1919 का अपराधी एक्ट

अराजक और रिवोल्यूशनरी अपराध अधिनियम, 1919

गवर्नर जनरल चेम्सफोर्ड ने 1917 में जस्टिस सिडनी रौलट की अध्यक्षता में एक समिति गठित की| इस समिति का गठन विद्रोह की प्रकृति को समझने और सुझाव देने के लिए किया गया था| इसे ‘रौलट समिति’ के नाम से भी जाना जाता है| इस अधिनियम, जोकि किसी भी क्षेत्र/भाग पर लागू किया जा सकता था, में किसी भी व्यक्ति को कार्यपालिका के नियंत्रण में लाने के लिए दो तरह के उपाय शामिल थे-दंडात्मक और प्रतिबंधात्मक| इस अधिनियम के तहत सरकार किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती थी और बिना सुनवाई के दो साल तक कैद में रख सकती थी|

अधिनियम के प्रावधान

• गवर्नर जनरल को इस अधिनियम को किसी भी क्षेत्र में लागू करने का अधिकार दिया गया

• अधिनियम में अपराधों की त्वरित सुनवाई की व्यवस्था की गयी

• जन सुरक्षा के दृष्टिकोण से किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर जेल में डाला जा सकता था

• भारत रक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को न छोड़ा जाये

• ऐसे मुकदमों की सुनवाई का अधिकार ज्यूरी पर छोड़ दिया गया था|

निष्कर्ष

ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था में यह अधिनियम उस समय की राजनीतिक गतिविधियों और चर्चित स्वतंत्रताओं पर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से लाया गया था| इस अधिनियम, जोकि किसी भी क्षेत्र/भाग पर लागू किया जा सकता था, में किसी भी व्यक्ति को कार्यपालिका के नियंत्रण में लाने के लिए दो तरह के उपाय शामिल थे-दंडात्मक और प्रतिबंधात्मक|

1940 का अगस्त प्रस्ताव

अगस्त प्रस्ताव

भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को शिमला से एक वक्तव्य जारी किया, जिसे अगस्त प्रस्ताव कहा गया|यह प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा ब्रिटेन से भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य को लेकर पूछे गए सवाल के जबाव में लाया गया था|

अगस्त प्रस्ताव के प्रावधान

• सलाहकारी युद्ध परिषद् की स्थापना

• युद्ध के पश्चात भारत के संविधान निर्माण के लिए प्रतिनिधिक भारतीय निकाय की स्थापना करना

• वायसराय की कार्यकारी परिषद् का तत्काल विस्तार

• अल्पसंख्यकों को यह आश्वासन दिया गया कि ब्रिटिश सरकार,शासन के किसी ऐसे तंत्र को सत्ता नहीं सौंपेगी जिसके प्राधिकार को भारतीय राष्ट्रीय जीवन के किसी बड़े और शक्तिशाली तबके द्वारा स्वीकार न किया गया हो

यह प्रथम अवसर था जब भारतीयों के संविधान निर्माण के अधिकार को स्वीकार किया गया और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की| कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया| जवाहर लाल नेहरु ने कहा कि डोमिनियन दर्जे का सिद्धांत अब मृतप्राय हो चुका है| गाँधी ने कहा कि इस घोषणा नेराष्ट्रवादियों और ब्रिटिश शासकों के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है| मुस्लिम लीग इसमें दिए गए वीटो अधिकार के चलते खुश थी और उसने कहा कि राजनीतिक गतिरोध को दूर करने का एकमात्र उपाय विभाजन है| कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत की गयी मांगों को स्वीकार न करने से व्याप्त व्यापक असंतोष के सन्दर्भ में गाँधी ने वर्धा में हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में अपनी व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा को शुरू करने की योजना को प्रस्तुत किया|

निष्कर्ष

यह भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो के द्वारा जारी किया गया औपचारिक वक्तव्य था,जिसने संविधान निर्माण प्रक्रिया की नींव रखी और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की|

भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को शिमला से एक वक्तव्य जारी किया, जिसे अगस्त प्रस्ताव कहा गया|यह प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा ब्रिटेन से भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य को लेकर पूछे गए सवाल के जबाव में लाया गया था|
अगस्त प्रस्ताव के प्रावधान
• सलाहकारी युद्ध परिषद् की स्थापना
• युद्ध के पश्चात भारत के संविधान निर्माण के लिए प्रतिनिधिक भारतीय निकाय की स्थापना करना
• वायसराय की कार्यकारी परिषद् का तत्काल विस्तार
• अल्पसंख्यकों को यह आश्वासन दिया गया कि ब्रिटिश सरकार,शासन के किसी ऐसे तंत्र को सत्ता नहीं सौंपेगी जिसके प्राधिकार को भारतीय राष्ट्रीय जीवन के किसी बड़े और शक्तिशाली तबके द्वारा स्वीकार न किया गया हो
यह प्रथम अवसर था जब भारतीयों के संविधान निर्माण के अधिकार को स्वीकार किया गया और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की| कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया| जवाहर लाल नेहरु ने कहा कि डोमिनियन दर्जे का सिद्धांत अब मृतप्राय हो चुका है| गाँधी ने कहा कि इस घोषणा नेराष्ट्रवादियों और ब्रिटिश शासकों के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है| मुस्लिम लीग इसमें दिए गए वीटो अधिकार के चलते खुश थी और उसने कहा कि राजनीतिक गतिरोध को दूर करने का एकमात्र उपाय विभाजन है| कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत की गयी मांगों को स्वीकार न करने से व्याप्त व्यापक असंतोष के सन्दर्भ में गाँधी ने वर्धा में हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में अपनी व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा को शुरू करने की योजना को प्रस्तुत किया|  
निष्कर्ष
यह भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो के द्वारा जारी किया गया औपचारिक वक्तव्य था,जिसने संविधान निर्माण प्रक्रिया की नींव रखी और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की|

1946 की अंतरिम सरकार

अंतरिम सरकार

2 सितम्बर 1946, को नवनिर्वाचित संविधान सभा ने भारत की अंतरिम सरकार का गठन किया जोकि 15 अगस्त 1947 तक अस्तित्व में बनी रही|अंतरिम सरकार की कार्यकारी शाखा का कार्य वायसराय की कार्यकारी परिषद करती थी जिसकी अध्यक्षता वायसराय द्वारा की जाती थी| इसमें कांग्रेस द्वारा नामित 3 मुस्लिम सदस्यों सहित कुल 12 सदस्य शामिल थे| भारत में ब्रिटिशों के आने के बाद यह प्रथम अवसर था जब भारत की सरकार भारतीयों के हाथों में थी| 26 अक्टूबर को लीग द्वारा नामित 5 सदस्य इसमें शामिल हुए और इन नए सदस्यों के लिए स्थान बनाने के लिए कांग्रेस द्वारा नियुक्त सदस्यों में हेर-फेर किया गया (दो सीटें पहले से ही खाली थीं इसके अलावा शरत बोस, सैय्यद अली जहीर व सर शफात अहमद खान ने त्यागपत्र दे दिया)| सरकार के सभी चौदह सदस्यों के विभाग निम्नलिखित थे-

अंतरिम सरकार के सदस्य

पंडित जवाहर लाल नेहरु

कार्यकारी परिषद् के उपाध्यक्ष,विदेश विभाग, राष्ट्रमंडल से सम्बंधित मामले

वल्लभभाई पटेल

गृह, सुचना एवं प्रसारण

बलदेव सिंह

रक्षा

डॉ.जॉन

उद्योग एवं आपूर्ति

सी.राजगोपालाचारी

शिक्षा

सी.एच.भाभा

कार्य, खनन एवं शक्ति

राजेंद्र प्रसाद

खाद्य एवं कृषि

आसफ अली

रेलवे

जगजीवन राम

श्रम

लियाकत अली

वित्त

टी.टी.चुंदरीगर

वाणिज्य

अब्दुल रब नश्तर

संचार

गजान्फर अली खान

स्वास्थ्य    

जोगेंद्र नाथ मंडल

विधि

निष्कर्ष
अगस्त 1946 में कांग्रेस ने अंतरिम सरकार में शामिल होने का निर्णय लिया ताकि ब्रिटिश सरकार के लिए सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को सरल बनाया जा सके| अंतरिम सरकार ने 2 सितम्बर 1946 से कार्य करना आरम्भ किया|

अंग्रेजी उपनिवेशवाद

अंग्रेज उपनिवेश की स्थापना

अंग्रेजों का भारत आगमन और ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना का प्रमुख कारण पुर्तगाली व्यापारियों द्वारा भारत में अपनी वस्तुओं को बेचने से होने वाला अत्यधिक लाभ था जिसने ब्रिटिश व्यापारियों को भारत के साथ व्यापार करने के लिए प्रोत्साहित किया । अतः पुर्तगाली व्यापारियों की व्यापारिक सफलता से प्रेरित होकर अंग्रेज व्यापारियों के एक समूह –मर्चेंट एडवेंचरर्स ने 1599 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की । महारानी स्वयं भी ईस्ट इंडिया कंपनी की साझेदार/शेयरहोल्डर थीं|

पश्चिम और दक्षिण में विस्तार

बाद में 1608 ई. में  ईस्ट इंडिया कंपनी ने शाही संरक्षण प्राप्त करने के लिए कैप्टन हॉकिन्स  को मुग़ल शासक जहाँगीर के दरबार में भेजा । वह भारत के पश्चिमी तट पर अपनी फैक्ट्रियां स्थापित करने हेतु शाही परमिट प्राप्त करने में सफल रहा। 1605 ई. में इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम ने सर थॉमस रो को कंपनी के लिए और अधिक छूटें प्राप्त करने के उद्देश्य से जहाँगीर के दरबार में भेजा। रो बहुत कुटनीतिज्ञ था और अपनी कूटनीति के बल पर वह  पूरे मुग़ल क्षेत्र पर स्वन्त्रतापूर्वक व्यापार करने हेतु शाही चार्टर प्राप्त करने में सफल रहा । बाद के वर्षों में ईस्ट इंडिया कंपनी अपने आधार को विस्तृत करती गयी । कंपनी को पुर्तगाली, डच और फ़्रांसीसी व्यापारियों द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। निर्णायक क्षण तब आया जब 1662 ई. में इंग्लैंड के चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन से हुआ और इंग्लैंड को बम्बई. दहेज़ के रूप में प्राप्त हुआ । इंग्लैंड द्वारा 1668 ई. में बम्बई. को दस पौंड प्रतिवर्ष की दर पर ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया। कंपनी ने अपने पश्चिमी तट पर अपना व्यापारिक मुख्यालय सूरत से बम्बई. स्थानांतरित कर दिया। 1639 ई. में  ईस्ट इंडिया कंपनी ने स्थानीय राजा से मद्रास को पट्टे पर प्राप्त कर लिया और वहां पर अपनी फैक्ट्री की सुरक्षा हेतु फोर्ट सेंट जॉर्ज का निर्माण कराया । बाद में मद्रास कंपनी का दक्षिण भारतीय  मुख्यालय बन गया।

पूर्व में कंपनी का विस्तार

दक्षिण एवं पश्चिमी भारत में सफलतापूर्वक अपनी फैक्ट्रियां स्थापित करने के बाद कंपनी ने पूर्व की ओर ध्यान केन्द्रित किया । कम्पनी ने पूर्व में अपना ध्यान मुख्य रूप से मुग़ल प्रान्त बंगाल पर लगाया। बंगाल के गवर्नर सुजाउद्दीन ने 1651 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल में अपनी व्यापारिक गतिविधियां चलने हेतु अनुमति प्रदान कर दी। हुगली में एक फैक्ट्री स्थापित की गयी और 1668 ई. में फैक्ट्री स्थापित करने हेतु सुतानती,गोविंदपुर व कोलकाता नाम के तीन गावों को खरीद लिया गया। बाद में फैक्ट्री की सुरक्षा के लिए उसके चारों ओर फोर्ट विलियम  का निर्माण कराया गया। इसी स्थान पर वर्त्तमान कोलकाता शहर का विकास हुआ|

फर्रुख्सियर द्वारा जारी शाही फरमान

मुग़ल शासक फर्रुख्सियर ने 1717 ई. में शाही फरमान जारी कर कंपनी को बंगाल में कुछ व्यापारिक विशेषाधिकार प्रदान कर दिए ,जिसमे बगैर कर अदा किये बंगाल में ब्रिटिश वस्तुओं के आयात-निर्यात की अनुमति भी शामिल थी। इस फरमान द्वारा कंपनी को वस्तुओं की आवाजाही हेतु दस्तक (पास ) जारी करने का अधिकार भी प्रदान कर दिया गया।

व्यापार एवं वाणिज्य के क्षेत्र में मजबूती से स्थापित होने के बाद कंपनी ने  भारत में सत्ता प्राप्त करने के सपने देखना शुरू कर दिया|

भारत में ब्रिटिश सत्ता के उदय में सहायक प्रमुख कारक

प्रमुख कारण,जिन्होनें ब्रिटिशों को लगभग दो सौ वर्षों तक भारत पर शासन करने का अवसर प्रदान किया,निम्नलिखित है-

  • 1707 ई. में  औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही भारत में मुग़ल साम्राज्य का पतन की ओर अग्रसर होना तथा भारत में मुगलों जैसी किसी केंद्रीय शक्ति का उपस्थित न होना |
  • तत्कालीन भारतीय शासकों में राजनीतिक एकजुटता का आभाव था और वे प्रायः अपनी सुरक्षा हेतु अंग्रेजों की मदद पर निर्भर थे । ऐसे में अंग्रेजों ने उनकी कमजोरी का फायदा उठाया और अपने हित के लिए राज्यों के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करने लगे|

यूरोपीय शक्तियों के बीच संघर्ष

भारत में प्रमुख यूरोपीय शक्तियाँ: पुर्तगाली,डच ,अंग्रेज और फ्रांसीसी चार प्रमुख यूरोपीय शक्तियां थी जो व्यापारिक संबंधों की स्थापना हेतु भारत आये लेकिन बाद में उन्होंने यहाँ अपने उपनिवेश स्थापित किये। इन यूरोपीय शक्तियों के बीच वाणिज्यिक और राजनीतिक प्रभुता हेतु छोटे-मोटे संघर्ष होते रहते थे लेकिन अंत में ब्रिटिश सबसे ताकतवर शक्ति के रूप में उभरे जिन्होंने अन्य तीनों शक्तियों को पीछे छोड़ लगभग दो सौ सालों तक भारत पर शासन किया। भारत में सबसे पहले पुर्तगाली आये जिन्होनें अपनी फैक्ट्रियां और औपनिवेशिक बस्तियां स्थापित की । डचों के साथ उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा लेकिन डच उनके सामने कमजोर साबित हुए और पुर्तगाली व ब्रिटिशों की प्रतिस्पर्धा के सामने टिक न सकने के कारण डच वापस चले गए|

मुख्य प्रतिस्पर्धी: ब्रिटिशों को भारत में प्रवेश करने के समय से ही डच,पुर्तगाली और फ़्रांसीसी शक्तियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी थी लेकिन पुर्तगाली व डच प्रतिस्पर्धी न तो अधिक गंभीर थे और न ही अधिक सक्षम । अतः ब्रिटिशों के सबसे मजबूत प्रतिद्वंदी फ्रांसीसी थे,जो भारत में सबसे बाद में आये थे। ब्रिटिशों द्वारा भारत के व्यापार एवं वाणिज्य पर पूर्ण एकाधिकार प्राप्त करने के प्रयासों ने फ्रांसीसियों के साथ उनके संघर्ष को जन्म दिया|1744 ई. से लेकर 1763 ई. के मध्य के 20  वर्षों में वाणिज्यिक व क्षेत्रीय नियंत्रण के उद्देश्यों को लेकर ब्रिटिशों व फ्रांसीसियों के मध्य तीन बड़े युद्ध लड़ें गए। अंतिम और निर्णायक युद्ध 22 जनवरी, 1763 ई. को बांडीवाश में लड़ा गया था|

कर्नाटक युद्ध: कर्नाटक और हैदराबाद दोनों राज्यों में उत्तराधिकार को लेकर विवाद था जिसने ब्रिटिश और फ्रांसीसी शक्तियों के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने के द्वार खोल दिए । इन दोनों यूरोपीय शक्तियों अपनी आपसी शत्रुता की आड़ में कर्नाटक और हैदराबाद के उत्तराधिकार हेतु अलग-अलग भारतीय दावेदारों का समर्थन किया । उत्तराधिकार के इस संघर्ष में पोंडिचेरी के गवर्नर डूप्ले के नेतृत्व में फ्रांसीसियों की जीत हुई. और अपने दावेदारों को गद्दी पर बिठाने के एवज में उन्हें उत्तरी सरकार का क्षेत्र प्राप्त हुआ जिसे फ्रांसीसी अफसर बुस्सी ने सात सालों तक नियंत्रित किया। लेकिन फ्रांसीसियों की यह जीत बहुत कम समय की थी क्योकि 1751 ई. में रोबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में ब्रिटिश शक्ति ने युद्ध की परिस्थितियाँ बदल दी थी। रोबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में ब्रिटिश शक्ति ने एक साल बाद ही उत्तराधिकार हेतु फ्रांसीसी समर्थित दावेदारों को पराजित कर दिया|अंततः फ्रांसीसियों को ब्रिटिशों के साथ त्रिचुरापल्ली की संधि करनी पड़ी|

अगले सात वर्षीय युद्ध (1756-1763 ई.।) अर्थात तृतीय कर्नाटक युद्ध  में दोनों यूरोपीय शक्तियों की शत्रुता फिर से सामने आ गयी । इस युद्ध की शुरुआत फ्रांसीसी सेनापति काउंट दे लाली द्वारा मद्रास पर आक्रमण के साथ हुई. थी |लाली को ब्रिटिश सेनापति सर आयरकूट द्वारा हरा दिया गया|1761 ई. में ब्रिटिशों ने पोंडिचेरी पर कब्ज़ा कर लिया और लाली को जिंजी और कराइकल के समर्पण हेतु बाध्य कर दिया|अतः फ्रांसीसी बांडीवाश में लडे गये तीसरे कर्नाटक युद्ध(1760 ई.) में हार गए और बाद में यूरोप में उन्हें ब्रिटेन के साथ पेरिस की संधि  करनी पड़ी|

ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना

कर्नाटक के युद्ध में प्राप्त विजय ने भारत में ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना हेतु जमीन तैयार कर दी थी और साथ ही फ्रांसीसियों के भारतीय साम्राज्य के सपने को चकनाचूर कर दिया था। इस जीत के बाद भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का कोई. यूरोपीय प्रतिद्वंदी नहीं बचा था। ब्रिटिशों को सर आयरकूट,मेजर स्ट्रिंगर लॉरेंस ,रोबर्ट क्लाइव  जैसे कुशल नेतृत्वकर्ताओं के साथ साथ एक मजबूत नौसैनिक शक्ति होने का भी लाभ मिला। इन कारकों के कारण ही वे भारत के विश्वसनीय शासक बन सके|

1909 का भारतीय परिसद अधिनियम

1909 ई. का भारतीय परिषद् अधिनियम

1909 ई. के भारत शासन अधिनियम को ,भारत सचिव और वायसराय के नाम पर, मॉर्ले-मिन्टो सुधार भी कहा जाता है|इसका निर्माण उदारवादियों को संतुष्ट करने के लिए किया गया था| इस अधिनियम द्वारा केंद्रीय व प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों  की संख्या में वृद्धि की गयी लेकिन इन परिषदों में अभी भी निर्वाचित सदस्यों की संख्या कुल सदस्य संख्या के आधे से भी कम थी अर्थात अभी भी नामनिर्देशित सदस्यों का बहुमत बना रहा| साथ ही निर्वाचित सदस्यों का निर्वाचन भी जनता द्वारा न होकर जमींदारों,व्यापारियों,उद्योगपतियों,विश्वविद्यालयों और  स्थानीय निकायों द्वारा किया जाता था| ब्रिटिशों ने सांप्रदायिक निर्वाचन मंडल का भी प्रारंभ किया जिसका उद्देश्य हिन्दू व मुस्लिमों के बीच मतभेद पैदा कर उनकी एकता को ख़त्म करना था| इस व्यवस्था के तहत परिषद् की कुछ सीटें मुस्लिमों के लिए आरक्षित कर दी गयी जिनका निर्वाचन भी मुस्लिमों मतदाताओं द्वारा ही किया जाना था|

इस व्यवस्था के द्वारा ब्रिटिश मुस्लिमों को राष्ट्रवादी आन्दोलन से अलग करना चाहते थे| उन्होंने मुस्लिमों को बहकाया कि उनके हित अन्य भारतीयों से अलग है | भारत के राष्ट्रवादी आन्दोलन को कमजोर करने के लिए अंग्रेज लगातार सम्प्रदायवाद को बढ़ावा देने वाली नीतियों का अनुसरण करते रहे| सम्प्रदायवाद के प्रसार ने भारतीय एकता और स्वतंत्रता के आन्दोलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1909 ई. के अपने अधिवेशन में इस अधिनियम के अन्य सुधारों का तो स्वागत किया लेकिन धर्म के आधार पर प्रथक निर्वाचक मंडलों की स्थापना के प्रावधान का विरोध किया|

मॉर्ले-मिन्टो सुधारों ने परिषदों की शक्तियों में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किया |इन सुधारों ने,स्वराज तो दूर, प्रतिनिधिक सरकार की स्थापना की ओर भी कोई कदम नहीं बढ़ाया | वास्तव में भारत सचिव ने स्वयं कहा कि भारत में संसदीय सरकार की स्थापना का उनका बिलकुल इरादा नहीं है| जिस निरंकुश सरकार की स्थापना 1857 के विद्रोह के बाद की गयी थी,उसमे मॉर्ले-मिन्टो सुधारों के बाद भी कोई बदलाव नहीं आया था |इतना अंतर जरुर आया कि सरकार अपनी पसंद के कुछ भारतीयों को उच्च पदों पर नियुक्त करने लगी| सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा ,जो बाद में लॉर्ड सिन्हा बन गए ,गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् में सदस्य नियुक्त होने वाले प्रथम भारतीय थे| बाद में उन्हें एक प्रान्त का गवर्नर बना दिया गया| वे भारत में पूरे ब्रिटिश शासनकाल के दौरान इतने उच्च पद पर पहुँचने वाले एकमात्र भारतीय थे| वे 1911 में दिल्ली में आयोजित किये गए शाही दरबार,जिसमें ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम और उनकी महारानी उपस्थित हुई थीं, में भी उपस्थित रहे थे| दरवार में भर्तिया रजवाड़े भी शामिल हुए जिन्होंने ब्रिटिश सम्राट के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट की| इस दरवार में दो महत्वपूर्ण घोषणाएं की गयीं ,प्रथम -1905 ई. से प्रभावी बंगाल के विभाजन को रद्द कर दिया गया ,द्वितीय –ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानन्तरित कर दी गयी|

अधिनियम की विशेषताएं

• इस अधिनियम ने विधान परिषदों की सदस्य संख्या का विस्तार किया और प्रत्यक्ष निर्वाचन को प्रारंभ किया|

• एक भारतीय को गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् का सदस्य नियुक्त किया गया |

• केंद्रीय विधान परिषद् के  निर्वाचित सदस्यों की संख्या 27 थी( जो 2 विशेष निर्वाचन मंडल ,13 सामान्य निर्वाचन मंडल और 12 वर्गीय निर्वाचन मंडल अर्थात 6 जमींदारों द्वारा निर्वाचित  व 6 मुस्लिम क्षेत्रों से निर्वाचित सदस्यों से मिलकर बनते थे)

• सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् में सदस्य नियुक्त होने वाले प्रथम भारतीय थे|

• ‘प्रथक निर्वाचन मंडल ‘ के सिद्धांत का प्रारंभ किया गया|लॉर्ड मिन्टो को ‘सांप्रदायिक निर्वाचन मंडल का पिता’ कहा गया |

निष्कर्ष

1909 ई. के भारत शासन अधिनियम का निर्माण उदारवादियों को संतुष्ट करने के लिए और ‘प्रथक निर्वाचन मंडल ‘ के सिद्धांत द्वारा मुस्लिमों को राष्ट्रीय आन्दोलन से अलग करने के लिए किया गया था|

सन 1892 का भारत शासन अधिनियम

1892 ई. का अधिनियम

ब्रिटेन की संसद द्वारा 1892 ई. में पारित किये गए अधिनियम ने विधान परिषदों की सदस्य संख्या में वृद्धि कर उन्हें सशक्त बनाया, जिसने भारत में संसदीय प्रणाली की आधारशिला रखी| इस अधिनियम से पूर्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 1885 ई. से लेकर 1889 ई. तक के अपने अधिवेशनों में कुछ मांगे प्रस्तुत कर चुकी थी जिनमें से प्रमुख मांगे निम्नलिखित थीं-

• आईसीएस परीक्षा भारत और इंग्लैंड दोनों जगह आयोजित की जाये|

• परिषदों में सुधर किये जाएँ और नामनिर्देशन के स्थान पर निर्वाचन प्रणाली को अपनाया जाये|

• ऊपरी वर्मा का विलय न किया जाये|

• सैन्य व्यय में कटौती की जाये|

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की इन मांगों ने इस अधिनियम के निर्माण की भूमिका तैयार कर दी|

अधिनियम के प्रावधान

• केंद्रीय और प्रांतीय दोनों विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गयी|

• विश्वविद्यालयों ,ज़मींदारों,नगरपालिकाओं आदि को प्रांतीय परिषद् के सदस्यों को अनुमोदित करने के लिए अधिकृत कर दिया गया| इस प्रावधान द्वारा प्रतिनिधित्व के सिद्धांत  को प्रारंभ किया गया|

• इस अधिनियम द्वारा परिषद् के सदस्यों को वार्षिक वित्तीय विवरण अर्थात बजट पर बहस करने का अधिकार प्रदान किया गया|

• गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 16 तक कर दी गयी|

• इस अधिनियम के अनुसार परिषद् के 2/5 सदस्य गैर-सरकारी हो सकते थे|

• इस अधिनियम ने परिषदों के अतिरिक्त सदस्यों को जनहित के मुद्दों पर प्रश्न पूछने का अधिकार प्रदान किया|

• प्रांतीय परिषदों में भी अतिरिक्त सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गयी,जैसे-बंगाल में इनकी संख्या 20 और अवध में 15 कर दी गयी|

निष्कर्ष

1892 ई. में पारित किये गए अधिनियम ने भारत में संसदीय प्रणाली की आधारशिला रखी और भारत के संवैधानिक विकास में मील का पत्थर साबित हुआ| इस अधिनियम द्वारा भारत में पहली बार चुनाव प्रणाली की शुरुआत की गयी| इन सबके बावजूद यह अधिनियम राष्ट्रीय मांगों की पूर्ति करने में सफल नहीं हो पाया और न ही कोई महत्वपूर्ण योगदान दे सका|

सन 1861 का भारत शासन अधिनियम, प्रशासन

1861 का अधिनियम

भारतीय परिषद् अधिनियम-1861 का निर्माण देश के प्रशासन में भारतीयों को शामिल करने के उद्देश्य से बनाया गया था|इस अधिनियम ने सरकार की शक्तियों और कार्यकारी व विधायी उद्देश्य हेतु गवर्नर जनरल की परिषद् की संरचना में बदलाव किया| यह प्रथम अवसर था जब गवर्नर जनरल की परिषद् के सदस्यों को अलग-अलग विभाग सौंपकर विभागीय प्रणाली की शुरुआत की| इस अधिनियम के अनुसार बम्बई व मद्रास की परिषदों को अपने लिए कानून व उसमें संशोधन करने की शक्ति पुनः प्रदान की  गयी जब कि अन्य प्रान्तों में अर्थात बंगाल में 1862 में,उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रान्त में 1886 में और बर्मा व पंजाब में 1897 में इन परिषदों की स्थापना की गयी|

अधिनियम के मुख्य बिंदु

• तीन अलग-अलग प्रेसीडेंसियों(बम्बई,मद्रास और बंगाल) को एक सामान्य प्रणाली के तहत लाया गया|

• इस अधिनियम द्वारा विधान परिषदों की स्थापना की गयी|

• इस अधिनियम द्वारा वायसराय की परिषद् में विधिवेत्ता के रूप में एक पांचवें सदस्य को शामिल किया गया|

•  वायसराय की परिषदों का विस्तार किया गया और कानून निर्माण के उद्देश्य से अतिरिक्त सदस्यों की संख्या न्यूनतम 6 और अधिकतम 12 तक कर दी गयी| ये सदस्य गवर्नर जनरल द्वारा नामित किये जाते थे और इनका कार्यकाल दो साल था|अतः कुल सदस्य संख्या बढ़कर 17 हो गयी|

• इन नामांकित सदस्यों के कम से कम आधे सदस्य गैर-सरकारी होना जरुरी था|

•  इस अधिनियम के अनुसार बम्बई व मद्रास की परिषदों को अपने लिए कानून व उसमें संशोधन करने की शक्ति पुनः प्रदान की  गयी जब कि अन्य प्रान्तों में अर्थात बंगाल में 1862 में,उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रान्त में 1886 में और बर्मा व पंजाब में 1897 में इन परिषदों की स्थापना की गयी|

• कैनिंग ने 1859 ई. में विभागीय प्रणाली की शुरुआत की जिसके तहत गवर्नर जनरल की परिषद् के सदस्यों को अलग-अलग विभाग सौंपे गए | कोई भी सदस्य अपने विभाग से सम्बंधित मामलों में अंतिम और निर्णायक आदेश जारी कर सकता था|

• लॉर्ड कैनिंग ने 1862 ई. में तीन भारतीय सदस्यों को अपनी परिषद् में शामिल किया जिनमें बनारस के राजा,पटियाला के राजा और सर दिनकर राव शामिल थे|

निष्कर्ष

भारतीय परिषद् अधिनियम-1861 भारतीयों को प्रशासन में भागीदारी प्रदान कर और भारत में कानून निर्माण की त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया को सुधार कर भारतीय आकांक्षाओं की पूर्ति की |अतः इस अधिनियम द्वारा भारत में प्रशासनिक प्रणाली की स्थापना की गयी जोकि भारत में ब्रिटिश शासन के अंत तक जारी रही|

सन 1858 का ब्रिटिश शासन अधिनियम

1858 ई. का भारत सरकार अधिनियम

अगस्त 1858 ई. में ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम पारित कर भारत में कंपनी के शासन को समाप्त कर दिया| इस अधिनियम द्वारा भारत के शासन का नियंत्रण ब्रिटिश सम्राट को सौंप दिया गया| इस समय विक्टोरिया ब्रिटेन की महारानी थीं| ब्रिटेन का सर्वोच्च निकाय ब्रिटिश संसद थी जिसके प्रति ब्रिटेन की सरकार उत्तरदायी थी| ब्रिटेन की सरकार द्वारा किये जाने वाले सभी कार्य सम्राट के नाम पर किये जाते थे| ब्रिटेन की सरकार के एक मंत्री ,जिसे भारत सचिव कहा जाता था ,को भारतीय सरकार का उत्तरदायित्व सौंपा गया | चूँकि ब्रिटेन की सरकार  संसद के प्रति उत्तरदायी थी अतः भारत के लिए भी सर्वोच्च निकाय ब्रिटेन की संसद ही थी| इस अधिनियम द्वारा  भारत के गवर्नर जनरल को वायसराय , जिसका अर्थ था-सम्राट का प्रतिनिधि ,कहा जाने लगा|   महारानी विक्टोरिया द्वारा एक घोषणा की गयी जिसे लार्ड कैनिंग द्वारा 1 नवम्बर,1858 ई.  इलाहाबाद के दरबार में पढ़ा गया|

• उद्घोषणा में सभी भारतीय राजाओं के अधिकारों के सम्मान वादा किया गया और भारत में ब्रिटिश क्षेत्रों के विस्तार पर रोक लगा दी गयी|

• इसमें लोगों के प्राचीन अधिकारों व परम्पराओं आदि के सम्मान और न्याय,सद्भाव व धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण करने का वादा किया गया |

• इसमें घोषित किया गया कि प्रत्येक व्यक्ति ,जाति और धर्म के भेदभाव के बिना,केवल अपनी योग्यता और शिक्षा के आधार पर प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश पाने का हक़दार होगा|

• घोषणा में एक तरफ राजाओं को सुरक्षा का आश्वासन दिया गया तो दूसरी तरफ मध्य वर्ग से भी विकास हेतु अवसरों को उपलब्ध कराने का वादा किया|

लेकिन धीरे धीरे यह साबित हो गया कि जिस अवसर की समानता की बात उद्घोषणा में की गयी उसे लागू नहीं किया गया| भारत की प्राचीन परम्पराओं के प्रति सम्मान के नाम पर ब्रिटिशों ने सामाजिक बुराइयों को संरक्षण देने की नीति अपना ली | अतः विदेशी शासकों द्वारा सामाजिक सुधारों की ओर बहुत ही कम ध्यान दिया गया और जब भी भारतीय नेताओं ने इन सुधारों की मांग की तो उनका विरोध किया गया |

1858 ई. के बाद भारतीयों के हितों को पुनः ब्रिटेन के हितों के अधीनस्थ बना दिया गया |ब्रिटेन व अन्य साम्राज्यवादी ताकतों के संघर्ष में भारत का उपयोग ब्रिटेन के आर्थिक हितों की पूर्ति के माध्यम के रूप में किया गया|भारत के संसाधनों का प्रयोग विश्व के अन्य भागों में ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की पूर्ति और अन्य देशों के विरुद्ध चलाये गए महंगे युद्धों की पूर्ति हेतु किया गया|

निष्कर्ष

महारानी विक्टोरिया द्वारा की गयी उद्घोषणा 1857 ई. के विद्रोह का परिणाम थी और इस उद्घोषणा में यह विश्वास दिलाया गया कि भारतीय लोगों के साथ जाति,धर्म,रंग और प्रजाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा |इसमें भारतीय राजाओं को भी यह विश्वास दिलाया गया की उनकी प्रतिष्ठा,अधिकार और गरिमा का सम्मान किया जायेगा और उनके अधीनस्थ क्षेत्रों पर किसी तरह का अतिक्रमण नहीं किया जायेगा|

सन 1857 का विद्रोह

1857 का विद्रोह (कारण और असफलताए)

सन1857 का विद्रोह उत्तरी और मध्य भारत में ब्रिटिश अधिग्रहण के विरुद्ध उभरे सैन्य असंतोष व जन-विद्रोह का परिणाम था| सैन्य असंतोष की घटनाएँ जैसे- छावनी क्षेत्र में आगजनी आदि जनवरी से ही प्रारंभ हो गयी थीं लेकिन बाद में मई में इन छिटपुट घटनाओं ने सम्बंधित क्षेत्र में एक व्यापक आन्दोलन या विद्रोह का रूप ले लिया| इस विद्रोह ने भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के शासन को समाप्त कर दिया और अगले 90 वर्षों के लिए भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश भाग को ब्रिटिश सरकार (ब्रिटिश राज) के प्रत्यक्ष शासन के अधीन लाने का रास्ता तैयार कर दिया|

विद्रोह के कारण

चर्बीयुक्त कारतूसों के प्रयोग और सैनिकों से सम्बंधित मुद्दों को इस विद्रोह का मुख्य कारण माना गया लेकिन वर्त्तमान शोध द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि कारतूसों का प्रयोग न तो विद्रोह का एकमात्र कारण था और न ही मुख्य कारण | वास्तव में यह विद्रोह सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक आदि अनेक कारणों का सम्मिलित परिणाम था|

• सामजिक और धार्मिक कारण: ब्रिटिशों ने भारतीयों के सामजिक-धार्मिक जीवन में दखल न देने की नीति से हटकर सती-प्रथा उन्मूलन (1829) और हिन्दू-विधवा पुनर्विवाह(1856) जैसे अधिनियम पारित किये | ईसाई मिशनरियों को भारत में प्रवेश करने और धर्म प्रचार करने की अनुमति प्रदान कर दी गयी|1950 ई. के धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम के द्वारा हिन्दुओं के परंपरागत कानूनों में संशोधन किया गया |इस अधिनियम के अनुसार धर्म परिवर्तन करने के कारण किसी भी पुत्र को उसके पिता की संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकेगा|

• आर्थिक कारण: ब्रिटिश शासन ने ग्रामीण आत्मनिर्भरता को समाप्त कर दिया | कृषि के वाणिज्यीकरण ने कृषक-वर्ग पर बोझ को बढ़ा दिया| इसके अलावा मुक्त व्यापार नीति को अपनाने,उद्योगों की स्थापना को हतोत्साहित करने और धन के बहिर्गमन आदि कारकों ने अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से नष्ट कर दिया|

• सैन्य कारण: भारत में ब्रिटिश उपनिवेश के विस्तार ने सिपाहियों की नौकरी की परिस्थितियों को बुरी तरह से प्रभावित किया |उन्हें बगैर किसी अतिरिक्त भत्ते के भुगतान के अपने घरों से दूर नियुक्तियां प्रदान की जाती थीं|सैन्य असंतोष का महत्वपूर्ण कारण जनरल सर्विस एन्लिस्टमेंट एक्ट ,1856 था,जिसके द्वारा सिपाहियों को आवश्यकता पड़ने पर समुद्र पार करने को अनिवार्य बना दिया गया | 1954 के डाक कार्यालय अधिनियम द्वारा सिपाहियों को मिलने वाली मुफ्त डाक सुविधा भी वापस ले ली गयी|

• राजनीतिक कारण: भारत में ब्रिटिश क्षेत्र का अंतिम रूप से विस्तार डलहौजी के शासन काल में हुआ था| डलहौजी ने 1849 ई. में घोषणा की कि बहादुरशाह द्वितीय के उत्तराधिकारियों को लाल किला छोड़ना होगा| बाघट और उदयपुर के सम्मिलन को किसी भी तरह से रद्द कर दिया गया और वे अपने शासक-घरानों के अधीन बने रहे| जब डलहौजी ने करौली (राजस्थान) पर व्यपगत के सिद्धांत को लागू करने की कोशिश की तो उसके निर्णय को कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स द्वारा निरस्त कर दिया गया|

1857 के विद्रोह से जुड़े विभिन्न नेता

बैरकपुर

मंगल पांडे

दिल्ली

बहादुरशाह द्वितीय ,जनरल बख्त खां

दिल्ली

हाकिम अहसानुल्लाह(बहादुरशाह द्वितीय का मुख्या सलाहकार)

लखनऊ

 

बेगम हजरत महल,बिजरिस कादिर,अहमदुल्लाह(अवध के पूर्व नवाब के

सलाहकार)

कानपुर

 

नाना साहिब ,राव साहिब(नाना साहिब के भतीजे),तांत्या

टोपे,अज़ीमुल्लाह खान (नाना साहिब के सलाहकार)

झाँसी

रानी लक्ष्मीबाई

बिहार(जगदीशपुर)

कुंवर सिंह ,अमर सिंह

इलाहाबाद और

बनारस

 

मौलवी लियाकत अली

फैजाबाद

 

मौलवी अहमदुल्लाह (इन्होनें विद्रोह को अंग्रजों के विरुद्ध जिहाद के   

रूप में घोषित किया) 

फर्रूखाबाद

तुफजल हसन खान

बिजनौर

मोहम्मद खान

मुरादाबाद

अब्दुल अली खान

बरेली

खान बहादुर खान

मंदसौर

फिरोजशाह

ग्वालियर/कानपुर

तांत्या टोपे

असम

कंदपरेश्वर सिंह ,मनीराम दत्ता

उड़ीसा

सुरेन्द्र शाही ,उज्जवल शाही

कुल्लू

राजा प्रताप सिंह

राजस्थान

जयदयाल सिंह ,हरदयाल सिंह

गोरखपुर

गजधर सिंह

मथुरा

सेवी सिंह ,कदम सिंह      

विद्रोह से सम्बंधित ब्रिटिश अधिकारी

जनरल जॉन निकोल्सन

 

20 सितम्बर,1857 को दिल्ली पर अधिकार किया( जल्द ही

लड़ाई में मिले घाव के कारण निकोल्सन की मृत्यु हो गयी|)

मेजर हडसन

दिल्ली में बहादुरशाह के पुत्रों व पोतों की हत्या कर दी|

सर ह्यूग व्हीलर

 

 

 

26 जून 1857 तक नाना साहिब की सेना का सामना किया

|27 तारीख को ब्रिटिश सेना ने इलाहाबाद से सुरक्षित

निकलने का आश्वासन प्राप्त करने के बाद आत्मसमर्पण कर

दिया|

जनरल नील

 

 

 

 

जून 1857 में बनारस और इलाहाबाद को पुनः अपने कब्जे

में लिया |नाना साहिब की सेना द्वारा अंग्रेजों की हत्या के

प्रतिशोधस्वरुप उसने कानपुर में भारतीयों की हत्या

की|विद्रोहियों से संघर्ष के दौरान लखनऊ में उसकी मृत्यु हो

गयी|

सर कॉलिन काम्पबेल

 

 

 

इन्होनें 6 दिसंबर 1857 को अंतिम रूप से कानपुर पर

कब्ज़ा किया | 21 मार्च 1858 को अंतिम रूप से लखनऊ

पर कब्ज़ा कर लिया |5 मई 1858 को बरेली को पुनः प्राप्त

किया|

हेनरी लॉरेंस

 

 

अवध के मुख्य प्रशासक, जिनकी हत्या विद्रोहियों द्वारा 2

जुलाई 1857 को लखनऊ रेजीडेंसी पर कब्जे के दौरान कर

दी गयी थी |

मेजर जनरल हैवलॉक

 

17 जुलाई 1857 को नाना साहिब की सेना को हराया

|दिसंबर 1857 को लखनऊ में इनकी मृत्यु हो गयी|

विलियम टेलर और आयर

अगस्त 1857 में आरा में विद्रोह का दमन किया|

ह्यूग रोज

 

 

झाँसी में विद्रोह का दमन किया और 20 जून 1858 को 

ग्वालियर पर पुनः कब्ज़ा किया |उन्होंने संपूर्ण मध्य भारत

और बुंदेलखंड को पुनः ब्रिटिश शासन के अधीन ला दिया|

कर्नल ओंसेल

बनारस पर कब्ज़ा किया|

निष्कर्ष:

1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी |हालाँकि इसका आरम्भ सैनिको के विद्रोह द्वारा हुआ था लेकिन यह कम्पनी के प्रशासन से असंतुष्ट और विदेशी शासन को नापसंद करने वालों की शिकायतों व समस्याओं की सम्मिलित अभिव्यक्ति थी|

सन 1833 का चार्टर अधिनियम

1833 ई. का चार्टर अधिनियम

1833 ई. का चार्टर अधिनियम इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्रांति का परिणाम था ताकि इंग्लैंड में मुक्त व्यापार नीति के आधार पर बड़ी मात्रा में उत्पादित माल हेतु बाज़ार के रूप में भारत का उपयोग किया जा सके| अतः चार्टर अधिनियम उदारवादी संकल्पना के आधार पर तैयार किया गया था| ब्रिटिश संसद के इस अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को अगले बीस वर्षों तक भारत पर शासन करने का अधिकार प्रदान कर दिया गया|

चार्टर अधिनियम की विशेषतायें

• इस अधिनियम द्वारा कंपनी के अधीन क्षेत्रों व भारत के उपनिवेशीकरण को वैधता प्रदान कर दी गयी|

• इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक कंपनी का दर्जा समाप्त कर दिया गया  और वह अब केवल प्रशासनिक निकाय मात्र रह गयी थी|

• बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा| लॉर्ड विलियम बेंटिक को “ब्रिटिश भारत का प्रथम गवर्नर जनरल” बनाया गया|

• सपरिषद गवर्नर जनरल को कंपनी के नागरिक व सैन्य संबंधों के नियंत्रण, अधीक्षण और निर्देशित करने की शक्ति प्रदान की गयी| केंद्रीय सरकार का राजस्व वृद्धि और व्यय पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया गया| अतः सभी वित्तीय व प्रशासनिक शक्तियों का केन्द्रीकरण गवर्नर जनरल के हाथों में कर दिया गया|

• गवर्नर जनरल की परिषद् के सदस्यों की संख्या,जिसे पिट्स इंडिया एक्ट द्वारा घटाकर तीन कर दिया गया था, को पुनः बढ़ाकर चार कर दिया|

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...