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चाय जो रोग दूर करे

औषधीय चाय

काली चाय

पातालकोट अक्सर आना जाना लगा रहता है और यहां आदिवासियों के बीच चाय मेहमान नवाज़ी का एक अहम हिस्सा है। जबरदस्त मिठास लिए ये चाय बगैर दूध की होती है और चाय की चुस्की लेते हुए जब इन आदिवासियों से इस चाय की ज्यादा मिठास की वजह पूछी जाए तो जवाब भी उतना ही मीठा मिलता है, 'आपके और हमारे बीच संबंधों में इस चाय की तरह मिठास बनी रहे'। खैर, इस चाय को तैयार करने के लिए 2 कप पानी में एक चम्मच चाय की पत्ती और 3 चम्मच शक्कर को डालकर उबाला जाता है। जब चाय लगभग एक कप शेष रह जाती है, इसे उतारकर छान लिया जाता है और परोसा जाता है। हर्बल जानकारों के अनुसार मीठी चाय दिमाग को शांत करने में काफी सक्रिय भूमिका निभाती है यानि यह तनाव कम करने में मदद करती है। आधुनिक शोध भी चाय के इस गुण को प्रमाणित करते हैं। सच ही है, यदि चाय की एक मिठास रिश्तों में इस कदर मजबूती ले आए तो अपने आप हमारे जीवन से तनाव छू मंतर हो जाए। 

गौती चाय

बुंदेलखंड में आपका आदर सत्कार अक्सर गौती चाय या हरी चाय से किया जाता है। लेमन ग्रास के नाम से प्रचलित इस चाय का स्वरूप एक घास की तरह होता है। हल्की सी नींबू की सुंगध लिए इस चाय की चुस्की गजब की ताजगी ले आती है। लेमन ग्रास की तीन पत्तियों को हथेली पर कुचलकर दो कप पानी में डाल दिया जाता है और उबाला जाता है। स्वादानुसार शक्कर डालकर इसे तब तक उबाला जाता है जब तक कि यह एक कप बचे। जो लोग अदरख का स्वाद पसंद करते हैं, वे एक चुटकी अदरख कुचलकर इसमें डाल सकते हैं। इस चाय में भी दूध का उपयोग नहीं होता है। गौती चाय में कमाल के एंटी ओक्सीडेंट गुण होते हैं और शरीर के अंदर किसी भी प्रकार के संक्रमण को नियंत्रित करने में गौती चाय काफी असरकारक होती है। यह चाय मोटापा कम करने में काफी सक्षम होती है। आधुनिक शोध भी इस तथ्य को प्रमाणित करते दिखाई देती है। हरी चाय वसा कोशिकाओं यानि एडिपोसाईट्स के निर्माण को रोकती है। इसी वजह से दुनिया के अनेक देश गौती चाय को मोटापा कम करने की औषधि के तौर पर देख रहें हैं और इस पर निरंतर शोध जारी है। नई शोधें बताती है कि वसा और कोलेस्ट्राल को कम करने वाले प्रोटीन काईनेस को क्रियाशील करने में गौती चाय महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

खट्टी गौती चाय

गौती चाय बनाते समय इसी चाय में संतरे या नींबू के छिल्के डाल दिये जाते हैं और कुछ मात्रा नींबू रस की भी डाल दी जाती है और फिर परोसी जाती है खट्टी गौती चाय। इस तरह की मेहमानी आप देख सकते हैं मध्यभारत के गोंडवाना क्षेत्र में। मूल रूप से गोंड, कोरकु और बैगा जनजातियों के बीच प्रचलित इस चाय के भी गजब के औषधीय गुण हैं। गाँव के बुजुर्गों से उनकी लंबी उम्र का राज पूछा जाए तो सीधा जवाब मिलता है, 'खट्टी गौती चाय' और मजे की बात यह भी है कि सदियों पुराने इस एंटी एजिंग फार्मुले को आदिवासी अपनाते रहें हैं और अब आधुनिक विज्ञान इस पर ठप्पा लगाना शुरु कर रहा है। नई शोधें बताती है कि हरी चाय और नींबू का मिश्रण उम्र के पड़ाव की प्रक्रिया को धीमा कर देता है यानि आप इस चाय का प्रतिदिन सेवन करें तो अपने यौवन को लंबा खींच सकते हैं।

मसाला चाय

गुजरात में किसी भी गाँव में जाएंगे तो मेहमानी के तौर पर मसाला चाय आपके स्वागत के लिए हमेशा तत्पर रहेगी। घरों में अक्सर मेहमान नवाज़ी के लिए छाछ या चाय का उपयोग किया जाता है। यदि आप चाय के शौकीन हैं तो आपको मसाला चाय परोसी जाएगी। काली मिर्च, सौंठ, तुलसी, दालचीनी, छोटी इलायची, बड़ी इलायची, लौंग, पीपरामूल, जायफ ल, जायपत्री और लौंग मिलाकर एक मसाला तैयार होता है। चाय पत्ती और दूध के उबलते पानी में चुटकी भर मसाला डाल दिया जाता है। स्वादिष्ठ मसाला चाय जब आपको परोसी जाती है, ना सिर्फ  ये गज़ब का स्वाद लिए होती है बल्कि शरीर ताजगी से भरपूर हो जाता है। मसालों के औषधीय गुणों से हम सभी 'गाँव कनेक्शन' के पिछले अंकों में रूबरू हो चुके है, यानि इन सभी मसालों का संगम जिस चाय में होगा, उसके औषधीय गुण भी कमाल के होंगे ही।

बस्तर की सैदी या मीठी चाय  

शहद होने की वजह से इस चाय को शहदी चाय या सैदी चाय कहा जाता है। दंतेवाड़ा के किसी दुरस्थ गाँव में आप जाईये, आपका स्वागत सैदी चाय से होगा। साधारण चाय पत्ती (2 चम्मच) के साथ कुछ मात्रा में शहद (लगभग 2 चम्मच) और दूध (2 चम्मच) डालकार फेंटा जाता है। दूसरी तरफ  एक बर्तन में 2 कप पानी को उबाला जाता है। पानी जब उबलने लगे तो इसमें इस फेंटे हुए मिश्रण को डाल दिया जाता है। यदि आवश्यकता हो तो थोड़ी सी मात्रा अदरख की डाल दी जाती है और तैयार हो जाती है सैदी चाय। माना जाता है कि यह चाय शरीर में गजब की स्फू र्ति लाती है। शहद, अदरक और चाय के अपने-अपने औषधीय गुण है और जब इनका संगम होता है तो ये गजब का टोनिक बन जाते हैं।

धनिया चाय

राजस्थान के काफी  हिस्सों में धनिया की चाय स्वास्थ्य सुधार के हिसाब से दी जाती है। लगभग 2 कप पानी में जीरा, धनिया, चायपत्ती और कुछ मात्रा में सौंफ  डालकर करीब 2 मिनिट तक खौलाया जाता है, आवश्यकतानुसार शक्कर और अदरख डाल दिया जाता है। कई बार शक्कर की जगह शहद डालकर इसे और भी स्वादिष्ठ बनाया जाता है। गले की समस्याओं, अपचन और गैस से त्रस्त लोगों को इस चाय का सेवन कराया जाता है। स्वाद के साथ सेहत भी बेहतर करने वाली इस चाय को धनिया चाय के नाम से जाना जाता है।

मुलेठी चाय

सौराष्ट्र में जेठीमद चाय के नाम मशहूर इस चाय को मध्यभारत में मुलेठी चाय के नाम से जाना जाता है। साधारण चाय तैयार करते समय चुटकी भर मात्रा मुलेठी की डाल दी जाए तो चाय में एक नयी तरह की खुश्बु का संचार होता है और चाय स्वादिष्ठ भी लगती है। दमा और सर्दी खांसी से परेशान लोगों को इस चाय को प्रतिदिन दिन में दो से तीन बार लेना चाहिए, माना जाता है कि मुलेठी के गुणों की वजह से चाय सेहत के हिसाब से अत्यंत लाभकारी होती है।

बर्फीली चाय  

गर्मियों की तपिश और लू के चपेटों से बचने के लिए पानी में एक नींबू का रस, थोड़ी सी चायपत्ती और लेमनग्रास डालकर उबाला जाए और ठंडा करके रेफ्रिजरेट किया जाए। जब यह चाय बिल्कुल ठंडी हो जाए तो इसमें बर्फ  के कुछ डालकर पिया जाए तो ताजगी के साथ शरीर में ऊर्जा का संचार भी होता है। यह चाय सेहत के लिए भी बेहतर होती है।

अनंतमूली चाय

पातालकोट में सर्द दिनों में अक्सर आदिवासी अनंतमूली चाय पीते हैं। अनंतमूल स्वभाव से गर्म प्रकृति का पौधा होता है, इसकी जड़ें निकालकर लगभग 1 ग्राम साफ  जड़ पानी में खौलायी जाती है। इसी पानी में थोड़ी सी चाय की पत्तियों को भी डाल दिया जाता है। दमा और सांस की बीमारी से ग्रस्त रोगियों को इसे दिया जाता है। जब ज्यादा ठंड पड़ती है तो इसी चाय का सेवन सभी लोग करते हैं, माना जाता है कि यह चाय शरीर में गर्मी बनाए रखती है। अनंतमूल का उपयोग करने की वजह से इसे अनंतमूली चाय के नाम से जाना जाता है। 


घर का बना घी

घर का बना घी

ह्रदयरोग के साथ मोटापे और दिल के रोगियों का सबसे अधिक गुस्सा घी पर ही उतरता है। आयुर्वेद में घी को ओषधी माना गया है । इस सबसे प्राचीन सात्विक आहार से सर्वदेशों का निवारण होता है । वात और पित्त को शांत करने में सर्वश्रेष्ट है साथ ही कफ भी संतुलित होता है । इससे स्वस्थ वसा प्राप्त होती है , जो लीवर और रोग प्रतिरोधक प्रणाली को ठीक रखने के लिए जरूरी है । घर का बना हुआ घी बाजार के मिलावटी घी से कही बेहतार होता है । यह तो पूरा का पूरा सैचुरेटेड फैट है ,कहते हुए आप  इंकार में अपना सिर हिला रहे होगे । ज़रा धीरज रखे । घी में उतने अवगुण पाली अनासोचुरेतेड वसा को आग पर चढना अस्वास्थकर होता है ,क्योंकी ऐसा करने से पैराक्सैड्स और एनी फ्री रेडिकल्स निकलते है । इन पदार्थों की वजह से अनेक  बीमारिया और समस्याएँ पैदा होती है । इसका अर्थ यह भी है कि वनास्पतिजन्य सभी खाध्य तेल स्वास्थ केलिए कमोवेश हानिकारक  तो है ही।

फायदेमंद है घी

घी का मामला थोड़ा जुदा है। वो इसलिए कि घी का स्मोकिंग पाइंट दूसरी वसा ओं की तुलना में बहुत अधिक है । यही वजह है कि पकाते समय आसानी से नहीं जलता । घी में स्थिर सैचुरेटेड बाँडस बहुत अधिक होते है जिससे फ्री रेडीकल्स निकलने की आशंका बहुत कम होती है । घी की छोटी फैटी एसिड की चेन को शरीर बहुत जल्दी पचा लेता है । अब तक तो सभी यही समझा रहे थे कि देशी घी ही रोगों की सबसे बड़ी जड़ है ?

कोलेस्ट्राल कम होता है

घी पर हुए शोध बताते है कि इससे रक्त और आँतों में मोजूद कोलेस्ट्राल कम होता है । ऐसा इसलिए होता है , क्यों कि घी से बाइलारी लिपिड का स्राव बढ़ जाता है । घी नाही प्रणाली एवं मस्तिष्क की श्रेष्ट ओषधि माना गया है । इससे आँखों पर पड़ने वाला दबाव कम होता है , इसलिए ग्लूकोमा के मरीजों के लिए भी फायदेमंद है । सकता है इस जानकारी ने आपको आश्चर्य में दाल दिया हो । घी पेट के एसिड्स के बहाव को बढाने में उत्प्रेरक का काम करता है जिससे पाचन क्रिया ठीक होती है । दूसरे अन्य वसा में यह गुण नहीं है । मक्खन , तेल आदि पाचन क्रिया को धीमा कर देते है और पेट में निष्क्रिय होकर बैठ जाते है । जाहिर है कि आप ऐसा नहीं चाहेगे । घी में भरपूर एंटी आक्सीडेट्स होते है तथा यह अन्य खाध्य पदार्थों से प्राप्त विटामिन और खनिजों को जज्ब करने में मदद करता है ।

यह शरीर के सभी ऊतकों की प्रत्येक सतह का पोषण करता है तथा रोग प्रतिरोधक प्रणाली को मजबूती प्रदान करता है । इसमें ब्यूटिरिक एसिड नामक फैटी एसिड भी भरपूर होता हैजिसे एंटीवायरल माना जाता है । एंटीवायरल विशेषता ओं के कारण कैसर की गठान की वृद्दि रूक जाती है । जलने के कारण हुए फफोलों पर घी बहुत अच्छा काम करता है । घी याददाश्त को बढाने और सीखने की प्रवृत्ति को विकसित करने में मदद करता है । ध्यान देने योग्य सलाह यह है की कोलेस्ट्राल की मात्रा कम हो लेकिन जिनका कोलेस्ट्राल पहले से ही बढ़ा हुआ है उन्हें घी से परहेज रखना चाहिए ।

घी खाएं या नहीं …

यदि आप स्वास्थ्य है, तो घी जरूर खाएं ,क्योंकी यह मक्खन से अधिक सुरक्षित है । इसमें तेल से अधिक पोषक तत्व है। आपने पंजाब और हरियाणा के निवासियों को देखा होगा । वे टनों घी खाते है ,लेकिन सबसे अधिक फिट और मेहनीत होते है ।यद्यपि घी पर अभी और शोधों के नतीजे आने शेष है , लेकिन प्राचीन काल से ही आयुर्वेद में अल्सर , कब्ज , आँखों की बीमारियों के साथ त्वचा रोगों के इलाज के लिए घी का प्रयोग किया जाता है ।

क्या रखें सावधानियां ……

भैस के दूध के मुकाबले गाय के दूध में वसा की मात्रा कम होती है । इसलिए शुरू में निराश न हो । हमेशा इतना बनाएं की वह जल्दी ही ख़त्म हो जाए । अगले हफ्ते पुनः यही प्रक्रिया दोहराई जा सकती है । गाय के दूध में सामान्य दूध की ही तरह प्रदूषण का असर हो सकता है , मसलन कीटनाशक और कृत्रिम खाद के अंश चारे के साथ के पेट में जा सकते है । जैविक घी में इस तरह के प्रदूषण से बचने की कोशिश की जाती है । यदि संभव हो तो गाय के दूध में कीटनाशकों और रासायनिक खाद के अंश की जांच कराई जा सकती है । जिस तरह हर चीज की अति बुरी होती है इसी तरह घी का प्रयोग भी संतुलित मात्रा में किया जाना चाहिए । 


 

आयुर्वेदिक चूर्ण से दुर करे रोग

आयुर्वेदिक चूर्ण

हम इससे पहले आयुर्वेदिक दवाओं में गोलियों, वटियों भस्म व पिष्टी की जानकारी आपको दे चुके हैं। आयुर्वेद के कुछ चूर्ण, जो दैनिक जीवन में बहुत उपयोगी हैं, की जानकारी दी जा रही है-

अश्वगन्धादि चूर्ण : धातु पौष्टिक, नेत्रों की कमजोरी, प्रमेह, शक्तिवर्द्धक, वीर्य वर्द्धक, पौष्टिक तथा बाजीकर, शरीर की झुर्रियों को दूर करता है। मात्रा 5 से 10 ग्राम प्रातः व सायं दूध के साथ।

अविपित्तकर चूर्ण : अम्लपित्त की सर्वोत्तम दवा। छाती और गले की जलन, खट्टी डकारें, कब्जियत आदि पित्त रोगों के सभी उपद्रव इसमें शांत होते हैं। मात्रा 3 से 6 ग्राम भोजन के साथ।

अष्टांग लवण चूर्ण : स्वादिष्ट तथा रुचिवर्द्धक। मंदाग्नि, अरुचि, भूख न लगना आदि पर विशेष लाभकारी। मात्रा 3 से 5 ग्राम भोजन के पश्चात या पूर्व। थोड़ा-थोड़ा खाना चाहिए।

आमलकी रसायन चूर्ण : पौष्टिक, पित्त नाशक व रसायन है। नियमित सेवन से शरीर व इन्द्रियां दृढ़ होती हैं। मात्रा 3 ग्राम प्रातः व सायं दूध के साथ।

आमलक्यादि चूर्ण : सभी ज्वरों में उपयोगी, दस्तावर, अग्निवर्द्धक, रुचिकर एवं पाचक। मात्रा 1 से 3 गोली सुबह व शाम पानी से।

एलादि चूर्ण : उल्टी होना, हाथ, पांव और आंखों में जलन होना, अरुचि व मंदाग्नि में लाभदायक तथा प्यास नाशक है। मात्रा 1 से 3 ग्राम शहद से।

गंगाधर (वृहत) चूर्ण : अतिसार, पतले दस्त, संग्रहणी, पेचिश के दस्त आदि में। मात्रा 1 से 3 ग्राम चावल का पानी या शहद से दिन में तीन बार।

जातिफलादि चूर्ण : अतिसार, संग्रहणी, पेट में मरोड़, अरुचि, अपचन, मंदाग्नि, वात-कफ तथा सर्दी (जुकाम) को नष्ट करता है। मात्रा 1.5 से 3 ग्राम शहद से।

दाडिमाष्टक चूर्ण : स्वादिष्ट एवं रुचिवर्द्धक। अजीर्ण, अग्निमांद्य, अरुचि गुल्म, संग्रहणी, व गले के रोगों में। मात्रा 3 से 5 ग्राम भोजन के बाद।

चातुर्जात चूर्ण : अग्निवर्द्धक, दीपक, पाचक एवं विषनाशक। मात्रा 1/2 से 1 ग्राम दिन में तीन बार शहद से।

चातुर्भद्र चूर्ण : बालकों के सामान्य रोग, ज्वर, अपचन, उल्टी, अग्निमांद्य आदि पर गुणकारी। मात्रा 1 से 4 रत्ती दिन में तीन बार शहद से।

चोपचिन्यादि चूर्ण : उपदंश, प्रमेह, वातव्याधि, व्रण आदि पर। मात्रा 1 से 3 ग्राम प्रातः व सायं जल अथवा शहद से। 

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गुर्दे का दर्द

गुर्दे का दर्द

तुलसी की पत्ते तुलसी के पत्ते (छाया में सुखाई हुई) --- 20 ग्राम
अजवायन अजमोद (साफ की हुई) ---- 20 ग्राम
सेंधा नमक सेंधा नमक --- 10 ग्राम

तीनों को पीस कर चूर्ण बना कर रख लें . जरुरत होने पर चूर्ण 2-2 ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी से सुबह शाम लें . एक ही मात्रा लेने से गुर्दे के दर्द में राहत मिल जाएगी .

विशेष : -नज़ला सर्दी , जुकाम जुकाम , खांसी , खांसी , पेट - दर्द अफारा पेट दर्द , बदहजमी अपच , खट्टे डकार खट्टे डकार, कब्ज कब्ज , उल्टियों के लिए भी उल्टी रामबाण हैं 

हिस्टीरिया, एक मानसिक रोग

हिस्टीरिया : मनोरोग का प्रकोप

सर्वप्रथम एरंड तेल में भुनी हुई छोटी काली हरड़ का चूर्ण ५ ग्राम प्रतिदिन लगातार दे कर उसका उदर शोधन तथा वायु का शमन करें।
सरसों, हींग, बालवच, करजबीज, देवदाख मंजीज, त्रिफला, श्वेत अपराजिता मालकंगुनी, दालचीनी, त्रिकटु, प्रियंगु शिरीष के बीज, हल्दी और दारु हल्दी को बराबर-बराबर ले कर, गाय या बकरी के मूत्र में पीस कर, गोलियां बना कर, छाया में सुखा लें। इसका उपयोग पीने, खाने, या लेप में किया जाता है। इसके सेवन से हिस्टीरिया रोग शांत होता है।
लहसुन को छील कर, चार गुना पानी और चार गुना दूध में मिला कर, धीमी आग पर पकाएं। आधा दूध रह जाने पर छान कर रोगी को थोड़ा-थोड़ा पिलाते रहें।

ब्रह्मी, जटामांसी शंखपुष्पी, असगंध और बच को समान मात्रा में पीस कर, चूर्ण बना कर, एक छोटा चम्मच दिन में दो बार दूध के साथ सेवन करें। इसके साथ ही सारिस्वतारिष्ट दो चम्मच, दिन में दो बार, पानी मिला कर सेवन करें।
ब्राह्मी वटी और अमर सुंदरी वटी की एक-एक गोली मिला कर सुबह तथा रात में सोते समय दूध के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है।
जो रोगी बालवच चूर्ण को शहद मिला कर लगातार सवा माह तक खाएं और भोजन में केवल दूध एवं शाश का सेवन करे, उसका हिस्टीरिया शांत हो जाता है।
अगर रोगी कुंवारी लड़की है, तो उसकी जल्द शादी करवा देनी चाहिए। रोग अपने आप दूर हो जाएगा। 


 

दात की बीमारी से छुटकारा

दांतों की बीमारिय में रामबाण

सैंधा  नमक मैदे की तरह बारीक पीस कर कपड-छान कर लें । ध्यान रहे, रगड़े नहीं । ऐसा नमक दो ग्राम हथेली पर रख कर उससे चार गुना सरसों का तेल डाल  दें । फिर हथेली को टेढ़ी कर तेल की बूंदों से ऊँगली से मसूड़ों की हल्के-हल्के भली प्रकार मालिश रोजाना प्रातः करे । खून निकले तो निकले दीजिये । कुछ देर नमकीन तेल की मसूड़ों पर मालिश करते रहने के पश्चात् तेल-भीगा बचा नमक दातों-दाड़ों  पर लेप की तरह ऊँगली से लगा कर रगड़ कर फ़ौरन सादे या गुनगुने पानी से कुल्ली कर लें ।

कुछ दिन लगातार दन्त साफ़ करते रहने से दांतों का ठंडा, गरम और खट्टा लग्न समाप्त हो जाता हैं हिलते हुए दांत  मजबूत हो जाते है । कलि पपड़ी नहीं जमती । दंत साफ़ और मजबूत होते हैं । दांतों के  कीड़े नष्ट हो जाते हैं । दन्त का दर्द और मसूड़ों की सुजन और टीस  मिट जाती हैं तथा फुले मसूड़ों से खून निकलना बंद हो जाता हैं निरंतर एसा करने से पायरिया नष्ट हो जाता हैं 

गर्भ धारण कराना

गर्भधारण (गर्भस्थापित कराना) 
किसी भी महिला तब तक महिला नही है, जब तक वह अपने बच्चे को जन्म न दे दे, 
जब तक औरत मां नही बनती संसार में उसके लिए कोई जगह नहीं है

चिकित्सा:

1. मोरछली: मोरछली की छाल का चूर्ण खाने से गर्भ ठहरता है।

2. केसर: केसर और नागकेसर को 4-4 ग्राम की मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। इसकी तीन पुड़िया मासिक-धर्म समाप्त होने के तुरंत बाद खाने से गर्भ स्थापित होता है।

3. हंसपदी: हंसपदी को बारीक पीसकर पीने से स्त्री का गर्भ स्थापित होता है।

4. शंखावली: शंखाहुली या इसके पंचांग के सेवन करने से गर्भ की स्थापना अवश्य होती है।

5. गोरखमुण्डी: गोरखमुण्डी और जायफल बारीक पीसकर सेवन करने से सन्तान की अवश्य ही प्राप्ति होती है।

6. समुद्रफेन: समुद्रफेन को दही के साथ खाने से निश्चय ही गर्भ धारण होता है।

7. समुद्रफल: समुद्रफल और अजवायन के सेवन से गर्भधारण अवश्य ही होता है।

8. खिरैटी: मासिक-धर्म में सफेद खिरेटी, मुलहठी तथा मिश्री मिलाकर गाय के दूध के साथ सेवन करने से गर्भ अवश्य ठहरता है।

9. सोंठ: सोंठ, मिर्च, पीपल और नागकेशर का चूर्ण घी के साथ माहवारी समाप्ति के बाद स्त्री को सेवन कराने से गर्भ ठहर जाता है।

10. सरसो: सफेद सरसो, बच, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, गदहपुरैना, दूधी, कूठ, मुलहठी, कुटकी, खंभारी के फल, फालसा, अनन्तमूल, कालीसर, हल्दी, भंगरा, देवदारू, सूर्यमुखी, मंजीठ, त्रिफला, प्रियंगु के फूल, अड़ूसा के फूल तथा गेरू सभी को 2 किलो गाय के घी में मिलाकर गर्म करें। इसे 20 से 40 ग्राम की मात्रा में पुरुष तथा ऋतुस्नाता स्त्री भगवान का स्मरण कर इस घी का सेवन करें तो इससे गर्भसम्बंधी सभी गुप्तांग रोग नष्ट होते हैं तथा बांझ स्त्री भी पुत्र उत्पन्न करने के योग्य हो जाती है।

11. कटेली: सफेद कटेली की जड़ रविवार को पुष्य नक्षत्र में लाए छाया में सुखाकर जड़ का बक्कल (छिलका) उतारकर कूटकर छान लें। इसे 10 ग्राम की मात्रा में गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध से सुबह माहवारी शुरू होने के दिन से 3 दिनों तक लगातार प्रयोग करना चाहिए।

12. तुलसी: तुलसी के बीज 5 ग्राम पानी के साथ मासिक-धर्म शुरू होने के पहले दिन से 3 दिनों तक नियमित सेवन कराना चाहिए। इस प्रयोग से गर्भ ठहरता है।

13. निर्गुण्डी: निर्गुण्डी की 10 ग्राम मात्रा को लगभग 100 मिलीलीटर पानी में रात को भिगोकर रख दें। सुबह उसे उबालें, जब यह एक चौथाई रह जाए तो इसे उतारकर छान लें। इसके बाद इसमें 10 ग्राम की मात्रा में पिसा हुआ गोखरू मिलाकर मासिक-धर्म खत्म होने के बाद पहले दिन से लगभग एक सप्ताह तक सेवन करें। इससे स्त्री गर्भधारण के योग्य हो जाती है।

14. नागकेसर: पिसी हुई नागकेसर को लगभग 5 ग्राम की मात्रा में सुबह के समय बछड़े वाली गाय या काली बकरी के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध के साथ माहवारी (मासिक-धर्म) खत्म होने के बाद सुबह के समय लगभग एक सप्ताह तक सेवन कराएं। इससे गर्भधारण के उपरान्त पुत्र का जन्म होगा।

15. कृष्णकांता: कृष्णकांता की जड़ 15 ग्राम को बारीक पीस लें। इसे 5 ग्राम सुबह के समय काली बकरी के कच्चे दूध से माहवारी खत्म होने के बाद 3 दिनों तक लगातार सेवन करना चाहिए। इससे स्त्री गर्भधारण के योग्य बन जाती है।

16. पुत्रजीवक (जियापोता): पुत्रजीवक (जियापोता) के एक पत्ते को बारीक पीसकर गाय के कच्चे दूध में मिला दें। इसे सुबह 10 ग्राम की मात्रा में मासिक-धर्म समाप्त होने के बाद लगभग एक सप्ताह तक नियमित रूप से सेवन करने से गर्भधारण होता है।

17. अपामार्ग: अपामार्ग की जड़ और लक्ष्मण बूटी 40 ग्राम की मात्रा में बारीक पीस-छानकर रख लें। इसे गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध के साथ सुबह के समय मासिक-धर्म समाप्त होने के बाद से लगभग एक सप्ताह तक सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से स्त्री गर्भधारण के योग्य हो जाती है।

18. माजूफल (मियादी फल): माजूफल (मियादी फल) 60 ग्राम की मात्रा में लेकर कूट छान लें। इसे 10-10 ग्राम सुबह-शाम मासिक-धर्म समाप्त होने के बाद 3 दिनों तक गाय के दूध से सेवन करना चाहिए। इससे गर्भ स्थापित होता है।

19. आम: आम के पेड़ का बांदा पानी के साथ बारीक पीसकर मासिक-धर्म खत्म होने के 2 दिन बाद सुबह के समय गाय के कच्चे दूध में मिलाकर सेवन करना चाहिए। इससे गर्भ ठहरता है।

20. ढाक: ढाक (पलाश) का एक पत्ता गाय के कच्चे दूध में पीसकर मासिक-धर्म के शुरू होने के दिनों में सुबह के समय लगातार तीन दिनों तक सेवन कराना चाहिए। इसके सेवन से स्त्रियां गर्भधारण के योग्य हो जाती हैं।

21. हाथी दांत: हाथी दांत को लेकर बारीक पीसकर रख लें। इसमें से लगभग 3 ग्राम सुबह के समय मासिक-धर्म के शुरू होने के दिनों में गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध से देना चाहिए। इसके सेवन से गर्भ स्थापित होता है।

22. ओंघाहुली: ओंघाहुली और ब्रह्मबूटी 15-15 ग्राम कूट-छानकर 3 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध से मासिक-धर्म खत्म होने के बाद सेवन करने से गर्भधारण होता है।

23. गजकेसर: गजकेसर की जड़, पीपल की दाढ़ी और शिवलिंगी के बीज 6-6 ग्राम की मात्रा में कूट-छानकर इसमें 18 ग्राम की मात्रा में खांड मिला दें। इसकी 5 ग्राम मात्रा को सुबह के समय बछडे़ वाली गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध से मासिक-धर्म खत्म होने के बाद लगभग एक सप्ताह तक करना चाहिए। इसके सेवन से स्त्रियां गर्भधारण के योग्य बन जाती हैं।

24. कायफल: कायफल 25 ग्राम की मात्रा में कूटपीसकर रख लें। इसमें 25 ग्राम की मात्रा में खांड मिला दें। इसे लगभग 10 ग्राम की मात्रा में सुबह पानी के साथ मासिक-धर्म खत्म होने के बाद लगभग 5 दिनों तक देना चाहिए। इससे स्त्रियों का गर्भ ठहरता है।

25. अजवायन: अजवायन 10 ग्राम पानी से मासिक-धर्म खत्म होने के बाद तीन-चार दिनों तक सेवन करने से गर्भ की स्थापना में लाभ मिलता है।

26. पीपल का बांदा: पीपल का बांदा (बांझी) को लेकर कूट-छान लें। इसे 5 ग्राम की मात्रा में सुबह के समय बछड़े वाली गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध से मासिक-धर्म के बीच में 3 दिनों तक लगातार सेवन करने से गर्भधारण होता है।

27. काकोली: काकोली का बीज 20 ग्राम की मात्रा में लेकर पीस लें। इसे 5 ग्राम लेकर सुबह एक रंग की गाय (जिस गाय के बछड़े मरते न हो) या काली बकरी के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध के साथ मासिक-धर्म के बीच में देने गर्भ स्थापित होता है।

28. जायफल: जायफल और मिश्री 50-50 ग्राम की मात्रा में पीसकर चूर्ण तैयार कर लें। इसे छह ग्राम की मात्रा में माहवारी के बाद सेवन करना चाहिए। आहार में चावल और दूध का सेवन करें। इससे गर्भधारण हो जाएगा।

29. मेहंदी: मासिक-धर्म के बाद हर चौथे दिन के बाद नियमित 5 बार लगातार अपने हाथ-पैरों पर लगाने से गर्भवती होने की आशा बढ़ जाती है।

30. देवदारू: तैलिया देवदारू को घिसकर स्त्री को पिलाना चाहिए इससे पेट की वायु कम होकर गर्भ को बढ़ने के लिए जगह मिलती है।

31. मशरूम: गर्भावस्था में मशरूम की सब्जी खाने से महिलाओं को पर्याप्त मात्रा में फोलिक अम्ल, नियासिन, वायमिन, राइबोफ्लेकिन आदि `बी´ कॉम्पलेक्स समूह के विटामिन प्राप्त होते हैं।

32. अशोक: अशोक के फूल दही के साथ नियमित रूप से सेवन करते रहने से गर्भ स्थापित होता है।

33. बरगद: पुष्य नक्षत्र और शुल्क पक्ष में लायें, हुए बरगद के कोपलों का चूर्ण 6 ग्राम की मात्रा में ऋतु काल में प्रात: पानी के साथ 4-6 दिन खाने से स्त्री अवश्य गर्भ धारण करती है, या कोंपलों को पीसकर बेर के जितनी 21 गोलियां बनाकर 3 गोली रोज घी के साथ खायें, इससे लाभ मिलेगा।

34. नीलकमल: नीलकमल का चूर्ण और धाय के फूल का चूर्ण समभाग मिलाकर ऋतुकाल प्रारंभ होने के दिन से पांच दिन तक शहद के साथ सुबह-शाम प्रतिदिन सेवन करने से गर्भधारण होता है। एक बार या प्रयोग असफल होने पर अगले ऋतुकाल (मासिक स्राव) में पुन: दोहराने से गर्भधारण हो जाता है।

35. गाजर: गर्भावस्था में गाजर का रस पीते रहने से सैप्टिक रोग नहीं होता है तथा शरीर में कैल्शियम की भी कमी नहीं रहती है। बच्चों को दूध पिलाने वाली माताओं को नियमित रूप से गाजर के रस का सेवन करना चाहिए। इससे उनके दूध की गुणवत्ता बढ़ती है।

36. पीपल:

पीपल, सोंठ, कालीमिर्च और नागकेसर को लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर पीसकर बारीक चूर्ण तैयार कर लें। इस चूर्ण को लगभग 7 ग्राम की मात्रा में लेकर 250 मिलीलीटर गाय के हल्के मीठे दूध में एक चम्मच देशी घी मिलाकर मासिक-धर्म शुरू होने के दिन से लेकर तीन दिनों तक नियमित सेवन कराएं। इससे गर्भ स्थिर होता है। 
पीपल की दाढ़ी 100 ग्राम कूटकर खांड 100 ग्राम की मात्रा में मिला दें। इसे 10-10 ग्राम की मात्रा में पति-पत्नी दोनों को सुबह के समय मासिक-धर्म खत्म होने के बाद लगभग एक सप्ताह तक सेवन कराने से गर्भ ठहरता है। 

37. शिवलिंगी:

शिवलिंगी के बीज 10 ग्राम, स्वर्ण भस्म 1 ग्राम, चांदी भस्म 6 ग्राम, वंग भस्म 6 ग्राम, सरफोका की जड़ 6 ग्राम, चंदन का बुरादा 6 ग्राम, शतावर 9 ग्राम, नागकेसर 9 ग्राम, अरुस के फूल 9 ग्राम तिल के फूल नौ ग्राम, हिंगुल भस्म 9 ग्राम, त्रिवंग भस्म 6 ग्राम, असगंध 10 ग्राम, विदारीकंद 10 ग्राम, बरगद की कोमल जटा नौ ग्राम सभी को कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। फिर केसर को 6 ग्राम की मात्रा में पीसकर विदावर कन्द शतावर को पानी में पीसकर इसी पानी से केसर को बारीक पीसते हैं। इसे लगभग आधे ग्राम की गोली बना लें। इसे सुबह-शाम दूध और मिश्री के साथ माहवारी खत्म होने के बाद सेवन करें। इसके सात दिनों बाद पति के साथ संभोग करें। इससे निश्चित ही गर्भधारण होगा। 
शिवलिंगी के 5 बीज और साबूत के 5 बीज सुबह महिलाएं अपने पति के हाथ से सूर्य की ओर मुंह करके लेकर, 250 मिलीलीटर कच्चे दूध (बछड़े वाली गाय के) से निगल जाए ऐसा मासिक-धर्म खत्म होने के बाद 7 दिनों तक लगातार करना चाहिए। इससे निश्चित रूप से गर्भधारण होता है। 

38. गुड़हल:

सफेद गुड़हल की जड़ को गाय के दूध में पीसकर उसमें बिजोरा नींबू के बीज का बारीक चूर्ण मिलाकर, मासिक-धर्म के समय महिलाओं को पिलाने से गर्भधारण में लाभ मिलता है। 
गु़ड़हल के मूल (जड़) और फूलों का रस 30-50 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह पीने से गर्भ स्थिति रहने से गर्भस्थिति बालक की पुष्टि होती है। 

39. बिजौरा नींबू:

एरण्ड के और बिजौरे नींबू के बीजों को पीसकर घी के साथ देना चाहिए। 
1 पके हुए बिजौरे नींबू के बीज को ऋतुकाल में खाने के लिए देना चाहिए। 

40. मजीठ:

मजीठ, मुलहठी, कूठ, त्रिफला, खांड, खिरैटी, मेदा, महामेदा दुधी, काकोली, असगंध की जड़, अजमोद, हल्दी, दारूहल्दी, लाल चंदन सभी 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर खरल कर लें। इसके बाद एक रंग की गाय (जिस गाय के बच्चे न मरते हो) का घी लगभग 2 किलो, दूध 8 किलो, शतावरी रस 8 किलो मिलाकर गर्म करें। इसे 20 से 40 ग्राम गाय के दूध के साथ सेवन करें। इसके सेवन से बांझ स्त्री को भी पुत्र की प्राप्ति होती है। 
मजीठ, मुलहठी, कूठ, हरड़, बहेड़ा, आमला, खांड, खिरेटी, शतावर, असगंध, असगंध की जड़, हल्दी, दारूहल्दी, प्रियंगु के फूल, कुटकी, कमल, कुमुदनी, अंगूर, काकोली, क्षीरकाकोली, दोनों चंदन सभी 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर लुगदी तैयार कर लें। इसके बाद गाय का घी लगभग 640 ग्राम, दूध लगभग 2.5 लीटर को मिलाकर गर्म करें। जब केवल घी मात्र ही शेष बचा रह जाए तो उसे उतारकर छान लें। इसे 20 से 40 ग्राम प्रतिदिन सेवन करने से बांझपन दूर हो जाता है और स्त्रियां गर्भधारण करने के योग्य हो जाती है। 

41. तेजपात:

तेजपत्ते के पत्तों का बारीक चूर्ण एक से तीन ग्राम तक सुबह-शाम सेवन करने से गर्भाशय शुद्ध होता है। 
तेजपत्ता के क्वाथ (काढ़े) में बैठने से गर्भाशय का दर्द (पीड़ा) शान्त होती है। 
प्रसूता को इसके पत्तों का काढ़ा सुबह-शाम पिलाने से गंदा खून तथा गर्भाशय के अन्य विकार नष्ट हो जाते हैं और गर्भाशय शुद्ध हो जाता है। 

42. असगंध:

असगंध के काढे़ में दूध और घी मिलाकर सात दिनों तक पिलाने से स्त्री को निश्चित रूप से गर्भधारण होता है। 
असगंध का चूर्ण 3 से 6 ग्राम मासिक-धर्म के शुरू होने के लगभग 4 दिन पहले से सेवन करना चाहिए। इससे गर्भ ठहरता है। 
असगंध के चूर्ण को गाय के दूध के साथ पकाकर मिश्री मिलाकर मासिक-धर्म के समाप्त होने के बाद पीने से गर्भधारण हो जाता है। 
असगंध 100 ग्राम दरदरा कूटकर 20 ग्राम दवा को पानी 200 मिलीलीटर में रात को भिगोकर रख देते हैं। सुबह इसे उबालते हैं। एक चौथाई रह जाने पर इसे छानकर 200 मिलीलीटर हल्के गर्म मीठे दूध में एक चम्मच घी मिलाकर माहवारी के पहले दिन से 5 दिनों तक लगातार प्रयोग करना चाहिए। 

42. धतूरा:

धतूरे के फलों का चूर्ण घी और शहद में मिलाकर चाटने से गर्भाशय के विकार दूर होकर गर्भस्थापित होता है। 
धतूरा के फलों के चूर्ण को एक चौथाई ग्राम विषम भाग घी और शहद के साथ चटाने से गर्भधारण करने में मदद मिलती है। 

44. अश्वगंधा:

अश्वगंधा का चूर्ण 20 ग्राम, पानी एक लीटर तथा गौ दूध 250 मिलीलीटर तीनों को हल्की आंच पर पकाकर जब दूध मात्र शेष रह जाये तब इसे 6 ग्राम मिश्री और 6 ग्राम गाय का घी मिलाकर मासिक-धर्म की शुद्धिस्नान के तीन दिन बाद तीन दिन तक सेवन करने से स्त्री अवश्य गर्भ धारण करती है। 
अश्वगंधा का चूर्ण, गाय के घी में मिलाकर मासिक-धर्म स्नान के पश्चात् प्रतिदिन गाय के दूध के साथ या ताजे पानी से 4-6 ग्राम की मात्रा में एक माह तक निरन्तर सेवन करने से स्त्री गर्भधारण अवश्य करती है। 
अश्वगंधा के जड़ के काढे़ में चौगुना घी मिलाकर पकाकर सेवन करने से वातरोग दूर होते हैं तथा स्त्री गर्भधारण करती है।  
और परिवार में सभी सुखी से रहते हैं ।

हस्तमैथुन, एक गुप्त रोग ,hand practice is a mently distrub disses

हस्तमैथुन

हस्तमैथुन ऐसी क्रिया है जिसमें रोगी अकेले में अपने ही हाथो से लिंग को घिसकर अपने वीर्य को निकालता रहता है। इसको करने से मानसिक और शारीरिक रोग पैदा हो जाते हैं। मानसिक रोगी दूसरों के सामने भी हस्तमैथुन करने से नहीं हिचकिचाता है। यह कार्य अविवाहित व्यक्ति ज्यादा करते है। यह कार्य स्त्रियां भी कर लेती है। अपनी योनि पर उंगुलियों से रगड़कर वे भी स्खलित कर लेती है यह भी हस्तमैथुन का ही रोग कहलाता है।

विभिन्न औषधियों से उपचार-

1. छोटा गोखरू: छोटा गोखरू और तिल को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। रोजाना सुबह-शाम 4 से 8 ग्राम यह चूर्ण मिश्री मिले गाय के दूध के साथ खाने से हस्तमैथुन से होने वाले रोग दूर होते हैं। इसका सेवन करने से हस्तमैथुन से पैदा होने वाली नपुंसकता भी दूर हो जाती है।

2. कुचला: लगभग चौथाई ग्राम कुचला को सुबह और शाम लेने से हस्तमैथुन से पैदा होने वाली नपुंसकता में लाभ होता है।

3. काहू: कामवासना पर नियंत्रण रखने के लिये जंगली काहू के बीज का चूर्ण 1 से 3 ग्राम रोजाना 2 बार लेने से लाभ होता हैं।

4. विल्वपत्र (बेलपत्र): 10 से 20 मिलीलीटर विल्वपत्र का रस सुबह-शाम पीने से कामइच्छा काबू में होती है, जिससे हस्तमैथुन की ओर से मन हट जाता हैं।

5. धनिया: धनिया का काढ़ा अनुपान या सहपान के रूप में खाने से हस्तमैथुन के रोग में लाभ होता है।

6. गोखरू: गोखरू फल और तिल को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 3 से 6 ग्राम की मात्रा में बकरी के दूध के साथ खाने से हस्तमैथुन से होने वाले सारे रोग दूर हो जाते हैं।

7. आंवला: हस्तमैथुन से धातु (वीर्य) पतला हो गया हो तो सबसे पहले इस हस्तमैथुन की आदत छोड़ दें। आंवलों तथा हल्दी को समान मात्रा में पीसकर घी डालकर सेंके और भूने। सेंकने के बाद इसमें दोनों के वजन के बराबर पिसी हुई मिश्री मिला लें। एक चाय के चम्मच भरकर सुबह-शाम गर्म दूध से इसकी फंकी लेना लाभकारी रहता है। 

मोतियाबिंद

 

मोतियाबिन्द

परिचय-

आंख को स्वच्छमण्डल के द्वारा देखने की शक्ति मिलती है तथा आंख में परितारिका की बनावट गोल और काली होती है। ये पटलों के प्रभावों का समायोजन करती है तथा प्रकाश, मनोवेग आदि अनेकों प्रभावों के उद्दीपन के अनुसार ढीली हो सकती है या फैल सकती है। आंखों में एक पतली सी झिल्ली भी पाई जाती है जिसे नेत्र-श्लेष्मला कहते हैं। यह नेत्र-श्लेष्मला ही आंखों के स्वच्छमण्डल और पलकों को अन्दर की ओर ढककर रखती है। इसके अलावा आंख के पिछले भाग पर एक दृष्टिपटल (रेटिना) होता है जिसके अन्दर नेत्रबिम्ब पाया जाता है।

आंखों में निम्नलिखित भाग पाए जाते हैं-

  • लेन्स
  • कपाट
  • प्रभावग्राही चित्र

मोतियाबिन्द-

          मोतियाबिन्द से पीड़ित रोगी को अपनी आंखों के आगे धुंआ दिखाई देने लगता है। मोतियाबिन्द रोग से पीड़ित व्यक्ति की आंखों से देखने की क्षमता में दोषपूर्ण अवस्था पैदा हो जाती है तथा उसे धुंधलापन दिखाई देने लगता है। इस प्रकार की अवस्था हो जाने को ही मोतियाबिन्द कहते हैं। इस रोग के कारण आंखों के लैंस धूमिल या पारभासी हो जाते हैं जिसके कारण आंखों को देखने की शक्ति नहीं मिल पाती है। इस लैंस के पारभासिता के कारण ही मनुष्य अन्धा हो जाता है।

          मोतियाबिन्द रोग से पीड़ित रोगी को कुछ भी दिखाई नहीं देता है। रोगी की आंखों के नेत्रपटल में भूरापन या सफेदी आ जाती है। यदि मोतियाबिन्द रोग की शुरुआत में ही चिकित्सा की जाए या फिर रोग होने के कारणों से बचाव किया जाये तो इस रोग को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है।

मोतियाबिन्द होने का कारण-

        बुढ़ापे के समय में मोतियाबिन्द होना आम बात है। वैसे यह रोग आंखों की आयु बढ़ने से होता है। इंसान जैसे-जैसे बूढ़ा होता जाता है वैसे-वैसे उसकी आंखों के लेंस की आयु भी बढ़ती जाती है जिसके कारण उसकी आंख का लेंस पारदर्शी होता चला जाता है। लेकिन इस लेंस का पारदर्शी होना अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग होता है। मोतियाबिन्द रोग होने के और भी कई कारण होते हैं जैसे- आंखों में किसी प्रकार का संक्रमण रोग होना, आंखों पर किसी तरह की चोट लगना, मधुमेह रोग होना, औषधियों का अधिक इस्तेमाल करना, चमड़ी पर किसी प्रकार की बीमारियां होना, आंखों में तेज खुजली होना तथा बिजली के तेज झटके लगना आदि। यह रोग जन्मजात भी हो सकता है जो मां-बाप से उसके बच्चों को हो सकता है। कुछ विशेष प्रकार की दवाईयों के प्रयोग से भी मोतियाबिन्द हो सकता है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा मोतियाबिन्द रोग का उपचार-

          मोतियाबिन्द का एक मात्र इलाज शल्य चिकित्सा है लेकिन बहुत सारे लोगों की सर्जरी इस रोग में इसलिए नहीं की जाती है क्योंकि कुछ रोगियों का मोतियाबिन्द छोटा होता है करीबन एक धूल जितना। यदि मोतियबिन्द बड़ा हो तो उसकी सर्जरी की जा सकती है। वैसे एक्यूप्रेशर चिकित्सक भी मोतियाबिन्द का इलाज कर सकता है। 




मसूड़ो के रोग

मसूढ़ों के रोग

परिचय-

    मसूढ़ों में किसी तरह का संक्रमण हो जाने से रोगी में दांतों का ढीलापन, मसूढ़ों से पीब निकलना और जिंजीवाइटिस जैसे लक्षण प्रकट हो जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति इस रोग से पीड़ित हो और वह अपने मसूढ़ों पर दबाव डालता है या ब्रुश करता है तो उसके मसूढ़ों से खून निकलने लगता है तथा उनमें तेज दर्द होने लगता है।

कारण-

        मसूढ़ों के रोग अधिकतर प्लाक जमने और मुंह की अच्छी तरह से सफाई न करने की वजह से होते हैं। जब दांतों पर पीली परत जम जाती है तो उसे प्लाक कहते हैं। यह प्लाक लार, बैक्टीरिया और भोजन के मिश्रण से बनता है और दांतों को ढक देता है। शुरू-शरू में यह प्लाक नर्म होता है तथा इसे उसी समय आसानी से छुड़ाया जा सकता है लेकिन दांतों के कुछ भाग ऐसे होते हैं जो सफाई के दौरान साफ नहीं हो पाते हैं जैसे- दांतों का निचला हिस्सा, दांतों के बीच का भाग और पिछले दांत आदि। यदि प्लाक समय रहते साफ नहीं होता है तो यह सख्त होकर टार्टर में बदल जाता है और दांत के निचले भाग को घेर लेता है। यह प्लाक बहुत से बैक्टीरिया के प्रजनन और प्रसार के लिए एक अच्छा स्थान साबित होता है। इन बैक्टीरिया के कारण ही जिंजीवाइटिस जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं। जब प्लाक की पलक मोटी हो जाती है तो यह दांतों को मजबूती देने वाले ऊतकों पर हमला बोलने लगते हैं। इसके कारण दांतों की हड्डी भी टूट जाती है तथा दांतों में बहुत तेज दर्द होता है। कुछ समय के बाद मसूढ़े सिकुड़ते जाते हैं और दांत ढीले हो जाते हैं।

लक्षण-

       मसूढ़ों के रोग हो जाने पर रोगी व्यक्ति के दांत में दर्द होने लगता है, दांतों के पास के मसूढ़ों से खून निकलने लगता है, मसूढ़े सूज जाते हैं और दांत हिलने लगते हैं। ब्रश से दांतों की सफाई करने पर दांतों में दर्द तथा दांतों से खून निकलने लगता है, मसूढ़ों में सूजन आ जाती है, दांत मसूढ़ों से ढीलें हो जाते हैं तथा मुंह से बदबू आने लगती है


 मसूढ़ों के रोग से पीड़ित रोगी के शरीर के प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर दबाव देने से मसूढ़ों के रोग तथा दांत दर्द में लाभ मिलता है। रोगी को यह क्रिया अपने शरीर पर 5 से 15 मिनट तक करनी चाहिए तथा इसके साथ-साथ उसे अपने दांतों की सफाई पर भी ध्यान देना चाहिए।


मसूढ़ों के रोगों को जल्दी ठीक करने के कुछ उपाय-

  • रोगी को अपने दांतों की सफाई पर उचित ध्यान देना चाहिए।
  • रोगी को अपने दांतों पर जमे प्लाक को हटाने के लिए बेहतर ब्रशिंग (सफाई) का उपाय करना चाहिए।
  • दांतों को साफ करने के लिए नाइलॉन टूथब्रश का प्रयोग करना चाहिए। ब्रश का सिरा छोटा होना चाहिए ताकि उसे आसानी से मुंह में इधर-उधर घुमाया जा सके।
  • रोगी को अपने दांतों का पिछला हिस्सा अच्छी तरह से साफ करना चाहिए।
  • दांतों को साफ करने के बाद शीशे में देखे कि कहीं दांत पर जमे प्लाक बचे तो नहीं है। अगर प्लाक बचे हों तो उन्हे फिर से सही ढंग से साफ करना चाहिए  



गैस्ट्रो

गैस्ट्रोएंट्रोंइटिस

परिचय-

जब बड़ी आंत और आमाशय में कोई संक्रमण होता है तो उसे गैस्ट्रोएंट्राइटिस कहते हैं। इस संक्रमण के कारण रोगी व्यक्ति का पेट खराब हो जाता है।

कारण-

गैस्ट्रोएंट्राइटिस रोग वायरस के कारण होता है। ये वायरस आसानी से किसी भी व्यक्ति के शरीर में पहुंचकर छोटी-मोटी महामारी का रूप ले लेते हैं।

यह रोग बैक्टीरिया आदि सूक्ष्मजीवियों द्वारा संक्रमित किए हुए भोजन या पेय पदार्थों से भी हो सकता है। इससे फूड पॉयजनिंग हो जाती है। ऐसी स्थिति अक्सर भोजन पकाते समय साफ-सफाई का पूरी तरह से ध्यान न रखने के कारण पैदा हो जाती है।

एंटीबायोटिक दवाईयां, आहार में तेजी से बदलाव या किसी बड़े गंभीर रोग के होने पर भी गैस्ट्रोएंट्राइटिस का रोग हो सकता है।

लक्षण-

गैस्ट्रोएंट्राइटिस रोग में रोगी को जी मिचलाने तथा दस्त लगने की शिकायत हो जाती है। कभी-कभी स्थिति कुछ ज्यादा गंभीर भी हो जाती है जिसमें रोगी को पेट दर्द, पेट में ऐंठन की शिकायत, उल्टी, पतले दस्त और बुखार तथा कमजोरी जैसी शिकायत भी हो सकती है।

चिकित्सा-

इस रोग में रोगी को अपने शरीर को पूरा आराम देना चाहिए। उसे नमक-चीनी या ओ.आर.एस का घोल पिलाते रहना चाहिए। रोगी को फलों का रस पिलाना चाहिए और दूध का सेवन नहीं कराना चाहिए। इस रोग का संक्रमण बड़ी आसानी से एक से दूसरे व्यक्ति के शरीर में फैल सकता है। इस रोग में साफ-सफाई का खासतौर पर ध्यान रखना होगा,

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सोराइसिस

साइनुसाइटिस

परिचय-

जब किसी व्यक्ति की नाक के अन्दर के ऊपरी भाग की हड्डी वाले खोल में अर्थात साइनस में पाई जाने वाले श्लेष्मा झिल्ली में संक्रमण तथा सूजन हो जाती है तो उसे साइनुसाइटिस रोग कहते हैं।

लक्षण-

       साइनुसाइटिस रोग के कारण रोगी की नाक के साइनस वाले भाग में बहुत तेज दर्द होता है। इस दर्द के कारण रोगी के गाल और माथे में भी दर्द होने लगता है। यदि किसी प्रकार से रोगी के एक से अधिक साइनसों में रोग हो जाए तो इसके कारण रोगी के दोनों गालों की हडि्डयों में दर्द होने लगता है। इस रोग के कारण रोगी को चेहरा भरा-भरा और काफी भारी सा हो जाता है तथा जब रोगी नीचे की ओर झुकता है तो उसे और भी तेज दर्द होता है। इस रोग से ग्रस्त रोगी का चेहरा काफी संवेदनशील हो जाता है लेकिन फिर भी इसमें सूजन नहीं होती है। कभी-कभी इस रोग के कारण रोगी की नाक भी बहने लगती है। नाक बहने पर रोगी की नाक से गाढ़ा पीले रंग का पदार्थ निकलने लगता है।

कारण-

       नाक के साइनस में वायु के अलावा कुछ भी नहीं पाया जाता है। लेकिन फिर भी जब किसी व्यक्ति को तेज जुकाम होता है तो उसकी नाक के अन्दर श्लेष्मा का भारी जमाव हो जाता है जिसके कारण उसकी नाक बंद हो जाती है। इस अवस्था के कारण श्लेष्मा रोग ग्रस्त हो जाता है और रोगी को साइनुसाइटिस रोग हो जाता है।

        जिन व्यक्तियों को अधिकतर जुकाम रहता है उन्हें इस रोग के हो जाने का ज्यादा खतरा होता है। कभी-कभी किसी व्यक्ति को किसी चीज से एलर्जी होती है जिसके फलस्वरूप रोगी को बहुत तेज जुकाम हो जाता हैं और इस जुकाम के कारण रोगी की नाक बंद हो जाती है और नाक बंद हो जाने के कारण रोगी के सिर में दर्द तथा कभी-कभी गालों में भी दर्द होने लगता है और रोगी को साइनुसाइटिस रोग हो जाता है। यह रोग सर्दी लगने के कारण भी हो सकता है।  

रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से साइनुसाइटिस रोग से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है।

        अगर कभी-कभी रोगी की नाक बंद हो जाए तो नाक के अन्दर श्लेष्मा के जमाव को रोकने वाला स्प्रे लगाने से लाभ होता है। कई बार यह रोग बहुत ही गम्भीर हो जाता है और बहुत से उपचार कराने के बावजूद भी ठीक नहीं होता है या ठीक भी हो जाता है तो कुछ समय के बाद फिर से उभरकर सामने आ जाता है। ऐसी अवस्था हो जाने पर रोगी को डॉक्टर से सलाह लेकर अपना उपचार कराना होगा 


white discharge, सफेद पानी का गिरना

 

श्वेतप्रदर

परिचय-

अक्सर स्त्रियों को श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) की शिकायत बहुत मिलती है। यह रोग किसी भी उम्र की स्त्री को हो सकता है। कई बार लड़कियां जिनकी शादी नहीं हुई होती है वे भी शर्म या दूसरे कारणों से बिना जांच और इलाज के अन्दर ही अन्दर दिमाग में परेशानी पालती रहती है जिसकी वजह से यह रोग उनमें और बढ़ जाता है।

कारण-

          श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) का रोग खुद में एक रोग न होकर ज्यादातर दूसरे रोगों के कारण होता है। इस रोग को मुख्यत: 2 भागों में बांट सकते हैं।

          स्त्रियों में श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) का रोग होने का कारण पोषण की कमी, शरीर में खून की कमी होना या भोजन में पोषक तत्वों की कमी के कारण विटामिन, कैल्शियम की कमी हो जाना है। श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) का रोग ज्यादा चिंता, ज्यादा थकान वाले काम करना, ज्यादा यौन सम्बंधों में लिप्त होना, जल्दी-जल्दी मां बनना या बार-बार गर्भपात होना आदि कारणों से भी हो सकता है। श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) का रोग होने का सबसे खास कारण है बच्चेदानी के मुंह पर घाव होना, यौन रोग, सुजाक (गिनोरिया) आदि होना।

लक्षण-

          स्त्रियों का योनिमार्ग थोड़ा बहुत हमेशा गीला रहता है और यौन उत्तेजना के समय तो यह गीलापन बढ़ता ही जाता है। स्त्रियों के गर्भकाल में, मासिकधर्म से ठीक पहले, मासिकधर्म बंद होने के बाद जब स्त्री-डिम्ब डिम्बाशय से निकलकर डिम्ब-नलिका से होते हुए गर्भाशय की तरफ बढ़ता रहता है और पुरुष शुक्राणु के न मिलने के कारण समाप्त हो जाता है तब इस डिम्ब-निष्कासन और डिम्ब-विर्सजन की अवधि में भी गीलापन बढ़ जाता है। इस स्राव को श्वेतप्रदर नहीं कहा जाता और न ही इसके लिए किसी चिंता या चिकित्सा की जरूरत है।

          सामान्य श्वेतप्रदर बहुत ज्यादा पोषण की कमी और ताकत से ज्यादा थकाने वालों कामों का नतीजा होता है। लेकिन कई बार यह रोग दिमागी परेशानी से भी हो सकता है। मधुमेह, लगातार खांसी या दमा रोग के कारण भी श्वेतप्रदर हो सकता है। इन सभी कारणों को दूर करने और मधुमेह, दमा तथा खांसी का इलाज करवाने से यह रोग ठीक हो सकता है। पोषण की कमी न हो तो इस सामान्य श्वेतप्रदर में न तो कमरदर्द की, न ही योनिप्रदेश पर खुजली की, न ही बदबूदार पानी की और न ही चिपचिपे या ज्यादा गाढ़े स्राव की शिकायत होती है। श्वेतप्रदर रोग के गंभीर न होने पर भी भोजन और जीवन में सुधार करके या डॉक्टर से पूछकर टॉनिक आदि लेकर इनसे बचने की कोशिश करें ताकि कमजोरी ज्यादा न बढ़े और जल्दी इन्फैक्शन न हो।

 शरीर पर एक्यूप्रेशर दबाव देकर श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) रोग का उपचार किया जा सकता है। रोगी स्त्री को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में ही कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) रोग का उपचार कर सकता है  

एंजाइना पेक्टोरिस

 

एंजाइना पेक्टोरिस

    परिचय-

              एंजाइना पेक्टोरिस के रोग में रोगी ऐंठन का शिकार हो जाता है। इस रोग में शरीर के अंदर खून का संचार कम होने की वजह से रोगी को पूरी तरह आक्सीजन नहीं मिल पाती है।

    कारण-

              जब रोगी के शरीर की धमनियां एकदम सख्त हो जाती है तब यह रोग पैदा होता है।

    लक्षण-

              इस रोग की शुरुआत में रोगी की छाती के बीचो-बीच में तेज दर्द होता है। खासतौर पर इस तरह का दर्द व्यायाम के बाद ही होता है। कभी-कभी यह दर्द जबड़े या बांह के ऊपरी भाग में भी चला जाता है। इस रोग में रोगी को काफी घुटन महसूस होती है और उसे ऐसा लगता है कि किसी ने उसकी छाती पर कुछ भारी सामान रख दिया हो। इस रोग की पहचान के लिए रोगी की इलेक्ट्रो-कॉडियोग्राम जांच करानी अच्छी रहती है।

    उपचार-

              इस रोग के होने पर सबसे पहले रोगी को अपने ब्लड प्रेशर की जांच करा लेनी चाहिए। अगर ब्लड प्रेशर बढ़ा

    हुआ तो उसे कंट्रोल करने की कोशिश करनी चाहिए। आपकी लंबाई के हिसाब से अगर आपका वजन ज्यादा हो तो वजन कम करने की कोशिश करनी चाहिए। अगर रोगी धूम्रपान करता हो तो उसे धूम्रपान तुरंत छोड़ देना चाहिए नहीं तो यह खतरनाक हो सकता हैं  





पेप्टिक अल्सर

पेप्टिक अल्सर

परिचय-

शरीर में पाये जाने वाले पाचनतन्त्र में होने वाले घाव को अल्सर कहते हैं। इस रोग में रोगी के आमाशय तथा आंत दोनों में अल्सर हो जाता है। वैसे यह रोग अधिकतर अधेड़ उम्र के पुरुषों तथा स्त्रियों में होता है। जब आमाशय या आंत के किसी भाग की सतह में पाचक रसों के प्रतिरोध की क्षमता खो जाती है तो इ88स प्रकार का रोग हो जाता है।

कारण-

        आमाशय तथा आंत का अल्सर कई कारणों से हो सकता है जैसे- अधिक मात्रा में शराब का सेवन या धूम्रपान करने आदि से। यह रोग उन व्यक्तियों को भी हो सकता है जो अनियमित रूप से भोजन का सेवन करते हैं। इस कारण से होने वाले रोगों को पेप्टिक अल्सर कह सकते हैं। इनके अलावा यह रोग कई सारी दवाईयों के साइड इफेक्ट से भी हो सकता है।

लक्षण-

        इस रोग के कारण व्यक्ति के पेट के ऊपरी भाग या बाईं पसलियों के नीचे की ओर जलन युक्त दर्द होता है। कई बार यह दर्द खाना खाने के बाद शुरू हो जाता है। लेकिन कई बार खाना खाने से यह दर्द कम भी हो जाता है। वैसे यह दर्द लम्बे समय तक रुक-रुककर भी होता रहता है। इस रोग से पीड़ित कुछ व्यक्तियों को जी-मिचलाने की भी शिकायत हो सकती है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार-

          देखा जाए तो यह रोग कुछ महीने के अन्दर ही ठीक हो सकता है लेकिन कभी-कभी इस तरह के रोग को ठीक होने में वर्षों भी लग जाते हैं। यह रोग कई वर्षों तक बना रहता है। कुछ अल्सर रोग में रोगी को उल्टी या मल के साथ खून आना शुरू हो जाता है। यह रोग आगे चलकर कैंसर का रूप भी धारण कर सकता है। इसलिए इन रोगों का सही तरीके से इलाज करना चाहिए। पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा भी किया जा सकता हैं   

 पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार किया जा सकता है। रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से पेप्टिक अल्सर से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है। जब रोगी को पेट में इस रोग के कारण दर्द हो रहा हो तो रोगी को अधिक से अधिक आराम करना चाहिए तथा सदैव पौष्टिक भोजन ही करना चाहिए ।

एन्जाइम प्रॉब्लम

एन्जाइना रोग में रोगी के सीने के बाईं ओर दर्द उठता है। यह दर्द बाद में सीने से हाथों और हथेलियों तक पहुंच जाता है। अक्सर यह रोग 40 साल की उम्र से ज्यादा के व्यक्तियों को होता है।

कारण-

एन्जाइना रोग ज्यादा शारीरिक-मानसिक श्रम, भय, घबराहट, अधिक सर्दी लगने अथवा जरूरत से अधिक भोजन करने के कारण हो जाता है। ज्यादा धूम्रपान करने से या उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर) रोग के कारण भी एन्जाइमा का रोग हो सकता है।

लक्षण-

एन्जाइना रोग के होने से पहले रोगी में छाती में जकड़न, सांस लेने में परेशानी और बैचेनी जैसे लक्षण प्रकट होते हैं और उसके बाद दर्द शुरू हो जाता है। रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसे दिल का दौरा पड़ने वाला है।

चिकित्सा-

एन्जाइना रोग में रोगी को सबसे पहले धूम्रपान करना बंद कर देना चाहिए। रोगी को अपने रक्तचाप को भी सामान्य करने की कोशिश करनी चाहिए। रोगी को अपने भोजन पर खासतौर से ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही उसे हृदय से सम्बंधित सभी प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर प्रेशर देना चाहिए।।                      

सनातन

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