प्राचीन भारतीय इतिहास और जाति प्रथा

चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं। 

सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की।

सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?

महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।

विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।

भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।

श्रीकृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे, 

उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे।

यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्रीकृषण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।

राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे।

उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे

तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।

वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे, जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।

प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे । 

नन्द वंश की शुरुवात गोकुल के जमींदार राजा साहब महाराज नंद जी ने की थी जो वासुदेव यादव के चचेरे भाई थे इनके ही यहां भगवान श्री कृष्ण जी महाराज का लालन पालन हुआ था गोकुल में,
बहुत बाद मे बिहार बंगाल में नंद बाबा के नाम पर नंद वंश चला और इसमें 
महापद्मनंद बहुत शक्तिशाली बलशाली योद्धा राजा था, बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी यदुवंशी क्षत्रिय ही कहलाये। और ये लोग नंदवंशी यादव कहलाए 

उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त यादव मौर्य से हुई, हालाकि ये चरवाहा यादव थे जिनको काम होता था कि यादव समाज की गायों को चराना और यह लोग भी यादव परिवार के ही एक अंग है हालाकि चंद्रगुप्त मोर पालने वाले परिवार से थे और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया और चंद्रगुप्त ने नंद वंश के बाद अपनी सत्ता बनाई। 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।

फिर गुप्त वंश गुप्त भी यादव ही थे का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।140 साल देश पर गुप्तो का राज रहा।

केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर 92% समय प्राचीन काल में देश में शासन यादव का ही रहा  आज पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।

फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम शासन रहा।

अंत में मराठों का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया, चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया।

अहिल्या बाई होलकर यदुवंशी  क्षत्रिय महारानी थी खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी काशी विश्वनाथ मंदिर इन्होने ही बनवाया था 
 पुरे देश को ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये। 

मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|।

यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।

मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।

1800 -1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ । जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया। 

अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब "कास्ट ऑफ़ माइंड" में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।

इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान,  ह्यू सांग और अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।

प्राचीन भारत वर्ण व्यवस्था के आधार पर था यानि कर्म के आधार पर था, अगर ब्राह्मण मे जनम लिया और शराब सेवन, मांस, मछली का सेवन करे तो उसे चंडाल कहा जाता था और असुर, जैसे रावण आदि 

योगी आदित्यनाथ जो क्षत्रिय है ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत  हैं, 
पिछड़ी जाति मे यादव उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं। 
जन्म आधारित जातीय व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।
और भीम राव अम्बेडकर जो कि हिंदू नाम रख के नव बौद्ध हो गया था ने,अंग्रेजो की नीति को ही आगे बढ़ाया और आज का भारत में 4 मुख्य जाति 200 सौ उप जाति और 4 हजार अति उप जाति में भारतीय हिंदू समाज बट चुका है,
अगर जनरल जाति का है अगर वोट के लालची नेताओं ने उस जाति को रिजर्व कोटा में शामिल किया तो उस जनरल जाति से बाकी के जनरल जाति वाले नफरत करते हैं और कल तक जो जनरल जाति वाला एक साथ मे उठना बैठना यह तक कि बेटी रोटी का रिश्ता था रातों रात सब खत्म,
अब जो जाति रिजर्व हुई उसके साथ के जाति वाले उसको अछूत बोल कर परेशान करेगें, प्रताड़ित करेगें, पिछले 300  सौ सालो से यहीं होता आ रहा है
क्या मेहतर, हलखौर, डोम, चमार, दुसाध, धोबी आदि अछूत जातियां हैं
नही,
अहीर – जनरल जाति, 1924 मे पिछड़ा वर्ग बना कर सबसे पहले शामिल किया गया और 2023 मे भी पिछड़ा वर्ग 2 मे ही है, सब कुछ जनरल जाति के ही बराबर कट ऑफ मार्क्स, परीक्षा फीस भी बराबर, मिला क्या,मिला की अहीर यानि यादव समाज वाले जनरल जाति के बाकी भाइयों से जलील होते रहें, परेशान होते रहें, उनका जनेऊ तोड़ा गया, काम मिलना भी बंद हो गया, रास्ते में औरत बेटी बहन की बेआबरु की गई, हालात इतना मजबूर हो गया की जो जाति राजा महाराजा थे अमीर थे, किसी के आगे हाथ नही फैलाया, अब वही जाति वाले दूसरे के यहां मजदूरी कर जी रहें हैं, जिन के घर की औरते गहनों की दुकान थी यानि पुरा सजी धजी रहती थीं, उन घरों की औरतों को माथे पर दही लेकर घूम घूम कर बेचना पड़ गया,
जो राजा महाराजा जमींदार कुलीन वर्ग के थे, 1947 मे रियासत खत्म की गई और 1952 आते आते जमींदारिया, एक ही झटके में सड़क पर भीख मांगने पर मजबूर कर दिया गया, यह है आरक्षण

मेहतर – मेहनत मजदूरी कर खाने वाला

हलखोर – जो मुसलमान नही बने तो मानव मल को साफ सफाई में लगा दिया.

डोम – कोई भी हिंदू किसी भी जाति का हो, जब तक पहली अग्नि शमशान घाट में डोम नही देगा, मृतक शरीर को अग्नि नही मिलेगी, क्या यह जाति नीच हुई. विचार करे.

चमार – रियासत काल, हमलावर काल, मुगल काल के बाद अंग्रेज काल में चमार ही वैध होते थे और सर्जन डॉ होते थे, जो मानव शरीर, जानवर के शरीर का ऑपरेशन करते थे,

आज भी गोपालगंज जिले, बिहार के एक सांसद महोदय है डाक्टर आलोक कुमार सुमन जो जात के चमार है, एमबीबीएस है लेकिन प्राचीन काल की तरह वैद्यों की तरह आपके नज्ब को पकड़ कर बीमारी पता करते हैं, अंग्रेज़ी दवा केवल 5 दिन का देते हैं, अब तक 5 हजार से ज्यादा ऑपरेशन कर चूके है, और जेडीयू के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष भी है 2019 से,
और चमार जाति की औरत जब तक डिलीवरी कराने नही जायेगी, कोई भी जाति हो बच्चा नही होता था, यानि गांव की दाई मां,
जब अंग्रेज आए तो इसे अवैध घोषित कर दिया और सब जाति वालों को नर्स बना कर बहाल कर रुपया भी देने लगे, क्या आज अस्पतालों में नर्स मे किस जाति की महिला नही है, इस हिसाब से सब की सब चमार हुई की नही,

दुसाध – जिसने एक साथ दो साध दिया, आज भी दुसाध तलवार की तरह एक हथियार लेकर ही जाते है शादी विवाह करने जाता है

कुर्मी – कछुआ पकड़ने वाली जाति, लोगो के घरों में काम करने वाली जातियां हैं

कोयरी – खेती बाड़ी यानि अनाज उत्पादन, सब्जी की खेती

कोहार – कृषि वैज्ञानिक यानि मिट्टी जांच की जन्मजात प्रतिभा

लोहार – अस्त्र शस्त्र बनाना, मशीनरी

बढ़ई – लकड़ियों के समान, डेकोरेशन आदि

पन्हेरी/चौरसिया/बराई/तमोली(वैश्य ) लेकिनआरक्षण से शुद्र यानि एससी एसटी वर्ग में शामिल – यानि पान मसाला उत्पादक

गोड(वैश्य )– अनाज भुजने वाले

कायस्थ (चमार जाति की एक शाखा )– मुंशी/मुनीम/राज शाही मे हिसाब किताब करने वाला

भूमिहार – यदुवंशी/यादव समाज की एक शाखा जो खुद को यादवों/अहीर क्षत्रिय से अलग बताते हुए, खुद को ब्राह्मण बताते हैं

तेली(वैश्य )– सरसो का तेल निकालने वाला

बनिया (वैश्य)– खाद्य पदार्थ का व्यापार करने वाला

राजपुत क्षत्रिय (यादव समाज)– राजा का पुत्र कालांतर में राजा महाराजा और उनके यहां सेनापति और सेना के सिपाही

जाट (यादव समाज)– राजा महाराजा और सेनापति/सैनिक 
अहीर (यादव समाज)– राजा महाराजा और सेनापति/सैनिक 
जादौन (यादव  समाज)– राजा महाराजा और सेनापति/सैनिक
ग्वाला (यादव  समाज)– राजा महाराजा, सेनापति/सैनिक
चरवाहा (यादव  समाज)– राजा महाराजा, सेनापति/सैनिक
गायकवाड (यादव  समाज )– राजा महाराजा, सेनापति/सैनिक
मराठा (नंद वंश –चरवाहा – यादव समाज)
सिंधिया ( यादव  समाज)– राजा महाराजा, सेनापति/सैनिक
गोप ( यादव  समाज)–राजा महाराजा, सेनापति/सैनिक
राय ( यादव  समाज)– राजा महाराजा सेनापति सैनिक आदि
नंद (नंदवंशी यादव – महाराज नंद के वंशज)
मौर्य –( ग्वालवंशी यादव – गोप ग्वाला)
सेन – मथुरा के महाराज कंस के पिता सुरसेन के वंशज(सेन वंश)


बाकियों का क्या कहना 
इसलिए भारतीय होने पर गर्व करें और घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्रों से खुद भी बचें और औरों को भी बचाएं..👍👍🙏🙏
गर्व करो कि सनातनी हो

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ 

अहीर Ahir यानी यादव मे ब्राह्मण सह क्षत्रिय


बनारस अगर एक जीवन शैली है तो अहीर रगो मे बहता खून है, अहीर यादव मे ब्राह्मण है, शुद्ध सात्विक शाकाहारी 

अहीर जाति संरचना में भी सबसे आगे है, अहीर यादव मे ब्राह्मण है और इसके सैकड़ों उदाहरण है, ब्राह्मण ही पहला पुजा का अधिकारी है और बनारस में यह नियम आज भी दिखाई देता है,

आयुर्वेद में घी को उत्तम रसायन माना जाता है. रसायन यानि जो शरीर में रस भर दे. पौरुष में वृद्धि कर दे. घी का स्रोत दूध है और दूध का कारोबार इनका है. यानि घी जो मनुष्य के पौरुष का मुख्य कारक है, उसके अधिपति अहीर हैं. अहीर ब्राह्मण, गौ वंश, प्रजा पालक है और त्रेता युग, द्वापर युग, कलियुग में भी हजारों राजे रजवाड़े रहें हैं आज भी दर्जनों है,


बनारस अगर एक जीवन शैली है तो इसकी नींव हैं अहीर
वीरता में राजपूतों भी नहीं रहे अहीर के मुकाबले . लेकिन इतिहास लेखन में उसकी अनदेखी हुई.( रेख मतलब घनीभूत मस्ती. यानि भीतर तक खुशी के उत्सव में डूब जाना, खो जाना, विलीन हो जाना. खुद को उत्सव में एकाकार कर लेना. पर बनारस में मस्तमौला का पर्याय है अहीर. बनारस का अहीर धर्मभीरू है, रामलीला का नेमी है. भरत मिलाप का रथ उसके कंधे पर चलता है. काशी विश्वनाथ का भक्त है. गंगा का प्रहरी है, गोपालक है. मलाई रबड़ी चांपता है. जोड़ी नाल फेरता है. उसकी अपनी बोली और गाली है. बहरी अलंग की सैर करता है. निछद्दम में निपटता है. लंगोट कसकर दंड पेलता है. बिरहा गाता है. नगाड़े की आवाज़ सुनते ही उसके पांव थिरकने लगते हैं. उसे दीन दुनिया की परवाह नहीं है. सरोतर छानता है. शब्दकोश के मुताबिक अहीर आभीर का समानार्थी है जिसका मतलब है वीरता निडरता. बनारस और अहीर के इस वर्णन के पीछे भी एक कारण है. उत्तर प्रदेश के अहीर राव साहब, राय साहब, चौधरी साहब, जादौ जी के साथ साथ सरदार जी कहे जाते है,इस वर्णन की धारा कल्लू सरदार के अहाते से फूटती है. कल्लू सरदार में अहीरत्व के ये सारे गुण थे. वे मेरे मुहल्ले के हीरो थे. बनारस के नाल उठाने में नंबर एक. जोड़ी फेरने में अव्वल. कल्लू का दूध कारोबार था. मेरे घर के सामने ही रहते थे. दिन भर कबूतर बाज़ी और रात में दारू उनका शग़ल था. क़द साढ़े छ: फुट, चौड़ाई खली की तरह. रंग भुजंग जैसा, लंबा मुंह, टूटा कान (पहलवानों के ऐसे ही होते हैं) अन्दर की तरफ़ घुसे गाल, बारहों महीने आंखों में काजल, कानों में सोने की बाली, गले में सिकडी, कमर में गमछा, कंधे पर बूटी वाला गमछा, बाक़ी शरीर पर अखरंगा, सर पर साफा , आवाज़ में खनक. कल्लू नल पर हमेशा लटकती लांग वाले लंगोट के साथ नहाते मिल जाते. दिनभर छत पर कबूतर उड़ाते हुए टंगे रहते. कबूतर के उड़नशास्त्र की नाना ध्वनि वह अपने मुंह से निकालते. जब रात में कल्लू दारू पी लेते तो अपनी पत्नी को अपने ससुर की मां कह कर पुकारते. यह था कल्लू सरदार का निजी और सार्वजनिक ब्यौरा.

कल्लू सरदार के बारे में कुछ और बताने से पहले उनके व्यक्तित्व का परिचय देना बहुत जरूरी होगा. वे गाय भैंस पालते थे, दूध का कारोबार करते थे. शायद इसलिए गाय की तरह सीधे, बैल की तरह मेहनती और भैंस की तरह मूढ़ थे. यानि एकदम सादगी पसंद और बनावट से कोसों दूर. शहर में वे कल्लू पहलवान के नाम से जाने जाते थे. जिस औघड़नाथ की तकिया में कबीर को ब्रह्म ज्ञान हुआ था, कल्लू उसी अखाड़े के पहलवान थे. दो मन की नाल उठा लेते. जोड़ी के भी वे मास्टर थे. मैंने कभी उन्हें कुर्ता धोती पहने समूचा शहर नाप लेते. बताते हैं कल्लू जवानी में गुंडा थे. प्रसाद जी की कहानी गुंडा के नायक.

बनारस के अहीराने, अहीर जादा की पहचान

कल्लू पहलवान बनारस के अहीराने की पहचान थे. बनारस और अहीर. यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. इस शहर से अगर ब्राह्मण और अहीर जो कि यादव मे ब्राह्मण ही है को हटा दिया जाए तो इसका रस तत्व ही गायब हो जाएगा. इसे यूं समझिए कि जहां धर्म, संस्कृति, खानपान, दूध, मलाई, पहलवानी, अखाड़ा, गुंडई, रंगदारी, घालमेल हो वहां अहीर… आयुर्वेद में घी को उत्तम रसायन माना जाता है. रसायन यानि जो शरीर में रस भर दे. पौरुष में वृद्धि कर दे. घी का स्रोत दूध है और दूध का कारोबार इनका है. यानि घी जो मनुष्य के पौरुष का मुख्य कारक है, उसके अधिपति अहीर हैं. आप जानते हैं कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए आचार्य शंकर ने तेरह अखाड़े बनाए थे पर जब यह आध्यात्मिक अखाड़े जनता के बीच गए तो पहलवानी, जोड़ी, गदा, नाल के अखाड़े हुए और अहीरों ने ही इसका जिम्मा संभाला. बनारस में अखाड़े की स्थापना किसने की इसका कोई सिलसिला नहीं मिलता. मुगलकाल में समर्थ गुरु रामदास के शिष्यों ने यहां कुछ अखाड़े बनवाए. तुलसीदास ने भी तुलसी अखाड़ा बनाया. पर सभी अखाड़ों पर जलवा इन्ही का था. यही वजह है कि धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए आज भी काशी में अहीर ही सबसे आगे रहते हैं.

बनारसीपन का का केन्द्र अहीर हैं. बनारस के हर मुहल्ले में अहीराना इसका प्रमाण है. अहीराना यानी अहीरो का टोला. जहां दूध का कारोबार , गौ वंश पालन पोषण तो इसलीय ही किया गया की युद्ध प्रिय जाति है तो ताकत भी आनी चाहिए सो  गाय, भैंस, सांड जहां के स्थायी निवासी हो. अहिराने की चौहद्दी. रिश्तों की मेरी समझ ऐसे ही अहीराने में ही पैदा हुई. मैं पैदा हुआ मध्यमेश्वर (दारानगर) में और बड़ा हुआ पियरी पर. बनारस में ये दोनो ही मुहल्ले अहीर संस्कृति के ‘ब्रम्हकेन्द्र’ हैं . दुनियादारी में जब मेरी आंख खुली और जेहन जब रिश्तों की समझ से रोशन हुआ तो मेरे चाचा, चाची, ताऊ, काका, काकी, अहीर ही थे. दारानगर के रामप्रीत सरदार की चाय की दुकान पर अखबार बांचकर मेरे पिता जी ने अपनी साहित्यिक समझ विकसित की तो पियरी के बुधराया सरदार की कोयले की टाल पर अखबार पढ़कर मैंने अपनी राजनीतिक समझ बढ़ाई. मेरे संस्कार अहीरों के मोहल्ले के हैं इसीलिए मेरे भीतर कुछ प्रतिशत अहिरत्व आपको मिलेगा. शायद तभी मेरी पत्नी अक्सर मुझे कहा करती हैं कि तुम्हारी बोली भाषा अहीरों वाली है.

काशी का हर वीर अहीर है

बनारस में अहीर के लिए सरदार सम्मान सूचक शब्द है. सरदार इस शहर का कोई भी धार्मिक आयोजन अहीरों के बिना पूरा नहीं होता है. नाटी इमली के भरत मिलाप का रथ सिर पर लाल गमछे का मुरैठा बांधकर वही खींचते हैं. 

जेठ की दुपहरी में बरसात की कामना के लिए काशी विश्वनाथ का जलाभिषेक अहीर ही करते है 

,गंगा से विश्वनाथ मंदिर तक मानव श्रृंखला बनाकर. मुंडकट्टा बाबा के सालाना श्रृंगार पर गांजे की चिलम भी वही चढ़ाते हैं. 

राम नगर की रामलीला का दर्शक और पात्र अहीर ही होता है. 

काशी का हर वीर अहीर है. लहुराबीर, भोजूबीर, बोलियावीर,बेचूबीर इन सभी वीरों को शांत रखने का काम इसी बिरादरी का है.

 कबीर को कबीरत्व न प्राप्त होता, 

अगर कबीरचौरा के अहीरों ने उन्हें गांजा और सुल्फा न उपलब्ध कराया होता. 

औघड़नाथ की तकिया में कबीर को तत्व ज्ञान हुआ था. यह तकिया आज भी अहीरों का रिजर्व अखाड़ा है.

श्वेत क्रांति के लिए देश भले ही कुरियन साहब को जानता हो पर बनारस में श्वेत क्रांति के संवाहक अहीर लोग हैं. एक बार करूणानिधि से मिलकर मद्रास से लखनऊ लौटते वक्त सरकारी जहाज़ में मुलायम सिंह यादव ने बताया था कि कुरियन भी केरल के अहीर हैं. पर श्वेत क्रान्ति के लिए उनका जातीय गौरव ज़रूर था. दुनिया में हर चीज पकड़ी जा सकती है. उपग्रह किसी भी गतिविधि का चित्र ले सकता है. पेगासस कुछ भी सुन और देख सकता है लेकिन ऐसा कोई यंत्र आज तक नहीं बना जो दूध में पानी मिलाने के अहीरों के विविध तरीकों को खोज सके . मेरा बचपन बीत गया, पर मैं कल्लू सरदार की वह ट्रिक न समझ सका जिसमें दूध में पानी कब और कैसे मिल जाता था. सुबह सवेरे उनके उठने से पहले ही मैं दूध लेने पहुंच जाता था ताकि मैं उनकी कारीगरी पकड़ सकूं. पर वे क्या गजब के सिद्धहस्त थे! नाना विधि से वे गोरस का गोरख धंधा करते थे. मैं उनकी ओर टकटकी लगाए देखता रहता था. दुहने से पहले बाल्टी देखता था. उनकी हर अदा पर मैं बाज की नजर रखता था. ताकि वे पहले से रखी बाल्टी के पानी में दूध न मिला दें, मगर कल्लू सरदार अपनी तिकड़म में हमेशा कामयाब रहते. और मैं उनके सामने बकलोल.

अनंत काल से ही गाय इनकी माता रही है

उनका गौ प्रेम अद्धुत था.धर्म सम्राट करपात्री जी ने बीसवीं सदी के पांचवें दशक में नारा दिया था कि गाय हमारी माता है, देश धर्म का नाता है. पर बनारस के अहीर तो अनंत काल से ही गाय को अपनी माता मानते रहे हैं. खैर, लौटते हैं बनारस के अहीरत्व पर तो नगाड़ा अहीरों का राष्ट्रीय वाद्य है. गमछा उनकी राष्ट्रीय पोशाक. गमछे के नीचे लटकती लाल लंगोट की लांग उनकी पहचान है. सेंगरी, लोहबंद, गड़ासा , फर्शा, तलवार, भाला ढाल कृपाण कटारी धारी बर्क्शी रक्षक उपकरण. जिस वक्त कल्लू सरदार अपनी भैंसों को लेकर सड़क पर निकलते थे, 

वे काशी नरेश को भी कुछ नही समझते थे. मैं यह आज तक नहीं समझ पाया कि दारू, मारपीट और मलाई से क्या संबंध है? कल्लू सरदार रोज पीते थे. पीते ही घर आकर पत्नी की पिटाई करते थे. फिर सड़क पर जाकर मलाई लाते और पत्नी को खिलाते. मार के बाद मलाई! यह फार्मूला आज तक मैं नहीं समझ सका.

बनारस में अहीरों का इतिहास वीरता का है. विदेशी हमला हो या दंगा, बनारस की शान और जनता की रक्षा यही करते थे. लेकिन इतिहास लेखन में उसकी अनदेखी हुई. 

16 अगस्त 1781 को जब काशी राज्य के जमींदार चेत सिंह जो कम्पनी शासन से बग़ावत कर शिवाले के क़िले में जा छुपे थे,तो उन्हें वॉरेन हेस्टिंग्स की कम्पनी फ़ौज ने घेर लिया. ऐसे में बनारस के अहीरो ने ही मोर्चा सम्भाला. अपनी भैंसों को खोलकर उनकी तरफ़ दौड़ा दिया. सेंगरा,लोहबंद,और गड़ासे से कई अंग्रेज सैनिक निपट गए. इस लड़ाई से घबराकर वॉरेन हेस्टिंग्स पीछे हटा और भाग गया. तब लोक में यह गीत प्रचलित हुआ.
घोड़े पर हौदा , हाथी पर जीन
काशी से भागा, वॉरेन हेस्टिंग्स.

अहीरों ने की तुलसीदास के रामचरित मानस की मार्केटिंग

कल्लू सरदार के बहाने मैं बनारस के अहीरों के गौरवशाली इतिहास का बखान कर रहा हूं. इस इतिहास से तुलसीबाबा भी जुड़े हैं. तुलसी दास ने यहां रह कर रामचरितमानस तो लिख दी मगर अब उसकी मार्केटिंग कैसे हो, वह जन जन के बीच तक कैसे पहुंचे, यह बड़ा सवाल था? छापा खाना था नहीं. सोशल मीडिया का जमाना नहीं था सो तुलसी के समकालीन मेधा भगत ने संवत 1610 के आसपास बनारस में रामलीला शुरू की. इसी में रामचरितमानस मानस गाया जाता था. चित्रकूट रामलीला समिति भी इन्ही मेधाभगत ने बनाई जिसकी एक लीला, नाटी इमली का भरत मिलाप आज भी लक्खी मेला है. रामचरित मानस, रामलीला के साथ ही लोक प्रिय होने लगा. प्रयोग सफल रहा. तुलसी का रामचरितमानस रामलीलाओं के ज़रिए लोक तक पहुंच गया. रामलीला का इंतज़ाम अहीर लोग ही करते थे. आज भी नाटी इमली के भरत मिलाप के चालीस मन का रथ अहीरों के कंधे पर ही चलता है. सफ़ेद गंजी और धोती बांध सिर पर गमछे का मुरेठा कस यही बिरादरी यह रथ उठाती हैं . कल्लू सरदार भी हर साल रथ उठाने जाते थे. वे साफ़ा पानी दे, आंखें में काजल लगा, घुटनों तक धोती पहन,जांघ तक खलीतेदार बंडी पहने हुए इसका हिस्सा होते थे. बिना पनही के वे भरत मिलाप में जाते .लौट कर हम सबको रेवड़ी और चूड़े का प्रसाद देते.

कल्लू सरदार गजब के शौकीन थे. शौक़ीनी में तो कल्लू को राजा बनारस भी नहीं पाते. कल्लू ने बहरी अलंग जाने के लिए एक एक्का रखा था. चांदी की मुठिया, और चारों तरफ़ चांदी के जंगले वाले इस एक्के में लाइट भी लगी होती. यह एक्का बहुत ख़ूबसूरत था. घोड़ा भी उतना ही हसीन. सुबह से घोड़े के पैर में खरहरा दिया जाता. कल्लू के साथ साथ घोड़ा भी संध्या वंदन करता था. कल्लू रामनगर की रामलीला के नेमी थे. बिना नागा पूरे नियम धर्म से जो लीला देखने जाते है, उन्हे नेमी कहते हैं. कल्लू पूरे नियम से 31 दिन लीला देखने अपने एक्के से जाते.
इस एक महीने शराब पर पाबंदी रहती. हां रामनगर के तालाब पर साफ़ा पानी के बाद भांग ज़रूर जमती. अक्सर यहां ठंडाई भी बनती शरीफा, कसेरू, केला, तरबूज़, खस,
गुलाब, चंदन की ठंडई छनती थी. आंवले के पेड़ के नीचे. लिट्टी- बाटी लगती, पोतनी मिट्टी की भी ठंडई बनती. जिसमें पांच तरह के मगज तरबूज़, ख़रबूज़, ककड़ी, लौकी और कोहडे़ का बीज पीसा जाता फिर सौंफ काली मिर्च से उसका संस्कार होता. फिर अंतर फुलेल लगा लोग वापस लौटते.

बिरहा, इनका राष्ट्रीय गीत

कल्लू पहलवान को नागपंचमी के उत्सव का खास इंतजार रहता. बनारस में पहलवानों का ओलम्पिक नागपंचमी को ही होता था. सारे अखाड़े रंग पुत कर संवरते. कुश्ती, जोड़ी, गदा, नाल की प्रतियोगिता होती. यह काम भी अहीर लोग ही करते. कल्लू इस प्रतियोगिता में कई अखाड़ों के कम्पटीशन में शामिल होते और नाल जोड़ी के नीरज चोपड़ा घोषित होते. कल्लू बिरहा प्रेमी थे, बिरहा को बनारसी अहीरों का राष्ट्रीय गीत कहा जा सकता है. कजरी बनारस की प्रसिद्ध थी. इसे किन्ही बिहारी सरदार ने कुछ बदलाव कर नई लयकारी में गाना शुरू किया. उन्होंने सुर के लिए लोहे के दो ठोस टुकड़ों से करताल नाम का एक वाद्ययंत्र भी बनाया. बनारस की लोक संगीत परम्परा में बिहारी सरदार का यह गायन उनके नाम पर बिरहा कहा जाने लगा. प्राय: पौराणिक, सांस्कृतिक,
ऐतिहासिक सन्दर्भ बिरहा के विषय होते पर शहर की कोई सनसनीख़ेज़ घटना पर भी बिरहा बन जाता था.

कल्लू सरदार सबै भूमि गोपाल की परम्परा के संवाहक थे. इस विचारधारा का भी अपना एक जमीनी समीकरण था. पहले मुरव्वौत में सरकारी या किसी दूसरे की ज़मीन पर गाय भैंस के लिए खूंटा गाड़ना. फिर उस पर ट्रजमेंट्री राइट के तहत दावा करना. इसे वो अपना अधिकार समझते थे. कल्लू कहते लोहिया जी कहले हऊअन कि राजनीति में आना है तो ज़मीन से जुड़ना होगा.

अहीरत्व की चेतना उत्सवबोध की चेतना है

अहीर बनारस की शान हैं. उनका महात्म्य समझने के लिए आपको अहीरत्व की चेतना से दो चार होना पड़ेगा. अहीरत्व की चेतना उत्सवबोध की चेतना है. यह चेतना बनारस के वजूद में घुली हुई है. अब जब अहीरों पर लेखन का विस्तृत पन्ना खुल ही गया है तो उनकी उत्पत्ति पर भी विचार कर लेते हैं. सवाल है कि अहीर आए कहां से? इसके संकेत संस्कृत भाषा में छिपे हैं. अहीर शब्द संस्कृत का “अहिः” है. अहिः का अर्थ है- सर्प. “अहिः से ही “अहीर” रूपांतरण हुआ होगा. इसका एक मतलब अहीर लोग नाग-वंशी थे. परंतु Ahirs of Khandesh and their language के लेखक प्रो. के.पी. कुलकर्णी का मत इससे अलग है. वे मानते हैं कि अहीर शब्द आभीर का ही अपभ्रंश है. इसके प्रमाण में वे महाभारत और पुराणों के साक्ष्य देते हुए लिखते हैं कि महाभारत या पुराणों में आभीर शब्द का ही प्रयोग हुआ है,अहीर का नहीं. ज़्यादातर विद्वान मानते हैं कि अहीर शब्द संस्कृत के ‘आभीर’ शब्द का तद्भव रूप है जिसका अर्थ है- वीरता निडर,

दुग्धोत्पादन आभीरों या अहीरों का पैतृक व्यवसाय रहा है. प्राकृत-हिन्दी शब्दकोश के अनुसार भी अहीर व आभीर समानार्थी शब्द हैं. हिन्दी क्षेत्रों में अहीर, ग्वाला तथा यादव शब्द प्रायः परस्पर पर्यायवाची रूप में प्रयुक्त होते हैं. ‘आभीर’ शब्द संस्कृत से परंपरागत रूप में हिंदी में आया है. वामन शिवराम आप्टे ने संस्कृत हिंदी कोश में ‘आभीर शब्द के संदर्भ में लिखा है-
अभीर, वामनयनाहृतमानसाय, दत्तं मनो यदुपते त्वरितं गृहाण..

स्वयं कृष्ण के समय में गोकुल और उसके आसपास के निवासियों का मुख्य व्यवसाय गोपालन और दुग्धोत्पादन ही था. इस संदर्भ में एक तर्क यह भी है कि अहीर शब्द- “महीर” शब्द का रूपांतरण है. “मही” का अर्थ दही होता है अत: मही यानी दही बेचने वाले महीर के नाम से जाने गए और महीर शब्द बिगड़ते -बिगड़ते बाद में अहीर बन गया. आभीर गण का वर्णन महाभारत काल में मिलता है.

 स्वभाव और गुण की दृष्टि से यह जाति गोपालक और युद्धप्रिय रही है.

आज भी बातो बातो में किसी से मारपीट शुरु हो जाय तो जानें की पीटने वाला अहीर ही है

आज भी अहीर कानून व्यवस्था नही मानते हैं, देश के किसी भी हिस्से में यादव लोग हैं तो पुलिस प्रशासन, अदालत कोर्ट कचहरी अहीर यानि यादव लोगो के बलबूते ही है,

इतिहास में अहीर

भगवान श्री राम जी के दादी भी अहीर ही थीं और राम जी जाट, भरत की मां गुर्जर जाति की थी 

 इंडियन एंटीक्वैरी, खानदेश डिस्ट्रिक्ट गजेटियर, भांडारकर कृत दक्षिण का इतिहास, एंथोवेन लिखित” ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ बाम्बे और डॉ. ग्रियर्सन के भारतीय भाषा सर्वेक्षण, इन ग्रंथों में आभीरों के संन्दर्भ मिलते है. “भारतीय संस्कृति-कोश” में टॉलेमी और प्रो.जयचंद्र विद्यालंकार जैसे इतिहासकारों का हवाला देते हुए लिखा गया है- “आभीरों का मूल निवास मध्य-रशिया में कहीं रहा होगा.” टॉलेमी का तर्क है कि आभीर आइबेरिया के मूल निवासी थे. ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में आभीरों का प्रदेश बैट्रियन ग्रीकों ने जीत लिया और वहां अपना राज्य प्रतिष्ठित किया. टॉलेमी ने इस प्रदेश को इण्डोसिथिया नाम दिया है. यादव समाज में अहीर जाट गुर्जर जादौन गोप ग्वाला पाल चरवाहा सेन शर्मा बघेल बाघमार गडेरिया राजपुत मौर्य नंद गुप्त बंजारा आते हैं मुसलमान मे शेख सैयद  पठान खान के रुप मे तो सिख मे निहंग सिंह, अहीर तो यादव समाज में ब्राह्मण है आप को जानकर हैरानी होगी कि यहूदी आज भी अपने भगवान श्री कृष्ण जी महाराज को दूसरे रूपो में याद करते हैं और आज भी प्रार्थना होती है कि उनके मूल निवासी स्थान मथुरा ही है, पुरे विश्व में जब यहूदी को परेशान किया गया तो इसके उलट भारत में यहूदी का सम्मान हुआ था, यादव समाज में ही यहूदी यजीदी आते हैं और ईसाई धर्म के संस्थापक येशु मसीह यानि यीशु मसीह भी यादव मे चारवाहा थे जिनका जन्म गाय के गौशाला के चरनी में हुआ था, इनके माता पिता यहूदी थे और काम था भेड़ चराना, भारत में आज भी भेड़ चराने वाली जाति अहीर यानि यादव मे मौजूद हैं और यहूदी वास्तव मे यादव है येशु मसीह भारत में अपने मूल निवासी स्थान में आए थे 12 साल भारतीय संस्कृति परंपरा को कायम रखते हुए वापस अपने देश को गए थे तो चमत्कार पर चमत्कार करते थे और भारतीय योग प्राणायाम को विश्व के अन्य भागों में ज्ञान दिया, मसीह जब क्रॉस पर चढ़ाए गए तो तीन दीन के पहले उतार लिय गए जहां उनके मानने वालों ने उनको उनके पूर्वजों के देश भारत मे सुरक्षित भेज दिया गया आज भी इनकी कब्र धरती पर के स्वर्ण कश्मीर के पहलगाम में है, पहलगाम का अर्थ है भेड़ों का रखवाला , अहीर यानि यादव जो कि हिंदू नही भागवत धर्म के लोग हैं 


क्षत्रपों के सेनापति वृत्रभूति आभीर द्वारा 181 ई. में लिखे एक अभिलेख का प्रमाण देते हैं.

इसी तरह एन्थोवेन ने ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ बाम्बे में ईसा की तीसरी शताब्दी के अंत में काठियावाड़ में आभीरों के अधिपत्य को प्रमाणित करते है. वे नासिक अभिलेख (300 ई.) के आभीर-राजा ईश्वरसेन की ओर ध्यान खींच यह सिद्ध करते है कि खानदेश ही आभीरों का स्थायी निवास था. इधर मध्य-भारत में मिर्जापुर जिले का “अहिरौरा” तथा हरियाणा का “अहिछत्र” भी आभीरों के नाम से जाना जाता है. नैसफिल्ड, के.एम. मुन्शी तथा राजबली पांडेय का कथन है कि मनु की पुत्री इला और बुध से पुरुरवा का जन्म हुआ और इससे चंद्रवंश चला. चंद्रवंशी ही यादवों के वंशज हैं.


प्राचीन धर्मग्रंथों के मुताबिक़ बुध से पुरुरवा और पुरुरवा से आयु हुए. आयु से नहुष और नहुष से ययाति थे. ययाति राजा की दो पत्नियां थी, देवयानी और शर्मिष्ठा. देवयानी से यदु और तुर्वसु पैदा हुए. यदु के वंशज यादव कहलाए. द्वापर के अंत में यदुवंश के प्रतापी राजा शूरसेन हुए जिनके पुत्र वासुदेव थे. वासुदेव श्रीकृष्ण के पिता थे. आज यादव देश के अलग अलग भागों में विविध नामों से पुकारे जाते हैं. ‘हिन्दी भाषी क्षेत्र’ के ‘अहीर’ और ‘यादव’, महाराष्ट्र के ‘गवली’,आंध्र प्रदेश व कर्नाटक के ‘गोल्ला’, तथा तमिलनाडु के ‘कोनार’ तथा केरल के ‘मनियार’ हैं .

मार्कंडेय पुराण में आभीरों को दक्षिण देश का निवासी कहा गया है वहां वे पुण्ड्रक, केरल, पुलिन्द, आंध्र नामों से पहचाने जाने लगे. मत्स्यपुराण में दस आभीर राजाओं का ज़िक्र आता है यथा – दशाभीरास्तथा नृपाः. मथुरा अंधक संघ की राजधानी थी और द्वारिका वृष्णियों की. ये दोनों ही यदुवंश की शाखाएं थीं. यदुवंश में अंधक, वृष्णि, माधव, यादव आदि वंश चले. श्रीकृष्ण वृष्णि वंश से थे. वृष्णि ही ‘वार्ष्णेय’ कहलाए, जो बाद में वैष्णव हो गए. श्रीकृष्ण के पूर्वज महाराजा यदु थे. यदु के पिता का नाम ययाति था. ययाति प्रजापति ब्रह्मा की 10वीं पीढ़ी में हुए थे. ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1. पुरु, 2. यदु, 3. तुर्वस, 4. अनु और 5. द्रुहु. इन्हें वेदों में पंचनद कहा गया है.


पुराणों में ज़िक्र है कि ययाति अपने बड़े लड़के यदु से रुष्ट हो गए थे और उसे शाप दिया था कि यदु या उसके लड़कों को कभी राजपद नहीं मिलेगा. ययाति सबसे छोटे बेटे पुरु को बहुत अधिक चाहते थे और उसी को उन्होंने राज्य देने का विचार किया, लेकिन राजा के सभासदों ने बडे़ पुत्र के रहते हुए इस प्रस्ताव का विरोध किया. यदु ने पुरु का समर्थन किया और स्वयं राज्य लेने से इंकार कर दिया. इस पर पुरु को राजा घोषित किया गया. उसके वंशज पौरव कहलाए. कौरव भी यादव ही थे बाद में जरासंध के आक्रमण से त्रस्त होकर कारण था दामाद कंस की हत्या, और जरासंध कनौजिया यादव थे यानि यदुवंशी वैदिक क्षत्रिय ब्राह्मण तो 

श्रीकृष्ण ने मथुरा से अपने 64 कुल के हजारों लोगों के साथ पलायन किया तो वे कुशस्थली आ गए और यहीं उन्होंने नई नगरी बसाई और जिसका नामद्वारका रखा. इसमें सैकड़ों द्वार थे इसीलिए इसे द्वारका या द्वारिका कहा गया. इस शहर को श्रीकृष्‍ण ने विश्वकर्मा और मयासुर मय दानव की सहायता से बनवाया था.


श्रीकृष्ण के अहीरों से रिश्ते के बारे में ऐतिहासिक मीमांसाएं भी हैं. इतिहासकार डीडी कौशाम्बी ने अपनी किताब ‘प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता’ में लिखा है-‘ऋग्वेद में कृष्ण को दानव और इंद्र का शत्रु बताया गया है. कृष्ण शाश्वत भी हैं और मामा कंस से बचाने के लिए उसे गोकुल में पाला गया था. इस स्थानांतरण ने उसे उन अहीरों से भी जोड़ दिया जो ईसा की आरंभिक सदियों में ऐतिहासिक एवं पशुपालक लोग थे. कृष्ण गोरक्षक थे, जिन यज्ञों में पशुबलि दी जाती थी, उनमें कृष्ण का कभी आह्वान नहीं हुआ है, जबकि इंद्र, वरुण तथा अन्य वैदिक देवताओं का सदैव आह्वान हुआ है. कौशाम्बी लिखते हैं कि कृष्ण आर्यों की पशु बलि के सख्त विरोधी थे यानि गोरक्षक थे. और गौ वंश, ब्राह्मण के साथ साथ प्रजा पालक होने के लिए अग्रसर किए

 

आदि से लेकर अब तक अहीरों का इतिहास पराक्रम और खून से सना हुआ है. वे इतिहास में सर्वथा पूज्य हैं, वर्तमान में प्रासंगिक हैं और भविष्य की संभावनाओं का द्वार हैं. धर्म, समाज, राजनीति, साहित्य, युद्ध सरीखे जीवन के अलग अलग क्षेत्रों में वे शीर्ष पर रहे हैं. बनारस के अहीरों ने मुझे अहीराने की इस महान परंपरा से वाकिफ कराया. कल्लू सरदार के जीवन ने मेरे भीतर इस महान विरासत के प्रति श्रद्धा और आस्था की बुनियाद रखी. बनारस अगर एक जीवन शैली है तो अहीर इस जीवन शैली की नींव के पत्थर हैं. बिना नींव के कंगूरे की कभी कल्पना भी नही की जा सकती. अहीराने की इस महान विरासत को प्रणाम.


सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...