लाला लाजपतराय का जीवन,पंजाब केसरी

लाला लाजपत राय का जीवन और भारतीय इतिहास में उनका स्थान

कांग्रेस के उग्रवादी नेताओं में लाला लाजपत राय का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है. तिलक की ही भाँति पंजाब में लाला लाजपत राय ने नयी सामाजिक और राजनीतिक चेतना लाने की कोशिश की. पंजाब के रहने वाले लोग लाला लाजपत राय को श्रद्धा से 'पंजाब केसरी (Punjab Kesari)” कहते थे.

लाला लाजपत राय की जीवन

लाला लाजपत राय का जन्म 1865 ई. में पंजाब में हुआ था. उनके पिता स्कूल-इंस्पेक्टर थे. लाला लाजपत बचपन से ही प्रखर बुद्धि के थे. उन्हें प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति से बहुत लगाव था. इसी लगाव के चलते ही उन्होंने प्राचीन विद्या, धर्म और संस्कृति का गहन रूप से अध्ययन किया. वे भी विदेशी शासन के विरोधी थे. उनका राजनीतिक दर्शन दयानंद सरस्वती  के दर्शन से प्रभावित था. अपनी शिक्षा ख़त्म कर के वे सक्रिय रूप से राजनीति में संग्लन हो गए.

इतिहास में से लाला लाजपत का स्थान

1888 ई. में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की. वे कांग्रेसी के नरमपंथी नेताओं और कांग्रेस की भिक्षा की नीति से काफी असंतुष्ट थे. तिलक के सामान वे भी उग्र राष्ट्रवादिता के हिमायती थी. जल्द ही तिलक और बिपिनचंद्र पाल के साथ उन्होंने अपना उग्रवादी गुट बना लिया जिसे लाल-बाल-पाल (<<Click to read in detail) के नाम से जाना गया. इन लोगोंने कांफ्रेस की शांतिपूर्ण नीतियों का विरोधरंभ किया. फलतः, कांग्रेस के अन्दर नरमपंथियों का प्रभाव कम होने लगा और उग्रवादियों का प्रभाव बढ़ने लगा. बनारस कांग्रेस अधिवेशन (1905 ई.) में उग्रवादियों ने कांग्रेस पंडाल में भी अलग बैठक की. लाजपत राय ने भी इसमें भाग लिया. उन्होंने कहा कि अगर 'भारत स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहता है तो उसको भिक्षावृत्ति का परित्याग कर स्वयं अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा.

कांग्रेस से अलग

1907 ई. में कांग्रेस के विभाजन के बाद लाला लाजपत राय कांग्रेस से अलग हो गए. कांग्रेस से अलग होकर इसी वर्ष उन्होंने पंजाब में 'उपनिवेशीकरण अधिनियम” के विरोध में एक व्यापक आन्दोलन चालाया. लाला हरदयाल के साथ मिलकर उन्होंने क्रांतिकारी आन्दोलनों में भी भाग लिया. फलतः सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर भारत से निर्वासित कर दिया. निर्वासन के बाद लाजपत राय अमेरिका चले गए और वहीं से राष्ट्रीय आन्दोलन और अंग्रेजी सरकार विरोधी गतिविधियों में भाग लेते रहे. उन्होंने भारत की दयनीय स्थिति से सम्बंधित एक पुस्तक की रचना भी की जिसे सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया.

भारत पुनर्वापसी

1920 ई. में लाला लाजपत राय पुनः भारत वापस आये. उस समय सम्पूर्ण देश महात्मा गान्धी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन की तैयारी कर रहा था. जब गांधी ने अपना आन्दोलन शुरू कियाअ लाजपत राय नेइन भाग लिया और पंजाब में इसे सफल किया. उनके कार्यों से क्रोधित होकर सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. जेल से छूटने के बाद वे फिर से राजनीति में सक्रिय हो उठे. 1923 ई. में वे केन्द्रीय सभा के सदस्य निर्वाचित हुए.

वे स्वराज दल के सदस्य भी बने परन्तु बाद में इससे अलग होकर एक राष्ट्रीय दल की स्थापना उन्होंने की. 1925 ई. में उन्हें हिन्दू महासभा के कलकत्ता अधिवेशन का सभापति बनाया गया. 1928 ई. में जब साइमन कमीशन के बहिष्कार की योजना बनाई गई तो लाला ने भी उसमें भाग लिया. उन्होंने लाहौर में साइमन कमीशन विरोधी जुलूस का नेतृत्व किया. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठियाँ बरसायी. इससे लाला लाजपत राय को सर पर चोट लगी. इसी चोट की वजह से 17 नवम्बर, 1928 को उनकी मृत्यु हो गई. उनकी असामयिक मृत्यु से पूरा देश स्तब्ध रह गया. भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में लाला लाजपत राय का बहुमूल्य योगदान है.

1921 ईस्वी का मोपलाओं का विद्रोह, हिन्दू नरसंहार

मोपला विद्रोह (The Moplah Rebellion - 1921) in Hindi

पूर्व बंगाल के पबना नामक स्थान के ही समान मद्रास प्रेसिडेंसी के मालाबार में मोपला का विद्रोह हुआ जिसे मालाबार विद्रोह (Malabar rebellion) भी कहते हैं. यदि आपसे Prelims परीक्षा में पूछा जाए कि मोपला विद्रोह (Moplah Rebellion) कहाँ हुआ तो इसका जवाब है मद्रास! खैर, मालाबार एक मुस्लिम बहुसंख्यक इलाका था. ये मुसलमान मोपला के नाम से जाने जाते थे. मोपला ज्यादातर कृषक या मजदूर वर्ग के थे जो चाय या कॉफ़ी बागानों में काम करते थे. वे अशिक्षित थे इसलिए धार्मिक कट्टरता भी उनमें अधिक थी.

कारण

मोपला विदेशी शासन, हिन्दू जमींदारों और साहूकारों से पीड़ित थे. अपनी दुःखद स्थिति से लाचार होकर 19-20वीं शताब्दी में मोपलाओं ने बार-बार विरोध और आक्रोश प्रकट किया. 1857 के पूर्व मोपलाओं के करीब 22 आन्दोलन हुए. 1882-85, 1896 और बाद में 1921 में भी मोपला विद्रोह (Moplah Rebellion) हुआ. 1870 में सरकार ने मालाबार में मोपलाओं द्वारा बार-बार विरोध की विवेचना करने के लिए एक समिति का निर्माण किया. इस समिति के रिपोर्ट में कुछ बातें सामने आईं कि इन विरोधों का कारण किसानों को जमीन से बेदखल किया जाना, लगान में मनमाने ढंग से वृद्धि किया जाना आदि हैं.

विद्रोह की प्रकृति

मोपला के किसानों का आन्दोलन हिंसात्मक था. मोपलाओं ने जमींदारों के घरों में धावा बोला, धन लूटे और हत्या की. मंदिरों की भी संपत्ति लूटी गई. साहूकारों को भी मौत के घाट उतारा गया. पूरे मालाबार में अशांति फ़ैल गई. सरकार ने अपनी तरफ से मोपला विद्रोह (Moplah Rebellion) को नियंत्रित करने के लिए बल का भी प्रयोग किया. पर मोपला किसी से नहीं डरे. उनके मन में यह भावना थी कि इस आन्दोलन में वे मर नहीं रहे बल्कि शहीद हो रहे हैं और उन्हें इस काम के लिए जन्नत मिलेगी.

विद्रोह का अंत

सरकार ने बलपूर्वक मोपला विद्रोह को दबा दिया. इस विद्रोह में संगठनात्मक कमजोरियाँ थीं. यह विद्रोह लम्बे समय तक के लिए टिक नहीं पाया. मोपलाओं को अपने आन्दोलन में कुछ बड़े किसानों का भी सहयोग मिला. जो मोपला विद्रोह (Moplah Rebellion) 1921 में हुआ वह बहुत ही व्यापक था. इस विद्रोह को दबाने के लिए तो सरकार को सेना की मदद लेनी पड़ी थी.

मुस्लिम लीग का जन्म

मुस्लिम लीग की स्थापना - Birth of Muslim League

भूमिका 

भारत में साम्प्रदायिक तत्व को बढ़ावा देने में ब्रिटिश अधिकारीयों का योगदान था. हिंदू राष्ट्रवाद के उदय से मुसलमानों के बीच भय उत्पन्न हो गया था. मुसलमानों के सामजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन को उन्नत बनाने में सर सैयद अहमद की भूमिका प्रशंसनीय थी. 20वीं सदी में भाषाई-विवाद, काउन्सिल न प्रतिनिधियों को निर्वाचित करने, मुसलमानों को सरकारी सेवा में नियुक्ति दिलाने के लिए लगातार प्रयास किया जा रहा था. हिंदुओं के बीच सरकार विरोधी रुख को देखकर ब्रिटिश अधिकारियों ने मुसलमानों के प्रति पुरानी दमन-नीति को छोड़कर उन्हें संरक्षण देने की नीति अपना ली थी. बंग-विभाजन ने मुस्लिम साम्प्रदायिकता को प्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहन दिया था. लॉर्ड कर्जन ने कई बार पूर्वी बंगाल का दौरा कर यह स्पष्ट कर दिया था कि वह मुस्लिम बहुल क्षेत्र के लिए ही पूर्वी बंगाल का निर्माण करने जा अरह है जहाँ मुसलमानों को विकास करने का पर्याप्त अवसर मिलेगा.

लॉर्ड मिन्टो

लॉर्ड कर्जन के बाद लॉर्ड मिन्टो भारत का वायसराय बना. भारत मंत्री लॉर्ड मार्ले संवैधानिक सुधार के पक्षधर थे. लॉर्ड मिन्टो मार्ले के विचार से सहमत थे, परन्तु वे सुधार के साथ-साथ भारतीय राष्ट्रीय जागरण के वेग को रोकना चाहते थे. इसलिए हिंदू और मुसलमानों के बीच मतभेद की खाई को वे और भी अधिक गहरा बनाना चाहते थे. इस उद्देश्य से उन्होंने अपने निजी सचिव स्मिथ को अलीगढ़ कॉलेज (Aligarh college) के प्रिंसिपल आर्चीवाल्ड (William A.J. Archbold) से मिलने के लिए भेजा और मुसलमानों का एक प्रतिनिधिमंडल भेजने का सुझाव दिया. मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल को साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग पेश करने का सन्देश दिया गया था. आर्चीवाल्ड ने स्मिथ का सुझाव अलीगढ़ कॉलेज के सचिव नवाब मोहसिन-उल-मुल्क के सामने रखा.

सर आगा खां

आर्चीवाल्ड गर्मी की छुट्टी में शिमला गए हुए थे. नवाब मोहसिन-उल-मुल्क को दूसरा पत्र नैनीताल से हाजी मुहम्मद इस्लाम खां का मिला जिसमें विधानसभा के विस्तार के सिलसिले में मुसलमानों को अपनी माँग सरकार के सामने रखने की पेशकश की गई थी. आर्चीवाल्ड ने अपने पत्र में यह सुझाव दिया था कि माँग-पत्र पर प्रमुख मुस्लिम प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर, सभी प्रान्तों के मुस्लिम प्रतिनिधि को शामिल करने और पृथक निर्वाचन अथवा मनोनयन की बात को प्रधानता देनी चाहिए. इन पत्रों के आलोक में नवाब मोहसिन-उल-मुल्क ने 4000 मुसलमानों के हस्ताक्षर करवाकर एक प्राथना-पत्र तैयार किया और विभिन्न क्षेत्रों के 35 प्रमुख मुसलमानों का एक प्रतिनिधिमंडल बनाया. सर आगा खां ने मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया. 1 अक्टूबर, 1906 ई. को मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल ने वायसराय से शिमला (Simla Deputation) में भेंट की. शिष्टमंडल ने साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की माँग पेश की. प्रार्थना-पत्र में निम्नलिखित माँगे थीं -

  1. मुसलमानों को सरकारी सेवाओं में उचित अनुपात में स्थान मिले.
  2. नौकरियों में प्रतियोगी तत्व की समाप्ति हो.
  3. प्रत्येक उच्च न्यायालय और मुख्य न्यालय में मुसलमानों को भी न्यायाधीश का पद मिले.
  4. नगरपालिकाओं में दोनों समुदायों को प्रतिनिधि भेजने की अलग से सुविधा दी जाए.
  5. विधान परिषद् के लिए मुस्लिम जमींदारों, वकीलों, व्यापारियों, जिला-परिषदों और नगरपालिकाओं के मुस्लिम सदस्य और पाँच वर्षों का अनुभव वाले मुस्लिम स्नातकों का एक अलग निर्वाचक मंडल बनाया जाए.
  6. वायसराय की काउन्सिल में भारतीयों की नियुक्ति करने के समय मुसलमानों के हितों का ध्यान रखा जाए.
  7. मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए.

वायसराय लॉर्ड मिन्टो ने प्रतिनिधिमंडल से मिलकर प्रसन्नता व्यक्त की और उत्तर में एक लम्बा पत्र लिखा जिसमें मुसलमानों को संरक्षण देने की बात स्वीकार कर ली गई थी. लॉर्ड मिन्टो ने कहा था कि -

'मुस्लिम सम्प्रदाय को इस बात से पूर्णतः निश्चित रहना चाहिए कि मेरे द्वारा प्रशासनिक पुनर्संगठन का जो कार्य होगा उसमें उनके अधिकार और हित सुरक्षित रहेंगे.”

मौलाना मुहम्मद अली के अनुसार मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल अंग्रेजों के द्वारा बजाई गई बाँसुरी थी. उसमें हिंदू विरोधी लोगों की प्रधानता थी. प्रतिनिधिमंडल की सलफता से मुसलमान अधिक उत्साहित हुए और उधर अंग्रेज़ अधिकारी भी प्रसन्न हो गए. एक अंग्रेज़ अधिकारी ने ने मिन्टो की पत्नी मेरी मिन्टो को यह सूचित किया कि - ” आज एक बहुत बड़ी बात हुई. आज एक ऐसा कार्य हुआ है, जिसका प्रभाव भारत और उसकी राजनीति अपर चिराकाल तक रहेगा. 6 करोड़ 20 लाख लोगों को हमने विद्रोही पक्ष में सम्मिलित होने से रोक लिया है.” मेरी मिन्टो ने इसे युगांतकारी घटना की संज्ञा दी.

मुस्लिम लीग का जन्म

वायसराय लॉर्ड मिन्टो के निमंत्रण पर भारत के अभिजात मुसलमानों को राजनीति में प्रवेश करने का अवसर मिला और वे पूरी तरह राजनीतिज्ञ बनकर शिमला से लौटे. अलीगढ़ की राजनीति सारे देश पर छा गई. ढाका बंगाल -विभाजन के फलस्वरूप आन्दोलन का गढ़ बन गया था. ढाका के नवाब सलीम उल्ला खां ने 'मुस्लिम ऑल इंडिया कान्फ्रेड्रेसी (All India Muslim Confederacy)” नामक एक संस्था के निर्माण का सुझाव दिया था. अंग्रेज़ों का सहयोग और संरक्षण का आश्वासन पाकर ढाका में मुसलमानों का एक सम्मेलन 30 दिसम्बर, 1906 ई. (when muslim league formed) को बुलाया गया. सम्मलेन का अध्यक्ष नवाब बकार-उल-मुल्क को बनाया गया. अखिल भारतीय स्तर पर एक मुस्लिम संगठन की नीव इसी सभा में डाली गई. संगठन का नाम 'ऑल इंडिया मुस्लिम लीग” रखा गया. मुस्लिम कांफ्रेड्रेसी (Muslim confederacy) का प्रस्ताव बहुमत से अस्वीकृत कर दिया गया.

नवाब वकार-उल-मुल्क ने अलीगढ़ के विद्यार्थियों की सभा में यह कहा था कि 'अच्छा यही होगा कि मुसलमान अपने-आपको अंग्रेजों की ऐसी फ़ौज समझें जो ब्रिटिश राज्य के लिए अपना खून बहाने और बलिदान करने के लिए तैयार हों.” नवाब वकार-उल-मुल्क ने कांग्रेस के आन्दोलन में मुसलमानों को भाग नहीं लेने की सलाह दी थी. ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठा रखना मुसलमानों का राष्ट्रीय कर्तव्य है.

मुस्लिम लीग की स्थापना का श्रेय अंग्रेजों को दिया जा सकता है. राष्ट्रीय आन्दोलन की राह में रुकावट पैदा करने के लिए ही मुस्लिम लीग की स्थापना की गई थी. यह संस्था चापलूसों की थी. मुसलमानों को उभारने में वायसराय लॉर्ड मिन्टो और भारत मंत्री मार्ले का भी सहयोग था. प्रथम अधिवेशन (first session) में मुस्लिम लीग के उद्देश्य के सम्बन्ध में स्पष्ट रुपरेखा का आभास नहीं मिलता है. मुस्लीम लीग का दूसरा अधिवेशन (second session) 1907 ई. में कराँची में हुआ जिसमें लीग के लिए एक संविधान बनाया गया.

संविधान

मुस्लिम लीग के संविधान में मुस्लिम लीग के उद्देश्य क्रमशः इस प्रकार थे -

  1. ब्रिटिश सरकार के प्रति भारतीय मुसलमानों में निष्ठा की भावना पैदा करना और किसी योजना के सम्बन्ध में मुसलमानों के प्रति होनेवाली सरकारी कुधाराणाओं को दूर करना.
  2. भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक और अन्य अधिकारों की रक्षा करना और उनकी आवश्यकताएँ और उच्च आकांक्षाएँ सयंत भाषा में सरकार के सामने रखना.
  3. जहाँ तक हो सके, उपर्युक्त उद्देश्यों को यथासंभव बिना हानि पहुँचाये, मुसलमानों और भारत के अन्य सम्प्रदायों में मित्रतापूर्ण भावना उत्पन्न करना.

कराँची सम्मलेन में मुस्लिम लीग का स्थाई अध्यक्ष आगा खां को बनाया गया जो खोजा सम्प्रदाय के प्रधान थे. आगा खां अंग्रेजों के मित्र थे और व्यस्तता के कारण प्रतिवर्ष लीग के लिए एक कार्यकारी अध्यक्ष का चुनाव किया जाता था. 1908 ई. में मुस्लिम लीग का कार्यकारी अध्यक्ष सर अली इमाम को बनाया गया जो बिहार के थे. सर अली इमाम ने भी ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठा को भारत के प्रति निष्ठा की संज्ञा दी और उनका मानना था कि वर्तमान प्रशासन तंत्र में सुधार तभी संभव है जब ब्रिटिश शासन बना रहे. लॉर्ड मार्ले ने यह कहा था कि कांग्रेस चंद्रमा को पकड़ने के लिए चिल्ला रही है.

साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व

मुस्लिम लीग मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था माने जाने लगी. कुछ ही मुसलमानों के द्वारा साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत की कटु आलोचना की गयी. परन्तु उनकी आवाज़ दबा दी गयी. कांग्रेस से मुसलमान धीरे-धीरे अलग रहने लगे. मुस्लिम लीग भी जन-प्रतिनिधि संस्था का रूप नहीं ग्रहण कर पायी थी. राजनीतिक प्रश्नों पर सरकार मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों को ही प्रशय देती थी.

एक तरफ मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल साम्प्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व की माँग कर रहा था तो दूसरी तरफ कांग्रेस के उग्रवादी पूर्ण स्वराज्य की माँग कर रहे थे. भारत में उग्रवादियों की बढ़ती हुई लोकप्रियता से सरकार की चिंता बढ़ी. लॉर्ड मार्ले पहले साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के पक्षधर नहीं थे किन्तु मिन्टो के आग्रह पर साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की बात स्वीकार कर ली गई. उस आधार पर 1909 ई. का मार्ले-मिन्टो सुधार लागू किया गया.

पाकिस्तान का निर्माण

1909 ई. के अधिनियम में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग को स्वीकार कर हिंदुओं की नाराजगी ब्रिटिश सरकार ने मोल ली थी. दोनों सम्प्रदायों केबीच विद्वेष की भावना बढ़ी. मुसलमानों को प्रत्यक्ष रीति से मतदान करने का अधिकार मिल गया, किन्तु हिंदुओं और दूसरे सम्प्रदायों को अधिकार से वंचित रखा गया. संपत्ति और शैक्षणिक योग्यता में भेदभाव की नीति से काम लिया गया था. मुसलमान स्नातक पाँच वर्ष का अनुभव रहने पर मतदाता बन सकता था और तीन हजार या उससे अधिक कर देने वाले जमींदारों को मतदान का अधिकार साम्प्रदायिकता के आधार पर दिया जाना तर्कसंगत नहीं था. हिंदुओं और मुसलमानों की तुलने में सुविधा और अधिकार से वंचित रखने के चलते देश के अन्दर जो आक्रोश फैला, उसके कारण कई स्थानों में दंगा हुआ. डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने ठीक कहा था कि 'पाकिस्तान के सच्चे जनक जिन्ना या रहीमतुल्ला नहीं थे वरन् लॉर्ड मिन्टो थे.” अंग्रेजों की की कूटनीति सफल रही और भारत में साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न हो गया जो अंततः भारत के विभाजन के बाद भी शांत नहीं हो पाया.

महात्मा गांधी की 11 सूत्रीय योजना

महात्मा गाँधी की ग्यारह सूत्री योजना - 11 Demands by Gandhi

महात्मा गाँधी ने हिन्सात्मक घटना के चलते (चौरी-चौरा नामक स्थान पर आन्दोलनकारियों ने एक थानेदार और 21 सिपाहियों को जलाकर मार डाला) असहयोग आंदोलन को बीच में ही स्थगित कर दिया क्योंकि वे अहिंसात्मक आंदोलन के पक्ष में थे.  असहयोग आन्दोलन की असफलता के बाद गाँधीजी 11 फरवरी, 1930 से सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करना चाहते थे. लेकिन देश की स्थिति का मूल्यांकन करते हुए उन्होंने एक बार सरकार से समझौता करने का प्रयत्न किया और वायसराय लॉर्ड इरविन (Lord Irwin) को एक पत्र लिखकर निम्नलिखित ग्यारह सूत्री माँगें  (11 Demands by Gandhi) पेश की -

महात्मा गाँधी की ग्यारह सूत्री योजना - 11 Demands

1) पूर्णरूपेण मदिरा निषेध (Total Prohibition)

2) विनिमय की दर घटाकर एक शिलिंग चार पेंस कर दी जाए (Exchange Rate should be reduced)

3) भूमि लगान आधा हो और उस पर काउंसिल का नियोजन रहे (Land rate should be halved)

4) नमक कर को समाप्त की जाए (Salt tax should be abolished)

5) सेना सम्बन्धी व्यय में कम-से-कम 50% की कमी हो (Defence expenditure should be reduced by 50%)

6) बड़ी-बड़ी सरकारी नौकरियों का वेतन आधा कर दिया गया (Salaries of top Govt. posts should be halved)

7) विदेशी वस्त्रों के आयात पर निषेध कर लगे (Import of foreign textile should be banned)

8) भारतीय समुद्र तट केवल भारतीय जहाज़ों के लिए सुरक्षित रहे और इसके लिए कानून का निर्माण हो (Indian sea coast should be reserved for Indian ships only)

9) सभी राजनीतिक बंदियों को छोड़ दिया जाए, राजनीतिक मामले उठा लिए जाए तथा निर्वासित भारतियों को देश वापस आने की अनुमति दी जाए (All political prisoners should be released and their political cases should be dropped)

10) गुप्तचर पुलिस हटा दिया जाए अथवा उस पर जनता का नियंत्रण रहे (Secret police should be either abolished or placed under the public)

11) आत्मरक्षा के लिए हथियार की अनुमति दी जाए (Arms for self protection be permitted)

गाँधीजी के इन ग्यारह सूत्रीय मांगों (eleven demands by Gandhiji) पर लॉर्ड इर्विन (Lord Irwin) ने कोई ध्यान नहीं दिया जिससे उनके मन में काफी निराशा हुई और उन्होंने डांडी यात्रा  के साथ सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारंभ किया क्योंकि अब सरकार के साथ समझौता की कोई गुंजाईश नहीं रही थी.

बेवेल योजना

बेवल योजना और शिमला सम्मलेन

लॉर्ड लिनलिथगो के स्थान पर अक्टूबर, 1943 में लॉर्ड वेबेल को गवर्नर जनरल के रूप में नियुक्त किया गया|लॉर्ड वेबेल ने उस समय के भारत में उपस्थित गतिरोध को दूर करने के लिए प्रयास किया| वे मार्च 1945 में विचार विमर्श के लिए इंग्लैंड गए| उन्होंने 14 जून को भारतीय राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए ब्रिटिश सरकार के एक प्रस्ताव, जिसे वेबेल योजना कहा गया,को भारतीय जनता के लिए जारी किया|

वेबेल योजना के प्रावधान

• केंद्र में नई कार्यकारी परिषद् का गठन करना,जिसमे वायसराय और कमांडर इन चीफ को छोड़कर अन्य सभी सदस्य भारतीय होंगें

• रक्षा को छोड़कर अन्य सभी विभाग भारतीय सदस्यों के नियंत्रण में रहेंगे

• प्रस्तावित कार्यकारी परिषद्, जिसमे 14 सदस्य शामिल होने थे, में मुस्लिमों,जोकि देश की कुल जनसंख्या के 25% ही थे, को उनके जनसंख्या अनुपात से अधिक अर्थात 6 सदस्यों को चुनने का अधिकार दिया गया|

कांग्रेस ने मांग की कि उसे कांग्रेस द्वारा परिषद् में नामित सदस्यों का चुनाव मुस्लिमों सहित किसी भी समुदाय के प्रतिनिधियों से करने का अधिकार प्रदान किया जाये|

शिमला सम्मलेन

• लॉर्ड वेबेल ने वेबेल योजना के प्रावधानों पर विचार करने के लिए ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला में 21 भारतीय नेताओं का एक सम्मलेन आयोजित किया|

• वेबेल योजना ऐसे भारतीय स्व-शासन पर सहमति बनाने के लिए आई थी जिसमे मुस्लिमों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व और दोनों समुदायों को उनके बहुमत वाले क्षेत्रों में बहुमत की शक्तियों को घटा दिया गया|

• वार्ता मुस्लिम प्रतिनिधियों के चयन के मुद्दे को लेकर अटक गयी| जिन्ना ने कहा कि कोई भी गैर-लीग मुस्लिम कार्यकारी परिषद् में शामिल नहीं होगा क्योकि भारतीय मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार सिर्फ मुस्लिम लीग को है, जबकि कांग्रेस का मानना था कि उसे मुस्लिमों सहित किसी भी संप्रदाय के लोगों को कार्यकारी परिषद् में शामिल करने का अधिकार है|

• वेबेल ने कार्यकारी परिषद् के कुल 14 स्थानों में से 6 स्थान मुस्लिमों को प्रदान किये और ब्रिटिशों ने उन्हें किसी भी ऐसे संवैधानिक प्रस्ताव, जो उनके हित में न हो, के सन्दर्भ में वीटो शक्ति प्रदान की| मुस्लिमों की जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या की 25% थी| अतः इन अतार्किक मांगों का कांग्रेस ने विरोध किया| मुस्लिम लीग भी झुकने को तैयार नहीं थी और वेबेल योजना समाप्त हो गयी|

निष्कर्ष

वेबेल योजना उस समय भारत में उपस्थित राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए तैयार किया गया था लेकिन मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेताओं के बीच समझौता न हो पाने के कारण उन्होंने प्रस्ताव का बहिष्कार कर दिया और अंततः शिमला सम्मलेन में प्रस्ताव समाप्त हो गया|

बक्सर की लड़ाई ( पूर्णिया यादव महाराजा जो बंगाल नबाब के सेनापति) 22-oct-1764


बक्सर का युद्ध बंगाल के नवाब मीर कासिम,अवध के नवाब सुजाउद्दौला व मुग़ल शासक शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना और अंग्रेजों के मध्य लड़ा गया था | यही वह निर्णायक युद्ध था जिसने अंग्रेजों को अगले दो सौ वर्षों के लिए भारत के शासक के रूप में स्थापित कर दिया| यह युद्ध अंग्रेजों द्वारा फरमान और दस्तक के दुरुपयोग और उनकी विस्तारवादी व्यापारिक आकांक्षाओं का परिणाम था|

22 अक्टूबर,1764 ई.   को लड़े गए बक्सर के युद्ध में संयुक्त भारतीय सेना की पराजय हुई| बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई |1765 ई. में सुजाउद्दौला और शाह आलम ने इलाहाबाद में कंपनी गवर्नर क्लाइव के साथ संधि पर हस्ताक्षर किये| इस संधि के तहत,कंपनी को बंगाल,बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार प्रदान कर दिए गए, जिसने कंपनी को इन क्षेत्रों से राजस्व वसूली के लिए अधिकृत कर दिया|कंपनी ने अवध के नवाब से कड़ा और इलाहाबाद के क्षेत्र लेकर मुग़ल शासक को सौंप दिए,जोकि अब इलाहाबाद में अंग्रेजी सेना के संरक्षण में रहने लगा था|कंपनी ने मुगल शासक को प्रतिवर्ष 26 लाख रुपये के भुगतान का वादा किया लेकिन थोड़े समय बाद ही कंपनी द्वारा इसे बंद कर दिया गया|कंपनी ने नवाब को किसी भी आक्रमण के विरुद्ध सैन्य सहायता प्रदान करने का वादा किया लेकिन इसके लिए नवाब को भुगतान करना होगा|अतः अवध का नवाब कंपनी पर निर्भर हो गया| इसी बीच मीर जाफर को दोबारा बंगाल का नवाब बना दिया गया| उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र को नवाब की गद्दी पर बैठाया गया| कंपनी के अफसरों ने नवाब से धन ऐंठ कर व्यक्तिगत रूप से काफी लाभ कमाया|

युद्ध के लिए जिम्मेदार घटनाएँ

  • ब्रिटिशों द्वारा दस्तक और फरमान का दुरुपयोग,जिसने मीर कासिम के प्राधिकार और प्रभुसत्ता को चुनौती दी
  • ब्रिटिशों के आतंरिक व्यापार पर सभी तरह के शुल्कों की समाप्ति
  • कंपनी के कर्मचारियों का दुर्व्यवहार : उन्होंने भारतीय दस्तकारों, किसानोंऔर व्यापारियों को अपना माल सस्ते में बेचने के लिए बाध्य किया और रिश्वत व उपहार लेने की परंपरा की भी शुरुआत कर दी|
  • ब्रिटिशों का लुटेरों जैसा व्यवहार जिसने न केवल व्यापार के नियमों का उल्लंघन किया बल्कि नवाब के प्राधिकार को भी चुनौती दी|

निष्कर्ष

बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई | ब्रिटिशों की रूचि तीन तटीय क्षेत्रों कलकत्ता ,बम्बई और मद्रास में अधिक थी| अंग्रेजों व फ्रांसीसियों के बीच लड़े  गए कर्नाटक युद्ध ,प्लासी के युद्ध और बक्सर के युद्ध ने भारत में ब्रिटिश सफलता के दौर को प्रारंभ कर दिया|1765 ई. तक ब्रिटिश बंगाल,बिहार और उड़ीसा के वास्तविक शासक बन गए| अवध और कर्नाटक के नवाब(जिसे उन्होंने ही नवाब बनाया था) उन पर निर्भर हो गए|

बंगाल ( पश्चिम बंगाल भारत में और पूर्व बंगाल आज का बांग्लादेश)😢😢

बंगाल

औरंगजेब द्वारा मुर्शिद कुली खां को बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया था। गवर्नर मुर्शिद कुली खां (1717-1727 ई.) ने बंगाल की राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित कर दी। उसने अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजस्व वसूली को रोककर अपने राज्य के हितों की रक्षा का प्रयास किया। उसका दामाद शुजाउद्दीन खां उसका उत्तराधिकारी बना जिसने बिहार के सूबे  को बंगाल राज्य में मिला लिया। मुर्शिद कुली खां और उसके उत्तराधिकारी नवाबों द्वारा बंगाल, बिहार और उड़ीसा का प्रशासन स्वतंत्र शासकों की तरह किया गया फिर भी उन्होंने मुग़ल शासक को राजस्व भेजना जारी रखा। बंगाल के नवाबों का विवरण निम्नलिखित है-

  • मुर्शिद कुली खां  को औरंगजेब द्वारा बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया था। उसने अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजस्व वसूली को रोककर अपने राज्य के हितों की रक्षा का प्रयास किया।
  • शुजाउद्दीन खां  जो मुर्शिद कुली खां का दामाद था ,उसका उत्तराधिकारी बना और उसने बिहार के सूबे  को बंगाल राज्य में मिला लिया।
  • सरफराज खां  ,जो शुजा का पुत्र था , ने आलम-उद-दौला हैदर जंग की उपाधि धारण की ।
  • अली बर्दी खां  ने मुग़ल शासक को दो करोड़ रुपये का भुगतान कर फरमान प्राप्त किया और अपने शासन को वैधानिक आधार प्रदान किया। उसने अपनी सबसे छोटी पुत्री के पुत्र सिराज-उद-दौला  को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया ।
  • सिराज-उद-दौला  ने कलकत्ता में अंग्रेजों को अपनी फैक्ट्रियों की किलेबंदी करने से रोका लेकिन अंग्रेजों द्वारा उसके आदेश को न मानने के परिणामस्वरूप अंग्रेजों और सिराज-उद-दौला के मध्य प्लासी का युद्ध लड़ा गया।
  • मीर कासिम ने बर्दवान,मिदनापुर  और चिटगांव की जमींदारी अंग्रेजों को सौंप दी। उसने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए अनेक राजस्व और सैन्य सुधारों को लागू किया ।
  • मीर जाफर ने बंगाल,बिहार और उड़ीसा में मुक्त व्यापार करने का अधिकार और चौबीस परगना की ज़मींदारी  ब्रिटिशों को प्रदान कर दी। मीर कासिम से युद्ध प्रारंभ होने के बाद 1763 ई.में उसे ब्रिटिशों द्वारा दुबारा गद्दी पर बिठाया गया।
  • नज़्म-उद-दौला  मीर जाफर का पुत्र था और द्वैध शासनकाल के दौरान अंग्रेजों के हाथों की  कठपुतली मात्र था।

निष्कर्ष

औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य के पतन के साथ ही बंगाल मुर्शिद कुली खां के नेतृत्व  से स्वतंत्र हो गया। मुर्शिद कुली खां ने अपनी योग्य प्रबंधन क्षमता के द्वारा बंगाल को समृद्धता के शिखर तक पहुँचाया।

यूरोप का पुनर्जागरण

यूरोप का पुनर्जागरण - Renaissance in Europe

पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) का शाब्दिक अर्थ होता है, 'फिर से जागना”. चौदहवीं और सोलहवीं शताब्दी के बीच यूरोप में जो सांस्कृतिक प्रगति हुई उसे ही 'पुनर्जागरण” कहा जाता है. इसके फलस्वरूप जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नवीन चेतना आई. यह आन्दोलन केवल पुराने ज्ञान के उद्धार तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इस युग में कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन प्रयोग हुए. नए अनुसंधान हुए और ज्ञान-प्राप्ति के नए-नए तरीके खोज निकाले गए. इसने परलोकवाद और धर्मवाद के स्थान पर मानववाद को प्रतिष्ठित किया. पुनर्जागरण वह आन्दोलन था जिसके द्वारा पश्चिम के राष्ट्र मध्ययुग से निकलकर आधुनिक युग के विचार और जीवन-शैली अपनाने लगे. यूरोप के निवासियों ने भौगोलिक, व्यापारिक, सामजिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्रों में प्रगति की. इस युग में लोगों ने मध्यकालीन संकीर्णता छोड़कर स्वयं को नयी खोजों, नवीनतम विचारों तथा सामजिक, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक उन्नति से सुसज्जित किया. प्रत्येक क्षेत्र में सर्वथा नवीन दृष्टिकोण, आदर्श और आशा का संचार हुआ. साहित्य, कला, दर्शन, विज्ञान, वाणिज्य-व्यवसाय, समाज और राजनीति पर से धर्म का प्रभाव समाप्त हो गया. इस प्रकार पुनर्जागरण उस बौद्धिक आन्दोलन का नाम है जिसने रोम और यूनान की प्राचीन सभ्यता-संस्कृति का पुनरुद्धार कर नयी चेतना को जन्म दिया.

यूरोप में पुनर्जागरण के कारण (Causes of Renaissance in Europe)

1. व्यापार तथा नगरों का विकास 

पुनर्जागरण का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण वाणिज्य-व्यापार का विकास था. नए-नए देशों के साथ लोगों का व्यापारिक सम्बन्ध कायम हुआ और उन्हें वहाँ की सभ्यता-संस्कृति को जानने का अवसर मिला. व्यापार के विकास ने एक नए व्यापारी वर्ग को जन्म दिया. व्यापारी वर्ग का कटु आलोचक और कट्टर विरोधी था. व्यापारी वर्ग ने चिंतकों, विचारकों, साहित्यकारों और वैज्ञानिकों को प्रश्रय दिया. इस प्रकार व्यापारी वर्ग की छत्रछाया में ज्ञान-विज्ञान की प्रगति हुई. व्यापार के विकास से नए-नए शहर बसे. इन शेरोन में व्यापार के सिलसिले में अनेक देशों के व्यापारी आते थे. उनके बीच विचारों का आदान-प्रदान होता था. विचारों के आदान-प्रदान से जनसाधारण का बौद्धिक विकास हुआ.

2. पूरब से संपर्क

जिस समय यूरोप के निवासी बौद्धिक दृष्टि से पिछड़े हुए थे, अरब वाले एक नयी सभ्यता-संस्कृति को जन्म दे चुके थे. अरबों का साम्राज्य स्पेन और उत्तरी अफ्रीका तक फैला हुआ था. वे अपने साम्राज्य-विस्तार के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान को भी फैला रखे थे. अरबों से सम्पर्क के कारण पश्चिम वालों को भी लाभ हुआ.

3. मध्यकालीन पंडितपंथ की परम्परा

अरबों से प्राप्त ज्ञान को आधार मानकर यूरोप के विद्वानों ने अरस्तू के अध्ययन पर जोर दिया. उन्होंने पंडितपंथ परम्परा चलाई. इसमें प्राचीनता तथा प्रामाणिकतावाद की प्रधानता थी. प्राचीन साहित्य को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया. विभिन्न भाषाओं में प्राचीन साहित्य का अनुवाद किया गया. इस विचार-पद्धति में अरस्तू के दर्शन की प्रधानता थी.

4. कागज़ तथा मुद्रण कला का आविष्कार

पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) को आगे बढ़ाने में कागज़ और मुद्रणकला का योगदान महत्त्वपूर्ण था. कागज़ और मुद्रणकला के आविष्कार से पुस्तकों की छपाई बड़े पैमाने पर होने लगी. अब साधारण व्यक्ति भी सस्ती दर पर पुस्तकें खरीदकर पढ़ सकता था. पुस्तकें जनसाधारण की भाषा में लिखी जाती थी जिससे ज्ञान-विज्ञान का लाभ साधारण लोगों तक पहुँचने लगा. लोग विभिन्न विचारकों और दार्शनिकों के कृतित्व से अवगत होने लगे. उनमें बौद्धिक जागरूकता आई.

5. मंगोल साम्राज्य का सांस्कृतिक महत्त्व

मंगोल सम्राट कुबलाई खाँ का दरबार पूरब और पश्चिम के विद्वानों का मिलन-स्थल था. उसका दरबार देश-विदेश के विद्वानों, धर्मप्रचारकों और व्यापारियों से भरा रहता था. इन विद्वानों के बीच पारस्परिक विचार-विनमय से ज्ञान-विज्ञान की प्रगति में सहायता मिली. यूरोप के यात्रियों ने गनपाउडर, कागज़ और जहाजी कम्पास की निर्माण-विधि सीखकर अपने देश में इनके प्रयोग का प्रयत्न किया. इस प्रकार मंगोल साम्राज्य ने पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) को आगे बढ़ाने में वाहन का काम किया.

6. कुस्तुनतुनिया का पतन

1453 ई. में उस्मानी तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया. कुस्तुनतुनिया ज्ञान-विज्ञान का केंद्र था. तुर्कों की विजय के बाद कुस्तुनतुनिया के विद्वान् भागकर यूरोप के देशों में शरण लिए. उन्होंने लोगों का ध्यान प्राचीन साहित्य और ज्ञान की ओर आकृष्ट किया. इससे लोगों में प्राचीन ज्ञान के प्रति श्रद्धा के साथ-साथ नवीन जिज्ञासा उत्पन्न हुई. यही जिज्ञासा पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) की आत्मा थी. कुस्तुनतुनिया के पतन का एक और महत्त्वपूर्ण प्रभाव हुआ. यूरोप और पूर्वी देशों के बीच व्यापार का स्थल मार्ग बंद हो गया. अब जलमार्ग से पूर्वी देशों में पहुँचने का प्रयास होने लगा. इसी कर्म में कोलंबस, वास्कोडिगामा और मैगलन ने अनेक देशों का पता लगाया.

7. प्राचीन साहित्य की खोज

तेरहवीं तथा चौदहवीं शताब्दी में विद्वानों ने प्राचीन साहित्य को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया. इनमें पेट्रार्क (Petrarch), दांते (Dante Alighieri), और बेकन के नाम उल्लेखनीय है. विद्वानों ने प्राचीन ग्रन्थों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया और लोगों को गूढ़ विषयों से परिचित कराने का प्रयास किया.

8. मानववादी विचारधारा का प्रभाव

यूरोप की मध्यकालीन सभ्यता कत्रिमता और कोरे आदर्श पर आधारित थी. सांसारिक जीवन को मिथ्या बतलाया जाता था. यूरोप के विश्वविद्यालयों में यूनानी दर्शन का अध्ययन-अध्यापन होता था. रोजर बेकन (Roger Bacon) ने अरस्तू की प्रधानता का विरोध किया और तर्कवाद के सिद्धांत (the principle of rationalism) का प्रतिपादन किया. इससे मानववाद का विकास हुआ. मानववादियों ने चर्च और पादरियों के कट्टरपण की आलोचना की.

9. धर्मयुद्ध का प्रभाव 

लगभग दो सौ वर्षों तक पूरब और पश्चिम के बीच धर्मयुद्ध चला. धर्मयुद्ध के योद्धा पूर्वी सभ्यता से प्रभावित हुए. आगे चलकर इन्हीं योद्धाओं ने यूरोप में पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) की नींव मजबूत की.

10. सामंतवाद का ह्रास

सामंती प्रथा के कारण किसानों, व्यापारियों, कलाकारों और साधारण जनता को स्वतंत्र चिंतन का अवसर नहीं मिलता था. सामंती युद्धों के कारण वातावरण हमेशा विषाक्त रहता था. किन्तु सामंती प्रथा के पतन से जन-जीवन संतुलित हो गया. शान्ति तथा व्यवस्था कायम हुई. शांतिपूर्ण वातावरण में लोग साहित्य, कला एवं व्यापार की प्रगति की और ध्यान देने लगे. शान्तिपूर्ण वातावरण में लोग साहित्य, कला और व्यापार की प्रगति की ओर ध्यान देने लगे. सामंतवाद का ह्रास का महत्त्वपूर्ण परिणाम राष्ट्रीय राज्यों का विकास था. लोगों में राष्ट्रीय भावना का जन्म हुआ.

बोस्टन की चाय पार्टी

बोस्टन की चाय-पार्टी की घटना क्या थी?

ब्रिटिश संसद ने चाय के व्यापार के सम्बन्ध में नया कानून बनाया था. इस कानून के अनुसार ईस्ट इंडिया कंपनी को अमेरिका में चाय भेजने की अनुमति दी गई थी. चाय के व्यापार को बढ़ाने के लिए मूल्य में कमी की गई थी. फलस्वरूप अमेरिकनों को सस्ती चाय मिल जाती थी और ईस्ट इंडिया कंपनी को भी आर्थिक लाभ हो जाता था. लेकिन अमेरिकन उपनिवेशवासियों ने इसे ब्रिटिश सरकार की चाल समझा. उन्होंने सोचा कि यदि संसंद व्यापारिक मामलों पर एकाधिकार कायम कर लेगी तो इससे उपनिवेश के व्यापार को हानि होगी. ईस्ट इंडिया कंपनी के कुछ जहाज बोस्टन बंदरगाह में ठहरे हुए थे. बोस्टन के नागरिकों ने जहाज़ों को लूट लिया और लगभग 342 चाय के बक्सों को समुद्र में फेंक दिया. इसे ही 'बोस्टन की चाय-पार्टी दुर्घटना (Boston tea-party incident)” कहा जाता है.

बोस्टन की चाय-पार्टी घटना के परिणाम

इस घटना से इंग्लैंड में उत्तेजना फैली. ब्रिटिश संसद ने दमन की नीति का समर्थन किया और मेसाचुसेट्स एक्ट (Massachusetts Act) पास किया. इस कानून के द्वारा ब्रिटिश सैनिक कमांडर को अमेरिकन प्रान्तों का राज्यपाल बनाया गया. सभी प्रकार के वाणिज्य के लिए बोस्टन का बंदरगाह बंद कर दिया गया. क्यूबेक एक्ट (Quebec Act) के अनुसार कनाडा की सीमा ओहायो नदी तक बढ़ा दी गई. रोमन कैथलिकों को विशेष सुविधा दी गई. कैथलिक चर्च की प्रधानता कायम होने से प्यूरिटनों को कष्ट हुआ और वे अंसतुष्ट हुए.

ब्रिटिश सरकार की दमन-नीति का प्रतिकूल प्रभाव उपनिवेशों पर पड़ा. वे आपस में संगठित हो गए. 5 सितम्बर, 1774 ई. को फिलेडेलफिया में पहली कांग्रेस की बैठक हुई. उपनिवेशवासियों ने अपने अधिकारों का एक घोषणापत्र तैयार किया. ब्रिटिश संसद द्वारा पारीय कानूनों को समाप्त करने की माँग की गई. ब्रिटेन के साथ आयात-निर्यात बंद करने का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ. लॉर्ड नॉर्थ ने उपनिवेशों के साथ समझौता का प्रस्ताव रखा लेकिन लॉर्ड नॉर्थ का प्रस्ताव देर से आया तबतक युद्ध की घोषणा हो चुकी थी. इसे ही अमेरिका का स्वातंत्र्य-संग्राम का जाता है.

1st world war प्रथम विश्व युद्ध

प्रथम विश्वयुद्ध - First World War [1914-18]

प्रथम विश्वयुद्ध की भूमिका (Background of First World War)

1914-18 ई. का प्रथम विश्वयुद्ध (First World War) साम्राज्यवादी राष्ट्रों की पारस्परिक प्रतिस्पर्द्धा का परिणाम था. प्रथम विश्वयुद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण गुप्त संधि प्रणाली थी. यूरोप में गुप्त संधि की प्रथा जर्मन चांसलर बिस्मार्क ने शुरू की थी. इसने यूरोप  को दो विरोधी गुटों में विभाजित कर दिया. दो गुटों के बीच एक-दूसरे के प्रति संदेह और घृणा का भाव बढ़ता गया. राजनीतिक वातावरण दूषित हो गया. 1879 ई. में जर्मनी ने ऑस्ट्रिया-हंगरी (Austria-Hungary) के साथ गुप्त संधि की. 1882 ई. में इटली भी इस गुट में शामिल हो गया. इस प्रकार त्रिगुट का निर्माण हुआ. 1887 ई. में जर्मनी और रूस दोनों मिल गए. विश्व राजनैतिक अखाड़े में फ्रांस अकेला पड़ गया. फ्रांस को अपमानित करने के लिए ही जर्मनी ने इन देशों के साथ संधि की थी. फ्रांस प्रतिशोध की आग में अन्दर ही अन्दर जल रहा था. इसलिए 1894 ई. में फ्रांस ने रूस से संधि की. उधर इंग्लैंड ने 1902 ई. में जापान के साथ, 1904 ई. में फ्रांस और 1907 ई. में रूस के साथ संधि कर ली.  इस प्रकार दो राजनीतिक खेमों में बँटा यूरोप युद्ध का अखाड़ा हो गया.

एक ओर इंग्लैंड, फ्रांस, रूस और जापान का त्रिगुट था और दूसरा गुट जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी, इटली और तुर्की का था. दोनों के बीच हथियारबंदी की होड़ चल रही थी.

1912-13 ई. के बाल्कन युद्धों (War in the Balkans) ने तो प्रथम विश्वयुद्ध को अनिवार्य बना दिया. यूरोप के अनेक राष्ट्र बाल्कन क्षेत्र में अपने साम्राज्य के विस्तार का प्रयास कर रहे थे. ऑस्ट्रिया और रूस भी इसी क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहते थे. बाल्कन क्षेत्र में साम्राज्यवादी प्रतिद्वंदिता ने विश्वयुद्ध की भूमिका तैयार की.

गुप्त संधियों के अलावे प्रथम विश्व युद्ध के अनेक कारण गिनाये जा सकते हैं -

Causes of World War I

1. उग्र राष्ट्रीयता (Furious Nationality)

उग्र राष्ट्रीयता के कारण भी प्रथम विश्वयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई थी. बड़े एवं शक्तिशाली राष्ट्रों के अतिरिक्त यूनान और सर्बिया जैसे छोटे-छोटे देशों पर भी उग्र राष्ट्रीयता का नशा चढ़ा हुआ था. वे वृहत्तर यूनान, वृहत्तर बुल्गेरिया और वृहत्तर सर्बिया की मांग कर रहे थे. चेक, स्लाव जातियाँ अपनी राष्ट्रीय आकांक्षा को पूरा करने के लिए यूरोप में अशांति उत्पन्न कर रही थीं. जब यूरोप के साम्राज्यवादी राष्ट्र अपनी सभ्यता-संस्कृति और धर्म का पाठ पढ़ाने के लिए संसार में आगे बढ़े तो उनमें संघर्ष अनिवार्य हो गया.

2. आर्थिक प्रतिद्वंदिता (Economic Rivalry)

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप यूरोप के राष्ट्रों के आर्थिक जीवन में महान् परिवर्तन हुआ. पूंजीवाद की उत्पत्ति हुई. पूँजीवादी अतिरिक्त पूँजी लगाने के लिए उपनिवेश की माँग करने लगे. बढ़ती हुई जनसंख्या को बसाने के लिए भी उपनिवेश की आवाश्यकता थी. इस समस्या का समाधान साम्राज्य-विस्तार से ही संभव था. इसलिए उपनिवेश को लेकर ही संघर्ष प्रारम्भ हुआ. पूँजीवादी राष्ट्रों के बीच आर्थिक महत्त्वाकांक्षा के कारण घृणा और अविश्वास का वातावरण तैयार हो गया.

3. साम्राज्यवादी होड़ (Imperialist Competition)

साम्राज्यवादी होड़ प्रथम विश्वयुद्ध का एक आधारभूत कारण था. औद्योगिक क्रान्ति के कारण यूरोपीय देशों के सामने व्यावसायिक माल की खपत और कल-कारखानों को चलाने के लिए कच्चे माल की प्राप्ति की समस्या उत्पन्न हुई. इस समस्या का समाधान साम्राज्य-विस्तार में दिखाई दिया. इसलिए इंग्लैंड, फ्रांस, हॉलैंड, बेल्जियम, पुर्तगाल, डेनमार्क, इटली अपना साम्राज्य बढ़ाने का प्रयत्न करने लगे. इससे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विता बढ़ी. अफ्रीका और चीन इस प्रतिद्वंद्विता का शिकार पहले हुए. सूडान को लेकर इंग्लैंड और फ्रांस के बीच युद्ध छिड़ते-छिड़ते बचा.

4. सैन्यवाद और शस्त्रीकरण (Militarism and Armament)

उग्र राष्ट्रीयता और साम्राज्यवादी मनोवृत्ति ने यूरोप के राष्ट्रों का ध्यान सैन्यवाद और शस्त्रीकरण की ओर खींचा. फ्रांस, जर्मनी आदि साम्राज्यवादी राष्ट्र अपनी आमदनी का 85% सैनिक तैयारी पर खर्च करने लगे. भय तथा संदेह ने प्रत्येक राष्ट्र को युद्ध-सामग्री जमा करने के लिए उत्प्रेरित किया और इस तरह प्रत्येक देश युद्ध के लिए तैयार हो गया.

5. समाचारपत्रों का झूठा प्रचार (Newspapers' False Propaganda)

प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व सभी देशों के समाचारपत्र एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे थे. इससे एक-दूसरे की राष्ट्रीय भावना को ठेस लग रही थी. कभी-कभी दो राष्ट्रों के बीच विवादास्पद प्रश्न पर समाचारपत्रों में इस तरह की आलोचना की जाती थी कि जनता पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता था.

6. फ्रांस की बदले की भावना (France's Revenge Spirit)

जर्मनी का एकीकरण फ्रांस को पराजित कर के पूरा किया गया था. फ्रांस को अल्सस-लारेन का प्रदेश खोना पड़ा था. फ्रांस राष्ट्रीय अपमान को भूला नहीं था और वह जर्मनी से बदला लेना चाहता था. जर्मनी मोरक्को में फ्रांस का विरोध कर रहा था. इससे दोनों में मनमुटाव पैदा हुआ.

7. अंतर्राष्ट्रीय अराजकता (International Anarchy)

इस समय यूरोप में एक प्रकार से अंतर्राष्ट्रीय अराजकता फ़ैल चुकी थी. प्रत्येक राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा था. अपने हितों की रक्षा के लिए कोई भी देश अपने विरोधी के साथ संधि कर सकता था. स्वार्थी राष्ट्र की इस नीति ने विरोधाभास को जन्म दिया. इस परिस्थिति को रोकने के लिए कोई अंतर्राष्ट्रीय संस्था नहीं थी जिसके अभाव के कारण सभी राष्ट्र मनमानी कर रहे थे.

8. सराजेवो हत्याकांड (Sarajevo Assassination)

युद्ध का तात्कालिक कारण ऑस्ट्रिया (Austria) के राजकुमार आर्कड्यूक फ्रान्ज़ (Archduke Franz) की हत्या थी. राजकुमार की हत्या बोस्निया (Bosnia) की राजधानी सराजेवो (Sarajevo) में हुई थी. ऑस्ट्रिया की सरकार ने राजकुमार की हत्या के लिए सर्बिया को उत्तरदाई ठहराया और उसके समक्ष 12 कड़ी शर्तें रखीं. सर्बिया की सरकार ने सभी शर्तों को मानने में अपनी असमर्थता प्रकट की. सर्बिया की सरकार समस्या का समाधान महाशक्तियों के सम्मलेन द्वारा करना चाहती थी. किन्तु ऑस्ट्रिया के राजनीतिज्ञों और सैनिक पदाधिकारियों ने सर्बिया की प्रार्थना पर ध्यान नहीं दिया. ऑस्ट्रिया की सरकार ने 28 जुलाई, 1914 ई. को युद्ध की घोषणा कर अपनी सेना को सर्बिया पर आक्रमण करने का आदेश दिया. इस घटना से ही प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई. युद्ध की समाप्ति 11 नवम्बर, 1918 को हुई.

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...