उदाहरण के लिए नेरोली तेल फूलों से, रोजमेरी तेल पत्तियों से, लेवेण्डर तेल रोज फूलों से, पीपरमेन्ट का तेल पत्तियों से, चन्दन का तेल चन्दन की लकड़ी से, संतरे का तेल संतरे के छिलके से और कई तेल पेड़ों की छाल एवं जड़ों से भी निकाले जाते हैं। ये तेल दूसरे तेलों से भिन्न होते हैं, क्योंकि ये तेल प्रकृति प्रदत्त हैं, साथ ही ये पानी से भी ज्यादा हल्के होते हैं। ये तेल जर्म्स वाले होते हैं, लेकिन मनुष्य को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाते, न ही मनुष्य के शरीर में स्थित सफेद रक्त कोशिकाओं को जो मानव शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति या क्षमता उत्पन्न करती है। इन तेलों का प्रत्यक्ष प्रयोग नहीं किया जाता। इन्हें अन्य दूसरे साधारण तेलों में मिलाकर ही इस्तेमाल किया जाता है। इन्हें त्वचा पर लगाने पर दर्द कम करने की अभूतपूर्व क्षमता होता है।
ये तेल अन्तः त्वचा के माध्यम से रक्त में भिद जाते हैं, शरीर की तेल मालिश करने पर। शरीर में तेल भिदने और अपना माकूल प्रभाव छोड़ने में लगभग 20 से 70 मिनट लग जाते हैं। ेएरोमाथेरेपी में प्रयोग में आने वाले तेल शुध्द, प्राकृतिक एरोमेटिक होने चाहिए। ये किसी भी प्रकार के सिन्थेटिक सुगंध वाले य कृत्रिम सुगंध वाले नहीं होने चाहिए। यह दुर्भाग्य की बात है कि बाजार में उपलब्ध होने वाले अधिकांश तेल नकली सिन्थेटिक ही होते हैं। एरोमेटिक चिकित्सा शरीर और मन दोनों पर प्रभावशाली असर करती है। यह शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार के तनाव कम करती है, कहते हैं मानव शरीर में मेग्नेटिक पावर होता है और यह पावर शरीर को उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करने में संतुलन का कार्य करती है।
यहां एक बहुत ही कारगर एरोमाविधी स्ायुओं का दर्द कम करने हेतु दी जा रही है।
No comments:
Post a Comment