में भी दर्द होने लगता है और रोगी को साइनुसाइटिस रोग हो जाता है। यह रोग सर्दी लगने के कारण भी हो सकता है।  

रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से साइनुसाइटिस रोग से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है।

        अगर कभी-कभी रोगी की नाक बंद हो जाए तो नाक के अन्दर श्लेष्मा के जमाव को रोकने वाला स्प्रे लगाने से लाभ होता है। कई बार यह रोग बहुत ही गम्भीर हो जाता है और बहुत से उपचार कराने के बावजूद भी ठीक नहीं होता है या ठीक भी हो जाता है तो कुछ समय के बाद फिर से उभरकर सामने आ जाता है। ऐसी अवस्था हो जाने पर रोगी को डॉक्टर से सलाह लेकर अपना उपचार कराना होगा 


सनातन

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