जर्मनी का एकीकरण

जर्मनी का एकीकरण - Unification of Germany in Hindi

19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में जर्मनी भी इटली की तरह एक 'भौगोलिक अभिव्यक्ति” मात्र था. जर्मनी अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था. इन राज्यों में एकता का अभाव था. ऑस्ट्रिया जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) का विरोधी था. आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से जर्मनी पिछड़ा और विभाजित देश था. फिर भी जर्मनी के देशभक्त जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) के लिए प्रयास कर रहे थे. कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं जिनसे जर्मन एकता को बल मिला. जर्मनी की औद्योगिक प्रगति हुई. वाणिज्य-व्यापार का विकास हुआ. नेपोलियन प्रथम ने जर्मन राज्यों का एक संघ स्थापित कर राष्ट्रीय एकता का मार्ग प्रशस्त किया. जर्मनी के निवासी स्वयं को एक राष्ट्र के रूप में देखने लगे. 1830 ई और 1848 ई. की क्रांतियों के द्वारा जर्मनी के लोगों में एकता आई और वे संगठित हुए. प्रशा (Persia) के नेतृत्व में आर्थिक संघ की स्थापना से राष्ट्रीय एकता की भावना को बल मिला. इससे राजनीतिक एकीकरण को भी प्रोत्साहन मिला. औद्योगिक विकास ने राजनीतिक एकीकरण को ठोस आधार प्रदान किया. जर्मनी का पूँजीपति वर्ग आर्थिक विकास और व्यापार की प्रगति के लिए जर्मनी को एक संगठित राष्ट्र  बनाना चाहता था. यह वर्ग एक शक्तिशाली केन्द्रीय शासन की स्थापना के पक्ष में था. जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) में रेल-लाइनों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी. रेलवे के निर्माण से प्राकृतिक बाधाएँ दूर हो गयीं. रेलमार्ग के निर्माण से राष्ट्रीय और राजनीतिक भावना के विकास में सहायता मिली. जर्मनी के लेखकों और साहित्यकारों ने भी लोगों की राष्ट्रीय भावना को उभरा. अंत में बिस्मार्क (Otto von Bismarck) के नेतृत्व में जर्मनी के एकीकरण का कार्य पूरा हुआ. इसके लिए उसे युद्ध भी करना पड़ा.

1830 ई. की क्रांति

1830 ई. की क्रांति का प्रभाव जर्मन रियासतों पर गहरे रूप से पड़ा था. ब्रुन्सविक, हिस, हेनोवर, सेक्सोनी, बवेरिया और नुरमबर्ग (Brunswick,  Hanover, Saxony, Bavaria, Nuremberg) के शासकों ने 1815 ई. का संविधान लागू किया. प्रशा और ऑस्ट्रिया को छोड़कर सभी जर्मन राज्यों में वैध शासन की स्थापना हुई. लेकिन प्रशा (Persia), ऑस्ट्रिया और रूस के प्रयासों से उदारवादी आन्दोलन को कुचल दिया गया. पुनः प्रतिक्रियावादी निरंकुश शासन की स्थापना हुई. जर्मन राज्य-परिषद् ने आन्दोलन को दबाने के लिए अनेक कठोर कानून बनाए. सभा के आयोजन और भाषण पर कठोर प्रतिबंध लगाया गया. विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण कायम किया गया. विद्यार्थी संघ को अवैध घोषित किया गया. राष्ट्रीयता के प्रचारकों और उदार शासन की माँग करनेवालों को कठोर दंड  दिया जाता था, लेकिन प्रतिक्रियावादी की यह विजय क्षणिक थी. थोड़े समय के लिए राष्ट्रीयता की लहर दब गयी थी, लेकिन जर्मनी के निवासी राष्ट्रीयता से प्रभावित हो चुके थे. उनमें क्रांति की आग धीरे-धीरे सुलग रही थी. शीघ्र ही यह आग 1948 ई. में भड़क उठी.

1848 ई. की क्रांति

1848 ई. की क्रांति से जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) में परोक्ष रूप से सहायता मिली थी. 1848 ई. की क्रांति ने ऑस्ट्रिया में निरंकुश शासन का एक प्रकार से अंत कर दिया. मेटरनिख का पतन हुआ, जो जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) का प्रबल शत्रु था. वियना (Vienna) के देशभक्तों की विजय से जर्मनी के देशभक्त प्र्तोसाहित हुए. प्रष, बवेरिया, सेक्सोनी, वादेन आदि राज्यों के निवासियों ने निरंकुश शासकों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया. शासकों को उदार संविधान लागू करने के लिए बाध्य किया गया. अनेक राज्यों में उदार संविधान भी लागू किया गया. भाषण और लेखन पर से प्रतिबंध समाप्त कर दिया गया. इस प्रकार प्रारम्भ में सभी राज्यों में क्रांतिकारियों को सफलता मिली. अतः 1848 ई. की क्रांति ने लोगों में एकता तथा संगठन की भावना उत्प्प्न की और राष्ट्रीयता की भावना को जागृत किया.

जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क की भूमिका (Role of Bismarck in Unification of Germany)

बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण के लिए नयी नीति अपनाई थी, जिसके चलते उन्हें man of blood and iron भी कहा जाता है. बिस्मार्क जनतंत्र का विरोधी और निरंकुश शासन का समर्थक था. वह राजतंत्र पर किसी प्रकार का संवैधानिक प्रतिबंध नहीं लगाना चाहता था. उसे संसद, संविधान और लोकतंत्र के आदर्शों से घृणा थी. उसका विश्वास था कि जर्मनी के भाग्य का निर्माण राजा ही कर सकता है. उसने क्रांतिकारियों और उदारवादियों की कटु आलोचना की. बिस्मार्क का उद्देश्य प्रष को शक्तिशाली राष्ट्र बनाकर उसके नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण (Unification of Germany) करना चाहता था. उसका दूसरा उद्देश्य ऑस्ट्रिया को जर्मन परिसंघ बाहर निकालना था, क्योंकि एकीकरण के मार्ग में सबसे बड़ा बाधक ऑस्ट्रिया था. साथ ही वह जर्मनी को यूरोप में प्रमुख शक्ति बनाना चाहता था. उसने प्रशा की सेना का संगठन कर उसे यूरोप का शक्तिशाली राष्ट्र बना दिया. उसने कूटनीतिक माध्यम से ऑस्ट्रिया को कमजोर बनाने का प्रयास किया. बिस्मार्क ऑस्ट्रिया के विरुद्ध रूस से मित्रता चाहता था.

नेपोलियन प्रथम का योगदान

नेपोलियन प्रथम ने जर्मनी के 300 राज्यों को समाप्त कर डच राज्यों का एक संघ बनाया. उसने फ्रांसीसी क्रांति  के सिद्धांतों से जर्मनी के लोगों को परिचित कराया. उसने अपने अधीनस्थ राज्यों में अपना 'कोड” भी लागू किया. इससे जर्मनी के लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगी और वे जर्मनी को एक सुसंगठित राष्ट्र के रूप में देखने लगे.

वियना कांग्रेस के निर्णय के विरुद्ध जर्मनी में प्रतिक्रिया

वियना कांग्रेस के द्वारा जर्मनी को पुनः छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित कर दिया गया था. उनका एक संघ बनाया गया जिसका अध्यक्ष ऑस्ट्रिया का सम्राट था. वियना कांग्रेस की व्यवस्था से जर्मनी के निवासियों में असंतोष उत्पन्न हुआ, क्योंकि उन्हें नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा गया.

जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) के आर्थिक तत्त्वों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी. प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का आर्थिक एकीकरण हुआ. आर्थिक एकीकरण ने राजनीतिक एकीकरण के लिए मार्ग तैयार किया. आर्थिक एकीकरण ने जर्मनी के विकेंद्रीकरण में सहायक प्रादेशिक और राजवंशीय प्रभाव को कम कर दिया. जर्मनी के एकीकरण (Unification of Germany) में औद्योगिक विकास से भी सहायता मिली. जर्मनी का पूँजीपति वर्ग मजबूत केन्द्रीय सरकार का समर्थक बन गया. जर्मनी के एकीकरण में रेल-लाइनों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी. इससे एकीकरण के मार्ग की प्राकृतिक बाधाएँ दूर हो गयीं. राष्ट्रीय विचारों का आदान-प्रदान सरल हो गया. औद्योगिकीकरण की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जर्मनी का एकीकरण (Unification of Germany) आवश्यक हो गया. सम्पूर्ण जर्मनी के लिए एक प्रकार के सिक्के तथा एक प्रकार की विधि-व्यवस्था की माँग की गयी. इस प्रकार आर्थिक जीवन में परिवर्तन से भी एकीकरण आन्दोलन को प्रोत्साहन मिला.

औद्योगिक क्रांति

औद्योगिक क्रांति - Industrial Revolution in Hindi

'क्रांति” शब्द से साधारणतया आकस्मिक उथल-पुथल का बोध होता है. लेकिन औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के साथ हम वैसी बात नहीं पाते हैं. साधारणतः लोहे, काँसे और दूसरी-दूसरी चीजों के उत्पादन के ढंग में आमूल परिवर्तन को 'औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution)” की संज्ञा दी जाती है. दस्तकारी के स्थान पर वैज्ञानिक अनुसंधानों के परिणामस्वरूप कारखानों का जन्म हुआ, उत्पादन में वृद्धि हुई. संक्षेप में, औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) का अभिप्राय उन परिवर्तनों से है जिन्होंने यह संभव कर दिया कि मनुष्य उत्पादन के प्राचीन तरीकों को छोड़कर बड़ी मात्रा बड़े-बड़े कारखानों में वस्तुओं का उत्पादन कर सके. इतिहासकार रायकर ने औद्योगिक क्रान्ति को परिभाषित करते हुए कहा है कि - 'दस्तकारी के स्थान पर वास्पयंत्रों द्वारा चालित उत्पादन और यातायात की प्रक्रियाओं में सामान्य रूप से परिवर्तन लाना ही औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) थी.”

1760 ई. से लेकर 1840 ई. तक Europe में अकस्मात् औद्योगिक प्रक्रिया में नई-नई चीजें हुईं, जिन्हें कुल मिलाकर औद्योगिक क्रांति का नाम दिया गया. वस्तुतः यह प्रक्रिया आज तक चल रही है परन्तु उस समय के कालखंड में औद्योगिक उत्पादन की प्रक्रिया में जो बदलाव आये थे वे अत्यंत आकस्मिक और अभूतपूर्व थे. इस संदर्भ में 1760 ई. का महत्त्व यह है कि उसी वर्ष cast iron blowing cylinder का सर्वप्रथम प्रयोग हुआ था. 1840 ई. के बाद यूरोप में रेलवे का विस्तार हुआ इसलिए इसके बाद औद्योगिक उत्पादन में अभूतपूर्व प्रगति हुई. अतः इस दौर को द्वितीय औद्योगिक क्रान्ति  का नाम दिया गया.

औद्योगिक क्रांति

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के प्रारम्भ होने के पहले घरेलू उद्योग-धंधों का बोलबाला था. शिल्पकार, कारीगर, दस्तकार अपने घरों के सुन्दर-सुन्दर वस्तुएँ तैयार करते थे. औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप उत्पादन के तरीकों में आमूल परिवर्तन हुआ. मानवीय श्रम के स्थान पर यंत्रो का प्रोयग शुरू हुआ. नयी-नयी मशीनें बनीं. इस प्रकार दस्तकारी के स्थान पर वैज्ञानिक अनुसंधानों के फलस्वरूप जब कारखानों का जन्म  हुआ और उत्पादन में वृद्धि हुई तो इसे ही 'औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution)” की संज्ञा दी गई. संक्षेप में, औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) का अभिप्राय उन परिवर्तनों से हैं जिन्होंने यह संभव कर दिया कि मनुष्य उत्पादन के प्राचीन तरीकों को छोड़कर बड़ी मात्रा में बड़े-बड़े कारखानों में वस्तुओं का उत्पादन कर सके.

कारण

इंगलैंड में औद्योगिक क्रान्ति की नींव पहले से ही तैयार की जा रही थी. इंगलैंड का व्यवसायी वर्ग अन्य देशों के व्यवसायी वर्ग की अपेक्षा अधिक कुशल और साहसी था. व्यापार की उन्नति के लिए उनमें अधिक  लगन और स्वाभाविक प्रेरणा थी. इंगलैंड का व्यवसायिक वर्ग सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त था. इंगलैंड की सरकार भी व्यापारियों के कार्यों में सहायता देती थी. परिस्थिति की सुगमता के अतिरिक्त सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थतियों के कारण भी औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) सर्वप्रथम इंगलैंड में हुई. इन कारणों का विवरण कुछ इस प्रकार है -

इंग्लैंड की आंतरिक स्थिति

1688 ई. की क्रांति के फलस्वरूप इंग्लैंड संसदीय शासन-पद्धति की स्थापना हुई. जनसाधारण के अधिकार सुरक्षित हो चुके थे. राजनीतिक और धार्मिक अत्याचार से मुक्ति पाकर लोग आर्थिक विकास की ओर अग्रसर हुए. गृहयुद्ध और बाह्य आक्रमण की कोई आशंका नहीं थी. आंतरिक शान्ति और सुदृढ़ता व्यापार की प्रगति में सहायक हुई. लेकिन अन्य दूसरे-दूसरे देश राजनीतिक उलझनों में ही फँसे थे.

मध्यम वर्ग का उदय

सतरहवीं सदी में व्यापारिक क्रांति के कारण मध्यम वर्ग की शक्ति बढ़ी. किन्तु अब भी सामंती प्रतिबंधों के कारण मध्यम वर्ग के वाणिज्य-व्यापार और उद्योग-धंधों की प्रगति नहीं हो रही थी. 1740 ई. में इंगलैंड में मध्यम वर्ग ने क्रांति की. क्रांति के फलस्वरूप एक नयी व्यवस्था कायम हुई. नयी व्यवस्था में पुराने सामंती प्रतिबंधों छुटकारा मिलने और उद्योगपतियों के हाथ में शक्ति आ जाने के कारण इंग्लैंड में उद्योग-धंधों की काफी प्रगति हुई. चूँकि इंगलैंड में मध्यम वर्ग के हाथ में राजनीतिक सत्ता फ्रांस और अमेरिका से पहले आई थी, इसलिए औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) का प्रारम्भ भी पहले-पहल इंगलैंड में हुआ.

पूँजी की अधिकता

इंगलैंड का व्यापार पूर्वी और पश्चिमी द्वीप समूहों से होता था. इससे इंगलैंड को अधिक मुनाफा प्राप्त होता था. देश में पूँजीवादी व्यस्था दिन-प्रतिदिन जोर पकड़ती जा रही थी. बची हुई पूँजी का उपयोग लोग उत्पादन बढ़ाने में करने लगे. उत्पादन बढ़ने से औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) को प्रोत्साहन मिला. बैंक-प्रणाली के विकास से भी धन इकठ्ठा करने में मदद मिली.

वस्तुओं की बढ़ती हुई माँग

अठारहवीं शताब्दी के युद्ध के परिणाम भी औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) की प्रगति में सहायक सिद्ध हुए. इंगलैंड पेशेवर सिपाहियों के लिए युद्ध-सामग्री तैयार करता था. सामानों की बढ़ती हुई माँग ने उत्पादन के तरीके और साधन में परिवर्तन को आवश्यक बना दिया था. ऐसी परिस्थिति पैदा हो गयी थी कि लोगों को बड़े पैमानों पर वस्तुओं के उत्पादन में अपनी बुद्धि लगानी पड़ी.

कृषि-क्रांति का प्रभाव

इंगलैंड में सर्प्र्थम औद्योगिक क्रांति होने का एक प्रमुख कारण यह था कि वहाँ सर्वप्रथम कृषि-प्रणाली में परिवर्तन हुआ. खेती के एक तरीके अपनाए गए और उत्पादन में वृद्धि हुई. लोगों की आर्थिक स्थिति में परिवर्तन आया, उनकी आवश्यकताएँ बढीं और आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए उद्योग-धंधों का विकास किया गया. उत्पादन बढ़ने से शहरों की बढ़ती हुई आबादी को खिलाना संभव हो सका. कृषि-क्रान्ति का एक परिणाम यह भी हुआ कि खेती में लगे किसान बेकार हो गए. वे जीविका की खोज में शहर गए. इससे श्रमशक्ति के अभाव की पूर्ति हुई. अब कारखाना में तैयार वस्तुओं के लिए देश में ही बाजार मिल गया.

कुशल कारीगर

सतरहवीं शताब्दी में धर्मयुद्ध के कारण अन्य देशों से अधिक संख्या में कुशल कारीगर इंगलैंड आये थे. उन्होंने अपनी कला-कौशल का प्रदर्शन इंगलैंड में किया. इससे इंगलैंड के मजदूरों के ज्ञान में वृद्धि हुई. खेती के तरीके में परिवर्तन हुआ और उद्योग-धंधों का विकास हुआ. इस प्रकार उद्योग-धंधों के विकास में कुशल कारीगरों ने बहुत मदद पहुँचाई.

कच्चे माल की सुविधा

18वीं शताब्दी के मध्य तक इंगलैंड का औपनिवेशिक साम्राज्य पूर्वी कनाडा, उत्तरी अमेरिका, फ्लोरिडा, भारत, पश्चिमी द्वीप समूह, पश्चिमी अफ्रीका, जिब्राल्टर तक फ़ैल चुका था. इन स्थानों से इंगलैंड को पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल मिल जाता था. साथ ही निर्मित वस्तुओं की खपत के लिए बाजार भी मिल जाता था. उपनिवेश से धन भी मिल जाता था. इस प्रकार औपनिवेशिक साम्राज्य की वृद्धि से इंगलैंड को औद्योगिक प्रगति में काफी सहायता मिली. क्योंकि औद्योगिक विकास के प्रमुख साधन - पूँजी, श्रम, कच्चा माल और बाजार उपनिवेशों में मिल जाते थे.

जनसंख्या में वृद्धि

जनसंख्या में वृद्धि औद्योगिक क्रान्ति का एक प्रमुख कारण था. बच्चों की सुरक्षा और गरीबों की सहायता की व्यवस्था की गई थी. अब लोग आसानी से भुखमरी और रोक का शिकार नहीं हो सकते थे. जनसंख्या बढ़ने से उद्योग के विकास के लिए श्रम की पूर्ति हुई.

वनिक संघ का पतन

वनिक संघ के पतन के फलस्वरूप भी औद्योगिक क्रांति कामयाबी हासिल कर सकी. वनिक संघ के अन्दर लोगों को संघ के नियमानुसार काम करना पड़ता था. लेकिन वणिक संघ के टूट जाने से लोग अपने पसंद का काम करने लगे. तरह-तरह के व्यापार का उदय हुआ. इससे भी औद्योगिक क्रांति को बल मिला.

 

परिणाम

आर्थिक परिणाम

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप लोगों के आर्थिक जीवन में परविर्तन आया. एक ओर बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना हुई तो दूसरी ओर घरेलू उद्योग-धंधों का विनाश हुआ. इस बुरा प्रभाव दस्तकारों पर पड़ा. अमीरी-गरीबी साथ-साथ बढ़ी. इंग्लैंड की राष्ट्रीय संपत्ति में वृद्धि हुई. अंतर्देशीय व्यापार के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भी वृद्धि हुई. इंग्लैंड का व्यापार एशिया, अफ्रीका और अमेरिका से होता था. इससे उसे आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ. देहात के बेकार मजदूर और दस्तकार शहर में काम करने लगे. इससे शहरों की जनसंख्या बढ़ी और साथ-साथ आर्थिक-सामजिक समस्याएँ भी उत्पन्न हुईं.

सामाजिक परिणाम

पौष्टिक आहार और दावा-दारु के उचित प्रबंध के कारण जनसंख्या में वृद्धि हुई. दूसरी ओर कारखाना प्रणाली का बुरा प्रभाव मजदूरों के स्वास्थ्य पर पड़ा. मजदूरों को उचित मजदूरी नहीं दी जाती थी. कम मजदूरी के कारण उन्हें अच्छा भोजन नहीं मिलता था. औद्योगिक क्रान्ति ने सामजिक विषमता को जन्म दिया. पूँजी कुछ ही लोगों के हाथों में जमा हो गई. पूँजीपति मुनाफा कमाने में लगे रहते थे और वे मजदूरों की सुविधा का ख्याल नहीं करते थे. धनी दिन-प्रतिदिन धनी होते जा रहे थे और गरीबों की गरीबी बढ़ती जा रही थी. आर्थिक विषमता ने सामजिक विषमता को जन्म दिया. समाज में भ्रष्टाचार और व्यभिचार जैसी सामजिक बुराइयाँ बढीं. इससे लोगों का जीवन कष्टमय हो गया.

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इंग्लैंड की गौरवपूर्ण क्रांति

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के फलस्वरूप कई लोगों के जीवन-स्तर में परिवर्तन आया. जीवन में शान-शौकत और विलासता बढ़ी. चीजों का उत्पादन पर्याप्त मात्र में होने लगा. अब साधारण व्यक्ति भी वैसी चीजों का प्रयोग करने लगा जिनका प्रयोग कभी सिर्फ अमीर वर्ग तक सीमित था. औद्योगिक वर्ग ने माध्यम वर्ग को जन्म दिया. इस वर्ग के लोगों के पास पूँजी थी. किन्तु उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं था. वे अपने अधिकार के लिए संघर्ष करने लगे. इससे सामजिक समस्या उत्पन्न हुई. समस्या को सुलझाने के लिए औद्योगिक देशों की सरकार ने कुछ कानून बनाए. मध्यम वर्ग को सामजिक समानता मिली. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में मजदूरों का शोषण होता था. उन्हें अधिक देर तक काम करना पड़ता था लेकिन मजदूरी कम मिलती थी. परिणामस्वरूप मजदूर संघ का जन्म हुआ.

इटली का एकीकरण

इटली का एकीकरण - Unification of Italy in Hindi

एकीकरण के पूर्व इटली एक 'भौगोलिक अभिव्यक्ति” मात्र था. वह अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था. राज्यों में मतभेद था और सभी अपने स्वार्थ में लिप्त थे. एकीकरण (Unification) के मार्ग में अनेक बाधाएँ थीं. लेकिन इटली (Italy) के कुछ प्रगतिवादी लोगों ने एकता की दिशा में कदम उठाया. इटली के एकीकरण (Unification of Italy) में आर्थिक तत्त्वों की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी. इटली के एकीकरण में सबसे अधिक योगदान रेलवे के विकास था. इटली में राष्ट्रीय आन्दोलन चलाने के लिए अनेक गुप्त समितियों का संगठन किया गया. इन गुप्त समितियों में कार्बोनरी प्रमुख था. इसके नेतृत्व में 1831 ई. तक इटली का एकता-आन्दोलन चलता रहा. मेजिनी (Giuseppe Mazzini) को इटली के राष्ट्रीय आन्दोलन का पैगम्बर कहा जाता है. उसने 'युवा इटली” नामक संस्था की स्थापना की. इसके सदस्यों ने मजदूरों और गाँवों तथा नगरों के लोगों के बीच चेतना फैलायी. 1848 ई. की क्रांति का प्रभाव भी इटली पर पड़ा था. काबूर (Camillo Benso, Count of Cavour) और गैरीबाल्डी (Giuseppe Garibaldi) ने भी इटली के राष्ट्रीय एकीकरण (Unification of Italy) में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था. 1871 ई. में इटली का एकीकरण पूरा हुआ.

19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में इटली अनेक भागों में विभाजित था. वह यूरोपीय शक्तियों के संघर्ष का अखाड़ा बना हुआ था. फ्रांस की क्रांति  का प्रभाव इटली पर भी पड़ा था. इटली के निवासियों में राष्ट्रीय भावना जाग चुकी थी. इटली ऑस्ट्रिया के प्रभाव में था. ऑस्ट्रिया का प्रधानमंत्री मेटरनिख (Metternich) और पोप का शक्तिशाली राज्य इटली के एकीकरण के मार्ग में बाधक थे. 1848 ई. की घटनाओं के फलस्वरूप इटली का एकीकरण आन्दोलन ने एक नया मोड़ ले लिया. इटली का एकीकरण (Unification of Italy) चार चरणों में हुआ -

इटली के एकीकरण का प्रथम चरण

1848 ई. के बाद पिडमांट-सार्डिनिया (Piedmont-Sardinia) का राज्य इटली के एकीकरण (Unification of Italy) आन्दोलन से सम्बंधित गतिविधियों का केंद्र बन गया. काउंट वहाँ का प्रधानमंत्री बना. उसने अपने आंतरिक सुधारों द्वारा पिडमांट राज्य की शक्ति बढ़ाई. उसने क्रीमिया के युद्ध में मित्रराष्ट्रों की सहायता की और पिडमांट-सार्डिनिया (Piedmont-Sardinia) के राज्य को बड़े राज्यों की पंक्ति में ला खड़ा किया. मित्रराष्ट्रों ने कबूर को एकीकरण आन्दोलन में मदद देने का आश्वासन दिया. कबूर (Count of Cavour)और नेपोलियन तृतीय (Napoleon III) के बीच प्लाम्बियर्स की संधि (Plombières Agreement) हुई. काबूर ने ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी. ऑस्ट्रिया युद्ध में पराजित हुआ. लोम्बार्डी को पिडमाउंट-सार्डिनिया राज्य में मिला लिया गया.

इटली के एकीकरण का द्वितीय चरण

जिस समय ऑस्ट्रिया के विरुद्ध पिडमांट-सार्डिनिया (Piedmont-Sardinia) सेना लड़ रही थी, उस समय मध्य इटली की जनता ने विद्रोह कर दिया. पारमा, मोडेना और टस्कनी के शासकों को देश छोड़कर भागना पड़ा. इन राज्यों को जनमत-संग्रह द्वारा सार्डिनिया में मिला लिया गया.

इटली के एकीकरण का तृतीय चरण

इटली के एकीकरण (Unification of Italy) के तृतीय चरण में गैराबाल्डी का नाम लिया जाता है. 1860 ई. में उसने सिसली और नेपुल्स पर अधिकार कर लिया. विक्टर एमैन्युएल ने पोप के राज्य के दो भागों पर अधिकार कर लिया. गैरीबाल्डी ने उसका विरोध नहीं किया. नेपुल्स का शासन भी उसे सौंप दिया. वहाँ की जनता ने भी बहुमत से इटली के राज्य में शामिल होने की इच्छा प्रकट की.

इटली के एकीकरण का चतुर्थ चरण

रोम और वेनेशिया इटली से बाहर थे. 1860 ई. में वेनेशिया पर अधिकार हो गया. 1870 ई. में रोम पर अधिकार कर लिया गया. 1871 ई. में रोम स्वतंत्र हुआ और संयुक्त इटली की राजधानी बनाया गया. इस प्रकार इटली का एकीकरण (Unification of Italy) पूरा हुआ.

इटली के एकीकरण में Camillo Benso, Count of Cavour का योगदान

इटली के राजनीतिक मंच पर Camillo Benso, Count of Cavour के पदार्पण से एकीकरण आन्दोलन में एक नया मोड़ आया. इटली को ऑस्ट्रिया की अधीनता से मुक्त करना काउंट कबूर की नीति थी. वह इटली के एकीकरण (Unification of Italy) को पिडमांट-सार्डिनिया (Piedmont-Sardinia) के नेतृत्व में पूरा करना चाहता था. उसने अपनी कूटनीति से इटली के प्रश्न को यूरोपीय अभिरुचि का प्रश्न बना दिया. उसका विश्वास था कि ऑस्ट्रिया के प्रभाव को समाप्त करने के लिए इटली को किसी यूरोपीय शक्ति से मित्रता करनी होगी. उस समय फ्रांस ने ऑस्ट्रिया के विरुद्ध इटली को सैनिक सहायता देने का वचन दिया. शीघ्र ही इटली और ऑस्ट्रिया के बीच युद्ध प्रारंभ हो गया. प्रारंभ में पिडमांट और फ्रांस की विजय हुई. इटली में क्रांति की लहर चल पड़ी. टस्कनी, मोडेना और पारमा की जनता ने अपने शासकों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया. इस समय नेपोलियन तृतीय ने ऑस्ट्रिया से विराम संधि कर ली. ऑस्ट्रिया-सार्डिनिया युद्ध (Austrian Sardinia War) का एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि इससे इटली के एकीकरण (Unification of Italy) आन्दोलन को बल मिला. युद्ध-काल में ही मध्य इटली के राज्यों में राष्ट्रीयता की भावना प्रबल हो चुकी थी. टस्कनी, पार्मा और मोडेना की जनता ने विद्रोह कर दिया और वहाँ के राजाओं को देश छोड़कर भागना पड़ा. इन राज्यों ने सार्डिनीया के साथ मिलने का निर्णय लिया.

इटली के एकीकरण में गैरीबाल्डी/Giuseppe Garibaldi का योगदान

काउंट कबूर (Count of Cavour) के प्रयत्नों के फलस्वरूप संयुक्त इटली के लिए आधार तैयार हो चुका था. लेकिन अभी उसका एकीकरण पूरा नहीं हुआ था. अभी नेपुल्स, सिसली, वेनेशिया और रोम पर अधिकार करना बाकी था. मई, 1860 ई. में गैरीबाल्डी ने सिसली पर आक्रमण कर दिया.  नेपुल्स और सिसली को जीतने के बाद उसने रोम को जीतने की योजना बनाई. 18 फरवरी, 1861 ई. में सार्डिनिया की राजधानी में नवीन संसद का उद्घाटन हुआ. इसमें रोम और वेनेशिया को छोड़कर शेष सभी राज्यों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए थे. 1866 ई. में वेनेशिया पर आक्रमण हुआ और वेनेशिया को इटली के राज्य में मिला लिया गया. 20 सितम्बर, 1871 ई. को रोम पर अधिकार कर लिया गया. रोम को स्वतंत्र इटली की राजधानी घोषित किया गया.

इटली के एकीकरण में मेजिनी/Giuseppe Mazzini का योगदान

इटली के एकीकरण आन्दोलन के पैगम्बर मेजिनी का प्रादुर्भाव उस समय हुआ जब वहाँ राष्ट्रीय एकता के सारे प्रयास विफल हो चुके थे. मेजिनी का करूण हृदय देश की दुर्दशा पर विलाप कर रहा था. वह अपने देशवासियों को अत्याचारी, निरंकुश शासकों के चंगुल से मुक्त करना चाहता था. वह अपने देशवासियों को अत्याचारी, निरंकुश शासकों के चंगुल से मुक्त करना चाहता था. वह इटली में गणतंत्र की स्थापना करना चाहता था. एकता और स्वाधीनता नके लिए उसने युवा इटली (Young Italy) की नामक संस्था की स्थापना की.

इंग्लैंड की गौरब क्रांति

इंग्लैंड की गौरवपूर्ण क्रांति -Glorious Revolution 1688 in Hindi

जेम्स द्वितीय 1685 ई. में इंग्लैंड का राजा बना. उसे बहुत सुरक्षित सिंहासन प्राप्त हुआ था. परिस्थिति राजतंत्र के पक्ष में थी. विरोधी दल कुचला जा चूका था. राज्य के प्रति निर्विरोध आज्ञाकारिता का सिद्धांत स्वीकृत हो चूका था. संसद के अधिकांश सदस्य राजा के दैवी अधिकार सिद्धांत के समर्थक थे. जेम्स द्वितीय ने स्वयं ही परिस्थिति को विपरीत बना दिया और उसे अंततोगत्वा गद्दी छोड़कर भागना पड़ा. 1688 ई. में हुए इंग्लैंड की क्रांति को 'गौरवपूर्ण क्रांति (Glorious Revolution)” भी कहा जाता है.

इंग्लैंड की क्रांति संक्षेप में

1688 ई. की क्रांति जेम्स द्वितीय के शासनकाल में हुई थी. क्रांति के लिए जेम्स द्वितीय ने खुद वातावरण तैयार किया था. उसके कार्यों से सभी दल के लोग असंतुष्ट थे. उन्हें विश्वास हो गया था कि राजा स्वेच्छाचारी शासन की पुनरावृत्ति करना चाहता है. जेम्स द्वितीय रोमन  कैथोलिक चर्च की शक्ति को बढ़ाना चाहता था. वह कैथलिकों को राज्य के महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करना चाहता था. वह किसी भी कानून को स्थगित अथवा रद्द करने के अधिकार द्वारा अपनी सत्ता को सर्वोपरि बनाना चाहता था. वह टेस्ट एक्ट को समाप्त करना चाहता था और इसलिए उसने न्यायालय में अपने समर्थक न्यायाधीशों को ही रहने दिया. वह स्थाई सेना की सहायता से विरोधियों पर नियंत्रण रखना चाहता था. इंग्लैंड की जनता जेम्स द्वितीय के क्रूर शासन को इसलिए बर्दास्त कर रही थी कि उसकी मृत्यु के बाद इंग्लैंड में कैथोलिक शासन का अंत होगा. लेकिन जून, 1688 ई में जेम्स द्वितीय की दूसरी कैथोलिक पत्नी से एक पुत्र उत्पन्न हुआ. पुत्र के जन्म ने इंग्लैंड की क्रांति को अवश्यम्भावी बना दिया. लोगों को विश्वास हो गया कि जेम्स द्वितीय की नीति अनंत काल तक चलती रहेगी. इस आशंका से लोग भयभीत हो गए. वे क्रांति द्वारा कैथोलिक शासन के अंत का प्रयास करने लगे. प्रतिकूल परिस्थिति के कारण जेम्स द्वितीय ने गद्दी छोड़ दिया. विलियम तृतीय और मेरी को इंग्लैंड का सम्राट और साम्राज्ञी घोषित किया गया. 'अधिकारों का घोषणापत्र” तैयार किया गया. जेम्स द्वितीय के सभी कार्यों को अवैध घोषित किया गया. प्रजा तथा संसद के अधिकारों की पुष्टि की गई.

1688 ई. की क्रांति के कारण

1688 ई. के इंग्लैंड की क्रांति के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे -

जेम्स द्वितीय की धार्मिक नीति

जेम्स द्वितीय कट्टर कैथोलिक था. कैथोलिक धर्म के सिधान्तों में उसकी गहरी आस्था थी. वह कैथोलिकों को राज्य के प्रमुख पदों पर नियुक्त करना चाहता था. इस पक्षपात को देखते हुए प्रोटेस्टेंट लोगों ने जेम्स के कार्यों का विरोध करना शुरू कर दिया. विरोधियों का दमन करने के लिए जेम्स द्वितीय ने अनेक कठोर कदम उठाये. हाई कमीशन नामक न्यायालय की स्थापना की गई. कैथोलिक धर्म की आलोचना अथवा निंदा करने का अधिकार किसी को नहीं था. विरोध की परवाह न करते हुए जेम्स द्वितीय ने कैथोलिक धर्म का प्रचार जारी रखा.

फ्रांस के साथ मैत्री सम्बन्ध

जेम्स द्वितीय का विश्वास था कि आवश्यकता पड़ने पर फ़्रांस का राजा लुई चौदहवाँ उसे सेना और धन से सहायता देगा. इस कारण उसने फ्रांस के साथ मैत्री सम्बन्ध बनाए रखना का पूर्ण रूप से प्रयास किया. उसने रोमन कैथोलिकों की सुविधाएँ प्रदान की और प्रोटेस्टेंट धर्म के अनुयायियों पर घोर अत्याचार किया. इंग्लैंड की प्रोटेस्टेंट जनता इस प्रकार के अत्याचार को सहन नहीं कर सकी. उसने जेम्स द्वितीय का विरोध करना शुरू कर दिया.

टेस्ट एक्ट के प्रति उदासीनाता

टेस्ट एक्ट के अनुसार केवल अंग्रेजी चर्च के अनुयायियों को ही राज्य कर्मचारी के रूप में नियुक्त किया जा सकता था. इस नियम के कारण कैथोलिकों की नियुक्ति नहीं की जा सकती थी. इसलिए जेम्स द्वितीय ने टेस्ट एक्ट को रद्द करने का प्रयास किया लेकिन संसद ने ऐसा करने की अनुमति नहीं दी. इससे असंतुष्ट होकर जेम्स द्वितीय ने संसद को ही स्थगित कर दिया.

निलंबन और विमोचन के अधिकार का प्रयोग

जेम्स द्वितीय का कहना था कि आवश्यकता होने पर राजा किसी भी नियम को स्थगित अथवा रद्द कर सकता है. इस अधिकार का प्रयोग करके उसने कैथोलिकों के विरुद्ध बने सभी कानूनों को रद्द कर दिया. इंग्लैंड की जनता ने राजा का विरोध किया.

विश्वविद्यालय में हस्तक्षेप 

जेम्स द्वितीय ने विश्वविद्यालय के कार्यों में भी हस्तक्षेप किया. विश्वविद्यालय में बड़े-बड़े पदों पर कैथोलिकों की नियुक्ति की गई. कैंब्रिज विश्वविद्यालय के उप-कुलपति को पदच्युत कर दिया गया था क्योंकि उसने एक कैथोलिक को डिग्री देने से इनकार कर दिया था. ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में भी कैथोलिक धर्म का प्रचार की व्यवस्था की गई. क्रिस्ट चर्च के अध्यक्ष के पद पर एक कट्टर रोमन कैथोलिक को नियुक्त किया गया. विश्वविद्यालय के कार्यों में हस्तक्षेप से भी इंग्लैंड की जनता असंतुष्ट थी.

धार्मिक न्यायालय की स्थापना

1686 ई. में जेम्स द्वितीय ने धार्मिक न्यायालय की स्थापना की. इस न्यायालय का मुख्य उद्देश्य पादरियों को राजा की इच्छानुसार कार्य करने के लिए बाध्य करना था. धार्मिक न्यायालय द्वारा कैथोलिक धर्म के विरोधियों को क्रूर सजा दी जाती थी.

स्थायी सेना में वृद्धि

जेम्स द्वितीय को सुरक्षित सिंहासन प्राप्त हुआ था. उस समय न तो आंतरिक विरोध की संभावना थी और न विदेशी आक्रमण का भय था. फिर भी जेम्स द्वितीय स्थायी सेना में वृद्धि करना चाहता था. सैनिकों में अधिकांश कैथोलिक थे. इससे लोगों का आतंकित होना स्वाभाविक था. उन्हें विश्वास हो गया था कि जेम्स द्वितीय स्थायी सेना की सहायता से स्वेच्छाचारी शासन की स्थापना करेगा और कैथोलिक धर्म का प्रचार-प्रसार करेगा.

स्कॉटलैंड और आयरलैंड के प्रति नीति 

`जेम्स द्वितीय के स्वेच्छाचारी शासन का प्रभाव स्कॉटलैंड और आयरलैंड पर भी पड़ा था. उसने वहाँ भी ऊँचे-ऊँचे पदों पर कैथोलिकों की नियुक्ति की. आयरलैंड के प्रोटोस्टेंट भयभीत हो गए. स्कॉटलैंड में रोमन कैथोलिकों को पूरी धार्मिक स्वतंत्रता दी गई. इससे लोगों में असंतोष बढ़ा जिसके कारण आगे चलकर क्रांति संभव हो सकी.

चुनाव में हस्तक्षेप

जेम्स द्वितीय चुनाव में भी हस्तक्षेप करने लगा था. वह संसद के सदस्यों को नामजद (nominate) भी करने लगा था. वह अपने समर्थकों की संख्या संसद में बढ़ाना चाहता था. इससे संसद के सदस्य असंतुष्ट थे.

सात पादरियों का मुकदमा 

जेम्स द्वितीय ने 1688 ई. में दूसरी घोषणा प्रकाशित की. उसने राज्य के प्रत्येक चर्च में इसे लगातार दो रविवारों को पढ़ने का आदेश दिया था. राजा की घोषणा की संसद की स्वीकृति प्राप्त नहीं थी. इसलिए राजा के आदेश को स्वीकार करना राजा की निरंकुशता को स्वीकार करना था. कैंटरबरी के आर्कविशप और छ: अन्य विशपों ने राजा के सामने एक आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर आदेश को वापस लेने की माँग  की. जेम्स द्वितीय ने इनपर राजद्रोह का अभियोग लगाकर मुकदमा चलवाया. लेकिन न्यायालय ने विशपों को निर्दोष घोषित किया. इससे लोगों ने आनंद और उत्साह की लहर दौड़ गई.

पुत्र का जन्म

जैसा हमने ऊपर भी लिखा है कि जेम्स द्वितीय ने अपनी कैथोलिक पत्नी से एक पुत्र को को जन्म दिया. इससे लोगों को लगने लगा कि यह कैथोलिक हमेशा उनपर भविष्य में भी हावी ही रहेंगे. उन्हें विश्वास हो गया कि बच्चे का लालन-पालन कैथोलिक वातावरण में होगा और उसे कैथोलिक शिक्षा दी जाएगी. इस प्रकार जेम्स द्वितीय की मृत्यु के बाद कैथोलिक शासन चलता रहेगा. इस आसह्नका से ही लोग भयभीत हो गए. अब वे क्रांति के द्वारा ही कैथोलिक शासन का अंत कर सकते थे.

क्रांति के परिणाम

  1. राजा की शक्ति में कमी आई.
  2. संसद के अधिकारों में वृद्धि हुई.
  3. क्रांति के बाद अनेक अधिनियम बने.
  4. धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया गया.
  5. नौ-सेना, स्थल सेना आदि के व्यय के ब्योरे और ऋण का अनुमान लगाया.
  6. न्यायालय को स्वतंत्रता मिली.
  7. फ़्रांस को पराजित कर इंग्लैंड ने एक नयी यूरोपीय नीति अपनाई.
  8. स्कॉटलैंड को क्रांति से सांविधानिक और राजनीतिक लाभ प्राप्त हुए.
  9. क्रांति का आयरलैंड पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा. आयरलैंड का ऊन का व्यापार चौपट हो गया.

1688 ई. की क्रांति इंग्लैंड के इतिहास में एक युगांतकारी घटना थी. निरंकुश राजतंत्र की परम्परा समाप्त हो गयी और राजा को वैधानिक सीमा में जकड़ दिया गया. 1689 ई . में अधिकार-विधेयक पारित हुआ. इसके अनुसार, राजा संसद की सहमति के बिना न तो किसी कानून को स्थगित कर सकता था, न किसी नए कानून को लागू कर सकता था, न नया कर लगा सकता था और न किसी व्यक्ति की सजा माफ़ कर सकता था. यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि कैथोलिक या कैथोलिक स्त्री से शादी करने वाला कोई भी व्यक्ति इंग्लैंड की गद्दी का अधिकारी नहीं होगा. निरंकुश राजतंत्र की जगह नियमानुमोदित शासन की स्थापना हुई. संसद की शक्ति बढ़ी. वह राजसत्ता पर नियंत्रण रखने लगी और राजकोष पर उसका एकमात्र अधिकार हो गया.

संसद ने विद्रोही-कानून पास किया गया. इससे सेना पर संसद का नियंत्रण हो गया. त्रैवार्षिक कानून पास कर हर तीसरे वर्ष पर संसद का निर्वाचन अनिवार्य कर दिया गया. सहिष्णुता-कानून पास कर सभी प्रोटेस्टेंट सम्प्रदायों को धार्मिक स्वतंत्रता दी गयी. 1701 ई. में उत्तराधिकार निर्णायक कानून बना. इसके अनुसार ये तय हुआ कि इंग्लैंड का राजा प्रोटेस्टेंट ही होगा. कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका पर संसद का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया. अब राजा की जगह संसद संप्रभु हो गया. राजा की निरंकुशता समाप्त हो गई और संसद की संप्रुभता स्थापित हुई.

अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम

अमेरिका का स्वतंत्रता-संग्राम - American Revolution

आपको पता ही होगा कि क्रिस्टोफ़र कोलम्बस ने अमेरिका का पता लगाया था. अमेरिका का पता लगने के बाद यूरोप के बड़े-बड़े धनवान लोगों ने अमेरिका को बाँटना शुरू कर दिया. स्पेन, पुर्तगाल, हॉलैंड, फ्रांस औरइंग्लैंड ने वहाँ अपनी बस्तियाँ बसायीं. अमेरिका में अंग्रेजों के 13 उपनिवेश (Colonies) थे. उपनिवेशों में रहनेवाले अंग्रेज स्वतंत्रता-प्रेमी थे. वे अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मातृभूमि छोड़कर उपनिवेशों में जा बसे थे. लेकिन जब जॉर्ज तृतीय (George III of the United Kingdom) ने उपनिवेशों पर अपना निरंकुश शासन लादना चाहा तो स्वतंत्रता-प्रेमी उपनिवेशवासियों ने विद्रोह कर दिया.

किसी भी देश में क्रांति की बीज वहाँ की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक अवस्थाओं में छिपा रहता है जो अनुकूल परिस्थिति पाकर प्रस्फुटित होता है.

अमेरिका के स्वतंत्रता-संग्राम ( American Revolution) ने सर्वप्रथम  यह उदाहरण उपस्थित किया कि जागृत राष्ट्रीय भावना को कुचलना मुश्किल है…याद कीजिये हमने 1857 की भारतीय क्रांति में क्या पढ़ा था? अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम (American Revolution) ने पूँजीवाद को बढ़ाने का मौका दिया. अमेरिका पहला देश बना जिसने वंशानुगत राजतंत्र का अंत कर प्रजातंत्र की स्थापना की.

अमेरिकी उपनिवेशों औरइंग्लैंड के बीच संघर्ष अनिवार्य था. इसके पीछे कारण यह था कि उनके राजनीतिक, आर्थिक, सामजिक और धार्मिक जीवन में इतना फर्क था कि अधिक दिनों तक उनके बीच मधुर सम्बन्ध कायम नहीं रह सकता था. यदि अमेरिका में होने वाले स्वातंत्र्य-संग्राम (American Revolution) के कारणों की बात करें तो संक्षेप में हम इन कारणों को निम्नवत रूप से रख सकते हैं -

American Revolution's Causes

i) धार्मिक मतभेद

उपनिवेशवासियों और अंग्रेजों के धार्मिक दृष्टिकोण में भिन्नता क्रांति का एक महत्त्वपूर्ण कारण थी. इंग्लैंड के अधिकांश निवासी का Anglicanism (what is Anglicanism, check WIKI)… की तरफ झुकाव था. वे बिशप (Bishop) और धर्म के आधिपत्य पर विश्वास रखते थे, उपनिवेशवासी प्यूरिटन (Puritan) मतावलम्बी थे. वे Anglican मत से घृणा करते थे.  बिशप-व्यवस्था और धर्म के आधिपत्य के विरोधी थे. धार्मिक भिन्नता के कारण उपनिवेशवासी इंग्लैंड के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखना चाहते थे.

ii) सामाजिक भिन्नता

अमेरिका की सामाजिक संरचनाइंग्लैंड की सामाजिक संरचना से भिन्न थी.इंग्लैंड का समाज सामंती था जबकि अमेरिका का समाज जनतंत्रात्मक था. इंग्लैंड का समाज रुढ़िवादी और कृत्रिम था, जबकि अमेरिका का समाज मौलिक और आदर्शवादी था. रुढ़िवादी और प्रगतिशील समाज में कभी समन्वय नहीं हो सकता. अंग्रेजों की राजनीति पर धनिकों का प्रभाव था. अंग्रेजी राजनीति में गरीबों के लिए कोई स्थान नहीं था. अमेरिका के समाज में अमीर-गरीब की भावना नहीं थी.

iii) असंतोषजनक शासन-प्रणाली

उपनिवेशों में बसनेवाले अंग्रेज अपने साथ इंग्लैंड की मान्यताएँ और संस्थाएँ भी लेते आये थे. उपनिवेशों की शासन-प्रणाली असंतोषजनक थी. कार्यकारिणी और व्यस्थापिका में निरंतर संघर्ष होता रहता था. उपनिवेश का गवर्नर इंग्लैंड के राजा नियुक्त होता था. गवर्नर को विशेषाधिकार प्राप्त था. वह व्यवस्थापिका सभा भी गवर्नर के वेतन को रोककर उस पर नियंत्रण रख सकती थी. उपनिवेशवासी व्यवस्थापिका सभा को सर्वशक्तिशाली संस्था मानते थे लेकिन ब्रिटेन की सरकार उसे अधीनस्थ एवं स्थानीय संस्था मानती थी. फलतः दोनों में संघर्ष स्वाभाविक था.

उपनिवेशवासियों को राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा गया था. ब्रिटिश शासकों का विचार था कि उपनिवेशवासियों में शासन करने की योग्यता नहीं है. इसलिए बड़े-बड़े पदों  पर अंग्रेजों को ही नियुक्ति किया जाता था. ब्रिटिश सरकार की इस नीति से भी उपनिवेशवासी असंतुष्ट थे.

iv) जातीय समानता

उपनिवेशवासियों की धमनियों में  भी अंग्रेजी रक्त प्रवाहित हो रहा था. वे भी अंग्रेजों की तरह स्वतंत्रता और स्वराज्य के पुजारी थे और गुलामी की जंजीर को तोड़ देना चाहते थे. अपनी ही जाति के लोगों द्वारा शासित होना उपनिवेशवासियों को अरुचिकर प्रतीत होता था.

v) उपनिवेशवासियों का ब्रिटेन के प्रति रुख

इंग्लैंड के सताए हुए कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट ही उपनिवेशों में जाकर बसे थे. वे वहाँ स्वतंत्रता की साँस लेना चाहते थे. किन्तु जब इंग्लैंड की सरकार ने उपनिवेशों को भी अत्याचार और अन्याय का अखाड़ा बना दिया तो वे विद्रोह कर उठे.

vi) स्वायत्त शासन की भावना का विकास

अमेरिका की भौगोलिक स्थिति के कारण इंग्लैंड की सरकार उपनिवेशों के मामलों में दिलचस्पी नहीं ले रही थी. दूरी और यातायात के साधनों  के अभाव के कारण इंग्लैंड की सरकार उपनिवेशों पर नितंत्रण रखने में असमर्थ थी. इसलिए उपनिवेशवासियों ने शासन सम्बन्धी समस्याओं का समाधान स्वयं खोज निकला और उनमें स्वशासन की भावना जगी. इंग्लैंड की प्रजातांत्रिक परम्परा में  पीला उपनिवेशवासी उत्तरदायी शासन के गुणों का उपयोग करना चाहते थे.

vii) बुद्धिजीवी वर्ग का नेतृत्व

जनक्रांति का नेतृत्व हमेशा ही बुद्धिजीवी वर्ग करता है. उपनिवेशवासियों को संघर्ष का नारा अंग्रेजों से ही मिला था. जॉन लॉक, रूसो, वाल्टेयर, मांटेस्क्यू जैसे दार्शिनकों का प्रभाव उपनिवेशवासियों पर पड़ा था. टॉमस पेन, जेम्स ओरिस जैसे लेखकों ने राजा के दैवी अधिकार के विरुद्ध आवाज़ उठाई, इससे भी लोगों में जागरण आया.

viii) व्यापारिक एवं औद्योगिक प्रतिबंध

उपनिवेशों के वाणिज्य-व्यवसाय पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए थे. वे इंग्लैंड के साथ व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता नहीं कर सकते थे और न इंग्लैंड के शत्रु-देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध कायम कर सकते थे. वस्तुओं के आयात-निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा हुआ था. इंग्लैंड और उपनिवेशों के बीच तथा उपनिवेशों एवं अन्य  यूरोपीय देशों के बीच वस्तुओं का आयात-निर्यात ब्रिटिश जहाज़ों के द्वारा ही होता था. कुछ व्यापार सम्बन्धी कानून भी थे. कुछ वस्तुएँ कपास, चीनी, तम्बाकू केवल इंग्लैंड ही भेजी का सकती थीं. वस्तुओं के उत्पादन पर भी प्रतिबंध लगाया गया था. उपनिवेशवासी लोहा, सूती कपड़ों जैसी आवश्यक वस्तुओं का उद्योग अपने यहाँ अलग नहीं कर सकते थे. औद्योगिक एवं व्यापारिक प्रतिबंधों के कारण उपनिवेशों की औद्योगिक एवं व्यापारिक प्रगति नहीं हो रही थी. इससे उपनिवेशवासी काफी असंतुष्ट थे और वे परतंत्रता की बेड़ी को तोड़ देना चाहते थे.

ix) सप्तवर्षीय युद्ध के परिणाम

इस युद्ध के परिणामस्वरूप उपनिवेशवासियों में आत्मविश्वास की भावना जगी. अमेरिकन सैनिकों ने अंग्रेज़ सैनकों के साथ मिलकर फ्रांस का मुकाबला युद्ध में किया था. उन्हें विश्वास हो गया कि वे अंग्रेजों से अच्छा लड़ सकते हैं. आर्थिक स्थितियाँ में सुधार और शिक्षा के विकास के कारण उपनिवेशों में मध्यम वर्ग का जन्म हुआ जो राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए प्रयास करने लगा. इस वर्ग के लोग स्वतंत्रता के इस संग्राम (American Revolution) के अग्रदूत बने.

x) तात्कालिक कारण

अमेरिका के स्वतंत्रता-संग्राम (American Revolution) का तात्कालिक ग्रेनविल के कुछ आपत्तिजनक कार्य थे. सप्तवर्षीय युद्ध के परिणामस्वरूप आर्थिक संकट पैदा हो गया था. किसान और मजदूर अपनी सीमा से बाहर जाकर आदिवासियों की भूमि आबाद करना चाहते थे, लेकिन ग्रेनविल ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया. ग्रेनविल ने नेविगेशन एक्ट कड़ाई से लागू किया. चोरबाजारी सम्बन्धी मामलों की जाँच के लिए admiralty court की स्थापना की गई. 1733 ई. में Molasses Act बना - . a British law that imposed a tax on molasses, sugar, and rum imported from non-British foreign colonies into the North American colonies. ग्रेनविल ने चुंगी की वसूली में सख्ती दिखलाई. बंदरगाहों पर अंग्रेज कर्मचारी तैनात किए गए और टैक्स नहीं देनेवालों के घर की तलाशी ली जाती थी.  1765 में Stamp Act बनाया गया. अब अखबारों, कानूनी कागजातों, बंधक सम्बन्धी दस्तावेजों और इश्तहारों पर सरकारी टिकट लगाना अनिवार्य कर दिया गया. इस कानून के कारण उपनिवेशों के पात्र-प्रकाशकों, इश्तहार निकाल्नेवालों, वकीलों, व्यापारियों को भारी क्षति उठानी पड़ी. उपनिवेशवासियों के विरोध के कारण 1766 ई. में स्टाम्प एक्ट को बंद कर दिया गया. लेकिन यह स्पष्ट कर दिया गया कि ब्रिटिश सरकार को उपनिवेशों पर कर लगाने का अधिकार है.

1789 फ्रांस की क्रांति

[विश्व इतिहास] फ्रांस की क्रांति - 1789 French Revolution

फ्रांस की क्रांति (French Revolution): भूमिका

18वीं शताब्दी के 70-80 के दशकों में विभिन्न कारणों से राजा और तत्कालीन राजव्यवस्था के प्रति फ्रांस के नागरिकों में विद्रोह की भावना पनप रही थी. यह विरोध धीरे-धीरे तीव्र होता चला गया. अंततोगत्वा 1789 में राजा लुई 16वाँ (Louis XVI) को एक सभा बुलानी पड़ी. इस सभा का नाम General State था. यह सभा कई वर्षों से बुलाई नहीं गयी थी. इसमें सामंतों के अतिरिक्त सामान्य वर्ग के भी प्रतिनिधि होते थे. इस सभा में जनता की माँगों पर जोरदार बहस हुई. स्पष्ट हो गया कि लोगों में व्यवस्था की बदलने की बैचैनी थी. इसी बैचैनी का यह परिणाम हुआ कि इस सभा के आयोजन के कुछ ही दिनों के बाद सामान्य नागरिकों का एक जुलूस बास्तिल नामक जेल पहुँच गया और उसके दरवाजे तोड़ डाले गए. सभी कैदी बाहर निकल गए. सच पूंछे तो नागरिक इस जेल को जनता के दमन का प्रतीक मानते थे. कुछ दिनों के बाद महिलाओं का एक दल राजा के वर्साय स्थित दरबार को घेरने निकल गया जिसके फलस्वरूप राजा को पेरिस चले जाना पड़ा. इसी बीच General State ने कई क्रांतिकारी कदम भी उठाना शुरू किए. यथा -  मानव के अधिकारों की घोषणा, मेट्रिक प्रणाली का आरम्भ, चर्च के प्रभाव का समापन, सामंतवाद की समाप्ति की घोषणा, दास प्रथा के अंत की घोषणा आदि. General State के सदस्यों में मतभेद भी हुए. कुछ लोग क्रांति के गति को धीमी रखना चाहते थे. कुछ अन्य प्रखर क्रान्ति के पोषक थे. इन लोगों में आपसी झगड़े भी होने लगे पर इनका नेतृत्व कट्टर क्रांतिकारियों के हाथ में रहा. बाद में इनके एक नेता Maximilian Robespierre हुआ जिसने हज़ारों को मौत के घाट उतार दिया. उसके एक वर्ष के नेतृत्व को आज भी आतंक का राज (Reign of terror) कहते हैं. इसकी परिणति स्वयं Louis 16th और उसकी रानी की हत्या से हुई. राजपरिवार के हत्या के पश्चात् यूरोप के अन्य राजाओं में क्रोध उत्पन्न हुआ और वे लोग संयुक्त सेना बना-बना कर क्रांतिकारियों के विरुद्ध लड़ने लगे. क्रांतिकारियों ने भी एक सेना बना ली जिसमें सामान्य वर्ग के लोग भी सम्मिलित हुए. क्रान्ति के नए-नए उत्साह के कारण क्रांतिकारियों की सेना बार-बार सफल हुई और उसका उत्साह बढ़ता चला गया. यह सेना फ्रांस के बाहर भी भूमि जीतने लगी. इसी बीच इस सेना का एक सेनापति जिसका नाम नेपोलियन बोनापार्ट था, अपनी विजयों के कारण बहुत लोकप्रिय हुआ. इधर फ्रांस के अन्दर कट्टर क्रांति से लोग ऊब चुके थे. इसका लाभ उठाते हुए और अपनी लोकप्रियता को भुनाते हुए नेपोलियन ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया और एक Consulate बना कर शासन चालने लगा. यह शासन क्रांतिकारी सिद्धांतों पर चलता रहा. अंततः नेपोलियन ने सम्राट की उपाधि अपने आप को प्रदान की और इस प्रकार फ्रांसमें राजतंत्र दुबारा लौट आया. इस प्रकार हम कह सकते हैं फ्रांस की क्रांति (French Revolution) अपनी चरम अवस्था में थी.

1789 ई. की फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution) आधुनिक युग की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी. यह क्रांति (French Revolution) निरंकुश राजतंत्र, सामंती शोषण, वर्गीय विशेषाधिकार तथा प्रजा की भलाई के प्रति शासकों की उदासीनता के विरुद्ध प्रारंभ हुई थी. उस समय फ्रांस में न केवल शोषित और असंतुष्ट वर्ग की विद्दमान थे, बल्कि वहाँ के आर्थिक और राजनैतिक ढाँचा में भी विरोधाभास देखा जा सकता था. राजनैतिक शक्ति का केन्द्रीकरण हो चुका था. सम्पूर्ण देश की धुरी एकमात्र राज्य था. समाज का नेतृत्व शनैः शनैः बुद्धिजीवी वर्ग के हाथ में आ रहा था. राजा शासन का सर्वोच्च अधिकारी होता था. राजा की इच्छाएँ ही राज्य का कानून था. लोगों को किसी प्रकार का नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं था. राजा के अन्यायों और अत्याचारों से आम जनता परेशान थी. भाषण, लेखन और प्रकाशन पर कड़ा प्रतिबंध लगा हुआ था. लोगों को धार्मिक स्वंतत्रता भी  नहीं दी गयी थी. राष्ट्र की सम्पूर्ण आय पर राजा का निजी अधिकार था. सम्पूर्ण आमदनी राजा-रानी और दरबारियों के भोग-विलास तथा आमोद-प्रमोद पर खर्च हो जाता था. राज्य के उच्च पदों पर राजा के कृपापात्रों की नियुक्ति होती थी. स्थानीय स्वशासन का अभाव था. फ्रांसीसी समाज दो टुकड़ों में बँट कर रह गया था - एक सुविधा-प्राप्त वर्ग और दूसरा सुविधाहीन वर्ग. 

फ्रांस की क्रांति (French Revolution) का प्रभाव विश्वव्यापी हुआ. इसके फलस्वरूप निरंकुश शासन तथा सामंती व्यवस्था का अंत हुआ. प्रजातंत्रात्मक शासन-प्रणाली की नींव डाली गई. सामजिक, आर्थिक और धार्मिक व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण सुधार लाये गए.

राजनैतिक कारण

i) निरंकुश राजतंत्र

राजतंत्र की निरंकुशता फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution) का एक प्रमुख कारण था. राजा शासन का सर्वोच्च अधिकारी होता था. वह अपनी इच्छानुसार काम करता था. वह अपने को ईश्वर का प्रतिनिधि बतलाता था. राजा के कार्यों के आलोचकों को बिना कारण बताए जेल में डाल दिया जाता था. राजा के अन्यायों और अत्याचारों से आम जनता तबाह थी. वह निरंकुश से छुटकारा पाने के लिए कोशिश करने लगी.

ii) स्वतंत्रताओं का अभाव

फ्रान्स में शासन का अति केन्द्रीकरण था. शासन के सभी सूत्र राजा के हाथों में थे. भाषण, लेखन और प्रकाशन पर कड़ा प्रतिबंध लगा हुआ था. राजनैतिक स्वतंत्रता का पूर्ण अभाव था. लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता भी नहीं थी. बंदी प्रत्यक्षीकरण नियम की व्यवस्था नहीं थी. न्याय और स्वतंत्रता की इस नग्न अवहेलना के कारण लोगों का रोष धीरे-धीरे क्रांति का रूप ले रहा था.

iii) राजप्रसाद का विलासी जीवन और धन का अपव्यय

राष्ट्र की सम्पूर्ण आय पर राजा का निजी अधिकार था. सम्पूर्ण आमदनी राजा-रानी और दरबारियों के भोग-विलास तथा आमोद-प्रमोद पर खर्च हुआ होता था. रानी बहुमूल्य वस्तुएँ खरीदने में अपार धन खर्च करती थी. एक ओर किसानों, श्रमिकों को भरपेट भोजन नहीं मिलता था तो दूसरी ओर सामंत, कुलीन और राजपरिवार के सदस्य विलासिता का जीवन बिताते थे.

iv) प्रशासनिक अव्यवस्था

फ्रान्स का शासन बेढंगा और अव्यवस्थित था. सरकारी पदों पर नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं होती थी. राजा के कृपापात्रों की नियुक्ति राज्य के उच्च पदों पर होती थी. भिन्न-भिन्न प्रान्तों में अलग-अलग कानून थे. कानून की विविधता के चलते स्वच्छ न्याय की आशा करना बेकार था.

सामजिक कारण

i) पादरी वर्ग

फ्रांसमें रोमन कैथोलिक चर्च की प्रधानता थी. चर्च एक स्वतंत्र संस्था के रूप में काम कर रहा था. इसका अपना अलग संगठन था, अपना न्यायालय था और धन प्राप्ति का स्रोत था. देश की भूमि का पाँचवा भाग चर्च के पास था. चर्च की वार्षिक आमदनी करीब तीस करोड़ रुपये थी. चर्च स्वयं करमुक्त था, लेकिन उसे लोगों पर कर लगाने का विशेष अधिकार प्राप्त था. चर्च की अपार संपत्ति से बड़े-बड़े पादरी भोग-विलास का जीवन बिताते थे. धर्म के कार्यों से उन्हें कोई मतलब नहीं था. वे पूर्णतया सांसारिक जीवन व्यतीत करते थे.

ii) कुलीन वर्ग

फ्रांसका कुलीन वर्ग सुविधायुक्त एवं सम्पन्न वर्ग था. कुलीनों को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे. वे राजकीय कर से मुक्त थे. राज्य, धर्म और सेना के उच्च पदों पर कुलीनों की नियुक्ति होती थी. वे किसानों से कर वसूल करते थे. वे वर्साय के राजमहल में जमे रहते और राजा को अपने प्रभाव में बनाए रखने की पूरी कोशिश करते थे. कुलीनों के विशेषाधिकार और उत्पीड़न ने साधारण लोगों को क्रांतिकारी बनाया था.

iii) कृषक वर्ग

किसानों का वर्ग सबसे अधिक शोषित और पीड़ित था. उन्हें कर का बोझ उठाना पड़ता था. उन्हें राज्य, चर्च और जमींदारों को अनेक प्रकार के कर देने पड़ते थे. कृषक वर्ग अपनी दशा में सुधार लान चाहते थे और यह सुधार सिर्फ एक क्रांति द्वारा ही आ सकती थी.

iv) मजदूर वर्ग

मजदूरों और कारीगरों की दशा अत्यंत दयनीय थी. औद्योगिक क्रान्ति के कारण घरेलू उद्योग-धंधों का विनाश हो चुका था और मजदूर वर्ग बेरोजगार हो गए थे. देहात के मजदूर रोजगार की तलाश में पेरिस भाग रहे थे. क्रांति के समय (French Revolution) मजदूर वर्ग का एक बड़ा गिरोह तैयार हो चुका था.

v) मध्यम वर्ग

माध्यम वर्ग के लोग सामजिक असमानता को समाप्त करना चाहते थे. चूँकि तत्कालीन शासन के प्रति सबसे अधिक असंतोष मध्यम वर्ग में था, इसलिए क्रांति (French Revolution) का संचालन और नेतृत्व इसी वर्ग ने किया.

आर्थिक कारण

विदेशी युद्ध और राजमहल के अपव्यय के कारण फ्रांस की आर्थिक स्थिति लचर हो गयी थी. आय से अधिक व्यय हो चुका था. खर्च पूरा करने के लिए सरकार को कर्ज लेना पड़ रहा था. कर की असंतोषजनक व्यवस्था के साथ-साथ शासकों की फिजूलखर्ची से फ्रांसकी हालत और भी ख़राब हो गई थी.

बौधिक जागरण 

विचारकों और दार्शनिकों ने फ्रांसकी राजनैतिक एवं सामाजिक बुराइयों की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया और तत्कालीन व्यवस्था के प्रति असंतोष, घृणा और विद्रोह की भावना को उभरा. Montesquieu, Voltaire, Jean-Jacques Rousseau के विचारों से मध्यम वर्ग सबसे अधिक प्रभावित था. Montesquieu ने समाज और शासन-व्यवस्था की प्रसंशा Power-Separation Theory का प्रतिपादन किया. वाल्टेयर ने सामाजिक एवं धार्मिक कुप्रथाओं पर प्रहार किया. रूसो ने राजतंत्र का विरोध किया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बल दिया. उसने जनता की सार्वभौमिकता के सिद्धांत (Principles of Rational and Just Civic Association) का प्रतिपादन किया. इन लेखकों ने लोगों को मानसिक रूप से क्रान्ति के लिए तैयार किया.

सैनिकों में असंतोष

फ्रांस की सेना भी तत्कालीन शासन-व्यवस्था से असंतुष्ट थी. सेना में असंतोष फैलते ही शासन का पतन अवश्यम्भावी हो जाता है. सैनिकों को समय पर वेतन नहीं मिलता था. उनके खाने-पीने तथा रहने की उचित व्यवस्था नहीं थी. उन्हें युद्ध के समय पुराने अस्त्र-शस्त्र दिए जाते थे. ऐसी स्थिति में सेना में रोष का उत्पन्न होना स्वाभाविक था.

फ्रांसीसी क्रांति के परिणाम

निरंकुश शासन का अंत कर प्रजातंत्रात्मक शासन-प्रणाली की नींव डाली गई. प्रशासन के साथ-साथ सामजिक, धार्मिक एवं आर्थिक जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए. फ्रांस की क्रांति (French Revolution) ने निरंकुश शासन का अंत कर लोकप्रिय संप्रभुता के सिद्धांत को प्रतिपादित किया. क्रांति के पूर्व फ्रांसऔर अन्य यूरोपीय देशों के शासक निरंकुश थे. उनपर किसी प्रकार का वैधानिक अंकुश नहीं था. क्रांति ने राजा के विशेषाधिकारों और दैवी अधिकार सिद्धांत पर आघात किया. इस क्रांति के फलस्वरूप सामंती प्रथा (Feudal System) का अंत हो गया. कुलीनों के विदेषाधिकार समाप्त कर दिए गए. किसानों को सामंती कर से मुक्त कर दिया गया. कुलीनों और पादरियों के विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गये. लोगों को भाषण-लेखन तथा विचार-अभीव्यक्ति का अधिकार दिया गया. फ्रांस की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए  कर-प्रणाली (tax system) में सुधार लाया गया. कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका को एक-दूसरे से पृथक् कर दिया गया. अब राजा को संसद के परामर्श से काम करना पड़ता था. न्याय को सुलभ बनाने के लिए न्यायालय का पुनर्गठन किया गया. सरकार के द्वारा सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था की गई. फ्रांसमें एक एक प्रकार की शासन-व्यवस्था स्थापित की गई, एक प्रकार के आर्थिक नियम बने और नाप-तौल की नयी व्यवस्था चालू की गई. लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता मिली. उन्हें किसी भी धर्म के पालन और प्रचार का अधिकार मिला. पादरियों को संविधान के प्रति वफादारी की शपथ लेनी पड़ती थी. French Revolution ने लोगों को विश्वास दिलाया कि राजा एक अनुबंध के अंतर्गत प्रजा के प्रति उत्तरदायी है. यदि राजा अनुबंध को भंग करता है तो प्रजा का अधिकार है कि वह राजा को पदच्युत कर दे. यूरोप के अनेक देशों में निरंकुश राजतंत्र को समाप्त कर प्रजातंत्र की स्थापना की गयी.

 

स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन

स्वामी दयानंद सरस्वती की जीवनी और आर्य समाज

उन्नीसवीं शताब्दी यूँ तो समाज सुधारकों और धर्म सुधारकों का युग है और इस युग में कई ऐसे महापुरुष हुए जिन्होनें समाज में व्याप्त अन्धकार को दूर कर नयी किरण दिखाने की चेष्टा की. इनमें आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती (Swami Dayananda Saraswati) का नाम सर्वप्रमुख है. स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के माध्यम से भारतीय संस्कृति को एक श्रेष्ठ संस्कृति के रूप में पुनर्स्थापित किया. ये हिन्दू समाज के रक्षक थे. आर्य समाज आन्दोलन भारत के बढ़ते पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था. उन्होंने 'वेदों की और लौटने - Back to Veda” का नारा बुलंद किया था. आज हम दयानंद सरस्वती के जीवन और उनके द्वारा संस्थापित आर्य समाज (Arya Samaj) के विषय में पढ़ेंगे.

दयानंद सरस्वती का जन्म

स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 1824 ई. में काठियावाड़, गुजरात में हुआ था. उनके बचपन का नाम मूलशंकर था. बालक मूलशंकर को अपने बाल्यकाल से ही सामजिक कुरीतियों और धार्मिक आडम्बरों से चिढ़ थी. स्वामी दयानंद को भारत के प्राचीन धर्म और संस्कृति में अटूट आस्था थी. उनका कहना था कि वेद भगवान् द्वारा प्रेरित हैं और समस्त ज्ञान के स्रोत हैं. उनके अनुसार वैदिक धर्म के प्रचार से ही व्यक्ति, समाज और देश की उन्नति संभव है. अतः दयानंद सरस्वती ने अपने देशवासियों को पुनः वेदों की ओर लौटने का सन्देश दिया. आर्य समाज की स्थापना के द्वारा उन्होंने हिन्दू समाज में नवचेतना का संचार किया.

कुरीतियों पर प्रहार

देश में प्रचलित सभी धार्मिक और सामजिक कुरीतियों के खिलाफ स्वामी दयानंद सरस्वती ने बड़ा कदम उठाया. उन्होंने जाति भेद, मूर्ति पूजा, सती-प्रथा, बहु विवाह, बाल विवाह, बलि-प्रथा आदि प्रथाओं का घोर विरोध किया. दयानंद सरस्वती ने पवित्र जीवन तथा प्राचीन हिन्दू आदर्श के पालन पर बल दिया. उन्होंने विधवा विवाह और नारी शिक्षा की भी वकालत की. सबसे ज्यादा उन्हें जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता से चिढ़ थी और इसे समाप्त करने के लिए उन्होंने कई कठोर कदम उठाए. आर्य समाज की स्थापना कर उन्होंने अपने सारे विचारों को मूर्त रूप प्रदान करने की चेष्टा की. 1877 ई. में लाहौर में आर्य समाज के शाखा की स्थापना की गई थी (a branch was established).

आर्य समाज (Arya Samaj) के सिद्धांत 

  1. ईश्वर एक है, वह सत्य और विद्या का मूल स्रोत है.
  2. ईश्वर सर्वशक्तिमान, निराकार, न्यायकारी, दयालु, अजर, अमर और सर्वव्यापी है, अतः उसकी उपासना की जानी चाहिए.
  3. सच्चा ज्ञान वेदों में निहित है और आर्यों का परम धर्म वेदों का पठन-पाठन है.
  4. प्रत्येक व्यक्ति को सदा सत्य ग्रहण करने तथा असत्य का त्याग करने के लिए प्रस्तुत रहना चाहिए.
  5. समस्त समाज का प्रमुख उद्देश्य मनुष्य जाति की शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक उन्नति होनी चाहिए. तभी समस्त विश्व का कल्याण संभव है.
  6. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए तथा पारस्परिक सम्बन्ध का आधार प्रेम, न्याय और धर्म होना चाहिए.
  7. प्रत्येक व्यक्ति को अपनी उन्नति और भलाई में ही संतुष्ट नहीं रहना चाहिए बल्कि सब की भलाई में अपनी भलाई समझनी चाहिए.
  8. प्रत्येक आदमी को व्यक्तिगत मामलों में आचरण की स्वतंत्रता रहनी चाहिए. लेकिन सर्वहितकारी नियम पालन सर्वोपरि होना चाहिए.

स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना कर भारत के सामजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन को नई दिशा प्रदान की. वे दलितों के उत्थान, स्त्रियों के उद्धार के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व कार्य किये. उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य को प्रोत्साहन दिया. हिंदी भाषा में ग्रंथों की रचना कर इन्होंने राष्ट्रीय गौरव बढ़ाया. इनके पूर्व भारतीय समाज में स्त्री शिक्षा की कोई भी व्यवस्था नहीं थी. इन्होंने स्त्रियों को शिक्षित बनाने पर बल दिया और वेद-पाठ करने की आज्ञा दी. संस्कृत भाषा के महत्त्व को पुनः स्थापित किया गया. इन्होनें ब्रह्मचर्य और चरित्र-निर्माण की दृष्टि से प्राचीन गुरुकुल प्रणाली के द्वारा छात्रों को शिक्षित करने की प्रथा शुरू की.

इस प्रकार स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के माध्यम से न केवल हिन्दू धर्म को नया रूप देने की चेष्टा की बल्कि समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों को दूर कर उसे शिक्षित तथा सभी बनाने का प्रयास भी किया.

दयानंद सरस्वती की मृत्यु

दयानंद सरस्वती (Swami Dayanand Saraswati's demise) की मृत्यु के बाद आर्य समाज दो भागों में बँट गया. एक दल का नेतृत्व लाला हरदयाल करते थे जो पश्चिमी शिक्षा पद्धति के समर्थक थे, दूसरे दल का नेतृत्व महात्मा मुंशी राम करते थे जो प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के समर्थक थे. आर्य समाज के प्रयास से अनेक अनाथालयों, गोशालाओं और विधवा आश्रमों का निर्माण किया गया. इस प्रकार हम देखते हैं कि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज आन्दोलन के माध्यम से हिन्दू समाज में नवचेतना और आत्मसम्मान का संचार किया. इस आन्दोलन के द्वारा धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में जो परिवर्तन हुआ उससे एक नयी राजनीतिक चेतना का जन्म हुआ और हमने अपनी संस्कृति की रक्षा हेतु अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की.

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान समाचार पत्र

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान समाचार पत्र तथा पत्रिकाएँ व उनके संस्थापक

Writers/Founders of Newspapers and Magazines During Freedom Struggle in Indian History

समाचार पत्रसंस्थापक
बंगाल गजट (1780)
(भारत का पहला समाचार पत्र)
जे.के. हिक्की
केसरीबाल गंगाधर तिलक
अमृत बाजार पत्रिकाशिशिर कुमार घोष और मोतीलाल घोष
हिन्दूवीर राघवाचार्य और जी.एस. एयर
वन्दे मातरम्अरविन्द घोष
स्टेट्समेनरोबर्ट नाइट
कविवचन सुधाभारतेंदु हरिश्चंद्र
राष्ट गोफ्तर
(गुजरात का सबसे पहला अखबार)
दादाभाई नौरोजी
मुखनायकबी.आर. अम्बेडकर
युगांतरभूपेन्द्रनाथ दत्ता और बिरेन्द्र कुमार घोष
हिंदुस्तानएम.एम. मालवीय
पंजाबीलाला लाजपत राय
कॉमरेडमुहम्मद अली
तहजीब-उल-अखलाकसर सैय्यद अहमद खान
बाम्बे क्रोनिकलफिरोज शाह मेहता
अल हिलालअबुल कलाम आजाद
अल बालाघअबुल कलाम आजाद
इंडिपेंडेंटमोतीलाल नेहरु
प्रतापगणेश शंकर विद्यार्थी
न्यू इंडिया (डेली)एनी बेसेंट
संवाद कौमुदी (बंगाली)राजा राममोहन राय
यंग इंडियागाँधीजी
मिरत-उल-अकबर
(पहला पर्सियन समाचार पत्र)
राजा राममोहन राय
हरिजनगाँधीजी
हिन्दुस्तान टाइम्सके.एम. पन्निकर

स्थाई बंदोबस्त

स्थायी बंदोबस्त क्या है? Permanent Settlement in Hindi

लॉर्ड कार्नवालिस का शासनकाल अपने प्रशानिक सुधारों के लिए हमेशा याद किया जायेगा. उसने साम्राज्य विस्तार की और अधिक ध्यान न देकर आंतरिक सुधारों की ओर विशेष ध्यान दिया. कम्पनी शासन में निष्पक्षता और दृढ़ता लाने में उसे काफी सफलता मिली. उसने कम्पनी की सेवा, लगान व्यवस्था, न्याय और व्यापार सम्बन्धी अनेकों सुधार किये. लगान व्यवस्था के क्षेत्र में उसके द्वारा किया गया स्थायी बंदोबस्त (permanent settlement) ब्रिटिश शासन के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है.

कार्नवालिस (Cornwallis) का सबसे महत्त्वपूर्ण सुधार राजस्व व्यवस्था एवं उसकी वसूली का प्रबंध करना था. अभी तक कंपनी वार्षिक ठेका के आधार पर लगान वसूलती थी. सबसे ऊंची बोली बोलने वाले को जमीन दी जाती थी. इससे कंपनी और किसान दोनों को परेशानी होती थी. लॉर्ड कार्नवालिस ने 1793 ई. में स्थायी व्यवस्था लागू की. स्थायी बंदोबस्त के आधार पर जमींदार भूमि के स्वामी बना दिए गए. जब तक जमींदार सरकार को निश्चित लगान देते रहते थे तब तक भूमि पर उनका अधिकार सुरक्षित रहता था. लगान नहीं देने की स्थिति में उन्हें अधिकार से वंचित किया जा सकता था. सरकार के साथ किसानों को कोई सम्बन्ध नहीं था. स्थाई बंदोबस्त को व्यवाहारिक रूप देकर कार्नवालिस भारत में जमींदारों का एक शक्तिशाली वर्ग तैयार करना चाहता था जो अंग्रेजों का हित चिन्तक रहे. लगान की रकम निश्चित कर देने से अंग्रेज़ अधिकारी भी प्रतिवर्ष लगान वसूलने के झंझट से मुक्त हो गए.

स्थायी बंदोबस्त से जमींदारों को लाभ

स्थायी बंदोबस्त से सबसे ज्यादा लाभ जमींदारों को हुआ. वे जमीन के वास्तविक स्वामी बन गए और उनका यह अधिकार वंशानुगत था. यह वर्ग भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ को मजबूत करने में सहयोग करने लगे. दूसरी ओर भूमि पर स्थाई स्वामित्व ही जाने से वे कृषि विकास के कार्य में रूचि लेने लगे जिससे उत्पादन में वृद्धि होने लगी. उत्पादन में वृद्धि होने से जमींदारों को अधिक लाभ प्राप्त होने लगा. कंपनी को भी प्रतिवर्ष एक निश्चित आय की प्राप्ति होने लगी. वह बार-बार लगान निर्धारित करने तथा वसूलने के झंझट से मुक्त होकर अपना ध्यान प्रशासनिक क्षमता को बढ़ाने में लगाया. साथ ही अब लगान वसूलने के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं करने से धन की बचत होने लगी. उद्योग-धंधों के विकास और उत्पादन में वृद्धि होने से कंपनी को काफी लाभ हुआ.

स्थाई बंदोबस्त के बुरे परिणाम

दूसरी और स्थायी बंदोबस्त के कई बुरे परिणाम भी निकले. स्थाई बंदोबस्त में जमींदार और कंपनी के बीच समझौता था और किसानों को जमींदारों की दया पर छोड़ दिया गया. जमींदार किसानों का बेरहमी से शोषण करने लगे. किसानों से बेगार, भेंट और उपहार लिया जाने लगा. किसानों को जमीन पर कोई अधिकार नहीं रहा, वे सिर्फ जमीन पर कार्य करते थे. इस नयी व्यवस्था के कारण किसान दिनोंदिन गरीब होते चले गए. गरीब किसानों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कोई कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं था. समाज में आर्थिक शोषण और सामाजिक विषमता की खाई बढ़ती चली गयी. जमींदार किसानों का शोषण कर धनवान बन गए और किसानों की दरिद्रता बढ़ती ही गई.

संथाल का विद्रोह

संथाल विद्रोह 1855 - The Santhal Rebellion in Hindi

संथाल समुदाय झारखण्ड-बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों के पर्वतीय इलाकों - मानभूम, बड़ाभूम, सिंहभूम, मिदनापुर, हजारीबाग, बाँकुड़ा क्षेत्र में रहते थे. कोलों के जैसे ही संथालों ने भी लगभग उन्हीं कारणों के चलते अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया. इस विद्रोह को भी अंग्रेजी सेना ने कुचल डाला. आइए जानते हैं इस विद्रोह के कारण और परिणाम को. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) का दमन किस तरह अंग्रेजों ने किया, इस विद्रोह का महत्त्व क्या है और इस विद्रोह में कौन संथालों के तरफ से आगे खड़ा (प्रमुख नेता) हुआ आदि इस पोस्ट के जरिए जानने की कोशिश करेंगे.

विद्रोह के कारण

संथालों का जीवन-यापन कृषि और वन संपदाओं पर निर्भर था. स्थायी बंदोबस्त (<<पढ़ें) के स्थापना के बाद संथालों के हाथ से खुद की जमीन भी निकल गयी. इसलिए उन्होंने अपना इलाका छोड़ दिया और राजमहल की पहाड़ियों में रहने लगे. यहाँ की जमीन को उन्होंने कृषि के योग्य बनाया, जंगल काटे और घर बनाया. संथालों के इस इलाके को 'दमनीकोह” के नाम से जाना गया. सरकार की नज़र दमनीकोह पर भी पड़ी और वहाँ भी लगान वसूलने के लिए आ टपके. फिर वहाँ जमींदारी स्थापित कर दी गई. अब उस इलाके में जमींदारों, महाजनों, साहूकारों और सरकारी कर्मचारियों का वर्चस्व बढ़ने लगा. बेचारे संथालों पर लगान की राशि इतनी रखी गई कि लगान के बोझ तले वे बिखर गए. दमन का तांडव ऐसा था कि महाजन द्वारा दिए गए कर्ज पर 50 से 500% तक का सूद वसूल किया जाने लगा. वे लगान चुकाने में असमर्थ हो गये. इन सब कारणों के चलते संथाल किसानों की दरिद्रता बढ़ गयी. कर्ज न चुकाने के चलते उनके खेत, मवेशी छीन लिए गए. संथालों को जमींदारों, महाजनों का गुलाम बनना पड़ा. संथालों को कहीं से भी न्याय मिलने वाला नहीं था. सरकारी कर्मचारी, पुलिस, थानेदार आदि महाजनों का ही पक्ष लेते थे. संथालों के हित के विषय में सोचना तो दूर, इनके द्वारा संथालों का धन लूटा गया, आदिवासी स्त्रियों की इज्जत लूटी गई. संथालों को इन सब से बाहर निकालने वाला कोई नहीं था. अंततः उनके जीवन की यह निराशा एक दिन सरकार पर कहर बन कर टूट पड़ी.

विद्रोह का स्वरूप और प्रमुख नेता

1855 ई. में संथालों की क्रोध की सीमा पार कर गई. संथालों को न्याय दिलाने के लिए चार भाई सामने आये. उनके नाम थे - सि द् धूका न्हूचाँ द और भैरव. इन्होंने संथालों को एकजुट किया. सि द् धू  ने खुद को देवदूत बतलाया ताकि संथाल समुदाय उसकी बातों पर विश्वास कर सके. संथालों के अन्दर धर्म भावना पैदा  करने के लिए उसने कहा कि वह भगवान् 'ठाकुर” के द्वारा भेजा गया दूत है जिन्हें वे रोज पूजते हैं. 30 जून, 1855 ई. को इन भाइयों ने सथालों की एक आमसभा बुलाई जिसमें 10,000 संथालों ने भाग लिया. इस सभा में संथालों को यह विश्वास दिलाया गया कि खुद भगवान् ठाकुर की यह इच्छा है कि जमींदारी, महाजनी और सरकारी अत्याचारों के खिलाफ संथाल सम्प्रदाय डट कर विरोध करें. अंग्रेजी शासन को समाप्त कर दिया जाए.

जुलाई 1855 ई. में सथालों ने विद्रोह का बिगुल बजाया. शुरुआत में यह आन्दोलन सरकार विरोधी आन्दोलन नहीं था पर जब संथालों ने देखा कि सरकार भी जमींदारों और महाजनों का पक्ष ले रही है तो उनका क्रोध सरकार पर भी टूट पड़ा. संथालों ने अत्याचारी दरोगा महेश लाल को मार डाला. बाजार, दुकान सब नष्ट कर दिए और थानों में आग लगा दी. कई सरकारी कार्यालयों, कर्मचारियों और महाजनों पर संथालों ने आक्रमण किया. इसके चलते कई बेक़सूर भी मारे गए. भागलपुर और राजमहल के बीच रेल, डाक, तार सेवा आदि सेवा भंग कर दी गई. संथालों ने अंग्रेजी शासन को समाप्त करने की शपथ ले ली थी. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) के आलावा हजारीबाग, बाँकुड़ा, पूर्णिया, भागलपुर, मुंगेर आदि जगहों में आग की तरह फ़ैल रही थी.

संथाल विद्रोह का दमन

ब्रिटिश सरकार संथाल की आक्रमकता देखकर अन्दर से हिल चुकी थी. सरकार ने इस इस हिंसक कार्रवाई को सख्ती से दबाने का ऐलान किया. बिहार के भागलपुर और पूर्णिया से सरकार के द्वारा घोषणापत्र जारी किया गया कि अब संथाल के विद्रोह को जल्द से जल्द कुचल दिया जाए. कलकत्ता केजार बर्रों और पूर्णिया से सेना की एक टुकड़ी संथालों का दमन करने के लिए भेजी गई.  फिर उसके बाद दमन का नग्न-नृत्य शुरू हुआ. संथाल के पास अधिक शक्ति नहीं थी और पर्याप्त शस्त्र-अस्त्र भी नहीं थे. मात्र तीर और धनुष से वे कितने दिन टिकते? फिर भी उन्होंने इस दमन का दबाव बहुत बहादुरी से दिया.

अंततः कई संथालों को गिरफ्तार कर लिया गया और 15 हज़ार से अधिक संथाल सैनिकों द्वारा मार गिराए गए. संथाल के नेता भी गिरफ्तार कर लिए गए और मारे गए. अपने नेता के गिरफ्तारी से संथालों का मनोबल टूट गया और फरवरी 1856 ई. तक संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) समाप्त कर दिया गया.

संथाल विद्रोह का महत्त्व

भले ही हजारों संथालों ने अपने हक के लिए कुर्बानी दी पर उन्होंने ये साबित कर दिया कि निरीह जनता भी दमन और अत्याचार एक हद तक बर्दास्त नहीं कर सकती. सरकार को संथाल की माँगों को बाद में पूरा करने का प्रयास किया जाने लगा. कालांतर में सरकार ने संथालपरगना को जिला बनाया. फिर भी आदिवासियों पर दमन होता ही रहा. संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion) की प्रेरणा लेकर आदिवासियों ने आगे भी सरकार के खिलाफ कई विद्रोह किए.

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...