नाभि का हटना

नाभिचक्र के अस्थायी रोग (नाभि का टलना)

परिचय-

इस रोग के कारण रोगी के पेट में बहुत तेज दर्द होता है। व्यक्ति को भूख कम लगती है तथा उसका जी घबराने लगता है। नाभिचक्र जब अपने स्थान से ऊपर की ओर हट जाता है तो व्यक्ति में कब्जियत जैसी अवस्था पैदा हो जाती है तथा नाभिचक्र जब अपने स्थान से नीचे की ओर हट जाता है तो वायु के दबाब के कारण दस्त जैसी अवस्था पैदा हो जाती है। यह रोग कभी भी दवाईयों द्वारा ठीक नहीं किया जा सकता है।

लक्षण-

        नाभिचक्र अपने स्थान पर है या नहीं यह पहचान करने के लिए व्यक्ति को सुबह के समय में शौचक्रिया के बाद पीठ के बल सीधा लेट जाना चाहिए और हाथों को बगल में शरीर के साथ सीधा रखना चाहिए। फिर दूसरे व्यक्ति को एक धागा लेकर रोगी की नाभि से लेकर छाती के एक तरफ के निप्पल तक नापना चाहिए। ठीक इसी तरह की क्रिया दूसरे निप्पल के साथ भी करें और पता करें कि दोनों तरफ के निप्पलों के साथ धागे की समान दूरी है या नहीं। यदि यह दूरी समान नहीं है तो समझ लेना चाहिए कि नाभिचक्र अपने स्थान से हट गया है और यदि दूरी समान है तो नाभिचक्र अपने स्थान पर है।

कारण-

        चलने-फिरने में असावधानी, अत्यधिक कूदने-फांदने, अधिक वजन उठाने वाले कार्य करने या किसी प्रकार से ऊंची-नीची जमीन पर अचानक पैर पड़ जाने से झटका आदि लग जाने के कारण यह रोग हो जाता है।

नाभिचक्र के रोग का एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा उपचार-

  • इस रोग का इलाज करने में एक्यूप्रेशर चिकित्सा का एक प्रमुख स्थान है। यदि किसी व्यक्ति का नाभिचक्र अपने स्थान से हट जाता है तो वह व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं रहता है। नाभिचक्र ही शरीर में पाए जाने वाले डायाफ्राम के नीचे अव्यवस्थित समस्त अंगों को नियंत्रित करता है।
  • किसी व्यक्ति का नाभिचक्र अपने स्थान से हट जाने पर उस व्यक्ति को पीठ के बल सीधा लिटा दें तथा इसके बाद अपने दाहिने हाथ की पांचों अंगुलियों को मिलाकर नाभिचक्र पर एक्यूप्रेशर चिकित्सा के अनुसार धीरे-धीरे दबाव डालें। यदि रोगी की धड़कन शुरु हो जाए तो उस समय यह क्रिया बंद कर देनी चाहिए। इसके अलावा किसी खाली गिलास को रोगी के नाभिचक्र पर उल्टा रखकर हल्का दबाब डालने से भी नाभिचक्र अपने स्थान पर वापस आ जाता है तथा रोगी को बहुत आराम मिलता है।
  • नाभिचक्र को ठीक करने का एक उपाय यह भी है कि पीठ के बल लेटने पर पैर का जो अंगूठा नीचे है उसे हाथ के साथ ऊपर की ओर खींचकर दूसरे के बराबर करें। यह क्रिया 2-3 बार करने पर नाभिचक्र अपने स्थान पर आ जाता है।

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