एन्जाइम प्रॉब्लम

एन्जाइना रोग में रोगी के सीने के बाईं ओर दर्द उठता है। यह दर्द बाद में सीने से हाथों और हथेलियों तक पहुंच जाता है। अक्सर यह रोग 40 साल की उम्र से ज्यादा के व्यक्तियों को होता है।

कारण-

एन्जाइना रोग ज्यादा शारीरिक-मानसिक श्रम, भय, घबराहट, अधिक सर्दी लगने अथवा जरूरत से अधिक भोजन करने के कारण हो जाता है। ज्यादा धूम्रपान करने से या उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर) रोग के कारण भी एन्जाइमा का रोग हो सकता है।

लक्षण-

एन्जाइना रोग के होने से पहले रोगी में छाती में जकड़न, सांस लेने में परेशानी और बैचेनी जैसे लक्षण प्रकट होते हैं और उसके बाद दर्द शुरू हो जाता है। रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसे दिल का दौरा पड़ने वाला है।

चिकित्सा-

एन्जाइना रोग में रोगी को सबसे पहले धूम्रपान करना बंद कर देना चाहिए। रोगी को अपने रक्तचाप को भी सामान्य करने की कोशिश करनी चाहिए। रोगी को अपने भोजन पर खासतौर से ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही उसे हृदय से सम्बंधित सभी प्रतिबिम्ब केन्द्रों पर प्रेशर देना चाहिए।।                      

अल्सर

पेप्टिक अल्सर

परिचय-

शरीर में पाये जाने वाले पाचनतन्त्र में होने वाले घाव को अल्सर कहते हैं। इस रोग में रोगी के आमाशय तथा आंत दोनों में अल्सर हो जाता है। वैसे यह रोग अधिकतर अधेड़ उम्र के पुरुषों तथा स्त्रियों में होता है। जब आमाशय या आंत के किसी भाग की सतह में पाचक रसों के प्रतिरोध की क्षमता खो जाती है तो इस प्रकार का रोग हो जाता है।

कारण-

        आमाशय तथा आंत का अल्सर कई कारणों से हो सकता है जैसे- अधिक मात्रा में शराब का सेवन या धूम्रपान करने आदि से। यह रोग उन व्यक्तियों को भी हो सकता है जो अनियमित रूप से भोजन का सेवन करते हैं। इस कारण से होने वाले रोगों को पेप्टिक अल्सर कह सकते हैं। इनके अलावा यह रोग कई सारी दवाईयों के साइड इफेक्ट से भी हो सकता है।

लक्षण-

        इस रोग के कारण व्यक्ति के पेट के ऊपरी भाग या बाईं पसलियों के नीचे की ओर जलन युक्त दर्द होता है। कई बार यह दर्द खाना खाने के बाद शुरू हो जाता है। लेकिन कई बार खाना खाने से यह दर्द कम भी हो जाता है। वैसे यह दर्द लम्बे समय तक रुक-रुककर भी होता रहता है। इस रोग से पीड़ित कुछ व्यक्तियों को जी-मिचलाने की भी शिकायत हो सकती है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार-

          देखा जाए तो यह रोग कुछ महीने के अन्दर ही ठीक हो सकता है लेकिन कभी-कभी इस तरह के रोग को ठीक होने में वर्षों भी लग जाते हैं। यह रोग कई वर्षों तक बना रहता है। कुछ अल्सर रोग में रोगी को उल्टी या मल के साथ खून आना शुरू हो जाता है। यह रोग आगे चलकर कैंसर का रूप भी धारण कर सकता है। इसलिए इन रोगों का सही तरीके से इलाज करना चाहिए। पेप्टिक अल्सर रोग का उपचार एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा भी किया जा सकत हैं।

                         अल्सर रोग का उपचार किया जा सकता है। रोगी को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में कराना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से पेप्टिक अल्सर से पीड़ित रोगी का उपचार कर सकता है। जब रोगी को पेट में इस रोग के कारण दर्द हो रहा हो तो रोगी को अधिक से अधिक आराम करना चाहिए तथा सदैव पौष्टिक भोजन ही करना चाहिए।



जोबना का कैंसर ( स्तन)

   

स्तन कैंसर

परिचय-

स्तन कैंसर स्त्रियों का एक बहुत ही ज्यादा कष्टदायक रोग होता है। इस रोग के कारण स्त्री के स्तनों में बहुत तेज दर्द होता है तथा स्तनों से पीब निकलने लगती है।

लक्षण-

        इस रोग के हो जाने पर स्तन सख्त तथा अनियमित आकार की गांठ के रूप में हो जाते हैं जिन्हें छूने पर बहुत तेज दर्द होने लगता है। इस प्रकार की गांठ स्तनों के किसी भी भाग में उभर आती है। जब इस रोग की शुरुआत होती है तो ये गांठ इधर-उधर सरकती भी रहती हैं।

        जब स्तनों में होने वाली गांठ बड़ी हो जाती है तो यह अपने ऊपर की त्वचा को अन्दर की ओर खींच लेती है जिसके कारण स्तन के अन्दर की ओर एक गड्ढा जैसा बन जाता है। यह गड्ढा दूध का संचार करने वाली नलिकाओं को प्रभावित करता है जिसके कारण यह सिकुड़ जाती हैं और निपल पिचक जाते हैं। जैसे-जैसे गांठ बड़ी होती जाती है वैसे-वैसे ही स्तन की ऊपर की त्वचा से भी चिपक जाती है जिसके कारण स्तन की त्वचा में जलन होने लगती है। कुछ दिनों में इस गांठ के अन्दर पीब बनने लगती है। जब स्त्री के निप्पलों को दबाते हैं तो उसमें से पीब के समान दूध निकलने लगता है। यह गांठ बढ़ते-बढ़ते स्त्रियों के बगलों में पाई जाने वाली लसीका ग्रन्थियों तक भी फैल सकती है। जब इस रोग की शुरुआत होती है तो उस समय इसका उपचार करना बहुत जरूरी हो जाता है यदि इस रोग को बढ़ने से न रोका जाए तो यह रोग पूरे शरीर को प्रभावित कर सकता है।

कारण-

        जब स्तन में गांठ बन जाती है तो सबसे पहले यह पता लगाना चाहिए कि गांठ ज्यादा खतरनाक तो नहीं है। स्तन कैंसर होने की आशंका काफी हद तक वातावरण और जीवनशैली पर निर्भर करती है। स्त्रियों को यह रोग भोजन की एलर्जी के कारण भी हो सकता है। इस रोग के होने में आनुवंशिकता भी एक मुख्य भूमिका अदा करती है। यह रोग एक स्त्री से दूसरी स्त्री को भी हो सकता है। स्त्रियों के स्तन में कैंसर रोग के लिए गर्भनिरोधक गोलियों और जीवन परिवर्तन लक्षणों के उपचार के लिए दी जाने वाली HRT को जिम्मेदार माना जाता है। कोई स्त्री जितनी जल्दी मां बन जाती है उसको स्तन कैंसर होने की आशंका लगभग उतनी ही कम होती है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा स्त्रियों के स्तन कैंसर का उपचार-

        जब किसी स्त्री के स्तन में गांठ सी बनी हुई दिखाई देती है तो तुरंत ही जांच करानी चाहिए कि यह गांठ ज्यादा खतरनाक तो नहीं है। यदि गांठ ज्यादा खतरनाक हो तो भी इसका इलाज किया जा सकता है। यह रोग एक बार ठीक होकर दुबारा भी हो सकता है इसलिए इस रोग का इलाज सही तरीके से कराना चाहिए। स्तन कैंसर का उपचार कराने के लिए सबसे पहले स्त्रियों को अपने स्तनों की जांच करानी चाहिए।

        स्त्रियों के स्तनों की जांच जब माहवारी आये, उसके बाद करनी चाहिए। यह जांच हर महीने तथा एक विशेष समय में करनी चाहिए। यदि स्त्रियों को अपने स्तन में भारीपन महसूस होता हो तो चिन्ता न करें। स्त्रियों को यह पता लगाना चाहिए कि उसके दोनों स्तन एक ही समान है। यदि जांच कराते दौरान स्त्री को लगे कि उसका एक स्तन भारी है तो स्त्री को दूसरे स्तनों पर भी हाथ फेरकर देखना चाहिए कि कहीं दूसरा स्तन भी तो भारी नहीं है। यदि दोनों स्तनों में कुछ असमानता नजर आती है तो घबराएं नहीं। स्तन कैंसर के रोगी को डॉक्टर से उचित सलाह लेनी चाहिए और बिल्कुल लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए क्योंकि यह रोग बढ़कर अधिक खतरनाक बन सकता है।

स्तनों की निम्नलिखित तरीकों द्वारा जांच की जा सकती है-

        स्त्रियों को अपनी स्तनों की जांच करने के लिए सबसे पहले आईने के सामने खड़े हो जाना चाहिए और अपने दोनों हाथों को बगल में लटका लेना चाहिए और देखना चाहिए कि दोनों स्तन दिखने में असामान्य तो नहीं है, स्तनों में डिम्पल या सिकुड़न आदि तो नहीं है या फिर स्तनों की त्वचा या बनावट में कोई फर्क तो नहीं है।

        आईने के सामने खड़े होकर स्त्रियों को अपने हाथ सिर के ऊपर रख लेने चाहिए और अपने आप को अलग-अलग कोणों में देखना चाहिए कि स्तनों में कोई विशेष परिवर्तन तो नहीं हो गया है तथा फिर दायें-बायें घूमकर देखना चाहिए और पता लगाना चाहिए कि दोनों स्तनों से कोई स्राव तो नहीं हो रहा है।

        स्तनों की जांच करते दौरान यह पता लगाना चाहिए कि निप्पल के चारों ओर के क्षेत्र में कहीं गांठ तो नहीं है।

        आईने के सामने खड़े होकर अपने हाथ को ऊपर-नीचे करके देखना चाहिए कि स्तन का कोई भाग सूज तो नहीं रहा है।

        स्त्रियों को पलंग पर लेटकर एक तकिया सिर के नीचे रख लेना चाहिए। फिर एक तकिया बाएं कंधे के नीचे रख लेना चाहिए। इसके बाद अपने बाएं हाथ को सिर के नीचे की ओर रख लेना चाहिए और दाहिने हाथ से बाएं स्तन को दबाकर जांच करनी चाहिए कि कहीं उनमें गांठ या सूजन तो नहीं है।

        स्त्रियों को अपने बगल में हाथ फिराकर गांठे पकड़ने की कोशिश करनी चाहिए। फिर यही क्रिया दोनों स्तनों पर करनी चाहिए। इस क्रिया में बाएं हाथ का प्रयोग करना चाहिए।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा-



(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)

        चित्र में दिए गए एक्यूप्रेशर बिन्दु के अनुसार रोगी के शरीर पर दबाव देकर स्त्रियों के स्तन कैंसर का उपचार किया जा सकता है। रोगी स्त्री को अपना इलाज किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की देख-रेख में करना चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही दबाव देने का अनुभव होता है और वह सही तरीके से स्त्रियों के स्तन कैंसर का उपचार कर सकता है।

        जब स्त्रियों के स्तन में गांठ बन जाती है तो स्त्रियों के स्तन के निप्पल के आस-पास सीबेशस ग्रन्थि अर्थात दुग्ध नलिका में द्रव्य के समान थैली बन जाती है। इस थैली को स्तन की गांठ कहते हैं। जब स्त्रियों की सीबेशस ग्रन्थि में जाने वाली कोई वाहिका अवरूद्ध हो जाती है तो उनके स्तन में गांठ सी बन जाती है। इन गांठों के कारण स्तन में थक्का या उभार हो जाता है।

उपचार-

        अगर किसी स्त्री के स्तन में गांठ बन जाती है तो उसको तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए और डॉक्टर की उचित सलाह के अनुसार अपना उपचार कराना चाहिए। हो सकता है कि कभी स्तन के अन्दर से सुईयों के द्वारा थैली के अन्दर के अवरूद्ध द्रव्य को बाहर खींचने की जरूरत पड़ जाए। ऐसा करने से यह पता चल जाता है कि गांठ ज्यादा हानिकारक तो नहीं है।

(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)

        चित्रों के अनुसार एक्यूप्रेशर बिन्दु पर दबाव देने से स्तन की गांठ जल्दी ठीक हो जाती है। स्त्रियों को अपने स्तन की गांठ का उपचार करने के लिए किसी अच्छे एक्यूप्रेशर चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सक को सही तरह से दबाव देने का अनुभव होता है और वह इस रोग का उपचार सही तरीके से कर सकता है।

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बंगाल की लड़ाई

बक्सर की लड़ाई

बक्सर का युद्ध बंगाल के नवाब मीर कासिम,अवध के नवाब सुजाउद्दौला व मुग़ल शासक शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना और अंग्रेजों के मध्य लड़ा गया था | यही वह निर्णायक युद्ध था जिसने अंग्रेजों को अगले दो सौ वर्षों के लिए भारत के शासक के रूप में स्थापित कर दिया| यह युद्ध अंग्रेजों द्वारा फरमान और दस्तक के दुरुपयोग और उनकी विस्तारवादी व्यापारिक आकांक्षाओं का परिणाम था|

22 अक्टूबर,1764 ई.   को लड़े गए बक्सर के युद्ध में संयुक्त भारतीय सेना की पराजय हुई| बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई |1765 ई. में सुजाउद्दौला और शाह आलम ने इलाहाबाद में कंपनी गवर्नर क्लाइव के साथ संधि पर हस्ताक्षर किये| इस संधि के तहत,कंपनी को बंगाल,बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार प्रदान कर दिए गए, जिसने कंपनी को इन क्षेत्रों से राजस्व वसूली के लिए अधिकृत कर दिया|कंपनी ने अवध के नवाब से कड़ा और इलाहाबाद के क्षेत्र लेकर मुग़ल शासक को सौंप दिए,जोकि अब इलाहाबाद में अंग्रेजी सेना के संरक्षण में रहने लगा था|कंपनी ने मुगल शासक को प्रतिवर्ष 26 लाख रुपये के भुगतान का वादा किया लेकिन थोड़े समय बाद ही कंपनी द्वारा इसे बंद कर दिया गया|कंपनी ने नवाब को किसी भी आक्रमण के विरुद्ध सैन्य सहायता प्रदान करने का वादा किया लेकिन इसके लिए नवाब को भुगतान करना होगा|अतः अवध का नवाब कंपनी पर निर्भर हो गया| इसी बीच मीर जाफर को दोबारा बंगाल का नवाब बना दिया गया| उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र को नवाब की गद्दी पर बैठाया गया| कंपनी के अफसरों ने नवाब से धन ऐंठ कर व्यक्तिगत रूप से काफी लाभ कमाया|

युद्ध के लिए जिम्मेदार घटनाएँ

  • ब्रिटिशों द्वारा दस्तक और फरमान का दुरुपयोग,जिसने मीर कासिम के प्राधिकार और प्रभुसत्ता को चुनौती दी
  • ब्रिटिशों के आतंरिक व्यापार पर सभी तरह के शुल्कों की समाप्ति
  • कंपनी के कर्मचारियों का दुर्व्यवहार : उन्होंने भारतीय दस्तकारों, किसानोंऔर व्यापारियों को अपना माल सस्ते में बेचने के लिए बाध्य किया और रिश्वत व उपहार लेने की परंपरा की भी शुरुआत कर दी|
  • ब्रिटिशों का लुटेरों जैसा व्यवहार जिसने न केवल व्यापार के नियमों का उल्लंघन किया बल्कि नवाब के प्राधिकार को भी चुनौती दी|

निष्कर्ष

बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई | ब्रिटिशों की रूचि तीन तटीय क्षेत्रों कलकत्ता ,बम्बई और मद्रास में अधिक थी| अंग्रेजों व फ्र

यूरोप का पुनर्जागरण

      

यूरोप का पुनर्जागरण - Renaissance in Europe

पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) का शाब्दिक अर्थ होता है, 'फिर से जागना”. चौदहवीं और सोलहवीं शताब्दी के बीच यूरोप में जो सांस्कृतिक प्रगति हुई उसे ही 'पुनर्जागरण” कहा जाता है. इसके फलस्वरूप जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नवीन चेतना आई. यह आन्दोलन केवल पुराने ज्ञान के उद्धार तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इस युग में कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन प्रयोग हुए. नए अनुसंधान हुए और ज्ञान-प्राप्ति के नए-नए तरीके खोज निकाले गए. इसने परलोकवाद और धर्मवाद के स्थान पर मानववाद को प्रतिष्ठित किया. पुनर्जागरण वह आन्दोलन था जिसके द्वारा पश्चिम के राष्ट्र मध्ययुग से निकलकर आधुनिक युग के विचार और जीवन-शैली अपनाने लगे. यूरोप के निवासियों ने भौगोलिक, व्यापारिक, सामजिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्रों में प्रगति की. इस युग में लोगों ने मध्यकालीन संकीर्णता छोड़कर स्वयं को नयी खोजों, नवीनतम विचारों तथा सामजिक, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक उन्नति से सुसज्जित किया. प्रत्येक क्षेत्र में सर्वथा नवीन दृष्टिकोण, आदर्श और आशा का संचार हुआ. साहित्य, कला, दर्शन, विज्ञान, वाणिज्य-व्यवसाय, समाज और राजनीति पर से धर्म का प्रभाव समाप्त हो गया. इस प्रकार पुनर्जागरण उस बौद्धिक आन्दोलन का नाम है जिसने रोम और यूनान की प्राचीन सभ्यता-संस्कृति का पुनरुद्धार कर नयी चेतना को जन्म दिया.

यूरोप में पुनर्जागरण के कारण (Causes of Renaissance in Europe)

1. व्यापार तथा नगरों का विकास 

पुनर्जागरण का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण वाणिज्य-व्यापार का विकास था. नए-नए देशों के साथ लोगों का व्यापारिक सम्बन्ध कायम हुआ और उन्हें वहाँ की सभ्यता-संस्कृति को जानने का अवसर मिला. व्यापार के विकास ने एक नए व्यापारी वर्ग को जन्म दिया. व्यापारी वर्ग का कटु आलोचक और कट्टर विरोधी था. व्यापारी वर्ग ने चिंतकों, विचारकों, साहित्यकारों और वैज्ञानिकों को प्रश्रय दिया. इस प्रकार व्यापारी वर्ग की छत्रछाया में ज्ञान-विज्ञान की प्रगति हुई. व्यापार के विकास से नए-नए शहर बसे. इन शेरोन में व्यापार के सिलसिले में अनेक देशों के व्यापारी आते थे. उनके बीच विचारों का आदान-प्रदान होता था. विचारों के आदान-प्रदान से जनसाधारण का बौद्धिक विकास हुआ.

2. पूरब से संपर्क

जिस समय यूरोप के निवासी बौद्धिक दृष्टि से पिछड़े हुए थे, अरब वाले एक नयी सभ्यता-संस्कृति को जन्म दे चुके थे. अरबों का साम्राज्य स्पेन और उत्तरी अफ्रीका तक फैला हुआ था. वे अपने साम्राज्य-विस्तार के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान को भी फैला रखे थे. अरबों से सम्पर्क के कारण पश्चिम वालों को भी लाभ हुआ.

3. मध्यकालीन पंडितपंथ की परम्परा

अरबों से प्राप्त ज्ञान को आधार मानकर यूरोप के विद्वानों ने अरस्तू के अध्ययन पर जोर दिया. उन्होंने पंडितपंथ परम्परा चलाई. इसमें प्राचीनता तथा प्रामाणिकतावाद की प्रधानता थी. प्राचीन साहित्य को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया. विभिन्न भाषाओं में प्राचीन साहित्य का अनुवाद किया गया. इस विचार-पद्धति में अरस्तू के दर्शन की प्रधानता थी.

4. कागज़ तथा मुद्रण कला का आविष्कार

पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) को आगे बढ़ाने में कागज़ और मुद्रणकला का योगदान महत्त्वपूर्ण था. कागज़ और मुद्रणकला के आविष्कार से पुस्तकों की छपाई बड़े पैमाने पर होने लगी. अब साधारण व्यक्ति भी सस्ती दर पर पुस्तकें खरीदकर पढ़ सकता था. पुस्तकें जनसाधारण की भाषा में लिखी जाती थी जिससे ज्ञान-विज्ञान का लाभ साधारण लोगों तक पहुँचने लगा. लोग विभिन्न विचारकों और दार्शनिकों के कृतित्व से अवगत होने लगे. उनमें बौद्धिक जागरूकता आई.

5. मंगोल साम्राज्य का सांस्कृतिक महत्त्व

मंगोल सम्राट कुबलाई खाँ का दरबार पूरब और पश्चिम के विद्वानों का मिलन-स्थल था. उसका दरबार देश-विदेश के विद्वानों, धर्मप्रचारकों और व्यापारियों से भरा रहता था. इन विद्वानों के बीच पारस्परिक विचार-विनमय से ज्ञान-विज्ञान की प्रगति में सहायता मिली. यूरोप के यात्रियों ने गनपाउडर, कागज़ और जहाजी कम्पास की निर्माण-विधि सीखकर अपने देश में इनके प्रयोग का प्रयत्न किया. इस प्रकार मंगोल साम्राज्य ने पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) को आगे बढ़ाने में वाहन का काम किया.

6. कुस्तुनतुनिया का पतन

1453 ई. में उस्मानी तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया. कुस्तुनतुनिया ज्ञान-विज्ञान का केंद्र था. तुर्कों की विजय के बाद कुस्तुनतुनिया के विद्वान् भागकर यूरोप के देशों में शरण लिए. उन्होंने लोगों का ध्यान प्राचीन साहित्य और ज्ञान की ओर आकृष्ट किया. इससे लोगों में प्राचीन ज्ञान के प्रति श्रद्धा के साथ-साथ नवीन जिज्ञासा उत्पन्न हुई. यही जिज्ञासा पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) की आत्मा थी. कुस्तुनतुनिया के पतन का एक और महत्त्वपूर्ण प्रभाव हुआ. यूरोप और पूर्वी देशों के बीच व्यापार का स्थल मार्ग बंद हो गया. अब जलमार्ग से पूर्वी देशों में पहुँचने का प्रयास होने लगा. इसी कर्म में कोलंबस, वास्कोडिगामा और मैगलन ने अनेक देशों का पता लगाया.

7. प्राचीन साहित्य की खोज

तेरहवीं तथा चौदहवीं शताब्दी में विद्वानों ने प्राचीन साहित्य को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया. इनमें पेट्रार्क (Petrarch), दांते (Dante Alighieri), और बेकन के नाम उल्लेखनीय है. विद्वानों ने प्राचीन ग्रन्थों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया और लोगों को गूढ़ विषयों से परिचित कराने का प्रयास किया.

8. मानववादी विचारधारा का प्रभाव

यूरोप की मध्यकालीन सभ्यता कत्रिमता और कोरे आदर्श पर आधारित थी. सांसारिक जीवन को मिथ्या बतलाया जाता था. यूरोप के विश्वविद्यालयों में यूनानी दर्शन का अध्ययन-अध्यापन होता था. रोजर बेकन (Roger Bacon) ने अरस्तू की प्रधानता का विरोध किया और तर्कवाद के सिद्धांत (the principle of rationalism) का प्रतिपादन किया. इससे मानववाद का विकास हुआ. मानववादियों ने चर्च और पादरियों के कट्टरपण की आलोचना की.

9. धर्मयुद्ध का प्रभाव 

लगभग दो सौ वर्षों तक पूरब और पश्चिम के बीच धर्मयुद्ध चला. धर्मयुद्ध के योद्धा पूर्वी सभ्यता से प्रभावित हुए. आगे चलकर इन्हीं योद्धाओं ने यूरोप में पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) की नींव मजबूत की.

10. सामंतवाद का ह्रास

सामंती प्रथा के कारण किसानों, व्यापारियों, कलाकारों और साधारण जनता को स्वतंत्र चिंतन का अवसर नहीं मिलता था. सामंती युद्धों के कारण वातावरण हमेशा विषाक्त रहता था. किन्तु सामंती प्रथा के पतन से जन-जीवन संतुलित हो गया. शान्ति तथा व्यवस्था कायम हुई. शांतिपूर्ण वातावरण में लोग साहित्य, कला एवं व्यापार की प्रगति की और ध्यान देने लगे. शान्तिपूर्ण वातावरण में लोग साहित्य, कला और व्यापार की प्रगति की ओर ध्यान देने लगे. सामंतवाद का ह्रास का महत्त्वपूर्ण परिणाम राष्ट्रीय राज्यों का विकास था. लोगों में राष्ट्रीय भावना का जन्म हुआ.                                                 

boston tee party ( बोस्टन की चाय पार्टी)

बोस्टन की चाय-पार्टी की घटना क्या थी?

ब्रिटिश संसद ने चाय के व्यापार के सम्बन्ध में नया कानून बनाया था. इस कानून के अनुसार ईस्ट इंडिया कंपनी को अमेरिका में चाय भेजने की अनुमति दी गई थी. चाय के व्यापार को बढ़ाने के लिए मूल्य में कमी की गई थी. फलस्वरूप अमेरिकनों को सस्ती चाय मिल जाती थी और ईस्ट इंडिया कंपनी को भी आर्थिक लाभ हो जाता था. लेकिन अमेरिकन उपनिवेशवासियों ने इसे ब्रिटिश सरकार की चाल समझा. उन्होंने सोचा कि यदि संसंद व्यापारिक मामलों पर एकाधिकार कायम कर लेगी तो इससे उपनिवेश के व्यापार को हानि होगी. ईस्ट इंडिया कंपनी के कुछ जहाज बोस्टन बंदरगाह में ठहरे हुए थे. बोस्टन के नागरिकों ने जहाज़ों को लूट लिया और लगभग 342 चाय के बक्सों को समुद्र में फेंक दिया. इसे ही 'बोस्टन की चाय-पार्टी दुर्घटना (Boston tea-party incident)” कहा जाता है.

बोस्टन की चाय-पार्टी घटना के परिणाम

इस घटना से इंग्लैंड में उत्तेजना फैली. ब्रिटिश संसद ने दमन की नीति का समर्थन किया और मेसाचुसेट्स एक्ट (Massachusetts Act) पास किया. इस कानून के द्वारा ब्रिटिश सैनिक कमांडर को अमेरिकन प्रान्तों का राज्यपाल बनाया गया. सभी प्रकार के वाणिज्य के लिए बोस्टन का बंदरगाह बंद कर दिया गया. क्यूबेक एक्ट (Quebec Act) के अनुसार कनाडा की सीमा ओहायो नदी तक बढ़ा दी गई. रोमन कैथलिकों को विशेष सुविधा दी गई. कैथलिक चर्च की प्रधानता कायम होने से प्यूरिटनों को कष्ट हुआ और वे अंसतुष्ट हुए.

ब्रिटिश सरकार की दमन-नीति का प्रतिकूल प्रभाव उपनिवेशों पर पड़ा. वे आपस में संगठित हो गए. 5 सितम्बर, 1774 ई. को फिलेडेलफिया में पहली कांग्रेस की बैठक हुई. उपनिवेशवासियों ने अपने अधिकारों का एक घोषणापत्र तैयार किया. ब्रिटिश संसद द्वारा पारीय कानूनों को समाप्त करने की माँग की गई. ब्रिटेन के साथ आयात-निर्यात बंद करने का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ. लॉर्ड नॉर्थ ने उपनिवेशों के साथ समझौता का प्रस्ताव रखा लेकिन लॉर्ड नॉर्थ का प्रस्ताव देर से आया तबतक युद्ध की घोषणा हो चुकी थी. इसे ही अमेरिका का स्वातंत्र्य-संग्राम का जाता है.

मदन मोहन मालवीय

मदन मोहन मालवीय (1861-1946 ई.) - Biography in Hindi

मदन मोहन मालवीय Biography

पंडित मदन मोहन मालवीय जा जन्म एक ब्राह्मण परिवार में 1861 ई. में प्रयाग (इलाहाबाद) में हुआ था. उनके सात भाई-बहन थे. 1884 ई. में स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद पंडित मदन मोहन मालवीय कानून के छात्र बने और 1886 ई. में कानून की परीक्षा पास करने के बाद कांग्रेस के संपर्क में आये. उन्हें महामना की उपाधि दी गई थी.

कांग्रेस से संपर्क

पंडित मदन मोहन मालवीय आजीवन कांग्रेस के सदस्य बने रहे. कांग्रेस की नीति के प्रति समय-समय पर मालवीय जी (Madan Mohan Malaviya) ने विरोध प्रकट किया पर कांग्रेस को कभी छोड़ने का प्रयास नहीं किया. मालवीयजी केन्द्रीय विधानसभा के सदस्य भी निर्वाचित हुए. 1929 ई. में कांग्रेस के सभी सदस्यों ने अपना त्यागपत्र दे दिया, परन्तु मालवीयजी ने सदस्यता का त्याग नहीं किया था. इसका कारण यह था कि वे कांग्रेस के टिकट पर चुनाव नहीं लादे थे. परन्तु 1930 ई. में जब देश की राजनीतिक परिस्थति बदल गई तो मालवीयजी ने विधान सभा की सदस्यता छोड़ दी. असहयोग और सविनय अवज्ञा आन्दोलन के पक्ष में नहीं रहते हुए भी मालवीयजी ने सरकारी आज्ञाओं और कानूनों को तोड़ने में साहस दिखाया था.

प्रखर नेता

मदन मोहन मालवीय 1902 ई. में ही उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य निर्वाचित हुए थे. बजट, उत्पाद कर और अन्य सरकारी विधेयकों पर उन्होंने महत्त्वपूर्ण भाषण दिया था. 1910 ई. से 1920 ई. तक मालवीयजी केन्द्रीय विधानसभा के सदस्य रहे. मालवीयजी ने केन्द्रीय विधान सभा में गोखले द्वारा प्रस्तावित प्राथमिक शिक्षा विधेयक (Elementary Education Bill) का समर्थन किया था. उन्होंने 1919 ई. में रौलेट एक्ट का विरोध किया. 1924 ई. में स्वतंत्र कांग्रेसी के रूप में उनका निर्वाचन केन्द्रीय विधान सभा में हुआ और वे विधान सभा के प्रधान बने. 1931 ई. में द्वितीय गोलमेज सम्मलेन में भाग लेने के लिए वे लन्दन गए थे. गोलमेज सम्मेलन की असफलता के बाद 1932 ई. में इलाहबाद में राष्ट्रीय एकता सम्मलेन हुआ. इस सम्मलेन की अध्यक्षता पंडित मदनमोहन मालवीय ने की थी. 1934 ई. में एम.एस.अणे के साथ मिलकर मालवीयजी ने मैकडोनाल्ड के साम्प्रदायिक पंचाट (Macdonald Communal Award) का विरोध किया था.

मदन मोहन मालवीय भारत के आर्थिक विकास में दिलचस्पी रखते थे. उनके प्रयास से 1905 ई. में भारतीय औद्योगिक सम्मलेन का आयोजन बनारस में किया गया था. 1907 ई. में उत्तर प्रदेश औद्योगिक सम्मलेन का आयोजन इलाहाबाद में मालवीयजी के प्रयत्न से ही हुआ था.

हिंदू धर्म से जुड़ाव

मालवीय जी (Madan Mohan Malaviya) की अटूट आस्था हिंदू धर्म में थी. गीता के कर्म सिद्धांत में उनकी आस्था थी. धर्म का ह्रास होने पर ईश्वर का अवतार होता है और वह विश्व के कष्ट को दूर कर देता है - गीता के इस सिद्धांत का वे प्रतिपादन करते थे. मालवीय हिंदू धर्म की श्रेष्ठता में विश्वास रखते थे. उन्होंने सनातन धर्म महासभा की स्थापना की थी. परन्तु मालवीय कट्टर साम्प्रदायिकता के विरोधी थे. मुसलामानों को अधिकार दिलाने की मांग का वह समर्थन करते थे. यही कारण था कि मुसलमान भी मालवीय जी (Madan Mohan Malaviya) की प्रशंसा करते थे. गांधी की तरह मालवीय भी हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे.

मदन मोहन मालवीय स्वतंत्रता और संवैधानिक शासन का समर्थन करते थे. वे भारतियों के अधिकाधिक सहयोग से सरकार का सञ्चालन करना चाहते थे. मालवीय जी स्वदेशी आन्दोलन और आत्म-निर्णय के अधिकार का समर्थन करते थे. 1918 ई. में कांग्रेस के अध्यक्ष पद से मालवीय जी ने आत्म-निर्णय के अधिकार का जोरदार ढंग से समर्थन किया था. मालवीय जी आतंकवाद या क्रांतिकारी आन्दोलन के पक्ष में नहीं थे. भारत के आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए राष्ट्रीय शिक्षा पर मालवीय जी अधिक बल देते थे.

राष्ट्रवादी रहते हुए भी मालवीय जी हिंदू धर्म का उत्थान चाहते थे. मदन मोहन मालवीय हिंदू महासभा के दो बार अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे. हिंदुओं के हित को किसी अन्य सम्प्रदाय के नाम पर कुर्बान करने के लिए मालवीयजी तैयार नहीं थे. साम्प्रदायिक पंचाट का उन्होंने विरोध इसी आधार पर किया था. अगस्त आन्दोलन में इ मालवीय जी (Madan Mohan Malaviya) तोड़-फोड़ के विरोधी इ. वे अगस्त आन्दोलन में जेल नहीं गए थे. मदन मोहन मालवीय चंदा वसूलने में बड़े प्रवीण माने जाते थे. कस्तूरबा ट्रस्ट के लिए उन्होंने एक करोड़ रूपया इकठ्ठा कर लिया था.

भारत रत्न

प्रारम्भ में मदन मोहन मालवीय ब्रिटिश सरकार के समर्थक थे. आगे चलकर वे सरकार की नीति के कटु आलोचक बन गए. मालवीय जी ने 4 फरवरी, 1918 ई. को बनारस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी. हिंदू विश्वविद्यालय में सनातन धर्म को प्रधानता दी जाती थी. वे गो-रक्षा के काम में भी दिलचस्पी रखते थे. हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में मालवीयजी का योगदान विशेष महत्त्वपूर्ण माना जाता है. उत्तर प्रदेश में हिंदी का प्रचार करने में मालवीय जी की भूमिका बहुत प्रसंशनीय थी. पत्रकारिता (journalism) में भी मालवीय जी का झुकाव था. हिन्दुस्तान, इंडियन यूनियन, अभ्युदय जैसे पत्रों (newspapers) का उन्होंने संपादन किया था. मालवीय जी (Madan Mohan Malaviya) हरिजनों का कल्याण चाहते थे. संक्षेप में, राष्ट्रसेवा, समाज-सुधार, धर्म की रक्षा में उन्होंने अपना सारा जीवन न्योछावर कर दिया था. त्याग में वे महात्मा गांधी के सामान थे. उनकी मृत्यु 1946 ई. में हुई. भारत सरकार ने हाल ही में 25 दिसम्बर 2014 को उन्हें भारत रत्न से विभूषित किया.

ईसाई समुदाय का 1st world वॉर 1914

प्रथम विश्वयुद्ध - First World War [1914-18]

प्रथम विश्वयुद्ध की भूमिका (Background of First World War)

1914-18 ई. का प्रथम विश्वयुद्ध (First World War) साम्राज्यवादी राष्ट्रों की पारस्परिक प्रतिस्पर्द्धा का परिणाम था. प्रथम विश्वयुद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण गुप्त संधि प्रणाली थी. यूरोप में गुप्त संधि की प्रथा जर्मन चांसलर बिस्मार्क ने शुरू की थी. इसने यूरोप  को दो विरोधी गुटों में विभाजित कर दिया. दो गुटों के बीच एक-दूसरे के प्रति संदेह और घृणा का भाव बढ़ता गया. राजनीतिक वातावरण दूषित हो गया. 1879 ई. में जर्मनी ने ऑस्ट्रिया-हंगरी (Austria-Hungary) के साथ गुप्त संधि की. 1882 ई. में इटली भी इस गुट में शामिल हो गया. इस प्रकार त्रिगुट का निर्माण हुआ. 1887 ई. में जर्मनी और रूस दोनों मिल गए. विश्व राजनैतिक अखाड़े में फ्रांस अकेला पड़ गया. फ्रांस को अपमानित करने के लिए ही जर्मनी ने इन देशों के साथ संधि की थी. फ्रांस प्रतिशोध की आग में अन्दर ही अन्दर जल रहा था. इसलिए 1894 ई. में फ्रांस ने रूस से संधि की. उधर इंग्लैंड ने 1902 ई. में जापान के साथ, 1904 ई. में फ्रांस और 1907 ई. में रूस के साथ संधि कर ली.  इस प्रकार दो राजनीतिक खेमों में बँटा यूरोप युद्ध का अखाड़ा हो गया.

एक ओर इंग्लैंड, फ्रांस, रूस और जापान का त्रिगुट था और दूसरा गुट जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी, इटली और तुर्की का था. दोनों के बीच हथियारबंदी की होड़ चल रही थी.

1912-13 ई. के बाल्कन युद्धों (War in the Balkans) ने तो प्रथम विश्वयुद्ध को अनिवार्य बना दिया. यूरोप के अनेक राष्ट्र बाल्कन क्षेत्र में अपने साम्राज्य के विस्तार का प्रयास कर रहे थे. ऑस्ट्रिया और रूस भी इसी क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहते थे. बाल्कन क्षेत्र में साम्राज्यवादी प्रतिद्वंदिता ने विश्वयुद्ध की भूमिका तैयार की.

गुप्त संधियों के अलावे प्रथम विश्व युद्ध के अनेक कारण गिनाये जा सकते हैं -

Causes of World War I

1. उग्र राष्ट्रीयता (Furious Nationality)

उग्र राष्ट्रीयता के कारण भी प्रथम विश्वयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई थी. बड़े एवं शक्तिशाली राष्ट्रों के अतिरिक्त यूनान और सर्बिया जैसे छोटे-छोटे देशों पर भी उग्र राष्ट्रीयता का नशा चढ़ा हुआ था. वे वृहत्तर यूनान, वृहत्तर बुल्गेरिया और वृहत्तर सर्बिया की मांग कर रहे थे. चेक, स्लाव जातियाँ अपनी राष्ट्रीय आकांक्षा को पूरा करने के लिए यूरोप में अशांति उत्पन्न कर रही थीं. जब यूरोप के साम्राज्यवादी राष्ट्र अपनी सभ्यता-संस्कृति और धर्म का पाठ पढ़ाने के लिए संसार में आगे बढ़े तो उनमें संघर्ष अनिवार्य हो गया.

2. आर्थिक प्रतिद्वंदिता (Economic Rivalry)

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप यूरोप के राष्ट्रों के आर्थिक जीवन में महान् परिवर्तन हुआ. पूंजीवाद की उत्पत्ति हुई. पूँजीवादी अतिरिक्त पूँजी लगाने के लिए उपनिवेश की माँग करने लगे. बढ़ती हुई जनसंख्या को बसाने के लिए भी उपनिवेश की आवाश्यकता थी. इस समस्या का समाधान साम्राज्य-विस्तार से ही संभव था. इसलिए उपनिवेश को लेकर ही संघर्ष प्रारम्भ हुआ. पूँजीवादी राष्ट्रों के बीच आर्थिक महत्त्वाकांक्षा के कारण घृणा और अविश्वास का वातावरण तैयार हो गया.

3. साम्राज्यवादी होड़ (Imperialist Competition)

साम्राज्यवादी होड़ प्रथम विश्वयुद्ध का एक आधारभूत कारण था. औद्योगिक क्रान्ति के कारण यूरोपीय देशों के सामने व्यावसायिक माल की खपत और कल-कारखानों को चलाने के लिए कच्चे माल की प्राप्ति की समस्या उत्पन्न हुई. इस समस्या का समाधान साम्राज्य-विस्तार में दिखाई दिया. इसलिए इंग्लैंड, फ्रांस, हॉलैंड, बेल्जियम, पुर्तगाल, डेनमार्क, इटली अपना साम्राज्य बढ़ाने का प्रयत्न करने लगे. इससे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विता बढ़ी. अफ्रीका और चीन इस प्रतिद्वंद्विता का शिकार पहले हुए. सूडान को लेकर इंग्लैंड और फ्रांस के बीच युद्ध छिड़ते-छिड़ते बचा.

4. सैन्यवाद और शस्त्रीकरण (Militarism and Armament)

उग्र राष्ट्रीयता और साम्राज्यवादी मनोवृत्ति ने यूरोप के राष्ट्रों का ध्यान सैन्यवाद और शस्त्रीकरण की ओर खींचा. फ्रांस, जर्मनी आदि साम्राज्यवादी राष्ट्र अपनी आमदनी का 85% सैनिक तैयारी पर खर्च करने लगे. भय तथा संदेह ने प्रत्येक राष्ट्र को युद्ध-सामग्री जमा करने के लिए उत्प्रेरित किया और इस तरह प्रत्येक देश युद्ध के लिए तैयार हो गया.

5. समाचारपत्रों का झूठा प्रचार (Newspapers' False Propaganda)

प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व सभी देशों के समाचारपत्र एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे थे. इससे एक-दूसरे की राष्ट्रीय भावना को ठेस लग रही थी. कभी-कभी दो राष्ट्रों के बीच विवादास्पद प्रश्न पर समाचारपत्रों में इस तरह की आलोचना की जाती थी कि जनता पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता था.

6. फ्रांस की बदले की भावना (France's Revenge Spirit)

जर्मनी का एकीकरण फ्रांस को पराजित कर के पूरा किया गया था. फ्रांस को अल्सस-लारेन का प्रदेश खोना पड़ा था. फ्रांस राष्ट्रीय अपमान को भूला नहीं था और वह जर्मनी से बदला लेना चाहता था. जर्मनी मोरक्को में फ्रांस का विरोध कर रहा था. इससे दोनों में मनमुटाव पैदा हुआ.

7. अंतर्राष्ट्रीय अराजकता (International Anarchy)

इस समय यूरोप में एक प्रकार से अंतर्राष्ट्रीय अराजकता फ़ैल चुकी थी. प्रत्येक राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा था. अपने हितों की रक्षा के लिए कोई भी देश अपने विरोधी के साथ संधि कर सकता था. स्वार्थी राष्ट्र की इस नीति ने विरोधाभास को जन्म दिया. इस परिस्थिति को रोकने के लिए कोई अंतर्राष्ट्रीय संस्था नहीं थी जिसके अभाव के कारण सभी राष्ट्र मनमानी कर रहे थे.

8. सराजेवो हत्याकांड (Sarajevo Assassination)

युद्ध का तात्कालिक कारण ऑस्ट्रिया (Austria) के राजकुमार आर्कड्यूक फ्रान्ज़ (Archduke Franz) की हत्या थी. राजकुमार की हत्या बोस्निया (Bosnia) की राजधानी सराजेवो (Sarajevo) में हुई थी. ऑस्ट्रिया की सरकार ने राजकुमार की हत्या के लिए सर्बिया को उत्तरदाई ठहराया और उसके समक्ष 12 कड़ी शर्तें रखीं. सर्बिया की सरकार ने सभी शर्तों को मानने में अपनी असमर्थता प्रकट की. सर्बिया की सरकार समस्या का समाधान महाशक्तियों के सम्मलेन द्वारा करना चाहती थी. किन्तु ऑस्ट्रिया के राजनीतिज्ञों और सैनिक पदाधिकारियों ने सर्बिया की प्रार्थना पर ध्यान नहीं दिया. ऑस्ट्रिया की सरकार ने 28 जुलाई, 1914 ई. को युद्ध की घोषणा कर अपनी सेना को सर्बिया पर आक्रमण करने का आदेश दिया. इस घटना से ही प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई. युद्ध की समाप्ति 11 नवम्बर, 1918 को हुई. 


इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति

औद्योगिक क्रांति - Industrial Revolution in Hindi

'क्रांति” शब्द से साधारणतया आकस्मिक उथल-पुथल का बोध होता है. लेकिन औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के साथ हम वैसी बात नहीं पाते हैं. साधारणतः लोहे, काँसे और दूसरी-दूसरी चीजों के उत्पादन के ढंग में आमूल परिवर्तन को 'औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution)” की संज्ञा दी जाती है. दस्तकारी के स्थान पर वैज्ञानिक अनुसंधानों के परिणामस्वरूप कारखानों का जन्म हुआ, उत्पादन में वृद्धि हुई. संक्षेप में, औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) का अभिप्राय उन परिवर्तनों से है जिन्होंने यह संभव कर दिया कि मनुष्य उत्पादन के प्राचीन तरीकों को छोड़कर बड़ी मात्रा बड़े-बड़े कारखानों में वस्तुओं का उत्पादन कर सके. इतिहासकार रायकर ने औद्योगिक क्रान्ति को परिभाषित करते हुए कहा है कि - 'दस्तकारी के स्थान पर वास्पयंत्रों द्वारा चालित उत्पादन और यातायात की प्रक्रियाओं में सामान्य रूप से परिवर्तन लाना ही औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) थी.”

1760 ई. से लेकर 1840 ई. तक Europe में अकस्मात् औद्योगिक प्रक्रिया में नई-नई चीजें हुईं, जिन्हें कुल मिलाकर औद्योगिक क्रांति का नाम दिया गया. वस्तुतः यह प्रक्रिया आज तक चल रही है परन्तु उस समय के कालखंड में औद्योगिक उत्पादन की प्रक्रिया में जो बदलाव आये थे वे अत्यंत आकस्मिक और अभूतपूर्व थे. इस संदर्भ में 1760 ई. का महत्त्व यह है कि उसी वर्ष cast iron blowing cylinder का सर्वप्रथम प्रयोग हुआ था. 1840 ई. के बाद यूरोप में रेलवे का विस्तार हुआ इसलिए इसके बाद औद्योगिक उत्पादन में अभूतपूर्व प्रगति हुई. अतः इस दौर को द्वितीय औद्योगिक क्रान्ति  का नाम दिया गया.

औद्योगिक क्रांति

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के प्रारम्भ होने के पहले घरेलू उद्योग-धंधों का बोलबाला था. शिल्पकार, कारीगर, दस्तकार अपने घरों के सुन्दर-सुन्दर वस्तुएँ तैयार करते थे. औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप उत्पादन के तरीकों में आमूल परिवर्तन हुआ. मानवीय श्रम के स्थान पर यंत्रो का प्रोयग शुरू हुआ. नयी-नयी मशीनें बनीं. इस प्रकार दस्तकारी के स्थान पर वैज्ञानिक अनुसंधानों के फलस्वरूप जब कारखानों का जन्म  हुआ और उत्पादन में वृद्धि हुई तो इसे ही 'औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution)” की संज्ञा दी गई. संक्षेप में, औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) का अभिप्राय उन परिवर्तनों से हैं जिन्होंने यह संभव कर दिया कि मनुष्य उत्पादन के प्राचीन तरीकों को छोड़कर बड़ी मात्रा में बड़े-बड़े कारखानों में वस्तुओं का उत्पादन कर सके.

कारण

इंगलैंड में औद्योगिक क्रान्ति की नींव पहले से ही तैयार की जा रही थी. इंगलैंड का व्यवसायी वर्ग अन्य देशों के व्यवसायी वर्ग की अपेक्षा अधिक कुशल और साहसी था. व्यापार की उन्नति के लिए उनमें अधिक  लगन और स्वाभाविक प्रेरणा थी. इंगलैंड का व्यवसायिक वर्ग सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त था. इंगलैंड की सरकार भी व्यापारियों के कार्यों में सहायता देती थी. परिस्थिति की सुगमता के अतिरिक्त सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थतियों के कारण भी औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) सर्वप्रथम इंगलैंड में हुई. इन कारणों का विवरण कुछ इस प्रकार है -

इंग्लैंड की आंतरिक स्थिति

1688 ई. की क्रांति के फलस्वरूप इंग्लैंड संसदीय शासन-पद्धति की स्थापना हुई. जनसाधारण के अधिकार सुरक्षित हो चुके थे. राजनीतिक और धार्मिक अत्याचार से मुक्ति पाकर लोग आर्थिक विकास की ओर अग्रसर हुए. गृहयुद्ध और बाह्य आक्रमण की कोई आशंका नहीं थी. आंतरिक शान्ति और सुदृढ़ता व्यापार की प्रगति में सहायक हुई. लेकिन अन्य दूसरे-दूसरे देश राजनीतिक उलझनों में ही फँसे थे.

मध्यम वर्ग का उदय

सतरहवीं सदी में व्यापारिक क्रांति के कारण मध्यम वर्ग की शक्ति बढ़ी. किन्तु अब भी सामंती प्रतिबंधों के कारण मध्यम वर्ग के वाणिज्य-व्यापार और उद्योग-धंधों की प्रगति नहीं हो रही थी. 1740 ई. में इंगलैंड में मध्यम वर्ग ने क्रांति की. क्रांति के फलस्वरूप एक नयी व्यवस्था कायम हुई. नयी व्यवस्था में पुराने सामंती प्रतिबंधों छुटकारा मिलने और उद्योगपतियों के हाथ में शक्ति आ जाने के कारण इंग्लैंड में उद्योग-धंधों की काफी प्रगति हुई. चूँकि इंगलैंड में मध्यम वर्ग के हाथ में राजनीतिक सत्ता फ्रांस और अमेरिका से पहले आई थी, इसलिए औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) का प्रारम्भ भी पहले-पहल इंगलैंड में हुआ.

पूँजी की अधिकता

इंगलैंड का व्यापार पूर्वी और पश्चिमी द्वीप समूहों से होता था. इससे इंगलैंड को अधिक मुनाफा प्राप्त होता था. देश में पूँजीवादी व्यस्था दिन-प्रतिदिन जोर पकड़ती जा रही थी. बची हुई पूँजी का उपयोग लोग उत्पादन बढ़ाने में करने लगे. उत्पादन बढ़ने से औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) को प्रोत्साहन मिला. बैंक-प्रणाली के विकास से भी धन इकठ्ठा करने में मदद मिली.

वस्तुओं की बढ़ती हुई माँग

अठारहवीं शताब्दी के युद्ध के परिणाम भी औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) की प्रगति में सहायक सिद्ध हुए. इंगलैंड पेशेवर सिपाहियों के लिए युद्ध-सामग्री तैयार करता था. सामानों की बढ़ती हुई माँग ने उत्पादन के तरीके और साधन में परिवर्तन को आवश्यक बना दिया था. ऐसी परिस्थिति पैदा हो गयी थी कि लोगों को बड़े पैमानों पर वस्तुओं के उत्पादन में अपनी बुद्धि लगानी पड़ी.

कृषि-क्रांति का प्रभाव

इंगलैंड में सर्प्र्थम औद्योगिक क्रांति होने का एक प्रमुख कारण यह था कि वहाँ सर्वप्रथम कृषि-प्रणाली में परिवर्तन हुआ. खेती के एक तरीके अपनाए गए और उत्पादन में वृद्धि हुई. लोगों की आर्थिक स्थिति में परिवर्तन आया, उनकी आवश्यकताएँ बढीं और आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए उद्योग-धंधों का विकास किया गया. उत्पादन बढ़ने से शहरों की बढ़ती हुई आबादी को खिलाना संभव हो सका. कृषि-क्रान्ति का एक परिणाम यह भी हुआ कि खेती में लगे किसान बेकार हो गए. वे जीविका की खोज में शहर गए. इससे श्रमशक्ति के अभाव की पूर्ति हुई. अब कारखाना में तैयार वस्तुओं के लिए देश में ही बाजार मिल गया.

कुशल कारीगर

सतरहवीं शताब्दी में धर्मयुद्ध के कारण अन्य देशों से अधिक संख्या में कुशल कारीगर इंगलैंड आये थे. उन्होंने अपनी कला-कौशल का प्रदर्शन इंगलैंड में किया. इससे इंगलैंड के मजदूरों के ज्ञान में वृद्धि हुई. खेती के तरीके में परिवर्तन हुआ और उद्योग-धंधों का विकास हुआ. इस प्रकार उद्योग-धंधों के विकास में कुशल कारीगरों ने बहुत मदद पहुँचाई.

कच्चे माल की सुविधा

18वीं शताब्दी के मध्य तक इंगलैंड का औपनिवेशिक साम्राज्य पूर्वी कनाडा, उत्तरी अमेरिका, फ्लोरिडा, भारत, पश्चिमी द्वीप समूह, पश्चिमी अफ्रीका, जिब्राल्टर तक फ़ैल चुका था. इन स्थानों से इंगलैंड को पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल मिल जाता था. साथ ही निर्मित वस्तुओं की खपत के लिए बाजार भी मिल जाता था. उपनिवेश से धन भी मिल जाता था. इस प्रकार औपनिवेशिक साम्राज्य की वृद्धि से इंगलैंड को औद्योगिक प्रगति में काफी सहायता मिली. क्योंकि औद्योगिक विकास के प्रमुख साधन - पूँजी, श्रम, कच्चा माल और बाजार उपनिवेशों में मिल जाते थे.

जनसंख्या में वृद्धि

जनसंख्या में वृद्धि औद्योगिक क्रान्ति का एक प्रमुख कारण था. बच्चों की सुरक्षा और गरीबों की सहायता की व्यवस्था की गई थी. अब लोग आसानी से भुखमरी और रोक का शिकार नहीं हो सकते थे. जनसंख्या बढ़ने से उद्योग के विकास के लिए श्रम की पूर्ति हुई.

वनिक संघ का पतन

वनिक संघ के पतन के फलस्वरूप भी औद्योगिक क्रांति कामयाबी हासिल कर सकी. वनिक संघ के अन्दर लोगों को संघ के नियमानुसार काम करना पड़ता था. लेकिन वणिक संघ के टूट जाने से लोग अपने पसंद का काम करने लगे. तरह-तरह के व्यापार का उदय हुआ. इससे भी औद्योगिक क्रांति को बल मिला.

 

परिणाम

आर्थिक परिणाम

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप लोगों के आर्थिक जीवन में परविर्तन आया. एक ओर बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना हुई तो दूसरी ओर घरेलू उद्योग-धंधों का विनाश हुआ. इस बुरा प्रभाव दस्तकारों पर पड़ा. अमीरी-गरीबी साथ-साथ बढ़ी. इंग्लैंड की राष्ट्रीय संपत्ति में वृद्धि हुई. अंतर्देशीय व्यापार के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भी वृद्धि हुई. इंग्लैंड का व्यापार एशिया, अफ्रीका और अमेरिका से होता था. इससे उसे आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ. देहात के बेकार मजदूर और दस्तकार शहर में काम करने लगे. इससे शहरों की जनसंख्या बढ़ी और साथ-साथ आर्थिक-सामजिक समस्याएँ भी उत्पन्न हुईं.

सामाजिक परिणाम

पौष्टिक आहार और दावा-दारु के उचित प्रबंध के कारण जनसंख्या में वृद्धि हुई. दूसरी ओर कारखाना प्रणाली का बुरा प्रभाव मजदूरों के स्वास्थ्य पर पड़ा. मजदूरों को उचित मजदूरी नहीं दी जाती थी. कम मजदूरी के कारण उन्हें अच्छा भोजन नहीं मिलता था. औद्योगिक क्रान्ति ने सामजिक विषमता को जन्म दिया. पूँजी कुछ ही लोगों के हाथों में जमा हो गई. पूँजीपति मुनाफा कमाने में लगे रहते थे और वे मजदूरों की सुविधा का ख्याल नहीं करते थे. धनी दिन-प्रतिदिन धनी होते जा रहे थे और गरीबों की गरीबी बढ़ती जा रही थी. आर्थिक विषमता ने सामजिक विषमता को जन्म दिया. समाज में भ्रष्टाचार और व्यभिचार जैसी सामजिक बुराइयाँ बढीं. इससे लोगों का जीवन कष्टमय हो गया.

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फ़्रांस की क्रांति

यूरोप का पुनर्जागरण

इंग्लैंड की गौरवपूर्ण क्रांति

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप कई लोगों के जीवन-स्तर में परिवर्तन आया. जीवन में शान-शौकत और विलासता बढ़ी. चीजों का उत्पादन पर्याप्त मात्र में होने लगा. अब साधारण व्यक्ति भी वैसी चीजों का प्रयोग करने लगा जिनका प्रयोग कभी सिर्फ अमीर वर्ग तक सीमित था. औद्योगिक वर्ग ने माध्यम वर्ग को जन्म दिया. इस वर्ग के लोगों के पास पूँजी थी. किन्तु उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं था. वे अपने अधिकार के लिए संघर्ष करने लगे. इससे सामजिक समस्या उत्पन्न हुई. समस्या को सुलझाने के लिए औद्योगिक देशों की सरकार ने कुछ कानून बनाए. मध्यम वर्ग को सामजिक समानता मिली. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में मजदूरों का शोषण होता था. उन्हें अधिक देर तक काम करना पड़ता था लेकिन मजदूरी कम मिलती थी. परिणामस्वरूप मजदूर संघ का जन्म हुआ.

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इंग्लैंड की गौरवशाली क्राँति

इंग्लैंड की गौरवपूर्ण क्रांति -Glorious Revolution 1688 in Hindi

जेम्स द्वितीय 1685 ई. में इंग्लैंड का राजा बना. उसे बहुत सुरक्षित सिंहासन प्राप्त हुआ था. परिस्थिति राजतंत्र के पक्ष में थी. विरोधी दल कुचला जा चूका था. राज्य के प्रति निर्विरोध आज्ञाकारिता का सिद्धांत स्वीकृत हो चूका था. संसद के अधिकांश सदस्य राजा के दैवी अधिकार सिद्धांत के समर्थक थे. जेम्स द्वितीय ने स्वयं ही परिस्थिति को विपरीत बना दिया और उसे अंततोगत्वा गद्दी छोड़कर भागना पड़ा. 1688 ई. में हुए इंग्लैंड की क्रांति को 'गौरवपूर्ण क्रांति (Glorious Revolution)” भी कहा जाता है.

इंग्लैंड की क्रांति संक्षेप में

1688 ई. की क्रांति जेम्स द्वितीय के शासनकाल में हुई थी. क्रांति के लिए जेम्स द्वितीय ने खुद वातावरण तैयार किया था. उसके कार्यों से सभी दल के लोग असंतुष्ट थे. उन्हें विश्वास हो गया था कि राजा स्वेच्छाचारी शासन की पुनरावृत्ति करना चाहता है. जेम्स द्वितीय रोमन  कैथोलिक चर्च की शक्ति को बढ़ाना चाहता था. वह कैथलिकों को राज्य के महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करना चाहता था. वह किसी भी कानून को स्थगित अथवा रद्द करने के अधिकार द्वारा अपनी सत्ता को सर्वोपरि बनाना चाहता था. वह टेस्ट एक्ट को समाप्त करना चाहता था और इसलिए उसने न्यायालय में अपने समर्थक न्यायाधीशों को ही रहने दिया. वह स्थाई सेना की सहायता से विरोधियों पर नियंत्रण रखना चाहता था. इंग्लैंड की जनता जेम्स द्वितीय के क्रूर शासन को इसलिए बर्दास्त कर रही थी कि उसकी मृत्यु के बाद इंग्लैंड में कैथोलिक शासन का अंत होगा. लेकिन जून, 1688 ई में जेम्स द्वितीय की दूसरी कैथोलिक पत्नी से एक पुत्र उत्पन्न हुआ. पुत्र के जन्म ने इंग्लैंड की क्रांति को अवश्यम्भावी बना दिया. लोगों को विश्वास हो गया कि जेम्स द्वितीय की नीति अनंत काल तक चलती रहेगी. इस आशंका से लोग भयभीत हो गए. वे क्रांति द्वारा कैथोलिक शासन के अंत का प्रयास करने लगे. प्रतिकूल परिस्थिति के कारण जेम्स द्वितीय ने गद्दी छोड़ दिया. विलियम तृतीय और मेरी को इंग्लैंड का सम्राट और साम्राज्ञी घोषित किया गया. 'अधिकारों का घोषणापत्र” तैयार किया गया. जेम्स द्वितीय के सभी कार्यों को अवैध घोषित किया गया. प्रजा तथा संसद के अधिकारों की पुष्टि की गई.

1688 ई. की क्रांति के कारण

1688 ई. के इंग्लैंड की क्रांति के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे -

जेम्स द्वितीय की धार्मिक नीति

जेम्स द्वितीय कट्टर कैथोलिक था. कैथोलिक धर्म के सिधान्तों में उसकी गहरी आस्था थी. वह कैथोलिकों को राज्य के प्रमुख पदों पर नियुक्त करना चाहता था. इस पक्षपात को देखते हुए प्रोटेस्टेंट लोगों ने जेम्स के कार्यों का विरोध करना शुरू कर दिया. विरोधियों का दमन करने के लिए जेम्स द्वितीय ने अनेक कठोर कदम उठाये. हाई कमीशन नामक न्यायालय की स्थापना की गई. कैथोलिक धर्म की आलोचना अथवा निंदा करने का अधिकार किसी को नहीं था. विरोध की परवाह न करते हुए जेम्स द्वितीय ने कैथोलिक धर्म का प्रचार जारी रखा.

फ्रांस के साथ मैत्री सम्बन्ध

जेम्स द्वितीय का विश्वास था कि आवश्यकता पड़ने पर फ़्रांस का राजा लुई चौदहवाँ उसे सेना और धन से सहायता देगा. इस कारण उसने फ्रांस के साथ मैत्री सम्बन्ध बनाए रखना का पूर्ण रूप से प्रयास किया. उसने रोमन कैथोलिकों की सुविधाएँ प्रदान की और प्रोटेस्टेंट धर्म के अनुयायियों पर घोर अत्याचार किया. इंग्लैंड की प्रोटेस्टेंट जनता इस प्रकार के अत्याचार को सहन नहीं कर सकी. उसने जेम्स द्वितीय का विरोध करना शुरू कर दिया.

टेस्ट एक्ट के प्रति उदासीनाता

टेस्ट एक्ट के अनुसार केवल अंग्रेजी चर्च के अनुयायियों को ही राज्य कर्मचारी के रूप में नियुक्त किया जा सकता था. इस नियम के कारण कैथोलिकों की नियुक्ति नहीं की जा सकती थी. इसलिए जेम्स द्वितीय ने टेस्ट एक्ट को रद्द करने का प्रयास किया लेकिन संसद ने ऐसा करने की अनुमति नहीं दी. इससे असंतुष्ट होकर जेम्स द्वितीय ने संसद को ही स्थगित कर दिया.

निलंबन और विमोचन के अधिकार का प्रयोग

जेम्स द्वितीय का कहना था कि आवश्यकता होने पर राजा किसी भी नियम को स्थगित अथवा रद्द कर सकता है. इस अधिकार का प्रयोग करके उसने कैथोलिकों के विरुद्ध बने सभी कानूनों को रद्द कर दिया. इंग्लैंड की जनता ने राजा का विरोध किया.

विश्वविद्यालय में हस्तक्षेप 

जेम्स द्वितीय ने विश्वविद्यालय के कार्यों में भी हस्तक्षेप किया. विश्वविद्यालय में बड़े-बड़े पदों पर कैथोलिकों की नियुक्ति की गई. कैंब्रिज विश्वविद्यालय के उप-कुलपति को पदच्युत कर दिया गया था क्योंकि उसने एक कैथोलिक को डिग्री देने से इनकार कर दिया था. ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में भी कैथोलिक धर्म का प्रचार की व्यवस्था की गई. क्रिस्ट चर्च के अध्यक्ष के पद पर एक कट्टर रोमन कैथोलिक को नियुक्त किया गया. विश्वविद्यालय के कार्यों में हस्तक्षेप से भी इंग्लैंड की जनता असंतुष्ट थी.

धार्मिक न्यायालय की स्थापना

1686 ई. में जेम्स द्वितीय ने धार्मिक न्यायालय की स्थापना की. इस न्यायालय का मुख्य उद्देश्य पादरियों को राजा की इच्छानुसार कार्य करने के लिए बाध्य करना था. धार्मिक न्यायालय द्वारा कैथोलिक धर्म के विरोधियों को क्रूर सजा दी जाती थी.

स्थायी सेना में वृद्धि

जेम्स द्वितीय को सुरक्षित सिंहासन प्राप्त हुआ था. उस समय न तो आंतरिक विरोध की संभावना थी और न विदेशी आक्रमण का भय था. फिर भी जेम्स द्वितीय स्थायी सेना में वृद्धि करना चाहता था. सैनिकों में अधिकांश कैथोलिक थे. इससे लोगों का आतंकित होना स्वाभाविक था. उन्हें विश्वास हो गया था कि जेम्स द्वितीय स्थायी सेना की सहायता से स्वेच्छाचारी शासन की स्थापना करेगा और कैथोलिक धर्म का प्रचार-प्रसार करेगा.

स्कॉटलैंड और आयरलैंड के प्रति नीति 

`जेम्स द्वितीय के स्वेच्छाचारी शासन का प्रभाव स्कॉटलैंड और आयरलैंड पर भी पड़ा था. उसने वहाँ भी ऊँचे-ऊँचे पदों पर कैथोलिकों की नियुक्ति की. आयरलैंड के प्रोटोस्टेंट भयभीत हो गए. स्कॉटलैंड में रोमन कैथोलिकों को पूरी धार्मिक स्वतंत्रता दी गई. इससे लोगों में असंतोष बढ़ा जिसके कारण आगे चलकर क्रांति संभव हो सकी.

चुनाव में हस्तक्षेप

जेम्स द्वितीय चुनाव में भी हस्तक्षेप करने लगा था. वह संसद के सदस्यों को नामजद (nominate) भी करने लगा था. वह अपने समर्थकों की संख्या संसद में बढ़ाना चाहता था. इससे संसद के सदस्य असंतुष्ट थे.

सात पादरियों का मुकदमा 

जेम्स द्वितीय ने 1688 ई. में दूसरी घोषणा प्रकाशित की. उसने राज्य के प्रत्येक चर्च में इसे लगातार दो रविवारों को पढ़ने का आदेश दिया था. राजा की घोषणा की संसद की स्वीकृति प्राप्त नहीं थी. इसलिए राजा के आदेश को स्वीकार करना राजा की निरंकुशता को स्वीकार करना था. कैंटरबरी के आर्कविशप और छ: अन्य विशपों ने राजा के सामने एक आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर आदेश को वापस लेने की माँग  की. जेम्स द्वितीय ने इनपर राजद्रोह का अभियोग लगाकर मुकदमा चलवाया. लेकिन न्यायालय ने विशपों को निर्दोष घोषित किया. इससे लोगों ने आनंद और उत्साह की लहर दौड़ गई.

पुत्र का जन्म

जैसा हमने ऊपर भी लिखा है कि जेम्स द्वितीय ने अपनी कैथोलिक पत्नी से एक पुत्र को को जन्म दिया. इससे लोगों को लगने लगा कि यह कैथोलिक हमेशा उनपर भविष्य में भी हावी ही रहेंगे. उन्हें विश्वास हो गया कि बच्चे का लालन-पालन कैथोलिक वातावरण में होगा और उसे कैथोलिक शिक्षा दी जाएगी. इस प्रकार जेम्स द्वितीय की मृत्यु के बाद कैथोलिक शासन चलता रहेगा. इस आसह्नका से ही लोग भयभीत हो गए. अब वे क्रांति के द्वारा ही कैथोलिक शासन का अंत कर सकते थे.

क्रांति के परिणाम

  1. राजा की शक्ति में कमी आई.
  2. संसद के अधिकारों में वृद्धि हुई.
  3. क्रांति के बाद अनेक अधिनियम बने.
  4. धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया गया.
  5. नौ-सेना, स्थल सेना आदि के व्यय के ब्योरे और ऋण का अनुमान लगाया.
  6. न्यायालय को स्वतंत्रता मिली.
  7. फ़्रांस को पराजित कर इंग्लैंड ने एक नयी यूरोपीय नीति अपनाई.
  8. स्कॉटलैंड को क्रांति से सांविधानिक और राजनीतिक लाभ प्राप्त हुए.
  9. क्रांति का आयरलैंड पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा. आयरलैंड का ऊन का व्यापार चौपट हो गया.

1688 ई. की क्रांति इंग्लैंड के इतिहास में एक युगांतकारी घटना थी. निरंकुश राजतंत्र की परम्परा समाप्त हो गयी और राजा को वैधानिक सीमा में जकड़ दिया गया. 1689 ई . में अधिकार-विधेयक पारित हुआ. इसके अनुसार, राजा संसद की सहमति के बिना न तो किसी कानून को स्थगित कर सकता था, न किसी नए कानून को लागू कर सकता था, न नया कर लगा सकता था और न किसी व्यक्ति की सजा माफ़ कर सकता था. यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि कैथोलिक या कैथोलिक स्त्री से शादी करने वाला कोई भी व्यक्ति इंग्लैंड की गद्दी का अधिकारी नहीं होगा. निरंकुश राजतंत्र की जगह नियमानुमोदित शासन की स्थापना हुई. संसद की शक्ति बढ़ी. वह राजसत्ता पर नियंत्रण रखने लगी और राजकोष पर उसका एकमात्र अधिकार हो गया.

संसद ने विद्रोही-कानून पास किया गया. इससे सेना पर संसद का नियंत्रण हो गया. त्रैवार्षिक कानून पास कर हर तीसरे वर्ष पर संसद का निर्वाचन अनिवार्य कर दिया गया. सहिष्णुता-कानून पास कर सभी प्रोटेस्टेंट सम्प्रदायों को धार्मिक स्वतंत्रता दी गयी. 1701 ई. में उत्तराधिकार निर्णायक कानून बना. इसके अनुसार ये तय हुआ कि इंग्लैंड का राजा प्रोटेस्टेंट ही होगा. कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका पर संसद का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया. अब राजा की जगह संसद संप्रभु हो गया. राजा की निरंकुशता समाप्त हो गई और संसद की संप्रुभता स्थापित हुई. 

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सनातन

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