भारतीय संविधान का विकास

भारतीय संविधान के विकास का इतिहास(1773-1947)
1757 ई. की प्लासी की लड़ाई और 1764 ई. बक्सर के युद्ध को अंग्रेजों द्वारा जीत लिए जाने के बाद बंगाल पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने शासन का शिकंजा कसा. इसी शासन को अपने अनुकूल बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने समय-समय पर कई एक्ट पारित किए, जो भारतीय संविधान के विकास की सीढ़ियां बनीं. वे निम्न हैं:

1. 1773 ई. का रेग्‍यूलेटिंग एक्ट: इस एक्ट के अंतर्गत कलकत्ता प्रेसिडेंसी में एक ऐसी सरकार स्थापित की गई, जिसमें गवर्नर जनरल और उसकी परिषद के चार सदस्य थे, जो अपनी सत्ता का उपयोग संयुक्त रूप से करते थे. इसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं -
(i) कंपनी के शासन पर संसदीय नियंत्रण स्थापित किया गया.
(ii) बंगाल के गवर्नर को तीनों प्रेसिडेंसियों का जनरल नियुक्त किया गया.
(iii) कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई.

2. 1784 ई. का पिट्स इंडिया एक्ट: इस एक्ट के द्वारा दोहरे प्रशासन का प्रारंभ हुआ-
(i) कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स - व्यापारिक मामलों के लिए
(ii) बोर्ड ऑफ़ कंट्रोलर- राजनीतिक मामलों के लिए.

3. 1793 ई. का चार्टर अधिनियम: इसके द्वारा नियंत्रण बोर्ड के सदस्यों तथा कर्मचारियों के वेतन आदि को भारतीय राजस्व में से देने की व्‍यवस्‍था की गई.

4. 1813 ई. का चार्टर अधिनियम: इसके द्वारा (i) कंपनी के अधिकार-पत्र को 20 सालों के लिए बढ़ा दिया गया. (ii) कंपनी के भारत के साथ व्यापर करने के एकाधिकार को छीन लिया गया. लेकिन उसे चीन के साथ व्यापर और पूर्वी देशों के साथ चाय के व्यापार के संबंध में 20 सालों के लिए एकाधिकार प्राप्त रहा. (iii) कुछ सीमाओं के अधीन सभी ब्रिटिश नागरिकों के लिए भारत के साथ व्यापार खोल दिया गया.

5. 1833 ई. का चार्टर अधिनियम: इसके द्वारा (i) कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए. (ii) अब कंपनी का कार्य ब्रिटिश सरकार की ओर से मात्र भारत का शासन करना रह गया. (iii) बंगालग के गवर्नर जरनल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा. (iv) भारतीय कानूनों का वर्गीकरण किया गया तथा इस कार्य के लिए विधि आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था की गई.

6. 1853 ई. का चार्टर अधिनियम: इस अधिनियम के द्वारा सेवाओं में नामजदगी का सिद्धांत समाप्त कर कंपनी के महत्वपूर्ण पदों को प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर भरने की व्यवस्था की गई.

7. 1858 ई. का चार्टर अधिनियम: (i) भारत का शासन कंपनी से लेकर ब्रिटिश क्राउन के हाथों सौंपा गया. (ii) भारत में मंत्री-पद की व्यवस्था की गई. (iii) 15 सदस्यों की भारत-परिषद का सृजन हुआ. (iv) भारतीय मामलों पर ब्रिटिश संसद का सीधा नियंत्रण स्थापित किया गया.

8. 1861 ई. का भारत शासन अधिनियम: गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार किया गया, (ii) विभागीय प्रणाली का प्रारंभ हुआ, (iii) गवर्नर जनरल को पहली बार अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई. (iv) गवर्नर जरनल को बंगाल, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब में विधान परिषद स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई.

9. 1892 ई. का भारत शासन अधिनियम: (i) अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली की शुरुआत हुई, (ii) इसके द्वारा राजस्व एवं व्यय अथवा बजट पर बहस करने तथा कार्यकारिणी से प्रश्न पूछने की शक्ति दी गई.

10. 1909 ई० का भारत शासन अधिनियम [मार्ले -मिंटो सुधार] -
(i) पहली बार मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक प्रतिनिधित्व का उपबंध किया गया.
(ii) भारतीयों को भारत सचिव एवं गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषदों में नियुक्ति की गई.
(iii) केंद्रीय और प्रांतीय विधान-परिषदों को पहली बार बजट पर वाद-विवाद करने, सार्वजनिक हित के विषयों पर प्रस्ताव पेश करने, पूरक प्रश्न पूछने और मत देने का अधिकार मिला.
(iv) प्रांतीय विधान परिषदों की संख्या में वृद्धि की गई.

11. 1919 ई० का भारत शासन अधिनियम [मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार] -
(i) केंद्र में द्विसदनात्मक विधायिका की स्थापना की गई- प्रथम राज्य परिषद तथा दूसरी केंद्रीय विधान सभा. राज्य परिषद के सदस्यों की संख्या 60 थी; जिसमें 34 निर्वाचित होते थे और उनका कार्यकाल 5 वर्षों का होता था. केंद्रीय विधान सभा के सदस्यों की संख्या 145 थी, जिनमें 104 निवार्चित तथा 41 मनोनीत होते थे. इनका कार्यकाल 3 वर्षों का था. दोनों सदनों के अधिकार समान थे. इनमें सिर्फ एक अंतर था कि बजट पर स्वीकृति प्रदान करने का अधिकार निचले सदन को था.

(ii) प्रांतो में द्वैध शासन प्रणाली का प्रवर्तन किया गया. इस योजना के अनुसार प्रांतीय विषयों को दो उपवर्गों में विभाजित किया गया- आरक्षित तथा हस्तांतरित. आरक्षित विषय थे - वित्त, भूमिकर, अकाल सहायता, न्याय, पुलिस, पेंशन, आपराधिक जातियां, छापाखाना, समाचार पत्र, सिंचाई, जलमार्ग, खान, कारखाना, बिजली, गैस, व्यालर, श्रमिक कल्याण, औघोगिक विवाद, मोटरगाड़ियां, छोटे बंदरगाह और सार्वजनिक सेवाएं आदि.

हस्तांतरित विषय -
(i) शिक्षा, पुस्तकालय, संग्रहालय, स्थानीय स्वायत्त शासन, चिकित्सा सहायता.
(ii) सार्वजनिक निर्माण विभाग, आबकारी, उघोग, तौल तथा माप, सार्वजनिक मनोरंजन पर नियंत्रण, धार्मिक तथा अग्रहार दान आदि.
(iii) आरक्षित विषय का प्रशासन गवर्नर अपनी कार्यकारी परिषद के माध्यम से करता था; जबकि हस्तांतरित विषय का प्रशासन प्रांतीय विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी भारतीय मंत्रियों के द्वारा किया जाता था.
(iv) द्वैध शासन प्रणाली को 1935 ई० के एक्ट के द्वारा समाप्त कर दिया गया.
(v) भारत सचिव को अधिकार दिया गया कि वह भारत में महालेखा परीक्षक की नियुक्ति कर सकता है.
(vi) इस अधिनियम ने भारत में एक लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान किया.
12. 1935 ई० का भारत शासन अधिनियम: 1935 ई० के अधिनियम में 451 धाराएं और 15 परिशिष्‍ट थे. इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
(i) अखिल भारतीय संघ: यह संघ 11 ब्रिटिश प्रांतो, 6 चीफ कमिश्नर के क्षेत्रों और उन देशी रियासतों से मिलकर बनना था, जो स्वेच्छा से संघ में सम्मलित हों. प्रांतों के लिए संघ में सम्मिलित होना अनिवार्य था, किंतु देशी रियासतों के लिय यह एच्छिक था. देशी रियासतें संघ में सम्मिलित नहीं हुईं और प्रस्तावित संघ की स्थापना संबंधी घोषणा-पत्र जारी करने का अवसर ही नहीं आया.
(ii) प्रांतीय स्वायत्ता: इस अधिनियम के द्वारा प्रांतो में द्वैध शासन व्यवस्था का अंत कर उन्हें एक स्‍वतंत्र और स्वशासित संवैधानिक आधार प्रदान किया गया.
(iii) केंद्र में द्वैध शासन की स्थापना: कुछ संघीय विषयों [सुरक्षा, वैदेशिक संबंध, धार्मिक मामलें] को गवर्नर जनरल के हाथों में सुरक्षित रखा गया. अन्य संघीय विषयों की व्यवस्था के लिए गवर्नर- जनरल को सहायता एवं परामर्श देने हेतु मंत्रिमंडल की व्यवस्था की गई, जो मंत्रिमंडल व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी था.
(iv) संघीय न्‍यायालय की व्यवस्था: इसका अधिकार क्षेत्र प्रांतों तथा रियासतों तक विस्तृत था. इस न्यायलय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा दो अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था की गई. न्यायालय से संबंधित अंतिम शक्ति प्रिवी काउंसिल [लंदन] को प्राप्त थी.
(v) ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता: इस अधिनियम में किसी भी प्रकार के परिवर्तन का अधिकार ब्रिटिश संसद के पास था. प्रांतीय विधान मंडल और संघीय व्यवस्थापिका: इसमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं कर सकते थे.
(vi) भारत परिषद का अंत : इस अधिनियम के द्वारा भारत परिषद का अंत कर दिया गया.
(vii) सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति का विस्तार: संघीय तथा प्रांतीय व्यवस्थापिकाओं में विभिन्न सम्प्रदायों को प्रतिनिधित्व देने के लिए सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति को जारी रखा गया और उसका विस्तार आंग्ल भारतीयों - भारतीय ईसाइयों, यूरोपियनों और हरिजनों के लिए भी किया गया.
(viii) इस अधिनियम में प्रस्तावना का अभाव था.
(xi) इसके द्वारा बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया, अदन को इंग्लैंड के औपनिवेशिक कार्यालय के अधीन कर दिया गया और बरार को मध्य प्रांत में शामिल कर लिया गया.

13. 1947 ई० का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम: ब्रिटिश संसद में 4 जुलाई, 1947 ई० को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम प्रस्तावित किया गया, जो 18 जुलाई, 1947 ई० को स्वीकृत हो गया. इस अधिनियम में 20 धाराएं थीं. अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्न हैं -
(i) दो अधिराज्यों की स्थापना: 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत एवं पाकिस्तान नामक दो अधिराज्य बना दिए जाएंगें, और उनको ब्रिटिश सरकार सत्ता सौंप देगी. सत्ता का उत्तरदायित्व दोनों अधिराज्यों की संविधान सभा को सौंपा जाएगा.
(ii) भारत एवं पाकिस्तान दोनों अधिराज्यों में एक-एक गवर्नर जनरल होंगे, जिनकी नियुक्ति उनके मंत्रिमंडल की सलाह से की जाएगी.
(iii) संविधान सभा का विधान मंडल के रूप में कार्य करना- जब तक संविधान सभाएं संविधान का निर्माण नई कर लेतीं, तब तक वह विधान मंडल के रूप में कार्य करती रहेंगीं.
(iv) भारत-मंत्री के पद समाप्त कर दिए जाएंगें.
(v) 1935 ई० के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा शासन जब तक संविधान सभा द्वारा नया संविधान बनाकर तैयार नहीं किया जाता है; तब तक उस समय 1935 ई० के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा ही शासन होगा.
(vi) देशी रियासतों पर ब्रिटेन की सर्वोपरिता का अंत कर दिया गया. उनको भारत या पाकिस्तान किसी भी अधिराज्य में सम्मलित होने और अपने भावी संबंधो का निश्चय करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई.
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प्राचीन भारतीय इतिहास और जाति प्रथा

चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं। 

सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की।

सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?

महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।

विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।

भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।

श्रीकृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे, 

उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे।

यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्रीकृषण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।

राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे।

उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे

तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।

वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे, जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।

प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे । 

नन्द वंश की शुरुवात गोकुल के जमींदार राजा साहब महाराज नंद जी ने की थी जो वासुदेव यादव के चचेरे भाई थे इनके ही यहां भगवान श्री कृष्ण जी महाराज का लालन पालन हुआ था गोकुल में,
बहुत बाद मे बिहार बंगाल में नंद बाबा के नाम पर नंद वंश चला और इसमें 
महापद्मनंद बहुत शक्तिशाली बलशाली योद्धा राजा था, बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी यदुवंशी क्षत्रिय ही कहलाये। और ये लोग नंदवंशी यादव कहलाए 

उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त यादव मौर्य से हुई, हालाकि ये चरवाहा यादव थे जिनको काम होता था कि यादव समाज की गायों को चराना और यह लोग भी यादव परिवार के ही एक अंग है हालाकि चंद्रगुप्त मोर पालने वाले परिवार से थे और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया और चंद्रगुप्त ने नंद वंश के बाद अपनी सत्ता बनाई। 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।

फिर गुप्त वंश गुप्त भी यादव ही थे का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।140 साल देश पर गुप्तो का राज रहा।

केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर 92% समय प्राचीन काल में देश में शासन यादव का ही रहा  आज पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।

फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम शासन रहा।

अंत में मराठों का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया, चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया।

अहिल्या बाई होलकर यदुवंशी  क्षत्रिय महारानी थी खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी काशी विश्वनाथ मंदिर इन्होने ही बनवाया था 
 पुरे देश को ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये। 

मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|।

यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।

मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।

1800 -1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ । जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया। 

अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब "कास्ट ऑफ़ माइंड" में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।

इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान,  ह्यू सांग और अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।

प्राचीन भारत वर्ण व्यवस्था के आधार पर था यानि कर्म के आधार पर था, अगर ब्राह्मण मे जनम लिया और शराब सेवन, मांस, मछली का सेवन करे तो उसे चंडाल कहा जाता था और असुर, जैसे रावण आदि 

योगी आदित्यनाथ जो क्षत्रिय है ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत  हैं, 
पिछड़ी जाति मे यादव उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं। 
जन्म आधारित जातीय व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।
और भीम राव अम्बेडकर जो कि हिंदू नाम रख के नव बौद्ध हो गया था ने,अंग्रेजो की नीति को ही आगे बढ़ाया और आज का भारत में 4 मुख्य जाति 200 सौ उप जाति और 4 हजार अति उप जाति में भारतीय हिंदू समाज बट चुका है,
अगर जनरल जाति का है अगर वोट के लालची नेताओं ने उस जाति को रिजर्व कोटा में शामिल किया तो उस जनरल जाति से बाकी के जनरल जाति वाले नफरत करते हैं और कल तक जो जनरल जाति वाला एक साथ मे उठना बैठना यह तक कि बेटी रोटी का रिश्ता था रातों रात सब खत्म,
अब जो जाति रिजर्व हुई उसके साथ के जाति वाले उसको अछूत बोल कर परेशान करेगें, प्रताड़ित करेगें, पिछले 300  सौ सालो से यहीं होता आ रहा है
क्या मेहतर, हलखौर, डोम, चमार, दुसाध, धोबी आदि अछूत जातियां हैं
नही,
अहीर – जनरल जाति, 1924 मे पिछड़ा वर्ग बना कर सबसे पहले शामिल किया गया और 2023 मे भी पिछड़ा वर्ग 2 मे ही है, सब कुछ जनरल जाति के ही बराबर कट ऑफ मार्क्स, परीक्षा फीस भी बराबर, मिला क्या,मिला की अहीर यानि यादव समाज वाले जनरल जाति के बाकी भाइयों से जलील होते रहें, परेशान होते रहें, उनका जनेऊ तोड़ा गया, काम मिलना भी बंद हो गया, रास्ते में औरत बेटी बहन की बेआबरु की गई, हालात इतना मजबूर हो गया की जो जाति राजा महाराजा थे अमीर थे, किसी के आगे हाथ नही फैलाया, अब वही जाति वाले दूसरे के यहां मजदूरी कर जी रहें हैं, जिन के घर की औरते गहनों की दुकान थी यानि पुरा सजी धजी रहती थीं, उन घरों की औरतों को माथे पर दही लेकर घूम घूम कर बेचना पड़ गया,
जो राजा महाराजा जमींदार कुलीन वर्ग के थे, 1947 मे रियासत खत्म की गई और 1952 आते आते जमींदारिया, एक ही झटके में सड़क पर भीख मांगने पर मजबूर कर दिया गया, यह है आरक्षण

मेहतर – मेहनत मजदूरी कर खाने वाला

हलखोर – जो मुसलमान नही बने तो मानव मल को साफ सफाई में लगा दिया.

डोम – कोई भी हिंदू किसी भी जाति का हो, जब तक पहली अग्नि शमशान घाट में डोम नही देगा, मृतक शरीर को अग्नि नही मिलेगी, क्या यह जाति नीच हुई. विचार करे.

चमार – रियासत काल, हमलावर काल, मुगल काल के बाद अंग्रेज काल में चमार ही वैध होते थे और सर्जन डॉ होते थे, जो मानव शरीर, जानवर के शरीर का ऑपरेशन करते थे,

आज भी गोपालगंज जिले, बिहार के एक सांसद महोदय है डाक्टर आलोक कुमार सुमन जो जात के चमार है, एमबीबीएस है लेकिन प्राचीन काल की तरह वैद्यों की तरह आपके नज्ब को पकड़ कर बीमारी पता करते हैं, अंग्रेज़ी दवा केवल 5 दिन का देते हैं, अब तक 5 हजार से ज्यादा ऑपरेशन कर चूके है, और जेडीयू के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष भी है 2019 से,
और चमार जाति की औरत जब तक डिलीवरी कराने नही जायेगी, कोई भी जाति हो बच्चा नही होता था, यानि गांव की दाई मां,
जब अंग्रेज आए तो इसे अवैध घोषित कर दिया और सब जाति वालों को नर्स बना कर बहाल कर रुपया भी देने लगे, क्या आज अस्पतालों में नर्स मे किस जाति की महिला नही है, इस हिसाब से सब की सब चमार हुई की नही,

दुसाध – जिसने एक साथ दो साध दिया, आज भी दुसाध तलवार की तरह एक हथियार लेकर ही जाते है शादी विवाह करने जाता है

कुर्मी – कछुआ पकड़ने वाली जाति, लोगो के घरों में काम करने वाली जातियां हैं

कोयरी – खेती बाड़ी यानि अनाज उत्पादन, सब्जी की खेती

कोहार – कृषि वैज्ञानिक यानि मिट्टी जांच की जन्मजात प्रतिभा

लोहार – अस्त्र शस्त्र बनाना, मशीनरी

बढ़ई – लकड़ियों के समान, डेकोरेशन आदि

पन्हेरी/चौरसिया/बराई/तमोली(वैश्य ) लेकिनआरक्षण से शुद्र यानि एससी एसटी वर्ग में शामिल – यानि पान मसाला उत्पादक

गोड(वैश्य )– अनाज भुजने वाले

कायस्थ (चमार जाति की एक शाखा )– मुंशी/मुनीम/राज शाही मे हिसाब किताब करने वाला

भूमिहार – यदुवंशी/यादव समाज की एक शाखा जो खुद को यादवों/अहीर क्षत्रिय से अलग बताते हुए, खुद को ब्राह्मण बताते हैं

तेली(वैश्य )– सरसो का तेल निकालने वाला

बनिया (वैश्य)– खाद्य पदार्थ का व्यापार करने वाला

राजपुत क्षत्रिय (यादव समाज)– राजा का पुत्र कालांतर में राजा महाराजा और उनके यहां सेनापति और सेना के सिपाही

जाट (यादव समाज)– राजा महाराजा और सेनापति/सैनिक 
अहीर (यादव समाज)– राजा महाराजा और सेनापति/सैनिक 
जादौन (यादव  समाज)– राजा महाराजा और सेनापति/सैनिक
ग्वाला (यादव  समाज)– राजा महाराजा, सेनापति/सैनिक
चरवाहा (यादव  समाज)– राजा महाराजा, सेनापति/सैनिक
गायकवाड (यादव  समाज )– राजा महाराजा, सेनापति/सैनिक
मराठा (नंद वंश –चरवाहा – यादव समाज)
सिंधिया ( यादव  समाज)– राजा महाराजा, सेनापति/सैनिक
गोप ( यादव  समाज)–राजा महाराजा, सेनापति/सैनिक
राय ( यादव  समाज)– राजा महाराजा सेनापति सैनिक आदि
नंद (नंदवंशी यादव – महाराज नंद के वंशज)
मौर्य –( ग्वालवंशी यादव – गोप ग्वाला)
सेन – मथुरा के महाराज कंस के पिता सुरसेन के वंशज(सेन वंश)


बाकियों का क्या कहना 
इसलिए भारतीय होने पर गर्व करें और घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्रों से खुद भी बचें और औरों को भी बचाएं..👍👍🙏🙏
गर्व करो कि सनातनी हो

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ 

मणिपुर में CRPF को खुली छूट मिली news

मणिपुर में CRPF का सख्त संदेश 🚨 मणिपुर में तैनात CRPF जवानों को संबोधित करते हुए महानिदेशक जी. पी. सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा— "यदि...