एंजाइना पेक्टोरिस

 

एंजाइना पेक्टोरिस

    परिचय-

              एंजाइना पेक्टोरिस के रोग में रोगी ऐंठन का शिकार हो जाता है। इस रोग में शरीर के अंदर खून का संचार कम होने की वजह से रोगी को पूरी तरह आक्सीजन नहीं मिल पाती है।

    कारण-

              जब रोगी के शरीर की धमनियां एकदम सख्त हो जाती है तब यह रोग पैदा होता है।

    लक्षण-

              इस रोग की शुरुआत में रोगी की छाती के बीचो-बीच में तेज दर्द होता है। खासतौर पर इस तरह का दर्द व्यायाम के बाद ही होता है। कभी-कभी यह दर्द जबड़े या बांह के ऊपरी भाग में भी चला जाता है। इस रोग में रोगी को काफी घुटन महसूस होती है और उसे ऐसा लगता है कि किसी ने उसकी छाती पर कुछ भारी सामान रख दिया हो। इस रोग की पहचान के लिए रोगी की इलेक्ट्रो-कॉडियोग्राम जांच करानी अच्छी रहती है।

    उपचार-

              इस रोग के होने पर सबसे पहले रोगी को अपने ब्लड प्रेशर की जांच करा लेनी चाहिए। अगर ब्लड प्रेशर बढ़ा

    हुआ तो उसे कंट्रोल करने की कोशिश करनी चाहिए। आपकी लंबाई के हिसाब से अगर आपका वजन ज्यादा हो तो वजन कम करने की कोशिश करनी चाहिए। अगर रोगी धूम्रपान करता हो तो उसे धूम्रपान तुरंत छोड़ देना चाहिए नहीं तो यह खतरनाक हो सकता हैं  





आँत का कैंसर

  

आंत का कैंसर

परिचय-

कैंसर एक बहुत ही गंभीर रोग है जिसका पूरा व सही तरह से इलाज न कराने से रोगी की जान भी जा सकती है। आंत का कैंसर भी एक ऐसा ही रोग है। यह रोग 40 साल से अधिक उम्र वाले लोगों में अधिक पाया जाता है।

कारण-

आंत का कैंसर गलत तरीके के भोजन जैसे ज्यादा रिफाइंड में पके हुए और कम रेशेवाले भोजन को खाने से होता है। गुदा से सम्बंधित रोग और आंत के अल्सर के कारण भी यह रोग हो सकता है।

लक्षण-

इस रोग में रोगी को पेट में कब्ज बने रहना, पेट में हल्का-हल्का चुभने वाला दर्द रहना, मल के साथ रक्त का आना, पेट में मुलायम गांठ का उभरना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।

उपचार-

आंत के कैंसर रोग में शल्य चिकित्सा (सर्जरी) का सहारा लिया जाता है क्योंकि इस रोग में आंत का वह हिस्सा जो कैंसर से ग्रस्त होता है, गल जाता है और शल्य चिकित्सा द्वारा उसे काटकर अलग कर दिया जाता है। अगर आंत का कैंसर कुछ कम या शुरुआती हो तो एक्युप्रेशर चिकित्सा से उपचार किया जा सकता है।।      

हर्पीज रोग

 

गुप्तांगों की हर्पीज

परिचय-

गुप्तांगों का हर्पीज एक कष्टकारक और बार-बार होने वाला संक्रमण है। कहते हैं कि अगर इसका वायरस एक बार शरीर में घुस जाए तो जिंदगी भर शरीर में ही रहता है। किसी-किसी को तो यह वायरस एक बार परेशान करता है मगर कुछ लोगों को तो यह बार-बार परेशान करता रहता है।

कारण-

          गुप्तांगों के हर्पीज रोग का संक्रमण संभोग करने के कारण ज्यादा फैलता है। योनि अथवा गुदा मैथुन के अलावा यह रोग मुखमैथुन करने से भी फैल सकता है।

लक्षण-

          संभोग के द्वारा इस रोग का संक्रमण फैलने के 1 या 2 हफ्ते बाद पीड़ित व्यक्ति की योनि या लिंग पर जलन और खुजली होने लगती है। यह गुदाद्वार में भी फैल सकता है। इस रोग में गुप्तांगों पर छोटे-छोटे छालों का गुच्छा भी देखा जा सकता है। ये छाले 10 से 12 दिनों में ठीक हो जाते हैं। इस रोग में रोगी को हल्का बुखार सा भी हो सकता है और उसके पेड़ू में लगी ग्रन्थियां बढ़ जाती हैं।

चिकित्सा-

          रोगी के शरीर के इस रोग से संक्रमित स्थान पर बने छालों को गुनगुने नमकीन पानी से धोने से आराम मिलता है।

     




tendinitis

टेंडिनाइटिस

परिचय-

शरीर की पेशियों को हड्डी के साथ बांधकर रखने वाले ऊतकों को टेंडन कहा जाता है। यदि इन टेंडनों में किसी प्रकार का संक्रमण हो जाता है तो उसे टेंडिनाइटिस रोग कहते हैं। इस रोग के कारण टेंडन का रेशेदार ऊतक फूल जाता है और स्पर्श करने पर मुलायम सा लगता है।

लक्षण-

          इस रोग के कारण टेंडन में बहुत तेज दर्द होता है और इससे मिलकर क्रिया करने वाले अंग भी प्रभावित हो जाते हैं। वैसे तो यह रोग ज्यादातर कोहनियों के इर्द-गिर्द के टेंडनों, एड़ी या फिर कंधों के आस-पास की पेशियों वाले भाग को ज्यादा प्रभावित करता है लेकिन फिर भी यह रोग शरीर के किसी भी भाग में हो सकता है।

कारण-

          टेंडिनाइटिस रोग अधिकतर किसी तरह की चोट लग जाने के कारण होता है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा 


 रोग का उपचार किया जा सकता है। रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से टेंडिनाइटिस से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है।


सावधानी-

          इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को जितना हो सके उतना आराम करना चाहिए। इसके अलावा रोगी को इस रोग के कारण प्रभावित भाग पर पट्टी बांधने से भी राहत मिल सकता है ।  

पेप्टिक अल्सर

पेप्टिक अल्सर

परिचय-

शरीर में पाये जाने वाले पाचनतन्त्र में होने वाले घाव को अल्सर कहते हैं। इस रोग में रोगी के आमाशय तथा आंत दोनों में अल्सर हो जाता है। वैसे यह रोग अधिकतर अधेड़ उम्र के पुरुषों तथा स्त्रियों में होता है। जब आमाशय या आंत के किसी भाग की सतह में पाचक रसों के प्रतिरोध की क्षमता खो जाती है तो इ88स प्रकार का रोग हो जाता है।

कारण-

        आमाशय तथा आंत का अल्सर कई कारणों से हो सकता है जैसे- अधिक मात्रा में शराब का सेवन या धूम्रपान करने आदि से। यह रोग उन व्यक्तियों को भी हो सकता है जो अनियमित रूप से भोजन का सेवन करते हैं। इस कारण से होने वाले रोगों को पेप्टिक अल्सर कह सकते हैं। इनके अलावा यह रोग कई सारी दवाईयों के साइड इफेक्ट से भी हो सकता है।

लक्षण-

        इस रोग के कारण व्यक्ति के पेट के ऊपरी भाग या बाईं पसलियों के नीचे की ओर जलन युक्त दर्द होता है। कई बार यह दर्द खाना खाने के बाद शुरू हो जाता है। लेकिन कई बार खाना खाने से यह दर्द कम भी हो जाता है। वैसे यह दर्द लम्बे समय तक रुक-रुककर भी होता रहता है। इस रोग से पीड़ित कुछ व्यक्तियों को जी-मिचलाने की भी शिकायत हो सकती है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार-

          देखा जाए तो यह रोग कुछ महीने के अन्दर ही ठीक हो सकता है लेकिन कभी-कभी इस तरह के रोग को ठीक होने में वर्षों भी लग जाते हैं। यह रोग कई वर्षों तक बना रहता है। कुछ अल्सर रोग में रोगी को उल्टी या मल के साथ खून आना शुरू हो जाता है। यह रोग आगे चलकर कैंसर का रूप भी धारण कर सकता है। इसलिए इन रोगों का सही तरीके से इलाज करना चाहिए। पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा भी किया जा सकता हैं   

 पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार किया जा सकता है। रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से पेप्टिक अल्सर से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है। जब रोगी को पेट में इस रोग के कारण दर्द हो रहा हो तो रोगी को अधिक से अधिक आराम करना चाहिए तथा सदैव पौष्टिक भोजन ही करना चाहिए ।

एन्जाइम प्रॉब्लम

एन्जाइना रोग में रोगी के सीने के बाईं ओर दर्द उठता है। यह दर्द बाद में सीने से हाथों और हथेलियों तक पहुंच जाता है। अक्सर यह रोग 40 साल की उम्र से ज्यादा के व्यक्तियों को होता है।

कारण-

एन्जाइना रोग ज्यादा शारीरिक-मानसिक श्रम, भय, घबराहट, अधिक सर्दी लगने अथवा जरूरत से अधिक भोजन करने के कारण हो जाता है। ज्यादा धूम्रपान करने से या उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर) रोग के कारण भी एन्जाइमा का रोग हो सकता है।

लक्षण-

एन्जाइना रोग के होने से पहले रोगी में छाती में जकड़न, सांस लेने में परेशानी और बैचेनी जैसे लक्षण प्रकट होते हैं और उसके बाद दर्द शुरू हो जाता है। रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसे दिल का दौरा पड़ने वाला है।

चिकित्सा-

एन्जाइना रोग में रोगी को सबसे पहले धूम्रपान करना बंद कर देना चाहिए। रोगी को अपने रक्तचाप को भी सामान्य करने की कोशिश करनी चाहिए। रोगी को अपने भोजन पर खासतौर से ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही उसे हृदय से सम्बंधित सभी प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर प्रेशर देना चाहिए।।                      

अल्सर

पेप्टिक अल्सर

परिचय-

शरीर में पाये जाने वाले पाचनतन्त्र में होने वाले घाव को अल्सर कहते हैं। इस रोग में रोगी के आमाशय तथा आंत दोनों में अल्सर हो जाता है। वैसे यह रोग अधिकतर अधेड़ उम्र के पुरुषों तथा स्त्रियों में होता है। जब आमाशय या आंत के किसी भाग की सतह में पाचक रसों के प्रतिरोध की क्षमता खो जाती है तो इस प्रकार का रोग हो जाता है।

कारण-

        आमाशय तथा आंत का अल्सर कई कारणों से हो सकता है जैसे- अधिक मात्रा में शराब का सेवन या धूम्रपान करने आदि से। यह रोग उन व्यक्तियों को भी हो सकता है जो अनियमित रूप से भोजन का सेवन करते हैं। इस कारण से होने वाले रोगों को पेप्टिक अल्सर कह सकते हैं। इनके अलावा यह रोग कई सारी दवाईयों के साइड इफेक्ट से भी हो सकता है।

लक्षण-

        इस रोग के कारण व्यक्ति के पेट के ऊपरी भाग या बाईं पसलियों के नीचे की ओर जलन युक्त दर्द होता है। कई बार यह दर्द खाना खाने के बाद शुरू हो जाता है। लेकिन कई बार खाना खाने से यह दर्द कम भी हो जाता है। वैसे यह दर्द लम्बे समय तक रुक-रुककर भी होता रहता है। इस रोग से पीड़ित कुछ व्यक्तियों को जी-मिचलाने की भी शिकायत हो सकती है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार-

          देखा जाए तो यह रोग कुछ महीने के अन्दर ही ठीक हो सकता है लेकिन कभी-कभी इस तरह के रोग को ठीक होने में वर्षों भी लग जाते हैं। यह रोग कई वर्षों तक बना रहता है। कुछ अल्सर रोग में रोगी को उल्टी या मल के साथ खून आना शुरू हो जाता है। यह रोग आगे चलकर कैंसर का रूप भी धारण कर सकता है। इसलिए इन रोगों का सही तरीके से इलाज करना चाहिए। पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा भी किया जा सकत हैं।

                         अल्सर रोग का उपचार किया जा सकता है। रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से पेप्टिक अल्सर से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है। जब रोगी को पेट में इस रोग के कारण दर्द हो रहा हो तो रोगी को अधिक से अधिक आराम करना चाहिए तथा सदैव पौष्टिक भोजन ही करना चाहिए।



जोबना का कैंसर ( स्तन)

   

स्तन कैंसर

परिचय-

स्तन कैंसर स्त्रियों का एक बहुत ही ज्यादा कष्टदायक रोग होता है। इस रोग के कारण स्त्री के स्तनों में बहुत तेज दर्द होता है तथा स्तनों से पीब निकलने लगती है।

लक्षण-

        इस रोग के हो जाने पर स्तन सख्त तथा अनियमित आकार की गांठ के रूप में हो जाते हैं जिन्हें छूने पर बहुत तेज दर्द होने लगता है। इस प्रकार की गांठ स्तनों के किसी भी भाग में उभर आती है। जब इस रोग की शुरुआत होती है तो ये गांठ इधर-उधर सरकती भी रहती हैं।

        जब स्तनों में होने वाली गांठ बड़ी हो जाती है तो यह अपने ऊपर की त्वचा को अन्दर की ओर खींच लेती है जिसके कारण स्तन के अन्दर की ओर एक गड्ढा जैसा बन जाता है। यह गड्ढा दूध का संचार करने वाली नलिकाओं को प्रभावित करता है जिसके कारण यह सिकुड़ जाती हैं और निपल पिचक जाते हैं। जैसे-जैसे गांठ बड़ी होती जाती है वैसे-वैसे ही स्तन की ऊपर की त्वचा से भी चिपक जाती है जिसके कारण स्तन की त्वचा में जलन होने लगती है। कुछ दिनों में इस गांठ के अन्दर पीब बनने लगती है। जब स्त्री के निप्पलों को दबाते हैं तो उसमें से पीब के समान दूध निकलने लगता है। यह गांठ बढ़ते-बढ़ते स्त्रियों के बगलों में पाई जाने वाली लसीका ग्रन्थियों तक भी फैल सकती है। जब इस रोग की शुरुआत होती है तो उस समय इसका उपचार करना बहुत जरूरी हो जाता है यदि इस रोग को बढ़ने से न रोका जाए तो यह रोग पूरे शरीर को प्रभावित कर सकता है।

कारण-

        जब स्तन में गांठ बन जाती है तो सबसे पहले यह पता लगाना चाहिए कि गांठ ज्यादा खतरनाक तो नहीं है। स्तन कैंसर होने की आशंका काफी हद तक वातावरण और जीवनशैली पर निर्भर करती है। स्त्रियों को यह रोग भोजन की एलर्जी के कारण भी हो सकता है। इस रोग के होने में आनुवंशिकता भी एक मुख्य भूमिका अदा करती है। यह रोग एक स्त्री से दूसरी स्त्री को भी हो सकता है। स्त्रियों के स्तन में कैंसर रोग के लिए गर्भनिरोधक गोलियों और जीवन परिवर्तन लक्षणों के उपचार के लिए दी जाने वाली HRT को जिम्मेदार माना जाता है। कोई स्त्री जितनी जल्दी मां बन जाती है उसको स्तन कैंसर होने की आशंका लगभग उतनी ही कम होती है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा स्त्रियों के स्तन कैंसर का उपचार-

        जब किसी स्त्री के स्तन में गांठ सी बनी हुई दिखाई देती है तो तुरंत ही जांच करानी चाहिए कि यह गांठ ज्यादा खतरनाक तो नहीं है। यदि गांठ ज्यादा खतरनाक हो तो भी इसका इलाज किया जा सकता है। यह रोग एक बार ठीक होकर दुबारा भी हो सकता है इसलिए इस रोग का इलाज सही तरीके से कराना चाहिए। स्तन कैंसर का उपचार कराने के लिए सबसे पहले स्त्रियों को अपने स्तनों की जांच करानी चाहिए।

        स्त्रियों के स्तनों की जांच जब माहवारी आये, उसके बाद करनी चाहिए। यह जांच हर महीने तथा एक विशेष समय में करनी चाहिए। यदि स्त्रियों को अपने स्तन में भारीपन महसूस होता हो तो चिन्ता न करें। स्त्रियों को यह पता लगाना चाहिए कि उसके दोनों स्तन एक ही समान है। यदि जांच कराते दौरान स्त्री को लगे कि उसका एक स्तन भारी है तो स्त्री को दूसरे स्तनों पर भी हाथ फेरकर देखना चाहिए कि कहीं दूसरा स्तन भी तो भारी नहीं है। यदि दोनों स्तनों में कुछ असमानता नजर आती है तो घबराएं नहीं। स्तन कैंसर के रोगी को डॉक्टर से उचित सलाह लेनी चाहिए और बिल्कुल लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए क्योंकि यह रोग बढ़कर अधिक खतरनाक बन सकता है।

स्तनों की निम्नलिखित तरीकों द्वारा जांच की जा सकती है-

        स्त्रियों को अपनी स्तनों की जांच करने के लिए सबसे पहले आईने के सामने खड़े हो जाना चाहिए और अपने दोनों हाथों को बगल में लटका लेना चाहिए और देखना चाहिए कि दोनों स्तन दिखने में असामान्य तो नहीं है, स्तनों में डिम्पल या सिकुड़न आदि तो नहीं है या फिर स्तनों की त्वचा या बनावट में कोई फर्क तो नहीं है।

        आईने के सामने खड़े होकर स्त्रियों को अपने हाथ सिर के ऊपर रख लेने चाहिए और अपने आप को अलग-अलग कोणों में देखना चाहिए कि स्तनों में कोई विशेष परिवर्तन तो नहीं हो गया है तथा फिर दायें-बायें घूमकर देखना चाहिए और पता लगाना चाहिए कि दोनों स्तनों से कोई स्राव तो नहीं हो रहा है।

        स्तनों की जांच करते दौरान यह पता लगाना चाहिए कि निप्पल के चारों ओर के क्षेत्र में कहीं गांठ तो नहीं है।

        आईने के सामने खड़े होकर अपने हाथ को ऊपर-नीचे करके देखना चाहिए कि स्तन का कोई भाग सूज तो नहीं रहा है।

        स्त्रियों को पलंग पर लेटकर एक तकिया सिर के नीचे रख लेना चाहिए। फिर एक तकिया बाएं कंधे के नीचे रख लेना चाहिए। इसके बाद अपने बाएं हाथ को सिर के नीचे की ओर रख लेना चाहिए और दाहिने हाथ से बाएं स्तन को दबाकर जांच करनी चाहिए कि कहीं उनमें गांठ या सूजन तो नहीं है।

        स्त्रियों को अपने बगल में हाथ फिराकर गांठे पकड़ने की कोशिश करनी चाहिए। फिर यही क्रिया दोनों स्तनों पर करनी चाहिए। इस क्रिया में बाएं हाथ का प्रयोग करना चाहिए।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा-



(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)

        चित्र में दिए गए एक्यूप्रेशर बिन्दु के अनुसार रोगी के शरीर पर दबाव देकर स्त्रियों के स्तन कैंसर का उपचार किया जा सकता है। रोगी स्त्री को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में करना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से स्त्रियों के स्तन कैंसर का उपचार कर सकता है।

        जब स्त्रियों के स्तन में गांठ बन जाती है तो स्त्रियों के स्तन के निप्पल के आस-पास सीबेशस ग्रन्थि अर्थात दुग्ध नलिका में द्रव्य के समान थैली बन जाती है। इस थैली को स्तन की गांठ कहते हैं। जब स्त्रियों की सीबेशस ग्रन्थि में जाने वाली कोई वाहिका अवरूद्ध हो जाती है तो उनके स्तन में गांठ सी बन जाती है। इन गांठों के कारण स्तन में थक्का या उभार हो जाता है।

उपचार-

        अगर किसी स्त्री के स्तन में गांठ बन जाती है तो उसको तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए और डॉक्टर की उचित सलाह के अनुसार अपना उपचार कराना चाहिए। हो सकता है कि कभी स्तन के अन्दर से सुईयों के द्वारा थैली के अन्दर के अवरूद्ध द्रव्य को बाहर खींचने की जरूरत पड़ जाए। ऐसा करने से यह पता चल जाता है कि गांठ ज्यादा हानिकारक तो नहीं है।

(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)

        चित्रों के अनुसार एक्यूप्रेशर बिन्दु पर दबाव देने से स्तन की गांठ जल्दी ठीक हो जाती है। स्त्रियों को अपने स्तन की गांठ का उपचार करने के लिए किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही तरह से दबाव देने का अनुभव होता है और वह इस रोग का उपचार सही तरीके से कर सकता है।

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बंगाल की लड़ाई

बक्सर की लड़ाई

बक्सर का युद्ध बंगाल के नवाब मीर कासिम,अवध के नवाब सुजाउद्दौला व मुग़ल शासक शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना और अंग्रेजों के मध्य लड़ा गया था | यही वह निर्णायक युद्ध था जिसने अंग्रेजों को अगले दो सौ वर्षों के लिए भारत के शासक के रूप में स्थापित कर दिया| यह युद्ध अंग्रेजों द्वारा फरमान और दस्तक के दुरुपयोग और उनकी विस्तारवादी व्यापारिक आकांक्षाओं का परिणाम था|

22 अक्टूबर,1764 ई.   को लड़े गए बक्सर के युद्ध में संयुक्त भारतीय सेना की पराजय हुई| बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई |1765 ई. में सुजाउद्दौला और शाह आलम ने इलाहाबाद में कंपनी गवर्नर क्लाइव के साथ संधि पर हस्ताक्षर किये| इस संधि के तहत,कंपनी को बंगाल,बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार प्रदान कर दिए गए, जिसने कंपनी को इन क्षेत्रों से राजस्व वसूली के लिए अधिकृत कर दिया|कंपनी ने अवध के नवाब से कड़ा और इलाहाबाद के क्षेत्र लेकर मुग़ल शासक को सौंप दिए,जोकि अब इलाहाबाद में अंग्रेजी सेना के संरक्षण में रहने लगा था|कंपनी ने मुगल शासक को प्रतिवर्ष 26 लाख रुपये के भुगतान का वादा किया लेकिन थोड़े समय बाद ही कंपनी द्वारा इसे बंद कर दिया गया|कंपनी ने नवाब को किसी भी आक्रमण के विरुद्ध सैन्य सहायता प्रदान करने का वादा किया लेकिन इसके लिए नवाब को भुगतान करना होगा|अतः अवध का नवाब कंपनी पर निर्भर हो गया| इसी बीच मीर जाफर को दोबारा बंगाल का नवाब बना दिया गया| उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र को नवाब की गद्दी पर बैठाया गया| कंपनी के अफसरों ने नवाब से धन ऐंठ कर व्यक्तिगत रूप से काफी लाभ कमाया|

युद्ध के लिए जिम्मेदार घटनाएँ

  • ब्रिटिशों द्वारा दस्तक और फरमान का दुरुपयोग,जिसने मीर कासिम के प्राधिकार और प्रभुसत्ता को चुनौती दी
  • ब्रिटिशों के आतंरिक व्यापार पर सभी तरह के शुल्कों की समाप्ति
  • कंपनी के कर्मचारियों का दुर्व्यवहार : उन्होंने भारतीय दस्तकारों, किसानोंऔर व्यापारियों को अपना माल सस्ते में बेचने के लिए बाध्य किया और रिश्वत व उपहार लेने की परंपरा की भी शुरुआत कर दी|
  • ब्रिटिशों का लुटेरों जैसा व्यवहार जिसने न केवल व्यापार के नियमों का उल्लंघन किया बल्कि नवाब के प्राधिकार को भी चुनौती दी|

निष्कर्ष

बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई | ब्रिटिशों की रूचि तीन तटीय क्षेत्रों कलकत्ता ,बम्बई और मद्रास में अधिक थी| अंग्रेजों व फ्र

यूरोप का पुनर्जागरण

      

यूरोप का पुनर्जागरण - Renaissance in Europe

पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) का शाब्दिक अर्थ होता है, 'फिर से जागना”. चौदहवीं और सोलहवीं शताब्दी के बीच यूरोप में जो सांस्कृतिक प्रगति हुई उसे ही 'पुनर्जागरण” कहा जाता है. इसके फलस्वरूप जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नवीन चेतना आई. यह आन्दोलन केवल पुराने ज्ञान के उद्धार तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इस युग में कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन प्रयोग हुए. नए अनुसंधान हुए और ज्ञान-प्राप्ति के नए-नए तरीके खोज निकाले गए. इसने परलोकवाद और धर्मवाद के स्थान पर मानववाद को प्रतिष्ठित किया. पुनर्जागरण वह आन्दोलन था जिसके द्वारा पश्चिम के राष्ट्र मध्ययुग से निकलकर आधुनिक युग के विचार और जीवन-शैली अपनाने लगे. यूरोप के निवासियों ने भौगोलिक, व्यापारिक, सामजिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्रों में प्रगति की. इस युग में लोगों ने मध्यकालीन संकीर्णता छोड़कर स्वयं को नयी खोजों, नवीनतम विचारों तथा सामजिक, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक उन्नति से सुसज्जित किया. प्रत्येक क्षेत्र में सर्वथा नवीन दृष्टिकोण, आदर्श और आशा का संचार हुआ. साहित्य, कला, दर्शन, विज्ञान, वाणिज्य-व्यवसाय, समाज और राजनीति पर से धर्म का प्रभाव समाप्त हो गया. इस प्रकार पुनर्जागरण उस बौद्धिक आन्दोलन का नाम है जिसने रोम और यूनान की प्राचीन सभ्यता-संस्कृति का पुनरुद्धार कर नयी चेतना को जन्म दिया.

यूरोप में पुनर्जागरण के कारण (Causes of Renaissance in Europe)

1. व्यापार तथा नगरों का विकास 

पुनर्जागरण का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण वाणिज्य-व्यापार का विकास था. नए-नए देशों के साथ लोगों का व्यापारिक सम्बन्ध कायम हुआ और उन्हें वहाँ की सभ्यता-संस्कृति को जानने का अवसर मिला. व्यापार के विकास ने एक नए व्यापारी वर्ग को जन्म दिया. व्यापारी वर्ग का कटु आलोचक और कट्टर विरोधी था. व्यापारी वर्ग ने चिंतकों, विचारकों, साहित्यकारों और वैज्ञानिकों को प्रश्रय दिया. इस प्रकार व्यापारी वर्ग की छत्रछाया में ज्ञान-विज्ञान की प्रगति हुई. व्यापार के विकास से नए-नए शहर बसे. इन शेरोन में व्यापार के सिलसिले में अनेक देशों के व्यापारी आते थे. उनके बीच विचारों का आदान-प्रदान होता था. विचारों के आदान-प्रदान से जनसाधारण का बौद्धिक विकास हुआ.

2. पूरब से संपर्क

जिस समय यूरोप के निवासी बौद्धिक दृष्टि से पिछड़े हुए थे, अरब वाले एक नयी सभ्यता-संस्कृति को जन्म दे चुके थे. अरबों का साम्राज्य स्पेन और उत्तरी अफ्रीका तक फैला हुआ था. वे अपने साम्राज्य-विस्तार के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान को भी फैला रखे थे. अरबों से सम्पर्क के कारण पश्चिम वालों को भी लाभ हुआ.

3. मध्यकालीन पंडितपंथ की परम्परा

अरबों से प्राप्त ज्ञान को आधार मानकर यूरोप के विद्वानों ने अरस्तू के अध्ययन पर जोर दिया. उन्होंने पंडितपंथ परम्परा चलाई. इसमें प्राचीनता तथा प्रामाणिकतावाद की प्रधानता थी. प्राचीन साहित्य को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया. विभिन्न भाषाओं में प्राचीन साहित्य का अनुवाद किया गया. इस विचार-पद्धति में अरस्तू के दर्शन की प्रधानता थी.

4. कागज़ तथा मुद्रण कला का आविष्कार

पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) को आगे बढ़ाने में कागज़ और मुद्रणकला का योगदान महत्त्वपूर्ण था. कागज़ और मुद्रणकला के आविष्कार से पुस्तकों की छपाई बड़े पैमाने पर होने लगी. अब साधारण व्यक्ति भी सस्ती दर पर पुस्तकें खरीदकर पढ़ सकता था. पुस्तकें जनसाधारण की भाषा में लिखी जाती थी जिससे ज्ञान-विज्ञान का लाभ साधारण लोगों तक पहुँचने लगा. लोग विभिन्न विचारकों और दार्शनिकों के कृतित्व से अवगत होने लगे. उनमें बौद्धिक जागरूकता आई.

5. मंगोल साम्राज्य का सांस्कृतिक महत्त्व

मंगोल सम्राट कुबलाई खाँ का दरबार पूरब और पश्चिम के विद्वानों का मिलन-स्थल था. उसका दरबार देश-विदेश के विद्वानों, धर्मप्रचारकों और व्यापारियों से भरा रहता था. इन विद्वानों के बीच पारस्परिक विचार-विनमय से ज्ञान-विज्ञान की प्रगति में सहायता मिली. यूरोप के यात्रियों ने गनपाउडर, कागज़ और जहाजी कम्पास की निर्माण-विधि सीखकर अपने देश में इनके प्रयोग का प्रयत्न किया. इस प्रकार मंगोल साम्राज्य ने पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) को आगे बढ़ाने में वाहन का काम किया.

6. कुस्तुनतुनिया का पतन

1453 ई. में उस्मानी तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया. कुस्तुनतुनिया ज्ञान-विज्ञान का केंद्र था. तुर्कों की विजय के बाद कुस्तुनतुनिया के विद्वान् भागकर यूरोप के देशों में शरण लिए. उन्होंने लोगों का ध्यान प्राचीन साहित्य और ज्ञान की ओर आकृष्ट किया. इससे लोगों में प्राचीन ज्ञान के प्रति श्रद्धा के साथ-साथ नवीन जिज्ञासा उत्पन्न हुई. यही जिज्ञासा पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) की आत्मा थी. कुस्तुनतुनिया के पतन का एक और महत्त्वपूर्ण प्रभाव हुआ. यूरोप और पूर्वी देशों के बीच व्यापार का स्थल मार्ग बंद हो गया. अब जलमार्ग से पूर्वी देशों में पहुँचने का प्रयास होने लगा. इसी कर्म में कोलंबस, वास्कोडिगामा और मैगलन ने अनेक देशों का पता लगाया.

7. प्राचीन साहित्य की खोज

तेरहवीं तथा चौदहवीं शताब्दी में विद्वानों ने प्राचीन साहित्य को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया. इनमें पेट्रार्क (Petrarch), दांते (Dante Alighieri), और बेकन के नाम उल्लेखनीय है. विद्वानों ने प्राचीन ग्रन्थों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया और लोगों को गूढ़ विषयों से परिचित कराने का प्रयास किया.

8. मानववादी विचारधारा का प्रभाव

यूरोप की मध्यकालीन सभ्यता कत्रिमता और कोरे आदर्श पर आधारित थी. सांसारिक जीवन को मिथ्या बतलाया जाता था. यूरोप के विश्वविद्यालयों में यूनानी दर्शन का अध्ययन-अध्यापन होता था. रोजर बेकन (Roger Bacon) ने अरस्तू की प्रधानता का विरोध किया और तर्कवाद के सिद्धांत (the principle of rationalism) का प्रतिपादन किया. इससे मानववाद का विकास हुआ. मानववादियों ने चर्च और पादरियों के कट्टरपण की आलोचना की.

9. धर्मयुद्ध का प्रभाव 

लगभग दो सौ वर्षों तक पूरब और पश्चिम के बीच धर्मयुद्ध चला. धर्मयुद्ध के योद्धा पूर्वी सभ्यता से प्रभावित हुए. आगे चलकर इन्हीं योद्धाओं ने यूरोप में पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) की नींव मजबूत की.

10. सामंतवाद का ह्रास

सामंती प्रथा के कारण किसानों, व्यापारियों, कलाकारों और साधारण जनता को स्वतंत्र चिंतन का अवसर नहीं मिलता था. सामंती युद्धों के कारण वातावरण हमेशा विषाक्त रहता था. किन्तु सामंती प्रथा के पतन से जन-जीवन संतुलित हो गया. शान्ति तथा व्यवस्था कायम हुई. शांतिपूर्ण वातावरण में लोग साहित्य, कला एवं व्यापार की प्रगति की और ध्यान देने लगे. शान्तिपूर्ण वातावरण में लोग साहित्य, कला और व्यापार की प्रगति की ओर ध्यान देने लगे. सामंतवाद का ह्रास का महत्त्वपूर्ण परिणाम राष्ट्रीय राज्यों का विकास था. लोगों में राष्ट्रीय भावना का जन्म हुआ.                                                 

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...