सम्राट अशोक असम में हार गए थे उसी असम में अलाउद्दीन खिलजी भी हार गया

विश्वप्रसिद्ध नालन्दा विश्वविद्यालय को जलाने वाले जे हादी #बख्तियार खिलजी की मौत कैसे हुई थी ??? असल में ये कहानी है सन 1206 ईसवी की. 1206 ईसवी में कामरूप (असम) में एक जोशीली आवाज गूंजती है... "बख्तियार खिलज़ी तू ज्ञान के मंदिर नालंदा को जलाकर #कामरूप (असम) की धरती पर आया है... अगर तू और तेरा एक भी सिपाही ब्रह्मपुत्र को पार कर सका तो मां चंडी (कामातेश्वरी) की सौगंध मैं जीते-जी अग्नि समाधि ले लूंगा"... राजा पृथु और , उसके बाद 27 मार्च 1206 को असम की धरती पर एक ऐसी लड़ाई लड़ी गई जो मानव #अस्मिता के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है. एक ऐसी लड़ाई जिसमें किसी फौज़ के फौज़ी लड़ने आए तो 12 हज़ार हों और जिन्दा बचे सिर्फ 100.... जिन लोगों ने #युद्धों के इतिहास को पढ़ा है वे जानते हैं कि जब कोई दो फौज़ लड़ती है तो कोई एक फौज़ या तो बीच में ही हार मान कर भाग जाती है या समर्पण करती है... लेकिन, इस लड़ाई में 12 हज़ार सैनिक लड़े और बचे सिर्फ 100 वो भी घायल.... ऐसी मिसाल दुनिया भर के इतिहास में संभवतः कोई नहीं.... आज भी गुवाहाटी के पास वो #शिलालेख मौजूद है जिस पर इस लड़ाई के बारे में लिखा है. उस समय मुहम्मद बख्तियार खिलज़ी बिहार और बंगाल के कई राजाओं को जीतते हुए असम की तरफ बढ़ रहा था. इस दौरान उसने नालंदा #विश्वविद्यालय को जला दिया था और हजारों बौद्ध, जैन और हिन्दू विद्वानों का कत्ल कर दिया था. नालंदा विवि में विश्व की अनमोल पुस्तकें, पाण्डुलिपियाँ, अभिलेख आदि जलकर खाक हो गये थे. यह जे हादी खिलज़ी मूलतः अफगानिस्तान का रहने वाला था और मुहम्मद गोरी व कुतुबुद्दीन एबक का रिश्तेदार था. बाद के दौर का #अलाउद्दीन खिलज़ी भी उसी का रिश्तेदार था. असल में वो जे हादी खिलज़ी, #नालंदा को खाक में मिलाकर असम के रास्ते तिब्बत जाना चाहता था. क्योंकि, तिब्बत उस समय... चीन, मंगोलिया, भारत, अरब व सुदूर पूर्व के देशों के बीच व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था तो खिलज़ी इस पर कब्जा जमाना चाहता था.... लेकिन, उसका रास्ता रोके खड़े थे असम के राजा #पृथु... जिन्हें राजा बरथू भी कहा जाता था... आधुनिक गुवाहाटी के पास दोनों के बीच युद्ध हुआ. राजा पृथु ने सौगन्ध खाई कि किसी भी सूरत में वो खिलज़ी को ब्रह्मपुत्र नदी पार कर तिब्बत की और नहीं जाने देंगे... उन्होने व उनके आदिवासी यौद्धाओं नें जहर बुझे तीरों, खुकरी, बरछी और छोटी लेकिन घातक तलवारों से खिलज़ी की सेना को बुरी तरह से काट दिया. स्थिति से घबड़ाकर.... खिलज़ी अपने कई सैनिकों के साथ जंगल और पहाड़ों का फायदा उठा कर भागने लगा...! लेकिन, असम वाले तो जन्मजात यौद्धा थे.. और, आज भी दुनिया में उनसे बचकर कोई नहीं भाग सकता.... उन्होने, उन भगोडों #खिलज़ियों को अपने पतले लेकिन जहरीले तीरों से बींध डाला.... अन्त में खिलज़ी महज अपने 100 सैनिकों को बचाकर ज़मीन पर घुटनों के बल बैठकर क्षमा याचना करने लगा.... राजा पृथु ने तब उसके सैनिकों को अपने पास बंदी बना लिया और खिलज़ी को अकेले को जिन्दा छोड़ दिया उसे घोड़े पर लादा और कहा कि "तू वापस अफगानिस्तान लौट जा... और, रास्ते में जो भी मिले उसे कहना कि तूने नालंदा को जलाया था फ़िर तुझे राजा पृथु मिल गया...बस इतना ही कहना लोगों से...." खिलज़ी रास्ते भर इतना बेइज्जत हुआ कि जब वो वापस अपने ठिकाने पंहुचा तो उसकी दास्ताँ सुनकर उसके ही भतीजे अली मर्दान ने ही उसका सर काट दिया.... लेकिन, कितनी दुखद बात है कि इस बख्तियार खिलज़ी के नाम पर बिहार में एक कस्बे का नाम बख्तियारपुर है और वहां रेलवे जंक्शन भी है.यह वही बख्तियारपुर है जहा खिलजी ने पड़ाव डाला था और नालंदा विश्वविद्यालय को जलाया था जबकि, हमारे राजा पृथु के नाम के #शिलालेख को भी ढूंढना पड़ता है. लेकिन, जब अपने ही देश भारत का नाम भारत करने के लिए कोर्ट में याचिका लगानी पड़े तो समझा जा सकता है कि क्यों ऐसा होता होगा..... उपरोक्त लेख पढ़ने के बाद भी अगर कायर, नपुंसक एवं तथाकथित गद्दार धर्म निरपेक्ष बुद्धिजीवी व स्वार्थी हिन्दूओं में एकता की भावना नहीं जागती... तो #लानत है ऐसे लोगों पर…

हिंदू राजा महाराजा की गैर हिन्दू प्रेमिका पत्नी

कभी भी हिन्दु राजा हो या रानी मुस्लिम समुदाय से शादी-ब्याह करके खुश नही रही थी

इतिहासकारों ने गलत इतिहास पढ़ाया

लेकिन इनमें से 👇 किसी को 35 टुकड़े का दिन न देखना पड़ा

• अकबर की बेटी शहज़ादी खानूम से महाराजा अमर सिंह जी का विवाह।

• कुँवर जगत सिंह ने उड़ीसा के अफगान नवाब कुतुल खा कि बेटी मरियम से विवाह।

• महाराणा सांगा मुस्लिम सेनापति की बेटी मेरूनीसा से ओर तीन मुस्लिम लड़किया से विवाह

• विजयनगर के सम्राट कृष्ण देव राय का गुजरात के नवाब सुल्तान महमूदशाह की बेटी मिहिरिमा सुल्तान से विवाह।

• महाराणा कुंभा (अपराजित योद्धा) का जागीरदार वजीर खा की बेटी से विवाह।

• बप्पा रावल (फादर ऑफ रावलपिंडी) गजनी के मुस्लिम शासक की पुत्री से और 30 से अधिक मुस्लिम राजकुमारीयो से विवाह

• विक्रमजीत सिंह गोतम का आज़मगढ़ की मुस्लिम लड़की से विवाह।

• जोधपुर के राजा राजा हनुमंत सिंह का मुस्लिम लड़की ज़ुबेदा

• कश्मीर के राजा सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड़ का तुर्की के खालीफा मुहम्मद बिन क़ासिम की बेटी जैनम से विवाह इसके अलावा उनकी 8 मुस्लिम बीबीया भी थी

• महाराणा उदय सिंह ने एक मुस्लिम लड़की लाला बाई से विवाह

• राजा मान सिंह मुस्लिम लड़की मुबारक से विवाह।

• अमरकोट के राजा वीरसाल का हामिदा बानो से विवाह।

• राजा छत्रसाल का हैदराबाद के निजाम की बेटी रूहानी बाई से विवाह।

• मीर खुरासन की बेटी नूर खुरासन का राजपूत राजा बिन्दुसार से विवाह।

वैवाहिक संबंध तो हुई ही बहुत सारे हिंदू राजाओ की मुस्लिम प्रेमिकाएं भी थी

• अल्लाउदीन खिलजी की बेटी "फिरोजा" जो जालोर के राजकुमार विरमदेव की दीवानी थी वीरमदेव की युद्ध मै वीरगति प्राप्त होने पर फिरोजा सती हो गयी थी

• औरंगजेब की एक बेटी ज़ेबुनिशा जो कुँवर छत्रसाल के पीछे दीवानी थी ओर प्रेम पत्र लिखा करती थी ओर छत्रसाल के अलावा किसी ओर से शादी करने से इंकार कर दिया था

• औरंगजेब की पोती ओर मोहम्मद अकबर की बेटी सफियत्नीशा जो राजकुमार अजीत सिंह के प्रेम की दीवानी थी

• इल्तुतमिश की बेटी रजिया सुल्तान जो राजपूत जागीरदार कर्म चंद्र से प्रेम करती थी

• औरंगजेब की बहन भी छत्रपति शिवाजी की दीवानी थी शिवाजी से मिलने आया करती थी।

मराठा साम्राज्य के वीर शिरोमणि सेनापति वाजीराव और उनकी पत्नी मस्तानी की प्रेम कहानी तो सब जानते है वह भी जब उन पर हिंदी भाषा में फिल्म बना तब,

हिन्दू राजाओ की और भी बहुत सी मुस्लिम बीवीया थी लेकिन वो राज परिवार और कुलीन वर्ग से थी भी और नही भी 

लेकिन उस समय की किताबो में ब्रिटिश और उस समय के कवियों के रचनाओ में जिक्र स्पष्ट है

और ब्रिटिश रिकॉर्ड में भी औऱ ज्यादातर हिन्दू राजाओ की एक से ज्यादा मुस्लिम बीवीया थी लेकिन रक्त शुध्दता की वजह से इनके बच्चो को अपनाया नहीं जाता ओर उन बच्चों को वर्णशंकर मान के जागिर दे दी जाती थी

तो ये ऐतिहासिक प्रक्षेप चप्पल की तरह फेंक कर उनके मुह पर अवश्य मारिए जो हिन्दुओ को जोधा अकबर जैसे झूठे ऐतिहासिक तथ्यों पर बहस करते हैं

कभी इनपर भी "बॉलीवुड" फिल्म बनाए

#सनातन_धर्म_सर्वश्रेष्ठ_है

कलाशा यानी नूरिस्तान में हिन्दू धर्म

काफिरिस्तान के काफिर...

काफिरिस्तान का नाम सुने हैं ?? पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर एक छोटा सा इलाका है यह। बड़ा ही महत्वपूर्ण क्षेत्र ! जानते हैं क्यों ?? क्योंकि आज से सवा सौ वर्ष पूर्व तक वहाँ विश्व की सबसे प्राचीन परंपरा को मानने वाले लोग बसते थे।


रुकिए !

हिन्दू ही थे वे, पर हमसे थोड़े अलग थे। विशुद्ध वैदिक परम्पराओं को मानने वाले हिन्दू... सूर्य, इंद्र, वरुण आदि प्राकृतिक शक्तियों को पूजने वाले वैदिक हिन्दू...

वैदिक काल से अबतक हमारी परम्पराओं में असँख्य परिवर्तन हुए हैं। हमने समय के अनुसार असँख्य बार स्वयं में परिवर्तन किया है, पर काफिरिस्तान के लोगों ने नहीं किया था।

बड़े शक्तिशाली लोग थे काफिरिस्तान के! इतने शक्तिशाली कि मोहम्मद बिन कासिम से लेकर अहमद शाह अब्दाली तक हजार वर्षों में हुए असँख्य अरबी आक्रमणों के बाद भी वे नहीं बदले।

वर्तमान अफगानिस्तान के अधिकांश लोग अशोक और कनिष्क के काल में हिन्दू से बौद्ध हो गए थे। आठवीं सदी में जब वहाँ अरबी आक्रमण शुरू हुआ तो ये बौद्ध स्वयं को पच्चीस वर्षों तक भी नहीं बचा पाए। वे तो गए ही, साथ ही शेष हिन्दू भी पतित हो गए। पर यदि कोई नहीं बदला, तो वे चंद सूर्यपूजक सनातनी लोग नहीं बदले।

युग बदल गया, पर वे नहीं बदले। तलवारों के भय से धर्म बदलने वाले हिन्दू और बौद्ध धीरे-धीरे इन प्राचीन लोगों को काफिर, और इनके क्षेत्र को काफिरिस्तान कहने लगे।

वैदिक सनातनियों का यह क्षेत्र बहुत ऊँचा पहाड़ी क्षेत्र है। ऊँचे ऊँचे पर्वतों और उनपर उगे घने जंगलों में बसी सभ्यता इतनी मजबूत थी कि वे पचास से अधिक आक्रमणों के बाद भी कभी पराजित नहीं हुए। न टूटे न बदले...

काफिरिस्तान के लोग जितने शक्तिशाली थे, उतने ही सुन्दर भी थे। वहाँ की लड़कियाँ दुनिया की सबसे सुन्दर लड़कियां लगती हैं। माथे पर मोर पंख सजा कर फूल की तरह खिली हुई लड़कियां, जैसे लड़कियाँ नहीं परियाँ हों...


वहाँ के चौड़ी छाती और लंबे शरीर वाले पुरुष, देवदूत की तरह लगते थे। दूध की तरह गोरा रङ्ग, बड़ी-बड़ी नीली आँखें... जैसे स्वर्ग का कोई निर्वासित देवता हो।

कहते हैं कि यह भारतीय संस्कृति और सभ्यता के भगवान श्री कृष्ण जी महाराज के वंशजों के लोग हैं यह आज भी गाय पुजा, सूर्य चंद्र पुजा, मोर पंख पूजा अर्चना आदि करते हैं

पूजा पाठ के समय नृत्य करने की परंपरा है


नूरिस्तानी लोगों को उन्नीसवी सदी के अंत में अफ़ग़ानिस्तान के अमीर अब्दुर रहमान ख़ान ने पराजित करके मुस्लिम बनाया था जबकि बहुत से कलश लोग अभी भी अपने हिन्दू धर्म से मिलते-जुलते प्राचीन धर्म  कलश लोग अधिकतर बुमबुरेत, रुम्बुर और बिरिर नाम की तीन घाटियों में रहते हैं और कलश भाषा में इस क्षेत्र को "कलश देश" कहा जाता है।

अरबी तलवार जब आठ सौ वर्षों में भी उन्हें नहीं बदल पायी, तो उन्होंने हमले का तरीका बदल दिया। अफगानी लोग उनसे मिल-जुल कर रहने लगे। दोनों लोगों में मेल जोल हो गया।

फिर !

सन अठारह सौ छानबे...

1896 

अफगानिस्तान के तात्कालिक शासक अब्दीर रहमान खान ने काफिरिस्तान पर आखिरी आक्रमण किया। इस बार प्रतिरोध उतना मजबूत नहीं था। काफिरों में असँख्य थे जिन्हें लगता था कि हमें प्रेम से रहना चाहिए, युद्ध नहीं करना चाहिए। फल यह हुआ कि हजार वर्षों तक अपराजेय रहने वाले काफिरिस्तान के सनातनी एक झटके में समाप्त हो गए। पूर्णतः समाप्त हो गए...

पराजित हुए। फिर हमेशा की तरह हत्या और बलात्कार का ताण्डव शुरू हुआ। आधे लोग मार डाले गए, जो बचे उनका धर्म बदल दिया गया। कोई नहीं बचा! कोई भी नहीं... काफिरिस्तान का नाम बदल कर नूरिस्तान कर दिया गया।

आज काफिरिस्तान  या नूरिस्तान या कलाशा का नाम लेने वाला कोई नहीं।

पर रुकिए !

मुझे आज पता चला कि काफिरिस्तान के वैदिक हिन्दुओं की ही एक शाखा पाकिस्तान के कलाशा में आज भी जीवित है। वे आज भी वैदिक रीतियों का पालन करते हैं। लगभग छह हजार की सँख्या है उनकी...

लेकिन कब तक ?? यह मुझे नहीं पता...

काफिरस्तान जी हां बिल्कुल सही 6 हजार साल की सभ्यता

काफिरिस्तान के काफिर...

काफिरिस्तान का नाम सुने हैं ?? पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर एक छोटा सा इलाका है यह। बड़ा ही महत्वपूर्ण क्षेत्र ! जानते हैं क्यों ?? क्योंकि आज से सवा सौ वर्ष पूर्व तक वहाँ विश्व की सबसे प्राचीन परंपरा को मानने वाले लोग बसते थे।

रुकिए !

हिन्दू ही थे वे, पर हमसे थोड़े अलग थे। विशुद्ध वैदिक परम्पराओं को मानने वाले हिन्दू... सूर्य, इंद्र, वरुण आदि प्राकृतिक शक्तियों को पूजने वाले वैदिक हिन्दू...

वैदिक काल से अबतक हमारी परम्पराओं में असँख्य परिवर्तन हुए हैं। हमने समय के अनुसार असँख्य बार स्वयं में परिवर्तन किया है, पर काफिरिस्तान के लोगों ने नहीं किया था।

बड़े शक्तिशाली लोग थे काफिरिस्तान के! इतने शक्तिशाली कि मोहम्मद बिन कासिम से लेकर अहमद शाह अब्दाली तक हजार वर्षों में हुए असँख्य अरबी आक्रमणों के बाद भी वे नहीं बदले।

वर्तमान अफगानिस्तान के अधिकांश लोग अशोक और कनिष्क के काल में हिन्दू से बौद्ध हो गए थे। आठवीं सदी में जब वहाँ अरबी आक्रमण शुरू हुआ तो ये बौद्ध स्वयं को पच्चीस वर्षों तक भी नहीं बचा पाए। वे तो गए ही, साथ ही शेष हिन्दू भी पतित हो गए। पर यदि कोई नहीं बदला, तो वे चंद सूर्यपूजक सनातनी लोग नहीं बदले।

युग बदल गया, पर वे नहीं बदले। तलवारों के भय से धर्म बदलने वाले हिन्दू और बौद्ध धीरे-धीरे इन प्राचीन लोगों को काफिर, और इनके क्षेत्र को काफिरिस्तान कहने लगे।

वैदिक सनातनियों का यह क्षेत्र बहुत ऊँचा पहाड़ी क्षेत्र है। ऊँचे ऊँचे पर्वतों और उनपर उगे घने जंगलों में बसी सभ्यता इतनी मजबूत थी कि वे पचास से अधिक आक्रमणों के बाद भी कभी पराजित नहीं हुए। न टूटे न बदले...

काफिरिस्तान के लोग जितने शक्तिशाली थे, उतने ही सुन्दर भी थे। वहाँ की लड़कियाँ दुनिया की सबसे सुन्दर लड़कियां लगती हैं। माथे पर मोर पंख सजा कर फूल की तरह खिली हुई लड़कियां, जैसे लड़कियाँ नहीं परियाँ हों...

वहाँ के चौड़ी छाती और लंबे शरीर वाले पुरुष, देवदूत की तरह लगते थे। दूध की तरह गोरा रङ्ग, बड़ी-बड़ी नीली आँखें... जैसे स्वर्ग का कोई निर्वासित देवता हो।

अरबी तलवार जब आठ सौ वर्षों में भी उन्हें नहीं बदल पायी, तो उन्होंने हमले का तरीका बदल दिया। अफगानी लोग उनसे मिल-जुल कर रहने लगे। दोनों लोगों में मेल जोल हो गया।

फिर !

सन अठारह सौ छानबे...

अफगानिस्तान के तात्कालिक शासक अब्दीर रहमान खान ने काफिरिस्तान पर आखिरी आक्रमण किया। इस बार प्रतिरोध उतना मजबूत नहीं था। काफिरों में असँख्य थे जिन्हें लगता था कि हमें प्रेम से रहना चाहिए, युद्ध नहीं करना चाहिए। फल यह हुआ कि हजार वर्षों तक अपराजेय रहने वाले काफिरिस्तान के सनातनी एक झटके में समाप्त हो गए। पूर्णतः समाप्त हो गए...

पराजित हुए। फिर हमेशा की तरह हत्या और बलात्कार का ताण्डव शुरू हुआ। आधे लोग मार डाले गए, जो बचे उनका धर्म बदल दिया गया। कोई नहीं बचा! कोई भी नहीं... काफिरिस्तान का नाम बदल कर नूरिस्तान कर दिया गया।

आज काफिरिस्तान का नाम लेने वाला कोई नहीं।

पर रुकिए !

मुझे आज पता चला कि काफिरिस्तान के वैदिक हिन्दुओं की ही एक शाखा पाकिस्तान के कलाशा में आज भी जीवित है। वे आज भी वैदिक रीतियों का पालन करते हैं। लगभग छह हजार की सँख्या है उनकी...

लेकिन कब तक ?? यह मुझे नहीं पता

आज भी समय है देश के हिंदुओ को, महामंडलेश्वर, स्वामी, यति ऋषी मुनि संन्यासी योगी का ही अब से भी अपनी विश्व पुरातन धर्म संस्कृति यानी सिंधु घाटी सभ्यता जो मोहनजोदड़ो होते हुए हड़प्पा कालीन कही जाती है आज उस काल से भी आगे की सभ्यता यानी वैदिक काल की सभ्यता को बचाना होगा


नही तो विश्व में हिंदू संग्रहालय में नजर आएंगे 

महाराणा का शुभर्क

!!!---: महाराणा का शुभ्रक :---!!!


कुतुबुद्दीन घोड़े से गिर कर मरा, यह तो सब जानते हैं, लेकिन कैसे? भारतीय इतिहास के छुपाए गए पन्ने

यह आज हम आपको बताएंगे..

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी का महान 'चेतक' सबको याद है, लेकिन शायद स्वामी भक्त 'शुभ्रक' नहीं होगा!!

तो मित्रो आज सुनिए कहानी 'शुभ्रक' की......

कुतुबुद्दीन ऐबक ने राजपूताना में जम कर कहर बरपाया, और मेवाड़ (उदयपुर) के 'राजकुंवर कर्णसिंह' को बंदी बनाकर लाहौर ले गया।

कुंवर का 'शुभ्रक' नामक एक स्वामिभक्त घोड़ा था,

जो कुतुबुद्दीन को पसंद आ गया और वो उसे भी साथ ले गया।

एक दिन कैद से भागने के प्रयास में कुँवर को सजा-ए-मौत सुनाई गई.. और सजा देने के लिए 'जन्नत बाग' में लाया गया। यह तय हुआ कि राजकुंवर का सिर काटकर उससे 'पोलो' (उस समय उस खेल का नाम और खेलने का तरीका कुछ और ही था) खेला जाएगा..

कुतुबुद्दीन ख़ुद, कुँवर के ही घोड़े 'शुभ्रक' पर सवार होकर अपनी खिलाड़ी टोली के साथ 'जन्नत बाग' में आया।

'शुभ्रक' ने जैसे ही कैदी अवस्था में अपने राजकुंवर को देखा, उसकी आंखों से आंसू टपकने लगे। जैसे ही सिर कलम करने के लिए कुँवर सा की जंजीरों को खोला गया, तो 'शुभ्रक' से रहा नहीं गया.. उसने उछलकर कुतुबुद्दीन को घोड़े से गिरा दिया और उसकी छाती पर अपने मजबूत पैरों से कई वार किए, जिससे कुतुबुद्दीन के प्राण पखेरू उड़ गए! इस्लामिक सैनिक अचंभित होकर देखते रह गए..

मौके का फायदा उठाकर कुंवर, सैनिकों से छूटे और 'शुभ्रक' पर सवार हो गए। 'शुभ्रक' ने हवा से बाजी लगा दी.. लाहौर से मेवाड़ बिना रुके , बिना थके दौडा और महल के सामने आकर ही रुका!

राजकुंवर घोड़े से उतरे और अपने प्रिय अश्व को पुचकारने के लिए हाथ बढ़ाया, तो पाया कि वह तो प्रतिमा बना खडा था.. उसमें प्राण नहीं बचे थे।

सिर पर हाथ रखते ही 'शुभ्रक' का निष्प्राण शरीर लुढक गया..

भारत के इतिहास में यह तथ्य कहीं नहीं पढ़ाया जाता क्योंकि वामपंथी लेखक अपने नाजायज बाप की ऐसी दुर्गति वाली मौत बताने से हिचकिचाते हैं! जबकि फारसी की कई प्राचीन पुस्तकों में कुतुबुद्दीन की मौत इसी तरह लिखी बताई गई है।

नमन स्वामीभक्त 'शुभ्रक' को..

#भारत माता की जय

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अगस्त और विभाजन एक त्रासदी रावलपिंडी

रावलपिंडी के समीप हिन्दुओं का एक छोटा सा गांव था। 500 के लगभग वयस्क होंगे।बाकि बच्चे,बुड्ढे। गांव के सरपंच रामलाल एक विशाल बरगद के नीचे बैठे थे। तभी मोहन भागता हुआ आया। बोला सरपंच जी,सरपंच जी। सरपंच जी ने कहा”क्या हुआ मोहन ? ” सरपंच जी मुझे पता लगा है यहाँ से 8 कोस दूर हिन्दुओं ने अपना गांव खाली करना शुरू कर दिया है। सिख भाई भी उनके साथ अमृतसर जाने की तैयारी कर रहे है। सरपंच जी ने एक लम्बी साँस ली और कहा,” मैंने कल ही रेडियो पर सुना था। महात्मा गाँधी ने कहा है कि "भारत-पाकिस्तान का विभाजन मेरी लाश पर होगा।" क्या तुम्हें उनकी बात पर भरोसा नहीं है?” मोहन बोला,” सुना तो मैंने भी है कि जवाहर लाल नेहरू ने कहा है कि हिन्दुओं आश्वस्त रहो। भारत के कभी टुकड़े नहीं होंगे। तुम लोग लाहौर और रावलपिंडी में आराम से रहो। पर जिस गांव की मैं बात कर रहा हूँ। उस गांव पर पिछली रात को चारों और के मुसलमान दंगाइयों ने इकट्ठे होकर हमला कर दिया। उनकी संपत्ति लूट ली। दुकानों में आग लगा दी। मैंने तो यह भी सुना की किसी गरीब हिन्दू की लड़की को भी उठा कर ले गए। भय के कारण उन्होंने आज ही पलायन करना शुरू कर दिया हैं।” सरपंचजी बोले,”देखो मोहन। हम यहाँ पर सदियों से रहते आये हैं। एक साथ ईद और दिवाली बनाते आये है। नवरात्र के व्रत और रोज़े रखते आये है। हमें डरने की कोई जरुरत नहीं है। तुम आश्वस्त रहो।” मोहन सरपंच जी की बात सुनकर चुप हो गया, मगर उसके मन में रह रहकर यह मलाल आता रहा कि सरपंच जी को कम से कम गांव के हिन्दुओं को इकट्ठा कर सावधान अवश्य करना चाहिए था। अभी दो दिन ही बीते थे। चारों ओर के गांवों के मुसलमान चौधरी इकट्ठे होकर सरपंच से मिलने आये और बोले। हमें मुस्लिम अमन कमेटी के लिए चंदा भेजना है। आप लोग चंदा दो। न नुकर करते हुए भी सरपंच ने गांव से पचास हज़ार रुपया इकठ्ठा करवा दिया। दो दिन बाद फिर आ गए। बोले कि और दो सरपंच ने कहा कि अभी तो दिया था। बोले की, “कम पड़ गया और दो। तुमने सुना नहीं 8 कोस दूर हिन्दुओं के गांव का क्या हश्र हुआ है। तुम्हें अपनी सुरक्षा चाहिए या नहीं?” सरपंच ने इस बार भय से सत्तर हज़ार इकट्ठे कर के दिए। दो दिन बाद बलूच रेजिमेंट की लोरी आई और हिन्दुओं कक इक्कट्ठा कर सभी हथियार यहाँ तक की लाठी, तलवार सब जमा कर ले गई। बोली की यह दंगों से बचाने के लिए किया है। क़ुराने पाक की कसम खाकर रक्षा का वायदा भी कर गई। नवें दिन गांव को मुसलमान दंगाइयों ने घेर लिया। सरपंच को अचरज हुआ जब उसने देखा कि जो हथियार बलूच रेजिमेंट उनके गांव से जब्त कर ले गयी थी. वही हथियार उन दंगाइयों के हाथ में हैं। दंगाइयों ने घरों में आग लगा दी।संपत्ति लूट ली।अनेकों को मौत के घाट उतार दिया गया। हिन्दुओं की माताओं और बहनों की उन्हीं की आँखों के सामने बेइज्जती की गई। सैकड़ों हिन्दू औरतों को नंगा कर उनका जुलुस निकाला गया।हिन्दू पुरुष मन मन में यही विनती कर रहे थे कि ऐसा देखने से पहले उन्हें मौत क्यों न आ गई... पर बेचारे क्या करते। गाँधी और नेहरू ने जूठे आश्वासन जो दिए थे। गांव के कुछ बचे लोग अँधेरे का लाभ उठाकर खेतों में भाग कर छुप गए। न जाने कैसे वह रात बिताई। अगले दिन अपने ही घर वालों की लाशे कुएं में डाल कर अटारी के लिए रेल पकड़नी थी। इसलिए किसी को सुध न थी। आगे क्या होगा? कैसे जियेंगे? कहाँ रहेंगे? यह कहानी कोई एक घर की नहीं थी। यह तो लाहौर, डेरा गाजी खां, झेलम, सियालकोट, कोहाट, मुलतान हर जगह एक ही कहानी थी। कहानी क्या साक्षात् नर पिशाचों का नंगा नाच था।

तत्कालीन कांग्रेस के अध्यक्ष आचार्य कृपलानी के शब्दों में इस कहानी को पढ़िए

“आठ मास हुए आपने मुझे कांग्रेस का अध्यक्ष चुना था। महात्मा गाँधी ने एक प्रार्थना सभा के भाषण में कहा था कि मुझे फूलों का मुकुट नहीं पहनाया जा रहा है। बल्कि काँटों की सेज पर सुलाया जा रहा है। उनका कहना बिलकुल ठीक है। उनकी घोषणा होने के दो दिन बाद मुझे नोआखली जाना पड़ा। वहां से बिहार और अभी मैं पंजाब होकर आया हूँ। नोआखली में जो देखा वह मेरे लिए नया अनुभव था। लेकिन बिहार में जो मैंने देखा वह और भी नया और पंजाब में जो देखा वह और भी अधिक था। मनुष्य मनुष्य नहीं रहा। स्त्रियां बच्चों को साथ लेकर इज्जत बचाने के लिए कुओं में कूद पड़ीं। उनको बाद में उससे बचाया गया। पूजा के एक स्थान में पचास स्त्रियों को इकठ्ठा करके उनके घर के लोगों ने उनको मार दिया। एक स्थान में 370 स्त्रियों और बच्चों ने अपने को आग को भेंट कर दिया है।- आचार्य कृपलानी”

(सन्दर्भ- श्यामजी पराशर, पाकिस्तान का विष वृक्ष, नवंबर,1947 संस्करण, राष्ट्रनिर्माण ग्रन्थ माला, दिल्ली, पृष्ठ 42)

दुरात्मा गाँधी और नेहरू जो पहले कहते थे कि पाकिस्तान हमारी लाश पर बनेगा अब कहने लगे कि हमने देश का विभाजन डरकर नहीं किया। जो खून खराबा हर तरफ हो रहा है,उसी को रोकने के लिए किया। जब हमने देखा कि हम किसी तरह भी मुसलमानों को मना नहीं सकते तब ऐसा किया गया। देश को तो 1942 में ही आज़ाद हो जाना था। अंग्रेजों ने देश छोड़ने से पहले मुस्लिम लीग को आगे कर दिया। जिन्नाह ने मांगे रखनी शुरू कर दी। मैं न मानूं की रट लगाए जिन्नाह तानाशाह की स्थिति अर्जित कर कायदे आज़म बन गया। बात बात पर वाक आउट की धमकी देता था। कभी कहता विभाजन कमेटी में सिखों को मत लो। अगर लिया तो मैं बहिष्कार कर दूंगा। कभी कहता सभी सब-कमेटियों का प्रधान किसी मुसलमान को बनाओ। नहीं तो मैं उठ कर चला जाऊंगा। कांग्रेस के लिए जिन्नाह के साथ जीना मुश्किल, जिन्नाह के बिना जीना मुश्किल। फिर जिन्नाह ने दबाव बनाने के लिए अपने गुर्गे सोहरावर्दी के माध्यम से नोआखली और कोलकाता के दंगे करवाए। सीमांत प्रान्त में दंगे करवाए। मेरठ, पानीपत, सहारनपुर, दिल्ली सारा देश जल उठा। आखिर कांग्रेस को विभाजन स्वीकार करना पड़ा। मुसलमानों को उनका देश मिल गया। हम हिन्दुओं को क्या मिला? एक हिन्दू राष्ट्र के स्थान पर एक सेक्युलर राष्ट्र। जिसमें बहुसंख्यक हिन्दुओं के अधिकारों से ज्यादा अल्पसंख्यक मुसलमानों के अधिकार हैं। पाकिस्तान में बचे हिन्दुओं के अधिकारों की कोई चर्चा नहीं छेड़ता। उसी कांग्रेस का 1947 में विस्थापित एक प्रधानमंत्री कहता था कि देश के संसाधनों पर उन्हीं अल्संख्यक मुसलमानों का अधिकार है। हिन्दू धर्मरक्षा के लिए अपने पूर्वजों की धरती छोड़ आये। अमानुषिक यातनायें सही। चित्तोड़ के जौहर के समान ललनाओं की जिन्दा चिताएं जली। राजसी ठाठ ठुकराकर दर दर के भिखारी बने। अपने बेगाने हो गए। यह सब जिन्नाह की जिद्द के चलते हुआ और आज मेरे देश के कुछ राजनेता यह कहते है कि जिन्नाह महान था। वह अंग्रेजों से लड़ा था।

अरे धिक्कार है तुमको जो तुम अपना इतिहास भूल गए। उन अकथनीय अत्याचारों को भूल गए। उन बलिदानों को भूल गए। अपने ही हाथों से अपनी बेटियों के काटे गए सरों को भूल गए। जिन्नाह को महान बताते हो। कुछ तो शर्म करो।

यह लेख उन अज्ञात लाखों हिन्दू पूर्वजों को समर्पित है जिन्होंने धर्मरक्षा हेतु अपने पूर्वजों की भूमि को पंजाब और बंगाल में त्याग दिया। मगर अपने पूर्वजों के धर्म को नहीं छोड़ा

हिंदू धर्म संस्कृती तो दुसरो के लिए भी है हिंदू का मतलब है कि जो अपना है और यही कारण है कि हिन्दू किसी को भी गैर नही मानते, सभी धर्मो के लोगो को अपना मानते हैं और इस कारण हिंदू लोग दुखी हैं और मारे जाते है 


भारतीय संविधान में विदेशी श्रोत

भारतीय संविधान के विदेशी स्रोत

भारतीय संविधान के अनेक देशी और विदेशी स्त्रोत हैं, लेकिन भारतीय संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव भारतीय शासन अधिनियम 1935 का है। भारत के संविधान का निर्माण 10 देशो के संविधान से प्रमुख तथ्य लेकर बनाया गया है। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है।भारत के संविधान के निर्माण में निम्न देशों के संविधान से सहायता ली गई है:

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनरावलोकन, संविधान की सर्वोच्चता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निर्वाचित राष्ट्रपति एवं उस पर महाभियोग, उपराष्ट्रपति, उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाने की विधि एवं वित्तीय आपात, न्यायपालिका की स्वतंत्रता
  • ब्रिटेन: संसदात्मक शासन-प्रणाली, एकल नागरिकता एवं विधि निर्माण प्रक्रिया, विधि का शासन, मंत्रिमंडल प्रणाली, परमाधिकार लेख, संसदीय विशेषाधिकार और द्विसदनवाद
  • आयरलैंड: नीति निर्देशक सिद्धांत, राष्ट्रपति के निर्वाचक-मंडल की व्यवस्था, राष्ट्रपति द्वारा राज्य सभा में साहित्य, कला, विज्ञान तथा समाज-सेवा इत्यादि के क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों का मनोनयन
  • ऑस्ट्रेलिया: प्रस्तावना की भाषा, समवर्ती सूची का प्रावधान, केंद्र एवं राज्य के बीच संबंध तथा शक्तियों का विभाजन, व्यापार-वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता, संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक
  • जर्मनी: आपातकाल के प्रवर्तन के दौरान राष्ट्रपति को मौलिक अधिकार संबंधी शक्तियां, आपातकाल के समय मूल अधिकारों का स्थगन
  • कनाडा: संघात्‍मक विशेषताएं, अवशिष्‍ट शक्तियां केंद्र के पास, केंद्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति और उच्चतम न्यायालय का परामर्श न्याय निर्णयन
  • दक्षिण अफ्रीका: संविधान संशोधन की प्रक्रिया प्रावधान, राज्यसभा में सदस्यों का निर्वाचन
  • सोवियत संघ (पूर्व): मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान, मूल कर्तव्यों और प्रस्तावना में न्याय (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) का आदर्श
  • जापान: विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया।
  • फ्रांस: गणतंत्रात्मक और प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता, बंधुता के आदर्श
  • भारतीय संविधान के अनेक देशी और विदेशी स्त्रोत हैं, लेकिन भारतीय संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव ‘भारतीय शासन अधिनियम: 1935 का है. भारतीय संविधान के 395 अनुच्छेदों में से लगभग 250 अनुच्छेद ऐसे हैं, जो 1935 ई० के अधिनियम से या तो शब्दश: लिए गए हैं या फिर उनमें बहुत थोड़ा परिवर्तन किया गया है।

    भारत शासन अधिनियम, 1935- संगीय तंत्र, राज्यपाल का कार्यकाल, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, आपातकालीन उपबंध व प्रसानिक विवरण

    घोरिद/घेरेंद/घेरेंड सनातनी/बखमनी हिंदु राजा इतिहास

     आइए जानते हैं समृद्ध भारतीय संस्कृति और सभ्यता घुरिडों ने शुरू में गजनवीड्स और बाद में सेल्जुकों के जागीरदारों के रूप में शासन किया । हालांकि, बारहवीं शताब्दी की शुरुआत के दौरान सेल्जूक्स और गजनवीड्स के बीच लंबे समय से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता ने पूर्वी अफगानिस्तान और पंजाब में एक शक्ति निर्वात पैदा कर दिया, जिसका घुरिडों ने फायदा उठाया और अपना क्षेत्रीय विस्तार शुरू किया। अला अल-दीन हुसैन ने घांजाविड्स के लिए घुरिद अधीनता को समाप्त कर दिया, उनकी राजधानी को बेरहमी से बर्खास्त कर दिया, हालांकि वह जल्द ही पराजित हो गए और उन्हें श्रद्धांजलि देना बंद करने के बाद सेल्जूक्स द्वारा अधिकृत किया गया, हालांकि, सेल्जुक शाही शक्ति खुद पूर्वी ईरान में बह गई थी ओघुज खानाबदोशों का समकालीन आगमन.

    अलाउद्दीन के भतीजों - घियाथ अल-दीन मुहम्मद और घोर के मुहम्मद के द्वैध शासन के दौरान , घुरिद साम्राज्य अपनी सबसे बड़ी क्षेत्रीय सीमा तक पहुंच गया, जिसमें पूर्वी ईरान से पूर्वी भारत के माध्यम से शामिल क्षेत्र शामिल थे । जबकि घियाथ अल-दीन का पश्चिम में घुरिद विस्तार पर कब्जा था, द्वैध शासन में उनके कनिष्ठ साथी , घोर के मुहम्मद और उनके लेफ्टिनेंट सिंधु के पूर्व में बंगाल तक सक्रिय थे और अंततः गंगा के मैदान के व्यापक क्षेत्रों को जीतने में सफल रहे , जबकि पश्चिम में घियाथ अल-दीन के साथ, एक लंबी लड़ाई में उलझा हुआख़्वारज़्म के शाह , घुरिड्स, कैस्पियन सागर के तट पर गोरगन (वर्तमान ईरान ) तक पहुँचे , यद्यपि थोड़े समय के लिए।

    गियाथ अल-दीन मुहम्मद की मृत्यु 1203 में गठिया संबंधी विकारों के कारण हुई बीमारी के कारण हुई थी और इसके तुरंत बाद घुरिडों को अपने तुर्की प्रतिद्वंद्वियों ख्वारेज़मियों के खिलाफ तबाही का सामना करना पड़ा था, जो 1204 में अंदखुद की लड़ाई में क़ारा खितैस से समय पर सुदृढीकरण द्वारा सहायता प्राप्त थी। मुहम्मद की जल्द ही हत्या कर दी गई थी मार्च 1206 जिसने खुरासान में घुरिद प्रभाव को समाप्त कर दिया और शाह मुहम्मद द्वितीय द्वारा एक दशक के भीतर सभी को एक साथ बुझा दिया गया, जिसने 1215 तक घुरिडों को उखाड़ फेंका।कुतुब उद दीन ऐबक ।

    मूलसंपादन करना

    19वीं शताब्दी में माउंटस्टुअर्ट एल्फिन्स्टन जैसे कुछ यूरोपीय विद्वानों ने इस विचार का समर्थन किया कि घुरिद राजवंश आज के पश्तून लोगों से संबंधित था 

    लेकिन यह आम तौर पर आधुनिक विद्वानों द्वारा खारिज कर दिया गया है और जैसा कि मॉर्गनस्टिएरने ने समझाया है इस्लाम का विश्वकोश , "विभिन्न कारणों से बहुत ही असंभव" है। 

     कुछ विद्वानों का कहना है कि राजवंश ताजिक मूल का था। 

     "न ही हम सामान्य रूप से सूरी के जातीय स्टॉक और विशेष रूप से संसबनी के बारे में कुछ भी जानते हैं; हम केवल यह मान सकते हैं कि वे पूर्वी ईरानी ताजिक थे"।

     बोसवर्थ आगे बताते हैं कि घुरिद परिवार का वास्तविक नाम, अल-ए संसाब (फारसी: संसाबनी ), मूल रूप से मध्य फ़ारसी नाम विस्नास्प का अरबी उच्चारण है। 

    भारतीय संविधान रुप रेखा और विकास

    भारतीय संविधान के विदेशी स्रोत

    भारतीय संविधान के अनेक देशी और विदेशी स्त्रोत हैं, लेकिन भारतीय संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव भारतीय शासन अधिनियम 1935 का है। भारत के संविधान का निर्माण 10 देशो के संविधान से प्रमुख तथ्य लेकर बनाया गया है। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है।भारत के संविधान के निर्माण में निम्न देशों के संविधान से सहायता ली गई है:

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनरावलोकन, संविधान की सर्वोच्चता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निर्वाचित राष्ट्रपति एवं उस पर महाभियोग, उपराष्ट्रपति, उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाने की विधि एवं वित्तीय आपात, न्यायपालिका की स्वतंत्रता
  • ब्रिटेन: संसदात्मक शासन-प्रणाली, एकल नागरिकता एवं विधि निर्माण प्रक्रिया, विधि का शासन, मंत्रिमंडल प्रणाली, परमाधिकार लेख, संसदीय विशेषाधिकार और द्विसदनवाद
  • आयरलैंड: नीति निर्देशक सिद्धांत, राष्ट्रपति के निर्वाचक-मंडल की व्यवस्था, राष्ट्रपति द्वारा राज्य सभा में साहित्य, कला, विज्ञान तथा समाज-सेवा इत्यादि के क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों का मनोनयन
  • ऑस्ट्रेलिया: प्रस्तावना की भाषा, समवर्ती सूची का प्रावधान, केंद्र एवं राज्य के बीच संबंध तथा शक्तियों का विभाजन, व्यापार-वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता, संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक
  • जर्मनी: आपातकाल के प्रवर्तन के दौरान राष्ट्रपति को मौलिक अधिकार संबंधी शक्तियां, आपातकाल के समय मूल अधिकारों का स्थगन
  • कनाडा: संघात्‍मक विशेषताएं, अवशिष्‍ट शक्तियां केंद्र के पास, केंद्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति और उच्चतम न्यायालय का परामर्श न्याय निर्णयन
  • दक्षिण अफ्रीका: संविधान संशोधन की प्रक्रिया प्रावधान, राज्यसभा में सदस्यों का निर्वाचन
  • सोवियत संघ (पूर्व): मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान, मूल कर्तव्यों और प्रस्तावना में न्याय (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) का आदर्श
  • जापान: विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया।
  • फ्रांस: गणतंत्रात्मक और प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता, बंधुता के आदर्श
  • भारतीय संविधान के अनेक देशी और विदेशी स्त्रोत हैं, लेकिन भारतीय संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव ‘भारतीय शासन अधिनियम: 1935 का है. भारतीय संविधान के 395 अनुच्छेदों में से लगभग 250 अनुच्छेद ऐसे हैं, जो 1935 ई० के अधिनियम से या तो शब्दश: लिए गए हैं या फिर उनमें बहुत थोड़ा परिवर्तन किया गया है।

    भारतीय संविधान के हिसाब किताब

    भारतीय संविधान के विदेशी स्रोत

    भारतीय संविधान के अनेक देशी और विदेशी स्त्रोत हैं, लेकिन भारतीय संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव भारतीय शासन अधिनियम 1935 का है। भारत के संविधान का निर्माण 10 देशो के संविधान से प्रमुख तथ्य लेकर बनाया गया है। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है।भारत के संविधान के निर्माण में निम्न देशों के संविधान से सहायता ली गई है:

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनरावलोकन, संविधान की सर्वोच्चता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निर्वाचित राष्ट्रपति एवं उस पर महाभियोग, उपराष्ट्रपति, उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाने की विधि एवं वित्तीय आपात, न्यायपालिका की स्वतंत्रता
  • ब्रिटेन: संसदात्मक शासन-प्रणाली, एकल नागरिकता एवं विधि निर्माण प्रक्रिया, विधि का शासन, मंत्रिमंडल प्रणाली, परमाधिकार लेख, संसदीय विशेषाधिकार और द्विसदनवाद
  • आयरलैंड: नीति निर्देशक सिद्धांत, राष्ट्रपति के निर्वाचक-मंडल की व्यवस्था, राष्ट्रपति द्वारा राज्य सभा में साहित्य, कला, विज्ञान तथा समाज-सेवा इत्यादि के क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों का मनोनयन
  • ऑस्ट्रेलिया: प्रस्तावना की भाषा, समवर्ती सूची का प्रावधान, केंद्र एवं राज्य के बीच संबंध तथा शक्तियों का विभाजन, व्यापार-वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता, संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक
  • जर्मनी: आपातकाल के प्रवर्तन के दौरान राष्ट्रपति को मौलिक अधिकार संबंधी शक्तियां, आपातकाल के समय मूल अधिकारों का स्थगन
  • कनाडा: संघात्‍मक विशेषताएं, अवशिष्‍ट शक्तियां केंद्र के पास, केंद्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति और उच्चतम न्यायालय का परामर्श न्याय निर्णयन
  • दक्षिण अफ्रीका: संविधान संशोधन की प्रक्रिया प्रावधान, राज्यसभा में सदस्यों का निर्वाचन
  • सोवियत संघ (पूर्व): मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान, मूल कर्तव्यों और प्रस्तावना में न्याय (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) का आदर्श
  • जापान: विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया।
  • फ्रांस: गणतंत्रात्मक और प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता, बंधुता के आदर्श
  • भारतीय संविधान के अनेक देशी और विदेशी स्त्रोत हैं, लेकिन भारतीय संविधान पर सबसे अधिक प्रभाव ‘भारतीय शासन अधिनियम: 1935 का है. भारतीय संविधान के 395 अनुच्छेदों में से लगभग 250 अनुच्छेद ऐसे हैं, जो 1935 ई० के अधिनियम से या तो शब्दश: लिए गए हैं या फिर उनमें बहुत थोड़ा परिवर्तन किया गया है।

    भारत शासन अधिनियम, 1935- संगीय तंत्र, राज्यपाल का कार्यकाल, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, आपातकालीन उपबंध व प्रसानिक विवरण

    सनातन

    फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...