पेट दर्द abdomen pen

पेट दर्द 

गलत खान पान अथवा अपच के कारण होने वाले पेट दर्द के लिए आयुर्वेद में कुछ नुस्खे बताए गये हैं ! जिनका अगर प्रयोग किया जाए तो पेट दर्द कि परेशानी से बचा जा सकता है ! हालांकि इस तरह के पेट दर्द के लिए आज भी हमारे घरों में आयुर्वेदिक नुस्खे काम में लाये जाते हैं और उनसे आराम भी मिलता है ! ऐसे ही कुछ नुस्खे : -

1 . अदरक और लहसुन को बराबर कि मात्रा में पीसकर एक चम्मच कि मात्रा में पानी के साथ सेवन करने से पेट दर्द में लाभ मिलता है !

2 . एक ग्राम काला नमक और दो ग्राम अजवायन गर्म पानी के साथ सेवन करने से पेट दर्द में लाभ मिलता है !

3 . अमरबेल के बीजों को पानी से पीसकर बनाए गये लेप को पेट पर लगाकर कपडे से बाँधने से गैस कि तकलीफ , डकारें आना , अपानवायु न निकलना , पेट दर्द और मरोड़ जैसे कष्ट दूर हो जाते हैं !

4 . सौंठ , हींग और कालीमिर्च का चूर्ण बराबर कि मात्रा में मिलाकर एक चम्मच कि मात्रा में गर्म पानी के साथ लेने से पेट दर्द में तुरंत आराम मिलता है !

5 . जटामांसी , सौंठ , आंवला और काला नमक बराबर कि मात्रा में पीस लें और एक एक चम्मच कि मात्रा में तीन बार लेने से भी पेट दर्द से राहत मिलती है !

6 . जायफल का एक चौथाई चम्मच चूर्ण गर्म पानी के साथ सेवन करने से भी पेट दर्द में आराम पहुँचता है !

7 . पत्थरचट्टा के दो तीन पत्तों पर हल्का नमक लगाकर या पत्तों के एक चम्मच रस में सौंठ का चूर्ण मिलाकर खिलाने से पेट दर्द से राहत मिलती है !

8 . सफ़ेद मुसली और दालचीनी को समभाग में मिलाकर पीस लें ! एक चम्मच कि मात्रा में पानी के साथ सेवन करने से 2-3 खुराक में ही पूरा आराम मिल जाता है ! 

गर्भ धारण कराना

गर्भधारण (गर्भस्थापित कराना) 
किसी भी महिला तब तक महिला नही है, जब तक वह अपने बच्चे को जन्म न दे दे, 
जब तक औरत मां नही बनती संसार में उसके लिए कोई जगह नहीं है

चिकित्सा:

1. मोरछली: मोरछली की छाल का चूर्ण खाने से गर्भ ठहरता है।

2. केसर: केसर और नागकेसर को 4-4 ग्राम की मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। इसकी तीन पुड़िया मासिक-धर्म समाप्त होने के तुरंत बाद खाने से गर्भ स्थापित होता है।

3. हंसपदी: हंसपदी को बारीक पीसकर पीने से स्त्री का गर्भ स्थापित होता है।

4. शंखावली: शंखाहुली या इसके पंचांग के सेवन करने से गर्भ की स्थापना अवश्य होती है।

5. गोरखमुण्डी: गोरखमुण्डी और जायफल बारीक पीसकर सेवन करने से सन्तान की अवश्य ही प्राप्ति होती है।

6. समुद्रफेन: समुद्रफेन को दही के साथ खाने से निश्चय ही गर्भ धारण होता है।

7. समुद्रफल: समुद्रफल और अजवायन के सेवन से गर्भधारण अवश्य ही होता है।

8. खिरैटी: मासिक-धर्म में सफेद खिरेटी, मुलहठी तथा मिश्री मिलाकर गाय के दूध के साथ सेवन करने से गर्भ अवश्य ठहरता है।

9. सोंठ: सोंठ, मिर्च, पीपल और नागकेशर का चूर्ण घी के साथ माहवारी समाप्ति के बाद स्त्री को सेवन कराने से गर्भ ठहर जाता है।

10. सरसो: सफेद सरसो, बच, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, गदहपुरैना, दूधी, कूठ, मुलहठी, कुटकी, खंभारी के फल, फालसा, अनन्तमूल, कालीसर, हल्दी, भंगरा, देवदारू, सूर्यमुखी, मंजीठ, त्रिफला, प्रियंगु के फूल, अड़ूसा के फूल तथा गेरू सभी को 2 किलो गाय के घी में मिलाकर गर्म करें। इसे 20 से 40 ग्राम की मात्रा में पुरुष तथा ऋतुस्नाता स्त्री भगवान का स्मरण कर इस घी का सेवन करें तो इससे गर्भसम्बंधी सभी गुप्तांग रोग नष्ट होते हैं तथा बांझ स्त्री भी पुत्र उत्पन्न करने के योग्य हो जाती है।

11. कटेली: सफेद कटेली की जड़ रविवार को पुष्य नक्षत्र में लाए छाया में सुखाकर जड़ का बक्कल (छिलका) उतारकर कूटकर छान लें। इसे 10 ग्राम की मात्रा में गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध से सुबह माहवारी शुरू होने के दिन से 3 दिनों तक लगातार प्रयोग करना चाहिए।

12. तुलसी: तुलसी के बीज 5 ग्राम पानी के साथ मासिक-धर्म शुरू होने के पहले दिन से 3 दिनों तक नियमित सेवन कराना चाहिए। इस प्रयोग से गर्भ ठहरता है।

13. निर्गुण्डी: निर्गुण्डी की 10 ग्राम मात्रा को लगभग 100 मिलीलीटर पानी में रात को भिगोकर रख दें। सुबह उसे उबालें, जब यह एक चौथाई रह जाए तो इसे उतारकर छान लें। इसके बाद इसमें 10 ग्राम की मात्रा में पिसा हुआ गोखरू मिलाकर मासिक-धर्म खत्म होने के बाद पहले दिन से लगभग एक सप्ताह तक सेवन करें। इससे स्त्री गर्भधारण के योग्य हो जाती है।

14. नागकेसर: पिसी हुई नागकेसर को लगभग 5 ग्राम की मात्रा में सुबह के समय बछड़े वाली गाय या काली बकरी के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध के साथ माहवारी (मासिक-धर्म) खत्म होने के बाद सुबह के समय लगभग एक सप्ताह तक सेवन कराएं। इससे गर्भधारण के उपरान्त पुत्र का जन्म होगा।

15. कृष्णकांता: कृष्णकांता की जड़ 15 ग्राम को बारीक पीस लें। इसे 5 ग्राम सुबह के समय काली बकरी के कच्चे दूध से माहवारी खत्म होने के बाद 3 दिनों तक लगातार सेवन करना चाहिए। इससे स्त्री गर्भधारण के योग्य बन जाती है।

16. पुत्रजीवक (जियापोता): पुत्रजीवक (जियापोता) के एक पत्ते को बारीक पीसकर गाय के कच्चे दूध में मिला दें। इसे सुबह 10 ग्राम की मात्रा में मासिक-धर्म समाप्त होने के बाद लगभग एक सप्ताह तक नियमित रूप से सेवन करने से गर्भधारण होता है।

17. अपामार्ग: अपामार्ग की जड़ और लक्ष्मण बूटी 40 ग्राम की मात्रा में बारीक पीस-छानकर रख लें। इसे गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध के साथ सुबह के समय मासिक-धर्म समाप्त होने के बाद से लगभग एक सप्ताह तक सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से स्त्री गर्भधारण के योग्य हो जाती है।

18. माजूफल (मियादी फल): माजूफल (मियादी फल) 60 ग्राम की मात्रा में लेकर कूट छान लें। इसे 10-10 ग्राम सुबह-शाम मासिक-धर्म समाप्त होने के बाद 3 दिनों तक गाय के दूध से सेवन करना चाहिए। इससे गर्भ स्थापित होता है।

19. आम: आम के पेड़ का बांदा पानी के साथ बारीक पीसकर मासिक-धर्म खत्म होने के 2 दिन बाद सुबह के समय गाय के कच्चे दूध में मिलाकर सेवन करना चाहिए। इससे गर्भ ठहरता है।

20. ढाक: ढाक (पलाश) का एक पत्ता गाय के कच्चे दूध में पीसकर मासिक-धर्म के शुरू होने के दिनों में सुबह के समय लगातार तीन दिनों तक सेवन कराना चाहिए। इसके सेवन से स्त्रियां गर्भधारण के योग्य हो जाती हैं।

21. हाथी दांत: हाथी दांत को लेकर बारीक पीसकर रख लें। इसमें से लगभग 3 ग्राम सुबह के समय मासिक-धर्म के शुरू होने के दिनों में गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध से देना चाहिए। इसके सेवन से गर्भ स्थापित होता है।

22. ओंघाहुली: ओंघाहुली और ब्रह्मबूटी 15-15 ग्राम कूट-छानकर 3 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध से मासिक-धर्म खत्म होने के बाद सेवन करने से गर्भधारण होता है।

23. गजकेसर: गजकेसर की जड़, पीपल की दाढ़ी और शिवलिंगी के बीज 6-6 ग्राम की मात्रा में कूट-छानकर इसमें 18 ग्राम की मात्रा में खांड मिला दें। इसकी 5 ग्राम मात्रा को सुबह के समय बछडे़ वाली गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध से मासिक-धर्म खत्म होने के बाद लगभग एक सप्ताह तक करना चाहिए। इसके सेवन से स्त्रियां गर्भधारण के योग्य बन जाती हैं।

24. कायफल: कायफल 25 ग्राम की मात्रा में कूटपीसकर रख लें। इसमें 25 ग्राम की मात्रा में खांड मिला दें। इसे लगभग 10 ग्राम की मात्रा में सुबह पानी के साथ मासिक-धर्म खत्म होने के बाद लगभग 5 दिनों तक देना चाहिए। इससे स्त्रियों का गर्भ ठहरता है।

25. अजवायन: अजवायन 10 ग्राम पानी से मासिक-धर्म खत्म होने के बाद तीन-चार दिनों तक सेवन करने से गर्भ की स्थापना में लाभ मिलता है।

26. पीपल का बांदा: पीपल का बांदा (बांझी) को लेकर कूट-छान लें। इसे 5 ग्राम की मात्रा में सुबह के समय बछड़े वाली गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध से मासिक-धर्म के बीच में 3 दिनों तक लगातार सेवन करने से गर्भधारण होता है।

27. काकोली: काकोली का बीज 20 ग्राम की मात्रा में लेकर पीस लें। इसे 5 ग्राम लेकर सुबह एक रंग की गाय (जिस गाय के बछड़े मरते न हो) या काली बकरी के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध के साथ मासिक-धर्म के बीच में देने गर्भ स्थापित होता है।

28. जायफल: जायफल और मिश्री 50-50 ग्राम की मात्रा में पीसकर चूर्ण तैयार कर लें। इसे छह ग्राम की मात्रा में माहवारी के बाद सेवन करना चाहिए। आहार में चावल और दूध का सेवन करें। इससे गर्भधारण हो जाएगा।

29. मेहंदी: मासिक-धर्म के बाद हर चौथे दिन के बाद नियमित 5 बार लगातार अपने हाथ-पैरों पर लगाने से गर्भवती होने की आशा बढ़ जाती है।

30. देवदारू: तैलिया देवदारू को घिसकर स्त्री को पिलाना चाहिए इससे पेट की वायु कम होकर गर्भ को बढ़ने के लिए जगह मिलती है।

31. मशरूम: गर्भावस्था में मशरूम की सब्जी खाने से महिलाओं को पर्याप्त मात्रा में फोलिक अम्ल, नियासिन, वायमिन, राइबोफ्लेकिन आदि `बी´ कॉम्पलेक्स समूह के विटामिन प्राप्त होते हैं।

32. अशोक: अशोक के फूल दही के साथ नियमित रूप से सेवन करते रहने से गर्भ स्थापित होता है।

33. बरगद: पुष्य नक्षत्र और शुल्क पक्ष में लायें, हुए बरगद के कोपलों का चूर्ण 6 ग्राम की मात्रा में ऋतु काल में प्रात: पानी के साथ 4-6 दिन खाने से स्त्री अवश्य गर्भ धारण करती है, या कोंपलों को पीसकर बेर के जितनी 21 गोलियां बनाकर 3 गोली रोज घी के साथ खायें, इससे लाभ मिलेगा।

34. नीलकमल: नीलकमल का चूर्ण और धाय के फूल का चूर्ण समभाग मिलाकर ऋतुकाल प्रारंभ होने के दिन से पांच दिन तक शहद के साथ सुबह-शाम प्रतिदिन सेवन करने से गर्भधारण होता है। एक बार या प्रयोग असफल होने पर अगले ऋतुकाल (मासिक स्राव) में पुन: दोहराने से गर्भधारण हो जाता है।

35. गाजर: गर्भावस्था में गाजर का रस पीते रहने से सैप्टिक रोग नहीं होता है तथा शरीर में कैल्शियम की भी कमी नहीं रहती है। बच्चों को दूध पिलाने वाली माताओं को नियमित रूप से गाजर के रस का सेवन करना चाहिए। इससे उनके दूध की गुणवत्ता बढ़ती है।

36. पीपल:

पीपल, सोंठ, कालीमिर्च और नागकेसर को लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर पीसकर बारीक चूर्ण तैयार कर लें। इस चूर्ण को लगभग 7 ग्राम की मात्रा में लेकर 250 मिलीलीटर गाय के हल्के मीठे दूध में एक चम्मच देशी घी मिलाकर मासिक-धर्म शुरू होने के दिन से लेकर तीन दिनों तक नियमित सेवन कराएं। इससे गर्भ स्थिर होता है। 
पीपल की दाढ़ी 100 ग्राम कूटकर खांड 100 ग्राम की मात्रा में मिला दें। इसे 10-10 ग्राम की मात्रा में पति-पत्नी दोनों को सुबह के समय मासिक-धर्म खत्म होने के बाद लगभग एक सप्ताह तक सेवन कराने से गर्भ ठहरता है। 

37. शिवलिंगी:

शिवलिंगी के बीज 10 ग्राम, स्वर्ण भस्म 1 ग्राम, चांदी भस्म 6 ग्राम, वंग भस्म 6 ग्राम, सरफोका की जड़ 6 ग्राम, चंदन का बुरादा 6 ग्राम, शतावर 9 ग्राम, नागकेसर 9 ग्राम, अरुस के फूल 9 ग्राम तिल के फूल नौ ग्राम, हिंगुल भस्म 9 ग्राम, त्रिवंग भस्म 6 ग्राम, असगंध 10 ग्राम, विदारीकंद 10 ग्राम, बरगद की कोमल जटा नौ ग्राम सभी को कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। फिर केसर को 6 ग्राम की मात्रा में पीसकर विदावर कन्द शतावर को पानी में पीसकर इसी पानी से केसर को बारीक पीसते हैं। इसे लगभग आधे ग्राम की गोली बना लें। इसे सुबह-शाम दूध और मिश्री के साथ माहवारी खत्म होने के बाद सेवन करें। इसके सात दिनों बाद पति के साथ संभोग करें। इससे निश्चित ही गर्भधारण होगा। 
शिवलिंगी के 5 बीज और साबूत के 5 बीज सुबह महिलाएं अपने पति के हाथ से सूर्य की ओर मुंह करके लेकर, 250 मिलीलीटर कच्चे दूध (बछड़े वाली गाय के) से निगल जाए ऐसा मासिक-धर्म खत्म होने के बाद 7 दिनों तक लगातार करना चाहिए। इससे निश्चित रूप से गर्भधारण होता है। 

38. गुड़हल:

सफेद गुड़हल की जड़ को गाय के दूध में पीसकर उसमें बिजोरा नींबू के बीज का बारीक चूर्ण मिलाकर, मासिक-धर्म के समय महिलाओं को पिलाने से गर्भधारण में लाभ मिलता है। 
गु़ड़हल के मूल (जड़) और फूलों का रस 30-50 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह पीने से गर्भ स्थिति रहने से गर्भस्थिति बालक की पुष्टि होती है। 

39. बिजौरा नींबू:

एरण्ड के और बिजौरे नींबू के बीजों को पीसकर घी के साथ देना चाहिए। 
1 पके हुए बिजौरे नींबू के बीज को ऋतुकाल में खाने के लिए देना चाहिए। 

40. मजीठ:

मजीठ, मुलहठी, कूठ, त्रिफला, खांड, खिरैटी, मेदा, महामेदा दुधी, काकोली, असगंध की जड़, अजमोद, हल्दी, दारूहल्दी, लाल चंदन सभी 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर खरल कर लें। इसके बाद एक रंग की गाय (जिस गाय के बच्चे न मरते हो) का घी लगभग 2 किलो, दूध 8 किलो, शतावरी रस 8 किलो मिलाकर गर्म करें। इसे 20 से 40 ग्राम गाय के दूध के साथ सेवन करें। इसके सेवन से बांझ स्त्री को भी पुत्र की प्राप्ति होती है। 
मजीठ, मुलहठी, कूठ, हरड़, बहेड़ा, आमला, खांड, खिरेटी, शतावर, असगंध, असगंध की जड़, हल्दी, दारूहल्दी, प्रियंगु के फूल, कुटकी, कमल, कुमुदनी, अंगूर, काकोली, क्षीरकाकोली, दोनों चंदन सभी 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर लुगदी तैयार कर लें। इसके बाद गाय का घी लगभग 640 ग्राम, दूध लगभग 2.5 लीटर को मिलाकर गर्म करें। जब केवल घी मात्र ही शेष बचा रह जाए तो उसे उतारकर छान लें। इसे 20 से 40 ग्राम प्रतिदिन सेवन करने से बांझपन दूर हो जाता है और स्त्रियां गर्भधारण करने के योग्य हो जाती है। 

41. तेजपात:

तेजपत्ते के पत्तों का बारीक चूर्ण एक से तीन ग्राम तक सुबह-शाम सेवन करने से गर्भाशय शुद्ध होता है। 
तेजपत्ता के क्वाथ (काढ़े) में बैठने से गर्भाशय का दर्द (पीड़ा) शान्त होती है। 
प्रसूता को इसके पत्तों का काढ़ा सुबह-शाम पिलाने से गंदा खून तथा गर्भाशय के अन्य विकार नष्ट हो जाते हैं और गर्भाशय शुद्ध हो जाता है। 

42. असगंध:

असगंध के काढे़ में दूध और घी मिलाकर सात दिनों तक पिलाने से स्त्री को निश्चित रूप से गर्भधारण होता है। 
असगंध का चूर्ण 3 से 6 ग्राम मासिक-धर्म के शुरू होने के लगभग 4 दिन पहले से सेवन करना चाहिए। इससे गर्भ ठहरता है। 
असगंध के चूर्ण को गाय के दूध के साथ पकाकर मिश्री मिलाकर मासिक-धर्म के समाप्त होने के बाद पीने से गर्भधारण हो जाता है। 
असगंध 100 ग्राम दरदरा कूटकर 20 ग्राम दवा को पानी 200 मिलीलीटर में रात को भिगोकर रख देते हैं। सुबह इसे उबालते हैं। एक चौथाई रह जाने पर इसे छानकर 200 मिलीलीटर हल्के गर्म मीठे दूध में एक चम्मच घी मिलाकर माहवारी के पहले दिन से 5 दिनों तक लगातार प्रयोग करना चाहिए। 

42. धतूरा:

धतूरे के फलों का चूर्ण घी और शहद में मिलाकर चाटने से गर्भाशय के विकार दूर होकर गर्भस्थापित होता है। 
धतूरा के फलों के चूर्ण को एक चौथाई ग्राम विषम भाग घी और शहद के साथ चटाने से गर्भधारण करने में मदद मिलती है। 

44. अश्वगंधा:

अश्वगंधा का चूर्ण 20 ग्राम, पानी एक लीटर तथा गौ दूध 250 मिलीलीटर तीनों को हल्की आंच पर पकाकर जब दूध मात्र शेष रह जाये तब इसे 6 ग्राम मिश्री और 6 ग्राम गाय का घी मिलाकर मासिक-धर्म की शुद्धिस्नान के तीन दिन बाद तीन दिन तक सेवन करने से स्त्री अवश्य गर्भ धारण करती है। 
अश्वगंधा का चूर्ण, गाय के घी में मिलाकर मासिक-धर्म स्नान के पश्चात् प्रतिदिन गाय के दूध के साथ या ताजे पानी से 4-6 ग्राम की मात्रा में एक माह तक निरन्तर सेवन करने से स्त्री गर्भधारण अवश्य करती है। 
अश्वगंधा के जड़ के काढे़ में चौगुना घी मिलाकर पकाकर सेवन करने से वातरोग दूर होते हैं तथा स्त्री गर्भधारण करती है।  
और परिवार में सभी सुखी से रहते हैं ।

हस्तमैथुन, एक गुप्त रोग ,hand practice is a mently distrub disses

हस्तमैथुन

हस्तमैथुन ऐसी क्रिया है जिसमें रोगी अकेले में अपने ही हाथो से लिंग को घिसकर अपने वीर्य को निकालता रहता है। इसको करने से मानसिक और शारीरिक रोग पैदा हो जाते हैं। मानसिक रोगी दूसरों के सामने भी हस्तमैथुन करने से नहीं हिचकिचाता है। यह कार्य अविवाहित व्यक्ति ज्यादा करते है। यह कार्य स्त्रियां भी कर लेती है। अपनी योनि पर उंगुलियों से रगड़कर वे भी स्खलित कर लेती है यह भी हस्तमैथुन का ही रोग कहलाता है।

विभिन्न औषधियों से उपचार-

1. छोटा गोखरू: छोटा गोखरू और तिल को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। रोजाना सुबह-शाम 4 से 8 ग्राम यह चूर्ण मिश्री मिले गाय के दूध के साथ खाने से हस्तमैथुन से होने वाले रोग दूर होते हैं। इसका सेवन करने से हस्तमैथुन से पैदा होने वाली नपुंसकता भी दूर हो जाती है।

2. कुचला: लगभग चौथाई ग्राम कुचला को सुबह और शाम लेने से हस्तमैथुन से पैदा होने वाली नपुंसकता में लाभ होता है।

3. काहू: कामवासना पर नियंत्रण रखने के लिये जंगली काहू के बीज का चूर्ण 1 से 3 ग्राम रोजाना 2 बार लेने से लाभ होता हैं।

4. विल्वपत्र (बेलपत्र): 10 से 20 मिलीलीटर विल्वपत्र का रस सुबह-शाम पीने से कामइच्छा काबू में होती है, जिससे हस्तमैथुन की ओर से मन हट जाता हैं।

5. धनिया: धनिया का काढ़ा अनुपान या सहपान के रूप में खाने से हस्तमैथुन के रोग में लाभ होता है।

6. गोखरू: गोखरू फल और तिल को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 3 से 6 ग्राम की मात्रा में बकरी के दूध के साथ खाने से हस्तमैथुन से होने वाले सारे रोग दूर हो जाते हैं।

7. आंवला: हस्तमैथुन से धातु (वीर्य) पतला हो गया हो तो सबसे पहले इस हस्तमैथुन की आदत छोड़ दें। आंवलों तथा हल्दी को समान मात्रा में पीसकर घी डालकर सेंके और भूने। सेंकने के बाद इसमें दोनों के वजन के बराबर पिसी हुई मिश्री मिला लें। एक चाय के चम्मच भरकर सुबह-शाम गर्म दूध से इसकी फंकी लेना लाभकारी रहता है। 

दौनी के तेल से मानसिक शांति

 दौनी तेल (रोजमेरी तेल) का नाम सर्वप्रथम आता है। इस तेल को दौनी के पत्तों से निकाला जाता है जिसमें बहुत हीं औषधीय गुण होते हैं। इसमें मष्तिष्क की शक्ति बढ़ाने के गुण होते हैं जिसकी वजह से इसे ब्रेन टोनिक भी कहा जाता है। इसके तेल का उपयोग स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए सदियों से किया जाता रहा है। इसकी तीखी खुशबू की वजह से लोग इसे खाना पकाने के काम में भी लाते हैं। इसकी खुशबू के कारण इसे सुगंध चिकित्सा में भी इस्तेमाल किया जाता है। इसकी तीखी खुशबू आपके मष्तिष्क को उत्प्रेरित करती है जिसकी वजह से आपके दिमाग की कार्यक्षमता बढ़ जाती है तथा आपकी एकाग्रता बढती है जिनकी वजह से आप अपने काम पर अच्छी तरह से ध्यान लगा पाते हैं।

अरोमा थेरेपी और उपचार


‘एरोमा’ का शाब्दिक अर्थ है  सुगंध के द्वारा उपचार कोई नयी विषय वस्तु नहीं। फूल सिर में लगाना, फूलों के गजरे पहनना, सिर एवं बालों की सुगंधित तेलों से मालिश करना, सुगंधित उबटन लगाना, सुगंधित लकड़ियां, धूप, पाउडर आदि कक्ष में जलाना विशेषकर, जब महिलायें बच्चों को जन्म दे चुकी हों यानी डिलीवरी के पश्चात् पुरानी प्रथायें हैं। एरोमाथेरेपी बिना किसी प्रकार से शरीर को नुक्सान पहुंचाये एवं एलर्जी उत्पन्न किये शरीर को बीमारियों से न केवल बचाती है, लेकिन अभी एक विशेष वर्ग ही ‘एरोमाथेरेपी’ के गुण एवं उपचार विधि से अवगत है। फूलों से अर्क एवं तेल निकालने की एक विशेष पध्दति है। ये विभिन्न तेल और अर्क विशेष क्रिया और प्लांट से गुजार कर निर्मित किये जाते हैं।

उदाहरण के लिए नेरोली तेल फूलों से, रोजमेरी तेल पत्तियों से, लेवेण्डर तेल रोज फूलों से, पीपरमेन्ट का तेल पत्तियों से, चन्दन का तेल चन्दन की लकड़ी से, संतरे का तेल संतरे के छिलके से और कई तेल पेड़ों की छाल एवं जड़ों से भी निकाले जाते हैं। ये तेल दूसरे तेलों से भिन्न होते हैं, क्योंकि ये तेल प्रकृति प्रदत्त हैं, साथ ही ये पानी से भी ज्यादा हल्के होते हैं। ये तेल जर्म्स वाले होते हैं, लेकिन मनुष्य को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाते, न ही मनुष्य के शरीर में स्थित सफेद रक्त कोशिकाओं को जो मानव शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति या क्षमता उत्पन्न करती है। इन तेलों का प्रत्यक्ष प्रयोग नहीं किया जाता। इन्हें अन्य दूसरे साधारण तेलों में मिलाकर ही इस्तेमाल किया जाता है। इन्हें त्वचा पर लगाने पर दर्द कम करने की अभूतपूर्व क्षमता होता है।

ये तेल अन्तः त्वचा के माध्यम से रक्त में भिद जाते हैं, शरीर की तेल मालिश करने पर। शरीर में तेल भिदने और अपना माकूल प्रभाव छोड़ने में लगभग 20 से 70 मिनट लग जाते हैं। ेएरोमाथेरेपी में प्रयोग में आने वाले तेल शुध्द, प्राकृतिक एरोमेटिक होने चाहिए। ये किसी भी प्रकार के सिन्थेटिक सुगंध वाले य कृत्रिम सुगंध वाले नहीं होने चाहिए। यह दुर्भाग्य की बात है कि बाजार में उपलब्ध होने वाले अधिकांश तेल नकली सिन्थेटिक ही होते हैं। एरोमेटिक चिकित्सा शरीर और मन दोनों पर प्रभावशाली असर करती है। यह शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार के तनाव कम करती है, कहते हैं मानव शरीर में मेग्नेटिक पावर होता है और यह पावर शरीर को उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करने में संतुलन का कार्य करती है।

यहां एक बहुत ही कारगर एरोमाविधी स्ायुओं का दर्द कम करने हेतु दी जा रही है।

गर्मी में बेहाल, पसीने की बदबू से छुटकारा


गुलाब का तेल - 20 बूंद
जोजोबा तेल - 5 बूंद
ये तेल 50 मि.ली. नारियल अथवा तिल के तेल में मिलायें और इस तेल से पूरे बदन की विशेष कर कांख (बगल) की इस तेल से मालिख करें। पसीने या शरीर की दुर्गन्ध से छुटकारा मिल जायेगा। ग्रीष्म ऋतु में तो इस तेल की मालिश शरीर को आराम तथा राहत भी प्रदान करती है।

एरोमाथेरेपी निश्चयत ही सौंदर्य श्रृंगार एवं सेहत तीनों पर ही अनुकूल प्रभाव छोड़ती है। शरीर तत्काल राहत एवं स्वयं को चुस्त महसूस करने लगता है।

हमेशा जवान दिखने के लिए थेरेपी

जवाँ दिखने के लिए इन्हें आजमाएँ



सौंदर्य विज्ञान के क्षेत्र में बहुत उन्नति हुई है। अपनी त्वचा के अनुरूप सौंदर्य प्रसाधनों का उपयोग करें। किसी सौंदर्य विशेषज्ञा से सलाह लेकर इनका उपयोग करें।

* आजकल पार्लर में मैच्योर स्किन के कई तरह के उपचार होते हैं। जैसे आयोनाइजेशन, डर्मापील, वेजिटेबल पील, केमिकल्स पील, फेस लिफ्ट (नॉन सर्जिकल), थर्मोहर्ब, वैक्स बाथ, ऑक्सीजन बाथ, फेशियल, आहा फेशियल, एरोमा फेशियल, स्किन पॉलिशिंग आदि कई उपचार हैं, जो हर त्वचा की जरूरत के हिसाब से किए जाते हैं।

मुहासों के लिए थेरैपी

मुँहासों के लिए ऐरोमा फेस मास्क



जब बात तैलीय त्वचा या मुँहासे की आती है, तब यह भ्रम पैदा हो जाता है कि एरोमा थेरेपी में ऑयल होते हैं और ऑयल से तैलीय त्वचा और तैलीय होकर मुँहासे की समस्या को और बढ़ावा देगी, पर यह सोच सर्वथा गलत है।

एरोमा ऑयल चिपचिपाहटरहित, एण्टीसेप्टिक व एण्टीबैक्टीरियल होते हैं। अतः ये तेलीय त्वचा के लिए बहुत लाभदायक हैं।

* एक चाय का चम्मच केयोलिन पाउडर, एक चाय का चम्मच आयुर्वेदिक पिंपल फेस पैक, एक-एक बूँद कैमोमिला, लेवेंडर, जूनियर पाचोली, लाइम एरोमा को एक साथ मिला लें व इस एसेन्शियल ऑयल की एक बूँद फेस मास्क में मिलाएँ।

* अब इसे ऐलोवेरा जेल के साथ मिलाकर चेहरे पर बीस मिनट लगाकर रखें व रोज दिन में दो बार उपरोक्त ऑयल की एक बूँद, एक चम्मच एलोवेरा तेल के साथ मिलाकर लगाएँ।

अरोमा थेरेपी

क्या है एरोमा थेरेपी



आजकल एरोमा थेरेपी के रूप में सौंदर्य निखारने का पुराना ट्रेंड नए कलेवर में हमारे सामने आ रहा है। एरोमा का अर्थ है खुशबू और थेरेपी यानी उपचार अर्थात खुशबू द्वारा उपचार।

* यह खुशबू प्राप्त करने के साधन हैं हमारा मस्तिष्क, हमारे स्नायुतंत्र, जिसमें पहचान पहले से व्याप्त रहती है और खुशबू वाली वस्तुएँ हैं- पेड़-पौधे, पत्तियाँ, जड़, तना, फल-फूल, सब्जियाँ, मसाले आदि।

* डिस्टीलेशन मेथड द्वारा फल, फूलों का अर्क निकाला जाता है, इसी अर्क को 'एसेन्शियल ऑयल' कहते हैं और हर अर्क की अपनी अलग खुशबू, पहचान होती है। इन्हीं अर्क से दिए जाने वाले उपचार को कहते हैं एरोमा थेरेपी।

* इसका उपचार देने से पहले आपको एरोमा ऑयल या एसेन्शियल ऑयल से मसाज करने का सही तरीका पता होना चाहिए। यह तेल आसानी से त्वचा में समा जाते हैं और अपना कार्य आरंभ कर देते हैं।

* एरोमा थेरेपी में इस्तेमाल होने वाले मुख्य ऑयल में बेंजाइन, यूकेलिप्टस, जिरेनियम, लेवेंडर, रोज, वर्गमोट आदि ऑयल प्रमुख है।

मावा की बर्फी

मावा या खोया की बर्फी

मावा से अनेको प्रकार के व्यंजन बनाये जाते हैं. मावा की बर्फी बहुत ही स्वादिष्ट होती है, और बड़ी आसानी से बनाई जा सकती है. आइये मावा की बर्फी बनायें.

आवश्यक सामग्री - Ingredients for Mawa Barfi

मावा - 250 ग्राम
घी - 1 टेबिल स्पून
चीनी - 150 ग्राम (चीनी स्वादानुसार थोड़ी कम ज्यादा की जा सकती है)
इलाइची - 4-5 (छील कर पीस लीजिये)यदि आप चाहें तो
बादाम - 6-7 (बारीक कतर लीजिये)
पिस्ते - 6-7 ( बारीक कतर लीजिये)

विधि - How to make Mawa Barfi

भारी तले की कढ़ाई में घी डाल कर मावा को धीमी गैस पर, हल्का गुलाबी होने तक भून कर, किसी प्याले में निकाल कर ठंडा होने के लिये रख दीजिये.

एक प्लेट या ट्रे को घी लगा कर चिकना करके रख लीजिये.

कढ़ाई में चीनी डालिये, चीनी की मात्रा का 1/3 पानी, चीनी में मिलाइये(चीनी 250 ग्राम तब पानी की मात्रा लगभग 80 ग्राम हो). इस तरह की चाशनी बनाइये कि चाशनी प्लेट में डालते ही तुरन्त जमने लगे.(अगुली अंगूठे के बीच चिपका कर देख लीजिये, वह बहुत ही गाड़ी और तुरन्त जमने लगेगी). चाशनी बनने के बाद गैस बन्द कर दीजिये.

चाशनी को चमचे से चलाते हुये ठंडा कीजिये और जब वह जमने पर आ जाय, तब मावा लेकर चाशनी में डालें और अच्छी तरह चमचे से चलाते हुये मिलाइये, इलाइची पाउडर भी मिला दीजिये.

मिश्रण को घी लगी हुई प्लेट में डालिये समान रूप से फैलाइये, ऊपर से कतरे हुये बादाम और पिस्ते डाल कर सजाइये.

बर्फी को जमने में करीब 20-24 घंटे लग जाते हैं. दूसरे दिन जमी हुई बर्फी को अपने मन पसन्द आकार में काट लीजिये.

बहुत ही स्वादिष्ट बर्फी बनी है, बर्फी को एअर टाइट कन्टेनर में रखकर फ्रिज में रखिये, और जब भी आपका मन करे बर्फी निकालिये और खाइये.


सनातन

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