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अहीर Ahir यानी यादव मे ब्राह्मण सह क्षत्रिय


बनारस अगर एक जीवन शैली है तो अहीर रगो मे बहता खून है, अहीर यादव मे ब्राह्मण है, शुद्ध सात्विक शाकाहारी 

अहीर जाति संरचना में भी सबसे आगे है, अहीर यादव मे ब्राह्मण है और इसके सैकड़ों उदाहरण है, ब्राह्मण ही पहला पुजा का अधिकारी है और बनारस में यह नियम आज भी दिखाई देता है,

आयुर्वेद में घी को उत्तम रसायन माना जाता है. रसायन यानि जो शरीर में रस भर दे. पौरुष में वृद्धि कर दे. घी का स्रोत दूध है और दूध का कारोबार इनका है. यानि घी जो मनुष्य के पौरुष का मुख्य कारक है, उसके अधिपति अहीर हैं. अहीर ब्राह्मण, गौ वंश, प्रजा पालक है और त्रेता युग, द्वापर युग, कलियुग में भी हजारों राजे रजवाड़े रहें हैं आज भी दर्जनों है,


बनारस अगर एक जीवन शैली है तो इसकी नींव हैं अहीर
वीरता में राजपूतों भी नहीं रहे अहीर के मुकाबले . लेकिन इतिहास लेखन में उसकी अनदेखी हुई.( रेख मतलब घनीभूत मस्ती. यानि भीतर तक खुशी के उत्सव में डूब जाना, खो जाना, विलीन हो जाना. खुद को उत्सव में एकाकार कर लेना. पर बनारस में मस्तमौला का पर्याय है अहीर. बनारस का अहीर धर्मभीरू है, रामलीला का नेमी है. भरत मिलाप का रथ उसके कंधे पर चलता है. काशी विश्वनाथ का भक्त है. गंगा का प्रहरी है, गोपालक है. मलाई रबड़ी चांपता है. जोड़ी नाल फेरता है. उसकी अपनी बोली और गाली है. बहरी अलंग की सैर करता है. निछद्दम में निपटता है. लंगोट कसकर दंड पेलता है. बिरहा गाता है. नगाड़े की आवाज़ सुनते ही उसके पांव थिरकने लगते हैं. उसे दीन दुनिया की परवाह नहीं है. सरोतर छानता है. शब्दकोश के मुताबिक अहीर आभीर का समानार्थी है जिसका मतलब है वीरता निडरता. बनारस और अहीर के इस वर्णन के पीछे भी एक कारण है. उत्तर प्रदेश के अहीर राव साहब, राय साहब, चौधरी साहब, जादौ जी के साथ साथ सरदार जी कहे जाते है,इस वर्णन की धारा कल्लू सरदार के अहाते से फूटती है. कल्लू सरदार में अहीरत्व के ये सारे गुण थे. वे मेरे मुहल्ले के हीरो थे. बनारस के नाल उठाने में नंबर एक. जोड़ी फेरने में अव्वल. कल्लू का दूध कारोबार था. मेरे घर के सामने ही रहते थे. दिन भर कबूतर बाज़ी और रात में दारू उनका शग़ल था. क़द साढ़े छ: फुट, चौड़ाई खली की तरह. रंग भुजंग जैसा, लंबा मुंह, टूटा कान (पहलवानों के ऐसे ही होते हैं) अन्दर की तरफ़ घुसे गाल, बारहों महीने आंखों में काजल, कानों में सोने की बाली, गले में सिकडी, कमर में गमछा, कंधे पर बूटी वाला गमछा, बाक़ी शरीर पर अखरंगा, सर पर साफा , आवाज़ में खनक. कल्लू नल पर हमेशा लटकती लांग वाले लंगोट के साथ नहाते मिल जाते. दिनभर छत पर कबूतर उड़ाते हुए टंगे रहते. कबूतर के उड़नशास्त्र की नाना ध्वनि वह अपने मुंह से निकालते. जब रात में कल्लू दारू पी लेते तो अपनी पत्नी को अपने ससुर की मां कह कर पुकारते. यह था कल्लू सरदार का निजी और सार्वजनिक ब्यौरा.

कल्लू सरदार के बारे में कुछ और बताने से पहले उनके व्यक्तित्व का परिचय देना बहुत जरूरी होगा. वे गाय भैंस पालते थे, दूध का कारोबार करते थे. शायद इसलिए गाय की तरह सीधे, बैल की तरह मेहनती और भैंस की तरह मूढ़ थे. यानि एकदम सादगी पसंद और बनावट से कोसों दूर. शहर में वे कल्लू पहलवान के नाम से जाने जाते थे. जिस औघड़नाथ की तकिया में कबीर को ब्रह्म ज्ञान हुआ था, कल्लू उसी अखाड़े के पहलवान थे. दो मन की नाल उठा लेते. जोड़ी के भी वे मास्टर थे. मैंने कभी उन्हें कुर्ता धोती पहने समूचा शहर नाप लेते. बताते हैं कल्लू जवानी में गुंडा थे. प्रसाद जी की कहानी गुंडा के नायक.

बनारस के अहीराने, अहीर जादा की पहचान

कल्लू पहलवान बनारस के अहीराने की पहचान थे. बनारस और अहीर. यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. इस शहर से अगर ब्राह्मण और अहीर जो कि यादव मे ब्राह्मण ही है को हटा दिया जाए तो इसका रस तत्व ही गायब हो जाएगा. इसे यूं समझिए कि जहां धर्म, संस्कृति, खानपान, दूध, मलाई, पहलवानी, अखाड़ा, गुंडई, रंगदारी, घालमेल हो वहां अहीर… आयुर्वेद में घी को उत्तम रसायन माना जाता है. रसायन यानि जो शरीर में रस भर दे. पौरुष में वृद्धि कर दे. घी का स्रोत दूध है और दूध का कारोबार इनका है. यानि घी जो मनुष्य के पौरुष का मुख्य कारक है, उसके अधिपति अहीर हैं. आप जानते हैं कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए आचार्य शंकर ने तेरह अखाड़े बनाए थे पर जब यह आध्यात्मिक अखाड़े जनता के बीच गए तो पहलवानी, जोड़ी, गदा, नाल के अखाड़े हुए और अहीरों ने ही इसका जिम्मा संभाला. बनारस में अखाड़े की स्थापना किसने की इसका कोई सिलसिला नहीं मिलता. मुगलकाल में समर्थ गुरु रामदास के शिष्यों ने यहां कुछ अखाड़े बनवाए. तुलसीदास ने भी तुलसी अखाड़ा बनाया. पर सभी अखाड़ों पर जलवा इन्ही का था. यही वजह है कि धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए आज भी काशी में अहीर ही सबसे आगे रहते हैं.

बनारसीपन का का केन्द्र अहीर हैं. बनारस के हर मुहल्ले में अहीराना इसका प्रमाण है. अहीराना यानी अहीरो का टोला. जहां दूध का कारोबार , गौ वंश पालन पोषण तो इसलीय ही किया गया की युद्ध प्रिय जाति है तो ताकत भी आनी चाहिए सो  गाय, भैंस, सांड जहां के स्थायी निवासी हो. अहिराने की चौहद्दी. रिश्तों की मेरी समझ ऐसे ही अहीराने में ही पैदा हुई. मैं पैदा हुआ मध्यमेश्वर (दारानगर) में और बड़ा हुआ पियरी पर. बनारस में ये दोनो ही मुहल्ले अहीर संस्कृति के ‘ब्रम्हकेन्द्र’ हैं . दुनियादारी में जब मेरी आंख खुली और जेहन जब रिश्तों की समझ से रोशन हुआ तो मेरे चाचा, चाची, ताऊ, काका, काकी, अहीर ही थे. दारानगर के रामप्रीत सरदार की चाय की दुकान पर अखबार बांचकर मेरे पिता जी ने अपनी साहित्यिक समझ विकसित की तो पियरी के बुधराया सरदार की कोयले की टाल पर अखबार पढ़कर मैंने अपनी राजनीतिक समझ बढ़ाई. मेरे संस्कार अहीरों के मोहल्ले के हैं इसीलिए मेरे भीतर कुछ प्रतिशत अहिरत्व आपको मिलेगा. शायद तभी मेरी पत्नी अक्सर मुझे कहा करती हैं कि तुम्हारी बोली भाषा अहीरों वाली है.

काशी का हर वीर अहीर है

बनारस में अहीर के लिए सरदार सम्मान सूचक शब्द है. सरदार इस शहर का कोई भी धार्मिक आयोजन अहीरों के बिना पूरा नहीं होता है. नाटी इमली के भरत मिलाप का रथ सिर पर लाल गमछे का मुरैठा बांधकर वही खींचते हैं. 

जेठ की दुपहरी में बरसात की कामना के लिए काशी विश्वनाथ का जलाभिषेक अहीर ही करते है 

,गंगा से विश्वनाथ मंदिर तक मानव श्रृंखला बनाकर. मुंडकट्टा बाबा के सालाना श्रृंगार पर गांजे की चिलम भी वही चढ़ाते हैं. 

राम नगर की रामलीला का दर्शक और पात्र अहीर ही होता है. 

काशी का हर वीर अहीर है. लहुराबीर, भोजूबीर, बोलियावीर,बेचूबीर इन सभी वीरों को शांत रखने का काम इसी बिरादरी का है.

 कबीर को कबीरत्व न प्राप्त होता, 

अगर कबीरचौरा के अहीरों ने उन्हें गांजा और सुल्फा न उपलब्ध कराया होता. 

औघड़नाथ की तकिया में कबीर को तत्व ज्ञान हुआ था. यह तकिया आज भी अहीरों का रिजर्व अखाड़ा है.

श्वेत क्रांति के लिए देश भले ही कुरियन साहब को जानता हो पर बनारस में श्वेत क्रांति के संवाहक अहीर लोग हैं. एक बार करूणानिधि से मिलकर मद्रास से लखनऊ लौटते वक्त सरकारी जहाज़ में मुलायम सिंह यादव ने बताया था कि कुरियन भी केरल के अहीर हैं. पर श्वेत क्रान्ति के लिए उनका जातीय गौरव ज़रूर था. दुनिया में हर चीज पकड़ी जा सकती है. उपग्रह किसी भी गतिविधि का चित्र ले सकता है. पेगासस कुछ भी सुन और देख सकता है लेकिन ऐसा कोई यंत्र आज तक नहीं बना जो दूध में पानी मिलाने के अहीरों के विविध तरीकों को खोज सके . मेरा बचपन बीत गया, पर मैं कल्लू सरदार की वह ट्रिक न समझ सका जिसमें दूध में पानी कब और कैसे मिल जाता था. सुबह सवेरे उनके उठने से पहले ही मैं दूध लेने पहुंच जाता था ताकि मैं उनकी कारीगरी पकड़ सकूं. पर वे क्या गजब के सिद्धहस्त थे! नाना विधि से वे गोरस का गोरख धंधा करते थे. मैं उनकी ओर टकटकी लगाए देखता रहता था. दुहने से पहले बाल्टी देखता था. उनकी हर अदा पर मैं बाज की नजर रखता था. ताकि वे पहले से रखी बाल्टी के पानी में दूध न मिला दें, मगर कल्लू सरदार अपनी तिकड़म में हमेशा कामयाब रहते. और मैं उनके सामने बकलोल.

अनंत काल से ही गाय इनकी माता रही है

उनका गौ प्रेम अद्धुत था.धर्म सम्राट करपात्री जी ने बीसवीं सदी के पांचवें दशक में नारा दिया था कि गाय हमारी माता है, देश धर्म का नाता है. पर बनारस के अहीर तो अनंत काल से ही गाय को अपनी माता मानते रहे हैं. खैर, लौटते हैं बनारस के अहीरत्व पर तो नगाड़ा अहीरों का राष्ट्रीय वाद्य है. गमछा उनकी राष्ट्रीय पोशाक. गमछे के नीचे लटकती लाल लंगोट की लांग उनकी पहचान है. सेंगरी, लोहबंद, गड़ासा , फर्शा, तलवार, भाला ढाल कृपाण कटारी धारी बर्क्शी रक्षक उपकरण. जिस वक्त कल्लू सरदार अपनी भैंसों को लेकर सड़क पर निकलते थे, 

वे काशी नरेश को भी कुछ नही समझते थे. मैं यह आज तक नहीं समझ पाया कि दारू, मारपीट और मलाई से क्या संबंध है? कल्लू सरदार रोज पीते थे. पीते ही घर आकर पत्नी की पिटाई करते थे. फिर सड़क पर जाकर मलाई लाते और पत्नी को खिलाते. मार के बाद मलाई! यह फार्मूला आज तक मैं नहीं समझ सका.

बनारस में अहीरों का इतिहास वीरता का है. विदेशी हमला हो या दंगा, बनारस की शान और जनता की रक्षा यही करते थे. लेकिन इतिहास लेखन में उसकी अनदेखी हुई. 

16 अगस्त 1781 को जब काशी राज्य के जमींदार चेत सिंह जो कम्पनी शासन से बग़ावत कर शिवाले के क़िले में जा छुपे थे,तो उन्हें वॉरेन हेस्टिंग्स की कम्पनी फ़ौज ने घेर लिया. ऐसे में बनारस के अहीरो ने ही मोर्चा सम्भाला. अपनी भैंसों को खोलकर उनकी तरफ़ दौड़ा दिया. सेंगरा,लोहबंद,और गड़ासे से कई अंग्रेज सैनिक निपट गए. इस लड़ाई से घबराकर वॉरेन हेस्टिंग्स पीछे हटा और भाग गया. तब लोक में यह गीत प्रचलित हुआ.
घोड़े पर हौदा , हाथी पर जीन
काशी से भागा, वॉरेन हेस्टिंग्स.

अहीरों ने की तुलसीदास के रामचरित मानस की मार्केटिंग

कल्लू सरदार के बहाने मैं बनारस के अहीरों के गौरवशाली इतिहास का बखान कर रहा हूं. इस इतिहास से तुलसीबाबा भी जुड़े हैं. तुलसी दास ने यहां रह कर रामचरितमानस तो लिख दी मगर अब उसकी मार्केटिंग कैसे हो, वह जन जन के बीच तक कैसे पहुंचे, यह बड़ा सवाल था? छापा खाना था नहीं. सोशल मीडिया का जमाना नहीं था सो तुलसी के समकालीन मेधा भगत ने संवत 1610 के आसपास बनारस में रामलीला शुरू की. इसी में रामचरितमानस मानस गाया जाता था. चित्रकूट रामलीला समिति भी इन्ही मेधाभगत ने बनाई जिसकी एक लीला, नाटी इमली का भरत मिलाप आज भी लक्खी मेला है. रामचरित मानस, रामलीला के साथ ही लोक प्रिय होने लगा. प्रयोग सफल रहा. तुलसी का रामचरितमानस रामलीलाओं के ज़रिए लोक तक पहुंच गया. रामलीला का इंतज़ाम अहीर लोग ही करते थे. आज भी नाटी इमली के भरत मिलाप के चालीस मन का रथ अहीरों के कंधे पर ही चलता है. सफ़ेद गंजी और धोती बांध सिर पर गमछे का मुरेठा कस यही बिरादरी यह रथ उठाती हैं . कल्लू सरदार भी हर साल रथ उठाने जाते थे. वे साफ़ा पानी दे, आंखें में काजल लगा, घुटनों तक धोती पहन,जांघ तक खलीतेदार बंडी पहने हुए इसका हिस्सा होते थे. बिना पनही के वे भरत मिलाप में जाते .लौट कर हम सबको रेवड़ी और चूड़े का प्रसाद देते.

कल्लू सरदार गजब के शौकीन थे. शौक़ीनी में तो कल्लू को राजा बनारस भी नहीं पाते. कल्लू ने बहरी अलंग जाने के लिए एक एक्का रखा था. चांदी की मुठिया, और चारों तरफ़ चांदी के जंगले वाले इस एक्के में लाइट भी लगी होती. यह एक्का बहुत ख़ूबसूरत था. घोड़ा भी उतना ही हसीन. सुबह से घोड़े के पैर में खरहरा दिया जाता. कल्लू के साथ साथ घोड़ा भी संध्या वंदन करता था. कल्लू रामनगर की रामलीला के नेमी थे. बिना नागा पूरे नियम धर्म से जो लीला देखने जाते है, उन्हे नेमी कहते हैं. कल्लू पूरे नियम से 31 दिन लीला देखने अपने एक्के से जाते.
इस एक महीने शराब पर पाबंदी रहती. हां रामनगर के तालाब पर साफ़ा पानी के बाद भांग ज़रूर जमती. अक्सर यहां ठंडाई भी बनती शरीफा, कसेरू, केला, तरबूज़, खस,
गुलाब, चंदन की ठंडई छनती थी. आंवले के पेड़ के नीचे. लिट्टी- बाटी लगती, पोतनी मिट्टी की भी ठंडई बनती. जिसमें पांच तरह के मगज तरबूज़, ख़रबूज़, ककड़ी, लौकी और कोहडे़ का बीज पीसा जाता फिर सौंफ काली मिर्च से उसका संस्कार होता. फिर अंतर फुलेल लगा लोग वापस लौटते.

बिरहा, इनका राष्ट्रीय गीत

कल्लू पहलवान को नागपंचमी के उत्सव का खास इंतजार रहता. बनारस में पहलवानों का ओलम्पिक नागपंचमी को ही होता था. सारे अखाड़े रंग पुत कर संवरते. कुश्ती, जोड़ी, गदा, नाल की प्रतियोगिता होती. यह काम भी अहीर लोग ही करते. कल्लू इस प्रतियोगिता में कई अखाड़ों के कम्पटीशन में शामिल होते और नाल जोड़ी के नीरज चोपड़ा घोषित होते. कल्लू बिरहा प्रेमी थे, बिरहा को बनारसी अहीरों का राष्ट्रीय गीत कहा जा सकता है. कजरी बनारस की प्रसिद्ध थी. इसे किन्ही बिहारी सरदार ने कुछ बदलाव कर नई लयकारी में गाना शुरू किया. उन्होंने सुर के लिए लोहे के दो ठोस टुकड़ों से करताल नाम का एक वाद्ययंत्र भी बनाया. बनारस की लोक संगीत परम्परा में बिहारी सरदार का यह गायन उनके नाम पर बिरहा कहा जाने लगा. प्राय: पौराणिक, सांस्कृतिक,
ऐतिहासिक सन्दर्भ बिरहा के विषय होते पर शहर की कोई सनसनीख़ेज़ घटना पर भी बिरहा बन जाता था.

कल्लू सरदार सबै भूमि गोपाल की परम्परा के संवाहक थे. इस विचारधारा का भी अपना एक जमीनी समीकरण था. पहले मुरव्वौत में सरकारी या किसी दूसरे की ज़मीन पर गाय भैंस के लिए खूंटा गाड़ना. फिर उस पर ट्रजमेंट्री राइट के तहत दावा करना. इसे वो अपना अधिकार समझते थे. कल्लू कहते लोहिया जी कहले हऊअन कि राजनीति में आना है तो ज़मीन से जुड़ना होगा.

अहीरत्व की चेतना उत्सवबोध की चेतना है

अहीर बनारस की शान हैं. उनका महात्म्य समझने के लिए आपको अहीरत्व की चेतना से दो चार होना पड़ेगा. अहीरत्व की चेतना उत्सवबोध की चेतना है. यह चेतना बनारस के वजूद में घुली हुई है. अब जब अहीरों पर लेखन का विस्तृत पन्ना खुल ही गया है तो उनकी उत्पत्ति पर भी विचार कर लेते हैं. सवाल है कि अहीर आए कहां से? इसके संकेत संस्कृत भाषा में छिपे हैं. अहीर शब्द संस्कृत का “अहिः” है. अहिः का अर्थ है- सर्प. “अहिः से ही “अहीर” रूपांतरण हुआ होगा. इसका एक मतलब अहीर लोग नाग-वंशी थे. परंतु Ahirs of Khandesh and their language के लेखक प्रो. के.पी. कुलकर्णी का मत इससे अलग है. वे मानते हैं कि अहीर शब्द आभीर का ही अपभ्रंश है. इसके प्रमाण में वे महाभारत और पुराणों के साक्ष्य देते हुए लिखते हैं कि महाभारत या पुराणों में आभीर शब्द का ही प्रयोग हुआ है,अहीर का नहीं. ज़्यादातर विद्वान मानते हैं कि अहीर शब्द संस्कृत के ‘आभीर’ शब्द का तद्भव रूप है जिसका अर्थ है- वीरता निडर,

दुग्धोत्पादन आभीरों या अहीरों का पैतृक व्यवसाय रहा है. प्राकृत-हिन्दी शब्दकोश के अनुसार भी अहीर व आभीर समानार्थी शब्द हैं. हिन्दी क्षेत्रों में अहीर, ग्वाला तथा यादव शब्द प्रायः परस्पर पर्यायवाची रूप में प्रयुक्त होते हैं. ‘आभीर’ शब्द संस्कृत से परंपरागत रूप में हिंदी में आया है. वामन शिवराम आप्टे ने संस्कृत हिंदी कोश में ‘आभीर शब्द के संदर्भ में लिखा है-
अभीर, वामनयनाहृतमानसाय, दत्तं मनो यदुपते त्वरितं गृहाण..

स्वयं कृष्ण के समय में गोकुल और उसके आसपास के निवासियों का मुख्य व्यवसाय गोपालन और दुग्धोत्पादन ही था. इस संदर्भ में एक तर्क यह भी है कि अहीर शब्द- “महीर” शब्द का रूपांतरण है. “मही” का अर्थ दही होता है अत: मही यानी दही बेचने वाले महीर के नाम से जाने गए और महीर शब्द बिगड़ते -बिगड़ते बाद में अहीर बन गया. आभीर गण का वर्णन महाभारत काल में मिलता है.

 स्वभाव और गुण की दृष्टि से यह जाति गोपालक और युद्धप्रिय रही है.

आज भी बातो बातो में किसी से मारपीट शुरु हो जाय तो जानें की पीटने वाला अहीर ही है

आज भी अहीर कानून व्यवस्था नही मानते हैं, देश के किसी भी हिस्से में यादव लोग हैं तो पुलिस प्रशासन, अदालत कोर्ट कचहरी अहीर यानि यादव लोगो के बलबूते ही है,

इतिहास में अहीर

भगवान श्री राम जी के दादी भी अहीर ही थीं और राम जी जाट, भरत की मां गुर्जर जाति की थी 

 इंडियन एंटीक्वैरी, खानदेश डिस्ट्रिक्ट गजेटियर, भांडारकर कृत दक्षिण का इतिहास, एंथोवेन लिखित” ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ बाम्बे और डॉ. ग्रियर्सन के भारतीय भाषा सर्वेक्षण, इन ग्रंथों में आभीरों के संन्दर्भ मिलते है. “भारतीय संस्कृति-कोश” में टॉलेमी और प्रो.जयचंद्र विद्यालंकार जैसे इतिहासकारों का हवाला देते हुए लिखा गया है- “आभीरों का मूल निवास मध्य-रशिया में कहीं रहा होगा.” टॉलेमी का तर्क है कि आभीर आइबेरिया के मूल निवासी थे. ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में आभीरों का प्रदेश बैट्रियन ग्रीकों ने जीत लिया और वहां अपना राज्य प्रतिष्ठित किया. टॉलेमी ने इस प्रदेश को इण्डोसिथिया नाम दिया है. यादव समाज में अहीर जाट गुर्जर जादौन गोप ग्वाला पाल चरवाहा सेन शर्मा बघेल बाघमार गडेरिया राजपुत मौर्य नंद गुप्त बंजारा आते हैं मुसलमान मे शेख सैयद  पठान खान के रुप मे तो सिख मे निहंग सिंह, अहीर तो यादव समाज में ब्राह्मण है आप को जानकर हैरानी होगी कि यहूदी आज भी अपने भगवान श्री कृष्ण जी महाराज को दूसरे रूपो में याद करते हैं और आज भी प्रार्थना होती है कि उनके मूल निवासी स्थान मथुरा ही है, पुरे विश्व में जब यहूदी को परेशान किया गया तो इसके उलट भारत में यहूदी का सम्मान हुआ था, यादव समाज में ही यहूदी यजीदी आते हैं और ईसाई धर्म के संस्थापक येशु मसीह यानि यीशु मसीह भी यादव मे चारवाहा थे जिनका जन्म गाय के गौशाला के चरनी में हुआ था, इनके माता पिता यहूदी थे और काम था भेड़ चराना, भारत में आज भी भेड़ चराने वाली जाति अहीर यानि यादव मे मौजूद हैं और यहूदी वास्तव मे यादव है येशु मसीह भारत में अपने मूल निवासी स्थान में आए थे 12 साल भारतीय संस्कृति परंपरा को कायम रखते हुए वापस अपने देश को गए थे तो चमत्कार पर चमत्कार करते थे और भारतीय योग प्राणायाम को विश्व के अन्य भागों में ज्ञान दिया, मसीह जब क्रॉस पर चढ़ाए गए तो तीन दीन के पहले उतार लिय गए जहां उनके मानने वालों ने उनको उनके पूर्वजों के देश भारत मे सुरक्षित भेज दिया गया आज भी इनकी कब्र धरती पर के स्वर्ण कश्मीर के पहलगाम में है, पहलगाम का अर्थ है भेड़ों का रखवाला , अहीर यानि यादव जो कि हिंदू नही भागवत धर्म के लोग हैं 


क्षत्रपों के सेनापति वृत्रभूति आभीर द्वारा 181 ई. में लिखे एक अभिलेख का प्रमाण देते हैं.

इसी तरह एन्थोवेन ने ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ बाम्बे में ईसा की तीसरी शताब्दी के अंत में काठियावाड़ में आभीरों के अधिपत्य को प्रमाणित करते है. वे नासिक अभिलेख (300 ई.) के आभीर-राजा ईश्वरसेन की ओर ध्यान खींच यह सिद्ध करते है कि खानदेश ही आभीरों का स्थायी निवास था. इधर मध्य-भारत में मिर्जापुर जिले का “अहिरौरा” तथा हरियाणा का “अहिछत्र” भी आभीरों के नाम से जाना जाता है. नैसफिल्ड, के.एम. मुन्शी तथा राजबली पांडेय का कथन है कि मनु की पुत्री इला और बुध से पुरुरवा का जन्म हुआ और इससे चंद्रवंश चला. चंद्रवंशी ही यादवों के वंशज हैं.


प्राचीन धर्मग्रंथों के मुताबिक़ बुध से पुरुरवा और पुरुरवा से आयु हुए. आयु से नहुष और नहुष से ययाति थे. ययाति राजा की दो पत्नियां थी, देवयानी और शर्मिष्ठा. देवयानी से यदु और तुर्वसु पैदा हुए. यदु के वंशज यादव कहलाए. द्वापर के अंत में यदुवंश के प्रतापी राजा शूरसेन हुए जिनके पुत्र वासुदेव थे. वासुदेव श्रीकृष्ण के पिता थे. आज यादव देश के अलग अलग भागों में विविध नामों से पुकारे जाते हैं. ‘हिन्दी भाषी क्षेत्र’ के ‘अहीर’ और ‘यादव’, महाराष्ट्र के ‘गवली’,आंध्र प्रदेश व कर्नाटक के ‘गोल्ला’, तथा तमिलनाडु के ‘कोनार’ तथा केरल के ‘मनियार’ हैं .

मार्कंडेय पुराण में आभीरों को दक्षिण देश का निवासी कहा गया है वहां वे पुण्ड्रक, केरल, पुलिन्द, आंध्र नामों से पहचाने जाने लगे. मत्स्यपुराण में दस आभीर राजाओं का ज़िक्र आता है यथा – दशाभीरास्तथा नृपाः. मथुरा अंधक संघ की राजधानी थी और द्वारिका वृष्णियों की. ये दोनों ही यदुवंश की शाखाएं थीं. यदुवंश में अंधक, वृष्णि, माधव, यादव आदि वंश चले. श्रीकृष्ण वृष्णि वंश से थे. वृष्णि ही ‘वार्ष्णेय’ कहलाए, जो बाद में वैष्णव हो गए. श्रीकृष्ण के पूर्वज महाराजा यदु थे. यदु के पिता का नाम ययाति था. ययाति प्रजापति ब्रह्मा की 10वीं पीढ़ी में हुए थे. ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1. पुरु, 2. यदु, 3. तुर्वस, 4. अनु और 5. द्रुहु. इन्हें वेदों में पंचनद कहा गया है.


पुराणों में ज़िक्र है कि ययाति अपने बड़े लड़के यदु से रुष्ट हो गए थे और उसे शाप दिया था कि यदु या उसके लड़कों को कभी राजपद नहीं मिलेगा. ययाति सबसे छोटे बेटे पुरु को बहुत अधिक चाहते थे और उसी को उन्होंने राज्य देने का विचार किया, लेकिन राजा के सभासदों ने बडे़ पुत्र के रहते हुए इस प्रस्ताव का विरोध किया. यदु ने पुरु का समर्थन किया और स्वयं राज्य लेने से इंकार कर दिया. इस पर पुरु को राजा घोषित किया गया. उसके वंशज पौरव कहलाए. कौरव भी यादव ही थे बाद में जरासंध के आक्रमण से त्रस्त होकर कारण था दामाद कंस की हत्या, और जरासंध कनौजिया यादव थे यानि यदुवंशी वैदिक क्षत्रिय ब्राह्मण तो 

श्रीकृष्ण ने मथुरा से अपने 64 कुल के हजारों लोगों के साथ पलायन किया तो वे कुशस्थली आ गए और यहीं उन्होंने नई नगरी बसाई और जिसका नामद्वारका रखा. इसमें सैकड़ों द्वार थे इसीलिए इसे द्वारका या द्वारिका कहा गया. इस शहर को श्रीकृष्‍ण ने विश्वकर्मा और मयासुर मय दानव की सहायता से बनवाया था.


श्रीकृष्ण के अहीरों से रिश्ते के बारे में ऐतिहासिक मीमांसाएं भी हैं. इतिहासकार डीडी कौशाम्बी ने अपनी किताब ‘प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता’ में लिखा है-‘ऋग्वेद में कृष्ण को दानव और इंद्र का शत्रु बताया गया है. कृष्ण शाश्वत भी हैं और मामा कंस से बचाने के लिए उसे गोकुल में पाला गया था. इस स्थानांतरण ने उसे उन अहीरों से भी जोड़ दिया जो ईसा की आरंभिक सदियों में ऐतिहासिक एवं पशुपालक लोग थे. कृष्ण गोरक्षक थे, जिन यज्ञों में पशुबलि दी जाती थी, उनमें कृष्ण का कभी आह्वान नहीं हुआ है, जबकि इंद्र, वरुण तथा अन्य वैदिक देवताओं का सदैव आह्वान हुआ है. कौशाम्बी लिखते हैं कि कृष्ण आर्यों की पशु बलि के सख्त विरोधी थे यानि गोरक्षक थे. और गौ वंश, ब्राह्मण के साथ साथ प्रजा पालक होने के लिए अग्रसर किए

 

आदि से लेकर अब तक अहीरों का इतिहास पराक्रम और खून से सना हुआ है. वे इतिहास में सर्वथा पूज्य हैं, वर्तमान में प्रासंगिक हैं और भविष्य की संभावनाओं का द्वार हैं. धर्म, समाज, राजनीति, साहित्य, युद्ध सरीखे जीवन के अलग अलग क्षेत्रों में वे शीर्ष पर रहे हैं. बनारस के अहीरों ने मुझे अहीराने की इस महान परंपरा से वाकिफ कराया. कल्लू सरदार के जीवन ने मेरे भीतर इस महान विरासत के प्रति श्रद्धा और आस्था की बुनियाद रखी. बनारस अगर एक जीवन शैली है तो अहीर इस जीवन शैली की नींव के पत्थर हैं. बिना नींव के कंगूरे की कभी कल्पना भी नही की जा सकती. अहीराने की इस महान विरासत को प्रणाम.


सम्राट अशोक असम में हार गए थे उसी असम में अलाउद्दीन खिलजी भी हार गया

विश्वप्रसिद्ध नालन्दा विश्वविद्यालय को जलाने वाले जे हादी #बख्तियार खिलजी की मौत कैसे हुई थी ??? असल में ये कहानी है सन 1206 ईसवी की. 1206 ईसवी में कामरूप (असम) में एक जोशीली आवाज गूंजती है... "बख्तियार खिलज़ी तू ज्ञान के मंदिर नालंदा को जलाकर #कामरूप (असम) की धरती पर आया है... अगर तू और तेरा एक भी सिपाही ब्रह्मपुत्र को पार कर सका तो मां चंडी (कामातेश्वरी) की सौगंध मैं जीते-जी अग्नि समाधि ले लूंगा"... राजा पृथु और , उसके बाद 27 मार्च 1206 को असम की धरती पर एक ऐसी लड़ाई लड़ी गई जो मानव #अस्मिता के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है. एक ऐसी लड़ाई जिसमें किसी फौज़ के फौज़ी लड़ने आए तो 12 हज़ार हों और जिन्दा बचे सिर्फ 100.... जिन लोगों ने #युद्धों के इतिहास को पढ़ा है वे जानते हैं कि जब कोई दो फौज़ लड़ती है तो कोई एक फौज़ या तो बीच में ही हार मान कर भाग जाती है या समर्पण करती है... लेकिन, इस लड़ाई में 12 हज़ार सैनिक लड़े और बचे सिर्फ 100 वो भी घायल.... ऐसी मिसाल दुनिया भर के इतिहास में संभवतः कोई नहीं.... आज भी गुवाहाटी के पास वो #शिलालेख मौजूद है जिस पर इस लड़ाई के बारे में लिखा है. उस समय मुहम्मद बख्तियार खिलज़ी बिहार और बंगाल के कई राजाओं को जीतते हुए असम की तरफ बढ़ रहा था. इस दौरान उसने नालंदा #विश्वविद्यालय को जला दिया था और हजारों बौद्ध, जैन और हिन्दू विद्वानों का कत्ल कर दिया था. नालंदा विवि में विश्व की अनमोल पुस्तकें, पाण्डुलिपियाँ, अभिलेख आदि जलकर खाक हो गये थे. यह जे हादी खिलज़ी मूलतः अफगानिस्तान का रहने वाला था और मुहम्मद गोरी व कुतुबुद्दीन एबक का रिश्तेदार था. बाद के दौर का #अलाउद्दीन खिलज़ी भी उसी का रिश्तेदार था. असल में वो जे हादी खिलज़ी, #नालंदा को खाक में मिलाकर असम के रास्ते तिब्बत जाना चाहता था. क्योंकि, तिब्बत उस समय... चीन, मंगोलिया, भारत, अरब व सुदूर पूर्व के देशों के बीच व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था तो खिलज़ी इस पर कब्जा जमाना चाहता था.... लेकिन, उसका रास्ता रोके खड़े थे असम के राजा #पृथु... जिन्हें राजा बरथू भी कहा जाता था... आधुनिक गुवाहाटी के पास दोनों के बीच युद्ध हुआ. राजा पृथु ने सौगन्ध खाई कि किसी भी सूरत में वो खिलज़ी को ब्रह्मपुत्र नदी पार कर तिब्बत की और नहीं जाने देंगे... उन्होने व उनके आदिवासी यौद्धाओं नें जहर बुझे तीरों, खुकरी, बरछी और छोटी लेकिन घातक तलवारों से खिलज़ी की सेना को बुरी तरह से काट दिया. स्थिति से घबड़ाकर.... खिलज़ी अपने कई सैनिकों के साथ जंगल और पहाड़ों का फायदा उठा कर भागने लगा...! लेकिन, असम वाले तो जन्मजात यौद्धा थे.. और, आज भी दुनिया में उनसे बचकर कोई नहीं भाग सकता.... उन्होने, उन भगोडों #खिलज़ियों को अपने पतले लेकिन जहरीले तीरों से बींध डाला.... अन्त में खिलज़ी महज अपने 100 सैनिकों को बचाकर ज़मीन पर घुटनों के बल बैठकर क्षमा याचना करने लगा.... राजा पृथु ने तब उसके सैनिकों को अपने पास बंदी बना लिया और खिलज़ी को अकेले को जिन्दा छोड़ दिया उसे घोड़े पर लादा और कहा कि "तू वापस अफगानिस्तान लौट जा... और, रास्ते में जो भी मिले उसे कहना कि तूने नालंदा को जलाया था फ़िर तुझे राजा पृथु मिल गया...बस इतना ही कहना लोगों से...." खिलज़ी रास्ते भर इतना बेइज्जत हुआ कि जब वो वापस अपने ठिकाने पंहुचा तो उसकी दास्ताँ सुनकर उसके ही भतीजे अली मर्दान ने ही उसका सर काट दिया.... लेकिन, कितनी दुखद बात है कि इस बख्तियार खिलज़ी के नाम पर बिहार में एक कस्बे का नाम बख्तियारपुर है और वहां रेलवे जंक्शन भी है.यह वही बख्तियारपुर है जहा खिलजी ने पड़ाव डाला था और नालंदा विश्वविद्यालय को जलाया था जबकि, हमारे राजा पृथु के नाम के #शिलालेख को भी ढूंढना पड़ता है. लेकिन, जब अपने ही देश भारत का नाम भारत करने के लिए कोर्ट में याचिका लगानी पड़े तो समझा जा सकता है कि क्यों ऐसा होता होगा..... उपरोक्त लेख पढ़ने के बाद भी अगर कायर, नपुंसक एवं तथाकथित गद्दार धर्म निरपेक्ष बुद्धिजीवी व स्वार्थी हिन्दूओं में एकता की भावना नहीं जागती... तो #लानत है ऐसे लोगों पर…

घोरिद/घेरेंद/घेरेंड सनातनी/बखमनी हिंदु राजा इतिहास

 आइए जानते हैं समृद्ध भारतीय संस्कृति और सभ्यता घुरिडों ने शुरू में गजनवीड्स और बाद में सेल्जुकों के जागीरदारों के रूप में शासन किया । हालांकि, बारहवीं शताब्दी की शुरुआत के दौरान सेल्जूक्स और गजनवीड्स के बीच लंबे समय से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता ने पूर्वी अफगानिस्तान और पंजाब में एक शक्ति निर्वात पैदा कर दिया, जिसका घुरिडों ने फायदा उठाया और अपना क्षेत्रीय विस्तार शुरू किया। अला अल-दीन हुसैन ने घांजाविड्स के लिए घुरिद अधीनता को समाप्त कर दिया, उनकी राजधानी को बेरहमी से बर्खास्त कर दिया, हालांकि वह जल्द ही पराजित हो गए और उन्हें श्रद्धांजलि देना बंद करने के बाद सेल्जूक्स द्वारा अधिकृत किया गया, हालांकि, सेल्जुक शाही शक्ति खुद पूर्वी ईरान में बह गई थी ओघुज खानाबदोशों का समकालीन आगमन.

अलाउद्दीन के भतीजों - घियाथ अल-दीन मुहम्मद और घोर के मुहम्मद के द्वैध शासन के दौरान , घुरिद साम्राज्य अपनी सबसे बड़ी क्षेत्रीय सीमा तक पहुंच गया, जिसमें पूर्वी ईरान से पूर्वी भारत के माध्यम से शामिल क्षेत्र शामिल थे । जबकि घियाथ अल-दीन का पश्चिम में घुरिद विस्तार पर कब्जा था, द्वैध शासन में उनके कनिष्ठ साथी , घोर के मुहम्मद और उनके लेफ्टिनेंट सिंधु के पूर्व में बंगाल तक सक्रिय थे और अंततः गंगा के मैदान के व्यापक क्षेत्रों को जीतने में सफल रहे , जबकि पश्चिम में घियाथ अल-दीन के साथ, एक लंबी लड़ाई में उलझा हुआख़्वारज़्म के शाह , घुरिड्स, कैस्पियन सागर के तट पर गोरगन (वर्तमान ईरान ) तक पहुँचे , यद्यपि थोड़े समय के लिए।

गियाथ अल-दीन मुहम्मद की मृत्यु 1203 में गठिया संबंधी विकारों के कारण हुई बीमारी के कारण हुई थी और इसके तुरंत बाद घुरिडों को अपने तुर्की प्रतिद्वंद्वियों ख्वारेज़मियों के खिलाफ तबाही का सामना करना पड़ा था, जो 1204 में अंदखुद की लड़ाई में क़ारा खितैस से समय पर सुदृढीकरण द्वारा सहायता प्राप्त थी। मुहम्मद की जल्द ही हत्या कर दी गई थी मार्च 1206 जिसने खुरासान में घुरिद प्रभाव को समाप्त कर दिया और शाह मुहम्मद द्वितीय द्वारा एक दशक के भीतर सभी को एक साथ बुझा दिया गया, जिसने 1215 तक घुरिडों को उखाड़ फेंका।कुतुब उद दीन ऐबक ।

मूलसंपादन करना

19वीं शताब्दी में माउंटस्टुअर्ट एल्फिन्स्टन जैसे कुछ यूरोपीय विद्वानों ने इस विचार का समर्थन किया कि घुरिद राजवंश आज के पश्तून लोगों से संबंधित था 

लेकिन यह आम तौर पर आधुनिक विद्वानों द्वारा खारिज कर दिया गया है और जैसा कि मॉर्गनस्टिएरने ने समझाया है इस्लाम का विश्वकोश , "विभिन्न कारणों से बहुत ही असंभव" है। 

 कुछ विद्वानों का कहना है कि राजवंश ताजिक मूल का था। 

 "न ही हम सामान्य रूप से सूरी के जातीय स्टॉक और विशेष रूप से संसबनी के बारे में कुछ भी जानते हैं; हम केवल यह मान सकते हैं कि वे पूर्वी ईरानी ताजिक थे"।

 बोसवर्थ आगे बताते हैं कि घुरिद परिवार का वास्तविक नाम, अल-ए संसाब (फारसी: संसाबनी ), मूल रूप से मध्य फ़ारसी नाम विस्नास्प का अरबी उच्चारण है। 

भारतीय संविधान के हिसाब किताब

भारतीय संविधान के विदेशी स्रोत

भारतीय संविधान के अनेक देशी और विदेशी स्त्रोत हैं, लेकिन भारतीय संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव भारतीय शासन अधिनियम 1935 का है। भारत के संविधान का निर्माण 10 देशो के संविधान से प्रमुख तथ्य लेकर बनाया गया है। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है।भारत के संविधान के निर्माण में निम्न देशों के संविधान से सहायता ली गई है:

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनरावलोकन, संविधान की सर्वोच्चता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निर्वाचित राष्ट्रपति एवं उस पर महाभियोग, उपराष्ट्रपति, उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाने की विधि एवं वित्तीय आपात, न्यायपालिका की स्वतंत्रता
  • ब्रिटेन: संसदात्मक शासन-प्रणाली, एकल नागरिकता एवं विधि निर्माण प्रक्रिया, विधि का शासन, मंत्रिमंडल प्रणाली, परमाधिकार लेख, संसदीय विशेषाधिकार और द्विसदनवाद
  • आयरलैंड: नीति निर्देशक सिद्धांत, राष्ट्रपति के निर्वाचक-मंडल की व्यवस्था, राष्ट्रपति द्वारा राज्य सभा में साहित्य, कला, विज्ञान तथा समाज-सेवा इत्यादि के क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों का मनोनयन
  • ऑस्ट्रेलिया: प्रस्तावना की भाषा, समवर्ती सूची का प्रावधान, केंद्र एवं राज्य के बीच संबंध तथा शक्तियों का विभाजन, व्यापार-वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता, संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक
  • जर्मनी: आपातकाल के प्रवर्तन के दौरान राष्ट्रपति को मौलिक अधिकार संबंधी शक्तियां, आपातकाल के समय मूल अधिकारों का स्थगन
  • कनाडा: संघात्‍मक विशेषताएं, अवशिष्‍ट शक्तियां केंद्र के पास, केंद्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति और उच्चतम न्यायालय का परामर्श न्याय निर्णयन
  • दक्षिण अफ्रीका: संविधान संशोधन की प्रक्रिया प्रावधान, राज्यसभा में सदस्यों का निर्वाचन
  • सोवियत संघ (पूर्व): मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान, मूल कर्तव्यों और प्रस्तावना में न्याय (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) का आदर्श
  • जापान: विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया।
  • फ्रांस: गणतंत्रात्मक और प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता, बंधुता के आदर्श
  • भारतीय संविधान के अनेक देशी और विदेशी स्त्रोत हैं, लेकिन भारतीय संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव ‘भारतीय शासन अधिनियम: 1935 का है. भारतीय संविधान के 395 अनुच्छेदों में से लगभग 250 अनुच्छेद ऐसे हैं, जो 1935 ई० के अधिनियम से या तो शब्दश: लिए गए हैं या फिर उनमें बहुत थोड़ा परिवर्तन किया गया है।

    भारत शासन अधिनियम, 1935- संगीय तंत्र, राज्यपाल का कार्यकाल, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, आपातकालीन उपबंध व प्रसानिक विवरण

    याददाश्त तेज कैसे करें

    याददाश्त कमजोर होना (Memory weakness)

    परिचय: इस रोग के होने के कारण रोगी व्यक्ति की याददाश्त बहुत कमजोर हो जाती है। वह किसी भी चीजों को पहचान नहीं पाता है अगर पहचानता भी है तो कुछ समय सोचने के बाद।

    याददाश्त कमजोर होने का लक्षण : जब यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो उसके सिर में हल्का दर्द रहता है, शोर बर्दाश्त नहीं होता है, एकाग्रता नहीं रख पाता है तथा वह किसी भी बात तथा किसी भी चीजों को याद नहीं रख पाता है।

    याददास्त कमजोर होने का कारण :-

    यह रोग दिमाग (मस्तिष्क) में रक्तसंचार की कमी हो जाने के कारण होता है।
    बहुत अधिक समस्याओं में उलझे रहने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
    सिर पर किसी दुर्घटना के कारण तेज चोट लगने तथा किसी दिमागी बीमारी के कारण भी यह रोग हो सकता है।
    अत्यधिक मानसिक बीमारी होने के कारण भी यह रोग हो सकता है।

    याददाश्त कमजोर होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

    इस रोग से पीड़ित रोगी को कॉफी, चाय, मैदा, कोला, शराब तथा मैदा और मैदा से बनी चीजों का सेवन बंद कर देना चाहिए।
    इस रोग से पीड़ित रोगी को संतुलित आहार जिसमें ताजी सब्जियां, फल, अंकुरित अन्न आदि हो उसका सेवन करना चाहिए जिसके फलस्वरूप कुछ ही दिनों में यह रोग ठीक हो जाता है।
    प्रतिदिन गाय के दूध में तिल को डालकर पीने से कुछ ही दिनों में यह रोग ठीक हो जाता है।
    अंगूर तथा सेब का अधिक सेवन करने से रोगी को बहुत लाभ मिलता है।
    पांच-छ: अखरोट तथा दो अंजीर प्रतिदिन खाने से याददाश्त से सम्बन्धित रोग दूर हो सकते हैं।
    रात के समय में बादाम या मुनक्का को भिगोकर सुबह के समय में चबाकर खाने से यह रोग ठीक हो जाता है।
    बादाम, तुलसी तथा काली मिर्च को पीसकर तथा इन्हें आपस में मिलाकर फिर इसमें शहद मिलाकर प्रतिदिन खाने से यह रोग ठीक हो जाता है।
    तुलसी का रस शहद के साथ प्रतिदिन सेवन करने से याददाश्त मजबूत होती है।
    बादाम का तेल नाक में प्रतिदिन डालने से याददाश्त मजबूत होती है।
    इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन जलनेति क्रिया करनी चाहिए तथा इसके बाद टबस्नान, कटिस्नान करना चाहिए तथा इसके बाद मेहनस्नान करने से यह रोग ठीक हो जाता है।
    इस रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकार की यौगिक क्रियाएं तथा योगासन हैं जिसे प्रतिदिन करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। ये आसन तथा यौगिक क्रियाएं इस प्रकार हैं- भस्त्रिका प्राणायाम,  नाड़ीशोधन, पश्चिमोत्तानासन, वज्रासन, शवासन, योगनिद्रा, ध्यान का अभ्यास तथा ज्ञानमुद्रा करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। 



    हरण का लाभ प्राप्त करे

    घर का बना घी

    ह्रदयरोग के साथ मोटापे और दिल के रोगियों का सबसे अधिक गुस्सा घी पर ही उतरता है। आयुर्वेद में घी को ओषधी माना गया है । इस सबसे प्राचीन सात्विक आहार से सर्वदेशों का निवारण होता है । वात और पित्त को शांत करने में सर्वश्रेष्ट है साथ ही कफ भी संतुलित होता है । इससे स्वस्थ वसा प्राप्त होती है , जो लीवर और रोग प्रतिरोधक प्रणाली को ठीक रखने के लिए जरूरी है । घर का बना हुआ घी बाजार के मिलावटी घी से कही बेहतार होता है । यह तो पूरा का पूरा सैचुरेटेड फैट है ,कहते हुए आप  इंकार में अपना सिर हिला रहे होगे । ज़रा धीरज रखे । घी में उतने अवगुण पाली अनासोचुरेतेड वसा को आग पर चढना अस्वास्थकर होता है ,क्योंकी ऐसा करने से पैराक्सैड्स और एनी फ्री रेडिकल्स निकलते है । इन पदार्थों की वजह से अनेक  बीमारिया और समस्याएँ पैदा होती है । इसका अर्थ यह भी है कि वनास्पतिजन्य सभी खाध्य तेल स्वास्थ केलिए कमोवेश हानिकारक  तो है ही।

    फायदेमंद है घी

    घी का मामला थोड़ा जुदा है। वो इसलिए कि घी का स्मोकिंग पाइंट दूसरी वसा ओं की तुलना में बहुत अधिक है । यही वजह है कि पकाते समय आसानी से नहीं जलता । घी में स्थिर सैचुरेटेड बाँडस बहुत अधिक होते है जिससे फ्री रेडीकल्स निकलने की आशंका बहुत कम होती है । घी की छोटी फैटी एसिड की चेन को शरीर बहुत जल्दी पचा लेता है । अब तक तो सभी यही समझा रहे थे कि देशी घी ही रोगों की सबसे बड़ी जड़ है ?

    कोलेस्ट्राल कम होता है

    घी पर हुए शोध बताते है कि इससे रक्त और आँतों में मोजूद कोलेस्ट्राल कम होता है । ऐसा इसलिए होता है , क्यों कि घी से बाइलारी लिपिड का स्राव बढ़ जाता है । घी नाही प्रणाली एवं मस्तिष्क की श्रेष्ट ओषधि माना गया है । इससे आँखों पर पड़ने वाला दबाव कम होता है , इसलिए ग्लूकोमा के मरीजों के लिए भी फायदेमंद है । सकता है इस जानकारी ने आपको आश्चर्य में दाल दिया हो । घी पेट के एसिड्स के बहाव को बढाने में उत्प्रेरक का काम करता है जिससे पाचन क्रिया ठीक होती है । दूसरे अन्य वसा में यह गुण नहीं है । मक्खन , तेल आदि पाचन क्रिया को धीमा कर देते है और पेट में निष्क्रिय होकर बैठ जाते है । जाहिर है कि आप ऐसा नहीं चाहेगे । घी में भरपूर एंटी आक्सीडेट्स होते है तथा यह अन्य खाध्य पदार्थों से प्राप्त विटामिन और खनिजों को जज्ब करने में मदद करता है ।

    यह शरीर के सभी ऊतकों की प्रत्येक सतह का पोषण करता है तथा रोग प्रतिरोधक प्रणाली को मजबूती प्रदान करता है । इसमें ब्यूटिरिक एसिड नामक फैटी एसिड भी भरपूर होता हैजिसे एंटीवायरल माना जाता है । एंटीवायरल विशेषता ओं के कारण कैसर की गठान की वृद्दि रूक जाती है । जलने के कारण हुए फफोलों पर घी बहुत अच्छा काम करता है । घी याददाश्त को बढाने और सीखने की प्रवृत्ति को विकसित करने में मदद करता है । ध्यान देने योग्य सलाह यह है की कोलेस्ट्राल की मात्रा कम हो लेकिन जिनका कोलेस्ट्राल पहले से ही बढ़ा हुआ है उन्हें घी से परहेज रखना चाहिए ।

    घी खाएं या नहीं …

    यदि आप स्वास्थ्य है, तो घी जरूर खाएं ,क्योंकी यह मक्खन से अधिक सुरक्षित है । इसमें तेल से अधिक पोषक तत्व है। आपने पंजाब और हरियाणा के निवासियों को देखा होगा । वे टनों घी खाते है ,लेकिन सबसे अधिक फिट और मेहनीत होते है ।यद्यपि घी पर अभी और शोधों के नतीजे आने शेष है , लेकिन प्राचीन काल से ही आयुर्वेद में अल्सर , कब्ज , आँखों की बीमारियों के साथ त्वचा रोगों के इलाज के लिए घी का प्रयोग किया जाता है ।

    क्या रखें सावधानियां ……

    भैस के दूध के मुकाबले गाय के दूध में वसा की मात्रा कम होती है । इसलिए शुरू में निराश न हो । हमेशा इतना बनाएं की वह जल्दी ही ख़त्म हो जाए । अगले हफ्ते पुनः यही प्रक्रिया दोहराई जा सकती है । गाय के दूध में सामान्य दूध की ही तरह प्रदूषण का असर हो सकता है , मसलन कीटनाशक और कृत्रिम खाद के अंश चारे के साथ के पेट में जा सकते है । जैविक घी में इस तरह के प्रदूषण से बचने की कोशिश की जाती है । यदि संभव हो तो गाय के दूध में कीटनाशकों और रासायनिक खाद के अंश की जांच कराई जा सकती है । जिस तरह हर चीज की अति बुरी होती है इसी तरह घी का प्रयोग भी संतुलित मात्रा में किया जाना चाहिए । 


    नपुंसकता को खत्म करने का उपाय

    नपुंसकता

    जो व्यक्ति यौन संबन्ध नहीं बना पाता या जल्द ही शिथिल हो जाता है वह नपुंसकता का रोगी होता है। इसका सम्बंध सीधे जननेन्द्रिय से होता है। इस रोग में रोगी अपनी यह परेशानी किसी दूसरे को नहीं बता पाता या सही उपचार नहीं करा पाता मगर जब वह पत्नी को संभोग के दौरान पूरी सन्तुष्टि नहीं दे पाता तो रोगी की पत्नी को पता चल ही जाता है कि वह नंपुसकता के शिकार हैं। इससे पति-पत्नी के बीच में लड़ाई-झगड़े होते हैं और कई तरह के पारिवारिक मन मुटाव हो जाते हैं बात यहां तक भी बढ़ जाती है कि आखिरी में उन्हें अलग होना पड़ता है।

    कुछ लोग शारीरिक रूप से नपुंसक नहीं होते, लेकिन कुछ प्रचलित अंधविश्वासों के चक्कर में फसकर, सेक्स के शिकार होकर मानसिक रूप से नपुंसक हो जाते हैं मानसिक नपुंसकता के रोगी अपनी पत्नी के पास जाने से डर जाते हैं। सहवास भी नहीं कर पाते और मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है।

    कारण :

    नपुंसकता के दो कारण होते हैं- शारीरिक और मानसिक। चिन्ता और तनाव से ज्यादा घिरे रहने से मानसिक रोग होता है। नपुंसकता शरीर की कमजोरी के कारण होती है। ज्यादा मेहनत करने वाले व्यक्ति को जब पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता तो कमजोरी बढ़ती जाती है और नपुंसकता पैदा हो सकती है। हस्तमैथुन, ज्यादा काम-वासना में लगे रहने वाले नवयुवक नपुंसक के शिकार होते हैं। ऐसे नवयुवकों की सहवास की इच्छा कम हो जाती है।

    लक्षण :

    मैथुन के योग्य न रहना, नपुंसकता का मुख्य लक्षण है। थोड़े समय के लिए कामोत्तेजना होना, या थोड़े समय के लिए ही लिंगोत्थान होना-इसका दूसरा लक्षण है। मैथुन अथवा बहुमैथुन के कारण उत्पन्न ध्वजभंग नपुंसकता में शिशन पतला, टेढ़ा और छोटा भी हो जाता है। अधिक अमचूर खाने से धातु दुर्बल होकर नपुंसकता आ जाती है।

    हेल्थ टिप्स :

    • नपुंसकता से परेशान रोगी को औषधियों खाने के साथ कुछ और बातों का ध्यान रखना चाहिए जैसे सुबह-शाम किसी पार्क में घूमना चाहिए, खुले मैदान में, किसी नदी या झील के किनारे घूमना चाहिए, सुबह सूर्य उगने से पहले घूमना ज्यादा लाभदायक है। सुबह साफ पानी और हवा शरीर में पहुंचकर शक्ति और स्फूर्ति पैदा करती है। इससे खून भी साफ होता है।
    • नपुंसकता के रोगी को अपने खाने (आहार) पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। आहार में पौष्टिक खाद्य-पदार्थों घी, दूध, मक्खन के साथ सलाद भी जरूर खाना चाहिए। फल और फलों के रस के सेवन से शारीरिक क्षमता बढ़ती है। नपुंसकता की चिकित्सा के चलते रोगी को अश्लील वातावरण और फिल्मों से दूर रहना चाहिए क्योंकि इसका मस्तिष्क पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इससे बुरे सपने भी आते हैं जिसमें वीर्यस्खलन होता है। 


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    पेट दर्द abdomen pen

    पेट दर्द 

    गलत खान पान अथवा अपच के कारण होने वाले पेट दर्द के लिए आयुर्वेद में कुछ नुस्खे बताए गये हैं ! जिनका अगर प्रयोग किया जाए तो पेट दर्द कि परेशानी से बचा जा सकता है ! हालांकि इस तरह के पेट दर्द के लिए आज भी हमारे घरों में आयुर्वेदिक नुस्खे काम में लाये जाते हैं और उनसे आराम भी मिलता है ! ऐसे ही कुछ नुस्खे : -

    1 . अदरक और लहसुन को बराबर कि मात्रा में पीसकर एक चम्मच कि मात्रा में पानी के साथ सेवन करने से पेट दर्द में लाभ मिलता है !

    2 . एक ग्राम काला नमक और दो ग्राम अजवायन गर्म पानी के साथ सेवन करने से पेट दर्द में लाभ मिलता है !

    3 . अमरबेल के बीजों को पानी से पीसकर बनाए गये लेप को पेट पर लगाकर कपडे से बाँधने से गैस कि तकलीफ , डकारें आना , अपानवायु न निकलना , पेट दर्द और मरोड़ जैसे कष्ट दूर हो जाते हैं !

    4 . सौंठ , हींग और कालीमिर्च का चूर्ण बराबर कि मात्रा में मिलाकर एक चम्मच कि मात्रा में गर्म पानी के साथ लेने से पेट दर्द में तुरंत आराम मिलता है !

    5 . जटामांसी , सौंठ , आंवला और काला नमक बराबर कि मात्रा में पीस लें और एक एक चम्मच कि मात्रा में तीन बार लेने से भी पेट दर्द से राहत मिलती है !

    6 . जायफल का एक चौथाई चम्मच चूर्ण गर्म पानी के साथ सेवन करने से भी पेट दर्द में आराम पहुँचता है !

    7 . पत्थरचट्टा के दो तीन पत्तों पर हल्का नमक लगाकर या पत्तों के एक चम्मच रस में सौंठ का चूर्ण मिलाकर खिलाने से पेट दर्द से राहत मिलती है !

    8 . सफ़ेद मुसली और दालचीनी को समभाग में मिलाकर पीस लें ! एक चम्मच कि मात्रा में पानी के साथ सेवन करने से 2-3 खुराक में ही पूरा आराम मिल जाता है ! 

    सनातन

    फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...