शिवाजी का बिजय

शिवाजी की विजयें और प्रमुख सफलताएँ - List of Conquests

शिवाजी ने 1645-47 ई. के मध्य जिन तीन किलों पर अधिकार किया वे पहाड़ी दुर्ग थे. कुछ समय बाद (1656 ई. में) उन्होंने जावली (Jawali) पर विजय की. यह विजय शिवाजी के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण विजय थी. इस विजय के बाद -

  1. अब उनके लिए अपने राज्य को दक्षिण-पश्चिम में फैलाना आसान हो गया.
  2. यहाँ से प्राप्त सैनिक (मालवी सैनिक) उसके सबसे पहले सच्चे साथी और सबसे बड़े स्वामिभक्त सैनिक निकले.
  3. शिवाजी को मोरों के वंश द्वारा एकत्र धन और खजाना प्राप्त हुआ जिससे शिवाजी ने अपनी वित्तीय और सैनिक समस्याओं को हल कर लिया.
  4. शिवाजी ने मालव प्रदेश पर अधिकार कर लिया.
  5. उसके बाद उन्होंने रायगढ़ में एक शक्तिशाली दुर्ग बनवाया और पुरंदर के किले जीत लिए और नए किले बनवाये. ये किले बीजापुर राज्य में पड़ते थे.

Shivaji List of Conquests

बीजापुर से संघर्ष

शिवाजी की गतिविधियों से क्रुद्ध होकर बीजापुर के शासक आदिलशाह ने शिवाजी के पिता शाहजी भोंसले को कैद कर लिया. ऐसी विकट परिस्थिति में शिवाजी ने मुग़ल सम्राट शाहजहाँ को औरंगजेब के माध्यम से (औरंगजेब उस समय दक्षिण सूबे का सूबेदार था) प्रार्थना की और उसके सहयोग से अपने पिता को कैद से मुक्त करा लिया. इसके 6 वर्ष बाद तक शिवाजी ने अपनी सैनिक गतिविधियों को बंद रखा.

अफजल खां का वध

मुग़लों के साथ संघर्ष

अफजल खां को पराजित करने के बाद शिवाजी ने बड़े जोश से मुग़ल प्रदेशों में छापे मारने प्रारम्भ कर दिए. औरंगजेब ने 1663 ई. में मुग़ल सेनापति शाइस्ता खां को शिवाजी के विरुद्ध भेजा. प्रारम्भ में उसने अनेक प्रदेश जीत लिए. इसके बाद शाइस्ता खां वर्षा ऋतु गुजारने के लिए पूना में ठहर गया. जब वह पूना में ठहरा हुआ था तो शिवाजी ने उसपर अचानक धावा बोल दिया. शिवाजी ने 15 अप्रैल, 1663 ई. की रात को अपने 400 चुने हुए सहयोगियों के साथ एक बारात के रूप में पूना में प्रवेश किया. उन्होंने शाइस्ता खां को छावनी के भीतर ही घायल कर दिया और उसके बेटे को मौत के घाट उतार दिया. मुग़ल सेना में भगदड़ मच गई. शाइस्ता खां की इस पराजय से मुग़ल दरबार में सनसनी फैल गई.

सूरत की लूट

शिवाजी ने पूना की विजय के बाद 4,000 सैनिकों के साथ मुगलों के अधीनस्थ सूरत शहर पर जोरदार हमला कर दिया. 16 से 20 जनवरी (1664 ई.) तक इस शहर को लूटा गया. शिवाजी की सेना ने करीब एक करोड़ रुपये का माल लूटा.

शिवाजी के विरुद्ध शहजादा मुअज्जम और राजा जयसिंह

औरंगजेब ने शिवाजी को मुँहतोड़ जवाब देने के लिए 1665 ई. में जयसिंह और मुअज्जम के अधीन एक विशाल सेना भेजी. इस बार की लड़ाई में मराठों के सेनापति मुरार नाडेय मारा गया. विवश होकर शिवाजी ने पुरंदर की संधि (22 जून, 1665 ई.) द्वारा शांति स्थापित की. जिसके अनुसार :-

क) शिवाजी अपने अधिकृत 35 किलों में 23 किले मुगलों को सौंप देंगे और 12 किले अपने पास रखेंगे. इन 23 किलों की आय लगान के रूप में प्रतिवर्ष 4 लाख हून थी. शिवाजी के पास जो 12 किले बचे थे, उनसे प्रतिवर्ष 1 लाख हून आय प्राप्त होती थी.

ख) शिवाजी ने 40 लाख हून 13 किश्तों में चुकाने का वादा किया. यह रकम कोंकण और बालाघाट के किलों से प्राप्त होने वाली आमदनी का एक प्रकार से अंश ही था. इन किलों पर शिवाजी के अधिकार को मान्यता दे दी थी.

ग) शिवाजी ने मुग़ल दरबार में व्यक्तिगत रूप से सेवा करने से छूट माँगी. उसके स्थान पर उसके छोटे पुत्र संभाजी को मुग़ल दरबार में 5,000 का मंसब दिया गया.

घ) शिवाजी ने मुग़ल सम्राट के प्रति निष्ठा का वचन दिया और मुगलों को दक्खन में सैनिक सहायता देने का वायदा किया. पुरंदर की सन्धि को इतिहासकार राजा जयसिंह की बड़ी विजय मानते हैं क्योंकि जयसिंह ने इस संधि के द्वारा मुगलों के लिए 23 किले और एक बहुत बड़ी रकम प्राप्त की. साथ ही साथ वह शिवाजी से यह बात मनवाने में भी सफल हुआ कि शिवाजी मुग़ल सम्राट को मिलने व्यक्तिगत रूप से मुग़ल दरबार में जायेंगे.

शिवाजी मुग़ल दरबार में बंदी और उनका वहाँ से बच निकलना

12 मई, 1666 ई. को शिवाजी अपने वायदे के अनुसार आगरा के मुग़ल दरबार में अपने पुत्र संभाजी और 350 सैनिकों के साथ उपस्थित हुआ. शिवाजी को औरंगजेब से उचित सम्मान न मिलने के चलते वे दरबार में ही क्रोधित हो उठे और मुग़ल सम्राट ने उन्हें बंदी बना लिया. परन्तु शिवाजी बड़ी चालाकी से एक टोकरे में बैठकर वहाँ से बच निकलने में सफल हो गए.

सूरत पर पुनः आक्रमण और राज्यारोहण

दक्षिण पहुँचकर शिवाजी ने अपने पुराने किले को पुनः जीत लिया. इस बार औरंगजेब ने जसवंतसिंह और शाहजादा मुअज्जम को भेजा. शिवाजी ने उन्हें पराजित किया और मुगलों से संधि कर ली. इस संधि के फलस्वरूप शीघ्र ही औरंगजेब ने शिवाजी को 'राजा” की उपाधि प्रदान की. शिवाजी को बरार की जागीर भी दे दी गई. परन्तु शिवाजी ने संधि का पालन नहीं किया और सूरत पर पुनः आक्रमण कर दिया. सूरत की दूसरी लूट में भी मराठों को बहुत-सा सोना मिला. दक्षिण में मराठों का इतना आतंक बढ़ गया कि वे मुगल प्रदेशों से चौथ और सरदेशमुखी नामक कर भी वसूल करने लगे. शिवाजी ने केवल लूटमार करके ही स्वयं को संतुष्ट नहीं किया. उनके सामने और भी महान् उद्देश्य थे. उन्होंने 15 जून, 1674 ई. में शाहूजी की मृत्यु के बाद 'छत्रपति महाराज” की उपाधि धारण की.

राज्यारोहण के बाद विजयें और मृत्यु

अपने राज्यारोहण के बाद शिवाजी केवल 6 वर्ष तक ही जीवित रह पाए. इस अवधि में उन्होंने सबसे पहले खानदेश (1675 ई.) आक्रमण किया और 1677 ई. में कर्नाटक पर चढ़ाई करके उसका अधिकांश भाग जीत लिया. शिवाजी ने अपनी मृत्यु से पहले बीजापुर के सुल्तान को मुगलों के विरुद्ध सैनिक सहयोग दिया.

वहाबी आंदोलन

वहाबी आन्दोलन - The Wahabi Movement in Hindi

वहाबी आन्दोलन (Wahabi Movement) की शुरुआत एक इस्लामी पुनरुत्थान आन्दोलन के रूप में हुई थी. इस आन्दोलन को तरीका-ए-मुहम्मदी अथवा वल्लीउल्लाही आन्दोलन के नाम से भी जाना जाता है. यह एक देश विरोधी और सशस्त्र आन्दोलन था जो शीघ्र ही पूरे देश में फ़ैल गया. वहाबी आन्दोलन एक व्यापक आन्दोलन बन चुका था और इसकी शाखाएँ देश के कई हिस्सों में स्थापित की गयीं. इस आन्दोलन को बिहार और बंगाल के किसान वर्गों, कारीगरों और दुकानदारों का समर्थन प्राप्त हुआ. यद्यपि यह एक धार्मिक आन्दोलन था पर कालांतर में इस आन्दोलन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आवाजें उठायीं जाने लगीं. पर इसके पीछे भी एक कारण था जो हम नीचे पढेंगे. ब्रिटिश शासन की समाप्ति तो इस आन्दोलन का उद्देश्य था ही, साथ-साथ सामजिक पुनर्गठन और सामाजिक न्याय की माँग भी वहाबी आन्दोलन की मुख्य माँगे (demands) थीं.

वहाबी आन्दोलन का संस्थापक और उसके कार्य

वहाबी आन्दोलन का संस्थापक सैयद अहमद बरेलवी (1786-1831 ई.) था. यह रायबरेली (उत्तर प्रदेश) का रहने वाला था. इसका जन्म शहर के एक नामी-गिरामी परिवार में हुआ था जो पैगम्बर हजरत मुहम्मद का वंशज मानता था. यह 1821 ई. में मक्का गया और जहाँ इसे अब्दुल वहाब नामक इंसान से दोस्ती हुई. अब्दुल वहाब के विचारों से अहमद बरेलवी अत्यंत प्रभावित हुआ और एक 'कट्टर धर्मयोद्धा” के रूप में भारत वापस लौटा. अब्दुल वहाब के नाम से इस आन्दोलन का नाम वहाबी आन्दोलन रखा गया.

सैयद अहमद बरेलवी एक और इंसान से बहुत प्रभावित हुआ जिसका नाम संत शाह वल्लीउल्लाह था. यह दिल्ली में रहता था और भारत में फिर से इस्लाम का प्रभुत्व हो, इसका इच्छुक था. वे भारत से अंग्रेजों को हटाकर फिर से इस्लामिक शासन लाना चाहते थे. उनका मानना था कि भारत को 'दार-उल-हर्ष (दुश्मनों का देश)” नहीं बल्कि भारत को 'दार-उल-इस्लाम (इस्लाम का देश)” बनाना है जिसके लिए अंग्रेजों से धर्मयुद्ध करना अनिवार्य है. अंग्रेजों को किसी भी प्रकार से सहयोग देना इस्लाम-विरोधी कार्य है, ऐसा उनका मानना था. इस बात का अहमद पर काफी प्रभाव पड़ा. इसलिए अहमद को इस जिहाद (धर्मयुद्ध) का नेता चुन लिया गया. सैयद अहमद की सहायता के लिए एक परिषद् का निर्माण किया गया जिसमें सहायक के रूप में अब्दुल अजीज के दो रिश्तेदारों को नियुक्त किया गया. इसकी संस्थाएँ भारत में अनेक जगह खोली गयीं.

पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में वहाबी का प्रभाव

इमाम बनने के बाद सैयद ने पूरे उत्तर प्रदेश का दौरा कर के इस आन्दोलन का प्रचार-प्रसार किया. इसके समर्थक बढ़ते गए. शिरात-ए-मुस्तकिन नामक एक फारसी ग्रन्थ में सैयद अहमद के विचारों को संकलित किया गया. एकेश्वरवाद और हिजरत यानी दुश्मनों को भारत से भगाने का प्रण लेकर सैयद अहमद ने एक योजना बनाई. इस योजना के अंतर्गत तीन बातों पर गौर फ़रमाया गया -> i) हमारी सेना सशस्त्र हो ii) भारत के हर कोने में उचित नेता को चुनना iii) जिहाद के लिए भारत में ऐसी जहग चुनना जहाँ मुस्लिम अधिक संख्या में रहते हों ताकि वहाबी आन्दोलन (Wahabi Movement) जोर-शोर से पूरे देश में फैले.

इसके लिए पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत को चुना गया. वहाँ कबायली इलाके में सिथाना को केंद्र बनाया गया और भारत के सभी मुस्लिम बहुल नगरों में स्थानीय कार्यालय खोले गए. Bengal Presidency के लिए कलकत्ता को चुना गया और प्रतिनिधित्व खलीफाओं को सौंपी गई.

1826 ई. से यह आन्दोलन सक्रिय हुआ. अपने 3000 समर्थकों के साथ वह पेशावर गया और वहाँ एक स्वतंत्र शासन की स्थापना की. बाद में केंद्र को बदलकर सिथाना (चारसद्दा, पाकिस्तान) में स्थापित किया गया. सीमाप्रांत में शासन चलाने हेतु, अस्त्र-शस्त्र, धन, जन सीमाप्रांत पहुँचाया जाने लगा. इसके लिए बंगाल से सिथाना तक खानकाह बनाया गया जो एक गुप्त रूप से सहायता पहुँचाने का जरिया था. पश्चिमोत्तर इलाके में वहाबी आन्दोलन के समर्थकों का सिख समुदाय से संघर्ष हुआ जिसमें सैयद अहमद मारा गया.

बंगाल में वहाबी आन्दोलन

जिस समय पश्चिमोत्तर में सैयद अहमद सिखों से संघर्ष कर रहा था, उस समय बंगाल में वहाबी आन्दोलन का बहाव किसान वर्गों में जोर-शोर से हो रहा था. बंगाल में वहाबी आन्दोलन के नेता तीतू मीर थे. जमींदार द्वारा कर बढ़ाने पर वहाबी समर्थक (अधिकांशतः किसान वर्ग) इसका विरोध करते थे. जब नदिया (बंगाल) के जमींदार कृष्णराय ने लगान की राशि बढ़ाई तो तीतू मीर ने उसपर हमला कर दिया. ऐसे कई काण्ड कई जगह हुए जहाँ जमींदारों को विरोध का सामना करना पड़ा. ऐसे में तीतू मेरे किसान वर्ग का मसीहा बन गया. एक बार तो तीतू मेरे ने कई वहाबी समर्थकों के साथ अंग्रेजी सेना द्वारा बनाए गए किले को ही नष्ट कर डाला. पर तीतू मीर इसी संघर्ष में मारा गया. उसकी मृत्यु के बाद बंगाल में वहाबी आन्दोलन कमजोर पड़ गया.

सैयद अहमद की मृत्यु के बाद वाला Wahabi Movement

ऐसा नहीं था कि सैयद अहमद की  मृत्यु के बाद वहाबी आन्दोलन (Wahabi Movement) थम गया. यह आन्दोलन चलता ही रहा. इस आन्दोलन को सैयद अहमद के बाद जिन्दा रखने का श्रेय विलायत अली और इनायत अली को जाता है. फिर से नए केंद्र स्थापित किए गए. इस बार पटना को मुख्यालय बनाया गया. इनायत अली को बंगाल का कार्यभार दिया गया. पंजाब और पश्चिमोत्तर प्रान्तों में  वहाबी आन्दोलन के समर्थकों और अंग्रेजों के बीच कई बार मुठभेड़ हुई. अंग्रेजों ने वहाबी के केंद्र सिथाना और मुल्का को नष्ट कर दिया. अनेक समर्थक गिरफ्तार हो गए. कई लोगों पर मुकदमा चला और उन्हें काला पानी व जेल  की सजा दी गई. कालांतर में पटना का भी केंद्र नष्ट कर दिया गया. सरकार के इस दमनात्मक रवैये के चलते वहाबी आन्दोलन शिथिल पड़ गया और प्रथम युद्ध के अंत तक इसने दम तोड़ दिया.

वहाबी आन्दोलन का प्रभाव और महत्त्व

वहाबी आन्दोलन (Wahabi Movement) की शुरुआत भले ही मुसलमान समुदाय के पुनरुत्थान के रूप में हुई हो पर बाद में इस आन्दोलन ने दिशा बदल ली. देश में मुस्लिम शासन फिर से आये, इस सोच को लेकर यह आन्दोलन चला था पर कालांतर में यह आन्दोलन मुख्यतः एक किसान आन्दोलन बन कर रह गया. जब यह किसान आन्दोलन बना तो कई हिन्दू भी इस आन्दोलन से जुड़ गए. यह सच है कि वहाबियों ने किसानों और निम्नवर्ग पर हो रहे अंग्रेजी अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाई. सरकार विरोधी अभियान चलाकर वहाबियों ने 1857 ई. के विद्रोह  के लिए एक वातावरण तैयार कर दिया. इस आन्दोलन से मिली विफलता के बाद मुसलमान लोगों में एक नई विचारधारा का संचार हुआ. धार्मिक कट्टरता के स्थान पर मुसलामानों ने अब आधुनिकीकरण पर बल दिया. आधुनिक शिक्षा और मुसलमानों का भला चाहने वाले सर सैयद अहमद खाँ का चेहरा सब के सामने आया.

1904 ल्हासा की संधि

ल्हासा की संधि - Treaty of Lhasa 1904 ई. in Hindi

भूमिका

लॉर्ड कर्जन की तिब्बत सम्बन्धी नीति उसके वायसराय काल की एक महत्त्वपूर्ण घटना है. गवर्नर जनरल लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स के समय में ब्रिटिश सरकार तिब्बत के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करने का यत्न कर रही थी और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने अनेक दूत वहाँ भेजे थे पर उनसे कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई थी. 1886 ई. में चीन की सरकार ने ब्रिटिश व्यापार मंडल को तिब्बत आने की आज्ञा दी और कुछ समय के बाद अंग्रेजों को यातुंग (Yatung, Tibet) नामक जगह में व्यापार करने की अनुमति मिल गई. परन्तु तिब्बत के लोग सामान्य रूप से अंग्रेजों के विरुद्ध थे और इसलिए चीन की सरकार से आज्ञा मिल जाने पर भी ब्रिटिश सरकार को कोई विशेष लाभ नहीं हुआ.

चीन से स्वतंत्र होने की माँग

जब कर्जन भारत पहुँचा तो उस समय तिब्बत में कुछ नए राजनीतिक परिवर्तन हो रहे थे जिन्होंने वायसराय के ध्यान को भी आकृष्ट किया. तिब्बत के लोगों में चीन से स्वतंत्र होने की दृढ़ भावना उत्पन्न हो रही थी और उन्होंने दलाई लामा को अपना नेता बनाया. दलाई लामा ने स्वयं को शक्तिशाली स्वतंत्र शासक के रूप में प्रमाणित किया. उन्होंने व्यस्क होते ही चीन के रीजेंसी सरकार (regency government) का तख्ता उलट दिया और उसपर शक्तिपूर्ण अधिकार करके दृढ़ धारणा और योग्यता से शासन-भार को संभाल लिया. उन्होंने रूस में जन्मे एक monk, जिनका नाम डोरजीफ (Dorjieff) था, से रूस में रहने वाले बौद्धों से धार्मिक कार्यों के लिए धन इकठ्ठा करने के लिए कहा. डोरजीफ रूसी सम्राट से भी मिला. रूसी समाचारपत्रों ने डोरजीफ के प्रयासों को बहुत महत्त्व दिया और तिब्बत में बढ़ते हुए रूसी प्रभाव का स्वागत किया.

तिब्बत में रूसी प्रभाव

भारत सरकार इन सूचनाओं से चिंतित हो उठी और उसने समझा कि रूसी सरकार डोरजीफ के द्वारा उसके पड़ोसी प्रदेश तिब्बत में राजनीतिक प्रभाव बढ़ा रही है. लॉर्ड कर्जन ने तिब्बत में रूसियों के मामले को गंभीरतापूर्वक लिया क्योंकि इससे एशिया में अंग्रेजों के सम्मान को धक्का लगने की संभावना थी. लॉर्ड कर्जन ने तिब्बत में एक मिशन भेजने के लिए इंग्लैंड की सरकार पर जोर डाला. उसने तिब्बत के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए भी जोर दिया, पर इंग्लैंड की सरकार मिशन भेजने के पक्ष में नहीं थी. इसपर लॉर्ड कर्जन ने यह सुझाव रखा कि सिक्किम की सीमा से पन्द्रह मील उत्तर में खाम्बाजोंग (Khamba Dzong) नामक स्थान पर तिब्बत और चीन से बातचीत की जाए और दोनों सरकारों पर संधि-दायित्वों को पूरा करने की आवश्यकता पर जोर डाला जाए. यदि दूत वहाँ न पहुँचे तो खुद ब्रिटिश कमिश्नर ही वहाँ पहुँचे. इंग्लैंड सरकार ने अनिच्छा से कर्जन की बात को स्वीकार लिया और कर्नल फ्रांसिस यंगहसबैंड (Francis Younghusband) के नेतृत्व में एक मिशन खाम्बाजोंग भेज दिया.

कर्नल यंगहसबैंड जुलाई, 1903 ई. खाम्बाजोंग पहुँचा, परन्तु तिब्बतियों ने तब तक बातचीत में आने से इनकार कर दिया. फलस्वरूप बातचीत में अवरोध उत्पन्न हो गया. इसी बीच तिब्बतियों ने खाम्बाजोंग के निकट अपनी सेनाओं को एकत्रित करना शुरू कर दिया. कर्जन इस बात को सहन न कर सका और उसने इंग्लैंड सरकार से गयान्त्से तक सेनाओं को भेजने की स्वीकृति माँगी. विदेश मंत्री लॉर्ड लैंसडाउन ने इस शर्त पर स्वीकृति दे दी कि क्षति-पूर्ति हो जाने पर सेनाएँ वापस लौट आएँगी.

ल्हासा की संधि (7 September 1904)

1904 ई. को ब्रिटिश सेनाओं ने गयान्त्से (Gyantse, Tibbat) की ओर बढ़ना आरम्भ किया और महीने के अंतिम दिन गुरु नामक स्थान पर उनकी तिब्बती सेनाओं से पहली टक्कर हुई. तिब्बती सेनाओं के पास न तो अच्छे शस्त्र थे और न ही उनका नेतृत्व अच्छा था, इसलिए थोड़ी ही देर में तिब्बती बुरी तरह हरा दिए गए. उनके सात सौ सैनिक मारे गए, जबकि अंग्रेजी सेना का एक भी सैनिक नहीं मारा. ग्यान्त्से पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया. परन्तु इतने पर भी दलाई लामा ने संधि करना स्वीकार नहीं किया. इसपर मंत्रिमंडल ने ल्हासा पर आक्रमण करने की आज्ञा दी. यंगहसबैंड के नेतृत्व में अंग्रेजी सेनाएँ तिब्बती सेनाओं को परास्त करती हुई तिब्बतियों के पवित्र और महत्त्वपूर्ण नगर ल्हासा में घुस गई. दलाई लामा नगर छोड़कर भाग निकले. यंगहसबैंड ने दलाई लामा के एजेंट से, जिसको दलाई लामा ने भागने से पहले संधि-विग्रह का अधिकार दे दिया था, संधि की वार्ता शुरू की. लम्बी बातचीत के बाद 7 सितम्बर को संधिपत्र पर हस्ताक्षर हुए. यह संधि ल्हासा की संधि (Treaty of Lhasa) के नाम से प्रसिद्ध है. इस संधि की शर्तों के अनुसार :

Conditions of Lhasa Treaty 

  1. यातुंग, ग्यान्त्से और गुरुतोक में व्यापार केंद्र खोलने का निश्चय हुआ.
  2. एक ब्रिटिश व्यापार एजेंट को ग्यान्त्से में रखने का निश्चय हुआ जो आवश्यकता पड़ने पर ल्हासा भी जा सकता था.
  3. 75 लाख रुपये क्षति-पूर्ति के रूप में ब्रिटिश सरकार को दिया जाए जो एक लाख रुपये की वार्षिक किश्तों में भुगतान करना होगा. क्षति-पूर्ति की सारी राशि के भुगतान तक भूटान और सिक्किम के बीच की चुम्बी घाटी (Chumbi Valley) में ब्रिटिश सेनाओं का रहना निश्चित किया गया.

ल्हासा संधि (Lhasa Treaty) की दूसरी शर्तों के अनुसार ब्रिटेन को तिब्बत की विदेश नीति पर प्रभाव रखने का सीधा अधिकार प्राप्त हुआ. इसके अनुसार, तिब्बत का कोई भी भाग किसी भी विदेशी शक्ति कोई नहीं दिया जा सकता था और न ही किसी राष्ट्र का एजेंट तिब्बत में प्रविष्ट हो सकता था. किसी देश अथवा वहाँ के प्रजा को तिब्बत में रेलपथ, सड़कें, टेलीग्राफ और खानों सम्बन्ध में सुविधाएँ नहीं दी जा सकती थीं. निश्चय हुआ कि यदि ऐसी सुविधाएँ किसी भी अन्य देश को दी गईं तो वे शीघ्र ही ब्रिटिश सरकार को देनी पड़ेंगी.

 St John Brodrick द्वारा शर्त्तों में बदलाव

संधि की शर्त्तें कठिन थीं. इसलिए रूस की सरकार ने उनका विरोध किया. भारत मंत्री जॉन ब्राडरिक ( St John Brodrick) ने भी अनुभव किया कि यंग हसबैंड ने अपने अधिकारों का उल्लंघन करते हुए तिब्बत के साथ अधिक सख्ती की है. उसने संधि के दोहराए जाने के लिए आग्रह किया. फलतः संधि की पुनरावृत्ति हुई. नए शर्त्तों के अनुसार -

  1. क्षति-पूर्ति की राशि 75 लाख से घटाकर 25 लाख कर दी गई.
  2. निश्चय किया गया कि वार्षिक किश्तों का भुगतान हो जाने के बाद ब्रिटिश सेनाओं को चुम्बी घाटी से हटा लिया जायेगा.
  3. ग्यान्त्से स्थित ब्रिटिश प्रतिनिधि को ल्हासा जाने की अनुमति रद्द कर दी गई.

लॉर्ड कर्जन की तिब्बत नीति की आलोचना

लॉर्ड कर्जन की तिब्बत सम्बन्धी नीति के विषय में बहुत-सा मतभेद रहा है. लॉर्ड रोजबर्री ने हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में कर्जन की तिब्बत सम्बन्धी नीति की आलोचना करते हुए उसकी लिटन द्वारा अपनाई गई मूर्खतापूर्ण अफगान नीति से तुलना की. उसका कहना था कि दोनों अवस्थाओं में ब्रिटिश सरकार ने रूस के कल्पित भय से हस्तक्षेप किया और दोनों मामलों में ब्रिटिश सरकार को स्वतंत्र राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई राजनीतिक अथवा वैधानिक अधिकार नहीं था.

मुस्लिम-हिन्दू दंगा 1921

मोपला विद्रोह (The Moplah Rebellion - 1921) in Hindi

पूर्व बंगाल के पबना नामक स्थान के ही समान मद्रास प्रेसिडेंसी के मालाबार में मोपला का विद्रोह हुआ जिसे मालाबार विद्रोह (Malabar rebellion) भी कहते हैं. यदि आपसे Prelims परीक्षा में पूछा जाए कि मोपला विद्रोह (Moplah Rebellion) कहाँ हुआ तो इसका जवाब है मद्रास! खैर, मालाबार एक मुस्लिम बहुसंख्यक इलाका था. ये मुसलमान मोपला के नाम से जाने जाते थे. मोपला ज्यादातर कृषक या मजदूर वर्ग के थे जो चाय या कॉफ़ी बागानों में काम करते थे. वे अशिक्षित थे इसलिए धार्मिक कट्टरता भी उनमें अधिक थी.

कारण

मोपला विदेशी शासन, हिन्दू जमींदारों और साहूकारों से पीड़ित थे. अपनी दुःखद स्थिति से लाचार होकर 19-20वीं शताब्दी में मोपलाओं ने बार-बार विरोध और आक्रोश प्रकट किया. 1857 के पूर्व मोपलाओं के करीब 22 आन्दोलन हुए. 1882-85, 1896 और बाद में 1921 में भी मोपला विद्रोह (Moplah Rebellion) हुआ. 1870 में सरकार ने मालाबार में मोपलाओं द्वारा बार-बार विरोध की विवेचना करने के लिए एक समिति का निर्माण किया. इस समिति के रिपोर्ट में कुछ बातें सामने आईं कि इन विरोधों का कारण किसानों को जमीन से बेदखल किया जाना, लगान में मनमाने ढंग से वृद्धि किया जाना आदि हैं.

विद्रोह की प्रकृति

मोपला के किसानों का आन्दोलन हिंसात्मक था. मोपलाओं ने जमींदारों के घरों में धावा बोला, धन लूटे और हत्या की. मंदिरों की भी संपत्ति लूटी गई. साहूकारों को भी मौत के घाट उतारा गया. पूरे मालाबार में अशांति फ़ैल गई. सरकार ने अपनी तरफ से मोपला विद्रोह (Moplah Rebellion) को नियंत्रित करने के लिए बल का भी प्रयोग किया. पर मोपला किसी से नहीं डरे. उनके मन में यह भावना थी कि इस आन्दोलन में वे मर नहीं रहे बल्कि शहीद हो रहे हैं और उन्हें इस काम के लिए जन्नत मिलेगी.

विद्रोह का अंत

सरकार ने बलपूर्वक मोपला विद्रोह को दबा दिया. इस विद्रोह में संगठनात्मक कमजोरियाँ थीं. यह विद्रोह लम्बे समय तक के लिए टिक नहीं पाया. मोपलाओं को अपने आन्दोलन में कुछ बड़े किसानों का भी सहयोग मिला. जो मोपला विद्रोह (Moplah Rebellion) 1921 में हुआ वह बहुत ही व्यापक था. इस विद्रोह को दबाने के लिए तो सरकार को सेना की मदद लेनी पड़ी थी.

भारत का विभाजन

भारत का विभाजन : Partition of India in Hindi

आज हम भारत का विभाजन (Partition of India) कैसे हुआ और इसके पीछे क्या कारण थे, क्या सच्चाई थी, यह जानने की कोशिश करेंगे. कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत भारत में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग कर एक अंतरिम सरकार (interim government) का गठन किया, लेकिन मुस्लिम लीग इस अंतरिम सरकार में रहकर भी केवल  व्यवधान डालने का कार्य करती रही. उससे सहयोग की अपेक्षा रखना भी शुद्ध मूर्खता थी क्योंकि वह तो पाकिस्तान के निर्माण के लिए कटिबद्ध हो चुकी थी. पूरे देश में साम्प्रदायिकता की आग फैली हुई थी और अशांति तथा अराजकता मची हुई थी. भारत की विषम साम्प्रदायिक समस्या का हल करने के लिए और कैबिनेट योजना की रक्षा के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने लन्दन में एक सम्मलेन का आयोजन किया, लेकिन फिर भी कांग्रेस तथा लीग में समझौता नहीं हो पाया. भारत की परिस्थति ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण से बाहर हो रही थी तब उसने भारत को भारतीयों के हाल पर ही छोड़ना उचित समझा. ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने घोषणा की कि जून 1948 के पहले भारतीयों के हाथ में सत्ता सौंप दी जायेगी. इस बात पर भारत के तत्कालीन वायसराय इस घोषणा से सहमत नहीं थे अतः उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और लॉर्ड माउंटबेटन अंतरिम वायसराय बनकर भारत आये.

माउंटबेटन योजना (Mountbatten Plan)

वायसराय लार्ड माउंटबेटन भारत के नेताओं से बातचीत कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत का विभाजन (Partition of India) हर हाल में होकर रहेगा. हालाँकि महात्मा गांधी ने माउंटबेटन से मिलकर इस विभाजन को रोकने का काफी प्रयत्न किया लेकिन वे असफल रहे. लॉर्ड माउंटबेटन लन्दन गए और वहां के अधिकारीयों से बातचीत कर यहाँ लौटे तथा 3 जून, 1947 को एक योजना प्रकाशित की जो 'माउंटबेटन योजना” के नाम से जानी जाती है. इस योजना के अनुसार यह तय था कि ब्रिटिश सरकार भारत का प्रशासन ऐसी सरकार को सौंप देगी जो जनता की इच्छा से निर्मित हो, साथ ही यह भी तय हुआ कि जो प्रांत भारतीय संघ में सम्मिलित नहीं होना चाहते हैं उन्हें आत्म-निर्णय का अधिकार दिया जायेगा. यदि मुस्लिम-बहुल क्षेत्र के निवासी देश के विभाजन का समर्थन करते हैं तो भारत और पाकिस्तान की सीमा का निर्धारण करने के लिए एक कमीशन की नियुक्ति की जाएगी. माउंटबेटन योजना को सबसे पहले मुस्लिम लीग ने ही स्वीकार किया, बाद में कांग्रेस ने मत विभाजन के बाद इसे स्वीकार किया. मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कहा था कि 'माउंटबेटन योजना के बाद भारत की एकता को बनाये रखने की आशा हर तरह से ख़त्म हो गई”. यह स्पष्ट है कि माउंटबेटन योजना देश के विभाजन के आधार पर ही लागू की गई थी और भारत दो भागों में बँट गया.

4 जुलाई, 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पेश किया गया जिसके अनुसार 15 अगस्त, 1947 को भारत दो अधिराज्यों में विभाजित हो गया. दोनों उपनिवेशों की संविधानसभा को ब्रिटिश सरकार ने सत्ता सौंप दी और जबतक संविधान का निर्माण नहीं हुआ तबतक 1935 के भारत सरकार अधिनियम के अनुसार उपनिवेशों का शासन चला तथा संविधान सभाएँ विधानमंडल के रूप में कार्य करती रहीं. पंजाब और बंगाल में सीमा निर्धारण का कार्य सीमा आयोग के हवाले कर दिया गया. इस प्रकार माउंटबेटन योजना के द्वारा भारत का विभाजन (Partition of India) हुआ और स्वतंत्रता अधिनियम के द्वारा आजादी मिली. इस प्रकार अखंड भारत की धारणा एक स्वप्नमात्र बन के रह गई. भारत स्वतंत्र तो हुआ पर इसके लिए उसे एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ी.

भारत-विभाजन के कारण - Causes of Partition of India

मुसलामानों की धार्मिक कट्टरता

अंग्रेजों का सिद्धांत ही था फूट डालो और शासन करो. भारत-विभाजन के पीछे मुसलामानों की धार्मिक कट्टरता काफी दोषी है. उनमें शिक्षा का अभाव था और आधुनिक विचारधारा के प्रति वे उदासीन थे. वे धर्म को विशेष महत्त्व देते थे. मुसलामानों में यह भावना प्रचारित कर दी गई की भारत जैसे हिन्दू बहुसंख्यक राष्ट्र में मुसलामानों के स्वार्थ की रक्षा संभव नहीं है और उनका कल्याण एक पृथक् राष्ट्र के निर्माण से ही हो सकता है. यद्यपि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ मधुर सम्बन्ध बनाने का प्रयास किया लेकिन मुहम्मद अली जिन्ना लीग की नीति में परिवर्तन के लिए तनिक भी तैयार नहीं हुए.

साम्प्रदायिकता को अंग्रेजों का प्रोत्साहन 

ब्रिटिश शासकों ने भारत में साम्प्रदायिकता के प्रोत्साहन में कोई कसर नहीं छोड़ी. 1857 के विद्रोह के बाद अँगरेज़ मुसलामानों को संरक्षण देकर फूट डालने का कार्य किया क्योंकि वे अनुभाव करने लगे कि हिन्दू-मुस्लिम एकता के बाद तो भारत पर उनका शासन करना मुश्किल हो जायेगा. उन्होंने अल्पसंख्यक के नाम पर मुसलामानों को आरक्षण दिया और राष्ट्रीय आंदोलं को कमजोर बनाया. 1909 में मुस्लिमों को अलग प्रतिनिधित्व देना ही भारत-विभाजन की पृष्ठभूमि बनी.

कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति 

कांग्रेस ने प्रारम्भ से ही मुसलामानों को संतुष्ट करने की नीति अपनाकर उनका मन काफी बाधा दिया था जिसका परिणाम यह हुआ कि वे अलग राष्ट्र की मांग करने लगे. कांग्रेस की यह तुष्टीकरण की नीति उनकी भयंकर भूल थी. लखनऊ समझौते के अनुसार मुसलामानों को उनकी जनसँख्या के आधार पर पृथक् प्रतिनिधित्व दिया गया. फिर 1932 के साम्प्रदायिक निर्णय के विषय में कांग्रेस ने अस्पृश्य जातियों के अलग हो जाने के भय से जिस दुर्बलता का परिचय दिया उससे मुसलामानों का मनोबल काफी बढ़ा. स्वतंत्र भारत में मुस्लिमों का क्या भविष्य होगा, उसके सम्बन्ध में कांग्रेस कोई स्पष्ट निर्णय नहीं ले सकी और दूसरी ओर जिन्ना का एक ही नारा था कि 'हिन्दू और मुसलमान दो पृथक् राष्ट्र हैं'.

तत्कालीन परिस्थितियाँ 

भारत की तत्कालीन परिस्थतियाँ भी भारत विभाजन (Partition of India) के लिए उत्तरदाई थीं. भारत छोड़ो आन्दोलन तथा विश्वयुद्ध से उत्पन्न स्थिति, अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीग को शामिल करना तथा कांग्रेस और लीग के बीच मतभेद भारत के विभाजन का कारण बनी. अंग्रेजों ने जैसे ही भारत को स्वतंत्र करने की घोषणा की, दंगे प्रारंभ हो गए. भयानक खूनखराबे  से बचने के लिए विभाजन को स्वीकार करना ही पड़ा.

इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत के विभाजन (Partition of India) के बाद अखंड भारत का सपना चूर-चूर हो गया. यह भी सत्य है कि अगर विभाजन की बात स्वीकार नहीं की जाती तो केंद्र सरकार और भी दुर्बल हो जाती और पूरा राष्ट्र बर्बाद हो जाता क्योंकि मुस्लिम लीग हमेशा सरकार के कारों में हस्तक्षेप करती और विकास का कार्य ठप पड़ जाता. देश की अखंडता उसी समय फायदेमंद हो सकती थी जब मुसलामानों को संतुष्ट करने के स्थान पर सबों के साथ समान व्यवहार किया जाता. भारत-विभाजन के कारण भारत को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. अब सीमा सुरक्षा का प्रश्न काफी जटिल हो गया, हमशा भारत और पकिस्तान के बीच युद्ध और तनाव चलता रहता. कश्मीर पर अधिकार का मुद्दा हमेशा भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का कारण बनता रहा और अब भी बना हुआ है.

1857 बिरसा मुंडा आंदोलन

बिरसा मुंडा आन्दोलन - Birsa Munda Movement in Hindi

1857 ई. के बाद मुंडाओं ने सरदार आन्दोलन चलाया जो एक शांत प्रकृति का आन्दोलन था. पर इससे आदिवासियों की स्थिति में कोई ख़ास परिवर्तन नहीं आया. मुंडाओं ने आगामी आन्दोलन को उग्र रूप देने का निर्णय लिया. सरदार आन्दोलन के ठीक विपरीत बिरसा मुंडा आन्दोलन उग्र और हिंसक था. इस आन्दोलन के नेता बिरसा मुंडा (Birsa Munda), एक पढ़े-लिखे युवा नेता थे. यह आन्दोलन विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शुरू किया गया था. इसलिए इसका स्वरूप भी मिश्रित था. यह आन्दोलन आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तन और धार्मिक पुनरुत्थान जैसे विभिन्न उद्देश्यों को प्राप्त करने की इच्छा रखता था. चलिए पढ़ते हैं बिरसा मुंडा आन्दोलन (Birsa Munda Movement) के उद्देश्य, नेतृत्वकर्ता और परिणाम के बारे में in Hindi - -

बिरसा मुंडा आन्दोलन का आर्थिक उद्देश्य

बिरसा आन्दोलन का आर्थिक उद्देश्य था दिकू जमींदारों (गैर-आदिवासी जमींदार) द्वारा हथियाए गए आदिवासियों की कर मुक्त भूमि की वापसी जिसके लिए आदिवासी लम्बे समय से संघर्ष कर रहे थे. मुंडा समुदाय सरकार से न्याय पाने में असमर्थ रहे. इस असमर्थता से तंग आ कर उन्होंने अंग्रेजी राज को समाप्त करने और मुंडा राज की स्थापना करने का निर्णय लिया. वे सभी ब्रिटिश अधिकारीयों और ईसाई मिशनों को अपने क्षेत्र से बाहर निकाल देना चाहते थे. बिरसा मुंडा ने एक नए धर्म का सहारा लेकर मुंडाओं को संगठित किया. उनके नेतृत्व में मुंडाओं ने 1899-1900 ई. में विद्रोह किया.

बिरसा मुंडा का नेतृत्व

बिरसा मुंडा आदिवासियों की दयनीय हालत को देखकर उन्हें जमींदारों और ठेकेदारों के अत्याचार से मुक्ति दिलाना चाहते थे. बिरसा मुंडा (Birsa Munda) ने अनुभव किया था कि शांतिपूर्ण तरीकों से आन्दोलन चलाने का परिणाम व्यर्थ होता है. इसलिए उन्होंने इस आन्दोलन को उग्र बनाने के लिए अधिक से अधिक नवयुवकों को संगठित किया. मुंडाओं ने उन्हें अपना भगवान् मान लिया. उनका प्रत्येक शब्द मुंडाओं के लिए मानो ब्रह्मवाक्य बन गया. बिरसा मुंडा ने घोषणा की कि कोई भी सरकार को कर नहीं दे. मुंडाओं ने उनकी बातें मानी और पालन किया.

बिरसा मुंडा गिरफ्तार

1895 ई. में बिरसा मुंडा को विद्रोह फैलाने और राजविरोधी षड्यंत्र करने के अपराध में गिरफ्तार कर  लिया गया. उन्हें दो वर्ष की कैद की सजा मिली. जेल से रिहा होने के बाद वह और भी सक्रिय होकर और अधिक गर्मजोशी से आदिवासी युवाओं को आन्दोलन के लिए प्रेरित करने लगे. जंगल में छिपकर गुप्त सभाएँ आयोजित की जाती थीं और सभी को आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाता था. वे स्वयं महारानी विक्टोरिया के पुतले पर तीरों से वार करके तीरंदाजी का अभ्यास करते थे. बिरसा मुंडा आन्दोलन में कई निर्दोष लोगों की भी हत्या हुई जिनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे सरकारी नौकर थे.

विद्रोह का दमन

1899 ई. में क्रिसमस के दिन मुंडाओं का व्यापक और हिंसक विद्रोह शुरू हुआ. सबसे पहले जो मुंडा ईसाई बने थे और जो लोग सरकार के लिए काम करते थे, उन्हें मारने का प्रयास किया गया लेकिन बाद में इस नीति में परिवर्तन किया गया क्योंकि अपना धर्म बदलने वाले मुंडा थे तो अपने ही समुदाय के! इसलिए उन्हें छोड़ सरकार और मिशनरियों के विरुद्ध आवाज़ उठने लगी. राँची और सिंहभूम में अनेक चर्चों में मुंडा आदिवासी समूह ने आक्रमण किया. पुलिस मुंडाओं के क्रोध का विशेष शिकार बनी. इस विद्रोह का प्रभाव पूरे छोटानागपुर में फ़ैल गया.

चिंतित होकर सरकार ने इस विद्रोह का दमन करने का निर्णय लिया. सरकार ने पुलिस और सेना की सहायता ली. मुंडाओं ने छापामार युद्ध का सहारा लेकर पुलिस और सेना का सामना किया लेकिन बन्दूक के सामने तीर-धनुष कब तक टिकती? फरवरी 1900 ई. में बिरसा एक बार फिर से गिरफ्तार कर लिए गए. उन्हें राँची के जेल में रखा गया. उनपर सरकार ने राजद्रोह का मुकदमा चलाया. मुक़दमे के दौरान ही बिरसा मुंडा को हैजा हो गया और 9 जून, 1900 ई. को उन्होंने अपना प्राण त्याग दिया.

परिणाम

बिरसा की मृत्यु के बाद बिरसा मुंडा आन्दोलन (Birsa Munda Movement) शिथिल पड़ गया. बिरसा के तीन प्रमुख सहयोगियों को फाँसी की सजा दी गई. अनेक मुंडाओं को जेल में ठूस दिया गया. परिणामस्वरूप बिरसा मुंडा आन्दोलन विफल हो गया. आदिवासियों को इस आन्दोलन से तत्काल कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ परन्तु सरकार को उनकी गंभीर स्थिति पर विचार करने के लिए बाध्य होना पड़ा. आदिवासियों की जमीन का सर्वे करवाया गया. 1908 ई. में  ही छोटानागपुर काश्तकारी कानून (Chotanagpur Tenancy Act, 1908) पारित हुआ. मुंडाओं को जमीन सम्बंधित कई अधिकार मिले और बेकारी से उन्हें मुक्ति मिली. मुंडा समुदाय आज भी बिरसा को अपना भगवान् मानता है.

1927 बटलर कमेटी

बटलर समिति के बारे में जानें - Butler Committee 1927 in Hindi

प्रथम विश्वयुद्ध के समय में देशी शासकों ने ब्रिटिश सरकार की बहुमूल्य सहायता की थी. युद्ध के अंत होने पर भारत में उत्तरदायी शासन के विकास की योजना बनाई गई. फलतः देशी शासकों और ब्रिटिश सरकार के बीच के सम्बन्ध की व्याख्या करने और ब्रिटिश सार्वभौम सत्ता को पारिभाषित करने की जरूरत महसूस हुई. फलतः 1927 ई. में इसकी जाँच करने और इस सम्बन्ध में उचित राय देने के लिए इंडियन-स्टेट्स-कमिटी जो साधारणतः इतिहास में बटलर समिति (Butler Committee) के नाम से विख्यात है, Harcourt Butler की अध्यक्षता में गठित की गई.

बटलर समिति (Butler Committee)

Butler Committee की सिफारिशें इस प्रकार थीं -

  1. राज्यों के साथ बरतने के लिए कौंसिल समेत गवर्नर-जनरल नहीं, बल्कि वायसराय ब्रिटिश साम्राज्य का प्रतिनिधि बने.
  2. ब्रिटिश सम्राट और देशी शासकों के सम्बन्ध के प्रक्रिया को बिना देशी नरेशों की राय के भारत सरकार को हस्तांतरित नहीं किया जाए क्योंकि वह व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदाई है.
  3. राज्य परिषद् बनाने की योजना रद्द कर दी जाए.
  4. देशी राज्यों के शासन में हस्तक्षेप करना वायसराय के निर्णय पर छोड़ दिया जाए.
  5. भारत सरकार और देशी राज्यों के मतभेद का समाधान करने के लिए विशेष समितियाँ नियुक्त की जाएँ.
  6. ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों के बीच आर्थिक संबंधों की जाँच के लिए एक समिति नियुक्त की जाए.
  7. राजनीतिक पदाधिकारियों की नियुक्ति और शिक्षा का अलग प्रबंध किया जाए और वे इंग्लैंड के विश्वविद्यालयों से लिए जाएँ.

Butler Committee की निंदा

बटलर-समिति की सिफारिशों की कड़ी निंदा की गई है क्योंकि इसके लेखकों ने एक नए सिद्धांत का आविष्कार किया था. समिति के रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से बताया गया कि देशी राज्यों का सम्बन्ध भारत सरकार से नहीं था, बल्कि सीधे ब्रिटिश सम्राट से था. पर इस सीधे सम्बन्ध का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं था, बल्कि भारत सरकार और देशी राज्यों के बीच एक बड़ी दीवार कायम करने के उद्देश्य से ही इस सिद्धांत का आविष्कार किया गया था. इस सिद्धांत के द्वारा ब्रिटिश-भारत में आनेवाली उत्तरदाई सरकार को कमजोर बनाने की योजना बनायी गई थी. इसी कारण कुछ भारतीयों ने बटलर समिति की सिफारिशों की कटु आलोचना की.

श्री.सी.वाई. चिंतामणि ने बतलाया कि 'बटलर कमिटी अपने जन्म में बुरी थी, इसकी नियुक्ति का समय बुरा था, इसकी जाँच-पड़ताल की शर्तें बुरी थीं, इसमें काम करनेवाले लोग बुरे थे और जाँच करने का इसका ढंग बुरा था. इस रिपोर्ट की दलीलें बुरी हैं और इसके निष्कर्ष बुरे हैं.”

बटलर समिति (Butler Committee) की रिपोर्ट में देशी राज्यों की जनता के लिए भविष्य का कोई संकेत नहीं था. उनमें आधुनिक विचार और ऐसी वस्तुओं का नितांत अभाव था जो विश्वास और आशा का संचार कर सकती हैं.

1st कर्नाटक युद्ध

प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746-48 ई.) : कारण एवं परिणाम

प्रथम कर्नाटक युद्ध : भूमिका

मुगलों के पतन के बाद राजनैतिक प्रभुत्व के लिए देशी शासकों के साथ-साथ विदेशी ताकतें भी संघर्षरत हो गयीं. देशी ताकतों में मुख्य रूप से मराठे थे तो विदेशी ताकतों में असली लड़ाई अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच थी. इन दोनों शक्तियों में प्रभुत्व का यह संघर्ष 60-70 साल चला और नेपोलियन के पतन के बाद अंग्रेजों के पक्ष में ख़त्म हो गया. इस सन्दर्भ में दोनों के शक्तियों के बीच पहली बड़ी लड़ाई कर्नाटक क्षेत्र में हुई. इसमें एक ओर फ़्रांस का गवर्नर दूप्ले और कर्नाटक का नवाब थे तो दूसरी ओर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी का गवर्नर. यह युद्ध प्रथम कर्नाटक युद्ध (First Carnatic War) कहलाता है जो 1746 ई.  से 1748 ई. तक चला. कहते हैं कि यूरोप में ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार के युद्ध में इंग्लैंड और फ़्रांस के बीच जो संघर्ष चला, उसी का परिणाम भारत में प्रथम कर्नाटक युद्ध (First Carnatic War) के रूप में सामने आया.

अंग्रेज-फ्रांसीसी संघर्ष

भारत में अंग्रेज-फ्रांसीसी संघर्ष का इतिहास चार भागों में बाँटा जाता है - 1746 ई. से 1748 ई. तक, 1749-1754 ई. तक, 1758 ई. से 1763 ई. और 1778 ई. से 1815 ई. तक. पहले तीन भागों का सम्बन्ध मुख्यतया दक्षिण भारत से था. इन तीनों कालों में दक्षिण भारत से फ्रांसीसी शक्ति नष्ट हो गई. अंतिम चरण में भारतीय नरेशों की सहायता से फ़्रांसीसियों ने अंग्रेजों की शक्ति को नष्ट करने का असफल प्रयास किया.

1740 ई. में ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध यूरोप में शुरू हुआ. प्रारम्भ में इंग्लैंड का प्रधानमंत्री वालपोल युद्ध में सम्मिलित नहीं हुआ. वालपोल शांतिप्रिय नीति का पृष्ठपोषक था. पर 1742 ई. में वालपोल के त्यागपत्र के बाद इंग्लैंड ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार-युद्ध में सम्मिलित हो गया. यूरोप में इंग्लैंड और फ्रांस एक-दूसरे के विपक्षी थे. इसलिए यूरोपीय युद्ध की स्वाभाविक प्रतिक्रिया भारत में भी हुई.

डूप्ले

फ्रांसीसी कंपनी का गवर्नर डूप्ले (Joseph François Dupleix) था. उसने मद्रास में अंग्रेज़ गवर्नर को एक पत्र लिखकर युद्ध रोकने की राय दी थी. उत्तर में अंग्रेज़ गवर्नर के द्वारा भी शांति कायम रखने का आश्वाशन दिया गया था. दोनों कंपनियों (अंग्रेज़ और फ़्रांस की कंपनियाँ) के अधिकारियों ने अपनी-अपनी सरकार से युद्ध न करने के पक्ष में निवेदन किया था. फ्रांसीसी सरकार ने डूप्ले की बात स्वीकार कर ली, परन्तु इंग्लैंड की सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया और कमांडर बार्नेट के नेतृत्व में एक जहाजी बेड़ा फ्रांसीसियों के विरुद्ध आक्रमण के लिए भेज दिया. 1746 ई. में दोनों कंपनियों के बीच युद्ध की घोषणा कर दी गई. अंग्रेजी नौसेना पांडिचेरी पर आक्रमण के लिए तैयार थी. परन्तु डूप्ले कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन (Anwaruddin) के बीच-बचाव से पांडेचेरी की रक्षा करने में सफल रहा. परन्तु अंग्रेज़ कमांडर बार्नेट ने फ्रांसीसी जहाज़ों को डुबा दिया जिसमें डूप्ले का भी एक जहाज था. अंग्रेज़ कमांडर के इस व्यवहार पर क्रुद्ध होकर डूप्ले (Joseph François Dupleix) ने मॉरिशस के गवर्नर और फ्रांसीसी नौसेना के सेनापति ला-बर्दिनो से सहायता की माँग की. अंग्रेज़ कमांडर बार्नेट पांडेचेरी तक पहुँच चुका था. संयोग से बार्नेट की मृत्यु हो गई और उसके स्थान पर पेटन नया कमांडर नियुक्त हुआ. 1746 ई. में ला-बर्दिनो ने पेटन को हुगली की तरफ जाने के लिए विवश कर दिया और सितम्बर, 1746 ई. में मद्रास पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया.

डूप्ले vs कर्नाटक का नवाब

मद्रास-विजय के बाद ला-बर्दिनो और डूप्ले के बीच मतभेद हो गया. डूप्ले मद्रास पर अधिकार करने के बाद बंगाल पर आक्रमण कर अंग्रेजों की शक्ति को सदा के लिए नष्ट कर देना चाहता था. परन्तु ला-बर्दिनो अंग्रेजों से सौदेबाजी कर उन्हें मद्रास को लौटा देने के पक्ष में था. वह अंग्रेज़ अधिकारियों से बातचीत कर तीन लाख रुपये फ्रांसीसी कंपनी के लिए और एक लाख रु. अपने लिए लेकर अंग्रेजों से समझौता कर लेना चाहता था. अग्रिम धनराशि के रूप में उसने अंग्रेजों से 60,000 रु. प्राप्त कर लिए थे. अतः डूप्ले की इच्छा के विरुद्ध ला-बर्दिनो मद्रास को अंग्रेजों को सौंपकर मॉरिशस की तरफ रवाना हो गया. डूप्ले ने ला-बर्दिनो के समझौते को ठुकरा कर मद्रास पर आक्रमण कर दिया. अंग्रेजों ने कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन (Anwaruddin) से सहायता की याचना की. नवाब अनवरुद्दीन ने फ्रांसीसियों को मद्रास छोड़ने का आदेश दिया. परन्तु डूप्ले की पोल जल्द ही खुल गई. उसने मद्रास की लूट का सारा धन अपने पास रख लिया था. असंतुष्ट नवाब ने अपने पुत्र को फ्रांसीसियों के विरुद्ध मद्रास पर आक्रमण के लिए भेजा. डूप्ले और नवाब की सेना की बीच सेंट थोमी नामक स्थान पर युद्ध हुआ. चंद फ्रांसीसी सैनिकों ने डूप्ले के नेतृत्व में नवाब की सेना को पराजित कर दिया.

फ्रांसीसी vs अंग्रेज़

नवाब की सेना को पराजित करने से डूप्ले (Joseph François Dupleix) का हौसला बढ़ गया. वह भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य कायम करने का स्वप्न दखने लगा. इस उद्देश्य से उसने मद्रास स्थित सेंट डेविड के अंग्रेजी किले पर आक्रमण किया. सेंट डेविड का किला (Fort St. David) मद्रास से केवल 12 मील दूरी पर था. परन्तु 18 महीने के अथक प्रयत्न के बावजूद सेंट डेविड पर डूप्ले अधिकार नहीं कर पाया. इस बीच 6 अगस्त, 1748 ई. को अंग्रेजों का एक जहाजी बेड़ा वहाँ पहुँच गया. अंग्रेजों ने पांडिचेरी पर घेरा डाल दिया. परन्तु शीघ्र ही अंग्रेजों को पांडिचेरी पर से अपना घेरा उठा लेना पड़ा. पांडिचेरी में अंग्रेजों की असफलता से डूप्ले की प्रतिष्ठा बढ़ गयी.

1748 ई. में यूरोप में एक्स ला चैपल संधि (Treaty of Aix-la-Chapelle) से ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध समाप्त हो गया. भारत में भी अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच युद्ध बंद हो गया. संधि के अनुसार मद्रास को अंग्रेजों को लौटा देना पड़ा और बदले में फ्रांस को अमेरिका में लूबर का क्षेत्र प्राप्त हुआ.

प्रथम कर्नाटक युद्ध का परिणाम (Results)

एक्स ला चैपल संधि ने डूप्ले (Joseph François Dupleix) की आशा पर पानी फेर दिया. भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य साम्राज्य की स्थापना का स्वप्न पूरा नहीं हो सका. अंग्रेजों की शक्ति नष्ट नहीं हुई. अंग्रेजों की शक्ति  नष्ट नहीं हुई. विजय अथवा पराजय का निर्णय नहीं हो सका. बाह्य दृष्टि से कर्नाटक के प्रथम युद्ध (First Carnatic War) का परिणाम भारतीय राजनीति की दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं था. मुख्यरूप से यह उदध अंग्रेज़ और फ्रांसीसी कंपनियों के बीच हुआ था. युद्ध यूरोपीय राजनीतिक घटनाचक्र का परिणाम था. अंग्रेज़ और फ्रांसीसी कंपनियाँ पूर्ववत कायम रहीं. दोनों के अधिकार और सीमाओं में कोई परविर्तन नहीं हुआ. परन्तु कर्नाटक का प्रथम युद्ध (First Carnatic War) आंतरिक दृष्टि से भारतीय इतिहास की एक युगांतकारी घटना माना जाता है. इस युद्ध ने भारतीय राजनीति के खोखलेपन को पूर्णतया स्पष्ट कर दिया. अंग्रेज़ और फ्रांसीसी भारतीय नरेशों की युद्ध-पद्धति और सैनिक दुर्बलता से परिचित हो गए. अबतक अंग्रेज़ और फ्रांसीसी केवल सामुद्रिक शक्ति के विकास पर ही बल दे रहे थे. परन्तु भारतीय नरेशों की कमजोरी को दखते हुए उनमें राजनीतिक प्रभुत्व कायम करने का हौसला बढ़ा दिया.

कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन (Anwaruddin) ने युद्ध रोकने का प्रयास किया था. परन्तु नवाब की विशाल सेना फ्रांसीसियों से युद्ध में पराजित हुई. फ्रांसीसियों की विजय से यह स्पष्ट हो गया कि थोड़ी-सी प्रशिक्षित यूरोपीय सेना बड़ी से बड़ी भारतीय सेना को आसानी से मात दे सकती है. इस विजय से फ्रांसीसियों की केवल प्रतिष्ठा ही नहीं बढ़ी, बल्कि कूटनीति में भी फ्रांसीसियों से कर्नाटक का नवाब मात खा गया. भारतीय नरेशों का आपसी संघर्ष, उनकी सैनिक कमजोरी, नौसेना का अभाव, इन सब तत्वों ने मिलकर विदेशियों को भारत में साम्राज्य कायम करने की प्रेरणा दी.

1928 की नेहरु रिपॉर्ट

नेहरु रिपोर्ट से जुड़े तथ्य और जानकारियाँ - Nehru Report 1928 in Hindi

साइमन कमीशन की नियुक्ति के साथ ही भारत सचिव Lord Birkenhead ने भारतीय नेताओं को यह चुनौती दी कि यदि वे विभिन्न दलों और सम्प्रदायों की सहमति से एक संविधान तैयार कर सकें तो इंग्लैंड सरकार उस पर गंभीरता से विचार करेगी. इस चुनौती को भारतीय नेताओं ने स्वीकार करके इस बात का प्रयास किया कि साथ में मिल-जुलकर संविधान का एक प्रारूप तैयार किया जाए. इसके लिए मोतीलाल नेहरु की अध्यक्षता में एक समिति को गठित किया गया, जिसका कार्य था संविधान का प्रारूप तैयार करना. इस समिति के सचिव् जवाहर लाल नेहरु थे. इसमें अन्य 9 सदस्य भी जिनमें से एक सुभाष चन्द्र बोस  थे. समिति ने अपनी रिपोर्ट 28-30 अगस्त, 1928 को प्रस्तुत की जिसे नेहरु रिपोर्ट (Nehru Report) के नाम से जाना जाता है.

Proposals of Nehru Report

1. भारत को एक dominion state राज्य का दर्जा दिया जाए.9

  • केंद्र में द्विसदनात्म्क प्रणाली की स्थापना हो.
  • कार्यकारिणी पूरी तरह से व्यवस्थापिका सभा के प्रति उत्तरदायित हो.
  • समस्त दायित्व भारतीय प्रतिनिधियों को सौंपा जाए.

2. भारत में संघीय प्रणाली की स्थापना की जाए.

  • अवशिष्ट शक्ति केंद्र के पास हो.

3. सभी चुनाव क्षेत्रीय आधार पर हों.

  • साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व को समाप्त कर दिया जाए.
  • निर्वाचन व्यस्क मताधिकार के आधार पर हो.

4. इस रिपोर्ट में कहा गया कि कोई राज धर्म नहीं होगा.

5. पुरुषों और स्त्रियों को सामान नागरिक अधिकार देने का प्रस्ताव था.

6. नेहरु रिपोर्ट में सर्वोच्च न्यायालय के निर्माण का प्रस्ताव शामिल था.

7. Nehru Report में किसी भी समुदाय के लिए अलग मतदाताओं (electorate) या अल्पसंख्यकों के लिए वेटेज प्रदान करने का प्रावधान नहीं  था.

8. नेहरु रिपोर्ट में संघीय शासन का प्रस्ताव दिया गया था जिसमें अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को ही मिलनी थीं.

नेहरु रिपोर्ट का विरोध

नेहरु रिपोर्ट का जिन्ना और मुस्लिम लीग के अन्य नेताओं ने पुरजोर विरोध किया. इसके पीछे मूल कारण यह था कि इसमें साम्प्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व का प्रावधान नहीं किया गया था. कांग्रेस में कुछ लोग डोमिनियन स्टेटस (dominion status) की बात से संतुष्ट नहीं थे. वे पूर्ण स्वराज को Nehru Report में शामिल किये जाने की माँग कर रहे थे. कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य राजनेताओं में नेहरु रिपोर्ट के सन्दर्भ में पूर्ण सहमति नहीं होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने रिपोर्ट को अस्वीकृत कर दिया.

दादा भाई नौरोज़ी

दादाभाई नौरोजी का धन-निष्कासन का सिद्धांत : Theory of Drain of Wealth

Drain of Wealth Theory 

ब्रिटिश शासक भारतीयों को बलपूर्वक बहुत-सी वस्तुएँ यूरोप (ब्रिटेन छोड़कर) को निर्यात के लिए बाध्य करते थे. इस निर्यात से बहुत मात्रा में आमदनी  होती थी क्योंकि अधिक से अधिक माल निर्यात होता था. पर इस अतिरिक्त आय (surplus income) से ही अंग्रेज़ व्यापारी ढेर सारा माल खरीदकर उसे इंग्लैंड और दूसरी जगहों में भेज देते थे. इस प्रकार अंग्रेज़ दोनों तरफ से संपत्ति प्राप्त कर रहे थे. इन व्यापारों से भारत को कोई भी धन प्राप्त नहीं होता था. साथ ही साथ भारत से इंग्लैंड जाने वाले अंग्रेज़ भी अपने साथ बहुत सारे धन ले जाते थे. कंपनी के कर्मचारी वेतन, भत्ते, पेंशन आदि के रूप में पर्याप्त धन इकठ्ठा कर इंग्लैंड ले जाते थे. यह धन न केवल सामान के रूप में था, बल्कि धातु (सोना, चाँदी) के रूप में भी पर्याप्त धन इंग्लैंड भेजा गया. इस धन के निष्कासन (Drain of Wealth) को इंग्लैंड एक 'अप्रत्यक्ष उपहार” समझकर हर वर्ष भारत से पूरे अधिकार के साथ ग्रहण करता था. भारत से कितना धन इंग्लैंड ले जाया गया, उसका कोई हिसाब नहीं है क्योंकि सरकारी आँकड़ो (ब्रिटिश आँकड़ो) के अनुसार बहुत कम धन-राशि भारत से ले जाया गया. फिर भी इस धन के निष्कासन (Drain of Wealth) के चलते भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा. धन निष्कासन (Drain of Wealth) के प्रमुख स्रोत की पहचान निम्नलिखित रूप से की गई थी :

  1. ईस्ट इंडिया कम्पनी के कर्मचारियों का वेतन, भत्ते और पेंशन
  2. बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल एवं बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स का वेतन व भत्ते
  3. 1858 के बाद कंपनी की सारी देनदारियाँ
  4. उपहार से मिला हुआ धन
  5. निजी व्यापार से प्राप्त लाभ
  6. साम्राज्यवाद के विस्तार हेतु भारतीय सेना का उपयोग किया जाता था, जिससे रक्षा बजट का बोझ भारत पर ही पड़ता था (20वीं सदी की शुरुआत में यह रक्षा बजट 52% तक चला गया था)
  7. रेल जैसे उद्योग में में धन लगाने वाले पूंजीपतियों को निश्चित लाभ का दिया जाना आदि

इतिहासकारों में दो मत

धन-निष्कासन के दुष्परिणाम - Adverse Consequences of Drain of Wealth

  1. धन के निष्कासन (Drain of Wealth) के परिणामस्वरूप भारत में 'पूँजी संचय (capital accumulation)” नहीं हो सका.
  2. लोगों का जीवन-स्तर लगातार गिरता चला गया. गरीबी बढ़ती गई.
  3. धन के निष्कासन के चलते जनता पर करों का बोझ बहुत अधिक बढ़ गया.
  4. इसके साथ साथ कुटीर उद्योगों का नाश हुआ.
  5. भूमि पर दबाव बढ़ता गया और भूमिहीन कृषि मजदूरों की संख्या बढ़ती चलती गई.

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...