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दिल्ली-औराई शाताब्दी एक्सप्रेस शुरू
उधर, जयपुर-दिल्ली सराय रोहिल्ला-जयपुर के बीच भी प्रतिदिन स्पेशल ट्रेन का संचालन भी किया जाएगा जो कि वाया दौसा, अलवर, रेवाड़ी व गुड़गांव होकर संचालित होगी. यह ट्रेन पूर्णतया आरक्षित रहेगी. यात्रियों को सफर के दौरान कोरोना रोकथाम के लिए लागू की गईं गाइडलाइन का अनुपालन करना अनिवार्य होगा.
उत्तर पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसम्पर्क अधिकारी गौरव गौड के अनुसार गाडी संख्या 04051, नई दिल्ली-दौराई शताब्दी एक्सप्रेस प्रतिदिन स्पेशल रेलसेवा 10 अप्रैल से आगामी आदेशों तक नई दिल्ली से 06.10 बजे रवाना होकर जयपुर 10.45 बजे आगमन व 10.50 बजे प्रस्थान कर 13.15 बजे दौराई पहुंचेगी.
इसी प्रकार गाडी संख्या 04052, दौराई-नई दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस प्रतिदिन स्पेशल रेलसेवा 10 अप्रैल से आगामी आदेशों तक दौराई से 15.15 बजे रवाना होकर जयपुर 17.45 बजे आगमन व 17.50 बजे प्रस्थान 22.40 बजे नई दिल्ली पहुंचेगी. यह रेलसेवा मार्ग में दिल्ली कैंट, गुडगांव, रेवाड़ी, अलवर, बांदीकुई, गांधीनगर जयपुर, जयपुर, किशनगढ व अजमेर स्टेशनों पर ठहराव करेगी.एक अप्रैल से शुरू होगी जयपुर-दिल्ली सराय रोहिल्ला दैनिक त्यौहार स्पेशल इसके अलावा यात्रियों की सुविधा के मद्देनजर जयपुर-दिल्ली सराय रोहिल्ला-जयपुर प्रतिदिन त्यौहार स्पेशल रेलसेवा का संचालन भी किया जा रहा है.
सिवान-थावे रेल सेवा शुरू
गोरखपुर, जेएनएन। होली में पूर्वांचल के लोगों के लिए राहत भरी खबर है। 27 मार्च से पैसेंजर ट्रेनों (सवारी गाडिय़ां) के बाद पूर्वोत्तर रेलवे प्रशासन ने डीजल से चलने वाली (डेमू) तथा इलेक्ट्रिक से चलने वाली (मेमू) ट्रेनों को भी हरी झंडी दे दी है। गोरखपुर से बढऩी और सिवान तथा सिवान-छपरा रूट पर डेमू ट्रेनें चलेगी। भटनी- वाराणसी रूट पर मेमू चलाई जाएगी। इसके अलावा भटनी से बरहज बाजार के बीच दो जोड़ी पैसेंजर ट्रेनों का संचालन भी शुरू हो जाएगा।
सवारी गाडिय़ों की तरह डेमू व मेमू में भी लगेगा एक्सप्रेस का किराया
स्थानीय यात्रियों को राहत तो मिलेगी, लेकिन उन्हें सवारी गाडिय़ों की तरह डेमू और मेमू ट्रेनों में भी एक्सप्रेस का ही किराया देना पड़ेगा।
05033 गोरखपुर-बढऩी अनारक्षित डेमू एक्सप्रेस 30 मार्च से प्रतिदिन सुबह 09.00 बजे रवाना होगी। नकहा जंगल, पीपीगंज, कैंपियरगंज, आनंदनगर और सिद्धार्थनगर के रास्ते दोपहर 12.55 बजे बढऩी पहुंचेगी।
05034 बढऩी-गोरखपुर दैनिक अनारक्षित डेमू एक्सप्रेस 30 मार्च से प्रतिदिन अपराह्न 03.20 बजे रवाना होगी। यह ट्रेन शोहरतगढ़, सिद्धार्थनगर, आनंदनगर, कैंपियरगंज और पीपीगंज के रास्ते शाम 06.40 बजे गोरखपुर पहुंचेगी।
05153 सिवान- गोरखपुर दैनिक अनारक्षित डेमू एक्सप्रेस 27 मार्च सुबह 07.55 बजे रवाना होगी। हथुआ, थावे, तमकुही रोड, दुदही, पडरौना, कप्तानगंज, पिपराइच, उनौला होते हुए दोपहर 01.25 बजे गोरखपुर पहुंचेगी।
05154 गोरखपुर- सिवान दैनिक अनारक्षित डेमू एक्सप्रेस 30 मार्च से प्रतिदिन शाम 07.15 बजे रवाना होगी। यह ट्रेन, कैंट, उनौला, पिपराइच, कप्तानगंज, पडरौना, तमकुही रोड और थावे के रास्ते रात 12.10 बजे सिवान पहुंचेगी।
05147 भटनी-वाराणसी सिटी अनारक्षित मेमू एक्सप्रेस 28 मार्च से प्रतिदिन (शुक्रवार को छोड़कर) सुबह 06.00 बजे रवाना होगी। यह ट्रेन सलेमपुर से 06.16 बजे से, लार रोड से 06.27 बजे से छूटकर बेल्थरा, इंदारा, मऊ, औडि़हार, सारनाथ होते हुए 10.05 बजे वाराणसी सिटी पहुंचेगी।
05148 वाराणसी सिटी-भटनी अनारक्षित मेमू एक्सप्रेस 27 मार्च से प्रतिदिन (गुरुवार को छोड़कर) अपराह्न 03.25 बजे रवाना होगी। यह ट्रेन सारनाथ, औडि़हार, मऊ, इंदारा, बेल्थरा रोड, लार रोड के रास्ते शाम 07.30 बजे भटनी पहुंचेगी।
शान्ति के लिए
वटवृक्ष
घर में वातावरण को शांतिमय बनाने के लिए एक कप दूध में मीठा मिलाकर वटवृक्ष की जड़ में प्रतिदिन अर्पित करें और उस स्थान की जरा-सी गीली मिट्टी लेकर माथे या नाभि पर लगा लें। यह क्रिया सोमवार से शुरू करें और 43 दिन तक प्रतिदिन करते रहें, लाभ होगा।
नाभि का हटना
नाभिचक्र के अस्थायी रोग (नाभि का टलना)
परिचय-
इस रोग के कारण रोगी के पेट में बहुत तेज दर्द होता है। व्यक्ति को भूख कम लगती है तथा उसका जी घबराने लगता है। नाभिचक्र जब अपने स्थान से ऊपर की ओर हट जाता है तो व्यक्ति में कब्जियत जैसी अवस्था पैदा हो जाती है तथा नाभिचक्र जब अपने स्थान से नीचे की ओर हट जाता है तो वायु के दबाब के कारण दस्त जैसी अवस्था पैदा हो जाती है। यह रोग कभी भी दवाईयों द्वारा ठीक नहीं किया जा सकता है।लक्षण-
नाभिचक्र अपने स्थान पर है या नहीं यह पहचान करने के लिए व्यक्ति को सुबह के समय में शौचक्रिया के बाद पीठ के बल सीधा लेट जाना चाहिए और हाथों को बगल में शरीर के साथ सीधा रखना चाहिए। फिर दूसरे व्यक्ति को एक धागा लेकर रोगी की नाभि से लेकर छाती के एक तरफ के निप्पल तक नापना चाहिए। ठीक इसी तरह की क्रिया दूसरे निप्पल के साथ भी करें और पता करें कि दोनों तरफ के निप्पलों के साथ धागे की समान दूरी है या नहीं। यदि यह दूरी समान नहीं है तो समझ लेना चाहिए कि नाभिचक्र अपने स्थान से हट गया है और यदि दूरी समान है तो नाभिचक्र अपने स्थान पर है।
कारण-
चलने-फिरने में असावधानी, अत्यधिक कूदने-फांदने, अधिक वजन उठाने वाले कार्य करने या किसी प्रकार से ऊंची-नीची जमीन पर अचानक पैर पड़ जाने से झटका आदि लग जाने के कारण यह रोग हो जाता है।
नाभिचक्र के रोग का एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा उपचार-
- इस रोग का इलाज करने में एक्यूप्रेशर चिकित्सा का एक प्रमुख स्थान है। यदि किसी व्यक्ति का नाभिचक्र अपने स्थान से हट जाता है तो वह व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं रहता है। नाभिचक्र ही शरीर में पाए जाने वाले डायाफ्राम के नीचे अव्यवस्थित समस्त अंगों को नियंत्रित करता है।
- किसी व्यक्ति का नाभिचक्र अपने स्थान से हट जाने पर उस व्यक्ति को पीठ के बल सीधा लिटा दें तथा इसके बाद अपने दाहिने हाथ की पांचों अंगुलियों को मिलाकर नाभिचक्र पर एक्यूप्रेशर चिकित्सा के अनुसार धीरे-धीरे दबाव डालें। यदि रोगी की धड़कन शुरु हो जाए तो उस समय यह क्रिया बंद कर देनी चाहिए। इसके अलावा किसी खाली गिलास को रोगी के नाभिचक्र पर उल्टा रखकर हल्का दबाब डालने से भी नाभिचक्र अपने स्थान पर वापस आ जाता है तथा रोगी को बहुत आराम मिलता है।
- नाभिचक्र को ठीक करने का एक उपाय यह भी है कि पीठ के बल लेटने पर पैर का जो अंगूठा नीचे है उसे हाथ के साथ ऊपर की ओर खींचकर दूसरे के बराबर करें। यह क्रिया 2-3 बार करने पर नाभिचक्र अपने स्थान पर आ जाता है।
संपर्क करें- सुन्दरामार्ट
नपुंसकता
नपुंसकता
परिचय-
जब कोई व्यक्ति यौन संम्बन्ध नहीं बना पाता है या संभोगक्रिया के समय जल्द ही शिथिल हो जाता है तो कहा जाता है कि वह व्यक्ति नपुंसकता के रोग से पीड़ित है। इस रोग का सम्बंध ज्ञानेन्द्रियों से होता है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति अपनी इस समस्या को किसी को भी बताने में संकोच करता है जिसके कारण उसका यह रोग बढ़ता ही चला जाता है। यह रोग अधिक उम्र वाले व्यक्तियों में अधिक पाया जाता है। संभोगक्रिया के समय इस रोग से पीड़ित व्यक्ति का लिंग उत्तेजित तो हो जाता है लेकिन फिर भी उसके लिंग से वीर्य नहीं निकलता है।
कारण-
नपुंसकता रोग होने के 3 कारण होते हैं-
1. शारीरिक- नपुंसकता रोग शरीर की कमजोरी के कारण होता है। ज्यादा मेहनत करने वाले व्यक्ति को जब पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता तो वह शारीरिक रूप से कमजोर हो जाता। जिसके कारण उसे नपुंसकता रोग हो जाता है।
2. मानसिक- नपुंसकता रोग ज्यादा चिंता और तनाव में रहने से भी हो सकता है। लिंग के उत्तेजित न होने का सबसे प्रमुख कारण तो मानसिक ही होता है। कोई व्यक्ति जब ज्यादा थक जाता है या तनावग्रस्त होता है या किसी कारण से चिंतित हो या किसी समस्या के कारण व्यक्ति का आत्मविश्वास बुरी तरह से टूट चुका हो तो उस व्यक्ति को नपुंसकता रोग हो सकता है। हस्तमैथुन या ज्यादा काम-वासना में लगे रहने वाले नवयुवक नपुंसकता के शिकार हो सकते हैं। ऐसे नवयुवकों में संभोग की इच्छा कम हो जाती है। कभी-कभी तो बैर-भाव, गुस्सा या पश्चाताप भी लिंग के उत्तेजित न होने का एक कारण हो सकता है या वह डरता है कि कहीं उसकी पत्नी गर्भवती न हो जाए या किसी तरह से पत्नी को चोट न पहुंच जाए जिसके कारण उस व्यक्ति को मानसिक तनाव होता है।
3. अपराध-बोध- कभी-कभी बेहद मुश्किल माहौल में परवरिश या अपने बचपन में यौन दुराचार का शिकार होने के कारण भी सेक्स के बारे में मन में नकारात्मक भावनाएं पैदा हो जाती हैं जिसके कारण नपुंसकता रोग हो जाता है।
लक्षण-
पुरुष का लिंग संभोग करने के योग्य न रहना नपुंसकता का मुख्य लक्षण है। पुरुषों के लिंग में थोड़े समय के लिए कामोत्तेजना होना या थोड़े समय के लिए ही लिंगोत्थान होना इसका दूसरा लक्षण है। पुरुषों में संभोग अथवा ज्यादा संभोग के कारण उत्पन्न ध्वजभंग नपुंसकता में लिंग पतला, टेढ़ा और छोटा भी हो जाता है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति का लिंग कभी-कभी थोड़े समय के लिए ही उत्तेजित रहता है तथा जब रोगी स्त्री के साथ संभोग क्रिया करता है तो कुछ समय के बाद ही उसके लिंग की उत्तेजना खत्म हो जाती है और वह संभोग क्रिया करने में असमर्थ हो जाता है। इसके कारण रोगी की पत्नी अपने पति से बहुत नाराज हो जाती है तथा उनके आपसी सम्बंधों में मन-मुटाव हो जाता है।
एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा नपुंसकता रोग का उपचार-
नपुंसकता रोग का इलाज करने के लिए रोगी की पत्नी की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि रोगी की पत्नी अपने पति के साथ अच्छा बर्ताव करे तथा वह अपनी पति का इलाज कराने में मदद करें तो रोगी जल्दी ठीक हो सकता है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को भी अपनी पत्नी को विश्वास दिलाना चाहिए कि उसे प्यार करना और प्यार पाना बहुत ही अच्छा लगता है।

(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)
इस च को अपनज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से नपुसंकता से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है
मोतियाबिंद
मोतियाबिन्द
परिचय-
आंख को स्वच्छमण्डल के द्वारा देखने की शक्ति मिलती है तथा आंख में परितारिका की बनावट गोल और काली होती है। ये पटलों के प्रभावों का समायोजन करती है तथा प्रकाश, मनोवेग आदि अनेकों प्रभावों के उद्दीपन के अनुसार ढीली हो सकती है या फैल सकती है। आंखों में एक पतली सी झिल्ली भी पाई जाती है जिसे नेत्र-श्लेष्मला कहते हैं। यह नेत्र-श्लेष्मला ही आंखों के स्वच्छमण्डल और पलकों को अन्दर की ओर ढककर रखती है। इसके अलावा आंख के पिछले भाग पर एक दृष्टिपटल (रेटिना) होता है जिसके अन्दर नेत्रबिम्ब पाया जाता है।आंखों में निम्नलिखित भाग पाए जाते हैं-
- लेन्स
- कपाट
- प्रभावग्राही चित्र
मोतियाबिन्द-
मोतियाबिन्द से पीड़ित रोगी को अपनी आंखों के आगे धुंआ दिखाई देने लगता है। मोतियाबिन्द रोग से पीड़ित व्यक्ति की आंखों से देखने की क्षमता में दोषपूर्ण अवस्था पैदा हो जाती है तथा उसे धुंधलापन दिखाई देने लगता है। इस प्रकार की अवस्था हो जाने को ही मोतियाबिन्द कहते हैं। इस रोग के कारण आंखों के लैंस धूमिल या पारभासी हो जाते हैं जिसके कारण आंखों को देखने की शक्ति नहीं मिल पाती है। इस लैंस के पारभासिता के कारण ही मनुष्य अन्धा हो जाता है।
मोतियाबिन्द रोग से पीड़ित रोगी को कुछ भी दिखाई नहीं देता है। रोगी की आंखों के नेत्रपटल में भूरापन या सफेदी आ जाती है। यदि मोतियाबिन्द रोग की शुरुआत में ही चिकित्सा की जाए या फिर रोग होने के कारणों से बचाव किया जाये तो इस रोग को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है।
मोतियाबिन्द होने का कारण-
बुढ़ापे के समय में मोतियाबिन्द होना आम बात है। वैसे यह रोग आंखों की आयु बढ़ने से होता है। इंसान जैसे-जैसे बूढ़ा होता जाता है वैसे-वैसे उसकी आंखों के लेंस की आयु भी बढ़ती जाती है जिसके कारण उसकी आंख का लेंस पारदर्शी होता चला जाता है। लेकिन इस लेंस का पारदर्शी होना अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग होता है। मोतियाबिन्द रोग होने के और भी कई कारण होते हैं जैसे- आंखों में किसी प्रकार का संक्रमण रोग होना, आंखों पर किसी तरह की चोट लगना, मधुमेह रोग होना, औषधियों का अधिक इस्तेमाल करना, चमड़ी पर किसी प्रकार की बीमारियां होना, आंखों में तेज खुजली होना तथा बिजली के तेज झटके लगना आदि। यह रोग जन्मजात भी हो सकता है जो मां-बाप से उसके बच्चों को हो सकता है। कुछ विशेष प्रकार की दवाईयों के प्रयोग से भी मोतियाबिन्द हो सकता है।
एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा मोतियाबिन्द रोग का उपचार-
मोतियाबिन्द का एक मात्र इलाज शल्य चिकित्सा है लेकिन बहुत सारे लोगों की सर्जरी इस रोग में इसलिए नहीं की जाती है क्योंकि कुछ रोगियों का मोतियाबिन्द छोटा होता है करीबन एक धूल जितना। यदि मोतियबिन्द बड़ा हो तो उसकी सर्जरी की जा सकती है। वैसे एक्यूप्रेशर चिकित्सक भी मोतियाबिन्द का इलाज कर सकता है।
मसूड़ो के रोग
मसूढ़ों के रोग
परिचय-
मसूढ़ों में किसी तरह का संक्रमण हो जाने से रोगी में दांतों का ढीलापन, मसूढ़ों से पीब निकलना और जिंजीवाइटिस जैसे लक्षण प्रकट हो जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति इस रोग से पीड़ित हो और वह अपने मसूढ़ों पर दबाव डालता है या ब्रुश करता है तो उसके मसूढ़ों से खून निकलने लगता है तथा उनमें तेज दर्द होने लगता है।कारण-
मसूढ़ों के रोग अधिकतर प्लाक जमने और मुंह की अच्छी तरह से सफाई न करने की वजह से होते हैं। जब दांतों पर पीली परत जम जाती है तो उसे प्लाक कहते हैं। यह प्लाक लार, बैक्टीरिया और भोजन के मिश्रण से बनता है और दांतों को ढक देता है। शुरू-शरू में यह प्लाक नर्म होता है तथा इसे उसी समय आसानी से छुड़ाया जा सकता है लेकिन दांतों के कुछ भाग ऐसे होते हैं जो सफाई के दौरान साफ नहीं हो पाते हैं जैसे- दांतों का निचला हिस्सा, दांतों के बीच का भाग और पिछले दांत आदि। यदि प्लाक समय रहते साफ नहीं होता है तो यह सख्त होकर टार्टर में बदल जाता है और दांत के निचले भाग को घेर लेता है। यह प्लाक बहुत से बैक्टीरिया के प्रजनन और प्रसार के लिए एक अच्छा स्थान साबित होता है। इन बैक्टीरिया के कारण ही जिंजीवाइटिस जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं। जब प्लाक की पलक मोटी हो जाती है तो यह दांतों को मजबूती देने वाले ऊतकों पर हमला बोलने लगते हैं। इसके कारण दांतों की हड्डी भी टूट जाती है तथा दांतों में बहुत तेज दर्द होता है। कुछ समय के बाद मसूढ़े सिकुड़ते जाते हैं और दांत ढीले हो जाते हैं।
लक्षण-
मसूढ़ों के रोग हो जाने पर रोगी व्यक्ति के दांत में दर्द होने लगता है, दांतों के पास के मसूढ़ों से खून निकलने लगता है, मसूढ़े सूज जाते हैं और दांत हिलने लगते हैं। ब्रश से दांतों की सफाई करने पर दांतों में दर्द तथा दांतों से खून निकलने लगता है, मसूढ़ों में सूजन आ जाती है, दांत मसूढ़ों से ढीलें हो जाते हैं तथा मुंह से बदबू आने लगती है
मसूढ़ों के रोगों को जल्दी ठीक करने के कुछ उपाय-
- रोगी को अपने दांतों की सफाई पर उचित ध्यान देना चाहिए।
- रोगी को अपने दांतों पर जमे प्लाक को हटाने के लिए बेहतर ब्रशिंग (सफाई) का उपाय करना चाहिए।
- दांतों को साफ करने के लिए नाइलॉन टूथब्रश का प्रयोग करना चाहिए। ब्रश का सिरा छोटा होना चाहिए ताकि उसे आसानी से मुंह में इधर-उधर घुमाया जा सके।
- रोगी को अपने दांतों का पिछला हिस्सा अच्छी तरह से साफ करना चाहिए।
- दांतों को साफ करने के बाद शीशे में देखे कि कहीं दांत पर जमे प्लाक बचे तो नहीं है। अगर प्लाक बचे हों तो उन्हे फिर से सही ढंग से साफ करना चाहिए
गैस्ट्रो
गैस्ट्रोएंट्रोंइटिस
परिचय-
जब बड़ी आंत और आमाशय में कोई संक्रमण होता है तो उसे गैस्ट्रोएंट्राइटिस कहते हैं। इस संक्रमण के कारण रोगी व्यक्ति का पेट खराब हो जाता है।कारण-
गैस्ट्रोएंट्राइटिस रोग वायरस के कारण होता है। ये वायरस आसानी से किसी भी व्यक्ति के शरीर में पहुंचकर छोटी-मोटी महामारी का रूप ले लेते हैं।
यह रोग बैक्टीरिया आदि सूक्ष्मजीवियों द्वारा संक्रमित किए हुए भोजन या पेय पदार्थों से भी हो सकता है। इससे फूड पॉयजनिंग हो जाती है। ऐसी स्थिति अक्सर भोजन पकाते समय साफ-सफाई का पूरी तरह से ध्यान न रखने के कारण पैदा हो जाती है।
एंटीबायोटिक दवाईयां, आहार में तेजी से बदलाव या किसी बड़े गंभीर रोग के होने पर भी गैस्ट्रोएंट्राइटिस का रोग हो सकता है।
लक्षण-
गैस्ट्रोएंट्राइटिस रोग में रोगी को जी मिचलाने तथा दस्त लगने की शिकायत हो जाती है। कभी-कभी स्थिति कुछ ज्यादा गंभीर भी हो जाती है जिसमें रोगी को पेट दर्द, पेट में ऐंठन की शिकायत, उल्टी, पतले दस्त और बुखार तथा कमजोरी जैसी शिकायत भी हो सकती है।
चिकित्सा-
इस रोग में रोगी को अपने शरीर को पूरा आराम देना चाहिए। उसे नमक-चीनी या ओ.आर.एस का घोल पिलाते रहना चाहिए। रोगी को फलों का रस पिलाना चाहिए और दूध का सेवन नहीं कराना चाहिए। इस रोग का संक्रमण बड़ी आसानी से एक से दूसरे व्यक्ति के शरीर में फैल सकता है। इस रोग में साफ-सफाई का खासतौर पर ध्यान रखना होगा,
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एक्यूप्रेशर चिकित्सा
स्वास्थ्य और सौन्दर्य का एक्यूप्रेशर चिकित्सा के साथ सम्बन्ध
परिचय-
एक्यूप्रेशर चिकित्सा वह चिकित्सा है जिसमें अपने ही शरीर में पाये जाने वाले बिन्दुओं पर दबाव देकर विभिन्न प्रकार के रोगों का उपचार किया जाता है अर्थात इस चिकित्सा में अपनी अंगुलियों और अंगूठों की सहायता से एक विशेष प्रकार की विधि के द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों से जुडे विशेष संवेदनशील स्थान या प्रतिबिम्ब केन्द्र (शरीर के ऊर्जा नियंत्रक) बिन्दुओं पर दबाव देकर अनेकों रोगों को ठीक किया जाता है। इस चिकित्सा के द्वारा बिना किसी दवाई के रोगों को ठीक किया जाता है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा में निपुणता हासिल करना कोई आम बात नहीं है।रोजाना 10 मिनट तक अपनी बाईं हथेली पर सरसों का तेल लगाकर दाएं पैर के तलुवे की मालिश और दाईं हथेली पर सरसों का तेल लगाकर बाएं पैर के तलुवे की मालिश करने से अनेक रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसा करने से शरीर की रोगों से लड़ने की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है तथा शरीर में ऐसी भी शक्तियां आ जाती हैं जो रोगों को ठीक कर देती है।
यदि कोई मनुष्य सुबह के समय में रोजाना व्यायाम करता है तो उसके शरीर में रोगों से लड़ने की शक्ति आ जाती है तथा उसकी रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। लेकिन व्यायाम करने के लिए भी कुछ नियम होते है जैसे- व्यायाम हमेशा सुबह के समय में करना चाहिए, खाना खाकर तुरन्त व्यायाम नहीं करना चाहिए तथा व्यायाम हमेशा खाली पेट करना चाहिए।
एक्यूप्रेशर चिकित्सा के लाभ निम्नलिखित है-
- इस चिकित्सा के द्वारा हाथ-पैरों की ऐंठन तथा दर्द दूर हो जाता है और स्वास्थ्य तथा सौन्दर्य में वृद्धि होती है।
- इस चिकित्सा की सहायता से पैरों और तलुवों पर मालिश करने से बहुत लाभ मिलता है।
- इस चिकित्सा के द्वारा शरीर के अंगों के कई रोग ठीक हो सकते हैं।
- एक्यूप्रेशर चिकित्सा का रोजाना शरीर पर प्रयोग करने से शरीर में बहुत समय के लिए यौवन शक्ति बनी रहती है।
- इस चिकित्सा के द्वारा पाचनशक्ति में सुधार हो जाता है।
- मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) तथा कई प्रकार की हडि्डयों के दर्द से छुटकारा मिल जाता है।
- त्वचा के रोग भी इस चिकित्सा के द्वारा ठीक हो सकते हैं।
- इस चिकित्सा के द्वारा स्रावी ग्रंथियों की कार्य-प्रणाली में सुधार तथा उसमें होने वाले रोगों का उपचार हो सकता है।
- इस चिकित्सा के द्वारा दिल का दौरा, लकवा, सायटिका, गठिया, रक्तचाप तथा मधुमेह रोगों का उपचार हो सकता है।
- एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा मूत्र-प्रणाली में भी सुधार हो सकता है।
- इस चिकित्सा के द्वारा मस्तिष्क से सम्बन्धित रोग भी ठीक हो सकते हैं।
- एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा हृदय रोग का उपचार भी आसानी से किया जा सकता है।
- स्त्रियों के मासिकधर्म के दौरान होने वाले रोगों का उपचार भी एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा किया जा सकता है।
- इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक्यूप्रेशर चिकित्सा एक प्रकार की ऐसी चिकित्सा है जिससे मनुष्यों के रोगों का उपचार बिना किसी शुल्क तथा बिना किसी परेशानी के किया जा सकता है और इस उपचार का फायदा भी बहुत अधिक होता है।
मन की सुन्दरता-
मनुष्य के तन और मन की सुन्दरता के द्वारा ही मनुष्य की जीवनशैली का विकास होता है। यदि किसी मनुष्य के मन में कोई गलत धारणा हो जाती है या वह मनुष्य किसी के प्रति भेद-भाव, ईर्ष्या, जलन रखता है तो उस मनुष्य का मन और तन स्वच्छ नहीं होता है क्योंकि ऐसे मनुष्य अपने आपको हानि तो पहुंचाते ही हैं साथ ही दूसरों का भी नाश करते हैं। इसलिए सभी मनुष्यों को अपने तन और मन को स्वच्छ रखना चाहिए।
प्रत्येक व्यक्ति को अपने मन और तन की सुन्दरता को बनाये रखने के साथ-साथ कई प्रकार के गुणों को भी अपने अन्दर संजोकर रखना चाहिए जैसे-त्याग, सहनशीलता, क्षमा, सेवा, हृदय की सुन्दरता, स्नेह, करुणा, मानवता तथा समर्पण आदि। यदि किसी मनुष्य में इस प्रकार के गुण नहीं होते हैं तो उस मनुष्य के तन और मन की सुन्दरता का विकास नहीं हो सकता है। इसलिए तन और मन की सुन्दरता के लिए सभी मनुष्यों को इन सभी गुणों का अपने अन्दर समावेश करना चाहिए
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संपर्क करें - mr ranjan sir- 9771017201सोराइसिस
साइनुसाइटिस
परिचय-
जब किसी व्यक्ति की नाक के अन्दर के ऊपरी भाग की हड्डी वाले खोल में अर्थात साइनस में पाई जाने वाले श्लेष्मा झिल्ली में संक्रमण तथा सूजन हो जाती है तो उसे साइनुसाइटिस रोग कहते हैं।लक्षण-
साइनुसाइटिस रोग के कारण रोगी की नाक के साइनस वाले भाग में बहुत तेज दर्द होता है। इस दर्द के कारण रोगी के गाल और माथे में भी दर्द होने लगता है। यदि किसी प्रकार से रोगी के एक से अधिक साइनसों में रोग हो जाए तो इसके कारण रोगी के दोनों गालों की हडि्डयों में दर्द होने लगता है। इस रोग के कारण रोगी को चेहरा भरा-भरा और काफी भारी सा हो जाता है तथा जब रोगी नीचे की ओर झुकता है तो उसे और भी तेज दर्द होता है। इस रोग से ग्रस्त रोगी का चेहरा काफी संवेदनशील हो जाता है लेकिन फिर भी इसमें सूजन नहीं होती है। कभी-कभी इस रोग के कारण रोगी की नाक भी बहने लगती है। नाक बहने पर रोगी की नाक से गाढ़ा पीले रंग का पदार्थ निकलने लगता है।
कारण-
नाक के साइनस में वायु के अलावा कुछ भी नहीं पाया जाता है। लेकिन फिर भी जब किसी व्यक्ति को तेज जुकाम होता है तो उसकी नाक के अन्दर श्लेष्मा का भारी जमाव हो जाता है जिसके कारण उसकी नाक बंद हो जाती है। इस अवस्था के कारण श्लेष्मा रोग ग्रस्त हो जाता है और रोगी को साइनुसाइटिस रोग हो जाता है।
जिन व्यक्तियों को अधिकतर जुकाम रहता है उन्हें इस रोग के हो जाने का ज्यादा खतरा होता है। कभी-कभी किसी व्यक्ति को किसी चीज से एलर्जी होती है जिसके फलस्वरूप रोगी को बहुत तेज जुकाम हो जाता हैं और इस जुकाम के कारण रोगी की नाक बंद हो जाती है और नाक बंद हो जाने के कारण रोगी के सिर में दर्द तथा कभी-कभी गालों में भी दर्द होने लगता है और रोगी को साइनुसाइटिस रोग हो जाता है। यह रोग सर्दी लगने के कारण भी हो सकता है।
रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से साइनुसाइटिस रोग से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है।
अगर कभी-कभी रोगी की नाक बंद हो जाए तो नाक के अन्दर श्लेष्मा के जमाव को रोकने वाला स्प्रे लगाने से लाभ होता है। कई बार यह रोग बहुत ही गम्भीर हो जाता है और बहुत से उपचार कराने के बावजूद भी ठीक नहीं होता है या ठीक भी हो जाता है तो कुछ समय के बाद फिर से उभरकर सामने आ जाता है। ऐसी अवस्था हो जाने पर रोगी को डॉक्टर से सलाह लेकर अपना उपचार कराना होगा
अंडमेटॉसिस
एंडोमेट्रियोसिस
परिचय-
एंडोमेट्रियोसिस महिलाओं को होने वाला रोग है। यह रोग ज्यादातर 30 साल से अधिक आयु वाली महिलाओं को ही होता है। जिन औरतों को बच्चा पैदा नहीं होता है उन्हे इस रोग के होने का ज्यादा खतरा रहता है।कारण-
एण्डोमेट्रियम की कोशिकाएं कई बार अपने स्थान से हटकर कहीं और विकसित होने लगती है। कभी-कभी ये फिलोपियन ट्यूब से बाहर निकलकर अंडाशय, बड़ी आंत या किसी और अंग को भी घेर लेती है जिसके कारण यह रोग हो जाता है।
मासिकधर्म की अवस्था में गर्भाशय की दीवार के ऊतकों से रक्तस्राव होता है। कुछ ऐसा ही एण्डोमेट्रियम के जमाव के समय भी होता है और एण्डोमेट्रियम और आसपास के अंगों के बीच एक विभाजक ऊतक निर्मित हो जाता है। इस प्रकार अगर एक फेलोपियन ट्यूब प्रभावित हो जाए तो स्त्री की गर्भधारण की क्षमता काफी कम हो जाती है।
लक्षण-
एण्डोमेट्रियम के जमने के कारण शरीर में खून रुक जाता है जिससे मासिकस्राव काफी दर्द भरा आता है और संभोग करने में भी अक्सर दर्द होता है। इसके साथ-साथ रोगी स्त्री को पीठ दर्द की शिकायत भी हो जाती है।
white discharge, सफेद पानी का गिरना
श्वेतप्रदर
परिचय-
अक्सर स्त्रियों को श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) की शिकायत बहुत मिलती है। यह रोग किसी भी उम्र की स्त्री को हो सकता है। कई बार लड़कियां जिनकी शादी नहीं हुई होती है वे भी शर्म या दूसरे कारणों से बिना जांच और इलाज के अन्दर ही अन्दर दिमाग में परेशानी पालती रहती है जिसकी वजह से यह रोग उनमें और बढ़ जाता है।कारण-
श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) का रोग खुद में एक रोग न होकर ज्यादातर दूसरे रोगों के कारण होता है। इस रोग को मुख्यत: 2 भागों में बांट सकते हैं।
स्त्रियों में श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) का रोग होने का कारण पोषण की कमी, शरीर में खून की कमी होना या भोजन में पोषक तत्वों की कमी के कारण विटामिन, कैल्शियम की कमी हो जाना है। श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) का रोग ज्यादा चिंता, ज्यादा थकान वाले काम करना, ज्यादा यौन सम्बंधों में लिप्त होना, जल्दी-जल्दी मां बनना या बार-बार गर्भपात होना आदि कारणों से भी हो सकता है। श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) का रोग होने का सबसे खास कारण है बच्चेदानी के मुंह पर घाव होना, यौन रोग, सुजाक (गिनोरिया) आदि होना।
लक्षण-
स्त्रियों का योनिमार्ग थोड़ा बहुत हमेशा गीला रहता है और यौन उत्तेजना के समय तो यह गीलापन बढ़ता ही जाता है। स्त्रियों के गर्भकाल में, मासिकधर्म से ठीक पहले, मासिकधर्म बंद होने के बाद जब स्त्री-डिम्ब डिम्बाशय से निकलकर डिम्ब-नलिका से होते हुए गर्भाशय की तरफ बढ़ता रहता है और पुरुष शुक्राणु के न मिलने के कारण समाप्त हो जाता है तब इस डिम्ब-निष्कासन और डिम्ब-विर्सजन की अवधि में भी गीलापन बढ़ जाता है। इस स्राव को श्वेतप्रदर नहीं कहा जाता और न ही इसके लिए किसी चिंता या चिकित्सा की जरूरत है।
सामान्य श्वेतप्रदर बहुत ज्यादा पोषण की कमी और ताकत से ज्यादा थकाने वालों कामों का नतीजा होता है। लेकिन कई बार यह रोग दिमागी परेशानी से भी हो सकता है। मधुमेह, लगातार खांसी या दमा रोग के कारण भी श्वेतप्रदर हो सकता है। इन सभी कारणों को दूर करने और मधुमेह, दमा तथा खांसी का इलाज करवाने से यह रोग ठीक हो सकता है। पोषण की कमी न हो तो इस सामान्य श्वेतप्रदर में न तो कमरदर्द की, न ही योनिप्रदेश पर खुजली की, न ही बदबूदार पानी की और न ही चिपचिपे या ज्यादा गाढ़े स्राव की शिकायत होती है। श्वेतप्रदर रोग के गंभीर न होने पर भी भोजन और जीवन में सुधार करके या डॉक्टर से पूछकर टॉनिक आदि लेकर इनसे बचने की कोशिश करें ताकि कमजोरी ज्यादा न बढ़े और जल्दी इन्फैक्शन न हो।
शरीर पर एक्यूप्रेशर दबाव देकर श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) रोग का उपचार किया जा सकता है। रोगी स्त्री को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में ही कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से श्वेतप्रदर (योनि में से सफेद पानी आने) रोग का उपचार कर सकता है
पथरी
मूत्राशय में पथरी
परिचय-
मूत्राशय में पथरी हो जाने पर रोगी को पेशाब करने में दिक्कत होती है तथा उसके पेट में दर्द होने लगता है। इस रोग के कारण रोगी के पेशाब में पीब, खून तथा एलुब्यूमिन निकलने लगता है। इस रोग में जब रोगी पेशाब करता है तो उसका मूत्राशय सिकुड़ जाता है और पथरी मूत्राशय के मांस के साथ लग जाती है जिसके कारण रोगी को बहुत तेज दर्द होने लगता है। कभी-कभी तो छोटी पथरी पेशाब के साथ बाहर निकल जाती है लेकिन जो बड़ी पथरी होती है वह पेशाब के साथ बाहर नहीं निकल पाती है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा इस बड़ी पथरी को बिना किसी यन्त्र तथा बिना दवाई के पेशाब के साथ शरीर से बाहर निकाला जा सकता है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा से उपचार करने के बाद दुबारा पथरी का बनना रुक जाता है।एक्यूप्रेशर चिकित्सा से उपचार करने के साथ-साथ कुछ देशी औषधियों के नुस्खे उपयोग में लाए जाए तो मूत्राशय की पथरी जल्दी निकल जाती है। यदि रोगी व्यक्ति प्रतिदिन सुबह-शाम कागजी नींबू का रस पानी में मिलाकर पिए तो इस रोग में बहुत लाभ मिलता है। लगभग आधा कप गाजर का रस दिन में 3 बार लेने से रोगी का यह रोग जल्दी ठीक हो जाता है। पके जामुन रोजाना खाने से भी पथरी रोग ठीक हो जाता है। जामुन की गुठलियों का चूर्ण बनाकर चुटकी भर चूर्ण छोटी कटोरी भर दही में मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से मूत्राशय की पथरी का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता हैं
चित्र में दिये गये प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर प्रतिदिन प्रेशर देने से पथरी का रोग धीरे-धीरे ठीक होने लगता है। इससे पथरी पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाती है और रोगी का पथरी के कारण होने वाला दर्द कम होता हैं
अघोरी
रहस्यमयी है अघोरियों की साधना विधि
अघोरी: अघोरियों के बारे में ये बातें जानकर हैरान रह जाएंगे आप... अघोरियों की साधना विधि सबसे ज्यादा रहस्यमयी है। उनकी अपनी शैली, अपना विधान है, अपनी अलग विधियां हैं। अघोरी उसे कहते हैं जो घोर नहीं हो। यानी बहुत सरल और सहज हो। जिसके मन में कोई भेदभाव नहीं हो। अघोरी हर चीज में समान भाव रखते हैं। वे सड़ते जीव के मांस को भी उतना ही स्वाद लेकर खा सकते हैं जितना स्वादिष्ट पकवानों को स्वाद लेकर खाया जा सकता है। अघोरियों की दुनिया ही नहीं, उनकी हर बात निराली है। वे जिस पर प्रसन्न हो जाएं उसे सबकुछ दे देते हैं। अघोरियों की कई बातें ऐसी हैं जो सुनकर आप दांतों तले अंगुली दबा लेंगे। हम आपको अघोरियों की दुनिया की कुछ ऐसी ही बातें बता रहे हैं, जिनको पढ़कर आपको एहसास होगा कि वे कितनी कठिन साधना करते हैं।अघोरी गाय का मांस छोड़ कर बाकी सभी चीजों को खाते हैं। मानव मल से लेकर मुर्दे का मांस तक। अघोरपंथ में श्मशान साधना का विशेष महत्व है इसलिए वे श्मशान में रहना ही ज्यादा पंसद करते हैं। श्मशान में साधना करना शीघ्र ही फलदायक होता है। श्मशान में साधारण मानव जाता ही नहीं, इसीलिए साधना में विध्न पड़ने का कोई प्रश्न नहीं। उनके मन से अच्छे बुरे का भाव निकल जाता है, इसलिए वे प्यास लगने पर खुद का मूत्र भी पी लेते हैं। अघोरियों के बारे में कई बातें प्रसिद्ध हैं जैसे कि वे बहुत ही हठी होते हैं, अगर किसी बात पर अड़ जाएं तो उसे पूरा किए बगैर नहीं छोड़ते। गुस्सा हो जाएं तो किसी भी हद तक जा सकते हैं।
अधिकतर अघोरियों की आंखें लाल होती हैं जैसे वो बहुत गुस्सा हो लेकिन उनका मन उतना ही शांत भी होता है। काले वस्त्रों में लिपटे अघोरी गले में धातु की बनी नरमुंड की माला पहनते हैं। अघोरी अक्सर श्मशानों में ही अपनी कुटिया बनाते हैं। जहां एक छोटी सी धूनि जलती रहती है। जानवरों में वो सिर्फ कुत्ते पालना पसंद करते हैं। उनके साथ उनके शिष्य रहते हैं जो उनकी सेवा करते हैं। अघोरी अपनी बात के बहुत पक्के होते हैं, वे अगर किसी से कोई बात कह दें तो उसे पूरा करते हैं। अघोरी अमूमन आम दुनिया से कटे हुए होते हैं। वे अपने आप में मस्त रहने वाले, अधिकांश समय दिन में सोने और रात को श्मशान में साधना करने वाले होते हैं। वे आम लोगों से कोई सम्पर्क नहीं रखते। ना ही ज्यादा बातें करते हैं। वे अधिकांश समय अपना सिद्ध मंत्र ही जाप करते रहते हैं। अघोरी मूलतः तीन तरह की साधनाएं करते हैं। शिव साधना. शव शाधना और श्मशान साधना। शिव साधना में शव के ऊपर पैर रखकर खड़े रहकर साधना की जाती है। बाकी तरीके शव साधना की ही तरह होते हैं। इस साधना का मूल शिव की छाती पर पार्वती द्वारा रखा हुआ पाँव है। ऐसी साधनाओं में मुर्दे को प्रसाद के रूप में मांस और मदिरा चढ़ाया जाता है। शव और शिव साधना के अतिरिक्त तीसरी साधना होती है श्मशान साधना, जिसमें आम परिवारजनों को भी शामिल किया जा सकता है। इस साधना में मुर्दे की जगह शवपीठ की पूजा की जाती है। उस पर गंगा जल चढ़ाया जाता है। यहाँ प्रसाद के रूप में भी मांस-मंदिरा की जगह मावा चढ़ाया जाता हैं
इंद्रजाल
जानकारी
भारतीय प्राचीन विद्याओं में जिन विषयों से सम्बंधित पुस्तकों के प्रति जनसामान्य भी लालायित रहता है, इंद्रजाल उनमें से एक है. इंद्रजाल में दत्तात्रेय द्वारा भगवान शिव से प्राप्त तंत्र-मंत्र-यंत्र का गुप्त दुर्लभ ज्ञान संकलित किया गया है. इंद्रजाल में संकलित तंत्र-मन्त्र आदि कामना पूर्ति कारक प्रयोगों के उत्कीलन की आवश्यकता नहीं होती. दत्तात्रेय तंत्र में कहा गया है कि
ब्राहमण काम क्रोध वश रहेऊ,
त्याहिकरण सब कीलित भयऊ,
कहौ नाथ बिन कीलेमंत्रा,
औरहु सिद्व होय जिमितंत्रा.
देखा जाये तो इंद्रजाल तंत्र के षटकर्मों जैसे शांति कर्म, वशीकरण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन एवं मारण कर्मों में किये जाने वाले विविध प्रकार के तंत्र-मंत्र-यंत्र से सम्बंधित प्रयोगों का विवरण दिया गया है. अलग-अलग लेखकों एवं प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित इंद्रजाल नामक पुस्तक में शिव-दत्तात्रेय वार्ता के दौरान भगवान शिव द्वारा बताये गए तांत्रिक प्रयोगों का समावेश भी किया गया है. इंद्रजाल को कौतुक रत्न कोष भी माना जाता है. क्योंकि इंद्रजाल में दिए गए प्रयोग आश्चर्यजनक परिणाम प्रदान करते हैं. तंत्र-मंत्र प्रयोगों के अतिरिक्त इंद्रजाल में रसायन शास्त्र, औषधि विज्ञान, चमत्कार दिखाने वाले खेल भी दिए गए हैं. हाथ की सफाई से किये जाने वाले जादू के खेलों का संकलन भी इंद्रजाल में किया गया है. इंद्रजाल में औद्योगिक उपयोग के नुस्खे भी बताये गए हैं. इंद्रजाल के कुछ कौतुक प्रयोगों के नाम आगे दिए जा रहे हैं. जैसे :- एक घंटे में पेड़ लगाना, नींबू से खून निकालना, अंडे को बोतल में डालना, अंडे का स्वत: उछलना, छलनी में पानी भरना, अग्नि से वस्त्र न जलना आदि रोचक एवं विस्मय उत्पन्न करने वाले प्रयोगों का विवरण दिया गया है. इसके अतिरिक्त नजर दोष निवारण के लिए भी अनेक प्रभावशाली प्रयोगों, एवं झाड़े आदि का विवरण दिया गया है. इंद्रजाल में यक्षिणी सिद्वि के बारे में भी विस्तार से बताया गया है. विभिन्न प्रकार की यक्षिणियां किस प्रकार की विशेषता से युक्त होती है तथा प्रसन्न होने पर साधक को किस प्रकार से लाभ पहुंचाती है, इसका विवरण भी इंद्रजाल में दिया गया है.
बांझपन
बांझपन
परिचय-
जब कोई स्त्री गर्भधारण नहीं कर पाती है या फिर पुरुष अपनी पत्नी को गर्भवती नहीं कर पाता है तो इस अवस्था को बांझपन कहते हैं। अक्सर इस तरह की स्थिति का सामना ज्यादा उम्र के स्त्री-पुरुषों को करना पड़ता है।
कारण-
बांझपन के कारण स्त्री या पुरुष दोनों में से किसी में भी हो सकते हैं या फिर दोनों में ही हो सकते हैं। गर्भधारण के लिए पुरुष के शुक्राणुओं का स्वस्थ होना, पूरी मात्रा में होना और स्त्री की योनि में शुक्राणुओं का काफी मात्रा में स्खलित होना है ताकि वे आसानी से डिम्ब में पहुंचकर निषेचित हो सके।
लक्षण-
अगर पति-पत्नी लगभग 1 साल तक बिना गर्भनिरोधक के यौन संबध बनाते हो लेकिन स्त्री फिर भी गर्भधारण न कर पा रही हो तो ऐसी स्त्री को बांझपन का रोग हो सकता है।
चिकित्सा-
बांझपन रोग में सबसे पहले स्त्री को अपनी जांच करवा लेनी चाहिए ताकि अगर उसके अंदर की किसी कमी के कारण वह गर्भधारण न कर पा रही हो तो उसका पता चल सके।
डिप्रेशन
अवसाद
परिचय-
अवसाद एक मानसिक बीमारी है जिससे ग्रस्त रोगी एकदम हताश और निराश हो जाता है।
कारण-
अवसाद का रोग पीढ़ी दर पीढ़ी भी पनप सकता है। वैसे यह रोग 2 तरह का होता है- बाहरी और आंतरिक अवसाद। बाहरी अवसाद किसी दुर्घटना, मानसिक चोट या तेज प्रतिक्रिया के कारण पैदा होता है और आंतरिक अवसाद गलैड्यूलर फीवर (ग्रंथिल ज्वर) जैसे वायरल संक्रमण से होता है।
लक्षण-
अवसाद रोग में रोगी को सिरदर्द, भूख न लगना, शारीरिक ऊर्जा का शमन होना व कब्ज जैसे लक्षण देखने में आते है। इस रोग में रोगी अजीब-अजीब सी हरकते करने लगता है।
चिकित्सा-
अवसाद एक मानसिक रोग है। इस रोग में अगर रोगी ज्यादा परेशान या दुखी रहता है तो उसे किसी अच्छे मनोचिकित्सक को दिखाना चाहिए।

अपच
अपच
परिचय-
कोई व्यक्ति जब भोजन करता है और उसका वह भोजन पचता नहीं है तो वह अपच रोग कहलाता है।
कारण-
अपच रोग के कई कारण होते है जैसे- ज्यादा खेलना, बहुत जल्दी खाना खा लेना, अत्यधिक मसालेदार भोजन अथवा वसायुक्त भोजन लेना। कभी-कभी पेप्टिक अल्सर, पित्त की पथरी या हर्निया आदि के कारण भी अपच का रोग हो जाता है।
लक्षण-
अपच रोग में खाना खाने के बाद पेट में ऐंठन, हल्का-हल्का दर्द, छाती में जलन, खट्टी डकार, जी मिचलाना और बेचैनी की शिकायत हो सकती है।
चिकित्सा-
अपच रोग में एसिडिटी को रोकने के लिए औषधि का प्रयोग करना चाहिए

एंजाइना पेक्टोरिस
एंजाइना पेक्टोरिस
परिचय-
एंजाइना पेक्टोरिस के रोग में रोगी ऐंठन का शिकार हो जाता है। इस रोग में शरीर के अंदर खून का संचार कम होने की वजह से रोगी को पूरी तरह आक्सीजन नहीं मिल पाती है।
कारण-
जब रोगी के शरीर की धमनियां एकदम सख्त हो जाती है तब यह रोग पैदा होता है।
लक्षण-
इस रोग की शुरुआत में रोगी की छाती के बीचो-बीच में तेज दर्द होता है। खासतौर पर इस तरह का दर्द व्यायाम के बाद ही होता है। कभी-कभी यह दर्द जबड़े या बांह के ऊपरी भाग में भी चला जाता है। इस रोग में रोगी को काफी घुटन महसूस होती है और उसे ऐसा लगता है कि किसी ने उसकी छाती पर कुछ भारी सामान रख दिया हो। इस रोग की पहचान के लिए रोगी की इलेक्ट्रो-कॉडियोग्राम जांच करानी अच्छी रहती है।
उपचार-
इस रोग के होने पर सबसे पहले रोगी को अपने ब्लड प्रेशर की जांच करा लेनी चाहिए। अगर ब्लड प्रेशर बढ़ा
हुआ तो उसे कंट्रोल करने की कोशिश करनी चाहिए। आपकी लंबाई के हिसाब से अगर आपका वजन ज्यादा हो तो वजन कम करने की कोशिश करनी चाहिए। अगर रोगी धूम्रपान करता हो तो उसे धूम्रपान तुरंत छोड़ देना चाहिए नहीं तो यह खतरनाक हो सकता हैं

आँत का कैंसर
आंत का कैंसर
परिचय-
कैंसर एक बहुत ही गंभीर रोग है जिसका पूरा व सही तरह से इलाज न कराने से रोगी की जान भी जा सकती है। आंत का कैंसर भी एक ऐसा ही रोग है। यह रोग 40 साल से अधिक उम्र वाले लोगों में अधिक पाया जाता है।
कारण-
आंत का कैंसर गलत तरीके के भोजन जैसे ज्यादा रिफाइंड में पके हुए और कम रेशेवाले भोजन को खाने से होता है। गुदा से सम्बंधित रोग और आंत के अल्सर के कारण भी यह रोग हो सकता है।
लक्षण-
इस रोग में रोगी को पेट में कब्ज बने रहना, पेट में हल्का-हल्का चुभने वाला दर्द रहना, मल के साथ रक्त का आना, पेट में मुलायम गांठ का उभरना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।
उपचार-
आंत के कैंसर रोग में शल्य चिकित्सा (सर्जरी) का सहारा लिया जाता है क्योंकि इस रोग में आंत का वह हिस्सा जो कैंसर से ग्रस्त होता है, गल जाता है और शल्य चिकित्सा द्वारा उसे काटकर अलग कर दिया जाता है। अगर आंत का कैंसर कुछ कम या शुरुआती हो तो एक्युप्रेशर चिकित्सा से उपचार किया जा सकता है।।
हर्पीज रोग
गुप्तांगों की हर्पीज
परिचय-
गुप्तांगों का हर्पीज एक कष्टकारक और बार-बार होने वाला संक्रमण है। कहते हैं कि अगर इसका वायरस एक बार शरीर में घुस जाए तो जिंदगी भर शरीर में ही रहता है। किसी-किसी को तो यह वायरस एक बार परेशान करता है मगर कुछ लोगों को तो यह बार-बार परेशान करता रहता है।कारण-
गुप्तांगों के हर्पीज रोग का संक्रमण संभोग करने के कारण ज्यादा फैलता है। योनि अथवा गुदा मैथुन के अलावा यह रोग मुखमैथुन करने से भी फैल सकता है।
लक्षण-
संभोग के द्वारा इस रोग का संक्रमण फैलने के 1 या 2 हफ्ते बाद पीड़ित व्यक्ति की योनि या लिंग पर जलन और खुजली होने लगती है। यह गुदाद्वार में भी फैल सकता है। इस रोग में गुप्तांगों पर छोटे-छोटे छालों का गुच्छा भी देखा जा सकता है। ये छाले 10 से 12 दिनों में ठीक हो जाते हैं। इस रोग में रोगी को हल्का बुखार सा भी हो सकता है और उसके पेड़ू में लगी ग्रन्थियां बढ़ जाती हैं।
चिकित्सा-
रोगी के शरीर के इस रोग से संक्रमित स्थान पर बने छालों को गुनगुने नमकीन पानी से धोने से आराम मिलता है।

tendinitis
टेंडिनाइटिस
परिचय-
शरीर की पेशियों को हड्डी के साथ बांधकर रखने वाले ऊतकों को टेंडन कहा जाता है। यदि इन टेंडनों में किसी प्रकार का संक्रमण हो जाता है तो उसे टेंडिनाइटिस रोग कहते हैं। इस रोग के कारण टेंडन का रेशेदार ऊतक फूल जाता है और स्पर्श करने पर मुलायम सा लगता है।लक्षण-
इस रोग के कारण टेंडन में बहुत तेज दर्द होता है और इससे मिलकर क्रिया करने वाले अंग भी प्रभावित हो जाते हैं। वैसे तो यह रोग ज्यादातर कोहनियों के इर्द-गिर्द के टेंडनों, एड़ी या फिर कंधों के आस-पास की पेशियों वाले भाग को ज्यादा प्रभावित करता है लेकिन फिर भी यह रोग शरीर के किसी भी भाग में हो सकता है।
कारण-
टेंडिनाइटिस रोग अधिकतर किसी तरह की चोट लग जाने के कारण होता है।
एक्यूप्रेशर चिकित्सा
रोग का उपचार किया जा सकता है। रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से टेंडिनाइटिस से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है।
सावधानी-
इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को जितना हो सके उतना आराम करना चाहिए। इसके अलावा रोगी को इस रोग के कारण प्रभावित भाग पर पट्टी बांधने से भी राहत मिल सकता है ।
पेप्टिक अल्सर
पेप्टिक अल्सर
परिचय-
शरीर में पाये जाने वाले पाचनतन्त्र में होने वाले घाव को अल्सर कहते हैं। इस रोग में रोगी के आमाशय तथा आंत दोनों में अल्सर हो जाता है। वैसे यह रोग अधिकतर अधेड़ उम्र के पुरुषों तथा स्त्रियों में होता है। जब आमाशय या आंत के किसी भाग की सतह में पाचक रसों के प्रतिरोध की क्षमता खो जाती है तो इ88स प्रकार का रोग हो जाता है।कारण-
आमाशय तथा आंत का अल्सर कई कारणों से हो सकता है जैसे- अधिक मात्रा में शराब का सेवन या धूम्रपान करने आदि से। यह रोग उन व्यक्तियों को भी हो सकता है जो अनियमित रूप से भोजन का सेवन करते हैं। इस कारण से होने वाले रोगों को पेप्टिक अल्सर कह सकते हैं। इनके अलावा यह रोग कई सारी दवाईयों के साइड इफेक्ट से भी हो सकता है।
लक्षण-
इस रोग के कारण व्यक्ति के पेट के ऊपरी भाग या बाईं पसलियों के नीचे की ओर जलन युक्त दर्द होता है। कई बार यह दर्द खाना खाने के बाद शुरू हो जाता है। लेकिन कई बार खाना खाने से यह दर्द कम भी हो जाता है। वैसे यह दर्द लम्बे समय तक रुक-रुककर भी होता रहता है। इस रोग से पीड़ित कुछ व्यक्तियों को जी-मिचलाने की भी शिकायत हो सकती है।
एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार-
देखा जाए तो यह रोग कुछ महीने के अन्दर ही ठीक हो सकता है लेकिन कभी-कभी इस तरह के रोग को ठीक होने में वर्षों भी लग जाते हैं। यह रोग कई वर्षों तक बना रहता है। कुछ अल्सर रोग में रोगी को उल्टी या मल के साथ खून आना शुरू हो जाता है। यह रोग आगे चलकर कैंसर का रूप भी धारण कर सकता है। इसलिए इन रोगों का सही तरीके से इलाज करना चाहिए। पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा भी किया जा सकता हैं
पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार किया जा सकता है। रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से पेप्टिक अल्सर से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है। जब रोगी को पेट में इस रोग के कारण दर्द हो रहा हो तो रोगी को अधिक से अधिक आराम करना चाहिए तथा सदैव पौष्टिक भोजन ही करना चाहिए ।
एन्जाइम प्रॉब्लम
एन्जाइना रोग में रोगी के सीने के बाईं ओर दर्द उठता है। यह दर्द बाद में सीने से हाथों और हथेलियों तक पहुंच जाता है। अक्सर यह रोग 40 साल की उम्र से ज्यादा के व्यक्तियों को होता है।
कारण-
एन्जाइना रोग ज्यादा शारीरिक-मानसिक श्रम, भय, घबराहट, अधिक सर्दी लगने अथवा जरूरत से अधिक भोजन करने के कारण हो जाता है। ज्यादा धूम्रपान करने से या उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर) रोग के कारण भी एन्जाइमा का रोग हो सकता है।
लक्षण-
एन्जाइना रोग के होने से पहले रोगी में छाती में जकड़न, सांस लेने में परेशानी और बैचेनी जैसे लक्षण प्रकट होते हैं और उसके बाद दर्द शुरू हो जाता है। रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसे दिल का दौरा पड़ने वाला है।
चिकित्सा-
एन्जाइना रोग में रोगी को सबसे पहले धूम्रपान करना बंद कर देना चाहिए। रोगी को अपने रक्तचाप को भी सामान्य करने की कोशिश करनी चाहिए। रोगी को अपने भोजन पर खासतौर से ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही उसे हृदय से सम्बंधित सभी प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर प्रेशर देना चाहिए।।
अल्सर
पेप्टिक अल्सर
परिचय-
शरीर में पाये जाने वाले पाचनतन्त्र में होने वाले घाव को अल्सर कहते हैं। इस रोग में रोगी के आमाशय तथा आंत दोनों में अल्सर हो जाता है। वैसे यह रोग अधिकतर अधेड़ उम्र के पुरुषों तथा स्त्रियों में होता है। जब आमाशय या आंत के किसी भाग की सतह में पाचक रसों के प्रतिरोध की क्षमता खो जाती है तो इस प्रकार का रोग हो जाता है।कारण-
आमाशय तथा आंत का अल्सर कई कारणों से हो सकता है जैसे- अधिक मात्रा में शराब का सेवन या धूम्रपान करने आदि से। यह रोग उन व्यक्तियों को भी हो सकता है जो अनियमित रूप से भोजन का सेवन करते हैं। इस कारण से होने वाले रोगों को पेप्टिक अल्सर कह सकते हैं। इनके अलावा यह रोग कई सारी दवाईयों के साइड इफेक्ट से भी हो सकता है।
लक्षण-
इस रोग के कारण व्यक्ति के पेट के ऊपरी भाग या बाईं पसलियों के नीचे की ओर जलन युक्त दर्द होता है। कई बार यह दर्द खाना खाने के बाद शुरू हो जाता है। लेकिन कई बार खाना खाने से यह दर्द कम भी हो जाता है। वैसे यह दर्द लम्बे समय तक रुक-रुककर भी होता रहता है। इस रोग से पीड़ित कुछ व्यक्तियों को जी-मिचलाने की भी शिकायत हो सकती है।
एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार-
देखा जाए तो यह रोग कुछ महीने के अन्दर ही ठीक हो सकता है लेकिन कभी-कभी इस तरह के रोग को ठीक होने में वर्षों भी लग जाते हैं। यह रोग कई वर्षों तक बना रहता है। कुछ अल्सर रोग में रोगी को उल्टी या मल के साथ खून आना शुरू हो जाता है। यह रोग आगे चलकर कैंसर का रूप भी धारण कर सकता है। इसलिए इन रोगों का सही तरीके से इलाज करना चाहिए। पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा भी किया जा सकत हैं।
अल्सर रोग का उपचार किया जा सकता है। रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से पेप्टिक अल्सर से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है। जब रोगी को पेट में इस रोग के कारण दर्द हो रहा हो तो रोगी को अधिक से अधिक आराम करना चाहिए तथा सदैव पौष्टिक भोजन ही करना चाहिए।
जोबना का कैंसर ( स्तन)
स्तन कैंसर
परिचय-
स्तन कैंसर स्त्रियों का एक बहुत ही ज्यादा कष्टदायक रोग होता है। इस रोग के कारण स्त्री के स्तनों में बहुत तेज दर्द होता है तथा स्तनों से पीब निकलने लगती है।लक्षण-
इस रोग के हो जाने पर स्तन सख्त तथा अनियमित आकार की गांठ के रूप में हो जाते हैं जिन्हें छूने पर बहुत तेज दर्द होने लगता है। इस प्रकार की गांठ स्तनों के किसी भी भाग में उभर आती है। जब इस रोग की शुरुआत होती है तो ये गांठ इधर-उधर सरकती भी रहती हैं।
जब स्तनों में होने वाली गांठ बड़ी हो जाती है तो यह अपने ऊपर की त्वचा को अन्दर की ओर खींच लेती है जिसके कारण स्तन के अन्दर की ओर एक गड्ढा जैसा बन जाता है। यह गड्ढा दूध का संचार करने वाली नलिकाओं को प्रभावित करता है जिसके कारण यह सिकुड़ जाती हैं और निपल पिचक जाते हैं। जैसे-जैसे गांठ बड़ी होती जाती है वैसे-वैसे ही स्तन की ऊपर की त्वचा से भी चिपक जाती है जिसके कारण स्तन की त्वचा में जलन होने लगती है। कुछ दिनों में इस गांठ के अन्दर पीब बनने लगती है। जब स्त्री के निप्पलों को दबाते हैं तो उसमें से पीब के समान दूध निकलने लगता है। यह गांठ बढ़ते-बढ़ते स्त्रियों के बगलों में पाई जाने वाली लसीका ग्रन्थियों तक भी फैल सकती है। जब इस रोग की शुरुआत होती है तो उस समय इसका उपचार करना बहुत जरूरी हो जाता है यदि इस रोग को बढ़ने से न रोका जाए तो यह रोग पूरे शरीर को प्रभावित कर सकता है।
कारण-
जब स्तन में गांठ बन जाती है तो सबसे पहले यह पता लगाना चाहिए कि गांठ ज्यादा खतरनाक तो नहीं है। स्तन कैंसर होने की आशंका काफी हद तक वातावरण और जीवनशैली पर निर्भर करती है। स्त्रियों को यह रोग भोजन की एलर्जी के कारण भी हो सकता है। इस रोग के होने में आनुवंशिकता भी एक मुख्य भूमिका अदा करती है। यह रोग एक स्त्री से दूसरी स्त्री को भी हो सकता है। स्त्रियों के स्तन में कैंसर रोग के लिए गर्भनिरोधक गोलियों और जीवन परिवर्तन लक्षणों के उपचार के लिए दी जाने वाली HRT को जिम्मेदार माना जाता है। कोई स्त्री जितनी जल्दी मां बन जाती है उसको स्तन कैंसर होने की आशंका लगभग उतनी ही कम होती है।
एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा स्त्रियों के स्तन कैंसर का उपचार-
जब किसी स्त्री के स्तन में गांठ सी बनी हुई दिखाई देती है तो तुरंत ही जांच करानी चाहिए कि यह गांठ ज्यादा खतरनाक तो नहीं है। यदि गांठ ज्यादा खतरनाक हो तो भी इसका इलाज किया जा सकता है। यह रोग एक बार ठीक होकर दुबारा भी हो सकता है इसलिए इस रोग का इलाज सही तरीके से कराना चाहिए। स्तन कैंसर का उपचार कराने के लिए सबसे पहले स्त्रियों को अपने स्तनों की जांच करानी चाहिए।
स्त्रियों के स्तनों की जांच जब माहवारी आये, उसके बाद करनी चाहिए। यह जांच हर महीने तथा एक विशेष समय में करनी चाहिए। यदि स्त्रियों को अपने स्तन में भारीपन महसूस होता हो तो चिन्ता न करें। स्त्रियों को यह पता लगाना चाहिए कि उसके दोनों स्तन एक ही समान है। यदि जांच कराते दौरान स्त्री को लगे कि उसका एक स्तन भारी है तो स्त्री को दूसरे स्तनों पर भी हाथ फेरकर देखना चाहिए कि कहीं दूसरा स्तन भी तो भारी नहीं है। यदि दोनों स्तनों में कुछ असमानता नजर आती है तो घबराएं नहीं। स्तन कैंसर के रोगी को डॉक्टर से उचित सलाह लेनी चाहिए और बिल्कुल लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए क्योंकि यह रोग बढ़कर अधिक खतरनाक बन सकता है।
स्तनों की निम्नलिखित तरीकों द्वारा जांच की जा सकती है-
स्त्रियों को अपनी स्तनों की जांच करने के लिए सबसे पहले आईने के सामने खड़े हो जाना चाहिए और अपने दोनों हाथों को बगल में लटका लेना चाहिए और देखना चाहिए कि दोनों स्तन दिखने में असामान्य तो नहीं है, स्तनों में डिम्पल या सिकुड़न आदि तो नहीं है या फिर स्तनों की त्वचा या बनावट में कोई फर्क तो नहीं है।
आईने के सामने खड़े होकर स्त्रियों को अपने हाथ सिर के ऊपर रख लेने चाहिए और अपने आप को अलग-अलग कोणों में देखना चाहिए कि स्तनों में कोई विशेष परिवर्तन तो नहीं हो गया है तथा फिर दायें-बायें घूमकर देखना चाहिए और पता लगाना चाहिए कि दोनों स्तनों से कोई स्राव तो नहीं हो रहा है।
स्तनों की जांच करते दौरान यह पता लगाना चाहिए कि निप्पल के चारों ओर के क्षेत्र में कहीं गांठ तो नहीं है।
आईने के सामने खड़े होकर अपने हाथ को ऊपर-नीचे करके देखना चाहिए कि स्तन का कोई भाग सूज तो नहीं रहा है।
स्त्रियों को पलंग पर लेटकर एक तकिया सिर के नीचे रख लेना चाहिए। फिर एक तकिया बाएं कंधे के नीचे रख लेना चाहिए। इसके बाद अपने बाएं हाथ को सिर के नीचे की ओर रख लेना चाहिए और दाहिने हाथ से बाएं स्तन को दबाकर जांच करनी चाहिए कि कहीं उनमें गांठ या सूजन तो नहीं है।
स्त्रियों को अपने बगल में हाथ फिराकर गांठे पकड़ने की कोशिश करनी चाहिए। फिर यही क्रिया दोनों स्तनों पर करनी चाहिए। इस क्रिया में बाएं हाथ का प्रयोग करना चाहिए।
एक्यूप्रेशर चिकित्सा-

(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)
चित्र में दिए गए एक्यूप्रेशर बिन्दु के अनुसार रोगी के शरीर पर दबाव देकर स्त्रियों के स्तन कैंसर का उपचार किया जा सकता है। रोगी स्त्री को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में करना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से स्त्रियों के स्तन कैंसर का उपचार कर सकता है।
जब स्त्रियों के स्तन में गांठ बन जाती है तो स्त्रियों के स्तन के निप्पल के आस-पास सीबेशस ग्रन्थि अर्थात दुग्ध नलिका में द्रव्य के समान थैली बन जाती है। इस थैली को स्तन की गांठ कहते हैं। जब स्त्रियों की सीबेशस ग्रन्थि में जाने वाली कोई वाहिका अवरूद्ध हो जाती है तो उनके स्तन में गांठ सी बन जाती है। इन गांठों के कारण स्तन में थक्का या उभार हो जाता है।
उपचार-
अगर किसी स्त्री के स्तन में गांठ बन जाती है तो उसको तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए और डॉक्टर की उचित सलाह के अनुसार अपना उपचार कराना चाहिए। हो सकता है कि कभी स्तन के अन्दर से सुईयों के द्वारा थैली के अन्दर के अवरूद्ध द्रव्य को बाहर खींचने की जरूरत पड़ जाए। ऐसा करने से यह पता चल जाता है कि गांठ ज्यादा हानिकारक तो नहीं है।
(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)
चित्रों के अनुसार एक्यूप्रेशर बिन्दु पर दबाव देने से स्तन की गांठ जल्दी ठीक हो जाती है। स्त्रियों को अपने स्तन की गांठ का उपचार करने के लिए किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही तरह से दबाव देने का अनुभव होता है और वह इस रोग का उपचार सही तरीके से कर सकता है।
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बंगाल की लड़ाई
बक्सर की लड़ाई
बक्सर का युद्ध बंगाल के नवाब मीर कासिम,अवध के नवाब सुजाउद्दौला व मुग़ल शासक शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना और अंग्रेजों के मध्य लड़ा गया था | यही वह निर्णायक युद्ध था जिसने अंग्रेजों को अगले दो सौ वर्षों के लिए भारत के शासक के रूप में स्थापित कर दिया| यह युद्ध अंग्रेजों द्वारा फरमान और दस्तक के दुरुपयोग और उनकी विस्तारवादी व्यापारिक आकांक्षाओं का परिणाम था|
22 अक्टूबर,1764 ई. को लड़े गए बक्सर के युद्ध में संयुक्त भारतीय सेना की पराजय हुई| बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई |1765 ई. में सुजाउद्दौला और शाह आलम ने इलाहाबाद में कंपनी गवर्नर क्लाइव के साथ संधि पर हस्ताक्षर किये| इस संधि के तहत,कंपनी को बंगाल,बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार प्रदान कर दिए गए, जिसने कंपनी को इन क्षेत्रों से राजस्व वसूली के लिए अधिकृत कर दिया|कंपनी ने अवध के नवाब से कड़ा और इलाहाबाद के क्षेत्र लेकर मुग़ल शासक को सौंप दिए,जोकि अब इलाहाबाद में अंग्रेजी सेना के संरक्षण में रहने लगा था|कंपनी ने मुगल शासक को प्रतिवर्ष 26 लाख रुपये के भुगतान का वादा किया लेकिन थोड़े समय बाद ही कंपनी द्वारा इसे बंद कर दिया गया|कंपनी ने नवाब को किसी भी आक्रमण के विरुद्ध सैन्य सहायता प्रदान करने का वादा किया लेकिन इसके लिए नवाब को भुगतान करना होगा|अतः अवध का नवाब कंपनी पर निर्भर हो गया| इसी बीच मीर जाफर को दोबारा बंगाल का नवाब बना दिया गया| उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र को नवाब की गद्दी पर बैठाया गया| कंपनी के अफसरों ने नवाब से धन ऐंठ कर व्यक्तिगत रूप से काफी लाभ कमाया|
युद्ध के लिए जिम्मेदार घटनाएँ
- ब्रिटिशों द्वारा दस्तक और फरमान का दुरुपयोग,जिसने मीर कासिम के प्राधिकार और प्रभुसत्ता को चुनौती दी
- ब्रिटिशों के आतंरिक व्यापार पर सभी तरह के शुल्कों की समाप्ति
- कंपनी के कर्मचारियों का दुर्व्यवहार : उन्होंने भारतीय दस्तकारों, किसानोंऔर व्यापारियों को अपना माल सस्ते में बेचने के लिए बाध्य किया और रिश्वत व उपहार लेने की परंपरा की भी शुरुआत कर दी|
- ब्रिटिशों का लुटेरों जैसा व्यवहार जिसने न केवल व्यापार के नियमों का उल्लंघन किया बल्कि नवाब के प्राधिकार को भी चुनौती दी|
निष्कर्ष
बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई | ब्रिटिशों की रूचि तीन तटीय क्षेत्रों कलकत्ता ,बम्बई और मद्रास में अधिक थी| अंग्रेजों व फ्र
यूरोप का पुनर्जागरण
यूरोप का पुनर्जागरण - Renaissance in Europe
पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) का शाब्दिक अर्थ होता है, 'फिर से जागना”. चौदहवीं और सोलहवीं शताब्दी के बीच यूरोप में जो सांस्कृतिक प्रगति हुई उसे ही 'पुनर्जागरण” कहा जाता है. इसके फलस्वरूप जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नवीन चेतना आई. यह आन्दोलन केवल पुराने ज्ञान के उद्धार तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इस युग में कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन प्रयोग हुए. नए अनुसंधान हुए और ज्ञान-प्राप्ति के नए-नए तरीके खोज निकाले गए. इसने परलोकवाद और धर्मवाद के स्थान पर मानववाद को प्रतिष्ठित किया. पुनर्जागरण वह आन्दोलन था जिसके द्वारा पश्चिम के राष्ट्र मध्ययुग से निकलकर आधुनिक युग के विचार और जीवन-शैली अपनाने लगे. यूरोप के निवासियों ने भौगोलिक, व्यापारिक, सामजिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्रों में प्रगति की. इस युग में लोगों ने मध्यकालीन संकीर्णता छोड़कर स्वयं को नयी खोजों, नवीनतम विचारों तथा सामजिक, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक उन्नति से सुसज्जित किया. प्रत्येक क्षेत्र में सर्वथा नवीन दृष्टिकोण, आदर्श और आशा का संचार हुआ. साहित्य, कला, दर्शन, विज्ञान, वाणिज्य-व्यवसाय, समाज और राजनीति पर से धर्म का प्रभाव समाप्त हो गया. इस प्रकार पुनर्जागरण उस बौद्धिक आन्दोलन का नाम है जिसने रोम और यूनान की प्राचीन सभ्यता-संस्कृति का पुनरुद्धार कर नयी चेतना को जन्म दिया.
यूरोप में पुनर्जागरण के कारण (Causes of Renaissance in Europe)
1. व्यापार तथा नगरों का विकास
पुनर्जागरण का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण वाणिज्य-व्यापार का विकास था. नए-नए देशों के साथ लोगों का व्यापारिक सम्बन्ध कायम हुआ और उन्हें वहाँ की सभ्यता-संस्कृति को जानने का अवसर मिला. व्यापार के विकास ने एक नए व्यापारी वर्ग को जन्म दिया. व्यापारी वर्ग का कटु आलोचक और कट्टर विरोधी था. व्यापारी वर्ग ने चिंतकों, विचारकों, साहित्यकारों और वैज्ञानिकों को प्रश्रय दिया. इस प्रकार व्यापारी वर्ग की छत्रछाया में ज्ञान-विज्ञान की प्रगति हुई. व्यापार के विकास से नए-नए शहर बसे. इन शेरोन में व्यापार के सिलसिले में अनेक देशों के व्यापारी आते थे. उनके बीच विचारों का आदान-प्रदान होता था. विचारों के आदान-प्रदान से जनसाधारण का बौद्धिक विकास हुआ.
2. पूरब से संपर्क
जिस समय यूरोप के निवासी बौद्धिक दृष्टि से पिछड़े हुए थे, अरब वाले एक नयी सभ्यता-संस्कृति को जन्म दे चुके थे. अरबों का साम्राज्य स्पेन और उत्तरी अफ्रीका तक फैला हुआ था. वे अपने साम्राज्य-विस्तार के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान को भी फैला रखे थे. अरबों से सम्पर्क के कारण पश्चिम वालों को भी लाभ हुआ.
3. मध्यकालीन पंडितपंथ की परम्परा
अरबों से प्राप्त ज्ञान को आधार मानकर यूरोप के विद्वानों ने अरस्तू के अध्ययन पर जोर दिया. उन्होंने पंडितपंथ परम्परा चलाई. इसमें प्राचीनता तथा प्रामाणिकतावाद की प्रधानता थी. प्राचीन साहित्य को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया. विभिन्न भाषाओं में प्राचीन साहित्य का अनुवाद किया गया. इस विचार-पद्धति में अरस्तू के दर्शन की प्रधानता थी.
4. कागज़ तथा मुद्रण कला का आविष्कार
पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) को आगे बढ़ाने में कागज़ और मुद्रणकला का योगदान महत्त्वपूर्ण था. कागज़ और मुद्रणकला के आविष्कार से पुस्तकों की छपाई बड़े पैमाने पर होने लगी. अब साधारण व्यक्ति भी सस्ती दर पर पुस्तकें खरीदकर पढ़ सकता था. पुस्तकें जनसाधारण की भाषा में लिखी जाती थी जिससे ज्ञान-विज्ञान का लाभ साधारण लोगों तक पहुँचने लगा. लोग विभिन्न विचारकों और दार्शनिकों के कृतित्व से अवगत होने लगे. उनमें बौद्धिक जागरूकता आई.
5. मंगोल साम्राज्य का सांस्कृतिक महत्त्व
मंगोल सम्राट कुबलाई खाँ का दरबार पूरब और पश्चिम के विद्वानों का मिलन-स्थल था. उसका दरबार देश-विदेश के विद्वानों, धर्मप्रचारकों और व्यापारियों से भरा रहता था. इन विद्वानों के बीच पारस्परिक विचार-विनमय से ज्ञान-विज्ञान की प्रगति में सहायता मिली. यूरोप के यात्रियों ने गनपाउडर, कागज़ और जहाजी कम्पास की निर्माण-विधि सीखकर अपने देश में इनके प्रयोग का प्रयत्न किया. इस प्रकार मंगोल साम्राज्य ने पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) को आगे बढ़ाने में वाहन का काम किया.
6. कुस्तुनतुनिया का पतन
1453 ई. में उस्मानी तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया. कुस्तुनतुनिया ज्ञान-विज्ञान का केंद्र था. तुर्कों की विजय के बाद कुस्तुनतुनिया के विद्वान् भागकर यूरोप के देशों में शरण लिए. उन्होंने लोगों का ध्यान प्राचीन साहित्य और ज्ञान की ओर आकृष्ट किया. इससे लोगों में प्राचीन ज्ञान के प्रति श्रद्धा के साथ-साथ नवीन जिज्ञासा उत्पन्न हुई. यही जिज्ञासा पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) की आत्मा थी. कुस्तुनतुनिया के पतन का एक और महत्त्वपूर्ण प्रभाव हुआ. यूरोप और पूर्वी देशों के बीच व्यापार का स्थल मार्ग बंद हो गया. अब जलमार्ग से पूर्वी देशों में पहुँचने का प्रयास होने लगा. इसी कर्म में कोलंबस, वास्कोडिगामा और मैगलन ने अनेक देशों का पता लगाया.
7. प्राचीन साहित्य की खोज
तेरहवीं तथा चौदहवीं शताब्दी में विद्वानों ने प्राचीन साहित्य को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया. इनमें पेट्रार्क (Petrarch), दांते (Dante Alighieri), और बेकन के नाम उल्लेखनीय है. विद्वानों ने प्राचीन ग्रन्थों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया और लोगों को गूढ़ विषयों से परिचित कराने का प्रयास किया.
8. मानववादी विचारधारा का प्रभाव
यूरोप की मध्यकालीन सभ्यता कत्रिमता और कोरे आदर्श पर आधारित थी. सांसारिक जीवन को मिथ्या बतलाया जाता था. यूरोप के विश्वविद्यालयों में यूनानी दर्शन का अध्ययन-अध्यापन होता था. रोजर बेकन (Roger Bacon) ने अरस्तू की प्रधानता का विरोध किया और तर्कवाद के सिद्धांत (the principle of rationalism) का प्रतिपादन किया. इससे मानववाद का विकास हुआ. मानववादियों ने चर्च और पादरियों के कट्टरपण की आलोचना की.
9. धर्मयुद्ध का प्रभाव
लगभग दो सौ वर्षों तक पूरब और पश्चिम के बीच धर्मयुद्ध चला. धर्मयुद्ध के योद्धा पूर्वी सभ्यता से प्रभावित हुए. आगे चलकर इन्हीं योद्धाओं ने यूरोप में पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) की नींव मजबूत की.
10. सामंतवाद का ह्रास
सामंती प्रथा के कारण किसानों, व्यापारियों, कलाकारों और साधारण जनता को स्वतंत्र चिंतन का अवसर नहीं मिलता था. सामंती युद्धों के कारण वातावरण हमेशा विषाक्त रहता था. किन्तु सामंती प्रथा के पतन से जन-जीवन संतुलित हो गया. शान्ति तथा व्यवस्था कायम हुई. शांतिपूर्ण वातावरण में लोग साहित्य, कला एवं व्यापार की प्रगति की और ध्यान देने लगे. शान्तिपूर्ण वातावरण में लोग साहित्य, कला और व्यापार की प्रगति की ओर ध्यान देने लगे. सामंतवाद का ह्रास का महत्त्वपूर्ण परिणाम राष्ट्रीय राज्यों का विकास था. लोगों में राष्ट्रीय भावना का जन्म हुआ.
सनातन
फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...
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