सैयद अहमद खान, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक

सर सैयद अहमद खाँ - Sir Syed Ahmed Khan

सर सैयद अहमद खाँ मुसलमानों में नवजागरण लाने के लिए और हर मुसलमान अपने अधिकारों के प्रति सचेष्ट हो, इसके लिए हमेशा प्रयासरत रहे. शुरुआती दौर में उनका प्रयास था कि मुसलमानों, विशेषतः उच्चवर्गीय मुसलमानों में अधिक से अधिक शिक्षा का प्रसार हो. उन्होंने मुसलमानों को आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा से अवगत कराया. वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर भी थे. उन्होंने खुद कहा था - 'याद रखो कि हिन्दू और मुसलमान शब्द सिर्फ और सिर्फ धार्मिक पहचान के लिए हैं - अन्यथा सभी मनुष्य चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान हों, या इसाई भी हों…वे सभी एक देश में हैं और एक देश के लिए हैं - सभी को देश की अच्छाई के लिए एकजुट होना चाहिए.

सर सैयद अहमद खाँ परिचय (Biography)

27 October, 1817 ई. में दिल्ली में जन्मे सर सैयद अहमद खां एक मुस्लिम शिक्षक, कानून और विविध भाषाओं के ज्ञानी और एक उत्कृष्ट लेखक और अनुवादक थे. मुस्लिम समुदाय आधुनिक शिक्षा के साथ जुड़े, उनके जीवन का लक्ष्य अंत तक यही रहा. आधुनिक शिक्षा से यहाँ मतलब अंग्रेजी शिक्षा से है.

उनकी कुछ  रचनाएँ (Books)

  1. Bible और Quran पर टीका-टिप्पणी
  2. आसारुस्सनादीद - दिल्ली की इमारतों पर एक शोध-पुस्तक.
  3. Abtale Ghulami (1893), Urdu (Slavery is against nature)
  4. Ahkam Ta” am al-kitab (1868)
  5. आइने अकबरी जो अबुल फजल द्वारा लिखा गया था, उसका उन्होंने पर्सियन, अरबी, संस्कृत, हिंदी, इंग्लिश भाषा में अनुवाद किया.
  6. Khutubat-i-Ahmadiya

संस्थाएँ

उन्होंने साइंटिफ़िक सोसाइटी (Scientific Society) की स्थापना की जिसके जरिये ऊर्दू और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में पत्रिकाएँ निकाली जाती थीं. 1875 ई. में उन्होंने उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना की जिसमें यूरोपीय शिक्षा-पद्धति को महत्ता दी गई. इसका पुराना नाम Mohammedan Anglo-Oriental College था.

सर सैयद अहमद खाँ के मन में परिवर्तन

दुःख की बात है कि कालांतर में सैयद अहमद के विचारों में परिवर्तन आ गया. वे रुढ़िवादी और साम्प्रदायिक बनते चले गए. उन्हें प्रजातंत्र की स्थापना पर आपत्ति थी क्योंकि उस समय उनके अनुसार देश के सभी वर्ग समान रूप से शिक्षित और प्रगतिशील नहीं थे. उनके अन्दर ये डर समाने लगा था कि प्रजातंत्र की स्थापना के बाद भारत देश दो दलों- हिन्दू और मुसलमान में बँट जायेगा जिससे अल्पसंख्यक मुसलमान कभी सत्ता में नहीं आ सकेंगे. इसलिए उनका झुकाव अंग्रेजी राज और उनके द्वारा मनोनीत प्रशासकों के प्रति हो गया. जब कांग्रेस की स्थापना हुई तो वे इसके कट्टर विरोधी के रूप में प्रकट हुए. उनका कहना था कि कांग्रेस केवल हिन्दुओं के लिए है और मुसलमानों को इससे दूरी बना कर रहना चाहिए. उन्होंने 1888 ई. में इलाहाबाद अधिवेशन के समय इस संस्था (कांग्रेस) को तोड़ने का जी-तोड़ प्रयास किया. इस प्रयास में उन्हें असफलता मिली और उसके बाद उन्होंने 'यूनाइटेड पैट्रियाटिक एसोसिएशन” (The United Patriotic Association - 1888) और 'मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल डिफेन्स एसोसिएशन (The Mohammedan Anglo-Oriental Defence Association -1893) की स्थापना की.

The United Patriotic Association द्वारा कांग्रेस और हिन्दू विरोधी प्रचार किया गया. दूसरी संस्था The Mohammedan…. ने मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों को उनके ऐतिहासिक योगदान और राजनीतिक महत्त्व के आधार पर प्रस्तुत किया. इसका मतलब ये हुआ कि वे गुलाम वंश से लेकर औरंगजेब तक के क्रूर शासन को एक उपलब्धि व योगदान के रूप में अंग्रेजों के सामने प्रस्तुत करना चाह रहे थे जिससे अभी के मुसलमानों को उनका हक़ मिले. इस संस्था ने उत्तरप्रदेश में हिन्दुओ के सामान प्रतिनिधित्व, पृथक निर्वाचन पद्धति और आरक्षण की माँग की. उन्होंने अदालतों में उर्दू की जगह हिंदी के प्रयोग पर भी आपत्ति उठाई और कहा कि इससे मुसलमानों के लिए नौकरी के अवसर घट जायेंगे. उनके द्वारा 1888 ई. में यह बयान दिया गया कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग कौम (देश) हैं जिनके स्वार्थ अलग-अलग हैं. सैयद अहमद जैसे इंसान का यह बयान आग की तरह फ़ैल गया और हिन्दू-मुस्लिम के बीच प्रत्यक्ष  रूप से दिवार दिखने लगा. वैसे कुछ मुसलमान ऐसे भी थे जिन्होंने अहमद खाँ के विरोध के बावजूद कांग्रेस से जुड़े, जैसे - एम. सयानी, बदरुद्दीन तैयब जी इत्यादि.

हिन्दू-मुस्लिम के बीच पड़ी दरार का फायदा उठाने के लिए लॉर्ड कर्जन ने बंगाल के विभाजन की योजना बनाई. इसका मुख्य उद्देश्य बंगाल में बढ़ी राष्ट्रीयता की भावना को कुचलना था. अपनी इस योजना के जरिये वह बंगाल की राष्ट्रीय एकता को नष्ट करके हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच फूट डालना चाहता था. बंगाल विभाजन के बारे में और detail में पढ़ें >> बंगाल विभाजन. हिन्दू ने बंगाल विभाजन का जोरों से विरोध किया पर मुसलमान इस विभाजन के पक्ष में थे. मुसलमान संगठित होने का प्रयास करने लगे. इसी प्रयास का परिणाम था कि 1906 ई. में 'मुस्लिम लीग” (The Muslim League) की स्थापना हुई.

सन 1855 का आदिवासी समुदाय

संथाल विद्रोह 1855 - The Santhal Rebellion in Hindi

संथाल समुदाय झारखण्ड-बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों के पर्वतीय इलाकों - मानभूम, बड़ाभूम, सिंहभूम, मिदनापुर, हजारीबाग, बाँकुड़ा क्षेत्र में रहते थे. कोलों के जैसे ही संथालों ने भी लगभग उन्हीं कारणों के चलते अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया. इस विद्रोह को भी अंग्रेजी सेना ने कुचल डाला. आइए जानते हैं इस विद्रोह के कारण और परिणाम को. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) का दमन किस तरह अंग्रेजों ने किया, इस विद्रोह का महत्त्व क्या है और इस विद्रोह में कौन संथालों के तरफ से आगे खड़ा (प्रमुख नेता) हुआ आदि इस पोस्ट के जरिए जानने की कोशिश करेंगे.

विद्रोह के कारण

संथालों का जीवन-यापन कृषि और वन संपदाओं पर निर्भर था. स्थायी बंदोबस्त (<<पढ़ें) के स्थापना के बाद संथालों के हाथ से खुद की जमीन भी निकल गयी. इसलिए उन्होंने अपना इलाका छोड़ दिया और राजमहल की पहाड़ियों में रहने लगे. यहाँ की जमीन को उन्होंने कृषि के योग्य बनाया, जंगल काटे और घर बनाया. संथालों के इस इलाके को 'दमनीकोह” के नाम से जाना गया. सरकार की नज़र दमनीकोह पर भी पड़ी और वहाँ भी लगान वसूलने के लिए आ टपके. फिर वहाँ जमींदारी स्थापित कर दी गई. अब उस इलाके में जमींदारों, महाजनों, साहूकारों और सरकारी कर्मचारियों का वर्चस्व बढ़ने लगा. बेचारे संथालों पर लगान की राशि इतनी रखी गई कि लगान के बोझ तले वे बिखर गए. दमन का तांडव ऐसा था कि महाजन द्वारा दिए गए कर्ज पर 50 से 500% तक का सूद वसूल किया जाने लगा. वे लगान चुकाने में असमर्थ हो गये. इन सब कारणों के चलते संथाल किसानों की दरिद्रता बढ़ गयी. कर्ज न चुकाने के चलते उनके खेत, मवेशी छीन लिए गए. संथालों को जमींदारों, महाजनों का गुलाम बनना पड़ा. संथालों को कहीं से भी न्याय मिलने वाला नहीं था. सरकारी कर्मचारी, पुलिस, थानेदार आदि महाजनों का ही पक्ष लेते थे. संथालों के हित के विषय में सोचना तो दूर, इनके द्वारा संथालों का धन लूटा गया, आदिवासी स्त्रियों की इज्जत लूटी गई. संथालों को इन सब से बाहर निकालने वाला कोई नहीं था. अंततः उनके जीवन की यह निराशा एक दिन सरकार पर कहर बन कर टूट पड़ी.

विद्रोह का स्वरूप और प्रमुख नेता

1855 ई. में संथालों की क्रोध की सीमा पार कर गई. संथालों को न्याय दिलाने के लिए चार भाई सामने आये. उनके नाम थे - सि द् धूका न्हूचाँ द और भैरव. इन्होंने संथालों को एकजुट किया. सि द् धू  ने खुद को देवदूत बतलाया ताकि संथाल समुदाय उसकी बातों पर विश्वास कर सके. संथालों के अन्दर धर्म भावना पैदा  करने के लिए उसने कहा कि वह भगवान् 'ठाकुर” के द्वारा भेजा गया दूत है जिन्हें वे रोज पूजते हैं. 30 जून, 1855 ई. को इन भाइयों ने सथालों की एक आमसभा बुलाई जिसमें 10,000 संथालों ने भाग लिया. इस सभा में संथालों को यह विश्वास दिलाया गया कि खुद भगवान् ठाकुर की यह इच्छा है कि जमींदारी, महाजनी और सरकारी अत्याचारों के खिलाफ संथाल सम्प्रदाय डट कर विरोध करें. अंग्रेजी शासन को समाप्त कर दिया जाए.

जुलाई 1855 ई. में सथालों ने विद्रोह का बिगुल बजाया. शुरुआत में यह आन्दोलन सरकार विरोधी आन्दोलन नहीं था पर जब संथालों ने देखा कि सरकार भी जमींदारों और महाजनों का पक्ष ले रही है तो उनका क्रोध सरकार पर भी टूट पड़ा. संथालों ने अत्याचारी दरोगा महेश लाल को मार डाला. बाजार, दुकान सब नष्ट कर दिए और थानों में आग लगा दी. कई सरकारी कार्यालयों, कर्मचारियों और महाजनों पर संथालों ने आक्रमण किया. इसके चलते कई बेक़सूर भी मारे गए. भागलपुर और राजमहल के बीच रेल, डाक, तार सेवा आदि सेवा भंग कर दी गई. संथालों ने अंग्रेजी शासन को समाप्त करने की शपथ ले ली थी. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) के आलावा हजारीबाग, बाँकुड़ा, पूर्णिया, भागलपुर, मुंगेर आदि जगहों में आग की तरह फ़ैल रही थी.

संथाल विद्रोह का दमन

ब्रिटिश सरकार संथाल की आक्रमकता देखकर अन्दर से हिल चुकी थी. सरकार ने इस इस हिंसक कार्रवाई को सख्ती से दबाने का ऐलान किया. बिहार के भागलपुर और पूर्णिया से सरकार के द्वारा घोषणापत्र जारी किया गया कि अब संथाल के विद्रोह को जल्द से जल्द कुचल दिया जाए. कलकत्ता केजार बर्रों और पूर्णिया से सेना की एक टुकड़ी संथालों का दमन करने के लिए भेजी गई.  फिर उसके बाद दमन का नग्न-नृत्य शुरू हुआ. संथाल के पास अधिक शक्ति नहीं थी और पर्याप्त शस्त्र-अस्त्र भी नहीं थे. मात्र तीर और धनुष से वे कितने दिन टिकते? फिर भी उन्होंने इस दमन का दबाव बहुत बहादुरी से दिया.

अंततः कई संथालों को गिरफ्तार कर लिया गया और 15 हज़ार से अधिक संथाल सैनिकों द्वारा मार गिराए गए. संथाल के नेता भी गिरफ्तार कर लिए गए और मारे गए. अपने नेता के गिरफ्तारी से संथालों का मनोबल टूट गया और फरवरी 1856 ई. तक संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) समाप्त कर दिया गया.

संथाल विद्रोह का महत्त्व

भले ही हजारों संथालों ने अपने हक के लिए कुर्बानी दी पर उन्होंने ये साबित कर दिया कि निरीह जनता भी दमन और अत्याचार एक हद तक बर्दास्त नहीं कर सकती. सरकार को संथाल की माँगों को बाद में पूरा करने का प्रयास किया जाने लगा. कालांतर में सरकार ने संथालपरगना को जिला बनाया. फिर भी आदिवासियों पर दमन होता ही रहा. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) की प्रेरणा लेकर आदिवासियों ने आगे भी सरकार के खिलाफ कई विद्रोह किए.

सन 1855 का संथाल विद्रोह

संथाल विद्रोह 1855 - The Santhal Rebellion in Hindi

संथाल समुदाय झारखण्ड-बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों के पर्वतीय इलाकों - मानभूम, बड़ाभूम, सिंहभूम, मिदनापुर, हजारीबाग, बाँकुड़ा क्षेत्र में रहते थे. कोलों के जैसे ही संथालों ने भी लगभग उन्हीं कारणों के चलते अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया. इस विद्रोह को भी अंग्रेजी सेना ने कुचल डाला. आइए जानते हैं इस विद्रोह के कारण और परिणाम को. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) का दमन किस तरह अंग्रेजों ने किया, इस विद्रोह का महत्त्व क्या है और इस विद्रोह में कौन संथालों के तरफ से आगे खड़ा (प्रमुख नेता) हुआ आदि इस पोस्ट के जरिए जानने की कोशिश करेंगे.

विद्रोह के कारण

संथालों का जीवन-यापन कृषि और वन संपदाओं पर निर्भर था. स्थायी बंदोबस्त (<<पढ़ें) के स्थापना के बाद संथालों के हाथ से खुद की जमीन भी निकल गयी. इसलिए उन्होंने अपना इलाका छोड़ दिया और राजमहल की पहाड़ियों में रहने लगे. यहाँ की जमीन को उन्होंने कृषि के योग्य बनाया, जंगल काटे और घर बनाया. संथालों के इस इलाके को 'दमनीकोह” के नाम से जाना गया. सरकार की नज़र दमनीकोह पर भी पड़ी और वहाँ भी लगान वसूलने के लिए आ टपके. फिर वहाँ जमींदारी स्थापित कर दी गई. अब उस इलाके में जमींदारों, महाजनों, साहूकारों और सरकारी कर्मचारियों का वर्चस्व बढ़ने लगा. बेचारे संथालों पर लगान की राशि इतनी रखी गई कि लगान के बोझ तले वे बिखर गए. दमन का तांडव ऐसा था कि महाजन द्वारा दिए गए कर्ज पर 50 से 500% तक का सूद वसूल किया जाने लगा. वे लगान चुकाने में असमर्थ हो गये. इन सब कारणों के चलते संथाल किसानों की दरिद्रता बढ़ गयी. कर्ज न चुकाने के चलते उनके खेत, मवेशी छीन लिए गए. संथालों को जमींदारों, महाजनों का गुलाम बनना पड़ा. संथालों को कहीं से भी न्याय मिलने वाला नहीं था. सरकारी कर्मचारी, पुलिस, थानेदार आदि महाजनों का ही पक्ष लेते थे. संथालों के हित के विषय में सोचना तो दूर, इनके द्वारा संथालों का धन लूटा गया, आदिवासी स्त्रियों की इज्जत लूटी गई. संथालों को इन सब से बाहर निकालने वाला कोई नहीं था. अंततः उनके जीवन की यह निराशा एक दिन सरकार पर कहर बन कर टूट पड़ी.

विद्रोह का स्वरूप और प्रमुख नेता

1855 ई. में संथालों की क्रोध की सीमा पार कर गई. संथालों को न्याय दिलाने के लिए चार भाई सामने आये. उनके नाम थे - सि द् धूका न्हूचाँ द और भैरव. इन्होंने संथालों को एकजुट किया. सि द् धू  ने खुद को देवदूत बतलाया ताकि संथाल समुदाय उसकी बातों पर विश्वास कर सके. संथालों के अन्दर धर्म भावना पैदा  करने के लिए उसने कहा कि वह भगवान् 'ठाकुर” के द्वारा भेजा गया दूत है जिन्हें वे रोज पूजते हैं. 30 जून, 1855 ई. को इन भाइयों ने सथालों की एक आमसभा बुलाई जिसमें 10,000 संथालों ने भाग लिया. इस सभा में संथालों को यह विश्वास दिलाया गया कि खुद भगवान् ठाकुर की यह इच्छा है कि जमींदारी, महाजनी और सरकारी अत्याचारों के खिलाफ संथाल सम्प्रदाय डट कर विरोध करें. अंग्रेजी शासन को समाप्त कर दिया जाए.

जुलाई 1855 ई. में सथालों ने विद्रोह का बिगुल बजाया. शुरुआत में यह आन्दोलन सरकार विरोधी आन्दोलन नहीं था पर जब संथालों ने देखा कि सरकार भी जमींदारों और महाजनों का पक्ष ले रही है तो उनका क्रोध सरकार पर भी टूट पड़ा. संथालों ने अत्याचारी दरोगा महेश लाल को मार डाला. बाजार, दुकान सब नष्ट कर दिए और थानों में आग लगा दी. कई सरकारी कार्यालयों, कर्मचारियों और महाजनों पर संथालों ने आक्रमण किया. इसके चलते कई बेक़सूर भी मारे गए. भागलपुर और राजमहल के बीच रेल, डाक, तार सेवा आदि सेवा भंग कर दी गई. संथालों ने अंग्रेजी शासन को समाप्त करने की शपथ ले ली थी. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) के आलावा हजारीबाग, बाँकुड़ा, पूर्णिया, भागलपुर, मुंगेर आदि जगहों में आग की तरह फ़ैल रही थी.

संथाल विद्रोह का दमन

ब्रिटिश सरकार संथाल की आक्रमकता देखकर अन्दर से हिल चुकी थी. सरकार ने इस इस हिंसक कार्रवाई को सख्ती से दबाने का ऐलान किया. बिहार के भागलपुर और पूर्णिया से सरकार के द्वारा घोषणापत्र जारी किया गया कि अब संथाल के विद्रोह को जल्द से जल्द कुचल दिया जाए. कलकत्ता केजार बर्रों और पूर्णिया से सेना की एक टुकड़ी संथालों का दमन करने के लिए भेजी गई.  फिर उसके बाद दमन का नग्न-नृत्य शुरू हुआ. संथाल के पास अधिक शक्ति नहीं थी और पर्याप्त शस्त्र-अस्त्र भी नहीं थे. मात्र तीर और धनुष से वे कितने दिन टिकते? फिर भी उन्होंने इस दमन का दबाव बहुत बहादुरी से दिया.

अंततः कई संथालों को गिरफ्तार कर लिया गया और 15 हज़ार से अधिक संथाल सैनिकों द्वारा मार गिराए गए. संथाल के नेता भी गिरफ्तार कर लिए गए और मारे गए. अपने नेता के गिरफ्तारी से संथालों का मनोबल टूट गया और फरवरी 1856 ई. तक संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) समाप्त कर दिया गया.

संथाल विद्रोह का महत्त्व

भले ही हजारों संथालों ने अपने हक के लिए कुर्बानी दी पर उन्होंने ये साबित कर दिया कि निरीह जनता भी दमन और अत्याचार एक हद तक बर्दास्त नहीं कर सकती. सरकार को संथाल की माँगों को बाद में पूरा करने का प्रयास किया जाने लगा. कालांतर में सरकार ने संथालपरगना को जिला बनाया. फिर भी आदिवासियों पर दमन होता ही रहा. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) की प्रेरणा लेकर आदिवासियों ने आगे भी सरकार के खिलाफ कई विद्रोह किए.

महाराष्ट्र महाराज शिवाजी

शिवाजी की विजयें और प्रमुख सफलताएँ - List of Conquests

शिवाजी ने 1645-47 ई. के मध्य जिन तीन किलों पर अधिकार किया वे पहाड़ी दुर्ग थे. कुछ समय बाद (1656 ई. में) उन्होंने जावली (Jawali) पर विजय की. यह विजय शिवाजी के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण विजय थी. इस विजय के बाद -

  1. अब उनके लिए अपने राज्य को दक्षिण-पश्चिम में फैलाना आसान हो गया.
  2. यहाँ से प्राप्त सैनिक (मालवी सैनिक) उसके सबसे पहले सच्चे साथी और सबसे बड़े स्वामिभक्त सैनिक निकले.
  3. शिवाजी को मोरों के वंश द्वारा एकत्र धन और खजाना प्राप्त हुआ जिससे शिवाजी ने अपनी वित्तीय और सैनिक समस्याओं को हल कर लिया.
  4. शिवाजी ने मालव प्रदेश पर अधिकार कर लिया.
  5. उसके बाद उन्होंने रायगढ़ में एक शक्तिशाली दुर्ग बनवाया और पुरंदर के किले जीत लिए और नए किले बनवाये. ये किले बीजापुर राज्य में पड़ते थे.

Shivaji List of Conquests

बीजापुर से संघर्ष

शिवाजी की गतिविधियों से क्रुद्ध होकर बीजापुर के शासक आदिलशाह ने शिवाजी के पिता शाहजी भोंसले को कैद कर लिया. ऐसी विकट परिस्थिति में शिवाजी ने मुग़ल सम्राट शाहजहाँ को औरंगजेब के माध्यम से (औरंगजेब उस समय दक्षिण सूबे का सूबेदार था) प्रार्थना की और उसके सहयोग से अपने पिता को कैद से मुक्त करा लिया. इसके 6 वर्ष बाद तक शिवाजी ने अपनी सैनिक गतिविधियों को बंद रखा.

अफजल खां का वध

मुग़लों के साथ संघर्ष

अफजल खां को पराजित करने के बाद शिवाजी ने बड़े जोश से मुग़ल प्रदेशों में छापे मारने प्रारम्भ कर दिए. औरंगजेब ने 1663 ई. में मुग़ल सेनापति शाइस्ता खां को शिवाजी के विरुद्ध भेजा. प्रारम्भ में उसने अनेक प्रदेश जीत लिए. इसके बाद शाइस्ता खां वर्षा ऋतु गुजारने के लिए पूना में ठहर गया. जब वह पूना में ठहरा हुआ था तो शिवाजी ने उसपर अचानक धावा बोल दिया. शिवाजी ने 15 अप्रैल, 1663 ई. की रात को अपने 400 चुने हुए सहयोगियों के साथ एक बारात के रूप में पूना में प्रवेश किया. उन्होंने शाइस्ता खां को छावनी के भीतर ही घायल कर दिया और उसके बेटे को मौत के घाट उतार दिया. मुग़ल सेना में भगदड़ मच गई. शाइस्ता खां की इस पराजय से मुग़ल दरबार में सनसनी फैल गई.

सूरत की लूट

शिवाजी ने पूना की विजय के बाद 4,000 सैनिकों के साथ मुगलों के अधीनस्थ सूरत शहर पर जोरदार हमला कर दिया. 16 से 20 जनवरी (1664 ई.) तक इस शहर को लूटा गया. शिवाजी की सेना ने करीब एक करोड़ रुपये का माल लूटा.

शिवाजी के विरुद्ध शहजादा मुअज्जम और राजा जयसिंह

औरंगजेब ने शिवाजी को मुँहतोड़ जवाब देने के लिए 1665 ई. में जयसिंह और मुअज्जम के अधीन एक विशाल सेना भेजी. इस बार की लड़ाई में मराठों के सेनापति मुरार नाडेय मारा गया. विवश होकर शिवाजी ने पुरंदर की संधि (22 जून, 1665 ई.) द्वारा शांति स्थापित की. जिसके अनुसार :-

क) शिवाजी अपने अधिकृत 35 किलों में 23 किले मुगलों को सौंप देंगे और 12 किले अपने पास रखेंगे. इन 23 किलों की आय लगान के रूप में प्रतिवर्ष 4 लाख हून थी. शिवाजी के पास जो 12 किले बचे थे, उनसे प्रतिवर्ष 1 लाख हून आय प्राप्त होती थी.

ख) शिवाजी ने 40 लाख हून 13 किश्तों में चुकाने का वादा किया. यह रकम कोंकण और बालाघाट के किलों से प्राप्त होने वाली आमदनी का एक प्रकार से अंश ही था. इन किलों पर शिवाजी के अधिकार को मान्यता दे दी थी.

ग) शिवाजी ने मुग़ल दरबार में व्यक्तिगत रूप से सेवा करने से छूट माँगी. उसके स्थान पर उसके छोटे पुत्र संभाजी को मुग़ल दरबार में 5,000 का मंसब दिया गया.

घ) शिवाजी ने मुग़ल सम्राट के प्रति निष्ठा का वचन दिया और मुगलों को दक्खन में सैनिक सहायता देने का वायदा किया. पुरंदर की सन्धि को इतिहासकार राजा जयसिंह की बड़ी विजय मानते हैं क्योंकि जयसिंह ने इस संधि के द्वारा मुगलों के लिए 23 किले और एक बहुत बड़ी रकम प्राप्त की. साथ ही साथ वह शिवाजी से यह बात मनवाने में भी सफल हुआ कि शिवाजी मुग़ल सम्राट को मिलने व्यक्तिगत रूप से मुग़ल दरबार में जायेंगे.

शिवाजी मुग़ल दरबार में बंदी और उनका वहाँ से बच निकलना

12 मई, 1666 ई. को शिवाजी अपने वायदे के अनुसार आगरा के मुग़ल दरबार में अपने पुत्र संभाजी और 350 सैनिकों के साथ उपस्थित हुआ. शिवाजी को औरंगजेब से उचित सम्मान न मिलने के चलते वे दरबार में ही क्रोधित हो उठे और मुग़ल सम्राट ने उन्हें बंदी बना लिया. परन्तु शिवाजी बड़ी चालाकी से एक टोकरे में बैठकर वहाँ से बच निकलने में सफल हो गए.

सूरत पर पुनः आक्रमण और राज्यारोहण

दक्षिण पहुँचकर शिवाजी ने अपने पुराने किले को पुनः जीत लिया. इस बार औरंगजेब ने जसवंतसिंह और शाहजादा मुअज्जम को भेजा. शिवाजी ने उन्हें पराजित किया और मुगलों से संधि कर ली. इस संधि के फलस्वरूप शीघ्र ही औरंगजेब ने शिवाजी को 'राजा” की उपाधि प्रदान की. शिवाजी को बरार की जागीर भी दे दी गई. परन्तु शिवाजी ने संधि का पालन नहीं किया और सूरत पर पुनः आक्रमण कर दिया. सूरत की दूसरी लूट में भी मराठों को बहुत-सा सोना मिला. दक्षिण में मराठों का इतना आतंक बढ़ गया कि वे मुगल प्रदेशों से चौथ और सरदेशमुखी नामक कर भी वसूल करने लगे. शिवाजी ने केवल लूटमार करके ही स्वयं को संतुष्ट नहीं किया. उनके सामने और भी महान् उद्देश्य थे. उन्होंने 15 जून, 1674 ई. में शाहूजी की मृत्यु के बाद 'छत्रपति महाराज” की उपाधि धारण की.

राज्यारोहण के बाद विजयें और मृत्यु

अपने राज्यारोहण के बाद शिवाजी केवल 6 वर्ष तक ही जीवित रह पाए. इस अवधि में उन्होंने सबसे पहले खानदेश (1675 ई.) आक्रमण किया और 1677 ई. में कर्नाटक पर चढ़ाई करके उसका अधिकांश भाग जीत लिया. शिवाजी ने अपनी मृत्यु से पहले बीजापुर के सुल्तान को मुगलों के विरुद्ध सैनिक सहयोग दिया.

सन 1821 का वहाबियों का आंदोलन

वहाबी आन्दोलन - The Wahabi Movement in Hindi

वहाबी आन्दोलन (Wahabi Movement) की शुरुआत एक इस्लामी पुनरुत्थान आन्दोलन के रूप में हुई थी. इस आन्दोलन को तरीका-ए-मुहम्मदी अथवा वल्लीउल्लाही आन्दोलन के नाम से भी जाना जाता है. यह एक देश विरोधी और सशस्त्र आन्दोलन था जो शीघ्र ही पूरे देश में फ़ैल गया. वहाबी आन्दोलन एक व्यापक आन्दोलन बन चुका था और इसकी शाखाएँ देश के कई हिस्सों में स्थापित की गयीं. इस आन्दोलन को बिहार और बंगाल के किसान वर्गों, कारीगरों और दुकानदारों का समर्थन प्राप्त हुआ. यद्यपि यह एक धार्मिक आन्दोलन था पर कालांतर में इस आन्दोलन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आवाजें उठायीं जाने लगीं. पर इसके पीछे भी एक कारण था जो हम नीचे पढेंगे. ब्रिटिश शासन की समाप्ति तो इस आन्दोलन का उद्देश्य था ही, साथ-साथ सामजिक पुनर्गठन और सामाजिक न्याय की माँग भी वहाबी आन्दोलन की मुख्य माँगे (demands) थीं.

वहाबी आन्दोलन का संस्थापक और उसके कार्य

वहाबी आन्दोलन का संस्थापक सैयद अहमद बरेलवी (1786-1831 ई.) था. यह रायबरेली (उत्तर प्रदेश) का रहने वाला था. इसका जन्म शहर के एक नामी-गिरामी परिवार में हुआ था जो पैगम्बर हजरत मुहम्मद का वंशज मानता था. यह 1821 ई. में मक्का गया और जहाँ इसे अब्दुल वहाब नामक इंसान से दोस्ती हुई. अब्दुल वहाब के विचारों से अहमद बरेलवी अत्यंत प्रभावित हुआ और एक 'कट्टर धर्मयोद्धा” के रूप में भारत वापस लौटा. अब्दुल वहाब के नाम से इस आन्दोलन का नाम वहाबी आन्दोलन रखा गया.

सैयद अहमद बरेलवी एक और इंसान से बहुत प्रभावित हुआ जिसका नाम संत शाह वल्लीउल्लाह था. यह दिल्ली में रहता था और भारत में फिर से इस्लाम का प्रभुत्व हो, इसका इच्छुक था. वे भारत से अंग्रेजों को हटाकर फिर से इस्लामिक शासन लाना चाहते थे. उनका मानना था कि भारत को 'दार-उल-हर्ष (दुश्मनों का देश)” नहीं बल्कि भारत को 'दार-उल-इस्लाम (इस्लाम का देश)” बनाना है जिसके लिए अंग्रेजों से धर्मयुद्ध करना अनिवार्य है. अंग्रेजों को किसी भी प्रकार से सहयोग देना इस्लाम-विरोधी कार्य है, ऐसा उनका मानना था. इस बात का अहमद पर काफी प्रभाव पड़ा. इसलिए अहमद को इस जिहाद (धर्मयुद्ध) का नेता चुन लिया गया. सैयद अहमद की सहायता के लिए एक परिषद् का निर्माण किया गया जिसमें सहायक के रूप में अब्दुल अजीज के दो रिश्तेदारों को नियुक्त किया गया. इसकी संस्थाएँ भारत में अनेक जगह खोली गयीं.

पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में वहाबी का प्रभाव

इमाम बनने के बाद सैयद ने पूरे उत्तर प्रदेश का दौरा कर के इस आन्दोलन का प्रचार-प्रसार किया. इसके समर्थक बढ़ते गए. शिरात-ए-मुस्तकिन नामक एक फारसी ग्रन्थ में सैयद अहमद के विचारों को संकलित किया गया. एकेश्वरवाद और हिजरत यानी दुश्मनों को भारत से भगाने का प्रण लेकर सैयद अहमद ने एक योजना बनाई. इस योजना के अंतर्गत तीन बातों पर गौर फ़रमाया गया -> i) हमारी सेना सशस्त्र हो ii) भारत के हर कोने में उचित नेता को चुनना iii) जिहाद के लिए भारत में ऐसी जहग चुनना जहाँ मुस्लिम अधिक संख्या में रहते हों ताकि वहाबी आन्दोलन (Wahabi Movement) जोर-शोर से पूरे देश में फैले.

इसके लिए पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत को चुना गया. वहाँ कबायली इलाके में सिथाना को केंद्र बनाया गया और भारत के सभी मुस्लिम बहुल नगरों में स्थानीय कार्यालय खोले गए. Bengal Presidency के लिए कलकत्ता को चुना गया और प्रतिनिधित्व खलीफाओं को सौंपी गई.

1826 ई. से यह आन्दोलन सक्रिय हुआ. अपने 3000 समर्थकों के साथ वह पेशावर गया और वहाँ एक स्वतंत्र शासन की स्थापना की. बाद में केंद्र को बदलकर सिथाना (चारसद्दा, पाकिस्तान) में स्थापित किया गया. सीमाप्रांत में शासन चलाने हेतु, अस्त्र-शस्त्र, धन, जन सीमाप्रांत पहुँचाया जाने लगा. इसके लिए बंगाल से सिथाना तक खानकाह बनाया गया जो एक गुप्त रूप से सहायता पहुँचाने का जरिया था. पश्चिमोत्तर इलाके में वहाबी आन्दोलन के समर्थकों का सिख समुदाय से संघर्ष हुआ जिसमें सैयद अहमद मारा गया.

बंगाल में वहाबी आन्दोलन

जिस समय पश्चिमोत्तर में सैयद अहमद सिखों से संघर्ष कर रहा था, उस समय बंगाल में वहाबी आन्दोलन का बहाव किसान वर्गों में जोर-शोर से हो रहा था. बंगाल में वहाबी आन्दोलन के नेता तीतू मीर थे. जमींदार द्वारा कर बढ़ाने पर वहाबी समर्थक (अधिकांशतः किसान वर्ग) इसका विरोध करते थे. जब नदिया (बंगाल) के जमींदार कृष्णराय ने लगान की राशि बढ़ाई तो तीतू मीर ने उसपर हमला कर दिया. ऐसे कई काण्ड कई जगह हुए जहाँ जमींदारों को विरोध का सामना करना पड़ा. ऐसे में तीतू मेरे किसान वर्ग का मसीहा बन गया. एक बार तो तीतू मेरे ने कई वहाबी समर्थकों के साथ अंग्रेजी सेना द्वारा बनाए गए किले को ही नष्ट कर डाला. पर तीतू मीर इसी संघर्ष में मारा गया. उसकी मृत्यु के बाद बंगाल में वहाबी आन्दोलन कमजोर पड़ गया.

सैयद अहमद की मृत्यु के बाद वाला Wahabi Movement

ऐसा नहीं था कि सैयद अहमद की  मृत्यु के बाद वहाबी आन्दोलन (Wahabi Movement) थम गया. यह आन्दोलन चलता ही रहा. इस आन्दोलन को सैयद अहमद के बाद जिन्दा रखने का श्रेय विलायत अली और इनायत अली को जाता है. फिर से नए केंद्र स्थापित किए गए. इस बार पटना को मुख्यालय बनाया गया. इनायत अली को बंगाल का कार्यभार दिया गया. पंजाब और पश्चिमोत्तर प्रान्तों में  वहाबी आन्दोलन के समर्थकों और अंग्रेजों के बीच कई बार मुठभेड़ हुई. अंग्रेजों ने वहाबी के केंद्र सिथाना और मुल्का को नष्ट कर दिया. अनेक समर्थक गिरफ्तार हो गए. कई लोगों पर मुकदमा चला और उन्हें काला पानी व जेल  की सजा दी गई. कालांतर में पटना का भी केंद्र नष्ट कर दिया गया. सरकार के इस दमनात्मक रवैये के चलते वहाबी आन्दोलन शिथिल पड़ गया और प्रथम युद्ध के अंत तक इसने दम तोड़ दिया.

वहाबी आन्दोलन का प्रभाव और महत्त्व

वहाबी आन्दोलन (Wahabi Movement) की शुरुआत भले ही मुसलमान समुदाय के पुनरुत्थान के रूप में हुई हो पर बाद में इस आन्दोलन ने दिशा बदल ली. देश में मुस्लिम शासन फिर से आये, इस सोच को लेकर यह आन्दोलन चला था पर कालांतर में यह आन्दोलन मुख्यतः एक किसान आन्दोलन बन कर रह गया. जब यह किसान आन्दोलन बना तो कई हिन्दू भी इस आन्दोलन से जुड़ गए. यह सच है कि वहाबियों ने किसानों और निम्नवर्ग पर हो रहे अंग्रेजी अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाई. सरकार विरोधी अभियान चलाकर वहाबियों ने 1857 ई. के विद्रोह  के लिए एक वातावरण तैयार कर दिया. इस आन्दोलन से मिली विफलता के बाद मुसलमान लोगों में एक नई विचारधारा का संचार हुआ. धार्मिक कट्टरता के स्थान पर मुसलामानों ने अब आधुनिकीकरण पर बल दिया. आधुनिक शिक्षा और मुसलमानों का भला चाहने वाले सर सैयद अहमद खाँ का चेहरा सब के सामने आया.

1904 ईस्वी का ल्हासा की संधि

ल्हासा की संधि - Treaty of Lhasa 1904 ई. in Hindi

भूमिका

लॉर्ड कर्जन की तिब्बत सम्बन्धी नीति उसके वायसराय काल की एक महत्त्वपूर्ण घटना है. गवर्नर जनरल लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स के समय में ब्रिटिश सरकार तिब्बत के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करने का यत्न कर रही थी और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने अनेक दूत वहाँ भेजे थे पर उनसे कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई थी. 1886 ई. में चीन की सरकार ने ब्रिटिश व्यापार मंडल को तिब्बत आने की आज्ञा दी और कुछ समय के बाद अंग्रेजों को यातुंग (Yatung, Tibet) नामक जगह में व्यापार करने की अनुमति मिल गई. परन्तु तिब्बत के लोग सामान्य रूप से अंग्रेजों के विरुद्ध थे और इसलिए चीन की सरकार से आज्ञा मिल जाने पर भी ब्रिटिश सरकार को कोई विशेष लाभ नहीं हुआ.

चीन से स्वतंत्र होने की माँग

जब कर्जन भारत पहुँचा तो उस समय तिब्बत में कुछ नए राजनीतिक परिवर्तन हो रहे थे जिन्होंने वायसराय के ध्यान को भी आकृष्ट किया. तिब्बत के लोगों में चीन से स्वतंत्र होने की दृढ़ भावना उत्पन्न हो रही थी और उन्होंने दलाई लामा को अपना नेता बनाया. दलाई लामा ने स्वयं को शक्तिशाली स्वतंत्र शासक के रूप में प्रमाणित किया. उन्होंने व्यस्क होते ही चीन के रीजेंसी सरकार (regency government) का तख्ता उलट दिया और उसपर शक्तिपूर्ण अधिकार करके दृढ़ धारणा और योग्यता से शासन-भार को संभाल लिया. उन्होंने रूस में जन्मे एक monk, जिनका नाम डोरजीफ (Dorjieff) था, से रूस में रहने वाले बौद्धों से धार्मिक कार्यों के लिए धन इकठ्ठा करने के लिए कहा. डोरजीफ रूसी सम्राट से भी मिला. रूसी समाचारपत्रों ने डोरजीफ के प्रयासों को बहुत महत्त्व दिया और तिब्बत में बढ़ते हुए रूसी प्रभाव का स्वागत किया.

तिब्बत में रूसी प्रभाव

भारत सरकार इन सूचनाओं से चिंतित हो उठी और उसने समझा कि रूसी सरकार डोरजीफ के द्वारा उसके पड़ोसी प्रदेश तिब्बत में राजनीतिक प्रभाव बढ़ा रही है. लॉर्ड कर्जन ने तिब्बत में रूसियों के मामले को गंभीरतापूर्वक लिया क्योंकि इससे एशिया में अंग्रेजों के सम्मान को धक्का लगने की संभावना थी. लॉर्ड कर्जन ने तिब्बत में एक मिशन भेजने के लिए इंग्लैंड की सरकार पर जोर डाला. उसने तिब्बत के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए भी जोर दिया, पर इंग्लैंड की सरकार मिशन भेजने के पक्ष में नहीं थी. इसपर लॉर्ड कर्जन ने यह सुझाव रखा कि सिक्किम की सीमा से पन्द्रह मील उत्तर में खाम्बाजोंग (Khamba Dzong) नामक स्थान पर तिब्बत और चीन से बातचीत की जाए और दोनों सरकारों पर संधि-दायित्वों को पूरा करने की आवश्यकता पर जोर डाला जाए. यदि दूत वहाँ न पहुँचे तो खुद ब्रिटिश कमिश्नर ही वहाँ पहुँचे. इंग्लैंड सरकार ने अनिच्छा से कर्जन की बात को स्वीकार लिया और कर्नल फ्रांसिस यंगहसबैंड (Francis Younghusband) के नेतृत्व में एक मिशन खाम्बाजोंग भेज दिया.

कर्नल यंगहसबैंड जुलाई, 1903 ई. खाम्बाजोंग पहुँचा, परन्तु तिब्बतियों ने तब तक बातचीत में आने से इनकार कर दिया. फलस्वरूप बातचीत में अवरोध उत्पन्न हो गया. इसी बीच तिब्बतियों ने खाम्बाजोंग के निकट अपनी सेनाओं को एकत्रित करना शुरू कर दिया. कर्जन इस बात को सहन न कर सका और उसने इंग्लैंड सरकार से गयान्त्से तक सेनाओं को भेजने की स्वीकृति माँगी. विदेश मंत्री लॉर्ड लैंसडाउन ने इस शर्त पर स्वीकृति दे दी कि क्षति-पूर्ति हो जाने पर सेनाएँ वापस लौट आएँगी.

ल्हासा की संधि (7 September 1904)

1904 ई. को ब्रिटिश सेनाओं ने गयान्त्से (Gyantse, Tibbat) की ओर बढ़ना आरम्भ किया और महीने के अंतिम दिन गुरु नामक स्थान पर उनकी तिब्बती सेनाओं से पहली टक्कर हुई. तिब्बती सेनाओं के पास न तो अच्छे शस्त्र थे और न ही उनका नेतृत्व अच्छा था, इसलिए थोड़ी ही देर में तिब्बती बुरी तरह हरा दिए गए. उनके सात सौ सैनिक मारे गए, जबकि अंग्रेजी सेना का एक भी सैनिक नहीं मारा. ग्यान्त्से पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया. परन्तु इतने पर भी दलाई लामा ने संधि करना स्वीकार नहीं किया. इसपर मंत्रिमंडल ने ल्हासा पर आक्रमण करने की आज्ञा दी. यंगहसबैंड के नेतृत्व में अंग्रेजी सेनाएँ तिब्बती सेनाओं को परास्त करती हुई तिब्बतियों के पवित्र और महत्त्वपूर्ण नगर ल्हासा में घुस गई. दलाई लामा नगर छोड़कर भाग निकले. यंगहसबैंड ने दलाई लामा के एजेंट से, जिसको दलाई लामा ने भागने से पहले संधि-विग्रह का अधिकार दे दिया था, संधि की वार्ता शुरू की. लम्बी बातचीत के बाद 7 सितम्बर को संधिपत्र पर हस्ताक्षर हुए. यह संधि ल्हासा की संधि (Treaty of Lhasa) के नाम से प्रसिद्ध है. इस संधि की शर्तों के अनुसार :

Conditions of Lhasa Treaty 

  1. यातुंग, ग्यान्त्से और गुरुतोक में व्यापार केंद्र खोलने का निश्चय हुआ.
  2. एक ब्रिटिश व्यापार एजेंट को ग्यान्त्से में रखने का निश्चय हुआ जो आवश्यकता पड़ने पर ल्हासा भी जा सकता था.
  3. 75 लाख रुपये क्षति-पूर्ति के रूप में ब्रिटिश सरकार को दिया जाए जो एक लाख रुपये की वार्षिक किश्तों में भुगतान करना होगा. क्षति-पूर्ति की सारी राशि के भुगतान तक भूटान और सिक्किम के बीच की चुम्बी घाटी (Chumbi Valley) में ब्रिटिश सेनाओं का रहना निश्चित किया गया.

ल्हासा संधि (Lhasa Treaty) की दूसरी शर्तों के अनुसार ब्रिटेन को तिब्बत की विदेश नीति पर प्रभाव रखने का सीधा अधिकार प्राप्त हुआ. इसके अनुसार, तिब्बत का कोई भी भाग किसी भी विदेशी शक्ति कोई नहीं दिया जा सकता था और न ही किसी राष्ट्र का एजेंट तिब्बत में प्रविष्ट हो सकता था. किसी देश अथवा वहाँ के प्रजा को तिब्बत में रेलपथ, सड़कें, टेलीग्राफ और खानों सम्बन्ध में सुविधाएँ नहीं दी जा सकती थीं. निश्चय हुआ कि यदि ऐसी सुविधाएँ किसी भी अन्य देश को दी गईं तो वे शीघ्र ही ब्रिटिश सरकार को देनी पड़ेंगी.

 St John Brodrick द्वारा शर्त्तों में बदलाव

संधि की शर्त्तें कठिन थीं. इसलिए रूस की सरकार ने उनका विरोध किया. भारत मंत्री जॉन ब्राडरिक ( St John Brodrick) ने भी अनुभव किया कि यंग हसबैंड ने अपने अधिकारों का उल्लंघन करते हुए तिब्बत के साथ अधिक सख्ती की है. उसने संधि के दोहराए जाने के लिए आग्रह किया. फलतः संधि की पुनरावृत्ति हुई. नए शर्त्तों के अनुसार -

  1. क्षति-पूर्ति की राशि 75 लाख से घटाकर 25 लाख कर दी गई.
  2. निश्चय किया गया कि वार्षिक किश्तों का भुगतान हो जाने के बाद ब्रिटिश सेनाओं को चुम्बी घाटी से हटा लिया जायेगा.
  3. ग्यान्त्से स्थित ब्रिटिश प्रतिनिधि को ल्हासा जाने की अनुमति रद्द कर दी गई.

लॉर्ड कर्जन की तिब्बत नीति की आलोचना

लॉर्ड कर्जन की तिब्बत सम्बन्धी नीति के विषय में बहुत-सा मतभेद रहा है. लॉर्ड रोजबर्री ने हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में कर्जन की तिब्बत सम्बन्धी नीति की आलोचना करते हुए उसकी लिटन द्वारा अपनाई गई मूर्खतापूर्ण अफगान नीति से तुलना की. उसका कहना था कि दोनों अवस्थाओं में ब्रिटिश सरकार ने रूस के कल्पित भय से हस्तक्षेप किया और दोनों मामलों में ब्रिटिश सरकार को स्वतंत्र राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई राजनीतिक अथवा वैधानिक अधिकार नहीं था.

लाला लाजपतराय का जीवन,पंजाब केसरी

लाला लाजपत राय का जीवन और भारतीय इतिहास में उनका स्थान

कांग्रेस के उग्रवादी नेताओं में लाला लाजपत राय का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है. तिलक की ही भाँति पंजाब में लाला लाजपत राय ने नयी सामाजिक और राजनीतिक चेतना लाने की कोशिश की. पंजाब के रहने वाले लोग लाला लाजपत राय को श्रद्धा से 'पंजाब केसरी (Punjab Kesari)” कहते थे.

लाला लाजपत राय की जीवन

लाला लाजपत राय का जन्म 1865 ई. में पंजाब में हुआ था. उनके पिता स्कूल-इंस्पेक्टर थे. लाला लाजपत बचपन से ही प्रखर बुद्धि के थे. उन्हें प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति से बहुत लगाव था. इसी लगाव के चलते ही उन्होंने प्राचीन विद्या, धर्म और संस्कृति का गहन रूप से अध्ययन किया. वे भी विदेशी शासन के विरोधी थे. उनका राजनीतिक दर्शन दयानंद सरस्वती  के दर्शन से प्रभावित था. अपनी शिक्षा ख़त्म कर के वे सक्रिय रूप से राजनीति में संग्लन हो गए.

इतिहास में से लाला लाजपत का स्थान

1888 ई. में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की. वे कांग्रेसी के नरमपंथी नेताओं और कांग्रेस की भिक्षा की नीति से काफी असंतुष्ट थे. तिलक के सामान वे भी उग्र राष्ट्रवादिता के हिमायती थी. जल्द ही तिलक और बिपिनचंद्र पाल के साथ उन्होंने अपना उग्रवादी गुट बना लिया जिसे लाल-बाल-पाल (<<Click to read in detail) के नाम से जाना गया. इन लोगोंने कांफ्रेस की शांतिपूर्ण नीतियों का विरोधरंभ किया. फलतः, कांग्रेस के अन्दर नरमपंथियों का प्रभाव कम होने लगा और उग्रवादियों का प्रभाव बढ़ने लगा. बनारस कांग्रेस अधिवेशन (1905 ई.) में उग्रवादियों ने कांग्रेस पंडाल में भी अलग बैठक की. लाजपत राय ने भी इसमें भाग लिया. उन्होंने कहा कि अगर 'भारत स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहता है तो उसको भिक्षावृत्ति का परित्याग कर स्वयं अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा.

कांग्रेस से अलग

1907 ई. में कांग्रेस के विभाजन के बाद लाला लाजपत राय कांग्रेस से अलग हो गए. कांग्रेस से अलग होकर इसी वर्ष उन्होंने पंजाब में 'उपनिवेशीकरण अधिनियम” के विरोध में एक व्यापक आन्दोलन चालाया. लाला हरदयाल के साथ मिलकर उन्होंने क्रांतिकारी आन्दोलनों में भी भाग लिया. फलतः सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर भारत से निर्वासित कर दिया. निर्वासन के बाद लाजपत राय अमेरिका चले गए और वहीं से राष्ट्रीय आन्दोलन और अंग्रेजी सरकार विरोधी गतिविधियों में भाग लेते रहे. उन्होंने भारत की दयनीय स्थिति से सम्बंधित एक पुस्तक की रचना भी की जिसे सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया.

भारत पुनर्वापसी

1920 ई. में लाला लाजपत राय पुनः भारत वापस आये. उस समय सम्पूर्ण देश महात्मा गान्धी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन की तैयारी कर रहा था. जब गांधी ने अपना आन्दोलन शुरू कियाअ लाजपत राय नेइन भाग लिया और पंजाब में इसे सफल किया. उनके कार्यों से क्रोधित होकर सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. जेल से छूटने के बाद वे फिर से राजनीति में सक्रिय हो उठे. 1923 ई. में वे केन्द्रीय सभा के सदस्य निर्वाचित हुए.

वे स्वराज दल के सदस्य भी बने परन्तु बाद में इससे अलग होकर एक राष्ट्रीय दल की स्थापना उन्होंने की. 1925 ई. में उन्हें हिन्दू महासभा के कलकत्ता अधिवेशन का सभापति बनाया गया. 1928 ई. में जब साइमन कमीशन के बहिष्कार की योजना बनाई गई तो लाला ने भी उसमें भाग लिया. उन्होंने लाहौर में साइमन कमीशन विरोधी जुलूस का नेतृत्व किया. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठियाँ बरसायी. इससे लाला लाजपत राय को सर पर चोट लगी. इसी चोट की वजह से 17 नवम्बर, 1928 को उनकी मृत्यु हो गई. उनकी असामयिक मृत्यु से पूरा देश स्तब्ध रह गया. भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में लाला लाजपत राय का बहुमूल्य योगदान है.

1921 ईस्वी का मोपलाओं का विद्रोह, हिन्दू नरसंहार

मोपला विद्रोह (The Moplah Rebellion - 1921) in Hindi

पूर्व बंगाल के पबना नामक स्थान के ही समान मद्रास प्रेसिडेंसी के मालाबार में मोपला का विद्रोह हुआ जिसे मालाबार विद्रोह (Malabar rebellion) भी कहते हैं. यदि आपसे Prelims परीक्षा में पूछा जाए कि मोपला विद्रोह (Moplah Rebellion) कहाँ हुआ तो इसका जवाब है मद्रास! खैर, मालाबार एक मुस्लिम बहुसंख्यक इलाका था. ये मुसलमान मोपला के नाम से जाने जाते थे. मोपला ज्यादातर कृषक या मजदूर वर्ग के थे जो चाय या कॉफ़ी बागानों में काम करते थे. वे अशिक्षित थे इसलिए धार्मिक कट्टरता भी उनमें अधिक थी.

कारण

मोपला विदेशी शासन, हिन्दू जमींदारों और साहूकारों से पीड़ित थे. अपनी दुःखद स्थिति से लाचार होकर 19-20वीं शताब्दी में मोपलाओं ने बार-बार विरोध और आक्रोश प्रकट किया. 1857 के पूर्व मोपलाओं के करीब 22 आन्दोलन हुए. 1882-85, 1896 और बाद में 1921 में भी मोपला विद्रोह (Moplah Rebellion) हुआ. 1870 में सरकार ने मालाबार में मोपलाओं द्वारा बार-बार विरोध की विवेचना करने के लिए एक समिति का निर्माण किया. इस समिति के रिपोर्ट में कुछ बातें सामने आईं कि इन विरोधों का कारण किसानों को जमीन से बेदखल किया जाना, लगान में मनमाने ढंग से वृद्धि किया जाना आदि हैं.

विद्रोह की प्रकृति

मोपला के किसानों का आन्दोलन हिंसात्मक था. मोपलाओं ने जमींदारों के घरों में धावा बोला, धन लूटे और हत्या की. मंदिरों की भी संपत्ति लूटी गई. साहूकारों को भी मौत के घाट उतारा गया. पूरे मालाबार में अशांति फ़ैल गई. सरकार ने अपनी तरफ से मोपला विद्रोह (Moplah Rebellion) को नियंत्रित करने के लिए बल का भी प्रयोग किया. पर मोपला किसी से नहीं डरे. उनके मन में यह भावना थी कि इस आन्दोलन में वे मर नहीं रहे बल्कि शहीद हो रहे हैं और उन्हें इस काम के लिए जन्नत मिलेगी.

विद्रोह का अंत

सरकार ने बलपूर्वक मोपला विद्रोह को दबा दिया. इस विद्रोह में संगठनात्मक कमजोरियाँ थीं. यह विद्रोह लम्बे समय तक के लिए टिक नहीं पाया. मोपलाओं को अपने आन्दोलन में कुछ बड़े किसानों का भी सहयोग मिला. जो मोपला विद्रोह (Moplah Rebellion) 1921 में हुआ वह बहुत ही व्यापक था. इस विद्रोह को दबाने के लिए तो सरकार को सेना की मदद लेनी पड़ी थी.

मुस्लिम लीग का जन्म

मुस्लिम लीग की स्थापना - Birth of Muslim League

भूमिका 

भारत में साम्प्रदायिक तत्व को बढ़ावा देने में ब्रिटिश अधिकारीयों का योगदान था. हिंदू राष्ट्रवाद के उदय से मुसलमानों के बीच भय उत्पन्न हो गया था. मुसलमानों के सामजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन को उन्नत बनाने में सर सैयद अहमद की भूमिका प्रशंसनीय थी. 20वीं सदी में भाषाई-विवाद, काउन्सिल न प्रतिनिधियों को निर्वाचित करने, मुसलमानों को सरकारी सेवा में नियुक्ति दिलाने के लिए लगातार प्रयास किया जा रहा था. हिंदुओं के बीच सरकार विरोधी रुख को देखकर ब्रिटिश अधिकारियों ने मुसलमानों के प्रति पुरानी दमन-नीति को छोड़कर उन्हें संरक्षण देने की नीति अपना ली थी. बंग-विभाजन ने मुस्लिम साम्प्रदायिकता को प्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहन दिया था. लॉर्ड कर्जन ने कई बार पूर्वी बंगाल का दौरा कर यह स्पष्ट कर दिया था कि वह मुस्लिम बहुल क्षेत्र के लिए ही पूर्वी बंगाल का निर्माण करने जा अरह है जहाँ मुसलमानों को विकास करने का पर्याप्त अवसर मिलेगा.

लॉर्ड मिन्टो

लॉर्ड कर्जन के बाद लॉर्ड मिन्टो भारत का वायसराय बना. भारत मंत्री लॉर्ड मार्ले संवैधानिक सुधार के पक्षधर थे. लॉर्ड मिन्टो मार्ले के विचार से सहमत थे, परन्तु वे सुधार के साथ-साथ भारतीय राष्ट्रीय जागरण के वेग को रोकना चाहते थे. इसलिए हिंदू और मुसलमानों के बीच मतभेद की खाई को वे और भी अधिक गहरा बनाना चाहते थे. इस उद्देश्य से उन्होंने अपने निजी सचिव स्मिथ को अलीगढ़ कॉलेज (Aligarh college) के प्रिंसिपल आर्चीवाल्ड (William A.J. Archbold) से मिलने के लिए भेजा और मुसलमानों का एक प्रतिनिधिमंडल भेजने का सुझाव दिया. मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल को साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग पेश करने का सन्देश दिया गया था. आर्चीवाल्ड ने स्मिथ का सुझाव अलीगढ़ कॉलेज के सचिव नवाब मोहसिन-उल-मुल्क के सामने रखा.

सर आगा खां

आर्चीवाल्ड गर्मी की छुट्टी में शिमला गए हुए थे. नवाब मोहसिन-उल-मुल्क को दूसरा पत्र नैनीताल से हाजी मुहम्मद इस्लाम खां का मिला जिसमें विधानसभा के विस्तार के सिलसिले में मुसलमानों को अपनी माँग सरकार के सामने रखने की पेशकश की गई थी. आर्चीवाल्ड ने अपने पत्र में यह सुझाव दिया था कि माँग-पत्र पर प्रमुख मुस्लिम प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर, सभी प्रान्तों के मुस्लिम प्रतिनिधि को शामिल करने और पृथक निर्वाचन अथवा मनोनयन की बात को प्रधानता देनी चाहिए. इन पत्रों के आलोक में नवाब मोहसिन-उल-मुल्क ने 4000 मुसलमानों के हस्ताक्षर करवाकर एक प्राथना-पत्र तैयार किया और विभिन्न क्षेत्रों के 35 प्रमुख मुसलमानों का एक प्रतिनिधिमंडल बनाया. सर आगा खां ने मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया. 1 अक्टूबर, 1906 ई. को मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल ने वायसराय से शिमला (Simla Deputation) में भेंट की. शिष्टमंडल ने साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की माँग पेश की. प्रार्थना-पत्र में निम्नलिखित माँगे थीं -

  1. मुसलमानों को सरकारी सेवाओं में उचित अनुपात में स्थान मिले.
  2. नौकरियों में प्रतियोगी तत्व की समाप्ति हो.
  3. प्रत्येक उच्च न्यायालय और मुख्य न्यालय में मुसलमानों को भी न्यायाधीश का पद मिले.
  4. नगरपालिकाओं में दोनों समुदायों को प्रतिनिधि भेजने की अलग से सुविधा दी जाए.
  5. विधान परिषद् के लिए मुस्लिम जमींदारों, वकीलों, व्यापारियों, जिला-परिषदों और नगरपालिकाओं के मुस्लिम सदस्य और पाँच वर्षों का अनुभव वाले मुस्लिम स्नातकों का एक अलग निर्वाचक मंडल बनाया जाए.
  6. वायसराय की काउन्सिल में भारतीयों की नियुक्ति करने के समय मुसलमानों के हितों का ध्यान रखा जाए.
  7. मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए.

वायसराय लॉर्ड मिन्टो ने प्रतिनिधिमंडल से मिलकर प्रसन्नता व्यक्त की और उत्तर में एक लम्बा पत्र लिखा जिसमें मुसलमानों को संरक्षण देने की बात स्वीकार कर ली गई थी. लॉर्ड मिन्टो ने कहा था कि -

'मुस्लिम सम्प्रदाय को इस बात से पूर्णतः निश्चित रहना चाहिए कि मेरे द्वारा प्रशासनिक पुनर्संगठन का जो कार्य होगा उसमें उनके अधिकार और हित सुरक्षित रहेंगे.”

मौलाना मुहम्मद अली के अनुसार मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल अंग्रेजों के द्वारा बजाई गई बाँसुरी थी. उसमें हिंदू विरोधी लोगों की प्रधानता थी. प्रतिनिधिमंडल की सलफता से मुसलमान अधिक उत्साहित हुए और उधर अंग्रेज़ अधिकारी भी प्रसन्न हो गए. एक अंग्रेज़ अधिकारी ने ने मिन्टो की पत्नी मेरी मिन्टो को यह सूचित किया कि - ” आज एक बहुत बड़ी बात हुई. आज एक ऐसा कार्य हुआ है, जिसका प्रभाव भारत और उसकी राजनीति अपर चिराकाल तक रहेगा. 6 करोड़ 20 लाख लोगों को हमने विद्रोही पक्ष में सम्मिलित होने से रोक लिया है.” मेरी मिन्टो ने इसे युगांतकारी घटना की संज्ञा दी.

मुस्लिम लीग का जन्म

वायसराय लॉर्ड मिन्टो के निमंत्रण पर भारत के अभिजात मुसलमानों को राजनीति में प्रवेश करने का अवसर मिला और वे पूरी तरह राजनीतिज्ञ बनकर शिमला से लौटे. अलीगढ़ की राजनीति सारे देश पर छा गई. ढाका बंगाल -विभाजन के फलस्वरूप आन्दोलन का गढ़ बन गया था. ढाका के नवाब सलीम उल्ला खां ने 'मुस्लिम ऑल इंडिया कान्फ्रेड्रेसी (All India Muslim Confederacy)” नामक एक संस्था के निर्माण का सुझाव दिया था. अंग्रेज़ों का सहयोग और संरक्षण का आश्वासन पाकर ढाका में मुसलमानों का एक सम्मेलन 30 दिसम्बर, 1906 ई. (when muslim league formed) को बुलाया गया. सम्मलेन का अध्यक्ष नवाब बकार-उल-मुल्क को बनाया गया. अखिल भारतीय स्तर पर एक मुस्लिम संगठन की नीव इसी सभा में डाली गई. संगठन का नाम 'ऑल इंडिया मुस्लिम लीग” रखा गया. मुस्लिम कांफ्रेड्रेसी (Muslim confederacy) का प्रस्ताव बहुमत से अस्वीकृत कर दिया गया.

नवाब वकार-उल-मुल्क ने अलीगढ़ के विद्यार्थियों की सभा में यह कहा था कि 'अच्छा यही होगा कि मुसलमान अपने-आपको अंग्रेजों की ऐसी फ़ौज समझें जो ब्रिटिश राज्य के लिए अपना खून बहाने और बलिदान करने के लिए तैयार हों.” नवाब वकार-उल-मुल्क ने कांग्रेस के आन्दोलन में मुसलमानों को भाग नहीं लेने की सलाह दी थी. ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठा रखना मुसलमानों का राष्ट्रीय कर्तव्य है.

मुस्लिम लीग की स्थापना का श्रेय अंग्रेजों को दिया जा सकता है. राष्ट्रीय आन्दोलन की राह में रुकावट पैदा करने के लिए ही मुस्लिम लीग की स्थापना की गई थी. यह संस्था चापलूसों की थी. मुसलमानों को उभारने में वायसराय लॉर्ड मिन्टो और भारत मंत्री मार्ले का भी सहयोग था. प्रथम अधिवेशन (first session) में मुस्लिम लीग के उद्देश्य के सम्बन्ध में स्पष्ट रुपरेखा का आभास नहीं मिलता है. मुस्लीम लीग का दूसरा अधिवेशन (second session) 1907 ई. में कराँची में हुआ जिसमें लीग के लिए एक संविधान बनाया गया.

संविधान

मुस्लिम लीग के संविधान में मुस्लिम लीग के उद्देश्य क्रमशः इस प्रकार थे -

  1. ब्रिटिश सरकार के प्रति भारतीय मुसलमानों में निष्ठा की भावना पैदा करना और किसी योजना के सम्बन्ध में मुसलमानों के प्रति होनेवाली सरकारी कुधाराणाओं को दूर करना.
  2. भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक और अन्य अधिकारों की रक्षा करना और उनकी आवश्यकताएँ और उच्च आकांक्षाएँ सयंत भाषा में सरकार के सामने रखना.
  3. जहाँ तक हो सके, उपर्युक्त उद्देश्यों को यथासंभव बिना हानि पहुँचाये, मुसलमानों और भारत के अन्य सम्प्रदायों में मित्रतापूर्ण भावना उत्पन्न करना.

कराँची सम्मलेन में मुस्लिम लीग का स्थाई अध्यक्ष आगा खां को बनाया गया जो खोजा सम्प्रदाय के प्रधान थे. आगा खां अंग्रेजों के मित्र थे और व्यस्तता के कारण प्रतिवर्ष लीग के लिए एक कार्यकारी अध्यक्ष का चुनाव किया जाता था. 1908 ई. में मुस्लिम लीग का कार्यकारी अध्यक्ष सर अली इमाम को बनाया गया जो बिहार के थे. सर अली इमाम ने भी ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठा को भारत के प्रति निष्ठा की संज्ञा दी और उनका मानना था कि वर्तमान प्रशासन तंत्र में सुधार तभी संभव है जब ब्रिटिश शासन बना रहे. लॉर्ड मार्ले ने यह कहा था कि कांग्रेस चंद्रमा को पकड़ने के लिए चिल्ला रही है.

साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व

मुस्लिम लीग मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था माने जाने लगी. कुछ ही मुसलमानों के द्वारा साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत की कटु आलोचना की गयी. परन्तु उनकी आवाज़ दबा दी गयी. कांग्रेस से मुसलमान धीरे-धीरे अलग रहने लगे. मुस्लिम लीग भी जन-प्रतिनिधि संस्था का रूप नहीं ग्रहण कर पायी थी. राजनीतिक प्रश्नों पर सरकार मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों को ही प्रशय देती थी.

एक तरफ मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल साम्प्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व की माँग कर रहा था तो दूसरी तरफ कांग्रेस के उग्रवादी पूर्ण स्वराज्य की माँग कर रहे थे. भारत में उग्रवादियों की बढ़ती हुई लोकप्रियता से सरकार की चिंता बढ़ी. लॉर्ड मार्ले पहले साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के पक्षधर नहीं थे किन्तु मिन्टो के आग्रह पर साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की बात स्वीकार कर ली गई. उस आधार पर 1909 ई. का मार्ले-मिन्टो सुधार लागू किया गया.

पाकिस्तान का निर्माण

1909 ई. के अधिनियम में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग को स्वीकार कर हिंदुओं की नाराजगी ब्रिटिश सरकार ने मोल ली थी. दोनों सम्प्रदायों केबीच विद्वेष की भावना बढ़ी. मुसलमानों को प्रत्यक्ष रीति से मतदान करने का अधिकार मिल गया, किन्तु हिंदुओं और दूसरे सम्प्रदायों को अधिकार से वंचित रखा गया. संपत्ति और शैक्षणिक योग्यता में भेदभाव की नीति से काम लिया गया था. मुसलमान स्नातक पाँच वर्ष का अनुभव रहने पर मतदाता बन सकता था और तीन हजार या उससे अधिक कर देने वाले जमींदारों को मतदान का अधिकार साम्प्रदायिकता के आधार पर दिया जाना तर्कसंगत नहीं था. हिंदुओं और मुसलमानों की तुलने में सुविधा और अधिकार से वंचित रखने के चलते देश के अन्दर जो आक्रोश फैला, उसके कारण कई स्थानों में दंगा हुआ. डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने ठीक कहा था कि 'पाकिस्तान के सच्चे जनक जिन्ना या रहीमतुल्ला नहीं थे वरन् लॉर्ड मिन्टो थे.” अंग्रेजों की की कूटनीति सफल रही और भारत में साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न हो गया जो अंततः भारत के विभाजन के बाद भी शांत नहीं हो पाया.

महात्मा गांधी की 11 सूत्रीय योजना

महात्मा गाँधी की ग्यारह सूत्री योजना - 11 Demands by Gandhi

महात्मा गाँधी ने हिन्सात्मक घटना के चलते (चौरी-चौरा नामक स्थान पर आन्दोलनकारियों ने एक थानेदार और 21 सिपाहियों को जलाकर मार डाला) असहयोग आंदोलन को बीच में ही स्थगित कर दिया क्योंकि वे अहिंसात्मक आंदोलन के पक्ष में थे.  असहयोग आन्दोलन की असफलता के बाद गाँधीजी 11 फरवरी, 1930 से सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करना चाहते थे. लेकिन देश की स्थिति का मूल्यांकन करते हुए उन्होंने एक बार सरकार से समझौता करने का प्रयत्न किया और वायसराय लॉर्ड इरविन (Lord Irwin) को एक पत्र लिखकर निम्नलिखित ग्यारह सूत्री माँगें  (11 Demands by Gandhi) पेश की -

महात्मा गाँधी की ग्यारह सूत्री योजना - 11 Demands

1) पूर्णरूपेण मदिरा निषेध (Total Prohibition)

2) विनिमय की दर घटाकर एक शिलिंग चार पेंस कर दी जाए (Exchange Rate should be reduced)

3) भूमि लगान आधा हो और उस पर काउंसिल का नियोजन रहे (Land rate should be halved)

4) नमक कर को समाप्त की जाए (Salt tax should be abolished)

5) सेना सम्बन्धी व्यय में कम-से-कम 50% की कमी हो (Defence expenditure should be reduced by 50%)

6) बड़ी-बड़ी सरकारी नौकरियों का वेतन आधा कर दिया गया (Salaries of top Govt. posts should be halved)

7) विदेशी वस्त्रों के आयात पर निषेध कर लगे (Import of foreign textile should be banned)

8) भारतीय समुद्र तट केवल भारतीय जहाज़ों के लिए सुरक्षित रहे और इसके लिए कानून का निर्माण हो (Indian sea coast should be reserved for Indian ships only)

9) सभी राजनीतिक बंदियों को छोड़ दिया जाए, राजनीतिक मामले उठा लिए जाए तथा निर्वासित भारतियों को देश वापस आने की अनुमति दी जाए (All political prisoners should be released and their political cases should be dropped)

10) गुप्तचर पुलिस हटा दिया जाए अथवा उस पर जनता का नियंत्रण रहे (Secret police should be either abolished or placed under the public)

11) आत्मरक्षा के लिए हथियार की अनुमति दी जाए (Arms for self protection be permitted)

गाँधीजी के इन ग्यारह सूत्रीय मांगों (eleven demands by Gandhiji) पर लॉर्ड इर्विन (Lord Irwin) ने कोई ध्यान नहीं दिया जिससे उनके मन में काफी निराशा हुई और उन्होंने डांडी यात्रा  के साथ सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारंभ किया क्योंकि अब सरकार के साथ समझौता की कोई गुंजाईश नहीं रही थी.

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...