जाती हैं कि जाति नही

मौत के घाट उतार दिया गया था। 

7) हाँ, जाति पूछकर ही 1979 में पटना के पास पारसबीघा में 11 दलित और एक यादव को भूमिहारों ने मौत के घाट उतार दिया था। 

८.) हाँ, जाति पूछकर ही शंकरबीघा में 1999 में 23 दलितों को मौत के घाट उतार दिया गया था। 

9) हाँ, जाति पूछकर ही 1988 में नोनहीगढ़ नगवाँ में 19 दलितों को मौत के घाट उतार दिया गया था। 

10) हाँ, जाति पूछकर ही 1989 में भोजपुर के दनवर-बिहटा गाँव में 23 दलितों का क़त्लेआम सिर्फ़ इसलिए हुआ क्यूँकि वो अपने मर्ज़ी से वोट कर आए थे। 

11) हाँ, जाति पूछकर ही दलित दूल्हे को घोड़ी चढ़ने नहीं दिया जाता है। 

12) हाँ, जाति पूछकर ही दलित महिलाओं को अपना स्तन ढकने नहीं दिया जाता था।

13) हाँ, जाति पूछकर ही वेदों का मंत्र सुनने

मुर्शिदाबाद

आज जब मुर्शिदाबाद जल रहा है और वहां से हिंदू पलायन कर रहे हैं, तो एक बात अपने हृदय पर हाथ रख कर बताइएगा। क्या आपको पता था कि मुर्शिदाबाद में 51 शक्तिपीठों में से एक कीरिटेश्वरी पीठ है।

ये बात बताना भी प्रासंगिक है कि सन 1700 में यह जिला भारत का सबसे समृद्ध जिला था। एक अनुमान के अनुसार तत्कालीन भारत की 20% जीडीपी और पूरे विश्व की 5% अर्थव्यवस्था का उत्पादन आज के मुर्शिदाबाद में होता था। यहां का रेशम पूरे विश्व में निर्यात होता था..

उस जमाने के सबसे बड़े व्यापारी जगत सेठ इसी जिले के थे और मुर्शीद कुली खान के साथ मिलकर उन्होंने मुर्शिदाबाद को शहर और बाद में बंगाल की राजधानी (ढाका से बदलकर) बनने योगदान दिया. जैसे अमेरिका में कभी रोथचाइल्ड परिवार था, वैसे ही जगत सेठ के पास अकूत धन और विस्तृत व्यापार था।

मुर्शिदाबाद औरंगजेब की सबसे दुधारू गाय थी. मुर्शिदकुली औरंग को सबसे अधिक कर वसूल कर देते थे। 1~2 करोड़ प्रतिवर्ष...

और आज?

मुर्शिदाबाद में मोम्बीज की जनसंख्या बहुसंख्य (70%) हैं। नतीजा भारत के सबसे समृद्ध जिले से आज गरीब जिले में बदल चुका हैं। तुलनात्मक रूप से भारत की औसत पर कैपिटा आय 205,000/व्यक्ति/वर्ष है तो मुर्शिदाबाद में यह घटकर 149,000 / व्यक्ति/वर्ष है.

आज मुर्शिदाबाद उत्तर बंगाल और झारखंड के बीच "चिकन नेक" जैसा हैं।

विडंबना है कि जो कभी शक्तिपीठ था, आज वहां से हिंदुओं का पलायन हो रहा है. 

यह शक्तिपीठ भी कब तक सुरक्षित है, समय बतायेगा... 

जय भवानी 🚩

सनातन को समझे

⚘️पाँच तत्व ●  पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
⚘️पाँच देवता ●  गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
⚘️पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ●  आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
⚘️पाँच कर्म ●  रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
⚘️पाँच  उंगलियां ● अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
⚘️पाँच पूजा उपचार ● गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य।
⚘️पाँच अमृत ●  दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
⚘️पाँच प्रेत ●  भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
⚘️पाँच स्वाद ● मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
⚘️पाँच वायु ● प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
⚘️पाँच इन्द्रियाँ ● आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
⚘️पाँच वटवृक्ष ● सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
⚘️पाँच पत्ते ●  आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
⚘️पाँच कन्या ●  अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।

एलर्जी

एलर्जी

" एलर्जी " एक आम शब्द , जिसका प्रयोग हम कभी ' किसी ख़ास व्यक्ति से मुझे एलर्जी है ' के रूप में करते हैं. ऐसे ही हमारा शरीर भी ख़ास रसायन उद्दीपकों के प्रति अपनी असहज प्रतिक्रया को ' एलर्जी ' के रूप में दर्शाता है.

बारिश के बाद आयी धूप तो ऐसे रोगियों क़ी स्थिति को और भी दूभर कर देती है. ऐसे लोगों को अक्सर अपने चेहरे पर रूमाल लगाए देखा जा सकता है. क्या करें छींक के मारे बुरा हाल जो हो जाता है.

हालांकि एलर्जी के कारणों को जानना कठिन होता है , परन्तु कुछ आयुर्वेदिक उपाय इसे दूर करने में कारगर हो सकते हैं. आप इन्हें अपनाएं और एलर्जी से निजात पाएं !

• नीम चढी गिलोय के डंठल को छोटे टुकड़ों में काटकर इसका रस हरिद्रा खंड चूर्ण के साथ 1.5 से तीन ग्राम नियमित प्रयोग पुरानी से पुरानी एलर्जी में रामबाण औषधि है.

• गुनगुने निम्बू पानी का प्रातःकाल नियमित प्रयोग शरीर सें विटामिन - सी की मात्रा की पूर्ति कर एलर्जी के कारण होने वाले नजला - जुखाम जैसे लक्षणों को दूर करता है.

• अदरख , काली मिर्च , तुलसी के चार पत्ते , लौंग एवं मिश्री को मिलाकर बनायी गयी ' हर्बल चाय ' एलर्जी से निजात दिलाती है.

• बरसात के मौसम में होनेवाले विषाणु ( वायरस ) संक्रमण के कारण ' फ्लू ' जनित लक्षणों को नियमित ताजे चार नीम के पत्तों को चबा कर दूर किया जा सकता है.

• आयुर्वेदिक दवाई ' सितोपलादि चूर्ण ' एलर्जी के रोगियों में चमत्कारिक प्रभाव दर्शाती है.

• नमक पानी से ' कुंजल क्रिया ' एवं ' नेती क्रिया " कफ दोष को बाहर निकालकर पुराने से पुराने एलर्जी को दूर कने में मददगार होती है.

• पंचकर्म की प्रक्रिया ' नस्य ' का चिकित्सक के परामर्श से प्रयोग ' एलर्जी ' से बचाव ही नहीं इसकी सफल चिकित्सा है.

• प्राणायाम में ' कपालभाती ' का नियमित प्रयोग एलर्जी से मुक्ति का सरल उपाय है.

कुछ सावधानियां जिन्हें अपनाकर आप एलर्जी से खुद को दूर रख सकते हैं : -

• धूल , धुआं एवं फूलों के परागकण आदि के संपर्क से बचाव.

• अत्यधिक ठंडी एवं गर्म चीजों के सेवन से बचना.

• कुछ आधुनिक दवाओं जैसे : एस्पिरीन , निमासूलाइड आदि का सेवन सावधानी से करना.

• खटाई एवं अचार के नियमित सेवन से बचना.

हल्दी से बनी आयुर्वेदिक औषधि '

  हरिद्रा खंड ' के सेवन से शीतपित्त , खुजली , एलर्जी , और चर्म रोग नष्ट होकर देह में सुन्दरता आ जाती हे | बाज़ार में यह ओषधि सूखे चूर्ण के रूप में मिलती हे | इसे खाने के लिए मीठे दूध का प्रयोग अच्छा होता हे | परन्तु शास्त्र विधि में इसको निम्न प्रकार से घर पर बना कर खाया जाये तो अधिक गुणकारी रहता हे | बाज़ार में इस विधि से बना कर चूँकि अधिक दिन तक नहीं रखा जा सकता , इसलिए नहीं मिलता हे | घर पर बनी इस विधि बना हरिद्रा खंड अधिक गुणकारी और स्वादिष्ट होता हे | मेरा अनुभव हे की कई सालो से चलती आ रही एलर्जी , या स्किन में अचानक उठाने वाले चकत्ते , खुजली इसके दो तीन माह के सेवन से हमेशा के लिए ठीक हो जाती हे | इस प्रकार के रोगियों को यह बनवा कर जरुर खाना चाहिए | और अपने मित्रो कोभी बताना चाहिए | यह हानि रहित निरापद बच्चे बूढ़े सभी को खा सकने योग्य हे | जो नहीं बना सकते वे या शुगर के मरीज , कुछ कम गुणकारी , चूर्ण रूप में जो की बाज़ार में उपलब्ध हे का सेवन कर सकते हे |

हरिद्रा खंड निर्माण विधि

सामग्री -

 हरिद्रा -320 ग्राम , गाय का घी - 240 ग्राम , दूध - 5 किलो , शक्कर -2 किलो |
    सोंठ , कालीमिर्च , पीपल , तेजपत्र , छोटी इलायची , दालचीनी , वायविडंग , निशोथ , हरड , बहेड़ा , आंवले , नागकेशर , नागरमोथा , और लोह भस्म , प्रत्येक 40-40 ग्राम ( यह सभी आयुर्वेदिक औषधि विक्रेताओ से मिल जाएँगी ) | आप यदि अधिक नहीं बनाना चाहते तो हर वस्तु अनुपात रूप से कम की जा सकती हे |

( यदि हल्दी ताजी मिल सके तो 1 किलो 250 ग्राम लेकर छीलकर मिक्सर पीस कर काम में लें | )

बनाने की विधि - हल्दी को दूध में मिलाकार खोया या मावा बनाये , इस खोये को घी डालकर धीमी आंच पर भूने , भुनने के बाद इसमें शक्कर मिलाये | सक्कर गलने पर शेष औषधियों का कपड छान बारीक़ चूर्ण मिला देवे | अच्छी तरह से पाक जाने पर चक्की या लड्डू बना लें |
सेवन की मात्रा - 20-25 ग्राम दो बार दूध के साथ |
( बाज़ार में मिलने वाला हरिद्रखंड चूर्ण के रूप में मिलता हे इसमें घी और दूध नहीं होता शकर कम या नहीं होती अत : खाने की मात्रा भी कम 3 से 5 ग्राम दो बार रहेगी | 

भारतीय संविधान का विकास

भारतीय संविधान के विकास का इतिहास(1773-1947)

1757 ई. की प्लासी की लड़ाई और 1764 ई. बक्सर के युद्ध को अंग्रेजों द्वारा जीत लिए जाने के बाद बंगाल पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने शासन का शिकंजा कसा. इसी शासन को अपने अनुकूल बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने समय-समय पर कई एक्ट पारित किए, जो भारतीय संविधान के विकास की सीढ़ियां बनीं. वे निम्न हैं:

1. 1773 ई. का रेग्‍यूलेटिंग एक्ट: इस एक्ट के अंतर्गत कलकत्ता प्रेसिडेंसी में एक ऐसी सरकार स्थापित की गई, जिसमें गवर्नर जनरल और उसकी परिषद के चार सदस्य थे, जो अपनी सत्ता का उपयोग संयुक्त रूप से करते थे. इसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं -
(i) कंपनी के शासन पर संसदीय नियंत्रण स्थापित किया गया.
(ii) बंगाल के गवर्नर को तीनों प्रेसिडेंसियों का जनरल नियुक्त किया गया.
(iii) कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई.

2. 1784 ई. का पिट्स इंडिया एक्ट: इस एक्ट के द्वारा दोहरे प्रशासन का प्रारंभ हुआ-
(i) कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स - व्यापारिक मामलों के लिए
(ii) बोर्ड ऑफ़ कंट्रोलर- राजनीतिक मामलों के लिए.

3. 1793 ई. का चार्टर अधिनियम: इसके द्वारा नियंत्रण बोर्ड के सदस्यों तथा कर्मचारियों के वेतन आदि को भारतीय राजस्व में से देने की व्‍यवस्‍था की गई.

4. 1813 ई. का चार्टर अधिनियम: इसके द्वारा (i) कंपनी के अधिकार-पत्र को 20 सालों के लिए बढ़ा दिया गया. (ii) कंपनी के भारत के साथ व्यापर करने के एकाधिकार को छीन लिया गया. लेकिन उसे चीन के साथ व्यापर और पूर्वी देशों के साथ चाय के व्यापार के संबंध में 20 सालों के लिए एकाधिकार प्राप्त रहा. (iii) कुछ सीमाओं के अधीन सभी ब्रिटिश नागरिकों के लिए भारत के साथ व्यापार खोल दिया गया.

5. 1833 ई. का चार्टर अधिनियम: इसके द्वारा (i) कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए. (ii) अब कंपनी का कार्य ब्रिटिश सरकार की ओर से मात्र भारत का शासन करना रह गया. (iii) बंगालग के गवर्नर जरनल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा. (iv) भारतीय कानूनों का वर्गीकरण किया गया तथा इस कार्य के लिए विधि आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था की गई.

6. 1853 ई. का चार्टर अधिनियम: इस अधिनियम के द्वारा सेवाओं में नामजदगी का सिद्धांत समाप्त कर कंपनी के महत्वपूर्ण पदों को प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर भरने की व्यवस्था की गई.

7. 1858 ई. का चार्टर अधिनियम: (i) भारत का शासन कंपनी से लेकर ब्रिटिश क्राउन के हाथों सौंपा गया. (ii) भारत में मंत्री-पद की व्यवस्था की गई. (iii) 15 सदस्यों की भारत-परिषद का सृजन हुआ. (iv) भारतीय मामलों पर ब्रिटिश संसद का सीधा नियंत्रण स्थापित किया गया.

8. 1861 ई. का भारत शासन अधिनियम: गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार किया गया, (ii) विभागीय प्रणाली का प्रारंभ हुआ, (iii) गवर्नर जनरल को पहली बार अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई. (iv) गवर्नर जरनल को बंगाल, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब में विधान परिषद स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई.

9. 1892 ई. का भारत शासन अधिनियम: (i) अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली की शुरुआत हुई, (ii) इसके द्वारा राजस्व एवं व्यय अथवा बजट पर बहस करने तथा कार्यकारिणी से प्रश्न पूछने की शक्ति दी गई.

10. 1909 ई० का भारत शासन अधिनियम [मार्ले -मिंटो सुधार] -
(i) पहली बार मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक प्रतिनिधित्व का उपबंध किया गया.
(ii) भारतीयों को भारत सचिव एवं गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषदों में नियुक्ति की गई.
(iii) केंद्रीय और प्रांतीय विधान-परिषदों को पहली बार बजट पर वाद-विवाद करने, सार्वजनिक हित के विषयों पर प्रस्ताव पेश करने, पूरक प्रश्न पूछने और मत देने का अधिकार मिला.
(iv) प्रांतीय विधान परिषदों की संख्या में वृद्धि की गई.

11. 1919 ई० का भारत शासन अधिनियम [मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार] -
(i) केंद्र में द्विसदनात्मक विधायिका की स्थापना की गई- प्रथम राज्य परिषद तथा दूसरी केंद्रीय विधान सभा. राज्य परिषद के सदस्यों की संख्या 60 थी; जिसमें 34 निर्वाचित होते थे और उनका कार्यकाल 5 वर्षों का होता था. केंद्रीय विधान सभा के सदस्यों की संख्या 145 थी, जिनमें 104 निवार्चित तथा 41 मनोनीत होते थे. इनका कार्यकाल 3 वर्षों का था. दोनों सदनों के अधिकार समान थे. इनमें सिर्फ एक अंतर था कि बजट पर स्वीकृति प्रदान करने का अधिकार निचले सदन को था.

(ii) प्रांतो में द्वैध शासन प्रणाली का प्रवर्तन किया गया. इस योजना के अनुसार प्रांतीय विषयों को दो उपवर्गों में विभाजित किया गया- आरक्षित तथा हस्तांतरित. आरक्षित विषय थे - वित्त, भूमिकर, अकाल सहायता, न्याय, पुलिस, पेंशन, आपराधिक जातियां, छापाखाना, समाचार पत्र, सिंचाई, जलमार्ग, खान, कारखाना, बिजली, गैस, व्यालर, श्रमिक कल्याण, औघोगिक विवाद, मोटरगाड़ियां, छोटे बंदरगाह और सार्वजनिक सेवाएं आदि.

हस्तांतरित विषय -
(i) शिक्षा, पुस्तकालय, संग्रहालय, स्थानीय स्वायत्त शासन, चिकित्सा सहायता.
(ii) सार्वजनिक निर्माण विभाग, आबकारी, उघोग, तौल तथा माप, सार्वजनिक मनोरंजन पर नियंत्रण, धार्मिक तथा अग्रहार दान आदि.
(iii) आरक्षित विषय का प्रशासन गवर्नर अपनी कार्यकारी परिषद के माध्यम से करता था; जबकि हस्तांतरित विषय का प्रशासन प्रांतीय विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी भारतीय मंत्रियों के द्वारा किया जाता था.
(iv) द्वैध शासन प्रणाली को 1935 ई० के एक्ट के द्वारा समाप्त कर दिया गया.
(v) भारत सचिव को अधिकार दिया गया कि वह भारत में महालेखा परीक्षक की नियुक्ति कर सकता है.
(vi) इस अधिनियम ने भारत में एक लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान किया.
12.
 1935 ई० का भारत शासन अधिनियम: 1935 ई० के अधिनियम में 451 धाराएं और 15 परिशिष्‍ट थे. इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
(i) अखिल भारतीय संघ: यह संघ 11 ब्रिटिश प्रांतो, 6 चीफ कमिश्नर के क्षेत्रों और उन देशी रियासतों से मिलकर बनना था, जो स्वेच्छा से संघ में सम्मलित हों. प्रांतों के लिए संघ में सम्मिलित होना अनिवार्य था, किंतु देशी रियासतों के लिय यह एच्छिक था. देशी रियासतें संघ में सम्मिलित नहीं हुईं और प्रस्तावित संघ की स्थापना संबंधी घोषणा-पत्र जारी करने का अवसर ही नहीं आया.
(ii) प्रांतीय स्वायत्ता: इस अधिनियम के द्वारा प्रांतो में द्वैध शासन व्यवस्था का अंत कर उन्हें एक स्‍वतंत्र और स्वशासित संवैधानिक आधार प्रदान किया गया.
(iii) केंद्र में द्वैध शासन की स्थापना: कुछ संघीय विषयों [सुरक्षा, वैदेशिक संबंध, धार्मिक मामलें] को गवर्नर जनरल के हाथों में सुरक्षित रखा गया. अन्य संघीय विषयों की व्यवस्था के लिए गवर्नर- जनरल को सहायता एवं परामर्श देने हेतु मंत्रिमंडल की व्यवस्था की गई, जो मंत्रिमंडल व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी था.
(iv) संघीय न्‍यायालय की व्यवस्था: इसका अधिकार क्षेत्र प्रांतों तथा रियासतों तक विस्तृत था. इस न्यायलय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा दो अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था की गई. न्यायालय से संबंधित अंतिम शक्ति प्रिवी काउंसिल [लंदन] को प्राप्त थी.
(v) ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता: इस अधिनियम में किसी भी प्रकार के परिवर्तन का अधिकार ब्रिटिश संसद के पास था. प्रांतीय विधान मंडल और संघीय व्यवस्थापिका: इसमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं कर सकते थे.
(vi) भारत परिषद का अंत : इस अधिनियम के द्वारा भारत परिषद का अंत कर दिया गया.
(vii) सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति का विस्तार: संघीय तथा प्रांतीय व्यवस्थापिकाओं में विभिन्न सम्प्रदायों को प्रतिनिधित्व देने के लिए सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति को जारी रखा गया और उसका विस्तार आंग्ल भारतीयों - भारतीय ईसाइयों, यूरोपियनों और हरिजनों के लिए भी किया गया.
(viii) इस अधिनियम में प्रस्तावना का अभाव था.
(xi) इसके द्वारा बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया, अदन को इंग्लैंड के औपनिवेशिक कार्यालय के अधीन कर दिया गया और बरार को मध्य प्रांत में शामिल कर लिया गया.

13. 1947 ई० का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम: ब्रिटिश संसद में 4 जुलाई, 1947 ई० को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम प्रस्तावित किया गया, जो 18 जुलाई, 1947 ई० को स्वीकृत हो गया. इस अधिनियम में 20 धाराएं थीं. अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्न हैं -
(i) दो अधिराज्यों की स्थापना: 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत एवं पाकिस्तान नामक दो अधिराज्य बना दिए जाएंगें, और उनको ब्रिटिश सरकार सत्ता सौंप देगी. सत्ता का उत्तरदायित्व दोनों अधिराज्यों की संविधान सभा को सौंपा जाएगा.
(ii) भारत एवं पाकिस्तान दोनों अधिराज्यों में एक-एक गवर्नर जनरल होंगे, जिनकी नियुक्ति उनके मंत्रिमंडल की सलाह से की जाएगी.
(iii) संविधान सभा का विधान मंडल के रूप में कार्य करना- जब तक संविधान सभाएं संविधान का निर्माण नई कर लेतीं, तब तक वह विधान मंडल के रूप में कार्य करती रहेंगीं.
(iv) भारत-मंत्री के पद समाप्त कर दिए जाएंगें.
(v) 1935 ई० के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा शासन जब तक संविधान सभा द्वारा नया संविधान बनाकर तैयार नहीं किया जाता है; तब तक उस समय 1935 ई० के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा ही शासन होगा.
(vi) देशी रियासतों पर ब्रिटेन की सर्वोपरिता का अंत कर दिया गया. उनको भारत या पाकिस्तान किसी भी अधिराज्य में सम्मलित होने और अपने भावी संबंधो का निश्चय करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई.

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भगवान श्री कृष्ण जन्माष्टमी विशेषांक, उखल में बांधा जाना

श्रीकृष्ण एक बार नन्दबाबाके आँगनसे बाहर निकलकर अब वे गोकुलकी गलियोंमें घूमने लगे थे। ग्वाल-बालोंके साथ खेलना-कूदना और ऊधम मचाना उनकी दिनचर्या बन गयी थी। भगवान् श्रीकृष्णकी शैतानियाँ गोकुलवासियोंके मनोरंजनका साधन बनी हुई थीं। प्रभु माखन-प्रेमी थे। घरमें माखनकी कमी थी भी नहीं; किंतु प्रभुको तो अपनी लीलाओंसे भक्तजनोंको सुख पहुँचाना ही चिर इष्ट रहा है। अतः वे माखन चोर बन बैठे। साथी ग्वाल-बालोंको लेकर वे किसी भी गोपके घर जा धमकते। खुद माखन खाते, साथियोंको खिलाते और बचे हुए माखनको इधर- उधर बिखेर भी देते। गोपियाँ मन-ही-मन यही चाहती भी थीं कि नटखट श्याम किसी भी बहाने उनके यहाँ आया करें; किंतु दिखावेके लिये वे उनको डाँटतीं-धमकातीं तथा उलाहना लेकर मैया यशोदाके पास भी पहुँच जातीं। यह बात अलग थी कि जब कभी मैया यशोदा श्रीकृष्णको दण्ड देनेके लिये उद्यत होतीं तो तत्काल वे उनका निहोरा करने लगतीं। वस्तुतः मनसे तो वे श्यामसुन्दरकी भक्त ही थीं। एक दिन नटखट श्रीकृष्णकी शरारतोंसे तंग आकर माता यशोदाने उन्हें ऊखलमें रस्सी लेकर बाँध दिया। प्रभुको तो इसी बहाने किसीका उद्धार करना था। ऊखलको आड़ा करके उन्होंने गिरा लिया और उसे घसीटते हुए उधर चले जिधर अर्जुनके दो वृक्ष आपसमें सटे खड़े थे। प्रभुने स्वयं उन वृक्षोंके बीचसे निकलकर जैसे ही ऊखलको खींचा, दोनों वृक्ष अरराकर धरतीपर आ गिरे। वस्तुतः वे दोनों यक्षराज कुबेरके पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे जो देवर्षि नारदके शापवश वृक्ष बन गये थे। प्रभुकी स्तुति करके दोनों अपने लोक चले गये। माता यशोदा तो यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गयीं।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी विशेषांक, भगवान श्री कृष्ण जी महाराज की कुंडली

श्रीकृष्ण की जन्म कुंडली और बाल लीला का दृश्य 


#thread 🧵 

#Krishna #Janamashtmi 

कलियुग के 7वें वैवस्वत और 28वें चतुर्युग के और श्री कृष्ण का जन्म कलियुग के 28वें चतुर्भुज के 5121वें वर्ष से 125 वर्ष पहले हुआ था, इस प्रकार 5246 वर्ष की गणना की गई और यह कुंडली आश्चर्यजनक रूप से दर्शाती है। कृष्ण के जन्म का विवरण भागवतपुराण, विष्णुपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, देवीभागवत, आदिपुराण और महाभारत में मिलता है। इन विवरणों से अनन्त कृष्ण के जन्म एवं देह त्याग के विवरण का पता लगाया जा सकता है।

🔺देवीपुराण के अनुसार अष्टमी रात्रि 

कृष्ण पक्ष और वृष लग्न, रोहिणी नक्षत्र में आदि देवी ने देवकी के गर्भ से परम पुरुष के रूप में जन्म लिया।

of Krishn paksh and in Vrish lagn, Rohini Nakshatra Adi devi was born from Devaki womb as Param Purush.

ततः समभवद्देवी देवक्याः परमः पुमान्।

अष्टम्यामधर्द्धरात्रे तु रोहिण्यामसिते वृषे।।
 (देवीभागवत 50.65) 

🔺In another text in BhavishyaPuran on the eighth tithi of Bhaadrapad month Krishna paksh when sun was in Simh(Leo) and moon was in Taurus(vrish) and Rohini was the Nakshatra Param Purush was born 

सिंहराशिगते सूर्ये गगने जलदाकुले।

मासि भाद्रपदेष्टम्यां कृष्णपक्षेऽर्धरात्रके।

वृषराशिस्थिते चन्द्रे नक्षत्रे

वृषराशिस्थिते चन्द्रे नक्षत्रे रोहिणीयुते।।

भविष्यपुराण (उत्तरपर्व, 55.14)

According to Hindu time 
dvapar Yuga was of 2400 Divya year and 8,64,000 Human year
And at present it is 
5321st year of 
2nd Parardh (परार्द्ध)of Brahma 
7th prardha 

महाभारत युद्ध को हुए 5455 सौ साल ही हुआ है 

औरंगजेब और ज्ञानवापी मन्दिर का सच

ज्ञानवापी मंदिर तोड़ने का फरमान औरंगज़ेब ने जारी किया था
*****
पर आप जानते हैं  - क्यों?
कच्छ की महारानी के साथ मंदिर के महन्त ने बलात्कार की कोशिश की थी
मंदिर के तहखाने में अनेक औरतें और लाशें बंद पाई गई थीं
मंदिर तोड़ने से पहले औरंगज़ेब ने महारानी से पूछा था कि क्या करना है
महारानी ने जब तोड़ने की अनुमति दी तब फरमान जारी हुआ था

देखिए

इतिहासकार बी द्वारा एन पांडेय के अनुसार: कच्छ की 8 रानियां बनारस शहर में काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए गईं, जिनमें से सुंदर रानी का ब्राह्मण महंतों द्वारा अपहरण कर लिया गया।

कच्छ के राजा द्वारा औरंगजेब को इसकी सूचना दी गई, जिन्होंने कहा कि यह उनका धार्मिक व व्यक्तिगत मामला है।वह उनके आपसी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते, लेकिन जब कच्छ के राजा ने शिकायत की, तो औरंगजेब ने सच्चाई का पता लगाने के लिए कुछ हिंदू सैनिकों को भेजा, लेकिन महंत के लोगों ने औरंगजेब के सैनिकों को मार डाला, डांटा और भगा दिया।

जब औरंगजेब को इस बात का पता चला तो उसने स्थिति का जायजा लेने के लिए कुछ विशेषज्ञ सैनिकों को भेजा, लेकिन मंदिर के पुजारियों ने उनका विरोध किया। मुगल सेना भी लड़ाई में आ गई, मुगल सैनिक और महंत मंदिर के अंदर फंस गए और युद्ध में मंदिर क्षतिग्रस्त हो गया।तीसरे दिन सैनिकों को सुरंग में प्रवेश करने में सफलता मिली और वहां हड्डियों की कई संरचनाएं मिलीं। जो केवल महिलाओं के थे।

सैनिकों ने मंदिर में प्रवेश किया और लापता रानी की तलाश शुरू कर दी।
इस संबंध में, मुख्य मूर्ति (देवता) के पीछे एक गुप्त सुरंग की खोज की गई थी जो बहुत जहरीली गंध छोड़ रही थी। दो दिन तक दवा छिड़ककर बदबू दूर करने की कोशिश करते रहे और सैनिक देखते रहे।

कच्छ की लापता रानी का शव भी उसी स्थान पर पड़ा हुआ था, उसके शरीर पर एक कपड़ा भी नहीं था। मंदिर के मुख्य महंत को गिरफ्तार कर लिया गया और कड़ी सजा दी गई।

(बी. एन. पाण्डेय, खुदाबख्श मेमोरियल एनविल लेक्चर्स, पटना, 1986 द्वारा उद्धृत। ओम प्रकाश प्रसाद: औरंगज़ेब एक नई दृष्टि, पृष्ठ 20, 21)

संविधान का प्रस्तावना

संविधान की प्रस्तावना

प्रस्तावना संविधान के लिए एक परिचय के रूप में कार्य करती है। 1976 में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा इसमें संशोधन किया गया था जिसमें तीन नए शब्द समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता को जोड़ा गया था। संविधान की प्रस्तावना का निर्माण भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य करने के लिए किया गया। यह भारत के सभी नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता को सुरक्षित करती है और लोगों के बीच भाई चारे को बढावा देती है।

प्रस्तावना

  • उद्देशिका संविधान के आदर्शोँ और उद्देश्योँ व आकांक्षाओं का संछिप्त रुप है।
  • अमेरिका का संविधान प्रथम संविधान है, जिसमेँ उद्देशिका सम्मिलित है।
  • भारत के संविधान की उद्देशिका जवाहरलाल नेहरु द्वारा संविधान सभा मेँ प्रस्तुत उद्देश्य प्रस्ताव पर आधारित है।
  • उद्देश्यिका 42 वेँ संविधान संसोधन (1976) द्वारा संशोधित की गयी। इस संशोधन द्वारा समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता शब्द सम्मिलित किए गए।
  • प्रमुख संविधान विशेषज्ञ एन. ए. पालकीवाला ने प्रस्तावना को संविधान का परिचय पत्र कहा है।
हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिक को : सामाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक नयाय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब मेँ व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा मेँ आज तारीख 26 नवंबर 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत २००६ विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित, और आत्मार्पित करते हैं।

प्रस्तावना का उद्देश्य

  • सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय उपलब्ध कराना।
  • विचार, मत, विश्वास, धर्म तथा उपासना की स्वतंत्रता प्रदान करना।
  • पद और अवसर की समानता देना।
  • व्यक्ति की गरिमा एवं राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता स्थापित करना।

आवश्यक तत्व

  • उद्घोषित करती है कि भारत की संप्रभुता भारत के लोगोँ मेँ समाहित है।
  • उद्घोषित करती है कि भारत भारतीय राज्य की प्रकृति संप्रभु, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक है।
  • उद्घोषित करती है कि भारत के लोगोँ का उद्देश्य न्याय, स्वतंत्रता, समानता प्राप्त करना है तथा बंधुत्व की भावना का विकास करना है।
  • उद्घोषित करती है कि भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत, अधिनियमित, आत्मार्पित किया गया है।

परिभाषिक शब्दों के भावार्थ

  • हम भारत के लोग : हम भारत के लोग संपूर्ण भारतीय राजव्यवस्था का मूल आधार है। इन शब्दोँ का महत्व इस अर्थ मेँ है कि अपने संपूर्ण इतिहास मेँ पहली बार भारत के लोग इस स्थिति मेँ हैं कि अपने भाग्य का निर्माण करने का निर्णय स्वयं कर सकें।
  • यह शब्दावली भारतीय समाज के अंतिम व्यक्ति की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है कि हमारे भारत और उसकी व्यवस्था का स्वरुप क्या हो। ध्यान रहे कि इससे पूर्व सभी अधिनियमों को ब्रिटेन ने पारित किया था जबकि यह संविधान भारत की प्रमुख प्रभुत्व संपन्न संविधान सभा ने भारत के लोगोँ की और से अधिनियमित किया था।
  • संप्रभुता : इस शब्द का अर्थ है कि भारत ने अपने आंतरिक और वाह्य मामलोँ मेँ पूर्णतः स्वतंत्र है। अन्य कोई सत्ता इसे अपने आदेश के पालन के लिए विवश नहीँ कर सकती है।
  • भारत मेँ स्वतंत्र होने के बाद से 1949 मेँ राष्ट्रमंडल की सदस्यता स्वेच्छा से की थी। अतः यह भारत की संप्रभुता का उल्लंघन नहीँ है।
  • समाजवादी : यह शब्द एक विशिष्ट आर्थिक व्यवस्था का द्योतक है जिसमेँ राष्ट्र की आर्थिक गतिविधियोँ पर सरकार के माध्यम से पूरे समाज का अधिकार होने को मान्यता दी जाती है।
  • यह पूंजी तथा व्यक्तिगत पूंजी पर आधारित आर्थिक व्यवस्था, पूंजीवाद के विपरीत संकल्पना है।
  • 42 वेँ संविधान संशोधन द्वारा शामिल किए जाने से पूर्व यह नीति निर्देशक तत्वों के माध्यम से संविधान मेँ शामिल था। समाजवादी शब्द को उद्देशिका मेँ सम्मिलित करना हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के उद्देश्यों के अनुरुप है।
  • पंथनिरपेक्ष : यह शब्द घोषित करता है कि भारत एक राष्ट्र के रुप मेँ किसी धर्म विदेश विशेष को मान्यता नहीँ देता है। इससे यह भी घोषित होता है कि भारत सभी धर्मो का आदर समान रुप से करता है।
  • सभी नागरिक अपने व्यक्तिगत विश्वास, आस्था और धर्म का पालन, संरक्षण और संवर्धन करने के लिए स्वतंत्र है।
  • यह शब्दावली भी 42 वेँ संविधान संशोधन द्वारा उद्देशिका मेँ सम्मिलित की गयी। यद्यपि पंथनिरपेक्षता के मूल तत्व संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 मेँ समाहित हैं।
  • लोकतंत्रात्मक : यह अत्यंत व्यापक अर्थों वाली शब्दावली है जिससे ध्वनित होता है कि आम आदमी की आवाज महत्वपूर्ण है। शासन प्रणाली हो या समाज व्यवस्था सभी क्षेत्रोँ मेँ लोकतंत्र की स्थापना के उद्देश्य का तात्पर्य यह घोषित करता है कि हम सभी समान है तथा क्योंकि हम मनुष्य है इसलिए अपने वर्तमान और भविष्य के उद्देश्यों, नीतियो को तय करना हम सब का समान अधिकार है।
  • उद्देशिका मेँ प्रयुक्त लोकतांत्रिक शब्द भारत को लोकतंत्रात्मक प्रणाली का राष्ट्र घोषित करता है। भारत ने अप्रत्यक्ष लोकतंत्र के अंतर्गत संसदीय प्रणाली को अपने ऐतिहासिक अनुभवो के आधार पर चुना।
  • गणराज्य : शब्द का तात्पर्य है कि राष्ट्र का प्रमुख या अध्यक्ष नियमित अंतराल पर नियमित कार्यकाल के लिए चुना जाता है।
  • ब्रिटेन में वंशानुगत अधार पर राजा या रानी राष्ट्र का प्रतिनिधिनित्व हारते हैं, जबकि शासन की बागडोर प्रधानमंत्री के हाथ मेँ होती है।
  • भारत मेँ गणतंत्र त्वक व्यवस्था के अंतर्गत राष्ट्र और शासन का प्रमुख एक ही पदाधिकारी राष्ट्रपति होता है।
  • सामाजिक आर्थिक एवं राजनैतिक नयाय : उद्देशिका भारत के नागरिकोँ को आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक नयाय प्राप्त कराने के उद्देश्य की घोषणा करती है।
  • न्याय का सामान्य अर्थ होता है कि भेद-भाव की समाप्ति। राजनीतिक न्याय सहित आर्थिक और सामाजिक नयाय के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए नीति-निदेशक तत्वों (भाग-4), मूल अधिकारोँ (भाग-3) मेँ विभिन्न प्रावधान किए गए हैं।
  • सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक नयाय का लक्ष्य 1917 की रुसी क्रांति से प्रेरित है।
  • विचार अभिव्यक्ति विश्वास धर्म और उपासना की स्वतंत्रता : इस शब्द का नकारात्मक अर्थ होता है - प्रतिबंधोँ का अभाव, जबकि सामान्य अर्थ होता है व्यक्तिगत विकास हेतु समान अवसरोँ की उपलब्धता।
  • उद्देशिका मेँ वर्णित इन आदर्शोँ की प्राप्ति के लिए संविधान के भाग-3 मेँ मूल अधिकारोँ के अंतर्गत प्रावधान किया गया है।
  • प्रतिष्ठा और अवसर की समता : इस शब्द का तात्पर्य है कि अतार्किक विशेषाधिकारोँ की समाप्ति, आगे बढ़ने के समान अवसर तथा मानव होने के आधार पर सभी समान हैं। इससे संबंधित प्रावधान संविधान के भाग-3 और भाग-4 मेँ उल्लिखित हैं।
  • व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता : बंधुता शब्द राष्ट्र के सभी नागरिकोँ के बीच भावनात्मक संबंधों को दृढ़ करने का आदर्श प्रस्तुत करता है, जैसा की परिवार के सदस्योँ के बीच मेँ होता है।
  • भावनात्मक एकता के अभाव मेँ न तो व्यक्ति के सम्मान की रक्षा की जा सकती है और न राष्ट्र की एकता और अखंडता संरक्षित रह सकती है।
  • अखंडता शब्द 42-वेँ संविधान संशोधन द्वारा उद्देशिका मे शामिल किया गया। वस्तुतः स्वतंत्रता, समता और बंधुता का उद्देश्य फ्रांसीसी क्रांति (1889) से प्रभावित है।

उद्देशिका : संविधान का भाग है या नहीँ? के संबंध संदर्भ मेँ न्यायिक निर्णय, सर्वोच्च नयायालय के दृष्टिकोण मेँ संविधान की प्रस्तावना संविधान के निर्माताओं के मन को खोलने की कुंजी है

  • 1960 के बेरुबाड़ी वाद मेँ यह प्रश्न निर्णय हेतु सर्वोच्च यायालय के समक्ष प्रस्तुत हुआ तो सर्वोच्चन न्यायालय ने माना की यद्यपि उद्देशिका संविधान के उद्देश्योँ का संघीभूत रुप है तथा संविधान निर्माताओं के लक्ष्योँ की कुंजी है, लेकिन यह संविधान का भाग नहीँ है।
  • 1973 के केशवानन्द भारती वाद और 1995 के एल. आई. सी. वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी पूर्व की मान्यता के विपरीत माना कि उद्देशिका संविधान का भाग है क्योंकि संविधान अनुच्छेदों में वर्णित प्रावधानोँ की व्याख्या मेँ सहायक है।
  • केशवानंद भारती के वाद मेँ उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि संविधान के किसी भाग मेँ संशोधन का अधिकार है लेकिन उस भाग मेँ संशोधन नहीँ किया जा सकता, जो आधारभूत ढांचे से संबंधित है।
  • संविधान सभा ने भी सभी भागोँ को अधिनियमित करने के बाद उद्देशिका को संविधान के भाग के रुप मेँ अधिनियमित किया गया था। अतः उद्देशिका संविधान का भाग है। परंतु इसे नयायालय मेँ वैधानिक की प्रस्थिति प्राप्त नहीँ है।

उद्देशिका : संशोधन योग्य है या नहीँ? के संदर्भ मेँ न्यायिक निर्णय - इसकी प्रकृति ऐसी है कि इनका प्रवर्तन नयायालय मेँ नहीँ हो सकता है अर्थात यह न्यायालय मेँ अप्रवर्तनीय है

  • संविधान के अनुच्छेद 368 मेँ संविधान संसोधन की शक्ति और प्रक्रिया सन्निहित है।
  • 1973 के केशवानन्द भारती वाद मेँ उद्देशिका के संशोधन योग्य होने या न होने का प्रश्न सर्वोच्च यायालय के समक्ष आया, तो न्यायालय ने माना की उद्देशिका संविधान का भाग है अतः यह अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधनीय है लेकिन एक शर्त रखी कि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत किए गए संशोधन से संविधान के मूल तत्वों मेँ कोई परिवर्तन नहीँ होना चाहिए। अतः उद्देशिका संशोधन योग्य है और यह शक्ति मात्र संसद को प्राप्त है। संविधान के मूल तत्वों के प्रतिबंध के अंतर्गत रहते हुए 1976 मेँ 42 वेँ संविधान संशोधन द्वारा उद्देशिका मेँ समाजवादी, पंथ निरपेक्ष और अखंडता शब्द जोड़े गए।

उद्देशिका का महत्व

  • संविधान के मूल सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक दर्शन की अभिव्यक्ति है।
  • संविधान निर्माताओं के महान और आदर्श विचारोँ की कुंजी है।
  • सर अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर के अनुसार उद्देशिका हमारे स्वप्नों और विचारोँ का प्रतिनिधित्व करती है।
  • के. एम. मुंशी के अनुसार उद्देशिका हमारे प्रभुत्व संपन्न, लोकतंत्रात्मक गणराज्य की जन्मकुंडली है।
  • सर अर्नेस्ट वार्कर ने उद्देशिका को अपने सामाजिक, राजनैतिक विचारोँ की कुंजी माना तथा अपनी पुस्तक प्रिंसिपल्स ऑफ सोशल एंड पोलिटिकल थ्योरी मेँ आमुख के रूप मेँ शामिल किया।
  • एम. हिदायतुल्ला के अनुसार उद्देशिका हमारे संविधान की आत्मा है।
  • अन्य तथ्य

  • संविधान का दार्शनिक आधार – पंडित नहेरु का उदेश्य प्रस्ताव (अमेरिकी प्रस्तावना पर आधारित)
  • संविधान सभा में प्रस्तुत: 13 दिसम्बर, 1946
  • सर्वसम्मति से स्वीकार: 15 दिसम्बर, 1946
  • संविधान की प्रस्तावना संविधान की आत्मा है
  • प्रस्तावना में अब तक सिर्फ एक बार संशोधन
  • 42वे संशोधन (1976) द्वारा
  • उच्चतम न्यायालय के अनुसार: 1. प्रस्तावना संविधान निर्माताओ के मन की कुंजी, 2. भारत के लोगो के आदर्शो और आकांक्षाओ का प्रतीक
  • बेरुबाडी मामला (1960) – प्रस्तावना संविधान का हिस्सा नही लेकिन ‘भारतीय संविधान की कुंजी’ माना गया.
  • गोलकनाथ वाद, 1969 में उच्चतम न्यायलय के न्यायमूर्ति हिदायतुल्ला ने कहा की “यदि विधानमंडल द्वारा प्रयुक्त किसी शब्दावली पर कोइ शंका हो तो उसे दूर करने के लिए विश्वसनीय तरीका यह है कि उसके मूल में निहित भावनाओ, आधार, कारणो पर विचार करने के लिए संविधान की प्रस्तावना का आश्रय लिया जाए.
  • केशवानंद भारती मामला (1973) – प्रस्तावना को संविधान का हिस्सा है और संवैधानिक संशोधनो के अधीन माना गया. बोम्मई मामला (1993) – प्रस्तावना संविधान का अभिन्न हिसा है.

भारतीय संविधान सभा का उत्तरोत्तर विकास

भारतीय संविधान सभा तथा संविधान निर्माण

संविधान निर्माण की सर्वप्रथम मांग बाल गंगाधर तिलक द्वारा 1895 में "स्वराज विधेयक" द्वारा की गई।

1916 में होमरूल लीग आन्दोलन चलाया गया।जिसमें घरेलू शासन सचांलन की मांग अग्रेजो से की गई।

1922 में गांधी जी ने संविधान सभा और संविधान निर्माण की मांग प्रबलतम तरीके से की और कहा- कि जब भी भारत को स्वाधीनता मिलेगी भारतीय संविधान का निर्माण -भारतीय लोगों की इच्छाओं के अनुकुल किया जाएगा।

अगस्त 1928 में नेहरू रिपोर्ट बनाई गई। जिसकी अध्यक्षता पं. मोतीलाल नेहरू ने की। इसका निर्माण बम्बई में किया गया।

इसके अन्तर्गत ब्रिटीश भारत का पहला लिखित संविधान बनाया गया। जिसमें मौलिक अधिकारों अल्पसंख्यकों के अधिकारों तथा अखिल भारतीय संघ एवम् डोमिनियम स्टेट के प्रावधान रखे गए।

इसका सबसे प्रबलतम विरोध मुस्लिम लीग और रियासतों के राजाओं द्वारा किया गया।

1929 में जवाहर लाला नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का लाहौर सम्मेलन हुआ। जिसमें पूर्ण स्वराज्य की मांग की गई।

1936 में कांग्रेस का फैजलपुर सम्मेलन आयोजित किया गया। जिसमें कांग्रेस के मंच से पहली बार चनी हुई संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण की मांग की गई।

मार्च 1942 में दुसरे विश्व युद्व से उपजी परिस्थितियों के उपरान्त क्रिप्स मिशन भारत भेजा गया। जो एक सदस्य का था। इसने युद्ध के बाद भारत में उतरदायी शासन की मांग को मानने का वचन दिया। लेकिन यहां भी 'डोमिनियम स्टेट' अवधारणा रखी गई।

जिसे कांग्रेस लीग और गांधीजी ने नामंजूर कर दिया।तथा गांधीजी ने इस मिशन को 'पोस्ट डेटेड चैक' की संज्ञा दी।

अर्थात अंग्रेज एक ऐसा दिवालिया बैंक है जो भविष्य में कभी भी फेल हो सकता है।

भारत में शासन की अव्यवस्था को देखते हुए तत्कालिन वायसराय लार्ड वेवल ने जून 1945 में शिमला में सर्वदलीय बैठक बुलायी जो किसी भी तार्किक नतीजे पर नहीं पहुंची। इस सम्मेलन को 'शिमला सम्मेलन' या वेवल योजना के नाम से जाना जाता है।

मार्च 19466 में केबिनेट मिशन भारत भेजा गया। जिसकी अघ्यक्षता 'सर पैथिक लारेन्स' ने की तथा दो अन्य सदस्य सर स्टेफर्ड क्रिम्स और ए. वी. अलेक्जेण्डर थे।

इस आयोग द्वारा तत्कालीन समय में शासन का सही निर्धारण करने का प्रयास किया गया। इसकी सिफारिशों के आधार पर संविधान सभा की रचना की गई जो निम्न प्रकार है-

संविधान सभा में कुद सदस्य संख्या 389 निर्धारित की गई।

ब्रिटीश भारत से -292 सदस्य

चीफ कमीशनरी से - 4 सदस्य

देशी रियासतों से - 93 सदस्य रखे गये।

ब्रिटीश भारत और चीफ कमिश्नरी क्षेत्रों से सदस्यों का निर्वाचन किया गया।

प्रत्येक 10 लाख की जनसंख्या पर 1 सदस्य को चुना जाएगा।

सदस्यों को 3 भागों में बांटा गया-

(1) सामान्य (2) मुस्लिम (3) सिख(पंजाब)

पृथक पाकिस्तान की मांग को नामंजूर कर दिया।

इसी आयोग की सिफारिशों के आधार पर जुलाई 1946 में चुनाव सम्पन्न कराए गए। जिसमें कांग्रेस ने 208 सीटें तथा मुस्लिम लीग 73 तथा अन्य 15 सीटे जीते।

चार चीफ कमिश्नरी क्षेत्रों में

  1. दिल्ली
  2. कुर्ग(कर्नाटक)
  3. अजमेर-मेरवाड़ा
  4. ब्रिटिश ब्लूचिस्तान(पाक)

इसी के आधार पर अन्तरीम सरकार का गठन 1946 में किया गया। जिसमें 2 सितम्बर 1946 से कार्य करना प्रारम्भ किया जिसमें मुस्लिम लीग ने भाग नहीं किया।

इस सरकार का अध्यक्ष तत्कालीन वायसराय लार्ड वेवल था। तथा उपाघ्यक्ष पं. जवाहर लाल नेहरू थे।

इस सरकार ने सदस्य संख्या नेहरू सहित 14 रखी गई।

26 अक्टूबर 1946 को इस सरकार का पुर्नगठन किया गया। लीन ने 5 प्रतिनिधि इसमें शामिल किए गए।

मार्च 1947 में माउण्ट बेटन भारत के वायसराय बने। इन्होंने 3 जुन 1947 को एक योजना प्रस्तुत की जिसे विभाजन/ माउण्ट बेटन/ जून योजना के नाम से जाना जाता है। इसे 18 जुलाई 1947 को ब्रिटेन के राजा ने पास कर दिया।

इस योजना की क्रियान्विती 15 अगस्त 1947 के भारत स्वतंन्त्रता अधिनियम में हुई। इसके निम्न प्रावधान थे-

भारत को 2 डोमिनियम स्टेटों में बांटा गय-

(1) भारत (2) पाकिस्तान

भारत से ब्रिटीश सम्राट के सभी अधिकार हटा लिए गए।

पुर्वी बंगाल, पश्चिमी बंगाल, सिन्ध, उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रदेश तथा असम का सिलहर जिला पाकिस्तान को दे दिया गया।

भारत का शासन जब तक संविधान का निर्माण पुर्णत न हो। 1935 के भारत शासन अधिनियम से चलाना तया किया गया।

संविधान सभा को सम्प्रभू/ सम्प्रभूता की स्थिति प्राप्त हो गई।

भारत का वायसराय माउण्ट बेटन बना रहा। लेकिन पाकिस्तान में गर्वनर जनरल या वायसराय मोहम्मद अली जिन्ना बनें।

विभाजन के बाद संविधान सभा का पुनर्गठन किया गया।

9 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक हुई। जिसमें अस्थायी अध्यक्ष सच्चिदानन्द सिन्हा को बनाया गया।

दुसरी बैठक 11 दिसम्बर 1946 को हुई। जिसमें स्थायी अघ्यक्ष डां. राजेन्द्र प्रसाद को बनाया गया। इसी बैठक में उपाध्यक्ष एच. सी. मुखर्जी थे तथा सवैधानिक सलाहकार बी. एन. राव थे।

तीसरी बैठक 13 दिसम्बर 1946 को बुलाई गई, जिसमें नेहरू जी द्वारा 'उदे्देश्य प्रस्ताव' पेश किया गया। जिसे संविधान सभा ने 22 जनवरी 1947 को अपना लिया। इन्ही उद्देश्य प्रस्तावों के आधार पर भारतीय संविधान की प्रस्तावना निर्मित की गई।

संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण हंतु कुछ समितियों का गठन किया गया जो निम्न प्रकार थी

समितिअध्यक्ष
1 संघ शक्त् समितिजवाहर लाल नेहरू
2 संविधान समितिजवाहर लाल नेहरू
3 राज्यों के लिए समितिजवाहर लाल नेहरू
4 राज्यों तथा रियासतों से परामर्श समितिसरदार पटेल
5 मौलिक अधिकार एवं अल्पसंख्यक समितिसरदार पटेल
6 प्रान्तीय संविधान समितिसरदार पटेल
7 मौलिक अधिकारों पर उपसमितीजे. बी. कृपलानी
8 झण्डा समिति अध्यक्षजे. बी. कृपलानी
9 प्रक्रिया नियम समिति(संचालन)राजेद्र प्रसाद
10 सर्वोच्च न्यायलय से संबधित समितिएस. एच. वर्धाचारियर
11 प्रारूप संविधान का परीक्षण करने वाली समितिअल्लादी कृष्णा स्वामी अरयर
12 प्रारूप समिति/ड्राफटिंग/मसौदा समितिडा. भीमराव अम्बेडकर
13 संविधान समीक्षा आयोगएम एन बैक्टाचेलेया

प्रारूप समिति के 7 सदस्य निम्न थे

  1. डाॅ. बी. आर. अम्बेडकर
  2. अल्लादी कृष्णा स्वामी अयंगर
  3. एन. गोपाल स्वामी अयंगर
  4. कन्हैयालाल माणिक्यलाल मुशी
  5. एन. माधवराज -यह बी. एल. मित्तल के स्थान पर आये थे।
  6. टी. टी. कृष्णामाचारी - यह डी. पी. खेतान के स्थान पर आये थे।
  7. मोहम्मद सादुल्ला

प्रारूप समिति 29 अगस्त 1947 को गठित की गई थी।

संविधान सभा में पहली बैठक क अन्तर्गत 207 सदस्यों ने भाग लिया।

संविधान सभा में कुल 15 महिलाओं ने भाग लिया। तथा 8 महिलाओं ने संविधान पर हस्ताक्षर किए।

15 अगस्त 1947 को भारत विभाजन उपरान्त संविधान सभा में सदस्य संख्या घटकर 324 रह गई।

अक्टुबर 1947 को संविधान सभा में सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई।

संविधान सभा द्वारा संविधान के कुल 3 वाचन सम्पन्न किए गए।

अन्तिम वाचन 17 नवम्बर 1949 से 26 नवम्बर 1949 तक।

कुल बैठके 105 तथा 12 अधिवेशन सम्पन्न किए गए। भारत विभाजन से पूर्व 4 अधिवेशन सम्पन्न किए गए।

7 वे अधिवेशन में महात्मा गांधी को श्रद्वांजली अर्पित कि गई।

मई 1949 में भारत ने राष्ट्रमण्डल की सदस्यता ग्रहण करना सुनिश्चित किया।

भारतीय संविधान सहमति और समायोजन के आधार पर बनाया गया है।

भारतीय संविधान सभा ने दो प्रकार से कार्य किया।

(1) जब संविधान निर्माण का कार्य किया जाता तो इसकी अध्यक्षता राजेन्द्र प्रसाद करते तथा

(2) जब संविधान सभा विधायिका के रूप में कार्य करती है तो अध्यक्षता गणेश वासुदेव मावंलकर द्वारा की जाती।

संविधान सभा की अंतिम बैठक संविधान निर्माण हेतु 24 नवम्बर 1949 को आयोजित की गई। इस दिन 284 लोगों ने संविधान पर हस्ताक्षर किए।

हस्ताक्षर करने वाला पहला व्यक्ति जवाहर लाल नेहरू था।

राजस्थान से हस्ताक्षर करने वाला पहला व्यक्ति बलवंत सिंह मेहता था। तथा राजस्थान से 12 सदस्य भेजे गए।

11 सदस्य देशी रियासतों से तथा 1 चीफ कमीश्नरी अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र से है।

26 नवम्बर 1949 को संविधान के 15 अनुच्छेद जिसमें नागरिकता, अन्तरिम संसद तथा सक्रमणकालीन उपबंध लागु किए गए।

सम्पुर्ण संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया।

लेकिन लागु करने से पूर्व 24 जनवरी 1950 को अन्तिम बैठक बुलाई गई। जिसमें डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद को भारत का राष्ट्रपति चुना गया तथा राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान को अपनाया गया।

राष्ट्रगान:- रविन्द्र नाथ टैगोर - पहली बार 1911 के कोलकत्ता अधिवेशन में गाया गया। अवधि - लगभग 52 सैकण्ड। रचना - मूल बांग्ला भाषा में

राष्ट्रीय गीत - बंकिम चन्द चटर्जी

यह मुलतः संस्कृत भाषा में है तथा आनन्द मठ से लिया गया था।

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...