महात्मा गांधी की 11 सूत्रीय योजना

महात्मा गाँधी की ग्यारह सूत्री योजना - 11 Demands by Gandhi

महात्मा गाँधी ने हिन्सात्मक घटना के चलते (चौरी-चौरा नामक स्थान पर आन्दोलनकारियों ने एक थानेदार और 21 सिपाहियों को जलाकर मार डाला) असहयोग आंदोलन को बीच में ही स्थगित कर दिया क्योंकि वे अहिंसात्मक आंदोलन के पक्ष में थे.  असहयोग आन्दोलन की असफलता के बाद गाँधीजी 11 फरवरी, 1930 से सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करना चाहते थे. लेकिन देश की स्थिति का मूल्यांकन करते हुए उन्होंने एक बार सरकार से समझौता करने का प्रयत्न किया और वायसराय लॉर्ड इरविन (Lord Irwin) को एक पत्र लिखकर निम्नलिखित ग्यारह सूत्री माँगें  (11 Demands by Gandhi) पेश की -

महात्मा गाँधी की ग्यारह सूत्री योजना - 11 Demands

1) पूर्णरूपेण मदिरा निषेध (Total Prohibition)

2) विनिमय की दर घटाकर एक शिलिंग चार पेंस कर दी जाए (Exchange Rate should be reduced)

3) भूमि लगान आधा हो और उस पर काउंसिल का नियोजन रहे (Land rate should be halved)

4) नमक कर को समाप्त की जाए (Salt tax should be abolished)

5) सेना सम्बन्धी व्यय में कम-से-कम 50% की कमी हो (Defence expenditure should be reduced by 50%)

6) बड़ी-बड़ी सरकारी नौकरियों का वेतन आधा कर दिया गया (Salaries of top Govt. posts should be halved)

7) विदेशी वस्त्रों के आयात पर निषेध कर लगे (Import of foreign textile should be banned)

8) भारतीय समुद्र तट केवल भारतीय जहाज़ों के लिए सुरक्षित रहे और इसके लिए कानून का निर्माण हो (Indian sea coast should be reserved for Indian ships only)

9) सभी राजनीतिक बंदियों को छोड़ दिया जाए, राजनीतिक मामले उठा लिए जाए तथा निर्वासित भारतियों को देश वापस आने की अनुमति दी जाए (All political prisoners should be released and their political cases should be dropped)

10) गुप्तचर पुलिस हटा दिया जाए अथवा उस पर जनता का नियंत्रण रहे (Secret police should be either abolished or placed under the public)

11) आत्मरक्षा के लिए हथियार की अनुमति दी जाए (Arms for self protection be permitted)

गाँधीजी के इन ग्यारह सूत्रीय मांगों (eleven demands by Gandhiji) पर लॉर्ड इर्विन (Lord Irwin) ने कोई ध्यान नहीं दिया जिससे उनके मन में काफी निराशा हुई और उन्होंने डांडी यात्रा  के साथ सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारंभ किया क्योंकि अब सरकार के साथ समझौता की कोई गुंजाईश नहीं रही थी.

बेवेल योजना

बेवल योजना और शिमला सम्मलेन

लॉर्ड लिनलिथगो के स्थान पर अक्टूबर, 1943 में लॉर्ड वेबेल को गवर्नर जनरल के रूप में नियुक्त किया गया|लॉर्ड वेबेल ने उस समय के भारत में उपस्थित गतिरोध को दूर करने के लिए प्रयास किया| वे मार्च 1945 में विचार विमर्श के लिए इंग्लैंड गए| उन्होंने 14 जून को भारतीय राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए ब्रिटिश सरकार के एक प्रस्ताव, जिसे वेबेल योजना कहा गया,को भारतीय जनता के लिए जारी किया|

वेबेल योजना के प्रावधान

• केंद्र में नई कार्यकारी परिषद् का गठन करना,जिसमे वायसराय और कमांडर इन चीफ को छोड़कर अन्य सभी सदस्य भारतीय होंगें

• रक्षा को छोड़कर अन्य सभी विभाग भारतीय सदस्यों के नियंत्रण में रहेंगे

• प्रस्तावित कार्यकारी परिषद्, जिसमे 14 सदस्य शामिल होने थे, में मुस्लिमों,जोकि देश की कुल जनसंख्या के 25% ही थे, को उनके जनसंख्या अनुपात से अधिक अर्थात 6 सदस्यों को चुनने का अधिकार दिया गया|

कांग्रेस ने मांग की कि उसे कांग्रेस द्वारा परिषद् में नामित सदस्यों का चुनाव मुस्लिमों सहित किसी भी समुदाय के प्रतिनिधियों से करने का अधिकार प्रदान किया जाये|

शिमला सम्मलेन

• लॉर्ड वेबेल ने वेबेल योजना के प्रावधानों पर विचार करने के लिए ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला में 21 भारतीय नेताओं का एक सम्मलेन आयोजित किया|

• वेबेल योजना ऐसे भारतीय स्व-शासन पर सहमति बनाने के लिए आई थी जिसमे मुस्लिमों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व और दोनों समुदायों को उनके बहुमत वाले क्षेत्रों में बहुमत की शक्तियों को घटा दिया गया|

• वार्ता मुस्लिम प्रतिनिधियों के चयन के मुद्दे को लेकर अटक गयी| जिन्ना ने कहा कि कोई भी गैर-लीग मुस्लिम कार्यकारी परिषद् में शामिल नहीं होगा क्योकि भारतीय मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार सिर्फ मुस्लिम लीग को है, जबकि कांग्रेस का मानना था कि उसे मुस्लिमों सहित किसी भी संप्रदाय के लोगों को कार्यकारी परिषद् में शामिल करने का अधिकार है|

• वेबेल ने कार्यकारी परिषद् के कुल 14 स्थानों में से 6 स्थान मुस्लिमों को प्रदान किये और ब्रिटिशों ने उन्हें किसी भी ऐसे संवैधानिक प्रस्ताव, जो उनके हित में न हो, के सन्दर्भ में वीटो शक्ति प्रदान की| मुस्लिमों की जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या की 25% थी| अतः इन अतार्किक मांगों का कांग्रेस ने विरोध किया| मुस्लिम लीग भी झुकने को तैयार नहीं थी और वेबेल योजना समाप्त हो गयी|

निष्कर्ष

वेबेल योजना उस समय भारत में उपस्थित राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए तैयार किया गया था लेकिन मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेताओं के बीच समझौता न हो पाने के कारण उन्होंने प्रस्ताव का बहिष्कार कर दिया और अंततः शिमला सम्मलेन में प्रस्ताव समाप्त हो गया|

बक्सर की लड़ाई ( पूर्णिया यादव महाराजा जो बंगाल नबाब के सेनापति) 22-oct-1764


बक्सर का युद्ध बंगाल के नवाब मीर कासिम,अवध के नवाब सुजाउद्दौला व मुग़ल शासक शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना और अंग्रेजों के मध्य लड़ा गया था | यही वह निर्णायक युद्ध था जिसने अंग्रेजों को अगले दो सौ वर्षों के लिए भारत के शासक के रूप में स्थापित कर दिया| यह युद्ध अंग्रेजों द्वारा फरमान और दस्तक के दुरुपयोग और उनकी विस्तारवादी व्यापारिक आकांक्षाओं का परिणाम था|

22 अक्टूबर,1764 ई.   को लड़े गए बक्सर के युद्ध में संयुक्त भारतीय सेना की पराजय हुई| बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई |1765 ई. में सुजाउद्दौला और शाह आलम ने इलाहाबाद में कंपनी गवर्नर क्लाइव के साथ संधि पर हस्ताक्षर किये| इस संधि के तहत,कंपनी को बंगाल,बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार प्रदान कर दिए गए, जिसने कंपनी को इन क्षेत्रों से राजस्व वसूली के लिए अधिकृत कर दिया|कंपनी ने अवध के नवाब से कड़ा और इलाहाबाद के क्षेत्र लेकर मुग़ल शासक को सौंप दिए,जोकि अब इलाहाबाद में अंग्रेजी सेना के संरक्षण में रहने लगा था|कंपनी ने मुगल शासक को प्रतिवर्ष 26 लाख रुपये के भुगतान का वादा किया लेकिन थोड़े समय बाद ही कंपनी द्वारा इसे बंद कर दिया गया|कंपनी ने नवाब को किसी भी आक्रमण के विरुद्ध सैन्य सहायता प्रदान करने का वादा किया लेकिन इसके लिए नवाब को भुगतान करना होगा|अतः अवध का नवाब कंपनी पर निर्भर हो गया| इसी बीच मीर जाफर को दोबारा बंगाल का नवाब बना दिया गया| उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र को नवाब की गद्दी पर बैठाया गया| कंपनी के अफसरों ने नवाब से धन ऐंठ कर व्यक्तिगत रूप से काफी लाभ कमाया|

युद्ध के लिए जिम्मेदार घटनाएँ

  • ब्रिटिशों द्वारा दस्तक और फरमान का दुरुपयोग,जिसने मीर कासिम के प्राधिकार और प्रभुसत्ता को चुनौती दी
  • ब्रिटिशों के आतंरिक व्यापार पर सभी तरह के शुल्कों की समाप्ति
  • कंपनी के कर्मचारियों का दुर्व्यवहार : उन्होंने भारतीय दस्तकारों, किसानोंऔर व्यापारियों को अपना माल सस्ते में बेचने के लिए बाध्य किया और रिश्वत व उपहार लेने की परंपरा की भी शुरुआत कर दी|
  • ब्रिटिशों का लुटेरों जैसा व्यवहार जिसने न केवल व्यापार के नियमों का उल्लंघन किया बल्कि नवाब के प्राधिकार को भी चुनौती दी|

निष्कर्ष

बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई | ब्रिटिशों की रूचि तीन तटीय क्षेत्रों कलकत्ता ,बम्बई और मद्रास में अधिक थी| अंग्रेजों व फ्रांसीसियों के बीच लड़े  गए कर्नाटक युद्ध ,प्लासी के युद्ध और बक्सर के युद्ध ने भारत में ब्रिटिश सफलता के दौर को प्रारंभ कर दिया|1765 ई. तक ब्रिटिश बंगाल,बिहार और उड़ीसा के वास्तविक शासक बन गए| अवध और कर्नाटक के नवाब(जिसे उन्होंने ही नवाब बनाया था) उन पर निर्भर हो गए|

बंगाल ( पश्चिम बंगाल भारत में और पूर्व बंगाल आज का बांग्लादेश)😢😢

बंगाल

औरंगजेब द्वारा मुर्शिद कुली खां को बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया था। गवर्नर मुर्शिद कुली खां (1717-1727 ई.) ने बंगाल की राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित कर दी। उसने अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजस्व वसूली को रोककर अपने राज्य के हितों की रक्षा का प्रयास किया। उसका दामाद शुजाउद्दीन खां उसका उत्तराधिकारी बना जिसने बिहार के सूबे  को बंगाल राज्य में मिला लिया। मुर्शिद कुली खां और उसके उत्तराधिकारी नवाबों द्वारा बंगाल, बिहार और उड़ीसा का प्रशासन स्वतंत्र शासकों की तरह किया गया फिर भी उन्होंने मुग़ल शासक को राजस्व भेजना जारी रखा। बंगाल के नवाबों का विवरण निम्नलिखित है-

  • मुर्शिद कुली खां  को औरंगजेब द्वारा बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया था। उसने अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजस्व वसूली को रोककर अपने राज्य के हितों की रक्षा का प्रयास किया।
  • शुजाउद्दीन खां  जो मुर्शिद कुली खां का दामाद था ,उसका उत्तराधिकारी बना और उसने बिहार के सूबे  को बंगाल राज्य में मिला लिया।
  • सरफराज खां  ,जो शुजा का पुत्र था , ने आलम-उद-दौला हैदर जंग की उपाधि धारण की ।
  • अली बर्दी खां  ने मुग़ल शासक को दो करोड़ रुपये का भुगतान कर फरमान प्राप्त किया और अपने शासन को वैधानिक आधार प्रदान किया। उसने अपनी सबसे छोटी पुत्री के पुत्र सिराज-उद-दौला  को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया ।
  • सिराज-उद-दौला  ने कलकत्ता में अंग्रेजों को अपनी फैक्ट्रियों की किलेबंदी करने से रोका लेकिन अंग्रेजों द्वारा उसके आदेश को न मानने के परिणामस्वरूप अंग्रेजों और सिराज-उद-दौला के मध्य प्लासी का युद्ध लड़ा गया।
  • मीर कासिम ने बर्दवान,मिदनापुर  और चिटगांव की जमींदारी अंग्रेजों को सौंप दी। उसने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए अनेक राजस्व और सैन्य सुधारों को लागू किया ।
  • मीर जाफर ने बंगाल,बिहार और उड़ीसा में मुक्त व्यापार करने का अधिकार और चौबीस परगना की ज़मींदारी  ब्रिटिशों को प्रदान कर दी। मीर कासिम से युद्ध प्रारंभ होने के बाद 1763 ई.में उसे ब्रिटिशों द्वारा दुबारा गद्दी पर बिठाया गया।
  • नज़्म-उद-दौला  मीर जाफर का पुत्र था और द्वैध शासनकाल के दौरान अंग्रेजों के हाथों की  कठपुतली मात्र था।

निष्कर्ष

औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य के पतन के साथ ही बंगाल मुर्शिद कुली खां के नेतृत्व  से स्वतंत्र हो गया। मुर्शिद कुली खां ने अपनी योग्य प्रबंधन क्षमता के द्वारा बंगाल को समृद्धता के शिखर तक पहुँचाया।

यूरोप का पुनर्जागरण

यूरोप का पुनर्जागरण - Renaissance in Europe

पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) का शाब्दिक अर्थ होता है, 'फिर से जागना”. चौदहवीं और सोलहवीं शताब्दी के बीच यूरोप में जो सांस्कृतिक प्रगति हुई उसे ही 'पुनर्जागरण” कहा जाता है. इसके फलस्वरूप जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नवीन चेतना आई. यह आन्दोलन केवल पुराने ज्ञान के उद्धार तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इस युग में कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन प्रयोग हुए. नए अनुसंधान हुए और ज्ञान-प्राप्ति के नए-नए तरीके खोज निकाले गए. इसने परलोकवाद और धर्मवाद के स्थान पर मानववाद को प्रतिष्ठित किया. पुनर्जागरण वह आन्दोलन था जिसके द्वारा पश्चिम के राष्ट्र मध्ययुग से निकलकर आधुनिक युग के विचार और जीवन-शैली अपनाने लगे. यूरोप के निवासियों ने भौगोलिक, व्यापारिक, सामजिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्रों में प्रगति की. इस युग में लोगों ने मध्यकालीन संकीर्णता छोड़कर स्वयं को नयी खोजों, नवीनतम विचारों तथा सामजिक, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक उन्नति से सुसज्जित किया. प्रत्येक क्षेत्र में सर्वथा नवीन दृष्टिकोण, आदर्श और आशा का संचार हुआ. साहित्य, कला, दर्शन, विज्ञान, वाणिज्य-व्यवसाय, समाज और राजनीति पर से धर्म का प्रभाव समाप्त हो गया. इस प्रकार पुनर्जागरण उस बौद्धिक आन्दोलन का नाम है जिसने रोम और यूनान की प्राचीन सभ्यता-संस्कृति का पुनरुद्धार कर नयी चेतना को जन्म दिया.

यूरोप में पुनर्जागरण के कारण (Causes of Renaissance in Europe)

1. व्यापार तथा नगरों का विकास 

पुनर्जागरण का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण वाणिज्य-व्यापार का विकास था. नए-नए देशों के साथ लोगों का व्यापारिक सम्बन्ध कायम हुआ और उन्हें वहाँ की सभ्यता-संस्कृति को जानने का अवसर मिला. व्यापार के विकास ने एक नए व्यापारी वर्ग को जन्म दिया. व्यापारी वर्ग का कटु आलोचक और कट्टर विरोधी था. व्यापारी वर्ग ने चिंतकों, विचारकों, साहित्यकारों और वैज्ञानिकों को प्रश्रय दिया. इस प्रकार व्यापारी वर्ग की छत्रछाया में ज्ञान-विज्ञान की प्रगति हुई. व्यापार के विकास से नए-नए शहर बसे. इन शेरोन में व्यापार के सिलसिले में अनेक देशों के व्यापारी आते थे. उनके बीच विचारों का आदान-प्रदान होता था. विचारों के आदान-प्रदान से जनसाधारण का बौद्धिक विकास हुआ.

2. पूरब से संपर्क

जिस समय यूरोप के निवासी बौद्धिक दृष्टि से पिछड़े हुए थे, अरब वाले एक नयी सभ्यता-संस्कृति को जन्म दे चुके थे. अरबों का साम्राज्य स्पेन और उत्तरी अफ्रीका तक फैला हुआ था. वे अपने साम्राज्य-विस्तार के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान को भी फैला रखे थे. अरबों से सम्पर्क के कारण पश्चिम वालों को भी लाभ हुआ.

3. मध्यकालीन पंडितपंथ की परम्परा

अरबों से प्राप्त ज्ञान को आधार मानकर यूरोप के विद्वानों ने अरस्तू के अध्ययन पर जोर दिया. उन्होंने पंडितपंथ परम्परा चलाई. इसमें प्राचीनता तथा प्रामाणिकतावाद की प्रधानता थी. प्राचीन साहित्य को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया. विभिन्न भाषाओं में प्राचीन साहित्य का अनुवाद किया गया. इस विचार-पद्धति में अरस्तू के दर्शन की प्रधानता थी.

4. कागज़ तथा मुद्रण कला का आविष्कार

पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) को आगे बढ़ाने में कागज़ और मुद्रणकला का योगदान महत्त्वपूर्ण था. कागज़ और मुद्रणकला के आविष्कार से पुस्तकों की छपाई बड़े पैमाने पर होने लगी. अब साधारण व्यक्ति भी सस्ती दर पर पुस्तकें खरीदकर पढ़ सकता था. पुस्तकें जनसाधारण की भाषा में लिखी जाती थी जिससे ज्ञान-विज्ञान का लाभ साधारण लोगों तक पहुँचने लगा. लोग विभिन्न विचारकों और दार्शनिकों के कृतित्व से अवगत होने लगे. उनमें बौद्धिक जागरूकता आई.

5. मंगोल साम्राज्य का सांस्कृतिक महत्त्व

मंगोल सम्राट कुबलाई खाँ का दरबार पूरब और पश्चिम के विद्वानों का मिलन-स्थल था. उसका दरबार देश-विदेश के विद्वानों, धर्मप्रचारकों और व्यापारियों से भरा रहता था. इन विद्वानों के बीच पारस्परिक विचार-विनमय से ज्ञान-विज्ञान की प्रगति में सहायता मिली. यूरोप के यात्रियों ने गनपाउडर, कागज़ और जहाजी कम्पास की निर्माण-विधि सीखकर अपने देश में इनके प्रयोग का प्रयत्न किया. इस प्रकार मंगोल साम्राज्य ने पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) को आगे बढ़ाने में वाहन का काम किया.

6. कुस्तुनतुनिया का पतन

1453 ई. में उस्मानी तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया. कुस्तुनतुनिया ज्ञान-विज्ञान का केंद्र था. तुर्कों की विजय के बाद कुस्तुनतुनिया के विद्वान् भागकर यूरोप के देशों में शरण लिए. उन्होंने लोगों का ध्यान प्राचीन साहित्य और ज्ञान की ओर आकृष्ट किया. इससे लोगों में प्राचीन ज्ञान के प्रति श्रद्धा के साथ-साथ नवीन जिज्ञासा उत्पन्न हुई. यही जिज्ञासा पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) की आत्मा थी. कुस्तुनतुनिया के पतन का एक और महत्त्वपूर्ण प्रभाव हुआ. यूरोप और पूर्वी देशों के बीच व्यापार का स्थल मार्ग बंद हो गया. अब जलमार्ग से पूर्वी देशों में पहुँचने का प्रयास होने लगा. इसी कर्म में कोलंबस, वास्कोडिगामा और मैगलन ने अनेक देशों का पता लगाया.

7. प्राचीन साहित्य की खोज

तेरहवीं तथा चौदहवीं शताब्दी में विद्वानों ने प्राचीन साहित्य को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया. इनमें पेट्रार्क (Petrarch), दांते (Dante Alighieri), और बेकन के नाम उल्लेखनीय है. विद्वानों ने प्राचीन ग्रन्थों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया और लोगों को गूढ़ विषयों से परिचित कराने का प्रयास किया.

8. मानववादी विचारधारा का प्रभाव

यूरोप की मध्यकालीन सभ्यता कत्रिमता और कोरे आदर्श पर आधारित थी. सांसारिक जीवन को मिथ्या बतलाया जाता था. यूरोप के विश्वविद्यालयों में यूनानी दर्शन का अध्ययन-अध्यापन होता था. रोजर बेकन (Roger Bacon) ने अरस्तू की प्रधानता का विरोध किया और तर्कवाद के सिद्धांत (the principle of rationalism) का प्रतिपादन किया. इससे मानववाद का विकास हुआ. मानववादियों ने चर्च और पादरियों के कट्टरपण की आलोचना की.

9. धर्मयुद्ध का प्रभाव 

लगभग दो सौ वर्षों तक पूरब और पश्चिम के बीच धर्मयुद्ध चला. धर्मयुद्ध के योद्धा पूर्वी सभ्यता से प्रभावित हुए. आगे चलकर इन्हीं योद्धाओं ने यूरोप में पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) की नींव मजबूत की.

10. सामंतवाद का ह्रास

सामंती प्रथा के कारण किसानों, व्यापारियों, कलाकारों और साधारण जनता को स्वतंत्र चिंतन का अवसर नहीं मिलता था. सामंती युद्धों के कारण वातावरण हमेशा विषाक्त रहता था. किन्तु सामंती प्रथा के पतन से जन-जीवन संतुलित हो गया. शान्ति तथा व्यवस्था कायम हुई. शांतिपूर्ण वातावरण में लोग साहित्य, कला एवं व्यापार की प्रगति की और ध्यान देने लगे. शान्तिपूर्ण वातावरण में लोग साहित्य, कला और व्यापार की प्रगति की ओर ध्यान देने लगे. सामंतवाद का ह्रास का महत्त्वपूर्ण परिणाम राष्ट्रीय राज्यों का विकास था. लोगों में राष्ट्रीय भावना का जन्म हुआ.

बोस्टन की चाय पार्टी

बोस्टन की चाय-पार्टी की घटना क्या थी?

ब्रिटिश संसद ने चाय के व्यापार के सम्बन्ध में नया कानून बनाया था. इस कानून के अनुसार ईस्ट इंडिया कंपनी को अमेरिका में चाय भेजने की अनुमति दी गई थी. चाय के व्यापार को बढ़ाने के लिए मूल्य में कमी की गई थी. फलस्वरूप अमेरिकनों को सस्ती चाय मिल जाती थी और ईस्ट इंडिया कंपनी को भी आर्थिक लाभ हो जाता था. लेकिन अमेरिकन उपनिवेशवासियों ने इसे ब्रिटिश सरकार की चाल समझा. उन्होंने सोचा कि यदि संसंद व्यापारिक मामलों पर एकाधिकार कायम कर लेगी तो इससे उपनिवेश के व्यापार को हानि होगी. ईस्ट इंडिया कंपनी के कुछ जहाज बोस्टन बंदरगाह में ठहरे हुए थे. बोस्टन के नागरिकों ने जहाज़ों को लूट लिया और लगभग 342 चाय के बक्सों को समुद्र में फेंक दिया. इसे ही 'बोस्टन की चाय-पार्टी दुर्घटना (Boston tea-party incident)” कहा जाता है.

बोस्टन की चाय-पार्टी घटना के परिणाम

इस घटना से इंग्लैंड में उत्तेजना फैली. ब्रिटिश संसद ने दमन की नीति का समर्थन किया और मेसाचुसेट्स एक्ट (Massachusetts Act) पास किया. इस कानून के द्वारा ब्रिटिश सैनिक कमांडर को अमेरिकन प्रान्तों का राज्यपाल बनाया गया. सभी प्रकार के वाणिज्य के लिए बोस्टन का बंदरगाह बंद कर दिया गया. क्यूबेक एक्ट (Quebec Act) के अनुसार कनाडा की सीमा ओहायो नदी तक बढ़ा दी गई. रोमन कैथलिकों को विशेष सुविधा दी गई. कैथलिक चर्च की प्रधानता कायम होने से प्यूरिटनों को कष्ट हुआ और वे अंसतुष्ट हुए.

ब्रिटिश सरकार की दमन-नीति का प्रतिकूल प्रभाव उपनिवेशों पर पड़ा. वे आपस में संगठित हो गए. 5 सितम्बर, 1774 ई. को फिलेडेलफिया में पहली कांग्रेस की बैठक हुई. उपनिवेशवासियों ने अपने अधिकारों का एक घोषणापत्र तैयार किया. ब्रिटिश संसद द्वारा पारीय कानूनों को समाप्त करने की माँग की गई. ब्रिटेन के साथ आयात-निर्यात बंद करने का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ. लॉर्ड नॉर्थ ने उपनिवेशों के साथ समझौता का प्रस्ताव रखा लेकिन लॉर्ड नॉर्थ का प्रस्ताव देर से आया तबतक युद्ध की घोषणा हो चुकी थी. इसे ही अमेरिका का स्वातंत्र्य-संग्राम का जाता है.

1st world war प्रथम विश्व युद्ध

प्रथम विश्वयुद्ध - First World War [1914-18]

प्रथम विश्वयुद्ध की भूमिका (Background of First World War)

1914-18 ई. का प्रथम विश्वयुद्ध (First World War) साम्राज्यवादी राष्ट्रों की पारस्परिक प्रतिस्पर्द्धा का परिणाम था. प्रथम विश्वयुद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण गुप्त संधि प्रणाली थी. यूरोप में गुप्त संधि की प्रथा जर्मन चांसलर बिस्मार्क ने शुरू की थी. इसने यूरोप  को दो विरोधी गुटों में विभाजित कर दिया. दो गुटों के बीच एक-दूसरे के प्रति संदेह और घृणा का भाव बढ़ता गया. राजनीतिक वातावरण दूषित हो गया. 1879 ई. में जर्मनी ने ऑस्ट्रिया-हंगरी (Austria-Hungary) के साथ गुप्त संधि की. 1882 ई. में इटली भी इस गुट में शामिल हो गया. इस प्रकार त्रिगुट का निर्माण हुआ. 1887 ई. में जर्मनी और रूस दोनों मिल गए. विश्व राजनैतिक अखाड़े में फ्रांस अकेला पड़ गया. फ्रांस को अपमानित करने के लिए ही जर्मनी ने इन देशों के साथ संधि की थी. फ्रांस प्रतिशोध की आग में अन्दर ही अन्दर जल रहा था. इसलिए 1894 ई. में फ्रांस ने रूस से संधि की. उधर इंग्लैंड ने 1902 ई. में जापान के साथ, 1904 ई. में फ्रांस और 1907 ई. में रूस के साथ संधि कर ली.  इस प्रकार दो राजनीतिक खेमों में बँटा यूरोप युद्ध का अखाड़ा हो गया.

एक ओर इंग्लैंड, फ्रांस, रूस और जापान का त्रिगुट था और दूसरा गुट जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी, इटली और तुर्की का था. दोनों के बीच हथियारबंदी की होड़ चल रही थी.

1912-13 ई. के बाल्कन युद्धों (War in the Balkans) ने तो प्रथम विश्वयुद्ध को अनिवार्य बना दिया. यूरोप के अनेक राष्ट्र बाल्कन क्षेत्र में अपने साम्राज्य के विस्तार का प्रयास कर रहे थे. ऑस्ट्रिया और रूस भी इसी क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहते थे. बाल्कन क्षेत्र में साम्राज्यवादी प्रतिद्वंदिता ने विश्वयुद्ध की भूमिका तैयार की.

गुप्त संधियों के अलावे प्रथम विश्व युद्ध के अनेक कारण गिनाये जा सकते हैं -

Causes of World War I

1. उग्र राष्ट्रीयता (Furious Nationality)

उग्र राष्ट्रीयता के कारण भी प्रथम विश्वयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई थी. बड़े एवं शक्तिशाली राष्ट्रों के अतिरिक्त यूनान और सर्बिया जैसे छोटे-छोटे देशों पर भी उग्र राष्ट्रीयता का नशा चढ़ा हुआ था. वे वृहत्तर यूनान, वृहत्तर बुल्गेरिया और वृहत्तर सर्बिया की मांग कर रहे थे. चेक, स्लाव जातियाँ अपनी राष्ट्रीय आकांक्षा को पूरा करने के लिए यूरोप में अशांति उत्पन्न कर रही थीं. जब यूरोप के साम्राज्यवादी राष्ट्र अपनी सभ्यता-संस्कृति और धर्म का पाठ पढ़ाने के लिए संसार में आगे बढ़े तो उनमें संघर्ष अनिवार्य हो गया.

2. आर्थिक प्रतिद्वंदिता (Economic Rivalry)

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप यूरोप के राष्ट्रों के आर्थिक जीवन में महान् परिवर्तन हुआ. पूंजीवाद की उत्पत्ति हुई. पूँजीवादी अतिरिक्त पूँजी लगाने के लिए उपनिवेश की माँग करने लगे. बढ़ती हुई जनसंख्या को बसाने के लिए भी उपनिवेश की आवाश्यकता थी. इस समस्या का समाधान साम्राज्य-विस्तार से ही संभव था. इसलिए उपनिवेश को लेकर ही संघर्ष प्रारम्भ हुआ. पूँजीवादी राष्ट्रों के बीच आर्थिक महत्त्वाकांक्षा के कारण घृणा और अविश्वास का वातावरण तैयार हो गया.

3. साम्राज्यवादी होड़ (Imperialist Competition)

साम्राज्यवादी होड़ प्रथम विश्वयुद्ध का एक आधारभूत कारण था. औद्योगिक क्रान्ति के कारण यूरोपीय देशों के सामने व्यावसायिक माल की खपत और कल-कारखानों को चलाने के लिए कच्चे माल की प्राप्ति की समस्या उत्पन्न हुई. इस समस्या का समाधान साम्राज्य-विस्तार में दिखाई दिया. इसलिए इंग्लैंड, फ्रांस, हॉलैंड, बेल्जियम, पुर्तगाल, डेनमार्क, इटली अपना साम्राज्य बढ़ाने का प्रयत्न करने लगे. इससे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विता बढ़ी. अफ्रीका और चीन इस प्रतिद्वंद्विता का शिकार पहले हुए. सूडान को लेकर इंग्लैंड और फ्रांस के बीच युद्ध छिड़ते-छिड़ते बचा.

4. सैन्यवाद और शस्त्रीकरण (Militarism and Armament)

उग्र राष्ट्रीयता और साम्राज्यवादी मनोवृत्ति ने यूरोप के राष्ट्रों का ध्यान सैन्यवाद और शस्त्रीकरण की ओर खींचा. फ्रांस, जर्मनी आदि साम्राज्यवादी राष्ट्र अपनी आमदनी का 85% सैनिक तैयारी पर खर्च करने लगे. भय तथा संदेह ने प्रत्येक राष्ट्र को युद्ध-सामग्री जमा करने के लिए उत्प्रेरित किया और इस तरह प्रत्येक देश युद्ध के लिए तैयार हो गया.

5. समाचारपत्रों का झूठा प्रचार (Newspapers' False Propaganda)

प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व सभी देशों के समाचारपत्र एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे थे. इससे एक-दूसरे की राष्ट्रीय भावना को ठेस लग रही थी. कभी-कभी दो राष्ट्रों के बीच विवादास्पद प्रश्न पर समाचारपत्रों में इस तरह की आलोचना की जाती थी कि जनता पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता था.

6. फ्रांस की बदले की भावना (France's Revenge Spirit)

जर्मनी का एकीकरण फ्रांस को पराजित कर के पूरा किया गया था. फ्रांस को अल्सस-लारेन का प्रदेश खोना पड़ा था. फ्रांस राष्ट्रीय अपमान को भूला नहीं था और वह जर्मनी से बदला लेना चाहता था. जर्मनी मोरक्को में फ्रांस का विरोध कर रहा था. इससे दोनों में मनमुटाव पैदा हुआ.

7. अंतर्राष्ट्रीय अराजकता (International Anarchy)

इस समय यूरोप में एक प्रकार से अंतर्राष्ट्रीय अराजकता फ़ैल चुकी थी. प्रत्येक राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा था. अपने हितों की रक्षा के लिए कोई भी देश अपने विरोधी के साथ संधि कर सकता था. स्वार्थी राष्ट्र की इस नीति ने विरोधाभास को जन्म दिया. इस परिस्थिति को रोकने के लिए कोई अंतर्राष्ट्रीय संस्था नहीं थी जिसके अभाव के कारण सभी राष्ट्र मनमानी कर रहे थे.

8. सराजेवो हत्याकांड (Sarajevo Assassination)

युद्ध का तात्कालिक कारण ऑस्ट्रिया (Austria) के राजकुमार आर्कड्यूक फ्रान्ज़ (Archduke Franz) की हत्या थी. राजकुमार की हत्या बोस्निया (Bosnia) की राजधानी सराजेवो (Sarajevo) में हुई थी. ऑस्ट्रिया की सरकार ने राजकुमार की हत्या के लिए सर्बिया को उत्तरदाई ठहराया और उसके समक्ष 12 कड़ी शर्तें रखीं. सर्बिया की सरकार ने सभी शर्तों को मानने में अपनी असमर्थता प्रकट की. सर्बिया की सरकार समस्या का समाधान महाशक्तियों के सम्मलेन द्वारा करना चाहती थी. किन्तु ऑस्ट्रिया के राजनीतिज्ञों और सैनिक पदाधिकारियों ने सर्बिया की प्रार्थना पर ध्यान नहीं दिया. ऑस्ट्रिया की सरकार ने 28 जुलाई, 1914 ई. को युद्ध की घोषणा कर अपनी सेना को सर्बिया पर आक्रमण करने का आदेश दिया. इस घटना से ही प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई. युद्ध की समाप्ति 11 नवम्बर, 1918 को हुई.

जर्मनी का एकीकरण

जर्मनी का एकीकरण - Unification of Germany in Hindi

19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में जर्मनी भी इटली की तरह एक 'भौगोलिक अभिव्यक्ति” मात्र था. जर्मनी अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था. इन राज्यों में एकता का अभाव था. ऑस्ट्रिया जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) का विरोधी था. आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से जर्मनी पिछड़ा और विभाजित देश था. फिर भी जर्मनी के देशभक्त जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) के लिए प्रयास कर रहे थे. कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं जिनसे जर्मन एकता को बल मिला. जर्मनी की औद्योगिक प्रगति हुई. वाणिज्य-व्यापार का विकास हुआ. नेपोलियन प्रथम ने जर्मन राज्यों का एक संघ स्थापित कर राष्ट्रीय एकता का मार्ग प्रशस्त किया. जर्मनी के निवासी स्वयं को एक राष्ट्र के रूप में देखने लगे. 1830 ई और 1848 ई. की क्रांतियों के द्वारा जर्मनी के लोगों में एकता आई और वे संगठित हुए. प्रशा (Persia) के नेतृत्व में आर्थिक संघ की स्थापना से राष्ट्रीय एकता की भावना को बल मिला. इससे राजनीतिक एकीकरण को भी प्रोत्साहन मिला. औद्योगिक विकास ने राजनीतिक एकीकरण को ठोस आधार प्रदान किया. जर्मनी का पूँजीपति वर्ग आर्थिक विकास और व्यापार की प्रगति के लिए जर्मनी को एक संगठित राष्ट्र  बनाना चाहता था. यह वर्ग एक शक्तिशाली केन्द्रीय शासन की स्थापना के पक्ष में था. जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) में रेल-लाइनों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी. रेलवे के निर्माण से प्राकृतिक बाधाएँ दूर हो गयीं. रेलमार्ग के निर्माण से राष्ट्रीय और राजनीतिक भावना के विकास में सहायता मिली. जर्मनी के लेखकों और साहित्यकारों ने भी लोगों की राष्ट्रीय भावना को उभरा. अंत में बिस्मार्क (Otto von Bismarck) के नेतृत्व में जर्मनी के एकीकरण का कार्य पूरा हुआ. इसके लिए उसे युद्ध भी करना पड़ा.

1830 ई. की क्रांति

1830 ई. की क्रांति का प्रभाव जर्मन रियासतों पर गहरे रूप से पड़ा था. ब्रुन्सविक, हिस, हेनोवर, सेक्सोनी, बवेरिया और नुरमबर्ग (Brunswick,  Hanover, Saxony, Bavaria, Nuremberg) के शासकों ने 1815 ई. का संविधान लागू किया. प्रशा और ऑस्ट्रिया को छोड़कर सभी जर्मन राज्यों में वैध शासन की स्थापना हुई. लेकिन प्रशा (Persia), ऑस्ट्रिया और रूस के प्रयासों से उदारवादी आन्दोलन को कुचल दिया गया. पुनः प्रतिक्रियावादी निरंकुश शासन की स्थापना हुई. जर्मन राज्य-परिषद् ने आन्दोलन को दबाने के लिए अनेक कठोर कानून बनाए. सभा के आयोजन और भाषण पर कठोर प्रतिबंध लगाया गया. विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण कायम किया गया. विद्यार्थी संघ को अवैध घोषित किया गया. राष्ट्रीयता के प्रचारकों और उदार शासन की माँग करनेवालों को कठोर दंड  दिया जाता था, लेकिन प्रतिक्रियावादी की यह विजय क्षणिक थी. थोड़े समय के लिए राष्ट्रीयता की लहर दब गयी थी, लेकिन जर्मनी के निवासी राष्ट्रीयता से प्रभावित हो चुके थे. उनमें क्रांति की आग धीरे-धीरे सुलग रही थी. शीघ्र ही यह आग 1948 ई. में भड़क उठी.

1848 ई. की क्रांति

1848 ई. की क्रांति से जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) में परोक्ष रूप से सहायता मिली थी. 1848 ई. की क्रांति ने ऑस्ट्रिया में निरंकुश शासन का एक प्रकार से अंत कर दिया. मेटरनिख का पतन हुआ, जो जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) का प्रबल शत्रु था. वियना (Vienna) के देशभक्तों की विजय से जर्मनी के देशभक्त प्र्तोसाहित हुए. प्रष, बवेरिया, सेक्सोनी, वादेन आदि राज्यों के निवासियों ने निरंकुश शासकों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया. शासकों को उदार संविधान लागू करने के लिए बाध्य किया गया. अनेक राज्यों में उदार संविधान भी लागू किया गया. भाषण और लेखन पर से प्रतिबंध समाप्त कर दिया गया. इस प्रकार प्रारम्भ में सभी राज्यों में क्रांतिकारियों को सफलता मिली. अतः 1848 ई. की क्रांति ने लोगों में एकता तथा संगठन की भावना उत्प्प्न की और राष्ट्रीयता की भावना को जागृत किया.

जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क की भूमिका (Role of Bismarck in Unification of Germany)

बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण के लिए नयी नीति अपनाई थी, जिसके चलते उन्हें man of blood and iron भी कहा जाता है. बिस्मार्क जनतंत्र का विरोधी और निरंकुश शासन का समर्थक था. वह राजतंत्र पर किसी प्रकार का संवैधानिक प्रतिबंध नहीं लगाना चाहता था. उसे संसद, संविधान और लोकतंत्र के आदर्शों से घृणा थी. उसका विश्वास था कि जर्मनी के भाग्य का निर्माण राजा ही कर सकता है. उसने क्रांतिकारियों और उदारवादियों की कटु आलोचना की. बिस्मार्क का उद्देश्य प्रष को शक्तिशाली राष्ट्र बनाकर उसके नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण (Unification of Germany) करना चाहता था. उसका दूसरा उद्देश्य ऑस्ट्रिया को जर्मन परिसंघ बाहर निकालना था, क्योंकि एकीकरण के मार्ग में सबसे बड़ा बाधक ऑस्ट्रिया था. साथ ही वह जर्मनी को यूरोप में प्रमुख शक्ति बनाना चाहता था. उसने प्रशा की सेना का संगठन कर उसे यूरोप का शक्तिशाली राष्ट्र बना दिया. उसने कूटनीतिक माध्यम से ऑस्ट्रिया को कमजोर बनाने का प्रयास किया. बिस्मार्क ऑस्ट्रिया के विरुद्ध रूस से मित्रता चाहता था.

नेपोलियन प्रथम का योगदान

नेपोलियन प्रथम ने जर्मनी के 300 राज्यों को समाप्त कर डच राज्यों का एक संघ बनाया. उसने फ्रांसीसी क्रांति  के सिद्धांतों से जर्मनी के लोगों को परिचित कराया. उसने अपने अधीनस्थ राज्यों में अपना 'कोड” भी लागू किया. इससे जर्मनी के लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगी और वे जर्मनी को एक सुसंगठित राष्ट्र के रूप में देखने लगे.

वियना कांग्रेस के निर्णय के विरुद्ध जर्मनी में प्रतिक्रिया

वियना कांग्रेस के द्वारा जर्मनी को पुनः छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित कर दिया गया था. उनका एक संघ बनाया गया जिसका अध्यक्ष ऑस्ट्रिया का सम्राट था. वियना कांग्रेस की व्यवस्था से जर्मनी के निवासियों में असंतोष उत्पन्न हुआ, क्योंकि उन्हें नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा गया.

जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) के आर्थिक तत्त्वों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी. प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का आर्थिक एकीकरण हुआ. आर्थिक एकीकरण ने राजनीतिक एकीकरण के लिए मार्ग तैयार किया. आर्थिक एकीकरण ने जर्मनी के विकेंद्रीकरण में सहायक प्रादेशिक और राजवंशीय प्रभाव को कम कर दिया. जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) में औद्योगिक विकास से भी सहायता मिली. जर्मनी का पूँजीपति वर्ग मजबूत केन्द्रीय सरकार का समर्थक बन गया. जर्मनी के एकीकरण में रेल-लाइनों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी. इससे एकीकरण के मार्ग की प्राकृतिक बाधाएँ दूर हो गयीं. राष्ट्रीय विचारों का आदान-प्रदान सरल हो गया. औद्योगिकीकरण की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जर्मनी का एकीकरण (Unification of Germany) आवश्यक हो गया. सम्पूर्ण जर्मनी के लिए एक प्रकार के सिक्के तथा एक प्रकार की विधि-व्यवस्था की माँग की गयी. इस प्रकार आर्थिक जीवन में परिवर्तन से भी एकीकरण आन्दोलन को प्रोत्साहन मिला.

औद्योगिक क्रांति

औद्योगिक क्रांति - Industrial Revolution in Hindi

'क्रांति” शब्द से साधारणतया आकस्मिक उथल-पुथल का बोध होता है. लेकिन औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के साथ हम वैसी बात नहीं पाते हैं. साधारणतः लोहे, काँसे और दूसरी-दूसरी चीजों के उत्पादन के ढंग में आमूल परिवर्तन को 'औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution)” की संज्ञा दी जाती है. दस्तकारी के स्थान पर वैज्ञानिक अनुसंधानों के परिणामस्वरूप कारखानों का जन्म हुआ, उत्पादन में वृद्धि हुई. संक्षेप में, औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) का अभिप्राय उन परिवर्तनों से है जिन्होंने यह संभव कर दिया कि मनुष्य उत्पादन के प्राचीन तरीकों को छोड़कर बड़ी मात्रा बड़े-बड़े कारखानों में वस्तुओं का उत्पादन कर सके. इतिहासकार रायकर ने औद्योगिक क्रान्ति को परिभाषित करते हुए कहा है कि - 'दस्तकारी के स्थान पर वास्पयंत्रों द्वारा चालित उत्पादन और यातायात की प्रक्रियाओं में सामान्य रूप से परिवर्तन लाना ही औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) थी.”

1760 ई. से लेकर 1840 ई. तक Europe में अकस्मात् औद्योगिक प्रक्रिया में नई-नई चीजें हुईं, जिन्हें कुल मिलाकर औद्योगिक क्रांति का नाम दिया गया. वस्तुतः यह प्रक्रिया आज तक चल रही है परन्तु उस समय के कालखंड में औद्योगिक उत्पादन की प्रक्रिया में जो बदलाव आये थे वे अत्यंत आकस्मिक और अभूतपूर्व थे. इस संदर्भ में 1760 ई. का महत्त्व यह है कि उसी वर्ष cast iron blowing cylinder का सर्वप्रथम प्रयोग हुआ था. 1840 ई. के बाद यूरोप में रेलवे का विस्तार हुआ इसलिए इसके बाद औद्योगिक उत्पादन में अभूतपूर्व प्रगति हुई. अतः इस दौर को द्वितीय औद्योगिक क्रान्ति  का नाम दिया गया.

औद्योगिक क्रांति

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के प्रारम्भ होने के पहले घरेलू उद्योग-धंधों का बोलबाला था. शिल्पकार, कारीगर, दस्तकार अपने घरों के सुन्दर-सुन्दर वस्तुएँ तैयार करते थे. औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप उत्पादन के तरीकों में आमूल परिवर्तन हुआ. मानवीय श्रम के स्थान पर यंत्रो का प्रोयग शुरू हुआ. नयी-नयी मशीनें बनीं. इस प्रकार दस्तकारी के स्थान पर वैज्ञानिक अनुसंधानों के फलस्वरूप जब कारखानों का जन्म  हुआ और उत्पादन में वृद्धि हुई तो इसे ही 'औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution)” की संज्ञा दी गई. संक्षेप में, औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) का अभिप्राय उन परिवर्तनों से हैं जिन्होंने यह संभव कर दिया कि मनुष्य उत्पादन के प्राचीन तरीकों को छोड़कर बड़ी मात्रा में बड़े-बड़े कारखानों में वस्तुओं का उत्पादन कर सके.

कारण

इंगलैंड में औद्योगिक क्रान्ति की नींव पहले से ही तैयार की जा रही थी. इंगलैंड का व्यवसायी वर्ग अन्य देशों के व्यवसायी वर्ग की अपेक्षा अधिक कुशल और साहसी था. व्यापार की उन्नति के लिए उनमें अधिक  लगन और स्वाभाविक प्रेरणा थी. इंगलैंड का व्यवसायिक वर्ग सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त था. इंगलैंड की सरकार भी व्यापारियों के कार्यों में सहायता देती थी. परिस्थिति की सुगमता के अतिरिक्त सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थतियों के कारण भी औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) सर्वप्रथम इंगलैंड में हुई. इन कारणों का विवरण कुछ इस प्रकार है -

इंग्लैंड की आंतरिक स्थिति

1688 ई. की क्रांति के फलस्वरूप इंग्लैंड संसदीय शासन-पद्धति की स्थापना हुई. जनसाधारण के अधिकार सुरक्षित हो चुके थे. राजनीतिक और धार्मिक अत्याचार से मुक्ति पाकर लोग आर्थिक विकास की ओर अग्रसर हुए. गृहयुद्ध और बाह्य आक्रमण की कोई आशंका नहीं थी. आंतरिक शान्ति और सुदृढ़ता व्यापार की प्रगति में सहायक हुई. लेकिन अन्य दूसरे-दूसरे देश राजनीतिक उलझनों में ही फँसे थे.

मध्यम वर्ग का उदय

सतरहवीं सदी में व्यापारिक क्रांति के कारण मध्यम वर्ग की शक्ति बढ़ी. किन्तु अब भी सामंती प्रतिबंधों के कारण मध्यम वर्ग के वाणिज्य-व्यापार और उद्योग-धंधों की प्रगति नहीं हो रही थी. 1740 ई. में इंगलैंड में मध्यम वर्ग ने क्रांति की. क्रांति के फलस्वरूप एक नयी व्यवस्था कायम हुई. नयी व्यवस्था में पुराने सामंती प्रतिबंधों छुटकारा मिलने और उद्योगपतियों के हाथ में शक्ति आ जाने के कारण इंग्लैंड में उद्योग-धंधों की काफी प्रगति हुई. चूँकि इंगलैंड में मध्यम वर्ग के हाथ में राजनीतिक सत्ता फ्रांस और अमेरिका से पहले आई थी, इसलिए औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) का प्रारम्भ भी पहले-पहल इंगलैंड में हुआ.

पूँजी की अधिकता

इंगलैंड का व्यापार पूर्वी और पश्चिमी द्वीप समूहों से होता था. इससे इंगलैंड को अधिक मुनाफा प्राप्त होता था. देश में पूँजीवादी व्यस्था दिन-प्रतिदिन जोर पकड़ती जा रही थी. बची हुई पूँजी का उपयोग लोग उत्पादन बढ़ाने में करने लगे. उत्पादन बढ़ने से औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) को प्रोत्साहन मिला. बैंक-प्रणाली के विकास से भी धन इकठ्ठा करने में मदद मिली.

वस्तुओं की बढ़ती हुई माँग

अठारहवीं शताब्दी के युद्ध के परिणाम भी औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) की प्रगति में सहायक सिद्ध हुए. इंगलैंड पेशेवर सिपाहियों के लिए युद्ध-सामग्री तैयार करता था. सामानों की बढ़ती हुई माँग ने उत्पादन के तरीके और साधन में परिवर्तन को आवश्यक बना दिया था. ऐसी परिस्थिति पैदा हो गयी थी कि लोगों को बड़े पैमानों पर वस्तुओं के उत्पादन में अपनी बुद्धि लगानी पड़ी.

कृषि-क्रांति का प्रभाव

इंगलैंड में सर्प्र्थम औद्योगिक क्रांति होने का एक प्रमुख कारण यह था कि वहाँ सर्वप्रथम कृषि-प्रणाली में परिवर्तन हुआ. खेती के एक तरीके अपनाए गए और उत्पादन में वृद्धि हुई. लोगों की आर्थिक स्थिति में परिवर्तन आया, उनकी आवश्यकताएँ बढीं और आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए उद्योग-धंधों का विकास किया गया. उत्पादन बढ़ने से शहरों की बढ़ती हुई आबादी को खिलाना संभव हो सका. कृषि-क्रान्ति का एक परिणाम यह भी हुआ कि खेती में लगे किसान बेकार हो गए. वे जीविका की खोज में शहर गए. इससे श्रमशक्ति के अभाव की पूर्ति हुई. अब कारखाना में तैयार वस्तुओं के लिए देश में ही बाजार मिल गया.

कुशल कारीगर

सतरहवीं शताब्दी में धर्मयुद्ध के कारण अन्य देशों से अधिक संख्या में कुशल कारीगर इंगलैंड आये थे. उन्होंने अपनी कला-कौशल का प्रदर्शन इंगलैंड में किया. इससे इंगलैंड के मजदूरों के ज्ञान में वृद्धि हुई. खेती के तरीके में परिवर्तन हुआ और उद्योग-धंधों का विकास हुआ. इस प्रकार उद्योग-धंधों के विकास में कुशल कारीगरों ने बहुत मदद पहुँचाई.

कच्चे माल की सुविधा

18वीं शताब्दी के मध्य तक इंगलैंड का औपनिवेशिक साम्राज्य पूर्वी कनाडा, उत्तरी अमेरिका, फ्लोरिडा, भारत, पश्चिमी द्वीप समूह, पश्चिमी अफ्रीका, जिब्राल्टर तक फ़ैल चुका था. इन स्थानों से इंगलैंड को पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल मिल जाता था. साथ ही निर्मित वस्तुओं की खपत के लिए बाजार भी मिल जाता था. उपनिवेश से धन भी मिल जाता था. इस प्रकार औपनिवेशिक साम्राज्य की वृद्धि से इंगलैंड को औद्योगिक प्रगति में काफी सहायता मिली. क्योंकि औद्योगिक विकास के प्रमुख साधन - पूँजी, श्रम, कच्चा माल और बाजार उपनिवेशों में मिल जाते थे.

जनसंख्या में वृद्धि

जनसंख्या में वृद्धि औद्योगिक क्रान्ति का एक प्रमुख कारण था. बच्चों की सुरक्षा और गरीबों की सहायता की व्यवस्था की गई थी. अब लोग आसानी से भुखमरी और रोक का शिकार नहीं हो सकते थे. जनसंख्या बढ़ने से उद्योग के विकास के लिए श्रम की पूर्ति हुई.

वनिक संघ का पतन

वनिक संघ के पतन के फलस्वरूप भी औद्योगिक क्रांति कामयाबी हासिल कर सकी. वनिक संघ के अन्दर लोगों को संघ के नियमानुसार काम करना पड़ता था. लेकिन वणिक संघ के टूट जाने से लोग अपने पसंद का काम करने लगे. तरह-तरह के व्यापार का उदय हुआ. इससे भी औद्योगिक क्रांति को बल मिला.

 

परिणाम

आर्थिक परिणाम

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप लोगों के आर्थिक जीवन में परविर्तन आया. एक ओर बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना हुई तो दूसरी ओर घरेलू उद्योग-धंधों का विनाश हुआ. इस बुरा प्रभाव दस्तकारों पर पड़ा. अमीरी-गरीबी साथ-साथ बढ़ी. इंग्लैंड की राष्ट्रीय संपत्ति में वृद्धि हुई. अंतर्देशीय व्यापार के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भी वृद्धि हुई. इंग्लैंड का व्यापार एशिया, अफ्रीका और अमेरिका से होता था. इससे उसे आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ. देहात के बेकार मजदूर और दस्तकार शहर में काम करने लगे. इससे शहरों की जनसंख्या बढ़ी और साथ-साथ आर्थिक-सामजिक समस्याएँ भी उत्पन्न हुईं.

सामाजिक परिणाम

पौष्टिक आहार और दावा-दारु के उचित प्रबंध के कारण जनसंख्या में वृद्धि हुई. दूसरी ओर कारखाना प्रणाली का बुरा प्रभाव मजदूरों के स्वास्थ्य पर पड़ा. मजदूरों को उचित मजदूरी नहीं दी जाती थी. कम मजदूरी के कारण उन्हें अच्छा भोजन नहीं मिलता था. औद्योगिक क्रान्ति ने सामजिक विषमता को जन्म दिया. पूँजी कुछ ही लोगों के हाथों में जमा हो गई. पूँजीपति मुनाफा कमाने में लगे रहते थे और वे मजदूरों की सुविधा का ख्याल नहीं करते थे. धनी दिन-प्रतिदिन धनी होते जा रहे थे और गरीबों की गरीबी बढ़ती जा रही थी. आर्थिक विषमता ने सामजिक विषमता को जन्म दिया. समाज में भ्रष्टाचार और व्यभिचार जैसी सामजिक बुराइयाँ बढीं. इससे लोगों का जीवन कष्टमय हो गया.

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यूरोप का पुनर्जागरण

इंग्लैंड की गौरवपूर्ण क्रांति

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप कई लोगों के जीवन-स्तर में परिवर्तन आया. जीवन में शान-शौकत और विलासता बढ़ी. चीजों का उत्पादन पर्याप्त मात्र में होने लगा. अब साधारण व्यक्ति भी वैसी चीजों का प्रयोग करने लगा जिनका प्रयोग कभी सिर्फ अमीर वर्ग तक सीमित था. औद्योगिक वर्ग ने माध्यम वर्ग को जन्म दिया. इस वर्ग के लोगों के पास पूँजी थी. किन्तु उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं था. वे अपने अधिकार के लिए संघर्ष करने लगे. इससे सामजिक समस्या उत्पन्न हुई. समस्या को सुलझाने के लिए औद्योगिक देशों की सरकार ने कुछ कानून बनाए. मध्यम वर्ग को सामजिक समानता मिली. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में मजदूरों का शोषण होता था. उन्हें अधिक देर तक काम करना पड़ता था लेकिन मजदूरी कम मिलती थी. परिणामस्वरूप मजदूर संघ का जन्म हुआ.

इटली का एकीकरण

इटली का एकीकरण - Unification of Italy in Hindi

एकीकरण के पूर्व इटली एक 'भौगोलिक अभिव्यक्ति” मात्र था. वह अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था. राज्यों में मतभेद था और सभी अपने स्वार्थ में लिप्त थे. एकीकरण (Unification) के मार्ग में अनेक बाधाएँ थीं. लेकिन इटली (Italy) के कुछ प्रगतिवादी लोगों ने एकता की दिशा में कदम उठाया. इटली के एकीकरण (Unification of Italy) में आर्थिक तत्त्वों की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी. इटली के एकीकरण में सबसे अधिक योगदान रेलवे के विकास था. इटली में राष्ट्रीय आन्दोलन चलाने के लिए अनेक गुप्त समितियों का संगठन किया गया. इन गुप्त समितियों में कार्बोनरी प्रमुख था. इसके नेतृत्व में 1831 ई. तक इटली का एकता-आन्दोलन चलता रहा. मेजिनी (Giuseppe Mazzini) को इटली के राष्ट्रीय आन्दोलन का पैगम्बर कहा जाता है. उसने 'युवा इटली” नामक संस्था की स्थापना की. इसके सदस्यों ने मजदूरों और गाँवों तथा नगरों के लोगों के बीच चेतना फैलायी. 1848 ई. की क्रांति का प्रभाव भी इटली पर पड़ा था. काबूर (Camillo Benso, Count of Cavour) और गैरीबाल्डी (Giuseppe Garibaldi) ने भी इटली के राष्ट्रीय एकीकरण (Unification of Italy) में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था. 1871 ई. में इटली का एकीकरण पूरा हुआ.

19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में इटली अनेक भागों में विभाजित था. वह यूरोपीय शक्तियों के संघर्ष का अखाड़ा बना हुआ था. फ्रांस की क्रांति  का प्रभाव इटली पर भी पड़ा था. इटली के निवासियों में राष्ट्रीय भावना जाग चुकी थी. इटली ऑस्ट्रिया के प्रभाव में था. ऑस्ट्रिया का प्रधानमंत्री मेटरनिख (Metternich) और पोप का शक्तिशाली राज्य इटली के एकीकरण के मार्ग में बाधक थे. 1848 ई. की घटनाओं के फलस्वरूप इटली का एकीकरण आन्दोलन ने एक नया मोड़ ले लिया. इटली का एकीकरण (Unification of Italy) चार चरणों में हुआ -

इटली के एकीकरण का प्रथम चरण

1848 ई. के बाद पिडमांट-सार्डिनिया (Piedmont-Sardinia) का राज्य इटली के एकीकरण (Unification of Italy) आन्दोलन से सम्बंधित गतिविधियों का केंद्र बन गया. काउंट वहाँ का प्रधानमंत्री बना. उसने अपने आंतरिक सुधारों द्वारा पिडमांट राज्य की शक्ति बढ़ाई. उसने क्रीमिया के युद्ध में मित्रराष्ट्रों की सहायता की और पिडमांट-सार्डिनिया (Piedmont-Sardinia) के राज्य को बड़े राज्यों की पंक्ति में ला खड़ा किया. मित्रराष्ट्रों ने कबूर को एकीकरण आन्दोलन में मदद देने का आश्वासन दिया. कबूर (Count of Cavour)और नेपोलियन तृतीय (Napoleon III) के बीच प्लाम्बियर्स की संधि (Plombières Agreement) हुई. काबूर ने ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी. ऑस्ट्रिया युद्ध में पराजित हुआ. लोम्बार्डी को पिडमाउंट-सार्डिनिया राज्य में मिला लिया गया.

इटली के एकीकरण का द्वितीय चरण

जिस समय ऑस्ट्रिया के विरुद्ध पिडमांट-सार्डिनिया (Piedmont-Sardinia) सेना लड़ रही थी, उस समय मध्य इटली की जनता ने विद्रोह कर दिया. पारमा, मोडेना और टस्कनी के शासकों को देश छोड़कर भागना पड़ा. इन राज्यों को जनमत-संग्रह द्वारा सार्डिनिया में मिला लिया गया.

इटली के एकीकरण का तृतीय चरण

इटली के एकीकरण (Unification of Italy) के तृतीय चरण में गैराबाल्डी का नाम लिया जाता है. 1860 ई. में उसने सिसली और नेपुल्स पर अधिकार कर लिया. विक्टर एमैन्युएल ने पोप के राज्य के दो भागों पर अधिकार कर लिया. गैरीबाल्डी ने उसका विरोध नहीं किया. नेपुल्स का शासन भी उसे सौंप दिया. वहाँ की जनता ने भी बहुमत से इटली के राज्य में शामिल होने की इच्छा प्रकट की.

इटली के एकीकरण का चतुर्थ चरण

रोम और वेनेशिया इटली से बाहर थे. 1860 ई. में वेनेशिया पर अधिकार हो गया. 1870 ई. में रोम पर अधिकार कर लिया गया. 1871 ई. में रोम स्वतंत्र हुआ और संयुक्त इटली की राजधानी बनाया गया. इस प्रकार इटली का एकीकरण (Unification of Italy) पूरा हुआ.

इटली के एकीकरण में Camillo Benso, Count of Cavour का योगदान

इटली के राजनीतिक मंच पर Camillo Benso, Count of Cavour के पदार्पण से एकीकरण आन्दोलन में एक नया मोड़ आया. इटली को ऑस्ट्रिया की अधीनता से मुक्त करना काउंट कबूर की नीति थी. वह इटली के एकीकरण (Unification of Italy) को पिडमांट-सार्डिनिया (Piedmont-Sardinia) के नेतृत्व में पूरा करना चाहता था. उसने अपनी कूटनीति से इटली के प्रश्न को यूरोपीय अभिरुचि का प्रश्न बना दिया. उसका विश्वास था कि ऑस्ट्रिया के प्रभाव को समाप्त करने के लिए इटली को किसी यूरोपीय शक्ति से मित्रता करनी होगी. उस समय फ्रांस ने ऑस्ट्रिया के विरुद्ध इटली को सैनिक सहायता देने का वचन दिया. शीघ्र ही इटली और ऑस्ट्रिया के बीच युद्ध प्रारंभ हो गया. प्रारंभ में पिडमांट और फ्रांस की विजय हुई. इटली में क्रांति की लहर चल पड़ी. टस्कनी, मोडेना और पारमा की जनता ने अपने शासकों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया. इस समय नेपोलियन तृतीय ने ऑस्ट्रिया से विराम संधि कर ली. ऑस्ट्रिया-सार्डिनिया युद्ध (Austrian Sardinia War) का एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि इससे इटली के एकीकरण (Unification of Italy) आन्दोलन को बल मिला. युद्ध-काल में ही मध्य इटली के राज्यों में राष्ट्रीयता की भावना प्रबल हो चुकी थी. टस्कनी, पार्मा और मोडेना की जनता ने विद्रोह कर दिया और वहाँ के राजाओं को देश छोड़कर भागना पड़ा. इन राज्यों ने सार्डिनीया के साथ मिलने का निर्णय लिया.

इटली के एकीकरण में गैरीबाल्डी/Giuseppe Garibaldi का योगदान

काउंट कबूर (Count of Cavour) के प्रयत्नों के फलस्वरूप संयुक्त इटली के लिए आधार तैयार हो चुका था. लेकिन अभी उसका एकीकरण पूरा नहीं हुआ था. अभी नेपुल्स, सिसली, वेनेशिया और रोम पर अधिकार करना बाकी था. मई, 1860 ई. में गैरीबाल्डी ने सिसली पर आक्रमण कर दिया.  नेपुल्स और सिसली को जीतने के बाद उसने रोम को जीतने की योजना बनाई. 18 फरवरी, 1861 ई. में सार्डिनिया की राजधानी में नवीन संसद का उद्घाटन हुआ. इसमें रोम और वेनेशिया को छोड़कर शेष सभी राज्यों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए थे. 1866 ई. में वेनेशिया पर आक्रमण हुआ और वेनेशिया को इटली के राज्य में मिला लिया गया. 20 सितम्बर, 1871 ई. को रोम पर अधिकार कर लिया गया. रोम को स्वतंत्र इटली की राजधानी घोषित किया गया.

इटली के एकीकरण में मेजिनी/Giuseppe Mazzini का योगदान

इटली के एकीकरण आन्दोलन के पैगम्बर मेजिनी का प्रादुर्भाव उस समय हुआ जब वहाँ राष्ट्रीय एकता के सारे प्रयास विफल हो चुके थे. मेजिनी का करूण हृदय देश की दुर्दशा पर विलाप कर रहा था. वह अपने देशवासियों को अत्याचारी, निरंकुश शासकों के चंगुल से मुक्त करना चाहता था. वह अपने देशवासियों को अत्याचारी, निरंकुश शासकों के चंगुल से मुक्त करना चाहता था. वह इटली में गणतंत्र की स्थापना करना चाहता था. एकता और स्वाधीनता नके लिए उसने युवा इटली (Young Italy) की नामक संस्था की स्थापना की.

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...