संविधान क्या केवल भीम राव का था

हिंदुओं को टॉर्चर किया जा रहा है और यह #संविधान निर्माताओं का अपमान है जो कि इसके असली हकदार को भूला दिया गया 

#संविधान सभा के स्थाई अध्यक्ष 
डॉ राजेंद्र प्रसाद (श्रीवास्तव –कायस्थ)

#संविधान_सभा के अटॉर्नी जनरल 
BN RAW (#यदुवंशी – #अहीर)

#संविधान_सभा के अस्थाई अध्यक्ष 
डॉ– सच्चिदानंद सिन्हा (#यदुवंशी – गोप)

#संविधान सभा की कुल 22 समितियाँ थीं । जिनमें से 8 समितियाँ प्रमुख समितियाँ थीं और बाकी छोटी समितियाँ थीं। 

इन छोटी #समितियों में से एक समिति जिसे #प्रस्तावना कहा जाता है उसके अध्यक्ष थे भीम राव आंबेडकर वह भी 7 माननीय सांसद महोदय के साथ थे 

#संविधान_सभा में कुल 292 जन प्रतिनिधि चुने हुए थे यानी सांसद महोदय थे 
93 देशी स्वतंत्र राजा महाराजा और ब्रिटिश क्राउन वाले राजा महाराजा के साथ साथ 4 गवर्नर प्रेसीडेंसी रूल के सदस्य थे 
मतलब कुल सदस्यों की संख्या 389 

तो देश के लोगों तुमने अपने जाति पूर्वजों पुरखों को भुला दिया 
लेकिन भीम राव आंबेडकर के जाति वाले ने उनको नहीं भुलाया नतीजा सामने है 
आज भीम राव आंबेडकर के ऊपर टिप्पणी हो जाए 
या #जयभीम
न बोलो तो ये लुटेरे वर्ग खुलेआम #SCSTACT लगाते है और कोर्ट उनको एकमुश्त 1 लाख रुपए नकद रुपया देती हैं वह भी टैक्स पेयर/#IMF #वर्ल्ड बैंक से कर्ज लेकर 
इनकी भरपाई कौन करेगा???

उस पुलिस अधिकारी पर भी कार्यवाही होनी चाहिए जो कि हिन्दुओं को प्रताड़ित करने के लिए उन पर बिना किसी ठोस सबूत के  #SCSTACT #scstact लगा देता है 

#संविधान हम सभी का है किसी एक का नहीं है 
बहुत हुआ बर्दास्त अब और नहीं 

#जागो_हिंदुओं_जागो 
#संविधान_बचाओ

india Balochistan

Dear international friends of Balochistan.

We are starting a campaign to connect the people of Bharat and Balochistan, understanding each other's cultural bonds, historic and brotherly relations.

We will start publishing your write ups, articles, personal thoughts, your experiences, your suggestions and solidarity messages for the people of Balochistan

Mode of communication:
You can share your content via email: bharatbalochistancc@gmail.com or send DM on @miryar_baloch

Content:

1: You can record 3 seconds to 1 minute video solidarity message.

2: You can photos of hoisting Balochistan and Indian flags with your friends circle.

3: You can organise a village gathering video and show your solidarity with Balochistan.

4: You can send your text (minimum 500 words) expressing your moral support and your suggestions.

5: You can approach to the foreign Embassies and send letters and urge them to raise voice about gross human rights violations in PoB Pakistan Occupied Balochistan.

6: You can approach your constituency MLA, MPA, Vidhayak and local Panchayaat have their words for the importance of Bharat Balochistan Friendship.

7: You can send us a group photo showing your solidarity with the Baloch people.

8: Even if you don't want to show your face, you can still write your solidarity message without revealing your identity.

9: You can suggest your government to have a long term strategy to include Balochistan to its foreign policy agenda.

10: People of the country have the power and it is the time show your power for the betterment of our two countries.

Let's connect.
Long Live #BhafatBalochistanFriendship

भारत पाकिस्तान बांग्लादेश

राजस्थान से 1070 किमी लंबा तथा जम्मू-कश्मीर से 1222 किमी लंबा भारत पाकिस्तान के बीच अन्तर्राष्ट्रीय सीमा है...

राजस्थान में कोई आतंकवादी इतनी जल्दी आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने की कोशिश नहीं करता हैं लेकिन कुछ समय अंतराल के बाद बारम्बार लगातार जम्मू कश्मीर में कोई न कोई बड़ी आतंकवादी घटना को बड़ी गुमचुप तरीके से अंजाम दे दिया जाता है |

कारण क्या है ?

राजस्थान हिन्दू बहुल है और जम्मू कश्मीर मुस्लिम बहुल...राजस्थान में इस्लामिक जिहाद के समर्थक नहीं है | जबकि जम्मू कश्मीर में इस्लामिक जिहाद के समर्थक घर-घर भरे पड़ें है | राजस्थान में इस्लामिक जिहाद के समर्थकों का इलाज वहां के स्थानीय लोग बेहिचक करने में जरा भी चिंता नहीं करेंगे | जबकि जम्मू कश्मीर में वहाँ के स्थानीय लोग इस्लामिक किताब के कारण खुलकर "तेरा मेरा रिस्ता क्या! ला इल्लाह! इ ललाह!" का रिस्ता निभाते आये हैं |

इस्लामिक जिहाद और कट्टरपंथी मुस्लिम देश के कोने-कोने में भारत की बर्बादी और तबाही की बेसर्बी से प्रतीक्षा "सेकुलरिज्म की आड़" में कर रहें हैं और भारत का गैर-मुस्लिम समाज आज भी गहरी नींद में सोया हैं| सेक्युलर लोग और सेक्युलर पार्टियां से जुड़े स्वार्थी लोग एक दिन इस भारत का सत्यानाश करवा के ही रहेंगे | 

"कट्टरपंथी सोच इस्लामिक जिहाद और आतंकवाद, सत्ता और मुस्लिम वोट के लिए इनकी आँखों पर बंधी मुस्लिम पट्टी और मौन साधना भारत के लिए सबसे खतरनाक है" 

पहलगाम आतंकी हमले के बाद जिस तरह से सेक्युलर नेताओं और उनके समर्थकों का इस्लामिक जिहाद और आतंकवाद पर सोशल मीडिया पर घमासान मचा हुआ है भारत में अंदरूनी सोच और जमीनी हकीकत उससे भी भयावह है जिसे जानने और समझने में भारत के तमाम धर्म और जाति के गैर मुस्लिम लोगों ने जानने और समझने में बहुत देर कर दी है | सेक्युलर सोच ने देश में इस्लामिक जिहाद और कट्टरपंथ को इतना सुदृढ़ और मजबूत कर दिया है संविधान की दुहाई निकट भविष्य में किसी काम की नहीं रहेगी |

5 लाख से जायदा मुस्लिम महिलाओं का पाकिस्तानी नागरिक से विवाह और देश के विभिन्न राज्यों में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसबैठियों का बेधड़क दाखिल होना झारखण्ड के आदिवासी इलाकों में, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में, बिहार के सीमांचल में.... असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, केरला, हैदराबाद, महाराष्ट्र, दिल्ली में बगावत के किनारे खड़े हैं | 

भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के 99.99 फीसदी मुसलमान कुरान के आगे नतमस्तक हैं | कुरान ही इनके दिलों दिमाग में इसके अतिरिक्त सब शून्य सा महसूस होता है | इस्लामिक जिहाद में मानवता करुणा दया और इंसानियत की कोई जगह नहीं हैं | हैवानियत और बात-बात में इंशाअल्लाह का उद्घोष कट्टर होने, दिखाने और एकजुट होने का बेहद खतरनाक मंत्र है |

उदाहरण अगर प्रेम, करुणा, दया, मानवता होता तो भारत में 'मदरसे' सार्वजानिक रूप से संचालित किये जाते, किसी के आने-जाने पर धर्म को देखकर पाबन्दी नहीं होती, जबकि गैर-मुस्लिम में ऐसा कोई सख्त पाबन्दी मैंने नहीं देखा न सुना |  

रामायण छोड़ के केवल 25 प्रतिशत भारतवंशी सिर्फ महाभारत के आगे नतमस्तक हो जाए भारत में कट्टरपंथी सोच, इस्लामिक जिहाद, आंतकवाद और आतंकवादियों के समर्थक और अनियंत्रित दोगली सेकुलरिज्म सबको आसानी से नियंत्रित किया जा सकता हैं अन्यथा "हिन्दुस्तान किसी के बाप का नहीं है", सुनने को नहीं मिलेगा बल्कि शीघ्र ही यहाँ से इस्लामिक जिहादियों और मुस्लिम आतंकियों के कारण भारत से भगा दिए जाओगे या बेहरमी से मार दिए जाओगे |

हमारे प्राचीन संस्कृति की देन है- सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक विनम्रता, धैर्य, संयम, सहलशीलता, त्याग, प्रेम, करुणा, दया, मानवता और इंसानियत का विश्व में कोई जोड़ा नहीं हैं, न ही होगा !

समय और वर्तमान परिस्तिथियों के आधार पर "सच कड़वा है" और यह मेरे व्यक्तिगत विचार एवं ऐसा मानना हैं...सहमत होना या न होना जरुरी नहीं है |

पुरे देश को समझाने-बुझाने वाले अहिंसावादी हिन्दू 'गाँधी' एक कट्टरपंथी 'जिन्ना' को नहीं समझा पाए थे...ठीक वैसा ही समय आ रहा है सेक्युलर हिंदू...कुरानी सोच, इस्लामिक कट्टरपंथी और जिहादी को नहीं समझा पाएंगे...लिख के रख लीजिये !

@nirajbabu121

सिंधु जल संधि क्या है

सिंधु नदी जल समझौता ,पूरा पढ़िए थ्रेड🧵 

ब्रिटिश राज के दौरान ही दक्षिण पंजाब में सिंधु नदी घाटी पर बड़ी नहर का निर्माण करवाया गया था. उस इलाक़े को इसका इतना लाभ मिला कि बाद में वो दक्षिण एशिया का एक प्रमुख कृषि क्षेत्र बन गया.

भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे के दौरान जब पंजाब को विभाजित किया गया तो इसका पूर्वी भाग भारत के पास और पश्चिमी भाग पाकिस्तान के पास गया.

बंटवारे के दौरान ही सिंधु नदी घाटी और इसकी विशाल नहरों को भी विभाजित किया गया. लेकिन इससे होकर मिलने वाले पानी के लिए पाकिस्तान पूरी तरह भारत पर निर्भर था

पानी के बहाव को बनाए रखने के उद्देश्य से पूर्व और पश्चिम पंजाब के चीफ़ इंजीनियरों के बीच 20 दिसंबर 1947 को एक समझौता हुआ.

इसके तहत बंटवारे से पहले तय किया गया पानी का निश्चित हिस्सा भारत को 31 मार्च 1948 तक पाकिस्तान को देते रहना तय हुआ.

1 अप्रैल 1948 को जब समझौता लागू नहीं रहा तो भारत ने दो प्रमुख नहरों का पानी रोक दिया जिससे पाकिस्तानी पंजाब की 17 लाख एकड़ ज़मीन पर हालात ख़राब हो गए.

भारत के इस क़दम के कई कारण बताए गए जिसमें एक था कि भारत कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहता था.

बाद में हुए समझौते के बाद भारत पानी की आपूर्ति जारी रखने पर राज़ी हो गया 

स्टडी के मुताबिक 1951 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने टेनसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख डेविड लिलियंथल को भारत बुलाया.

लिलियंथल पाकिस्तान भी गए और वापस अमेरिका लौटकर उन्होंने सिंधु नदी घाटी जल बंटवारे पर एक लेख लिखा.

ये लेख विश्व बैंक प्रमुख और लिलियंथल के दोस्त डेविड ब्लैक ने भी पढ़ा और उन्होंने भारत और पाकिस्तान के प्रमुखों से इस बारे में संपर्क किया. और फिर दोनों पक्षों के बीच बैठकों का सिलसिला शुरू हुआ.

ये बैठकें क़रीब एक दशक तक चलीं और आख़िरकार 19 सितंबर 1960 को कराची में सिंधु नदी घाटी संधि पर हस्ताक्षर हुए.

समझौते की शर्ते निम्न प्रकार से है :

संधि के मुताबिक़, सिंधु, झेलम और चिनाब को पश्चिमी नदियां बताते हुए इनका पानी पाकिस्तान के लिए तय किया गया. जबकि रावी, ब्यास और सतलुज को पूर्वी नदियां बताते हुए इनका पानी भारत के लिए तय किया गया.

इसके मुताबिक़,भारत पूर्वी नदियों के पानी का, कुछ अपवादों को छोड़कर, बेरोकटोक इस्तेमाल कर सकता है.

वहीं पश्चिमी नदियों के पानी के इस्तेमाल का कुछ सीमित अधिकार भारत को भी दिया गया था. जैसे बिजली बनाना, कृषि के लिए सीमित पानी.

इस संधि में दोनों देशों के बीच समझौते को लेकर बातचीत करने और साइट के मुआयना आदि का प्रावधान भी था.

इसी संधि में सिंधु आयोग भी स्थापित किया गया. इस आयोग के तहत दोनों देशों के कमिश्नरों के मिलने का प्रस्ताव था.

संधि में दोनों कमिश्नरों के बीच किसी भी विवादित मुद्दे पर बातचीत का प्रावधान है.

इसमें यह भी था कि जब कोई एक देश किसी परियोजना पर काम करता है और दूसरे को उस पर कोई आपत्ति है तो पहला देश उसका जवाब देगा. इसके लिए दोनों पक्षों की बैठकें होंगी.

बैठकों में भी अगर कोई हल नहीं निकल पाया तो दोनों देशों की सरकारों को इसे मिलकर सुलझाना होगा.

साथ ही ऐसे किसी भी विवादित मुद्दे पर तटस्थ विशेषज्ञ की मदद लेने या कोर्ट ऑफ़ ऑर्बिट्रेशन में जाने का प्रावधान भी रखा गया है

जाती हैं कि जाति नही

मौत के घाट उतार दिया गया था। 

7) हाँ, जाति पूछकर ही 1979 में पटना के पास पारसबीघा में 11 दलित और एक यादव को भूमिहारों ने मौत के घाट उतार दिया था। 

८.) हाँ, जाति पूछकर ही शंकरबीघा में 1999 में 23 दलितों को मौत के घाट उतार दिया गया था। 

9) हाँ, जाति पूछकर ही 1988 में नोनहीगढ़ नगवाँ में 19 दलितों को मौत के घाट उतार दिया गया था। 

10) हाँ, जाति पूछकर ही 1989 में भोजपुर के दनवर-बिहटा गाँव में 23 दलितों का क़त्लेआम सिर्फ़ इसलिए हुआ क्यूँकि वो अपने मर्ज़ी से वोट कर आए थे। 

11) हाँ, जाति पूछकर ही दलित दूल्हे को घोड़ी चढ़ने नहीं दिया जाता है। 

12) हाँ, जाति पूछकर ही दलित महिलाओं को अपना स्तन ढकने नहीं दिया जाता था।

13) हाँ, जाति पूछकर ही वेदों का मंत्र सुनने

मुर्शिदाबाद

आज जब मुर्शिदाबाद जल रहा है और वहां से हिंदू पलायन कर रहे हैं, तो एक बात अपने हृदय पर हाथ रख कर बताइएगा। क्या आपको पता था कि मुर्शिदाबाद में 51 शक्तिपीठों में से एक कीरिटेश्वरी पीठ है।

ये बात बताना भी प्रासंगिक है कि सन 1700 में यह जिला भारत का सबसे समृद्ध जिला था। एक अनुमान के अनुसार तत्कालीन भारत की 20% जीडीपी और पूरे विश्व की 5% अर्थव्यवस्था का उत्पादन आज के मुर्शिदाबाद में होता था। यहां का रेशम पूरे विश्व में निर्यात होता था..

उस जमाने के सबसे बड़े व्यापारी जगत सेठ इसी जिले के थे और मुर्शीद कुली खान के साथ मिलकर उन्होंने मुर्शिदाबाद को शहर और बाद में बंगाल की राजधानी (ढाका से बदलकर) बनने योगदान दिया. जैसे अमेरिका में कभी रोथचाइल्ड परिवार था, वैसे ही जगत सेठ के पास अकूत धन और विस्तृत व्यापार था।

मुर्शिदाबाद औरंगजेब की सबसे दुधारू गाय थी. मुर्शिदकुली औरंग को सबसे अधिक कर वसूल कर देते थे। 1~2 करोड़ प्रतिवर्ष...

और आज?

मुर्शिदाबाद में मोम्बीज की जनसंख्या बहुसंख्य (70%) हैं। नतीजा भारत के सबसे समृद्ध जिले से आज गरीब जिले में बदल चुका हैं। तुलनात्मक रूप से भारत की औसत पर कैपिटा आय 205,000/व्यक्ति/वर्ष है तो मुर्शिदाबाद में यह घटकर 149,000 / व्यक्ति/वर्ष है.

आज मुर्शिदाबाद उत्तर बंगाल और झारखंड के बीच "चिकन नेक" जैसा हैं।

विडंबना है कि जो कभी शक्तिपीठ था, आज वहां से हिंदुओं का पलायन हो रहा है. 

यह शक्तिपीठ भी कब तक सुरक्षित है, समय बतायेगा... 

जय भवानी 🚩

सनातन को समझे

⚘️पाँच तत्व ●  पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
⚘️पाँच देवता ●  गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
⚘️पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ●  आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
⚘️पाँच कर्म ●  रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
⚘️पाँच  उंगलियां ● अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
⚘️पाँच पूजा उपचार ● गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य।
⚘️पाँच अमृत ●  दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
⚘️पाँच प्रेत ●  भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
⚘️पाँच स्वाद ● मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
⚘️पाँच वायु ● प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
⚘️पाँच इन्द्रियाँ ● आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
⚘️पाँच वटवृक्ष ● सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
⚘️पाँच पत्ते ●  आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
⚘️पाँच कन्या ●  अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।

एलर्जी

एलर्जी

" एलर्जी " एक आम शब्द , जिसका प्रयोग हम कभी ' किसी ख़ास व्यक्ति से मुझे एलर्जी है ' के रूप में करते हैं. ऐसे ही हमारा शरीर भी ख़ास रसायन उद्दीपकों के प्रति अपनी असहज प्रतिक्रया को ' एलर्जी ' के रूप में दर्शाता है.

बारिश के बाद आयी धूप तो ऐसे रोगियों क़ी स्थिति को और भी दूभर कर देती है. ऐसे लोगों को अक्सर अपने चेहरे पर रूमाल लगाए देखा जा सकता है. क्या करें छींक के मारे बुरा हाल जो हो जाता है.

हालांकि एलर्जी के कारणों को जानना कठिन होता है , परन्तु कुछ आयुर्वेदिक उपाय इसे दूर करने में कारगर हो सकते हैं. आप इन्हें अपनाएं और एलर्जी से निजात पाएं !

• नीम चढी गिलोय के डंठल को छोटे टुकड़ों में काटकर इसका रस हरिद्रा खंड चूर्ण के साथ 1.5 से तीन ग्राम नियमित प्रयोग पुरानी से पुरानी एलर्जी में रामबाण औषधि है.

• गुनगुने निम्बू पानी का प्रातःकाल नियमित प्रयोग शरीर सें विटामिन - सी की मात्रा की पूर्ति कर एलर्जी के कारण होने वाले नजला - जुखाम जैसे लक्षणों को दूर करता है.

• अदरख , काली मिर्च , तुलसी के चार पत्ते , लौंग एवं मिश्री को मिलाकर बनायी गयी ' हर्बल चाय ' एलर्जी से निजात दिलाती है.

• बरसात के मौसम में होनेवाले विषाणु ( वायरस ) संक्रमण के कारण ' फ्लू ' जनित लक्षणों को नियमित ताजे चार नीम के पत्तों को चबा कर दूर किया जा सकता है.

• आयुर्वेदिक दवाई ' सितोपलादि चूर्ण ' एलर्जी के रोगियों में चमत्कारिक प्रभाव दर्शाती है.

• नमक पानी से ' कुंजल क्रिया ' एवं ' नेती क्रिया " कफ दोष को बाहर निकालकर पुराने से पुराने एलर्जी को दूर कने में मददगार होती है.

• पंचकर्म की प्रक्रिया ' नस्य ' का चिकित्सक के परामर्श से प्रयोग ' एलर्जी ' से बचाव ही नहीं इसकी सफल चिकित्सा है.

• प्राणायाम में ' कपालभाती ' का नियमित प्रयोग एलर्जी से मुक्ति का सरल उपाय है.

कुछ सावधानियां जिन्हें अपनाकर आप एलर्जी से खुद को दूर रख सकते हैं : -

• धूल , धुआं एवं फूलों के परागकण आदि के संपर्क से बचाव.

• अत्यधिक ठंडी एवं गर्म चीजों के सेवन से बचना.

• कुछ आधुनिक दवाओं जैसे : एस्पिरीन , निमासूलाइड आदि का सेवन सावधानी से करना.

• खटाई एवं अचार के नियमित सेवन से बचना.

हल्दी से बनी आयुर्वेदिक औषधि '

  हरिद्रा खंड ' के सेवन से शीतपित्त , खुजली , एलर्जी , और चर्म रोग नष्ट होकर देह में सुन्दरता आ जाती हे | बाज़ार में यह ओषधि सूखे चूर्ण के रूप में मिलती हे | इसे खाने के लिए मीठे दूध का प्रयोग अच्छा होता हे | परन्तु शास्त्र विधि में इसको निम्न प्रकार से घर पर बना कर खाया जाये तो अधिक गुणकारी रहता हे | बाज़ार में इस विधि से बना कर चूँकि अधिक दिन तक नहीं रखा जा सकता , इसलिए नहीं मिलता हे | घर पर बनी इस विधि बना हरिद्रा खंड अधिक गुणकारी और स्वादिष्ट होता हे | मेरा अनुभव हे की कई सालो से चलती आ रही एलर्जी , या स्किन में अचानक उठाने वाले चकत्ते , खुजली इसके दो तीन माह के सेवन से हमेशा के लिए ठीक हो जाती हे | इस प्रकार के रोगियों को यह बनवा कर जरुर खाना चाहिए | और अपने मित्रो कोभी बताना चाहिए | यह हानि रहित निरापद बच्चे बूढ़े सभी को खा सकने योग्य हे | जो नहीं बना सकते वे या शुगर के मरीज , कुछ कम गुणकारी , चूर्ण रूप में जो की बाज़ार में उपलब्ध हे का सेवन कर सकते हे |

हरिद्रा खंड निर्माण विधि

सामग्री -

 हरिद्रा -320 ग्राम , गाय का घी - 240 ग्राम , दूध - 5 किलो , शक्कर -2 किलो |
    सोंठ , कालीमिर्च , पीपल , तेजपत्र , छोटी इलायची , दालचीनी , वायविडंग , निशोथ , हरड , बहेड़ा , आंवले , नागकेशर , नागरमोथा , और लोह भस्म , प्रत्येक 40-40 ग्राम ( यह सभी आयुर्वेदिक औषधि विक्रेताओ से मिल जाएँगी ) | आप यदि अधिक नहीं बनाना चाहते तो हर वस्तु अनुपात रूप से कम की जा सकती हे |

( यदि हल्दी ताजी मिल सके तो 1 किलो 250 ग्राम लेकर छीलकर मिक्सर पीस कर काम में लें | )

बनाने की विधि - हल्दी को दूध में मिलाकार खोया या मावा बनाये , इस खोये को घी डालकर धीमी आंच पर भूने , भुनने के बाद इसमें शक्कर मिलाये | सक्कर गलने पर शेष औषधियों का कपड छान बारीक़ चूर्ण मिला देवे | अच्छी तरह से पाक जाने पर चक्की या लड्डू बना लें |
सेवन की मात्रा - 20-25 ग्राम दो बार दूध के साथ |
( बाज़ार में मिलने वाला हरिद्रखंड चूर्ण के रूप में मिलता हे इसमें घी और दूध नहीं होता शकर कम या नहीं होती अत : खाने की मात्रा भी कम 3 से 5 ग्राम दो बार रहेगी | 

भारतीय संविधान का विकास

भारतीय संविधान के विकास का इतिहास(1773-1947)

1757 ई. की प्लासी की लड़ाई और 1764 ई. बक्सर के युद्ध को अंग्रेजों द्वारा जीत लिए जाने के बाद बंगाल पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने शासन का शिकंजा कसा. इसी शासन को अपने अनुकूल बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने समय-समय पर कई एक्ट पारित किए, जो भारतीय संविधान के विकास की सीढ़ियां बनीं. वे निम्न हैं:

1. 1773 ई. का रेग्‍यूलेटिंग एक्ट: इस एक्ट के अंतर्गत कलकत्ता प्रेसिडेंसी में एक ऐसी सरकार स्थापित की गई, जिसमें गवर्नर जनरल और उसकी परिषद के चार सदस्य थे, जो अपनी सत्ता का उपयोग संयुक्त रूप से करते थे. इसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं -
(i) कंपनी के शासन पर संसदीय नियंत्रण स्थापित किया गया.
(ii) बंगाल के गवर्नर को तीनों प्रेसिडेंसियों का जनरल नियुक्त किया गया.
(iii) कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई.

2. 1784 ई. का पिट्स इंडिया एक्ट: इस एक्ट के द्वारा दोहरे प्रशासन का प्रारंभ हुआ-
(i) कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स - व्यापारिक मामलों के लिए
(ii) बोर्ड ऑफ़ कंट्रोलर- राजनीतिक मामलों के लिए.

3. 1793 ई. का चार्टर अधिनियम: इसके द्वारा नियंत्रण बोर्ड के सदस्यों तथा कर्मचारियों के वेतन आदि को भारतीय राजस्व में से देने की व्‍यवस्‍था की गई.

4. 1813 ई. का चार्टर अधिनियम: इसके द्वारा (i) कंपनी के अधिकार-पत्र को 20 सालों के लिए बढ़ा दिया गया. (ii) कंपनी के भारत के साथ व्यापर करने के एकाधिकार को छीन लिया गया. लेकिन उसे चीन के साथ व्यापर और पूर्वी देशों के साथ चाय के व्यापार के संबंध में 20 सालों के लिए एकाधिकार प्राप्त रहा. (iii) कुछ सीमाओं के अधीन सभी ब्रिटिश नागरिकों के लिए भारत के साथ व्यापार खोल दिया गया.

5. 1833 ई. का चार्टर अधिनियम: इसके द्वारा (i) कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए. (ii) अब कंपनी का कार्य ब्रिटिश सरकार की ओर से मात्र भारत का शासन करना रह गया. (iii) बंगालग के गवर्नर जरनल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा. (iv) भारतीय कानूनों का वर्गीकरण किया गया तथा इस कार्य के लिए विधि आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था की गई.

6. 1853 ई. का चार्टर अधिनियम: इस अधिनियम के द्वारा सेवाओं में नामजदगी का सिद्धांत समाप्त कर कंपनी के महत्वपूर्ण पदों को प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर भरने की व्यवस्था की गई.

7. 1858 ई. का चार्टर अधिनियम: (i) भारत का शासन कंपनी से लेकर ब्रिटिश क्राउन के हाथों सौंपा गया. (ii) भारत में मंत्री-पद की व्यवस्था की गई. (iii) 15 सदस्यों की भारत-परिषद का सृजन हुआ. (iv) भारतीय मामलों पर ब्रिटिश संसद का सीधा नियंत्रण स्थापित किया गया.

8. 1861 ई. का भारत शासन अधिनियम: गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार किया गया, (ii) विभागीय प्रणाली का प्रारंभ हुआ, (iii) गवर्नर जनरल को पहली बार अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई. (iv) गवर्नर जरनल को बंगाल, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब में विधान परिषद स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई.

9. 1892 ई. का भारत शासन अधिनियम: (i) अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली की शुरुआत हुई, (ii) इसके द्वारा राजस्व एवं व्यय अथवा बजट पर बहस करने तथा कार्यकारिणी से प्रश्न पूछने की शक्ति दी गई.

10. 1909 ई० का भारत शासन अधिनियम [मार्ले -मिंटो सुधार] -
(i) पहली बार मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक प्रतिनिधित्व का उपबंध किया गया.
(ii) भारतीयों को भारत सचिव एवं गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषदों में नियुक्ति की गई.
(iii) केंद्रीय और प्रांतीय विधान-परिषदों को पहली बार बजट पर वाद-विवाद करने, सार्वजनिक हित के विषयों पर प्रस्ताव पेश करने, पूरक प्रश्न पूछने और मत देने का अधिकार मिला.
(iv) प्रांतीय विधान परिषदों की संख्या में वृद्धि की गई.

11. 1919 ई० का भारत शासन अधिनियम [मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार] -
(i) केंद्र में द्विसदनात्मक विधायिका की स्थापना की गई- प्रथम राज्य परिषद तथा दूसरी केंद्रीय विधान सभा. राज्य परिषद के सदस्यों की संख्या 60 थी; जिसमें 34 निर्वाचित होते थे और उनका कार्यकाल 5 वर्षों का होता था. केंद्रीय विधान सभा के सदस्यों की संख्या 145 थी, जिनमें 104 निवार्चित तथा 41 मनोनीत होते थे. इनका कार्यकाल 3 वर्षों का था. दोनों सदनों के अधिकार समान थे. इनमें सिर्फ एक अंतर था कि बजट पर स्वीकृति प्रदान करने का अधिकार निचले सदन को था.

(ii) प्रांतो में द्वैध शासन प्रणाली का प्रवर्तन किया गया. इस योजना के अनुसार प्रांतीय विषयों को दो उपवर्गों में विभाजित किया गया- आरक्षित तथा हस्तांतरित. आरक्षित विषय थे - वित्त, भूमिकर, अकाल सहायता, न्याय, पुलिस, पेंशन, आपराधिक जातियां, छापाखाना, समाचार पत्र, सिंचाई, जलमार्ग, खान, कारखाना, बिजली, गैस, व्यालर, श्रमिक कल्याण, औघोगिक विवाद, मोटरगाड़ियां, छोटे बंदरगाह और सार्वजनिक सेवाएं आदि.

हस्तांतरित विषय -
(i) शिक्षा, पुस्तकालय, संग्रहालय, स्थानीय स्वायत्त शासन, चिकित्सा सहायता.
(ii) सार्वजनिक निर्माण विभाग, आबकारी, उघोग, तौल तथा माप, सार्वजनिक मनोरंजन पर नियंत्रण, धार्मिक तथा अग्रहार दान आदि.
(iii) आरक्षित विषय का प्रशासन गवर्नर अपनी कार्यकारी परिषद के माध्यम से करता था; जबकि हस्तांतरित विषय का प्रशासन प्रांतीय विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी भारतीय मंत्रियों के द्वारा किया जाता था.
(iv) द्वैध शासन प्रणाली को 1935 ई० के एक्ट के द्वारा समाप्त कर दिया गया.
(v) भारत सचिव को अधिकार दिया गया कि वह भारत में महालेखा परीक्षक की नियुक्ति कर सकता है.
(vi) इस अधिनियम ने भारत में एक लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान किया.
12.
 1935 ई० का भारत शासन अधिनियम: 1935 ई० के अधिनियम में 451 धाराएं और 15 परिशिष्‍ट थे. इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
(i) अखिल भारतीय संघ: यह संघ 11 ब्रिटिश प्रांतो, 6 चीफ कमिश्नर के क्षेत्रों और उन देशी रियासतों से मिलकर बनना था, जो स्वेच्छा से संघ में सम्मलित हों. प्रांतों के लिए संघ में सम्मिलित होना अनिवार्य था, किंतु देशी रियासतों के लिय यह एच्छिक था. देशी रियासतें संघ में सम्मिलित नहीं हुईं और प्रस्तावित संघ की स्थापना संबंधी घोषणा-पत्र जारी करने का अवसर ही नहीं आया.
(ii) प्रांतीय स्वायत्ता: इस अधिनियम के द्वारा प्रांतो में द्वैध शासन व्यवस्था का अंत कर उन्हें एक स्‍वतंत्र और स्वशासित संवैधानिक आधार प्रदान किया गया.
(iii) केंद्र में द्वैध शासन की स्थापना: कुछ संघीय विषयों [सुरक्षा, वैदेशिक संबंध, धार्मिक मामलें] को गवर्नर जनरल के हाथों में सुरक्षित रखा गया. अन्य संघीय विषयों की व्यवस्था के लिए गवर्नर- जनरल को सहायता एवं परामर्श देने हेतु मंत्रिमंडल की व्यवस्था की गई, जो मंत्रिमंडल व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी था.
(iv) संघीय न्‍यायालय की व्यवस्था: इसका अधिकार क्षेत्र प्रांतों तथा रियासतों तक विस्तृत था. इस न्यायलय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा दो अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था की गई. न्यायालय से संबंधित अंतिम शक्ति प्रिवी काउंसिल [लंदन] को प्राप्त थी.
(v) ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता: इस अधिनियम में किसी भी प्रकार के परिवर्तन का अधिकार ब्रिटिश संसद के पास था. प्रांतीय विधान मंडल और संघीय व्यवस्थापिका: इसमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं कर सकते थे.
(vi) भारत परिषद का अंत : इस अधिनियम के द्वारा भारत परिषद का अंत कर दिया गया.
(vii) सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति का विस्तार: संघीय तथा प्रांतीय व्यवस्थापिकाओं में विभिन्न सम्प्रदायों को प्रतिनिधित्व देने के लिए सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति को जारी रखा गया और उसका विस्तार आंग्ल भारतीयों - भारतीय ईसाइयों, यूरोपियनों और हरिजनों के लिए भी किया गया.
(viii) इस अधिनियम में प्रस्तावना का अभाव था.
(xi) इसके द्वारा बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया, अदन को इंग्लैंड के औपनिवेशिक कार्यालय के अधीन कर दिया गया और बरार को मध्य प्रांत में शामिल कर लिया गया.

13. 1947 ई० का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम: ब्रिटिश संसद में 4 जुलाई, 1947 ई० को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम प्रस्तावित किया गया, जो 18 जुलाई, 1947 ई० को स्वीकृत हो गया. इस अधिनियम में 20 धाराएं थीं. अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्न हैं -
(i) दो अधिराज्यों की स्थापना: 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत एवं पाकिस्तान नामक दो अधिराज्य बना दिए जाएंगें, और उनको ब्रिटिश सरकार सत्ता सौंप देगी. सत्ता का उत्तरदायित्व दोनों अधिराज्यों की संविधान सभा को सौंपा जाएगा.
(ii) भारत एवं पाकिस्तान दोनों अधिराज्यों में एक-एक गवर्नर जनरल होंगे, जिनकी नियुक्ति उनके मंत्रिमंडल की सलाह से की जाएगी.
(iii) संविधान सभा का विधान मंडल के रूप में कार्य करना- जब तक संविधान सभाएं संविधान का निर्माण नई कर लेतीं, तब तक वह विधान मंडल के रूप में कार्य करती रहेंगीं.
(iv) भारत-मंत्री के पद समाप्त कर दिए जाएंगें.
(v) 1935 ई० के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा शासन जब तक संविधान सभा द्वारा नया संविधान बनाकर तैयार नहीं किया जाता है; तब तक उस समय 1935 ई० के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा ही शासन होगा.
(vi) देशी रियासतों पर ब्रिटेन की सर्वोपरिता का अंत कर दिया गया. उनको भारत या पाकिस्तान किसी भी अधिराज्य में सम्मलित होने और अपने भावी संबंधो का निश्चय करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई.

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भगवान श्री कृष्ण जन्माष्टमी विशेषांक, उखल में बांधा जाना

श्रीकृष्ण एक बार नन्दबाबाके आँगनसे बाहर निकलकर अब वे गोकुलकी गलियोंमें घूमने लगे थे। ग्वाल-बालोंके साथ खेलना-कूदना और ऊधम मचाना उनकी दिनचर्या बन गयी थी। भगवान् श्रीकृष्णकी शैतानियाँ गोकुलवासियोंके मनोरंजनका साधन बनी हुई थीं। प्रभु माखन-प्रेमी थे। घरमें माखनकी कमी थी भी नहीं; किंतु प्रभुको तो अपनी लीलाओंसे भक्तजनोंको सुख पहुँचाना ही चिर इष्ट रहा है। अतः वे माखन चोर बन बैठे। साथी ग्वाल-बालोंको लेकर वे किसी भी गोपके घर जा धमकते। खुद माखन खाते, साथियोंको खिलाते और बचे हुए माखनको इधर- उधर बिखेर भी देते। गोपियाँ मन-ही-मन यही चाहती भी थीं कि नटखट श्याम किसी भी बहाने उनके यहाँ आया करें; किंतु दिखावेके लिये वे उनको डाँटतीं-धमकातीं तथा उलाहना लेकर मैया यशोदाके पास भी पहुँच जातीं। यह बात अलग थी कि जब कभी मैया यशोदा श्रीकृष्णको दण्ड देनेके लिये उद्यत होतीं तो तत्काल वे उनका निहोरा करने लगतीं। वस्तुतः मनसे तो वे श्यामसुन्दरकी भक्त ही थीं। एक दिन नटखट श्रीकृष्णकी शरारतोंसे तंग आकर माता यशोदाने उन्हें ऊखलमें रस्सी लेकर बाँध दिया। प्रभुको तो इसी बहाने किसीका उद्धार करना था। ऊखलको आड़ा करके उन्होंने गिरा लिया और उसे घसीटते हुए उधर चले जिधर अर्जुनके दो वृक्ष आपसमें सटे खड़े थे। प्रभुने स्वयं उन वृक्षोंके बीचसे निकलकर जैसे ही ऊखलको खींचा, दोनों वृक्ष अरराकर धरतीपर आ गिरे। वस्तुतः वे दोनों यक्षराज कुबेरके पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे जो देवर्षि नारदके शापवश वृक्ष बन गये थे। प्रभुकी स्तुति करके दोनों अपने लोक चले गये। माता यशोदा तो यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गयीं।

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...