अघोरी

रहस्यमयी है अघोरियों की साधना विधि




अघोरी: अघोरियों के बारे में ये बातें जानकर हैरान रह जाएंगे आप... अघोरियों की साधना विधि सबसे ज्यादा रहस्यमयी है। उनकी अपनी शैली, अपना विधान है, अपनी अलग विधियां हैं। अघोरी उसे कहते हैं जो घोर नहीं हो। यानी बहुत सरल और सहज हो। जिसके मन में कोई भेदभाव नहीं हो। अघोरी हर चीज में समान भाव रखते हैं। वे सड़ते जीव के मांस को भी उतना ही स्वाद लेकर खा सकते हैं जितना स्वादिष्ट पकवानों को स्वाद लेकर खाया जा सकता है। अघोरियों की दुनिया ही नहीं, उनकी हर बात निराली है। वे जिस पर प्रसन्न हो जाएं उसे सबकुछ दे देते हैं। अघोरियों की कई बातें ऐसी हैं जो सुनकर आप दांतों तले अंगुली दबा लेंगे। हम आपको अघोरियों की दुनिया की कुछ ऐसी ही बातें बता रहे हैं, जिनको पढ़कर आपको एहसास होगा कि वे कितनी कठिन साधना करते हैं।अघोरी गाय का मांस छोड़ कर बाकी सभी चीजों को खाते हैं। मानव मल से लेकर मुर्दे का मांस तक। अघोरपंथ में श्मशान साधना का विशेष महत्व है इसलिए वे श्मशान में रहना ही ज्यादा पंसद करते हैं। श्मशान में साधना करना शीघ्र ही फलदायक होता है। श्मशान में साधारण मानव जाता ही नहीं, इसीलिए साधना में विध्न पड़ने का कोई प्रश्न नहीं। उनके मन से अच्छे बुरे का भाव निकल जाता है, इसलिए वे प्यास लगने पर खुद का मूत्र भी पी लेते हैं। अघोरियों के बारे में कई बातें प्रसिद्ध हैं जैसे कि वे बहुत ही हठी होते हैं, अगर किसी बात पर अड़ जाएं तो उसे पूरा किए बगैर नहीं छोड़ते। गुस्सा हो जाएं तो किसी भी हद तक जा सकते हैं।

अधिकतर अघोरियों की आंखें लाल होती हैं जैसे वो बहुत गुस्सा हो लेकिन उनका मन उतना ही शांत भी होता है। काले वस्त्रों में लिपटे अघोरी गले में धातु की बनी नरमुंड की माला पहनते हैं। अघोरी अक्सर श्मशानों में ही अपनी कुटिया बनाते हैं। जहां एक छोटी सी धूनि जलती रहती है। जानवरों में वो सिर्फ कुत्ते पालना पसंद करते हैं। उनके साथ उनके शिष्य रहते हैं जो उनकी सेवा करते हैं। अघोरी अपनी बात के बहुत पक्के होते हैं, वे अगर किसी से कोई बात कह दें तो उसे पूरा करते हैं। अघोरी अमूमन आम दुनिया से कटे हुए होते हैं। वे अपने आप में मस्त रहने वाले, अधिकांश समय दिन में सोने और रात को श्मशान में साधना करने वाले होते हैं। वे आम लोगों से कोई सम्पर्क नहीं रखते। ना ही ज्यादा बातें करते हैं। वे अधिकांश समय अपना सिद्ध मंत्र ही जाप करते रहते हैं। अघोरी मूलतः तीन तरह की साधनाएं करते हैं। शिव साधना. शव शाधना और श्मशान साधना। शिव साधना में शव के ऊपर पैर रखकर खड़े रहकर साधना की जाती है। बाकी तरीके शव साधना की ही तरह होते हैं। इस साधना का मूल शिव की छाती पर पार्वती द्वारा रखा हुआ पाँव है। ऐसी साधनाओं में मुर्दे को प्रसाद के रूप में मांस और मदिरा चढ़ाया जाता है। शव और शिव साधना के अतिरिक्त तीसरी साधना होती है श्‍मशान साधना, जिसमें आम परिवारजनों को भी शामिल किया जा सकता है। इस साधना में मुर्दे की जगह शवपीठ की पूजा की जाती है। उस पर गंगा जल चढ़ाया जाता है। यहाँ प्रसाद के रूप में भी मांस-मंदिरा की जगह मावा चढ़ाया जाता हैं   

इंद्रजाल

जानकारी




भारतीय प्राचीन विद्याओं में जिन विषयों से सम्बंधित पुस्तकों के प्रति जनसामान्य भी लालायित रहता है, इंद्रजाल उनमें से एक है. इंद्रजाल में दत्तात्रेय द्वारा भगवान शिव से प्राप्त तंत्र-मंत्र-यंत्र का गुप्त दुर्लभ ज्ञान संकलित किया गया है. इंद्रजाल में संकलित तंत्र-मन्त्र आदि कामना पूर्ति कारक प्रयोगों के उत्कीलन की आवश्यकता नहीं होती. दत्तात्रेय तंत्र में कहा गया है कि

ब्राहमण काम क्रोध वश रहेऊ,
त्याहिकरण सब कीलित भयऊ,
कहौ नाथ बिन कीलेमंत्रा,
औरहु सिद्व होय जिमितंत्रा.

देखा जाये तो इंद्रजाल तंत्र के षटकर्मों जैसे शांति कर्म, वशीकरण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन एवं मारण कर्मों में किये जाने वाले विविध प्रकार के तंत्र-मंत्र-यंत्र से सम्बंधित प्रयोगों का विवरण दिया गया है. अलग-अलग लेखकों एवं प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित इंद्रजाल नामक पुस्तक में शिव-दत्तात्रेय वार्ता के दौरान भगवान शिव द्वारा बताये गए तांत्रिक प्रयोगों का समावेश भी किया गया है. इंद्रजाल को कौतुक रत्न कोष भी माना जाता है. क्योंकि इंद्रजाल में दिए गए प्रयोग आश्चर्यजनक परिणाम प्रदान करते हैं. तंत्र-मंत्र प्रयोगों के अतिरिक्त इंद्रजाल में रसायन शास्त्र, औषधि विज्ञान, चमत्कार दिखाने वाले खेल भी दिए गए हैं. हाथ की सफाई से किये जाने वाले जादू के खेलों का संकलन भी इंद्रजाल में किया गया है. इंद्रजाल में औद्योगिक उपयोग के नुस्खे भी बताये गए हैं. इंद्रजाल के कुछ कौतुक प्रयोगों के नाम आगे दिए जा रहे हैं. जैसे :- एक घंटे में पेड़ लगाना, नींबू से खून निकालना, अंडे को बोतल में डालना, अंडे का स्वत: उछलना, छलनी में पानी भरना, अग्नि से वस्त्र न जलना आदि रोचक एवं विस्मय उत्पन्न करने वाले प्रयोगों का विवरण दिया गया है. इसके अतिरिक्त नजर दोष निवारण के लिए भी अनेक प्रभावशाली प्रयोगों, एवं झाड़े आदि का विवरण दिया गया है. इंद्रजाल में यक्षिणी सिद्वि के बारे में भी विस्तार से बताया गया है. विभिन्न प्रकार की यक्षिणियां किस प्रकार की विशेषता से युक्त होती है तथा प्रसन्न होने पर साधक को किस प्रकार से लाभ पहुंचाती है, इसका विवरण भी इंद्रजाल में दिया गया है.





बांझपन

 

बांझपन

परिचय-

जब कोई स्त्री गर्भधारण नहीं कर पाती है या फिर पुरुष अपनी पत्नी को गर्भवती नहीं कर पाता है तो इस अवस्था को बांझपन कहते हैं। अक्सर इस तरह की स्थिति का सामना ज्यादा उम्र के स्त्री-पुरुषों को करना पड़ता है।


कारण-

        बांझपन के कारण स्त्री या पुरुष दोनों में से किसी में भी हो सकते हैं या फिर दोनों में ही हो सकते हैं। गर्भधारण के लिए पुरुष के शुक्राणुओं का स्वस्थ होना, पूरी मात्रा में होना और स्त्री की योनि में शुक्राणुओं का काफी मात्रा में स्खलित होना है ताकि वे आसानी से डिम्ब में पहुंचकर निषेचित हो सके।

लक्षण-

        अगर पति-पत्नी लगभग 1 साल तक बिना गर्भनिरोधक के यौन संबध बनाते हो लेकिन स्त्री फिर भी गर्भधारण न कर पा रही हो तो ऐसी स्त्री को बांझपन का रोग हो सकता है।

चिकित्सा-

        बांझपन रोग में सबसे पहले स्त्री को अपनी जांच करवा लेनी चाहिए ताकि अगर उसके अंदर की किसी कमी के कारण वह गर्भधारण न कर पा रही हो तो उसका पता चल सके।


डिप्रेशन

अवसाद

परिचय-

अवसाद एक मानसिक बीमारी है जिससे ग्रस्त रोगी एकदम हताश और निराश हो जाता है।

कारण-

अवसाद का रोग पीढ़ी दर पीढ़ी भी पनप सकता है। वैसे यह रोग 2 तरह का होता है- बाहरी और आंतरिक अवसाद। बाहरी अवसाद किसी दुर्घटना, मानसिक चोट या तेज प्रतिक्रिया के कारण पैदा होता है और आंतरिक अवसाद गलैड्यूलर फीवर (ग्रंथिल ज्वर) जैसे वायरल संक्रमण से होता है।

लक्षण-

अवसाद रोग में रोगी को सिरदर्द, भूख न लगना, शारीरिक ऊर्जा का शमन होना व कब्ज जैसे लक्षण देखने में आते है। इस रोग में रोगी अजीब-अजीब सी हरकते करने लगता है।

चिकित्सा-

अवसाद एक मानसिक रोग है। इस रोग में अगर रोगी ज्यादा परेशान या दुखी रहता है तो उसे किसी अच्छे मनोचिकित्सक को दिखाना चाहिए।




अपच

 

अपच

परिचय-

कोई व्यक्ति जब भोजन करता है और उसका वह भोजन पचता नहीं है तो वह अपच रोग कहलाता है।

कारण-

अपच रोग के कई कारण होते है जैसे- ज्यादा खेलना, बहुत जल्दी खाना खा लेना, अत्यधिक मसालेदार भोजन अथवा वसायुक्त भोजन लेना। कभी-कभी पेप्टिक अल्सर, पित्त की पथरी या हर्निया आदि के कारण भी अपच का रोग हो जाता है।

लक्षण-

अपच रोग में खाना खाने के बाद पेट में ऐंठन, हल्का-हल्का दर्द, छाती में जलन, खट्टी डकार, जी मिचलाना और बेचैनी की शिकायत हो सकती है।

चिकित्सा-

अपच रोग में एसिडिटी को रोकने के लिए औषधि का प्रयोग करना चाहिए 





एंजाइना पेक्टोरिस

 

एंजाइना पेक्टोरिस

    परिचय-

              एंजाइना पेक्टोरिस के रोग में रोगी ऐंठन का शिकार हो जाता है। इस रोग में शरीर के अंदर खून का संचार कम होने की वजह से रोगी को पूरी तरह आक्सीजन नहीं मिल पाती है।

    कारण-

              जब रोगी के शरीर की धमनियां एकदम सख्त हो जाती है तब यह रोग पैदा होता है।

    लक्षण-

              इस रोग की शुरुआत में रोगी की छाती के बीचो-बीच में तेज दर्द होता है। खासतौर पर इस तरह का दर्द व्यायाम के बाद ही होता है। कभी-कभी यह दर्द जबड़े या बांह के ऊपरी भाग में भी चला जाता है। इस रोग में रोगी को काफी घुटन महसूस होती है और उसे ऐसा लगता है कि किसी ने उसकी छाती पर कुछ भारी सामान रख दिया हो। इस रोग की पहचान के लिए रोगी की इलेक्ट्रो-कॉडियोग्राम जांच करानी अच्छी रहती है।

    उपचार-

              इस रोग के होने पर सबसे पहले रोगी को अपने ब्लड प्रेशर की जांच करा लेनी चाहिए। अगर ब्लड प्रेशर बढ़ा

    हुआ तो उसे कंट्रोल करने की कोशिश करनी चाहिए। आपकी लंबाई के हिसाब से अगर आपका वजन ज्यादा हो तो वजन कम करने की कोशिश करनी चाहिए। अगर रोगी धूम्रपान करता हो तो उसे धूम्रपान तुरंत छोड़ देना चाहिए नहीं तो यह खतरनाक हो सकता हैं  





आँत का कैंसर

  

आंत का कैंसर

परिचय-

कैंसर एक बहुत ही गंभीर रोग है जिसका पूरा व सही तरह से इलाज न कराने से रोगी की जान भी जा सकती है। आंत का कैंसर भी एक ऐसा ही रोग है। यह रोग 40 साल से अधिक उम्र वाले लोगों में अधिक पाया जाता है।

कारण-

आंत का कैंसर गलत तरीके के भोजन जैसे ज्यादा रिफाइंड में पके हुए और कम रेशेवाले भोजन को खाने से होता है। गुदा से सम्बंधित रोग और आंत के अल्सर के कारण भी यह रोग हो सकता है।

लक्षण-

इस रोग में रोगी को पेट में कब्ज बने रहना, पेट में हल्का-हल्का चुभने वाला दर्द रहना, मल के साथ रक्त का आना, पेट में मुलायम गांठ का उभरना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।

उपचार-

आंत के कैंसर रोग में शल्य चिकित्सा (सर्जरी) का सहारा लिया जाता है क्योंकि इस रोग में आंत का वह हिस्सा जो कैंसर से ग्रस्त होता है, गल जाता है और शल्य चिकित्सा द्वारा उसे काटकर अलग कर दिया जाता है। अगर आंत का कैंसर कुछ कम या शुरुआती हो तो एक्युप्रेशर चिकित्सा से उपचार किया जा सकता है।।      

हर्पीज रोग

 

गुप्तांगों की हर्पीज

परिचय-

गुप्तांगों का हर्पीज एक कष्टकारक और बार-बार होने वाला संक्रमण है। कहते हैं कि अगर इसका वायरस एक बार शरीर में घुस जाए तो जिंदगी भर शरीर में ही रहता है। किसी-किसी को तो यह वायरस एक बार परेशान करता है मगर कुछ लोगों को तो यह बार-बार परेशान करता रहता है।

कारण-

          गुप्तांगों के हर्पीज रोग का संक्रमण संभोग करने के कारण ज्यादा फैलता है। योनि अथवा गुदा मैथुन के अलावा यह रोग मुखमैथुन करने से भी फैल सकता है।

लक्षण-

          संभोग के द्वारा इस रोग का संक्रमण फैलने के 1 या 2 हफ्ते बाद पीड़ित व्यक्ति की योनि या लिंग पर जलन और खुजली होने लगती है। यह गुदाद्वार में भी फैल सकता है। इस रोग में गुप्तांगों पर छोटे-छोटे छालों का गुच्छा भी देखा जा सकता है। ये छाले 10 से 12 दिनों में ठीक हो जाते हैं। इस रोग में रोगी को हल्का बुखार सा भी हो सकता है और उसके पेड़ू में लगी ग्रन्थियां बढ़ जाती हैं।

चिकित्सा-

          रोगी के शरीर के इस रोग से संक्रमित स्थान पर बने छालों को गुनगुने नमकीन पानी से धोने से आराम मिलता है।

     




tendinitis

टेंडिनाइटिस

परिचय-

शरीर की पेशियों को हड्डी के साथ बांधकर रखने वाले ऊतकों को टेंडन कहा जाता है। यदि इन टेंडनों में किसी प्रकार का संक्रमण हो जाता है तो उसे टेंडिनाइटिस रोग कहते हैं। इस रोग के कारण टेंडन का रेशेदार ऊतक फूल जाता है और स्पर्श करने पर मुलायम सा लगता है।

लक्षण-

          इस रोग के कारण टेंडन में बहुत तेज दर्द होता है और इससे मिलकर क्रिया करने वाले अंग भी प्रभावित हो जाते हैं। वैसे तो यह रोग ज्यादातर कोहनियों के इर्द-गिर्द के टेंडनों, एड़ी या फिर कंधों के आस-पास की पेशियों वाले भाग को ज्यादा प्रभावित करता है लेकिन फिर भी यह रोग शरीर के किसी भी भाग में हो सकता है।

कारण-

          टेंडिनाइटिस रोग अधिकतर किसी तरह की चोट लग जाने के कारण होता है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा 


 रोग का उपचार किया जा सकता है। रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से टेंडिनाइटिस से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है।


सावधानी-

          इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को जितना हो सके उतना आराम करना चाहिए। इसके अलावा रोगी को इस रोग के कारण प्रभावित भाग पर पट्टी बांधने से भी राहत मिल सकता है ।  

पेप्टिक अल्सर

पेप्टिक अल्सर

परिचय-

शरीर में पाये जाने वाले पाचनतन्त्र में होने वाले घाव को अल्सर कहते हैं। इस रोग में रोगी के आमाशय तथा आंत दोनों में अल्सर हो जाता है। वैसे यह रोग अधिकतर अधेड़ उम्र के पुरुषों तथा स्त्रियों में होता है। जब आमाशय या आंत के किसी भाग की सतह में पाचक रसों के प्रतिरोध की क्षमता खो जाती है तो इ88स प्रकार का रोग हो जाता है।

कारण-

        आमाशय तथा आंत का अल्सर कई कारणों से हो सकता है जैसे- अधिक मात्रा में शराब का सेवन या धूम्रपान करने आदि से। यह रोग उन व्यक्तियों को भी हो सकता है जो अनियमित रूप से भोजन का सेवन करते हैं। इस कारण से होने वाले रोगों को पेप्टिक अल्सर कह सकते हैं। इनके अलावा यह रोग कई सारी दवाईयों के साइड इफेक्ट से भी हो सकता है।

लक्षण-

        इस रोग के कारण व्यक्ति के पेट के ऊपरी भाग या बाईं पसलियों के नीचे की ओर जलन युक्त दर्द होता है। कई बार यह दर्द खाना खाने के बाद शुरू हो जाता है। लेकिन कई बार खाना खाने से यह दर्द कम भी हो जाता है। वैसे यह दर्द लम्बे समय तक रुक-रुककर भी होता रहता है। इस रोग से पीड़ित कुछ व्यक्तियों को जी-मिचलाने की भी शिकायत हो सकती है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार-

          देखा जाए तो यह रोग कुछ महीने के अन्दर ही ठीक हो सकता है लेकिन कभी-कभी इस तरह के रोग को ठीक होने में वर्षों भी लग जाते हैं। यह रोग कई वर्षों तक बना रहता है। कुछ अल्सर रोग में रोगी को उल्टी या मल के साथ खून आना शुरू हो जाता है। यह रोग आगे चलकर कैंसर का रूप भी धारण कर सकता है। इसलिए इन रोगों का सही तरीके से इलाज करना चाहिए। पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा भी किया जा सकता हैं   

 पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार किया जा सकता है। रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से पेप्टिक अल्सर से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है। जब रोगी को पेट में इस रोग के कारण दर्द हो रहा हो तो रोगी को अधिक से अधिक आराम करना चाहिए तथा सदैव पौष्टिक भोजन ही करना चाहिए ।

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...