हर्पिस रोग।

मलेरिया maleriya

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मलेरिया

परिचय-

मलेरिया एक प्रकार का बहुत ही खतरनाक रोग है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को अक्सर बहुत तेज बुखार रहता है। इस रोग से रोगी के शरीर में खून की कमी हो जाती है और रक्त वाहिकाओं को बहुत नुकसान पहुंचता है जिसके कारण रोगी बहुत कमजोर हो जाता है तथा उसके शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है और उसे बहुत से कष्टों का सामना करना पड़ता है।

लक्षण-

        मलेरिया रोग हो जाने पर रोगी को सिर में तेज दर्द होता है, पेशियों में दर्द की अवस्था बनी रहती है तथा कपंकंपी के साथ तेज बुखार होने लगता है। रोगी को बुखार तेजी से चढ़ता है तथा उल्टी भी होने लगती है। कुछ समय बाद रोगी के शरीर से तेज पसीना निकलता है तथा शरीर के तापमान में गिरावट आने लगती है। व्यक्ति का बुखार उतरता-चढ़ता रहता है। पेट-दर्द, दस्त, पीलिया और नकसीर छूटना आदि लक्षण मलेरिया के शुरू होने की पहचान है। मलेरिया रोग के शुरुआती लक्षण काफी हद तक फ्लू रोग से मिलते-जुलते हैं।

कारण-

        यह रोग एक प्रकार के सूक्ष्म एक कोशिकीय परजीवी के कारण होता है। यह सूक्ष्म परजीवी मच्छर के शरीर के अन्दर पलता है। जब यह संक्रमित मच्छर किसी व्यक्ति को काटता है तो यह सूक्ष्म एक कोशिकीय परजीवी उस व्यक्ति के शरीर के अन्दर चला जाता है जिसके कारण उस व्यक्ति को मलेरिया का रोग हो जाता है। मलेरिया के रोग को फैलाने वाले परजीवी प्लाजमाडियम प्रजाति से सबंध रखते हैं। इसी प्रजाति का सबसे खतरनाक सदस्य प्लाजमोडियम फालसीपेरम है। इस प्रजाति के दूसरे सदस्यों के द्वारा होने वाले रोग कभी-कभी अधिक घातक नहीं होते हैं

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        यह क्रिया करीब 1 महीने तक करनी चाहिए। व्यस्क व्यक्ति को यह क्रिया रोजाना 5 से 15 मिनट और छोटे बच्चों को 5 से 10 मिनट तक करनी चाहिए। रोगी को चिकित्सक की उचित सलाह लेकर अपना इलाज कराना चाहिए।

हमेशा जवान रहना

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सदा युवा रहना (वृद्धावस्था को रोकना)

परिचय-

हम जानते हैं कि संसार में रहने वाले सभी मनुष्यों की मृत्यु जरूर होती है लेकिन फिर भी अपनी आयु या युवावस्था को अधिक समय तक बनाए रखने के लिए प्रयास किया जा सकता है। अंतिम सांस तक अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखना सभी को अच्छा लगता है। शरीर की चेतना का प्रवाह, जीवन का प्रवाह दाएं हाथ से बाहर निकलता है तथा उसे नियंत्रण में रखने वाला बिन्दु दाएं हाथ की कोहनी और कलाई के बीच एक इंच के वर्तुलाकार में स्थित है। इस वर्तुल पर प्रतिदिन केवल 2 तक मिनट दबाव देने से जीवनीशक्ति बढ़ने लगती है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा दबाव देने से लाभ होता है। इस प्रकार दबाव देने से बहुत समय तक यौवन सुरक्षित रहता है और बुढ़ापा देर से होता है। इस प्रकार का उपचार 40 वर्ष की उम्र के बाद करना बहुत ही जरूरी है

        बूढ़े व्यक्तियों के लिए भी इस तरह का उपचार बहुत लाभकारी रहता है। इससे उनकी जीवनशक्ति बढ़ जाती है तथा उन्हें थकान भी कम लगती है।

        जीवनशक्ति को बढ़ाने के लिए अपने भोजन पर बहुत ही ध्यान देना चाहिए। अपने भोजन में हरे रस वाली सब्जियों, सलाद, फल, दही तथा फलों के रस को उचित मात्रा में उपयोग किया जा सकता है। व्यक्ति को ऐसे भोजन का उपयोग करना चाहिए जो आसानी से पच सके तथा जीवनीशक्ति को बढ़ा सकें। इस प्रकार से रोगी को अपना इलाज कराने से बहुत लाभ मिलता है तथा उसको अपने जीवन में नया आनन्द महसूस होता है। व्यक्ति को दुबारा से यौवन की नई ताजगी महसूस होती है तथा उसका आत्मविश्वास भी बढ़ जाता है।

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खशरा

खसरा

परिचय-

खसरा रोग का संक्रमण बचपन में ही भंयकर रूप ले सकता है। जिन रोगियों को खसरा शुरू में ही हो जाता है उनके शरीर में रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक-क्षमता बहुत कम हो जाती है।

कारण-

          जब इस रोग से पीड़ित व्यक्ति खांसना और छींकता है तो इस रोग के वायरस दूसरे व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और उन्हें इस रोग से पीड़ित बना देते हैं। इस रोग के लक्षण उभरने के बाद लगभग एक हफ्ते तक संक्रमण बना रहता है।

लक्षण-

          खसरे के वायरस शरीर में प्रवेश करने के 7 से 14 दिनों के अन्दर इसके लक्षण नज़र आने लगते है। इस रोग के शुरुआती लक्षणों में बुखार, नाक बहना और आंखों में जलन महसूस होती है। इसके अलावा रोगी को खांसी और गले में खराश भी हो सकती है।

          खसरा रोग की शुरुआत दानों के साथ होती है। इस रोग में रोगी के मुंह के अन्दर लाल, गुलाबी रंग के दाने (जिनके अन्दर मवाद भरी होती है) उभरने लगते हैं। यह दाने सिर व गर्दन पर भी कुछ दिनों के बाद उभरने लगते हैं जो बाद में पूरे शरीर पर हो जाते हैं।

चिकित्सा-

          जब किसी व्यक्ति को खसरे का रोग हो जाता है तो उसे बिस्तर पर लिटा देना चाहिए और उसे पेय (पानी, चाय, रस) पदार्थों का सेवन कराना चाहिए। इस रोग की ज्यादा गम्भीर स्थिति में चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।




कंठमाला

कंठमाला

परिचय-

कंठमाला एक ऐसा रोग है जिसमें संक्रमण शरीर की कई ग्रन्थियों को प्रभावित करता है विशेषकर लार-ग्रन्थियों को।

कारण-

          कंठमाला एक संक्रमित रोग है। इसका संक्रमण किसी के खांसने या बोलने पर लार के कणों के साथ हवा में फैलने लगता है। अगर इस रोग से संक्रमित व्यक्ति लंबे समय तक किसी स्वस्थ व्यक्ति के संपर्क में रहता है तो उस व्यक्ति में इस रोग के संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है। जिसे पहले यह रोग न हुआ हो उसे इस रोग से ग्रस्त रोगी के संक्रमण में आने पर इस रोग की चपेट में आने का खतरा ज्यादा रहता है। ज्यादातर लोगों को कंठमाला रोग बचपन से ही होता है लेकिन बराबर टीके लगवाते रहने से इस यह रोग कम होता जाता है।

लक्षण-

          कंठमाला रोग के संक्रमण को उभरने में 12 से 26 दिन का समय लगता है। जब यह रोग कम होता है तो रोगी को इस रोग का हल्का अहसास होता है। इस रोग में रोगी के जबड़े के पीछे स्थित ग्रन्थियों में हल्का दर्द होता रहता है। इस रोग के गंभीर मामलों में रोगी की ग्रन्थियों में सूजन और जलन हो सकती है। रोगी को बुखार, सिरदर्द और खाना खाने में परेशानी भी हो सकती है। इस रोग के कई मामलों में अंडकोषों में सूजन और नरमाहट पैदा हो सकती है। यह रोग नपुंसकता तक भी पहुंच सकता है। बड़े व्यक्तियों में यह रोग रोगी के अग्न्याशय तक पंहुच सकता है।

चिकित्सा-

          कंठमाला का रोग वैसे तो कुछ दिनों में अपने आप ही ठीक हो जाता है लेकिन इस रोग में होने वाले दर्द से बचने के लिये दर्दनाशक औषधि ले सकते हैं।

         



glucoma

ग्लूकोमा

परिचय-

ग्लूकोमा आंख से संबन्धित रोग है। इस रोग में रोगी की आंखों पर दबाव बना रहता है जो बाद में चक्षुतंत्रिका को खत्म कर देता है। इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति अंधा भी हो सकता है।

कारण-

          आंखों के अन्दर पैदा होने वाले द्रव्यों और उनकी निकासी की प्रक्रिया के बीच एक संतुलन होता है। जब द्रव्यों के निकलने की रफ्तार उनके उत्पादन के मुकाबले धीमी पड़ जाती है तो यह संतुलन बिगड़ जाता है और रोगी की आंख के अन्दर दबाव बढ़ने लगता है।

लक्षण-

          पुराने ग्लूकोमा के लक्षण आमतौर पर दिखते हैं। इसमें आंखों पर दबाव धीरे-धीरे बढ़ता रहता है जिससे रोगी की नजर कमजोर होने लगती है और अंत में रोगी को दिखाई देना बिल्कुल बंद हो जाता है।

          तेज ग्लूकोमा रोग में आंखों पर दबाव बहुत तेजी से बढ़ता है और आंखों में दर्द व लालपन सा भी नजर आता है। रोगी की नजर कमजोर और धुंधली हो जाती है। ज्यादा गंभीर स्थिति में रोगी को जी मिचलाना, उल्टी, पेट दर्द और सिरदर्द की शिकायत भी हो सकती है।

चिकित्सा-

          ग्लूकोमा रोग होने का खतरा 40 वर्ष से अधिक आयु वाले व्यक्तियों को होता है। इसलिए इस उम्र के बाद लगभग हर 2 साल में आंखों की जांच करवाते रहना चाहिए। जिन लोगों के घर में पहले कभी किसी को ग्लूकोमा का रोग हुआ है तो उनके संम्पर्क में रहने वाले लोगों को भी इसका खतरा ज्यादा रहता है।

चिकित्सा-

       

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अंतःकरण स्रावी ग्रंथियां

अन्त:स्रावी रसोत्पादक नलिकाहीन ग्रंथियां और इन ग्रंथियों का प्रभाव

परिचय-

मनुष्य के शरीर में 2 प्रकार की ग्रंथियां होती हैं और इन ग्रंथियों के द्वारा ही पूरे शरीर की क्रिया का संचालन होता है। यदि इन ग्रंथियों के कार्य में किसी प्रकार की कमी आ जाती है तो शरीर का विकास रुक जाता है तथा शरीर में कई प्रकार के रोग पैदा हो जाते हैं।

ग्रंथियां 2 प्रकार की होती हैं-

        एक वह ग्रंथि होती है जो अपने में बनने वाले रस को नलिकाओं द्वारा शरीर के विशेष भागों तक पहुंचाती है।

        दूसरी वह ग्रंथि होती है जो अपने द्वारा बनाये गए रस को नलिकाओं द्वारा नहीं बल्कि सीधा रक्त के द्वारा शरीर के विभिन्न आंतरिक अंगों तक पहुंचाती है।

        ये ग्रंथियां शरीर में हार्मोन्स का निर्माण करती हैं। इन ग्रंथियों में उत्पन्न होने वाले उत्तेजक रस शरीर की वृद्धि, यौन संतुलन, मांसपेशियों के संचालन, पोषण तथा अन्य ग्रंथियों की क्रियाओं के नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि किसी तरह से अन्त:स्रावी ग्रंथियों की कार्यप्रणाली में विकार आ जाता है तो शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग हो जाते हैं तथा शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है।

        यदि किसी प्रकार से अन्त:स्रावी ग्रंथियों के उत्तेजक रस में किसी प्रकार की कमी या अधिकता हो जाए तो इससे मनुष्य की मानसिक योग्यता, शारीरिक गठन तथा साहस आदि गुण भी कम हो जाते हैं तथा इसके साथ-साथ व्यक्ति के व्यवहार में भी बदलाव हो जाता है। शरीर में पाई जाने वाली ये ग्रंथियां इतनी शक्तिशाली और प्रभावकारी होती हैं कि ये किसी भी पुरुष तथा स्त्री के जीवनशैली में परिवर्तन ला सकती हैं।

        अन्त:स्रावी ग्रंथियां हमारे शरीर के विभिन्न भागों में नाक की सीध में लगभग मध्य भाग में होती हैं। इन ग्रंथियों के कार्य प्रणाली का आपस में घनिष्ट सम्बन्ध होता है तथा ये ग्रंथियां एक-दूसरे की पूरक तथा संचालक होती हैं।

अन्त:स्रावी ग्रंथियों के नाम और यह शरीर के रोगों को किस प्रकार ठीक करती है-

पिट्यूटरी ग्रंथि-

        पिट्यूटरी ग्रंथि मनुष्य के शरीर में मस्तिष्क के नीचे होती है। यह ग्रंथि आकार में मटर के दाने से भी छोटी होती है। इस ग्रंथि की विशेषता बहुत अधिक होती है क्योंकि यह ग्रंथि सभी ग्रंथियों का संचालन करती है। यह ग्रंथि 3 भागों में बंटी होती है और कई प्रकार के रसों को छोड़ती है। इसके द्वारा छोड़े गए कुछ रस दूसरी ग्रंथियों को उत्तेजित कर देते हैं जिससे कि वे सभी ग्रंथियां ठीक प्रकार से कार्य कर सके। यदि किसी प्रकार से इस ग्रंथि का कार्य रुक जाता है तो शरीर के विकास में बहुत प्रभाव पड़ता है। इस ग्रंथि के कारण ही शरीर की हडि्डयों का विकास होता है। यदि किसी प्रकार से इस ग्रंथि से अधिक रस निकलता है तो शरीर असाधारण रूप से आकार में बड़ा हो जाता है और जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य का धड़ तो साधारण रूप में पर भुजाएं, पैर तथा टांगे अपेक्षाकृत अधिक बड़े हो जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति की यह ग्रंथि अधिक सुस्त पड़ जाती है या फिर जरूरत से कम रस का निर्माण करती है तो शरीर की हडि्डयों की वृद्धि सामान्य रूप से विकसित नहीं हो पाती है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति बौना रह जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि किसी भी व्यक्ति के शरीर का सही विकास उसकी इस ग्रंथि पर निर्भर करता है।

        पिट्यूटरी ग्रंथि शरीर में पाई जाने वाली अन्य ग्रंथियों की सहायता से शरीर में शक्कर बनने तथा चर्बी बनने पर नियंत्रण करती है। यदि यह ग्रंथि ठीक प्रकार से काम नहीं करती है तो व्यक्ति को मधुमेह रोग हो जाता है। इस ग्रंथि के द्वारा ही बच्चों के शरीर का विकास, शरीर में कैल्शियम का बनना तथा हडि्डयों की वृद्धि होती है। इस ग्रंथि के द्वारा ही मनुष्य की मानसिक प्रतिभा, रक्त का दबाव, जनन-संस्थान की वृद्धि, पुरुषों तथा स्त्रियों की जननेन्द्रियों तथा यौन-लक्षणों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।  

        इस ग्रंथि के कार्य करने में किसी प्रकार की कमी आ जाती है तो रोगी को शरीर में कमजोरी, अधिक पेशाब आना, अधिक प्यास लगना तथा बाल झड़ना तथा शरीर का न बढ़ना आदि रोग हो जाते हैं।

        यदि एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा इस ग्रंथि से सम्बन्धित प्रतिबिम्ब केन्द्र बिन्दु (जो हाथों तथा पैरों के अंगूठों के अग्रभागों में होते हैं) पर प्रेशर दें तो इस ग्रंथि से सम्बन्धित रोगों को ठीक किया जा सकता है। इस ग्रंथि को सक्रिय करने के लिए बाएं से दाएं भाग पर प्रेशर देना चाहिए तथा इसकी कार्यगति को कम करने के लिए दाएं से बाएं भाग पर प्रेशर देना चाहिए। इससे इसकी कार्य करने की गति सामान्य हो जाती है।

        शरीर में पिट्यूटरी ग्रंथि ठीक प्रकार से कार्य कर रही है या नहीं इसका पता खून की जांच कराने से चल जाता है। जांच के दौरान कौन सी ग्रंथि ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर रही है उसका भी पता खून की जांच कराने से चल जाता है। यदि यह ग्रंथि ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर रही है तो इसकी कार्य करने की गति को एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा ठीक किया जा सकता है।

(एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा पिट्रयूटरी ग्रंथि के कार्य को ठीक करने का चित्र)

        इस चित्र की सहायता से रोगी के शरीर पर प्रेशर देकर पिट्रयूटरी ग्रंथि की कार्यगति को सुधारा जा सकता है जिसके फलस्वरूप कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।

थाइरॉयड ग्रंथि-

        यह ग्रंथि गहरे लाल रंग की होती है तथा कंठ के नीचे गले की जड़ में 2 खण्डों में बंटी होती है। यह ग्रंथि शरीर को शक्ति तथा फुर्तीलापन प्रदान करती है। इस ग्रंथि का पाचनक्रिया से सम्बन्ध है तथा यह शरीर में आक्सीजन के उपभाग को नियंत्रित करके कार्बन-डाइआक्साइड के चालन गति को प्रभावित करती है।

        यदि इस ग्रंथि के द्वारा हार्मोन्स का कम स्राव होता है तो रोगी का वजन बढ़ने लगता है तथा उसके शरीर में सूजन आ जाती है। उसके शरीर में विभिन्न प्रकार की गतियां, बोलने तथा सोचने की शक्ति कम पड़ जाती है, सिर के बाल झड़ने लगते हैं और गंजेपन जैसी अवस्था पैदा हो जाती है, त्वचा स्थूल तथा शुष्क हो जाती है और शरीर का तापमान कम होने लगता है और शरीर में अनेक रोग हो जाते हैं।

        यदि इस ग्रंथि का स्राव सामान्य से अधिक हो जाता है तो शरीर का तापमान बढ़ने लगता है, गर्मी को सहन करने की शक्ति कम हो जाती है, वजन घटने लगता है, घबराहट होने लगती है तथा हाथ-पैर कांपने लग जाते हैं। इसके अधिक स्राव के कारण व्यक्ति छोटी-छोटी बात पर उत्तेजित हो जाता है तथा उसकी नाड़ी की गति बढ़ जाती है।

        थाइरॉयड ग्रंथि के सामान्य स्राव में आयोडीन की मात्रा होती है लेकिन ऐसे इलाके जहां पानी में आयोडीन की मात्रा कम रहती है वहां के लोगों में गलगण्ड जैसे रोग हो जाते हैं। इस अवस्था के कारण थाइरॉयड ग्रंथि का आकार बढ़ जाता है। ऐसे क्षेत्रों में आयोडीन की कमी होने पर वहां के लोगों को आयोडाइजड नमक खाने को कहा जाता है। यदि इस ग्रंथि का थोड़ा सा भाग काटकर निकाल दिया जाए तो इसके कारण मनुष्य का चाल-चलन, रहने का ढंग, स्वभाव प्रभावित होता है और शरीर में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं।

        इस ग्रंथि के कारण दाम्पत्य जीवन में बहुत प्रभाव पड़ता है क्योंकि ऐसे पति-पत्नी जिनकी थाइरॉयड ग्रंथि एक दूसरे के विपरीत हो तथा उत्तेजित हो, उनके स्वभाव में परस्पर तालमेल होना बहुत मुश्किल हो जाता है।

        कोई भी व्यक्ति थाइरॉयड टेस्ट कराकर पता लगा सकता है कि उसकी यह ग्रंथि ठीक प्रकार से कार्य कर रही है या नहीं। कभी-कभी ऐसा होता है कि पिट्रयूटरी ग्रंथि के ठीक प्रकार से कार्य न करने के कारण इस ग्रंथि में दोष उत्पन्न हो जाता है इसलिए यह ग्रंथि सही तरीके से कार्य नहीं करती है।

        एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा इस ग्रंथि से सम्बन्धित प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर प्रेशर देकर इसकी कार्यक्षमता को सही किया जा सकता है।

(एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा थाइरॉयड ग्रंथि के कार्य को ठीक करने का चित्र)

        थाइरॉयड तथा पैरा-थाइरॉयड ग्रंथियों के प्रतिबिम्ब बिन्दु हाथ-पैरों के अंगूठों के बिल्कुल नीचे तथा अंगूठों के ऊंचे उठे हुए भाग में पाए जाते हैं। इस भाग में एक्यूप्रेशर चिकित्सा के अनुसार प्रेशर देने से इस ग्रंथि के सही से कार्य करने की शक्ति को बढ़ाया जा सकता है। इस ग्रंथि से सम्बन्धित बिन्दुओं पर दबाव देने से कई प्रकार के रोग भी ठीक हो जाते हैं। इस ग्रंथि से सम्बंधित प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर दबाव देने के साथ-साथ पिट्रयूटरी ग्रंथि से सम्बन्धित प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर भी दबाव देना चाहिए। इससे रोगी को बहुत लाभ मिलता है।

पैरा-थाइरॉयड ग्रंथि-

        थाइरॉयड ग्रंथि के पीछे की ओर 2-2 ग्रंथियां होती हैं जिन्हें पैरा-थाइरॉयड ग्रंथियां कहते हैं। इन ग्रंथियों के अन्दर वसा होती है लेकिन आयोडीन नहीं होती है। इन ग्रंथियों में सबसे अधिक शरीर का रक्तमय अंग होता हैं तथा ये रक्त के कुछ रासायनिक तत्वों को ठीक रखने में सहायक होती हैं। इस ग्रंथि के द्वारा ही शरीर में कैल्शियम की मात्रा का संतुलन बना रहता है। अगर इस ग्रंथि की क्रिया में कोई कमी हो जाती है तो शरीर की हडि्डयां कमजोर पड़ जाती हैं और शीघ्र ही हडि्डयां टूट जाती हैं तथा शरीर में कई प्रकार के जोड़ों का दर्द होना शुरू हो जाता है। इन ग्रंथियों के कार्य में कमी आ जाने के कारण गुर्दे में पथरी भी बनने लगती है।

        डॉक्टरों से जांच करने से पता चल जाता है कि पैरा-थाइरॉयड ग्रंथि सही तरीके से कार्य कर रही है या नहीं। यदि यह सही तरीके से नहीं कार्य कर रही है तो एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा इसका उपचार किया जा सकता है।

(एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा पैरा-थाइरॉयड ग्रंथि के कार्य को ठीक करने का चित्र)

        दिये गए चित्र के अनुसार पैरा-थाइरॉयड ग्रंथि के हाथों तथा पैरों में वही प्रतिबिम्ब केन्द्र हैं जो कि थाइरॉयड ग्रंथि के तथा पिट्रयूटरी ग्रंथि के हैं। इन बिन्दुओं पर एक्यूप्रेशर चिकित्सा के अनुसार प्रेशर देने से इसकी क्रिया सही हो जाती है तथा इसके सही से काम नहीं करने से होने वाले रोग भी ठीक हो जाते हैं।

थाइमस ग्रंथि-

        यह ग्रंथि मनुष्य की गर्दन के नीचे तथा हृदय से कुछ ऊपर की ओर पाई जाती है। यह ग्रंथि 2 वर्ष की आयु में विकसित होती है और 14 वर्ष की आयु तक इस ग्रंथि के पिण्ड धीरे-धीरे चर्बी में लुप्त होने लगते हैं। इस ग्रंथि के द्वारा ही छोटे बच्चों के शरीर का विकास होता है और इस ग्रंथि के द्वारा ही ज्ञाननेन्द्रियों का विकास भी होता है।

        यदि थाइमस ग्रंथि युवावस्था के व्यक्तियों में लुप्त न हो तो व्यक्ति के शरीर में बड़ा विकार आ जाता है और व्यक्ति को छोटी सी भी चोट लग जाती है तो उसकी मृत्यु हो जाती है।

        एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा इसके प्रतिबिम्ब केन्द्र बिन्दु, जो गर्दन के नीचे और हृदय से कुछ ऊपर होते है, उन पर प्रेशर देने से व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ होता है।

डिम्ब-ग्रंथियां-

        डिम्ब-ग्रंथियां स्त्रियों के प्रजनन अंगों के कार्य करने में बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इनमें 2 अंडाशय होते हैं। ये ग्रंथियां स्त्रियों के गर्भाशय के दोनों ओर पाई जाने वाले नलिकाओं के नीचे की ओर पाई जाती हैं। जब कोई लडकी 12 वर्ष की होती है तो उसकी इन ग्रंथियों में से एक डिम्ब प्रत्येक महीने पककर गर्भाशय नलिका के अन्दर पहुंच जाता है। स्त्री के गर्भाशय के अन्दर पुरुष का एक शुक्राणु इस डिम्ब से मिलकर एक जीव का निर्माण करता है जिसके कारण स्त्री गर्भवती हो जाती हैं।

        इन ग्रंथियों के द्वारा डिम्ब का भंडार करने और डिम्ब को पकाने के अलावा इसमें पाई जाने वाली डिम्ब-ग्रंथियां हार्मोन्स का निर्माण करती हैं जिन्हे एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्ट्रोन कहते हैं। इस ग्रंथियों के द्वारा ही स्त्रियों के शरीर का विकास होता है। यदि इस ग्रंथि के कार्य में कोई कमी आ जाती है तो स्त्रियों के शरीर में कई प्रकार के रोग हो जाते हैं।

        एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा इस ग्रंथि की कार्य प्रणाली को सुधारा जा सकता है जिससे स्त्रियों के शरीर के कई रोग ठीक हो सकते हैं। इस ग्रंथि से सम्बन्धित प्रतिबिम्ब बिन्दु हाथ तथा पैरों में होते हैं। इन प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर प्रेशर दिया जाए तो इसकी कार्य-प्रणाली में सुधार हो सकता है जिसके फलस्वरूप स्त्रियों के कई प्रकार के रोग ठीक हो सकते हैं।

आड्रेनल-उपवृक्क ग्रंथियां-

        ये ग्रंथियां शरीर के दोनों गुर्दों के ऊपर एक टोपी के आकार में पाई जाती हैं। इन ग्रंथियों द्वारा छोड़ा गया रस मनुष्य की जीवन-शक्ति के लिए बहुत ही आवश्यक है क्योंकि यह खून में दबाव तथा मांसपेशियों पर प्रभाव डालता है। इन ग्रंथियों के प्रभाव के कारण ही मनुष्य साहसी या डरपोक बनता है। इन ग्रंथियों द्वारा अगर अधिक रस निकलता है तो खून का दबाव बढ़ जाता है तथा पेट में पित्त की अधिकता हो जाती है, पेट में गैस बनने लगती है और मोटापा रोग हो जाता हैं। यदि इस ग्रंथि के कार्य में कोई कमी हो जाती है तो व्यक्ति की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं तथा उसके शरीर में रक्त का दबाव कम हो जाता है और शरीर में कमजोरी आ जाती है तथा शरीर की नाड़ियों में रोग हो जाता है।

        इसकी कार्य शक्ति को सही तरीके से चलाने के लिए एक्यूप्रेशर चिकित्सा का सहारा ले सकते हैं। एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा इस ग्रंथि से सम्बन्धित प्रतिबिम्ब बिन्दु पैरों तथा हाथों में होते हैं जैसा कि चित्र में दिया गया है।

(एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा आड्रेनल-उपवृक्क ग्रंथियों के कार्य को ठीक करने का चित्र)

        इस चित्र के अनुसार दिए गए बिन्दुओं पर प्रेशर देने से आड्रेनल-उपवृक्क ग्रंथियों के कार्य करने की शक्ति सही तरीके से चलने लगती है तथा इसके सही तरीके से कार्य न करने से होने वाले रोग ठीक हो जाते हैं।

अगन्याशय ग्रंथि (Pancreas)-

        यह ग्रंथि एक प्रकार की दोहरी ग्रंथि होती है। इस ग्रंथि का एक भाग पाचनप्रणाली के लिए पाचक रस का निर्माण करता है तथा दूसरा भाग इंसुलिन रस बनाता है। अगन्याशय ग्रंथि का आकार अंग्रेजी के अक्षर J के समान होता है। इंसुलिन शरीर में शर्करा को ग्रहण करने में मदद करता है और शरीर में शर्करा की मात्रा पर नियंत्रण रखता है। यदि इसकी कार्य प्रणाली में कोई कमी आ जाती है तो शरीर में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है जिसके कारण मधुमेह रोग हो जाता है।

        इस ग्रंथि की कार्य प्रणाली को सही तरीके से कार्य कराने के लिए एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा उपचार किया जा सकता है। इस ग्रंथि के प्रतिबिम्ब हाथ तथा पैरों के तलुवों पर पाए जाते हैं। जिन पर एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा प्रेशर देने से अग्न्याशय ग्रंथि की कार्य प्रणाली सुधर जाती है। जिसके परिणामस्वरूप इसके ठीक से कार्य न करने पर होने वाले रोग ठीक हो जाते हैं।

अण्डकोष-

        अण्डकोष पुरुषों में होते हैं। यह लिंग के दोनों ओर एक-एक होते हैं। और आपस में जुड़े रहते हैं। यह आकार में अण्डे जैसे होते हैं। इन अण्डकोषों को जनन-अंग कहते हैं। इन अण्डकोषों के द्वारा ही शुक्राणुओं की उत्पत्ति होती है। दोनों अण्डकोषों से पुरुष हार्मोन्स टेस्टोस्टीरोन का अन्त:स्राव होता है।

        अण्डकोष की कार्य प्रणाली में सुधार करने के लिए इससे सम्बन्धित केन्द्र बिन्दुओं पर एक्यूप्रेशर चिकित्सा के अनुसार दबाव देने से इसके कार्य करने की शक्ति में सुधार हो जाता है तथा इस ग्रंथि के सही से कार्य न करने के कारण होने वाले रोग ठीक हो जाते हैं।

पीनियल ग्रंथि-

        यह ग्रंथि मस्तिष्क के अन्दर के आधे-गोलार्द्धो के पीछे की ओर होती है। इस ग्रंथि के द्वारा ही मनुष्य की जवानी बनी रहती है। इस ग्रंथि का जनन-अंगों से सम्बन्ध बना रहता है। इस ग्रंथि के द्वारा ही शरीर में पानी, सोड़ियम तथा पोटेशियम की मात्रा का संतुलन बना रहता है। यदि यह ग्रंथि आपना कार्य सही तरीके से नहीं करती है, तो शरीर बहुत अधिक फूल जाता है।

        एक्सूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा पीनियल ग्रंथि के कार्य प्रणाली में सुधार किया जा सकता है।


   



नसे की लत

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नशीले पदार्थों के कारण होने वाले रोग

परिचय-

वर्तमान समय में युवा पीढ़ी को यदि किसी आदत ने बहुत अधिक नुकसान पहुंचाया है तो वह है नशीले पदार्थों को सेवन करने की आदत। गांजा, भांग, चरस, ब्राउन शूगर, हेरोइन आदि नशे की चीजों की आदत पड़ जाने के कारण व्यक्ति को कई प्रकार के रोग हो जाते हैं जैसे- उल्टी आना, शरीर का कमजोर पड़ जाना, अधिक पसीना आना, चक्कर आना, सिर में दर्द होना आदि। यदि किसी व्यक्ति को इनमें से किसी भी नशे की आदत पड़ जाए तो उस व्यक्ति को इस नशे की आदत छोड़ने में बहुत ही मुश्किल होती है और यदि उस व्यक्ति की नशे की आदत छुड़ाने की कोशिश की जाए तो पीड़ित व्यक्ति पर इसका साइड इफेक्ट हो जाता है। इसके अलावा नशा करने वाले व्यक्ति को सिर में दर्द, कमजोरी, चक्कर आना या उल्टी जैसी लक्षण घेर लेते हैं।


इन नशीले पदार्थों की लत को छुड़ाने के बाद व्यक्ति पर होने वाले प्रभाव को व्यक्ति के ऊपर कम करने के लिए एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा नई आशाएं जाग चुकी हैं। एक्यूप्रेशर चिकित्सा के अनुसार चित्र में दिए गए प्रतिबिम्ब बिन्दुओं पर दबाव देने से नशीले पदार्थों के सेवन करने की आदत में कमी आ जाती है तथा व्यक्ति को इसका बहुत लाभ मिलता है।

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पति-पत्नी के अनबन को दूर करने के लिए उपाय

जोड़े कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ते-झगड़ते हैं

कुछ जोड़े कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ते-झगड़ते रहते हैं, जिनके कारण उनका वैवाहिक जीवन एकदम खराब हो जाता है। इसे दूर करने के लिए आप सूर्योदय से पहले स्नान आदि के बाद किसी मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ाएं और इस मंत्र का जाप करें।

ओम् नम: संभवाय च मयो भवाय च नम:
शंकराय च मयस्कराय च नम: शिवाय च शिवतराय च।।

पति-पत्नी के मतभेद को दूर करने के लिए कुछ लोग मंत्र जाप का भी सहारा लेते हैं। कहते हैं यदि यह जप विधि-विधान से किया जाए तो पति-पत्नी के बीच कभी अनबन नहीं होती साथ ही प्रेम भी बढ़ता है।

अक्ष्यौ नौ मधुसंकाशे अनीकं नौ समंजनम्।
अंत: कृणुष्व मां ह्रदि मन इन्नौ सहासति।।
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लू लगना , गर्मी में लू लगता है

लू लगना

परिचय-

जब किसी व्यक्ति का शरीर जरूरत से ज्यादा गर्म हो जाता है तो इस अवस्था को लू लगना कहते हैं। इस प्रकार के रोग का इलाज यदि समय पर नहीं कराया जाता तो यह शरीर के लिए काफी घातक (खतरनाक) सिद्ध हो सकता है। इस रोग से अधिकतर वे लोग पीड़ित होते हैं जो ज्यादातर गर्म जलवायु वाले भागों में रहते हैं। इस रोग के होने का खतरा छोटे बच्चों तथा बूढ़े व्यक्तियों को अधिक होता है।

कारण-

  • ज्यादा देर तक तेज धूप में रहने से शरीर का तापमान बढ़ जाता है जिसके कारण शरीर में 2 परिवर्तन होते हैं-
  • तेज धूप में रहने के कारण शरीर से काफी ज्यादा पसीना निकलता है जिसके कारण शरीर में पानी की कमी हो जाती है तथा कमजोरी आ जाती है।
  • तेज धूप में रहने के कारण शरीर में तापमान को नियन्त्रित करने वाली प्रणाली नष्ट हो जाती है जिससे शरीर का तापमान बढ़ जाता है।
  • इस रोग के होने के और भी कई कारण हैं जैसे- ज्यादा भोजन करना, बहुत अधिक शराब का सेवन करना, अत्यधिक थकाने वाले व्यायाम करना तथा मौसम के अनुसार कपड़े न पहनना आदि।

लक्षण-

        इस रोग के होने की शुरुआती पहचान शरीर का तापमान बढ़ने से होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी की त्वचा का रंग उड़ जाता है तथा उसकी त्वचा ठंडी और चिपचिपी हो जाती है। इस रोग में रोगी के शरीर से बहुत अधिक पसीना निकलता है तथा उसे अत्यधिक कमजोरी, सिरदर्द, सुस्ती, नाड़ी का तेज चलना तथा उल्टियां होने लगती हैं। जब रोगी का रोग बहुत अधिक बढ़ जाता है तो उसके शरीर से पसीना निकलना कम हो जाता है या रुक जाता है। रोगी के शरीर की त्वचा गर्म, सूखी और लाल सी हो जाती है। रोगी की नाड़ी तेज चलने लगती है और कमजोर हो जाती है। इस रोग के और भी कई लक्षण है जैसे- सिर में दर्द रहना, शरीर में कमजोरी आ जाना तथा जी मिचलाना आदि।

उपचार-

        यदि लू लगना रोग से पीड़ित व्यक्ति की अवस्था ज्यादा गंभीर हो तो तुरंत चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति के शरीर के तापमान को घटाने का उपाय करना चाहिए अर्थात रोगी को ठंडक देनी चाहिए और उसके शरीर की पानी की कमी को जल्दी पूरा कराना चाहिए। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति के शरीर से तुरंत गर्म कपड़ों को उतारकर उसे ठंडी जगह पर सीधा लिटा देना चाहिए। लू से पीड़ित व्यक्ति के शरीर का तापमान तथा नब्ज को मापना चाहिए। रोगी को तब तक पौष्टिक द्रव्य पदार्थों का सेवन कराते रहना चाहिए जब तक की वह ठीक न हो जाए। यदि रोगी की अवस्था बहुत अधिक गंभीर हो तो उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।

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सनातन

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