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एक्यूप्रेशर चिकित्सा

स्वास्थ्य और सौन्दर्य का एक्यूप्रेशर चिकित्सा के साथ सम्बन्ध

परिचय-

एक्यूप्रेशर चिकित्सा वह चिकित्सा है जिसमें अपने ही शरीर में पाये जाने वाले बिन्दुओं पर दबाव देकर विभिन्न प्रकार के रोगों का उपचार किया जाता है अर्थात इस चिकित्सा में अपनी अंगुलियों और अंगूठों की सहायता से एक विशेष प्रकार की विधि के द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों से जुडे विशेष संवेदनशील स्थान या प्रतिबिम्ब केन्द्र (शरीर के ऊर्जा नियंत्रक) बिन्दुओं पर दबाव देकर अनेकों रोगों को ठीक किया जाता है। इस चिकित्सा के द्वारा बिना किसी दवाई के रोगों को ठीक किया जाता है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा में निपुणता हासिल करना कोई आम बात नहीं है।

        रोजाना 10 मिनट तक अपनी बाईं हथेली पर सरसों का तेल लगाकर दाएं पैर के तलुवे की मालिश और दाईं हथेली पर सरसों का तेल लगाकर बाएं पैर के तलुवे की मालिश करने से अनेक रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसा करने से शरीर की रोगों से लड़ने की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है तथा शरीर में ऐसी भी शक्तियां आ जाती हैं जो रोगों को ठीक कर देती है।

        यदि कोई मनुष्य सुबह के समय में रोजाना व्यायाम करता है तो उसके शरीर में रोगों से लड़ने की शक्ति आ जाती है तथा उसकी रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। लेकिन व्यायाम करने के लिए भी कुछ नियम होते है जैसे- व्यायाम हमेशा सुबह के समय में करना चाहिए, खाना खाकर तुरन्त व्यायाम नहीं करना चाहिए तथा व्यायाम हमेशा खाली पेट करना चाहिए।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा के लाभ निम्नलिखित है-

  • इस चिकित्सा के द्वारा हाथ-पैरों की ऐंठन तथा दर्द दूर हो जाता है और स्वास्थ्य तथा सौन्दर्य में वृद्धि होती है।
  • इस चिकित्सा की सहायता से पैरों और तलुवों पर मालिश करने से बहुत लाभ मिलता है।
  • इस चिकित्सा के द्वारा शरीर के अंगों के कई रोग ठीक हो सकते हैं।
  • एक्यूप्रेशर चिकित्सा का रोजाना शरीर पर प्रयोग करने से शरीर में बहुत समय के लिए यौवन शक्ति बनी रहती है।
  • इस चिकित्सा के द्वारा पाचनशक्ति में सुधार हो जाता है।
  • मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) तथा कई प्रकार की हडि्डयों के दर्द से छुटकारा मिल जाता है।
  • त्वचा के रोग भी इस चिकित्सा के द्वारा ठीक हो सकते हैं।
  • इस चिकित्सा के द्वारा स्रावी ग्रंथियों की कार्य-प्रणाली में सुधार तथा उसमें होने वाले रोगों का उपचार हो सकता है।
  • इस चिकित्सा के द्वारा दिल का दौरा, लकवा, सायटिका, गठिया, रक्तचाप तथा मधुमेह रोगों का उपचार हो सकता है।
  • एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा मूत्र-प्रणाली में भी सुधार हो सकता है।
  • इस चिकित्सा के द्वारा मस्तिष्क से सम्बन्धित रोग भी ठीक हो सकते हैं।
  • एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा हृदय रोग का उपचार भी आसानी से किया जा सकता है।
  • स्त्रियों के मासिकधर्म के दौरान होने वाले रोगों का उपचार भी एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा किया जा  सकता है।
  • इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक्यूप्रेशर चिकित्सा एक प्रकार की ऐसी चिकित्सा है जिससे मनुष्यों के रोगों का उपचार बिना किसी शुल्क तथा बिना किसी परेशानी के किया जा सकता है और इस उपचार का फायदा भी बहुत अधिक होता है।

मन की सुन्दरता-

        मनुष्य के तन और मन की सुन्दरता के द्वारा ही मनुष्य की जीवनशैली का विकास होता है। यदि किसी मनुष्य के मन में कोई गलत धारणा हो जाती है या वह मनुष्य किसी के प्रति भेद-भाव, ईर्ष्या, जलन रखता है तो उस मनुष्य का मन और तन स्वच्छ नहीं होता है क्योंकि ऐसे मनुष्य अपने आपको हानि तो पहुंचाते ही हैं साथ ही दूसरों का भी नाश करते हैं। इसलिए सभी मनुष्यों को अपने तन और मन को स्वच्छ रखना चाहिए।

        प्रत्येक व्यक्ति को अपने मन और तन की सुन्दरता को बनाये रखने के साथ-साथ कई प्रकार के गुणों को भी अपने अन्दर संजोकर रखना चाहिए जैसे-त्याग, सहनशीलता, क्षमा, सेवा, हृदय की सुन्दरता, स्नेह, करुणा, मानवता तथा समर्पण आदि। यदि किसी मनुष्य में इस प्रकार के गुण नहीं होते हैं तो उस मनुष्य के तन और मन की सुन्दरता का विकास नहीं हो सकता है। इसलिए तन और मन की सुन्दरता के लिए सभी मनुष्यों को इन सभी गुणों का अपने अन्दर समावेश करना चाहिए 

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अपच

 

अपच

परिचय-

कोई व्यक्ति जब भोजन करता है और उसका वह भोजन पचता नहीं है तो वह अपच रोग कहलाता है।

कारण-

अपच रोग के कई कारण होते है जैसे- ज्यादा खेलना, बहुत जल्दी खाना खा लेना, अत्यधिक मसालेदार भोजन अथवा वसायुक्त भोजन लेना। कभी-कभी पेप्टिक अल्सर, पित्त की पथरी या हर्निया आदि के कारण भी अपच का रोग हो जाता है।

लक्षण-

अपच रोग में खाना खाने के बाद पेट में ऐंठन, हल्का-हल्का दर्द, छाती में जलन, खट्टी डकार, जी मिचलाना और बेचैनी की शिकायत हो सकती है।

चिकित्सा-

अपच रोग में एसिडिटी को रोकने के लिए औषधि का प्रयोग करना चाहिए 





हर्पीज रोग

 

गुप्तांगों की हर्पीज

परिचय-

गुप्तांगों का हर्पीज एक कष्टकारक और बार-बार होने वाला संक्रमण है। कहते हैं कि अगर इसका वायरस एक बार शरीर में घुस जाए तो जिंदगी भर शरीर में ही रहता है। किसी-किसी को तो यह वायरस एक बार परेशान करता है मगर कुछ लोगों को तो यह बार-बार परेशान करता रहता है।

कारण-

          गुप्तांगों के हर्पीज रोग का संक्रमण संभोग करने के कारण ज्यादा फैलता है। योनि अथवा गुदा मैथुन के अलावा यह रोग मुखमैथुन करने से भी फैल सकता है।

लक्षण-

          संभोग के द्वारा इस रोग का संक्रमण फैलने के 1 या 2 हफ्ते बाद पीड़ित व्यक्ति की योनि या लिंग पर जलन और खुजली होने लगती है। यह गुदाद्वार में भी फैल सकता है। इस रोग में गुप्तांगों पर छोटे-छोटे छालों का गुच्छा भी देखा जा सकता है। ये छाले 10 से 12 दिनों में ठीक हो जाते हैं। इस रोग में रोगी को हल्का बुखार सा भी हो सकता है और उसके पेड़ू में लगी ग्रन्थियां बढ़ जाती हैं।

चिकित्सा-

          रोगी के शरीर के इस रोग से संक्रमित स्थान पर बने छालों को गुनगुने नमकीन पानी से धोने से आराम मिलता है।

     




सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...