उत्तर कालीन बैदिक रीति रिवाज

उत्तरकालीन वैदिक युग में आर्थिक व सामाजिक जीवन

प्रधान भाग : वह काल जिसने ऋग वैदिक युग का अनुसरण किया वह उत्तरकालीन वैदिक के नाम से जाना गया |

I. उत्तरकालीन युग में आर्थिक जीवन

• वैदिक लेखों में समुद्र व समुद्री यात्राओं का उल्लेख है | यह ये दर्शाता है कि वर्तमान का समुद्री व्यापार आर्यन के द्वारा शुरुं किया गया था |
• धन उधार  देना एक फलता फूलता व्यापार था | श्रेस्थिन शब्द यह बताता है कि  इस युग में सम्पन्न व्यापारी थे और शायद वे सभा के रूप में संगठित थे |
• आर्यन ने सिक्कों का प्रयोग नहीं किया परंतु सोने की मुद्राओं के लिए विशेष सोने के वज़नों का प्रयोग किया गया | सतमाना, निष्का, कौशांभी, काशी और विदेहा प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र थे |
• जमीन पर बैल गाड़ी का प्रयोग सामान ले जाने के  लिए किया जाता था |विदेशी सामान के लिए नावों और समुद्री जहाजों का प्रयोग किया जाता था |
• चाँदी का इस्तेमाल बढ़ गया था और उससे आभूषण बनाए जाते थे |

II. उत्तरकालीन वैदिक युग में सामाजिक जीवन

• समाज 4 वर्णों  में विभाजित था : ब्राह्मण, राजन्य या क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र |
• प्रत्येक वर्ण का अपना कार्य निर्धारित था जिसे वे पूरे रीति रिवाज के साथ करते थे | हर एक को जन्म से ही वर्ण दे दिया जाता था |
• गुरुओं के 16 वर्गों मे से एक ब्राह्मण होते थे परंतु बाद में दूसरे संत दलों से भी श्रेष्ठ हो जाते थे | इन्हे सभी वर्गों में सबसे शुद्ध माना जाता था और ये लोग अपने तथा दूसरों के लिए बलिदान जैसी क्रियाएँ  करते थे |
• क्षत्रिय शासकों और राजाओं के वर्ग में आते थे और उनका कार्य लोगों की रक्षा करना और साथ ही साथ समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखना होता था |
• वैश्य लोग आम लोग होते थे जो व्यापार, खेतीबाड़ी और पशु पालना इत्यादि का कार्य करते थे | मुख्यतः यही लोग कर अदा करते थे |
• यद्यपि सभी तीनों वर्णों को उच्च स्थान मिला था और ये सभी पवित्र धागे को धारण कर सकते थे, पर शूद्रों को ये सभी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं और इनसे भेदभाव किया जाता था |
• पैतृक धन पित्रसत्तात्मक का नियम था जैसे चल अचल संपत्ति पिता से बेटे को चली जाती थी | औरतों को ज़्यादातर निचला स्थान दिया जाता था | लोगों ने गोत्र असवारन विवाह का चलन चलाया |एक ही गोत्र के या एक ही पूर्वजों के लोग आपस में विवाह नहीं कर सकते थे |
वैदिक लेखों के अनुसार जीवन के चार चरण या आश्रम थे :ब्रह्मचारी या विद्यार्थी, गृहस्थ, वनप्रस्थ या आधी निवृत्ति और सन्यास या पूर्ण निवृत्ति |

III. प्रशासन की व्यवस्था
• पूर्व वैदिक आर्यन जाति में संगठित रहते थे ना की राज्यों के रूप में | जाति के मुखिया को राजन कहते थे | राजन की अपनी स्वायत्तता उसकी जाति की सभा में प्रतिबंधित थी जिसे सभा या समिति कहा जाता था |
• राजन उनकी सहमति के बिना सिंहासन पर नहीं बैठ सकता था | सभा, जाति के कुछ प्रमुख लोगों की होती थी जबकि समिति में जाति का हर एक आदमी होता था |
• कुछ जातियों के वंशानुगत  मुखिया नहीं होते थे और इन्हे जातिय सभा की सरकार द्वारा चलाया जाता था | राजन की  प्राथमिक अदालत होती थी जिसमे उसकी जाति के सांसद और जाति के मुख्य लोग (ग्रामणि ) शामिल होते थे |
• राजन का मुख्य कार्य अपनी जाति की रक्षा करना था | उसकी सहायता उसके कई अधिकारियों द्वारा की जाति थी जिसमे पुरोहित, सेनानी(सेना का प्रमुख), दूत और जासूस शामिल थे |पुरोहित समारोह करते थे तथा युद्ध में जीत के लिए और शांति बनाए रखने के लिए मंत्रौच्चारण करते थे |
• राजन को समाज और जाति के संरक्षक के रूप में देखा जाता था| वंशानुगत शासन उभरना शुरू हुआ और जिसके फलस्वरूप प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई जैसे रथ दौड़, पशु की छाप और पासों का खेल जो की पहले निश्चय करते थे कि कौन राजा बनने योग्य है, बिलकुल भी महत्वपूर्ण नहीं  थे |इस युग के  रीति-रिवाज राजा के दर्जे को लोगों से ऊपर रखते थे | उसे प्रायः सम्राट कहा जाता था |
• राजन की बड़ी हुई राजनीतिक ताकतों ने  उसे उत्पादिक संसाधनों पर नियंत्रण करने की ताकत दे दी थी | ऐच्छिक रूप से दिया गया उपहार अनिवार्य भेंट बना दिया गया हालांकि कर के लिए कोई व्यवस्थित प्रणाली नहीं थी  |
• उत्तरकालीन वैदिक युग के अंत में, विभिन्न प्रकार की राजनीतिक ताकतों जैसे राज्य, गण राज्य और जातिय रियासतों का भारत में उत्थान हुआ |

IV. उत्तरकालीन वैदिक ईश्वर   

• सबसे महत्वपूर्ण वैदिक ईश्वर, इंद्र और अग्नि ने अपनी महत्वता  खो दी और इनके स्थान पर प्रजापति, विधाता की पूजा होने लगी  |
• कुछ सूक्ष्म  भगवान जैसे रुद्र, पशुओं के देवता और विष्णु, मनुष्य का पालक और रक्षक प्रसिद्ध हो गए |

V. रीति-रिवाज और दर्शन शास्त्र 

• बलिदान, प्रार्थनाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए और वे दोनों प्रजा और स्वदेशी को अपनाते थे  | जबकि लोग परिवार के बीच में ही बलिदान करते थे, जन बलिदान में राजा और उसकी प्रजा शामिल होते थे |
• यज्ञ या हवन करना उनके मुख्य धार्मिक कार्य होते थे | रोज़ाना के यज्ञ साधारण होते थे और परिवारों के बीच में ही होते थे |
• रोज़ के यज्ञों के अलावा वे त्योहार के दिनों में ख़ास यज्ञ करते थे | कभी कभार इन मौकों पर जानवरों का भी बलिदान दिया जाता था |

भारतीय उत्तर बैदिक काल

उत्तर वैदिक काल (1000 - 600 ई.पू.)

उत्तर वैदिक काल के दौरान (1000-600 ईसा पूर्व) आर्यों का यमुना, गंगा और सदनीरा जैसे सिंचिंत उपजाऊ मैदानों पर पूर्ण नियंत्रण था।

घटनाक्रम

  • 1500 ईसा पूर्व और 600 ईसा पूर्व की अवधि प्रारंभिक वैदिक काल (वैदिक काल) और उत्तर वैदिक काल के रूप में विभाजित थी।
  • वैदिक काल: 1500 ईसा पूर्व- 1000 ईसा पूर्व: इस अवधि के दौरान ही आर्य भारत पर आक्रमण करने वाले थे।
  • उत्तर वैदिक काल: 1000 ईसा पूर्व- 600 ईसा पूर्व

विशेषताएं

उत्तर वैदिक रचनाएं

  • यह अवधि वेद के बाद संकलित वैदिक ग्रंथों पर आधारित थी।
  • वैदिक भजन या मंत्रों के संग्रह को संहिता कहा जाता था।
  • भजन गाये जाने के बाद वेदों को धुनों पर स्थापित किया गया था और इसके बाद इन्हें साम वेद संहिता नामित किया गया था।
  • इस अवधि के दौरान दो और वेदों के संग्रहों, यजुरवेद वेद संहिता और अथर्ववेद संहिता की भी रचना हुई थी।
  • यजुर वेद में भजन अनुष्ठान के साथ होते थे जो समाज के सामाजिक-राजनीतिक संरचना को दर्शाते थे।
  • अथर्ववेद में आकर्षण और मंत्र होते थे जो विपदा से रक्षा करते थे। ये गैर-आर्यों के विश्वासों और प्रथाओं को प्रतिबिंबित करते थे।
  • संहिताओं के बाद ग्रंथों की एक श्रृखंला आयी थी जिसे ब्राह्मण कहा जाता था जिन्होंने अनुष्ठानों के सामाजिक और धार्मिक पहलुओं के बारे में विस्तृत जानकारी दी थी।

II- भूरे रंगीन बर्तन

  • ऊपरी गंगा बेसिन के उत्खनन ने मिट्टी के कटोरों और भूरी मिट्टी से चित्रित बर्तनों की खोज  को सुनिश्चित किया ।
  • ये उत्पाद एक ही क्षेत्र और एक ही अवधि (1000-600 ईसा पूर्व लगभग), उत्तर वैदिक संकलन का हिस्सा थे।
  • इस प्रकार,  इन स्थानों को पेंटेट ग्रे वेयर (पीजीडब्ल्यू) स्थान कहा जाने लगा था।
  • ये स्थान पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के आसपास के क्षेत्रों में पाये जा सकते हैं।

III. लौह चरण संस्कृति

  • 1000 ईसा पूर्व के आसपास पाकिस्तान और बलूचिस्तान में मिट्टी के अंदर   बहुत लौह भण्डार पाया गया था।
  • 800 ईसा पूर्व के आस-पास उत्तर प्रदेश में लोहे का उपयोग तीर-कमान और बरछी- भाला जैसे हथियार बनाने के लिए किया जाता था।
  • उत्तर वैदिक ग्रंथों में लोहे के लिए 'श्यामा' या 'कृष्णा अयास'  शब्दों का प्रयोग किया जाता था।
  • हालांकि कृषि साधारण होती थी लेकिन यह व्यापक होती थी और उत्तर वैदिक काल में चावल और गेहूं की व्यापकता में वृद्धि हुई थी।
  • धातुओं की विविध कला और शिल्प के प्रस्तुतीकरण में वृद्धि हुई। धातु गलाने वाले(स्मेल्टर), लोहे और तांबे के कारीगर तथा बढ़ई जैसे व्यवसाय अस्तित्व में आये थे।
  • उत्तर वैदिक काल में चार प्रकार के मिट्टी के बर्तन होते थे (काले और लाल-बर्तन, काले-स्खलित बर्तन, चित्रित भूरे बर्तन, और लाल बर्तन)।

आर्य औऱ भारत

आर्यों की जन्मभूमि और उनका प्रसार (साक्ष्य के साथ)

आर्यों  (Aryans) की जन्मभूमि कहाँ पर थी, इस विषय में इतिहास के विद्वानों में बड़ा मतभेद है. आर्य (Aryans) कहाँ से आये, वे कौन थे इसका पता ठीक से अभी तक चल नहीं पाया है. कुछ विद्वानों का मत है कि वे डैन्यूब नदी के पास ऑस्ट्रिया-हंगरी के विस्तृत मैदानों में रहते थे. कुछ लोगों का विचार है कि उनका आदिम निवास-स्थान दक्षिण रूस में था. बहुत-से विद्वान ये मत रखते थे कि आर्य (Aryans) मध्य एशिया के मैदानी भागों में रहते थे. फिर वहां से वे फैले. और कुछ लोगों का यह मानना है कि आर्य (Aryans) लोग भारत के आदिम निवासी थे और यही से वे संसार के अन्य भागों में फैले.

फिर भी, अधिकांश विद्वानों का मत है कि आर्य (Aryans) लोग मध्य एशिया के मैदानी भागों में रहते थे. उनके इधर-उधर फ़ैल जाने का कारण उनका चारागाह की तलाश करना माना जाता है. आर्य (Aryans) देखने में लम्बे-चौड़े और गोरे रंग के थे. वे घुमंतू प्रवृत्ति के होते थे. उनकी भाषा लैटिन, यूनानी आदि प्राचीन यूरोपीय भाषाओं तथा आज-कल की अंग्रेजी, फ्रांसीसी, रुसी तथा जर्मन भाषाओं से मिलती-जुलती थी. अधिकांश इतिहासकारों और विद्वानों के मत से तो यही लगता है कि यूरोप और भारत के आधुनिक निवासियों के पूर्वज एक ही स्थान में रहते थे और वह स्थान मध्य-एशिया में था.

आर्यों (Aryans) के Origin के कुछ साक्ष्य

एशिया में उनका उल्लेख सर्वप्रथम एक खुदे हुए लेख में पाया जाता है जो ई.पू. 2500 के लगभग का है. घोड़ों की सौदागिरी करने के लिए वे मध्य एशिया से एशियाई कोचक में आये. यहाँ आकर कोचक और मेसोपोटामिया को जीतकर उन्होंने अपना राज्य स्थापित किया. वेवीलोनिया (जो अभी Iraq में है) के इतिहास में आर्य (Aryans) 'मिटन्नी” नाम से प्रसिद्ध है. उनके राजाओं के नाम आर्यों (Aryans) के नामों से मिलते-जुलते जैसे 'दुशरत्त” (दुक्षत्र) और 'सुवरदत्त” (स्वर्दत्त). बोगाज-कोई (Bogl as-Koi) में पाये हुए और तेल-यल-अमर्ना (Tell-al-Amarna) के लेखों से यह सिद्ध होता है कि ये लोग भी आर्यों (Aryans) के जैसे सूर्य, वरुण, इंद्र तथा मरूत की पूजा करते थे. उनके देवताओं के 'शुरियस” और 'मरूत्तश ” संस्कृत के शब्द सूर्य तथा मरूत ही है. ज्ञात होता है कि ई.पू. 1500 के लगभग मेसोपोटामिया की सभ्यता को नष्ट करनेवाले लोग उन्हीं आर्य Aryans के पूर्वज थे जिन्होंने भारत के द्रविड़ों को हराया और वेदों की रचना की.

आर्यों (Aryans)की एक दूसरी शाखा भी थी जो फारस के उपजाऊ मैदानों में पाई जाती थी. उन्हें इंडो-ईरानियन कहा जाता था. पहले इन दोनों दलों के बीच कोई स्पष्ट अंतर नहीं दिखता था. जैसे वे एक ही देवताओं को पूजते थे, पूजा-पाठ का ढंग भी एक ही था. कालांतर में  इरानी दल बदल गया. उनके नामों में भी जो समानता थी, वे भी धीरे-धीरे नहीं रही. ई.पू. छठी शताब्दी के पहले ही उन्होंने अपना धर्म बदल डाला और सूर्य और अग्नि के उपासक बन गए.

आर्य लोगों (Aryans) का बाहर जाना

आर्य (Aryans) लोग अपनी जन्मभूमि को छोड़कर ऐसी जगह गए जहाँ कुछ लोग पहले से निवास करते थे. ऐसी दशा में उन्हें पहले से निवास कर रहे लोगों से लड़ना पड़ा. आर्य (Aryans) लोग अपने जन्म-स्थान से कभी-भी बड़ी संख्या में नहीं निकलते थे. वे टुकड़ों में बँट के ही इधर-उधर जाते थे. पर जहाँ भी जाते थे, उनका द्वंद्व पहले से रह रहे लोगों से होता था. कहीं-कहीं जो अनार्य थे उन्होंने आर्यों (Aryans) की भाषा को तो अपनाया ही, साथ-साथ उन्हीं के देवी-देवताओं को भी पूजने लगे. पर अधिकांश जगह यही हुआ कि आर्यों (Aryans) ने उनकी जमीन और संपत्ति छीन कर उन्हें अपनी प्रजा में शामिल कर लिया. आर्यों  (Aryans) के बाहर निकलने का समय ठीक तौर पर निश्चित नहीं किया जा सकता परन्तु विद्वानों का अनुमान है कि यह घटना 3000 ई.पू. से पहले की नहीं है.

आर्य भारतीय और संस्कृति

आर्यों का आगमन

वास्तव में आर्यन उन लोगों को कहा जाता था जो प्राचीन इंडो-युरोपियन भाषा बोलते थे और  जो प्राचीन ईरान और उत्तर भारतीय महाद्वीपों में बसने  की सोचते थे | आर्यन  भारत में पूर्व वैदिक काल मे बसे | इसे सप्तसिंधु या सात नदियों झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास, सतलुज, सिंधु और सरस्वती की धरा कहा गया |

घटना क्रम :

1500 B .C और 600 B .C के युग को पूर्व वैदिक युग (ऋग वैदिक काल) तथा बाद के वैदिक युग में विभाजित किया गया |

  • पूर्व वैदिक काल : 1500 B .C – 1000 B . C ; यह वह युग था जब आर्यन्स भारत पर आक्रमण कर सकते थे |
  • बाद का वैदिक युग : 1000 B . C – 600 B . C

वैदिक काल की विशेषताएँ

शब्दों की बुनियाद से निकला वेद शब्द का अर्थ है “जानना” या “उच्च विद्या” | चार प्रकार के महत्वपूर्ण वेद हैं:

  1. ऋगवेद : यह 10 किताबों से बना है और इसमे 1028 भजन हैं जिन्हे अलग अलग ईश्वरों के लिए गाया गया है | मण्डल II से VII को पारिवारिक पुस्तक के नाम से जानते थे क्यूंकि यह पारिवारिक कथाओं जैसे गृतसमदा, विश्वामित्र, बामदेव, आरती, भारद्व्जा और वसीष्ठा पर आधारित थे |
  2. यजुर्वेद : यह राजनीतिक जीवन, सामाजिक जीवन, नियम और कायदों के बारे में बताता है जिन्हे हमे मानना चाहिए | यह कृष्ण यजुर वेद और शुक्ल यजुर वेद में विभाजित हैं |
  3. सामवेद : यह कीर्तन व प्रार्थनाओं की किताब है और इसमे 1810 भजन हैं |
  4. अथर्ववेद : यह जादुई वचनों , भारतीय औषिधियों और लोक नृत्य पर आधारित है |  

ब्राह्मण

  • ये वेदों की द्वितीय क्ष्रेणी से तालुक्क रखते हैं और इनका संबंध प्रार्थना और बलिदानों के समारोहों से है |
  • तंद्यमहा ब्राह्मण को सबसे पुराने ब्राह्मण माना जाता था और इनकी कई पौराणिक कथाएँ  हैं |
  • व्रत्यसोमा एक समारोह है जिसमे इन पौराणिक कथाएँ के द्वारा गैर आर्यन को आर्यन में बदला जाता था |
  • सतपथा एक बहुत महत्वपूर्ण तथा विस्तीर्ण ब्राह्मण है | यह वैदिक काल के दर्शन शास्त्र, धर्म शास्त्र, शैली और रीति-रिवाज के बारे में बताता है |
  • ब्राह्मण का आखिरी भाग अरण्यकस था | इसके दो भाग ऋगवेद से जुड़े थे ; आइतारेय और कौसितकी |
  • 108 प्रकार के दर्शन शास्त्र हैं जिनका  सीधा संबंध आत्मा से है | इन्हे उपनिषद कहते हैं |
  • बृहदर्णयका और चंदोग्य सबसे पुराने उपनिषद हैं |
  • यह वचन “सत्यमेव जयते” मुंडका उपनिषद से लिया गया है|

आर्यन का संघर्ष

  • आर्यन के प्रथम दस्ते ने भारत में लगभग 1500 B . C  में आक्रमण किया |
  • उन्हें भारत के मूल निवासियों जैसे दास व दस्यु से संघर्ष करना पड़ा|
  • हालांकि दास को आर्यन की तरफ से कभी भी आक्रमण के लिए उत्तेजित नहीं किया गया, पर दस्यु हत्या का ऋग वेद में बारबार उल्लेख किया गया है |
  • इन्द्र को ऋग वेद में पुरान्द्र के नाम से भी उल्लेख किया गया है जिसे किलों का भंजक भी कहा गया है |
  • पूर्व आर्यन के किलों का उल्लेख हरप्पा संस्कृति की वजह से भी किया गया है |
  • आर्यन मूल निवासियों पर इसलिए भी विजय प्राप्त कर पाये क्यूंकि उनके पास बेहतर हथियार,वरमान, तथा घोड़े वाले रथ थे |
  • आर्यन् दो तरह के संघर्षों  में व्यस्त रहे  एक तो स्वदेशी लोग व अपने आप में |
  • आर्यन को पाँच आदिवासी जातियों में विभाजित किया गया जिसे पंचजन कहा गया तथा गैर आर्यन की भी मदद प्राप्त की |
  • आर्यन गोत्र के शासक भरत व त्रित्सु थे जिन्हे वसिष्ठ पुरोहित मदद करते थे |
  • भारतवर्ष देश का नाम राजा भरत के ऊपर रखा गया

      दसराजन युद्ध

      • भारत पर भरत गोत्र के राजा ने शासन किया तथा उन्हें दस राजाओं का विरोध भी झेलना पड़ा; पाँच आर्यन तथा पाँच गैर आर्यन|
      • इनके बीच में हुए युद्ध को दस राजाओं के युद्ध या दसराजन युद्ध के नाम से जाना  गया |
      • परुषनी या रावी नदी पर किया गया युद्ध सूद के द्वारा जीता गया |
      • बाद में भरत ने पुरू के साथ नाता जोड़ लिया जिससे कुरु नाम का नया गोत्र बना |
      • बाद के वैदिक युग में कुरु व पांचालों ने गंगा के ऊपरी पठारों की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जहाँ उन्होने एक साथ राज किया |

      वैदिक काल में नदियाँ

      • सप्त सिंधु शब्द  या सात मुख्य नदियों के समूह का भारत के ऋग वेद में उल्लेख किया गया है |
      • वे सात नदियाँ थीं:
          1. पूर्व में सरस्वती
          2. पश्चिम में सिंधु
          3. सतुद्रु (सतलुज)
          4. विपासा (ब्यास)
          5. असिक्नी(चेनाब)
          6. परुषनी(रावी) और
          7. वितस्ता( झेलम)

        आर्य भारतीय है या बिदेसी अपने अपने मत

        आर्यन्स का भारत में आगमन

        घटना क्रम

        1500 B .C और 600 B .C के युग को पूर्व वैदिक युग (ऋग वैदिक काल) तथा बाद के वैदिक युग में विभाजित किया गया |

        • पूर्व वैदिक काल : 1500 B .C – 1000 B . C ; यह वह युग था जब आर्यन्स भारत पर आक्रमण कर सकते थे |
        • बाद का वैदिक युग : 1000 B . C – 600 B . C

        प्रारंभिक घर व पहचान

        • आर्यन्स चरवाहे थे यानी वे खेतीबाड़ी नहीं करते थे |
        • उन्होने कई  जानवर पाले थे परंतु घोड़े इनमें सबसे महत्वपूर्ण थे |
        • आर्यन्स ने अपनी यात्रा  पश्चिम एशिया से  भारत की ओर 200 B .C के उपरान्त शुरू की |
        • आर्यन्स का पहला पड़ाव भारत की यात्रा के दौरान ईरान था |

        ऋग वेद

        • यह इंडो यूरोपियन भाषा की सबसे पुरानी पुस्तक है |
        • इसमें प्रार्थना का सार- संग्रह है, इसे दस किताबों या मण्डल  में विभाजित किया  गया है |
        • इसमें प्रार्थनाओं का संकलन है जिसे विभिन्न देवता जैसे अग्नि, वरुण, इन्द्र, मित्रा, इत्यादि को समर्पित किया गया है |
        • ऋग वेद ने अपने प्रसंग अवेस्ता, ईरनियों की सबसे पुरानी किताब जिसमें ईश्वर के विभिन्न नाम तथा कुछ सामाजिक वर्गों में बांटे हैं |

        वैदिक काल में नदियाँ

        • पहले, आर्यन्स पूर्वी अफ़गानिस्तान, पंजाब तथा उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में रहते थे |
        • कुछ नदियाँ जैसे कुम्भ, सरस्वती, सिंधु, और इसकी का ऋग वेद में उल्लेख किया गया है|
        • सप्त सिंधु या सात मुख्य नदियों के समूह का भारत के ऋग वेद में उल्लेख किया गया है |
        • वे सात नदियाँ शायद इन के बीच में थीं:
            1. पूर्व में सरस्वती
            2. पश्चिम में सिंधु
            3. सतुद्रु (सतलुज)
            4. विपासा (ब्यास)
            5. असिक्नी(चेनाब)
            6. परुषनी(रावी) और
            7. वितस्ता( झेलम)

            आदिवासी संघर्ष

            • आर्यन के प्रथम दस्ते ने भारत में लगभग 1500 B .C  में आक्रमण किया |
            • उन्हें भारत के मूल निवासियों जैसे दास व दस्यु से संघर्ष करना पड़ा|
            • हालांकि दास को आर्यन की तरफ से कभी भी आक्रमण के लिए उत्तेजित नहीं किया गया, पर दस्यु हत्या का ऋग वेद में बारबार उल्लेख किया गया है |
            • इन्द्र को ऋग वेद में पुरान्द्र के नाम से भी उल्लेख किया गया है जिसे किलों का भंजक भी कहा गया है |
            • पूर्व आर्यन के किलों का उल्लेख हरप्पा संस्कृति की वजह से भी किया गया है |
            • आर्यन मूल निवासियों पर इसलिए भी विजय प्राप्त कर पाये क्यूंकि उनके पास बेहतर हथियार,वरमान, तथा घोड़े वाले रथ थे |
            • आर्यन् दो तरह के संघर्षों  में व्यस्त रहे  एक तो स्वदेशी लोग व अपने आप में |
            • आर्यन को पाँच आदिवासी जातियों में विभाजित किया गया जिसे पंचजन कहा गया तथा गैर आर्यन की भी मदद प्राप्त की |
            • आर्यन गोत्र के शासक भरत व त्रित्सु थे जिन्हे वसिष्ठ पुरोहित मदद करते थे |
            • भारतवर्ष देश का नाम राजा भरत के ऊपर रखा गया

              दसराजन युद्ध

              • भारत पर भरत गोत्र के राजा ने शासन किया तथा उन्हें दस राजाओं का विरोध भी झेलना पड़ा; पाँच आर्यन तथा पाँच गैर आर्यन|
              • इनके बीच में हुए युद्ध को दस राजाओं के युद्ध या दसराजन युद्ध के नाम से जाना  गया |
              • परुषनी या रावी नदी पर किया गया युद्ध सूद के द्वारा जीता गया |
              • बाद में भरत ने पुरू के साथ नाता जोड़ लिया जिससे कुरु नाम का नया गोत्र बना |

              बाद के वैदिक युग में कुरु व पांचालों ने गंगा के ऊपरी पठारों की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जहाँ उन्होने एक साथ राज किया |

              सम्राट अशोक के समय सामाजिक जीवन

              अशोक के समय का सामाजिक जीवन और कला का स्थान

              अशोक के शासन-काल में भारत की सामाजिक स्थिति में बहुत परिवर्तन दिखे. ब्राह्मण, श्रवण, आजीवक आदि अनेक सम्प्रदाय थे परन्तु राज्य की ओर से सबके साथ निष्पक्षता का व्यवहार किया जाता था और सभी को इस बात की हिदायत दी जाती थी  कि धर्म के मामलों में सहिष्णु होना सीखें, सत्य का आदर करें आदि. कई साधु भी देश और समाज की भलाई कैसे हो, इसमें अपनी पूरी ऊर्जा झोकते थे. कभी-कभी ऐसा देखने को भी मिलता था कि स्वयं राजकुमार और राजकुमारियाँ दूर देश जा कर धर्म का प्रचार कर रहे हैं. लोगों का धार्मिक दृष्टिकोण उदार था और कभी-कभी विदेशियों को भी शिक्षा-दीक्षा दे कर हिन्दू बना दिया जाता था जिन्हें लोग सहर्ष स्वीकार करते थे.

              एक यूनानी हिन्दू-धर्म में दीक्षित किया गया और उसका नाम धर्मरक्षित रखा गया. अशोक ने अपनी शिक्षाओं को बोल-चाल की भाषा में स्तंभों पर खुदवाया था. दूसरी तरफ आशिक के काल में कई मठ और पाठशालाएँ भी थीं. इससे मालूम होता है कि उस समय शिक्षा का अच्छा-खासा प्रसार था. इतिहासकार स्मिथ अशोक के काल में शिक्षा का स्थान के सम्बन्ध कुछ इस तरह कहते हैं  -

              मेरे अनुसार अशोक के समय की बौद्ध-जनता में प्रतिशत शिक्षितों की संख्या, आधुनिक ब्रिटिश भारत के अनेक प्रान्तों की अपेक्षा कहीं अधिक थी.

              ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्ण अशोक के शासन-काल में सुखी तथा सदाचारी थे. संबंधियों, मित्रों, नौकरों तथा पशुओं पर भी लोग दया का भाव रखते थे. बाल-विवाह और बहुविवाह की प्रथाएँ अशोक के समय में भी थीं. खुद अशोक की कई रानियाँ थीं. अशोक ने 18 वर्ष की आयु में शादी किया था और उसके बहन की शादी 14 वर्ष की अवस्था में हुई थी. मांसाहार का प्रचालन अशोक के समय घट रहा था.

              मौर्यकालीन कला (Mauryan Art)

              अशोक ने बहुत-से नगर, स्तूप, विहार और मठ बनवाये. कई जगह स्तंभों को गड़वाया. उसने कश्मीर की राजधानी श्रीनगर की स्थापना की और एक दूसरा नगर उसने नेपाल में बसवाया. कहा जाता है कि अशोक अपनी बेटी चारुमती और उसके पति देवपाल के साथ वहाँ गया था. अशोक का महल इतना सुन्दर था कि लगभग 900 वर्ष के बाद जब चीनी यात्री फाह्यान भारत आया तो उसे देखकर वह चकित रह गया. उसे विश्वास नहीं हुआ कि वह महल मनुष्य के हाथ का बनाया हुआ है. उसकी चित्रकारी और पत्थर की खुदाई देखकर वह मुग्ध हो गया.

              अशोक स्तम्भ (Pillars of Ashoka)

              अशोक की बनवाई हुई बहुत-सी ईमारतें अब तो नष्ट हो गई हैं परन्तु साँची का स्तूप (भोपाल में स्थित) तथा भरहुत (इलाहबाद से कुछ दूरी पर) के स्तूप अब भी उसकी स्मृति की रक्षा कर रहे हैं. अशोक ने कई स्तम्भ खड़े करवाए जो देश के विभिन्न भागों में पाए जाते हैं. इनमें से साँची, प्रयाग, सारनाथ और लौरिया नंदन-गढ़ के स्तम्भ अधिक प्रसिद्ध हैं. इनमें कुछ स्तंभों पर सिंह की मूर्तियाँ हैं.

              दिल्ली के अशोक स्तम्भ  को 1356 ई. में फिरोज शाह तुगलक टोपरा नामक गाँव (मेरठ जिले में स्थित) से उठाकर लगवाया था. यह उस काल के स्थापत्य का एक सुन्दर नमूना है. इसकी बनावट और चमक अत्यंत सुन्दर है. इस स्तम्भ को उठाकर खड़ा करने में उस काल के इंजीनियरों ने जो कुशलता दिखाई, वह भी काबिले-तारीफ है. सर जान मार्शल का कथन है कि सारनाथ के शिला-स्तम्भ पर जानवरों के जो चित्र खोदे गये हैं वह कला और शैली दोनों दृष्टि से बहुत उच्च कोटि के हैं. पत्थर पर इतनी सुन्दर खुदाई भारत में कभी नहीं हुई और न प्राचीन संसार में ही इसके जोड़ की कोई चीज मिलती है.

              गुफाएँ

              अशोक की कुछ ऐसी गुफाएँ भी हैं जिन पर अशोक के लेख खुदे हुए हैं. ऐसी कुल सात गुफाएँ हैं और गया के पास बराबर की पहाड़ियों में स्थित हैं. उन पर मौर्य-काल की चमकीली पॉलिश हैं. दीवारें और छतें शीशे की तरह चमकती है. मौर्य-काल के कारीगरी जौहरी का काम भी खूब जानते थे. वे बड़ी होशियारी और सफलता के साथ पत्थरों को काटते और उन पर पॉलिश करते थे.

              यूनानी कला का प्रभाव

              कुछ विद्वानों का मत है कि मौर्य-कालीन कला पर यूनानी तथा ईरानी कला का प्रभाव पड़ा है. किन्तु इस कथन का कोई विश्वसनीय प्रमाण देखने को नहीं मिलता. यह अवश्य है कि उस काल में कई विदेशी भारत आये और यहीं बस गए. अशोक ने पश्चिम के देशों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित कर लिया था. संभव है कि उन देशों की कला का यहाँ की कला पर प्रभाव पड़ा हो.

              सम्राट अशोक का शासन काल

              1. अशोक का राज्यारोहण पिता बिंदुसार के निधन के उपरान्त मगध के सिंहासन पर 268 ई.पू. में हुआ.
              2. अशोक के शासन के 8वें वर्ष में (दीर्घ शिलालेख -XIII) कलिंग विजय के बाद अशोक ने क्षोभ व्यक्त किया. युद्ध का अंत कर धम्म के मार्ग पर चलने की घोषणा की.
              3. नवम वर्ष में बौद्ध धर्म स्वीकारा (लघु शिलालेख - I तथा II) परन्तु वह धर्म के प्रति उतना सक्रिय नहीं रहा.
              4. दशम वर्ष में बोधगया (दीर्घ शिलालेख/III) की यात्रा की और पूर्ण रूप से वह बौद्ध हो गया.
              5. राजकीय शिकार की प्रथा समाप्त कर दी और धम्म यात्रा प्रारम्भ की.
              6. 11वें-12वें शासन वर्ष में उसने धम्म पर मौखिक घोषनाएँ करनी शुरू की.
              7. विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों में सद्भाव स्थापित किया (लघु शिलालेख)
              8. पशुवध बंद किया (दीर्घ शिलालेख-I).
              9. भारत और विदेशों में अस्पताल खोले और वृक्ष लगवाए (दीर्घ शिलालेख-II)
              10. सीमाओं पर अपने सद्भाव का आश्वासन दिया (लघु कलिंग शिलालेख -II)
              11. विधि और न्याय से शासन करने का व्रत किया (पृथक कलिंग शिलालेख)
              12. धार्मिक सम्प्रदायों में आपसी विरोधों को रोकने का प्रयास किया (दीर्घ शिलालेख - XII)
              13. बारहवें वर्ष (दीर्घ स्तम्भ लेख - VI) में प्रथम राजाज्ञा अभिलिखित की और धम्म आदेश जारी करने शुरू किये.
              14. उसी वर्ष (दीर्घ शिलालेख - IV) धम्म प्रसार के लिए एक जन-प्रदर्शन किया.
              15. उसी वर्ष आजीविकों को (गुहा लेख - I, II) गुफाएँ प्रदान कीं.
              16. उसी वर्ष (दीर्घ शिलालेख - III) अधिकारीयों को अपने-अपने क्षेत्र में भ्रमण का आदेश दिया.
              17. 13वें वर्ष में (दीर्घ शिलालेख - V) धम्म-महामात्रों की नियुक्ति की.
              18. मुनि के स्तूप को दुगुना बढ़ाया (निगलिवा - दीर्घ स्तम्भ लेख)
              19. 19वें वर्ष में (गुज लेख -III) आजीविकों को तीसरी गुफा प्रदान की.
              20. 20वें वर्ष में लुम्बिनी (दीर्घ स्तम्भ लेख-निगलिवा शिलालेख) की यात्रा के मध्य एक स्तम्भ स्थापित करके बलि का अन्त और भू-राजस्व भाग 1/8 कर दिया.
              21. 22वें और 24वें वर्षों के मध्य विरुद्ध आचरण वाले बौद्ध भिक्षुओं को विहारों से निकालने का उल्लेख मिलता है और बौद्धों द्वारा गहन अध्ययन की संस्तुति का पता चलता है और द्वितीय महारानी कारूवाकी के दानों की घोषणा की सूचना मिलती है. उसके शासन के 27वें वर्ष में दान को संगठित रूप देने और विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के कार्यकलाप की देखभाल के लिए महामात्रों की नियुक्ति का उल्लेख मिलता है.
              22. 26वें वर्ष प्रथम छह स्तम्भ-राज्यादेश जारी (दीर्घ स्तम्भ लेख - IV) किये, जिला अधिकारियों को जन-कल्याण के कार्य करने एवं न्यायपूर्ण निष्पक्ष शासन करने को उद्बोधन दिया (दीर्घ स्तम्भलेख - IV और V).
              23. 26वें वर्ष के बाद (महारानी का स्तम्भ अभिलेख) अपनी दूसरी रानी के द्वारा दिए गए उपहारों के बारे में अभिलिखित कराया.
              24. 27वें वर्ष में (दीर्घ स्तम्भ लेख - VII) 7वाँ स्तम्भ अभिलेख जारी किया.
              25. संभवतः 27वें वर्ष में (सारनाथ स्तम्भ अभिलेख के बाद) नियम-विरुद्ध प्रवृत्तियों की भर्त्सना की.

              भारतीय महान शासक ,सम्राट अशोक

              अशोक के विषय में Important Facts

              1. अशोक का सर्वाधिक पसंदीदा पंक्षी मयूर था.
              2. अशोक के जीवित भाइयों और बहनों के परिवारों का उल्लेख पांचवे शिलालेख में मिलता है.
              3. राजतरंगिणी के अनुसार बौद्ध धर्म स्वीकार करने के पूर्व अशोक ब्राह्मण धर्म (शिव का उपासक) का अनुयायी था.
              4. दिव्यावदान के अनुसार, अशोक को बौद्ध धर्म में उपगुप्त ने दीक्षित किया था.
              5. अशोक को उसके शासन के चौथे वर्ष निग्रोध नामक सात वर्षीय भिक्षु ने बौद्ध मत में दीक्षित किया था, वह उल्लेख सिंहली अनुश्रुतियों (दीपवंश और महावंश) में होता है.
              6. वृहतशिलालेख पांच में अशोक द्वारा बौद्ध ग्रहण करने के बाद राजकीय पाकशाला में दो मयूर और एक हिरन का वध किये जाने का उल्लेख मिलता है.
              7. बौद्ध साहित्य में प्रयुक्त भिक्षु गतिक शब्दों का प्रयोग संघ में प्रविष्ट होने के लिए उन्मुख होने के सन्दर्भ में किया गया है.
              8. प्रथम लघु शिलालेक के अनुसार, बौद्ध धर्म ग्रहण के बाद अशोक 2 वर्ष 6 माह तक एक साधारण उपासक था.
              9. भाब्रू (बैराट, राजस्थान) से प्राप्त लघु शिलालेख जिसमें अशोक स्पष्टतः बुद्ध, धम्म और संघ का अभिवादन करता है.
              10. सारनाथ, साँची और कौशाम्बी के लघु स्तम्भों पर उत्कीर्ण शासनादेश अशोक को बौद्ध सिद्ध करते हैं.
              11. अशोक साँची, सारनाथ और कौशाम्बी लघु स्तम्भ लेखों में बौद्ध संघ में फूट डालने वाले भिक्षु और भिक्षुणियों को निष्कासन  चेतावनी देता है.
              12. बौद्ध संघ से सम्बंधित पबज्जा (प्रवज्या-संन्यास) नाम की प्रथा, अशोक के समय तक पर्याप्त सुदृढ़ हो चुकी थी.
              13. दिव्यावदान से अशोक द्वारा खस देश (नेपाल) के विजय का उल्लेख मिलता है.
              14. अशोक ने पालि भाषा और ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया.
              15. अशोक के अभिलेखों में प्राकृत प्रयुक्त भाषा है.
              16. तीसरे शिलालेख में अशोक ने अल्प व्यय और अल्प संग्रह को धम्म का अंग माना है.
              17. गार्गी संहिता ग्रन्थ में धम्म विजय का पालन करने के कारण अशोक की आलोचना की गई है.
              18. स्तम्भ अभिलेख न. 7 को अशोक के शासनकाल की अंतिम घोषणा माना जाता है.
              19. दिव्यावदान के अनुसार अशोक अपने जीवन के अंतिम समय में, कुक्कुटाराम विहार को उपहार देना चाहता था.
              20. अशोक की राजत्व सबंधी अवधारणा का विवेचन छठे शिलालेख में प्राप्त होती है.
              21. अशोक ने कश्मीर में श्रीनगर का निर्माण कराया था.
              22. दिव्यावदान के अनुसार अशोक ने नेपाल में देवपाटन नगर की स्थापना की. तारानाथ के विवरण के अनुसार अशोक ने नेपाल में 'ललितपत्तन” नामक नगर बसाया था और उसकी बेटी चारुमती ने देवपत्तन नामक नगर बसाया था.
              23. ब्रह्मगिरि शिलालेख में अशोक द्वारा 256 रातें धम्म यात्रा में बिताने का उल्लेख है.
              24. अशोक के धम्म की परिभाषा 'राहुलोवावसुत्त” ग्रंथ से ली गई है.

              भारतीय रिंग्वेद

              1. ऋग्वेद में उल्लेख मिलता है कि उस समय कुछ स्त्रियाँ ऐसी थीं जो पूरी जिंदगी अविवाहित रहती थीं. ऐसी स्त्रियों/कन्याओं को अमाजू कहते थे.
              2. ऋग्वेद में अनेक बार पंचजन का उल्लेख हुआ है. निरुक्त (वेदों पर लिखा किताब) में उल्लेख है कि कुछ विद्वान् पंचजन से चार वर्णों और निषाद-समुदाय (नाविक वर्ग) का अर्थ समझते हैं.
              3. Rigveda में इंद्र को पञ्चजन्य बतलाया गया है.
              4. ऋग्वैदिक काल में वर्ण कर्म के आधार पर ही संगठित थे.
              5. इस वेद में दो भाइयों का उल्लेख मिलता है - शांतनु और देवापि, जिसमें शांतनु राजा है और देवापि एक पुरोहित है.
              6. Rigveda में केवल हिमालय और उसकी चोटी मूजवंत का उल्लेख मिलता है. शतपथ ब्राह्मण में त्रिककुट का भी उल्लेख है जिसको आजकल त्रिकोट कहते हैं.
              7. इस वेद में सिन्धु नदी को हिरण्ययी कहा गया है क्योंकि इस नदी के द्वारा धन की प्राप्ति होती थी.
              8. गृहस्थ शब्द के लिए ऋग्वेद में गृहपति शब्द का उल्लेख है.
              9. ऋग्वेद में ऋजाश्व और भृज्यु की कथाओं से स्पष्ट है कि पिता का पुत्र पर सम्पूर्ण अधिकार होता था.
              10. जंगल की देवी अरण्यानी का उल्लेख 'ऋक् संहिता” में प्राप्त होता है.
              11. शूद्र शब्द की सूचना ऋग्वेद के 10वें मंडल से प्राप्त होती है.
              12. Rigveda में फसलों के रूप में - जौ और धान्य का उल्लेख मिलता है.
              13. ऋग्वेद में मगध के लिए कीकट शब्द का प्रयोग किया गया है.

              न्यूज़ 11/3/2020

               दिल्ली. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला (Om Birla) ने बुधवार को कांग्रेस के सातों सदस्यों के निलंबन के आदेश को तत्काल प्रभाव से समाप्त करने की घोषणा की. सर्वदलीय बैठक में सभी दलों ने निलंबन वापस लेने का अनुरोध किया था, जिसके बाद ये फैसला लिया गया.

              बीते दिनों कांग्रेस के सात सांसदों गौरव गोगोई, टी.एन प्रतापन, एडवोकेट डीन कुरियाकोस, बेनी बेहनन, मणिक्कम टैगोर, राजमोहन उन्नीथन और गुरजीत सिंह औजला ने लोकसभा में दिल्ली हिंसा को लेकर हंगामा किया था. इन कांग्रेस सांसदों पर स्पीकर पर पेपर फेंकने का आरोप है. इस घटना के बाद स्पीकर ने इन सांसदों को लोकसभा के बजट सत्र तक निलंबित कर दिया था.

              सनातन

              फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...