भारत का विभाजन

भारत का विभाजन : Partition of India in Hindi

आज हम भारत का विभाजन (Partition of India) कैसे हुआ और इसके पीछे क्या कारण थे, क्या सच्चाई थी, यह जानने की कोशिश करेंगे. कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत भारत में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग कर एक अंतरिम सरकार (interim government) का गठन किया, लेकिन मुस्लिम लीग इस अंतरिम सरकार में रहकर भी केवल  व्यवधान डालने का कार्य करती रही. उससे सहयोग की अपेक्षा रखना भी शुद्ध मूर्खता थी क्योंकि वह तो पाकिस्तान के निर्माण के लिए कटिबद्ध हो चुकी थी. पूरे देश में साम्प्रदायिकता की आग फैली हुई थी और अशांति तथा अराजकता मची हुई थी. भारत की विषम साम्प्रदायिक समस्या का हल करने के लिए और कैबिनेट योजना की रक्षा के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने लन्दन में एक सम्मलेन का आयोजन किया, लेकिन फिर भी कांग्रेस तथा लीग में समझौता नहीं हो पाया. भारत की परिस्थति ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण से बाहर हो रही थी तब उसने भारत को भारतीयों के हाल पर ही छोड़ना उचित समझा. ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने घोषणा की कि जून 1948 के पहले भारतीयों के हाथ में सत्ता सौंप दी जायेगी. इस बात पर भारत के तत्कालीन वायसराय इस घोषणा से सहमत नहीं थे अतः उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और लॉर्ड माउंटबेटन अंतरिम वायसराय बनकर भारत आये.

माउंटबेटन योजना (Mountbatten Plan)

वायसराय लार्ड माउंटबेटन भारत के नेताओं से बातचीत कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत का विभाजन (Partition of India) हर हाल में होकर रहेगा. हालाँकि महात्मा गांधी ने माउंटबेटन से मिलकर इस विभाजन को रोकने का काफी प्रयत्न किया लेकिन वे असफल रहे. लॉर्ड माउंटबेटन लन्दन गए और वहां के अधिकारीयों से बातचीत कर यहाँ लौटे तथा 3 जून, 1947 को एक योजना प्रकाशित की जो 'माउंटबेटन योजना” के नाम से जानी जाती है. इस योजना के अनुसार यह तय था कि ब्रिटिश सरकार भारत का प्रशासन ऐसी सरकार को सौंप देगी जो जनता की इच्छा से निर्मित हो, साथ ही यह भी तय हुआ कि जो प्रांत भारतीय संघ में सम्मिलित नहीं होना चाहते हैं उन्हें आत्म-निर्णय का अधिकार दिया जायेगा. यदि मुस्लिम-बहुल क्षेत्र के निवासी देश के विभाजन का समर्थन करते हैं तो भारत और पाकिस्तान की सीमा का निर्धारण करने के लिए एक कमीशन की नियुक्ति की जाएगी. माउंटबेटन योजना को सबसे पहले मुस्लिम लीग ने ही स्वीकार किया, बाद में कांग्रेस ने मत विभाजन के बाद इसे स्वीकार किया. मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कहा था कि 'माउंटबेटन योजना के बाद भारत की एकता को बनाये रखने की आशा हर तरह से ख़त्म हो गई”. यह स्पष्ट है कि माउंटबेटन योजना देश के विभाजन के आधार पर ही लागू की गई थी और भारत दो भागों में बँट गया.

4 जुलाई, 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पेश किया गया जिसके अनुसार 15 अगस्त, 1947 को भारत दो अधिराज्यों में विभाजित हो गया. दोनों उपनिवेशों की संविधानसभा को ब्रिटिश सरकार ने सत्ता सौंप दी और जबतक संविधान का निर्माण नहीं हुआ तबतक 1935 के भारत सरकार अधिनियम के अनुसार उपनिवेशों का शासन चला तथा संविधान सभाएँ विधानमंडल के रूप में कार्य करती रहीं. पंजाब और बंगाल में सीमा निर्धारण का कार्य सीमा आयोग के हवाले कर दिया गया. इस प्रकार माउंटबेटन योजना के द्वारा भारत का विभाजन (Partition of India) हुआ और स्वतंत्रता अधिनियम के द्वारा आजादी मिली. इस प्रकार अखंड भारत की धारणा एक स्वप्नमात्र बन के रह गई. भारत स्वतंत्र तो हुआ पर इसके लिए उसे एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ी.

भारत-विभाजन के कारण - Causes of Partition of India

मुसलामानों की धार्मिक कट्टरता

अंग्रेजों का सिद्धांत ही था फूट डालो और शासन करो. भारत-विभाजन के पीछे मुसलामानों की धार्मिक कट्टरता काफी दोषी है. उनमें शिक्षा का अभाव था और आधुनिक विचारधारा के प्रति वे उदासीन थे. वे धर्म को विशेष महत्त्व देते थे. मुसलामानों में यह भावना प्रचारित कर दी गई की भारत जैसे हिन्दू बहुसंख्यक राष्ट्र में मुसलामानों के स्वार्थ की रक्षा संभव नहीं है और उनका कल्याण एक पृथक् राष्ट्र के निर्माण से ही हो सकता है. यद्यपि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ मधुर सम्बन्ध बनाने का प्रयास किया लेकिन मुहम्मद अली जिन्ना लीग की नीति में परिवर्तन के लिए तनिक भी तैयार नहीं हुए.

साम्प्रदायिकता को अंग्रेजों का प्रोत्साहन 

ब्रिटिश शासकों ने भारत में साम्प्रदायिकता के प्रोत्साहन में कोई कसर नहीं छोड़ी. 1857 के विद्रोह के बाद अँगरेज़ मुसलामानों को संरक्षण देकर फूट डालने का कार्य किया क्योंकि वे अनुभाव करने लगे कि हिन्दू-मुस्लिम एकता के बाद तो भारत पर उनका शासन करना मुश्किल हो जायेगा. उन्होंने अल्पसंख्यक के नाम पर मुसलामानों को आरक्षण दिया और राष्ट्रीय आंदोलं को कमजोर बनाया. 1909 में मुस्लिमों को अलग प्रतिनिधित्व देना ही भारत-विभाजन की पृष्ठभूमि बनी.

कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति 

कांग्रेस ने प्रारम्भ से ही मुसलामानों को संतुष्ट करने की नीति अपनाकर उनका मन काफी बाधा दिया था जिसका परिणाम यह हुआ कि वे अलग राष्ट्र की मांग करने लगे. कांग्रेस की यह तुष्टीकरण की नीति उनकी भयंकर भूल थी. लखनऊ समझौते के अनुसार मुसलामानों को उनकी जनसँख्या के आधार पर पृथक् प्रतिनिधित्व दिया गया. फिर 1932 के साम्प्रदायिक निर्णय के विषय में कांग्रेस ने अस्पृश्य जातियों के अलग हो जाने के भय से जिस दुर्बलता का परिचय दिया उससे मुसलामानों का मनोबल काफी बढ़ा. स्वतंत्र भारत में मुस्लिमों का क्या भविष्य होगा, उसके सम्बन्ध में कांग्रेस कोई स्पष्ट निर्णय नहीं ले सकी और दूसरी ओर जिन्ना का एक ही नारा था कि 'हिन्दू और मुसलमान दो पृथक् राष्ट्र हैं'.

तत्कालीन परिस्थितियाँ 

भारत की तत्कालीन परिस्थतियाँ भी भारत विभाजन (Partition of India) के लिए उत्तरदाई थीं. भारत छोड़ो आन्दोलन तथा विश्वयुद्ध से उत्पन्न स्थिति, अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीग को शामिल करना तथा कांग्रेस और लीग के बीच मतभेद भारत के विभाजन का कारण बनी. अंग्रेजों ने जैसे ही भारत को स्वतंत्र करने की घोषणा की, दंगे प्रारंभ हो गए. भयानक खूनखराबे  से बचने के लिए विभाजन को स्वीकार करना ही पड़ा.

इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत के विभाजन (Partition of India) के बाद अखंड भारत का सपना चूर-चूर हो गया. यह भी सत्य है कि अगर विभाजन की बात स्वीकार नहीं की जाती तो केंद्र सरकार और भी दुर्बल हो जाती और पूरा राष्ट्र बर्बाद हो जाता क्योंकि मुस्लिम लीग हमेशा सरकार के कारों में हस्तक्षेप करती और विकास का कार्य ठप पड़ जाता. देश की अखंडता उसी समय फायदेमंद हो सकती थी जब मुसलामानों को संतुष्ट करने के स्थान पर सबों के साथ समान व्यवहार किया जाता. भारत-विभाजन के कारण भारत को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. अब सीमा सुरक्षा का प्रश्न काफी जटिल हो गया, हमशा भारत और पकिस्तान के बीच युद्ध और तनाव चलता रहता. कश्मीर पर अधिकार का मुद्दा हमेशा भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का कारण बनता रहा और अब भी बना हुआ है.

1857 बिरसा मुंडा आंदोलन

बिरसा मुंडा आन्दोलन - Birsa Munda Movement in Hindi

1857 ई. के बाद मुंडाओं ने सरदार आन्दोलन चलाया जो एक शांत प्रकृति का आन्दोलन था. पर इससे आदिवासियों की स्थिति में कोई ख़ास परिवर्तन नहीं आया. मुंडाओं ने आगामी आन्दोलन को उग्र रूप देने का निर्णय लिया. सरदार आन्दोलन के ठीक विपरीत बिरसा मुंडा आन्दोलन उग्र और हिंसक था. इस आन्दोलन के नेता बिरसा मुंडा (Birsa Munda), एक पढ़े-लिखे युवा नेता थे. यह आन्दोलन विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शुरू किया गया था. इसलिए इसका स्वरूप भी मिश्रित था. यह आन्दोलन आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तन और धार्मिक पुनरुत्थान जैसे विभिन्न उद्देश्यों को प्राप्त करने की इच्छा रखता था. चलिए पढ़ते हैं बिरसा मुंडा आन्दोलन (Birsa Munda Movement) के उद्देश्य, नेतृत्वकर्ता और परिणाम के बारे में in Hindi - -

बिरसा मुंडा आन्दोलन का आर्थिक उद्देश्य

बिरसा आन्दोलन का आर्थिक उद्देश्य था दिकू जमींदारों (गैर-आदिवासी जमींदार) द्वारा हथियाए गए आदिवासियों की कर मुक्त भूमि की वापसी जिसके लिए आदिवासी लम्बे समय से संघर्ष कर रहे थे. मुंडा समुदाय सरकार से न्याय पाने में असमर्थ रहे. इस असमर्थता से तंग आ कर उन्होंने अंग्रेजी राज को समाप्त करने और मुंडा राज की स्थापना करने का निर्णय लिया. वे सभी ब्रिटिश अधिकारीयों और ईसाई मिशनों को अपने क्षेत्र से बाहर निकाल देना चाहते थे. बिरसा मुंडा ने एक नए धर्म का सहारा लेकर मुंडाओं को संगठित किया. उनके नेतृत्व में मुंडाओं ने 1899-1900 ई. में विद्रोह किया.

बिरसा मुंडा का नेतृत्व

बिरसा मुंडा आदिवासियों की दयनीय हालत को देखकर उन्हें जमींदारों और ठेकेदारों के अत्याचार से मुक्ति दिलाना चाहते थे. बिरसा मुंडा (Birsa Munda) ने अनुभव किया था कि शांतिपूर्ण तरीकों से आन्दोलन चलाने का परिणाम व्यर्थ होता है. इसलिए उन्होंने इस आन्दोलन को उग्र बनाने के लिए अधिक से अधिक नवयुवकों को संगठित किया. मुंडाओं ने उन्हें अपना भगवान् मान लिया. उनका प्रत्येक शब्द मुंडाओं के लिए मानो ब्रह्मवाक्य बन गया. बिरसा मुंडा ने घोषणा की कि कोई भी सरकार को कर नहीं दे. मुंडाओं ने उनकी बातें मानी और पालन किया.

बिरसा मुंडा गिरफ्तार

1895 ई. में बिरसा मुंडा को विद्रोह फैलाने और राजविरोधी षड्यंत्र करने के अपराध में गिरफ्तार कर  लिया गया. उन्हें दो वर्ष की कैद की सजा मिली. जेल से रिहा होने के बाद वह और भी सक्रिय होकर और अधिक गर्मजोशी से आदिवासी युवाओं को आन्दोलन के लिए प्रेरित करने लगे. जंगल में छिपकर गुप्त सभाएँ आयोजित की जाती थीं और सभी को आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाता था. वे स्वयं महारानी विक्टोरिया के पुतले पर तीरों से वार करके तीरंदाजी का अभ्यास करते थे. बिरसा मुंडा आन्दोलन में कई निर्दोष लोगों की भी हत्या हुई जिनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे सरकारी नौकर थे.

विद्रोह का दमन

1899 ई. में क्रिसमस के दिन मुंडाओं का व्यापक और हिंसक विद्रोह शुरू हुआ. सबसे पहले जो मुंडा ईसाई बने थे और जो लोग सरकार के लिए काम करते थे, उन्हें मारने का प्रयास किया गया लेकिन बाद में इस नीति में परिवर्तन किया गया क्योंकि अपना धर्म बदलने वाले मुंडा थे तो अपने ही समुदाय के! इसलिए उन्हें छोड़ सरकार और मिशनरियों के विरुद्ध आवाज़ उठने लगी. राँची और सिंहभूम में अनेक चर्चों में मुंडा आदिवासी समूह ने आक्रमण किया. पुलिस मुंडाओं के क्रोध का विशेष शिकार बनी. इस विद्रोह का प्रभाव पूरे छोटानागपुर में फ़ैल गया.

चिंतित होकर सरकार ने इस विद्रोह का दमन करने का निर्णय लिया. सरकार ने पुलिस और सेना की सहायता ली. मुंडाओं ने छापामार युद्ध का सहारा लेकर पुलिस और सेना का सामना किया लेकिन बन्दूक के सामने तीर-धनुष कब तक टिकती? फरवरी 1900 ई. में बिरसा एक बार फिर से गिरफ्तार कर लिए गए. उन्हें राँची के जेल में रखा गया. उनपर सरकार ने राजद्रोह का मुकदमा चलाया. मुक़दमे के दौरान ही बिरसा मुंडा को हैजा हो गया और 9 जून, 1900 ई. को उन्होंने अपना प्राण त्याग दिया.

परिणाम

बिरसा की मृत्यु के बाद बिरसा मुंडा आन्दोलन (Birsa Munda Movement) शिथिल पड़ गया. बिरसा के तीन प्रमुख सहयोगियों को फाँसी की सजा दी गई. अनेक मुंडाओं को जेल में ठूस दिया गया. परिणामस्वरूप बिरसा मुंडा आन्दोलन विफल हो गया. आदिवासियों को इस आन्दोलन से तत्काल कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ परन्तु सरकार को उनकी गंभीर स्थिति पर विचार करने के लिए बाध्य होना पड़ा. आदिवासियों की जमीन का सर्वे करवाया गया. 1908 ई. में  ही छोटानागपुर काश्तकारी कानून (Chotanagpur Tenancy Act, 1908) पारित हुआ. मुंडाओं को जमीन सम्बंधित कई अधिकार मिले और बेकारी से उन्हें मुक्ति मिली. मुंडा समुदाय आज भी बिरसा को अपना भगवान् मानता है.

1927 बटलर कमेटी

बटलर समिति के बारे में जानें - Butler Committee 1927 in Hindi

प्रथम विश्वयुद्ध के समय में देशी शासकों ने ब्रिटिश सरकार की बहुमूल्य सहायता की थी. युद्ध के अंत होने पर भारत में उत्तरदायी शासन के विकास की योजना बनाई गई. फलतः देशी शासकों और ब्रिटिश सरकार के बीच के सम्बन्ध की व्याख्या करने और ब्रिटिश सार्वभौम सत्ता को पारिभाषित करने की जरूरत महसूस हुई. फलतः 1927 ई. में इसकी जाँच करने और इस सम्बन्ध में उचित राय देने के लिए इंडियन-स्टेट्स-कमिटी जो साधारणतः इतिहास में बटलर समिति (Butler Committee) के नाम से विख्यात है, Harcourt Butler की अध्यक्षता में गठित की गई.

बटलर समिति (Butler Committee)

Butler Committee की सिफारिशें इस प्रकार थीं -

  1. राज्यों के साथ बरतने के लिए कौंसिल समेत गवर्नर-जनरल नहीं, बल्कि वायसराय ब्रिटिश साम्राज्य का प्रतिनिधि बने.
  2. ब्रिटिश सम्राट और देशी शासकों के सम्बन्ध के प्रक्रिया को बिना देशी नरेशों की राय के भारत सरकार को हस्तांतरित नहीं किया जाए क्योंकि वह व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदाई है.
  3. राज्य परिषद् बनाने की योजना रद्द कर दी जाए.
  4. देशी राज्यों के शासन में हस्तक्षेप करना वायसराय के निर्णय पर छोड़ दिया जाए.
  5. भारत सरकार और देशी राज्यों के मतभेद का समाधान करने के लिए विशेष समितियाँ नियुक्त की जाएँ.
  6. ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों के बीच आर्थिक संबंधों की जाँच के लिए एक समिति नियुक्त की जाए.
  7. राजनीतिक पदाधिकारियों की नियुक्ति और शिक्षा का अलग प्रबंध किया जाए और वे इंग्लैंड के विश्वविद्यालयों से लिए जाएँ.

Butler Committee की निंदा

बटलर-समिति की सिफारिशों की कड़ी निंदा की गई है क्योंकि इसके लेखकों ने एक नए सिद्धांत का आविष्कार किया था. समिति के रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से बताया गया कि देशी राज्यों का सम्बन्ध भारत सरकार से नहीं था, बल्कि सीधे ब्रिटिश सम्राट से था. पर इस सीधे सम्बन्ध का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं था, बल्कि भारत सरकार और देशी राज्यों के बीच एक बड़ी दीवार कायम करने के उद्देश्य से ही इस सिद्धांत का आविष्कार किया गया था. इस सिद्धांत के द्वारा ब्रिटिश-भारत में आनेवाली उत्तरदाई सरकार को कमजोर बनाने की योजना बनायी गई थी. इसी कारण कुछ भारतीयों ने बटलर समिति की सिफारिशों की कटु आलोचना की.

श्री.सी.वाई. चिंतामणि ने बतलाया कि 'बटलर कमिटी अपने जन्म में बुरी थी, इसकी नियुक्ति का समय बुरा था, इसकी जाँच-पड़ताल की शर्तें बुरी थीं, इसमें काम करनेवाले लोग बुरे थे और जाँच करने का इसका ढंग बुरा था. इस रिपोर्ट की दलीलें बुरी हैं और इसके निष्कर्ष बुरे हैं.”

बटलर समिति (Butler Committee) की रिपोर्ट में देशी राज्यों की जनता के लिए भविष्य का कोई संकेत नहीं था. उनमें आधुनिक विचार और ऐसी वस्तुओं का नितांत अभाव था जो विश्वास और आशा का संचार कर सकती हैं.

1st कर्नाटक युद्ध

प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746-48 ई.) : कारण एवं परिणाम

प्रथम कर्नाटक युद्ध : भूमिका

मुगलों के पतन के बाद राजनैतिक प्रभुत्व के लिए देशी शासकों के साथ-साथ विदेशी ताकतें भी संघर्षरत हो गयीं. देशी ताकतों में मुख्य रूप से मराठे थे तो विदेशी ताकतों में असली लड़ाई अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच थी. इन दोनों शक्तियों में प्रभुत्व का यह संघर्ष 60-70 साल चला और नेपोलियन के पतन के बाद अंग्रेजों के पक्ष में ख़त्म हो गया. इस सन्दर्भ में दोनों के शक्तियों के बीच पहली बड़ी लड़ाई कर्नाटक क्षेत्र में हुई. इसमें एक ओर फ़्रांस का गवर्नर दूप्ले और कर्नाटक का नवाब थे तो दूसरी ओर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी का गवर्नर. यह युद्ध प्रथम कर्नाटक युद्ध (First Carnatic War) कहलाता है जो 1746 ई.  से 1748 ई. तक चला. कहते हैं कि यूरोप में ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार के युद्ध में इंग्लैंड और फ़्रांस के बीच जो संघर्ष चला, उसी का परिणाम भारत में प्रथम कर्नाटक युद्ध (First Carnatic War) के रूप में सामने आया.

अंग्रेज-फ्रांसीसी संघर्ष

भारत में अंग्रेज-फ्रांसीसी संघर्ष का इतिहास चार भागों में बाँटा जाता है - 1746 ई. से 1748 ई. तक, 1749-1754 ई. तक, 1758 ई. से 1763 ई. और 1778 ई. से 1815 ई. तक. पहले तीन भागों का सम्बन्ध मुख्यतया दक्षिण भारत से था. इन तीनों कालों में दक्षिण भारत से फ्रांसीसी शक्ति नष्ट हो गई. अंतिम चरण में भारतीय नरेशों की सहायता से फ़्रांसीसियों ने अंग्रेजों की शक्ति को नष्ट करने का असफल प्रयास किया.

1740 ई. में ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध यूरोप में शुरू हुआ. प्रारम्भ में इंग्लैंड का प्रधानमंत्री वालपोल युद्ध में सम्मिलित नहीं हुआ. वालपोल शांतिप्रिय नीति का पृष्ठपोषक था. पर 1742 ई. में वालपोल के त्यागपत्र के बाद इंग्लैंड ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार-युद्ध में सम्मिलित हो गया. यूरोप में इंग्लैंड और फ्रांस एक-दूसरे के विपक्षी थे. इसलिए यूरोपीय युद्ध की स्वाभाविक प्रतिक्रिया भारत में भी हुई.

डूप्ले

फ्रांसीसी कंपनी का गवर्नर डूप्ले (Joseph François Dupleix) था. उसने मद्रास में अंग्रेज़ गवर्नर को एक पत्र लिखकर युद्ध रोकने की राय दी थी. उत्तर में अंग्रेज़ गवर्नर के द्वारा भी शांति कायम रखने का आश्वाशन दिया गया था. दोनों कंपनियों (अंग्रेज़ और फ़्रांस की कंपनियाँ) के अधिकारियों ने अपनी-अपनी सरकार से युद्ध न करने के पक्ष में निवेदन किया था. फ्रांसीसी सरकार ने डूप्ले की बात स्वीकार कर ली, परन्तु इंग्लैंड की सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया और कमांडर बार्नेट के नेतृत्व में एक जहाजी बेड़ा फ्रांसीसियों के विरुद्ध आक्रमण के लिए भेज दिया. 1746 ई. में दोनों कंपनियों के बीच युद्ध की घोषणा कर दी गई. अंग्रेजी नौसेना पांडिचेरी पर आक्रमण के लिए तैयार थी. परन्तु डूप्ले कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन (Anwaruddin) के बीच-बचाव से पांडेचेरी की रक्षा करने में सफल रहा. परन्तु अंग्रेज़ कमांडर बार्नेट ने फ्रांसीसी जहाज़ों को डुबा दिया जिसमें डूप्ले का भी एक जहाज था. अंग्रेज़ कमांडर के इस व्यवहार पर क्रुद्ध होकर डूप्ले (Joseph François Dupleix) ने मॉरिशस के गवर्नर और फ्रांसीसी नौसेना के सेनापति ला-बर्दिनो से सहायता की माँग की. अंग्रेज़ कमांडर बार्नेट पांडेचेरी तक पहुँच चुका था. संयोग से बार्नेट की मृत्यु हो गई और उसके स्थान पर पेटन नया कमांडर नियुक्त हुआ. 1746 ई. में ला-बर्दिनो ने पेटन को हुगली की तरफ जाने के लिए विवश कर दिया और सितम्बर, 1746 ई. में मद्रास पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया.

डूप्ले vs कर्नाटक का नवाब

मद्रास-विजय के बाद ला-बर्दिनो और डूप्ले के बीच मतभेद हो गया. डूप्ले मद्रास पर अधिकार करने के बाद बंगाल पर आक्रमण कर अंग्रेजों की शक्ति को सदा के लिए नष्ट कर देना चाहता था. परन्तु ला-बर्दिनो अंग्रेजों से सौदेबाजी कर उन्हें मद्रास को लौटा देने के पक्ष में था. वह अंग्रेज़ अधिकारियों से बातचीत कर तीन लाख रुपये फ्रांसीसी कंपनी के लिए और एक लाख रु. अपने लिए लेकर अंग्रेजों से समझौता कर लेना चाहता था. अग्रिम धनराशि के रूप में उसने अंग्रेजों से 60,000 रु. प्राप्त कर लिए थे. अतः डूप्ले की इच्छा के विरुद्ध ला-बर्दिनो मद्रास को अंग्रेजों को सौंपकर मॉरिशस की तरफ रवाना हो गया. डूप्ले ने ला-बर्दिनो के समझौते को ठुकरा कर मद्रास पर आक्रमण कर दिया. अंग्रेजों ने कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन (Anwaruddin) से सहायता की याचना की. नवाब अनवरुद्दीन ने फ्रांसीसियों को मद्रास छोड़ने का आदेश दिया. परन्तु डूप्ले की पोल जल्द ही खुल गई. उसने मद्रास की लूट का सारा धन अपने पास रख लिया था. असंतुष्ट नवाब ने अपने पुत्र को फ्रांसीसियों के विरुद्ध मद्रास पर आक्रमण के लिए भेजा. डूप्ले और नवाब की सेना की बीच सेंट थोमी नामक स्थान पर युद्ध हुआ. चंद फ्रांसीसी सैनिकों ने डूप्ले के नेतृत्व में नवाब की सेना को पराजित कर दिया.

फ्रांसीसी vs अंग्रेज़

नवाब की सेना को पराजित करने से डूप्ले (Joseph François Dupleix) का हौसला बढ़ गया. वह भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य कायम करने का स्वप्न दखने लगा. इस उद्देश्य से उसने मद्रास स्थित सेंट डेविड के अंग्रेजी किले पर आक्रमण किया. सेंट डेविड का किला (Fort St. David) मद्रास से केवल 12 मील दूरी पर था. परन्तु 18 महीने के अथक प्रयत्न के बावजूद सेंट डेविड पर डूप्ले अधिकार नहीं कर पाया. इस बीच 6 अगस्त, 1748 ई. को अंग्रेजों का एक जहाजी बेड़ा वहाँ पहुँच गया. अंग्रेजों ने पांडिचेरी पर घेरा डाल दिया. परन्तु शीघ्र ही अंग्रेजों को पांडिचेरी पर से अपना घेरा उठा लेना पड़ा. पांडिचेरी में अंग्रेजों की असफलता से डूप्ले की प्रतिष्ठा बढ़ गयी.

1748 ई. में यूरोप में एक्स ला चैपल संधि (Treaty of Aix-la-Chapelle) से ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध समाप्त हो गया. भारत में भी अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच युद्ध बंद हो गया. संधि के अनुसार मद्रास को अंग्रेजों को लौटा देना पड़ा और बदले में फ्रांस को अमेरिका में लूबर का क्षेत्र प्राप्त हुआ.

प्रथम कर्नाटक युद्ध का परिणाम (Results)

एक्स ला चैपल संधि ने डूप्ले (Joseph François Dupleix) की आशा पर पानी फेर दिया. भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य साम्राज्य की स्थापना का स्वप्न पूरा नहीं हो सका. अंग्रेजों की शक्ति नष्ट नहीं हुई. अंग्रेजों की शक्ति  नष्ट नहीं हुई. विजय अथवा पराजय का निर्णय नहीं हो सका. बाह्य दृष्टि से कर्नाटक के प्रथम युद्ध (First Carnatic War) का परिणाम भारतीय राजनीति की दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं था. मुख्यरूप से यह उदध अंग्रेज़ और फ्रांसीसी कंपनियों के बीच हुआ था. युद्ध यूरोपीय राजनीतिक घटनाचक्र का परिणाम था. अंग्रेज़ और फ्रांसीसी कंपनियाँ पूर्ववत कायम रहीं. दोनों के अधिकार और सीमाओं में कोई परविर्तन नहीं हुआ. परन्तु कर्नाटक का प्रथम युद्ध (First Carnatic War) आंतरिक दृष्टि से भारतीय इतिहास की एक युगांतकारी घटना माना जाता है. इस युद्ध ने भारतीय राजनीति के खोखलेपन को पूर्णतया स्पष्ट कर दिया. अंग्रेज़ और फ्रांसीसी भारतीय नरेशों की युद्ध-पद्धति और सैनिक दुर्बलता से परिचित हो गए. अबतक अंग्रेज़ और फ्रांसीसी केवल सामुद्रिक शक्ति के विकास पर ही बल दे रहे थे. परन्तु भारतीय नरेशों की कमजोरी को दखते हुए उनमें राजनीतिक प्रभुत्व कायम करने का हौसला बढ़ा दिया.

कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन (Anwaruddin) ने युद्ध रोकने का प्रयास किया था. परन्तु नवाब की विशाल सेना फ्रांसीसियों से युद्ध में पराजित हुई. फ्रांसीसियों की विजय से यह स्पष्ट हो गया कि थोड़ी-सी प्रशिक्षित यूरोपीय सेना बड़ी से बड़ी भारतीय सेना को आसानी से मात दे सकती है. इस विजय से फ्रांसीसियों की केवल प्रतिष्ठा ही नहीं बढ़ी, बल्कि कूटनीति में भी फ्रांसीसियों से कर्नाटक का नवाब मात खा गया. भारतीय नरेशों का आपसी संघर्ष, उनकी सैनिक कमजोरी, नौसेना का अभाव, इन सब तत्वों ने मिलकर विदेशियों को भारत में साम्राज्य कायम करने की प्रेरणा दी.

1928 की नेहरु रिपॉर्ट

नेहरु रिपोर्ट से जुड़े तथ्य और जानकारियाँ - Nehru Report 1928 in Hindi

साइमन कमीशन की नियुक्ति के साथ ही भारत सचिव Lord Birkenhead ने भारतीय नेताओं को यह चुनौती दी कि यदि वे विभिन्न दलों और सम्प्रदायों की सहमति से एक संविधान तैयार कर सकें तो इंग्लैंड सरकार उस पर गंभीरता से विचार करेगी. इस चुनौती को भारतीय नेताओं ने स्वीकार करके इस बात का प्रयास किया कि साथ में मिल-जुलकर संविधान का एक प्रारूप तैयार किया जाए. इसके लिए मोतीलाल नेहरु की अध्यक्षता में एक समिति को गठित किया गया, जिसका कार्य था संविधान का प्रारूप तैयार करना. इस समिति के सचिव् जवाहर लाल नेहरु थे. इसमें अन्य 9 सदस्य भी जिनमें से एक सुभाष चन्द्र बोस  थे. समिति ने अपनी रिपोर्ट 28-30 अगस्त, 1928 को प्रस्तुत की जिसे नेहरु रिपोर्ट (Nehru Report) के नाम से जाना जाता है.

Proposals of Nehru Report

1. भारत को एक dominion state राज्य का दर्जा दिया जाए.9

  • केंद्र में द्विसदनात्म्क प्रणाली की स्थापना हो.
  • कार्यकारिणी पूरी तरह से व्यवस्थापिका सभा के प्रति उत्तरदायित हो.
  • समस्त दायित्व भारतीय प्रतिनिधियों को सौंपा जाए.

2. भारत में संघीय प्रणाली की स्थापना की जाए.

  • अवशिष्ट शक्ति केंद्र के पास हो.

3. सभी चुनाव क्षेत्रीय आधार पर हों.

  • साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व को समाप्त कर दिया जाए.
  • निर्वाचन व्यस्क मताधिकार के आधार पर हो.

4. इस रिपोर्ट में कहा गया कि कोई राज धर्म नहीं होगा.

5. पुरुषों और स्त्रियों को सामान नागरिक अधिकार देने का प्रस्ताव था.

6. नेहरु रिपोर्ट में सर्वोच्च न्यायालय के निर्माण का प्रस्ताव शामिल था.

7. Nehru Report में किसी भी समुदाय के लिए अलग मतदाताओं (electorate) या अल्पसंख्यकों के लिए वेटेज प्रदान करने का प्रावधान नहीं  था.

8. नेहरु रिपोर्ट में संघीय शासन का प्रस्ताव दिया गया था जिसमें अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को ही मिलनी थीं.

नेहरु रिपोर्ट का विरोध

नेहरु रिपोर्ट का जिन्ना और मुस्लिम लीग के अन्य नेताओं ने पुरजोर विरोध किया. इसके पीछे मूल कारण यह था कि इसमें साम्प्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व का प्रावधान नहीं किया गया था. कांग्रेस में कुछ लोग डोमिनियन स्टेटस (dominion status) की बात से संतुष्ट नहीं थे. वे पूर्ण स्वराज को Nehru Report में शामिल किये जाने की माँग कर रहे थे. कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य राजनेताओं में नेहरु रिपोर्ट के सन्दर्भ में पूर्ण सहमति नहीं होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने रिपोर्ट को अस्वीकृत कर दिया.

दादा भाई नौरोज़ी

दादाभाई नौरोजी का धन-निष्कासन का सिद्धांत : Theory of Drain of Wealth

Drain of Wealth Theory 

ब्रिटिश शासक भारतीयों को बलपूर्वक बहुत-सी वस्तुएँ यूरोप (ब्रिटेन छोड़कर) को निर्यात के लिए बाध्य करते थे. इस निर्यात से बहुत मात्रा में आमदनी  होती थी क्योंकि अधिक से अधिक माल निर्यात होता था. पर इस अतिरिक्त आय (surplus income) से ही अंग्रेज़ व्यापारी ढेर सारा माल खरीदकर उसे इंग्लैंड और दूसरी जगहों में भेज देते थे. इस प्रकार अंग्रेज़ दोनों तरफ से संपत्ति प्राप्त कर रहे थे. इन व्यापारों से भारत को कोई भी धन प्राप्त नहीं होता था. साथ ही साथ भारत से इंग्लैंड जाने वाले अंग्रेज़ भी अपने साथ बहुत सारे धन ले जाते थे. कंपनी के कर्मचारी वेतन, भत्ते, पेंशन आदि के रूप में पर्याप्त धन इकठ्ठा कर इंग्लैंड ले जाते थे. यह धन न केवल सामान के रूप में था, बल्कि धातु (सोना, चाँदी) के रूप में भी पर्याप्त धन इंग्लैंड भेजा गया. इस धन के निष्कासन (Drain of Wealth) को इंग्लैंड एक 'अप्रत्यक्ष उपहार” समझकर हर वर्ष भारत से पूरे अधिकार के साथ ग्रहण करता था. भारत से कितना धन इंग्लैंड ले जाया गया, उसका कोई हिसाब नहीं है क्योंकि सरकारी आँकड़ो (ब्रिटिश आँकड़ो) के अनुसार बहुत कम धन-राशि भारत से ले जाया गया. फिर भी इस धन के निष्कासन (Drain of Wealth) के चलते भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा. धन निष्कासन (Drain of Wealth) के प्रमुख स्रोत की पहचान निम्नलिखित रूप से की गई थी :

  1. ईस्ट इंडिया कम्पनी के कर्मचारियों का वेतन, भत्ते और पेंशन
  2. बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल एवं बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स का वेतन व भत्ते
  3. 1858 के बाद कंपनी की सारी देनदारियाँ
  4. उपहार से मिला हुआ धन
  5. निजी व्यापार से प्राप्त लाभ
  6. साम्राज्यवाद के विस्तार हेतु भारतीय सेना का उपयोग किया जाता था, जिससे रक्षा बजट का बोझ भारत पर ही पड़ता था (20वीं सदी की शुरुआत में यह रक्षा बजट 52% तक चला गया था)
  7. रेल जैसे उद्योग में में धन लगाने वाले पूंजीपतियों को निश्चित लाभ का दिया जाना आदि

इतिहासकारों में दो मत

धन-निष्कासन के दुष्परिणाम - Adverse Consequences of Drain of Wealth

  1. धन के निष्कासन (Drain of Wealth) के परिणामस्वरूप भारत में 'पूँजी संचय (capital accumulation)” नहीं हो सका.
  2. लोगों का जीवन-स्तर लगातार गिरता चला गया. गरीबी बढ़ती गई.
  3. धन के निष्कासन के चलते जनता पर करों का बोझ बहुत अधिक बढ़ गया.
  4. इसके साथ साथ कुटीर उद्योगों का नाश हुआ.
  5. भूमि पर दबाव बढ़ता गया और भूमिहीन कृषि मजदूरों की संख्या बढ़ती चलती गई.

जिन्ना की मांग

जिन्ना की चौदह मांगें (Fourteen points of Jinnah)

1928 ई. के राष्ट्रीय सम्मलेन में नेहरु रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया गया था. नेहरु रिपोर्ट के बारे में जिन्ना ने यह कहा था कि - 'नेहरु रिपोर्ट को हिंदुओं की ओर से मुस्लिम प्रस्तावों का जवाब था.” जिन्ना ने कांग्रेस प्रस्ताव को, जिसमें नेहरु रिपोर्ट को स्वीकार किया गया था, मुस्लिम सम्प्रदाय का अपमान समझा और यह निष्कर्ष निकाला कि महात्मा गांधी और कांग्रेस से कोई न्याय प्राप्त नहीं किया जा सकता. मुस्लिम लीग के गुटों के बीच एकता लाने के उद्देश्य से जिन्ना ने मार्च, 1929 ई. में दिल्ली में लीग की एक बैठक बुलाई और नेहरु रिपोर्ट को अस्वीकार करते हुए चौदह सूत्री/14 सूत्री/Fourteen points/demands of Jinnah पेश की (Read about background of jinnah's fourteen points.). ये माँगे/demands/points इस प्रकार थीं -

जिन्ना की चौदह मांगें (Fourteen points of Jinnah)

  1. भारत का संविधान संघात्मक (federal) हो और अवशिष्ट अधिकार प्रान्तों के अधीन रखा जाए.
  2. सभी प्रान्तों में सामान रूप से स्वायत्त शासन (autonomous government) की स्थापना की जाए.
  3. सभी विधानमंडलों और निर्वाचित निकायों का फिर से गठन किया जाए और अल्पसंख्यक जातियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाए. प्रांतीय विधानमंडलों में बहुसंख्यक लोगों का बहुमत रहे और उसे न तो घटाया जाए और न बराबरी पर लाया जाए.
  4. केन्द्रीय विधानमंडल में मुसलमानों का एक-तिहाई प्रतिनिधित्व रहे.
  5. सभी सम्प्रदायों का प्रतिनिधित्व पृथक निर्वाचन-पद्धति (separate electorate) के आधार पर हो और यदि कोई सम्प्रदाय चाहे तो वह संयुक्त निर्वाचन-पद्धति को अपना सकता है.
  6. पंजाब, बंगाल और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में क्षेत्रीय पुनर्गठन इस ढंग से किया जाए कि उसके कारण मुसलमान इन प्रान्तों में अल्पसंख्यक न हो जाएँ.
  7. सभी धार्मिक सम्प्रदायों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी दी जाए और पूजा, आचरण, प्रचार-प्रसार पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाए.
  8. किसी विधानमंडल में ऐसे विधेयक न पेश किये जाएँ जिसका सम्बन्ध किसी सम्प्रदाय विशेष के लिए हानिकारक हो. यदि उक्त सम्प्रदाय के 3/4 सदस्य विधेयक के सम्बन्ध में अपनी सहमति प्रकट न करें तो उसे पेश नहीं किया जाए.
  9. सिंध को बम्बई प्रांत से अलग कर स्वतंत्र प्रांत का दर्जा दिया जाए.
  10. उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और बलूचिस्तान में अन्य प्रान्तों की तरह सांविधानिक सुधार आरम्भ होना चाहिए.
  11. अन्य भारतीयों की तरह मुसलमानों को कुशलता के आधार पर सरकारी संस्थाओं और स्वायत्तशासी निकायों में नौकरी करने का उचित अवसर प्राप्त हो.
  12. भावी संविधान में मुसलमानों के धर्म, संस्कृति, भाषा और शिक्षा के विकास की समुचित व्यवस्था की जाए.
  13. केंद्रीय और प्रांतीय मंत्रिमंडलों में मुसलमानों को 1/3 प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए.
  14. केन्द्रीय सभा तभी संविधान में संशोधन कर सकती है जब ऐसा करने के इ उसे भारतीय संघ के घटक-राज्यों से स्वीकृति मिल चुकी हो.

Brief of Jinnah 14 Points

जिन्ना ने पृथक निर्वाचन (separate electorate) के आधार पर जोर दिया था और संयुक्त निर्वाचन की पद्धति पर अपनी असहमति प्रकट की थी. मुस्लिम बहुल प्रान्तों में मुसलमानों को विशेष प्रतिनिधित्व दिया जाए और जहाँ वे अल्पसंख्यक हैं, वहाँ भी उन्हें अधिक प्रतिनिधित्व प्राप्त हो. जिन्ना की योजना पर सर्वदलीय मुस्लिम कांग्रेस ने अपनी असहमति प्रकट की और शफी-गुट भी सहमत नहीं हुआ. मुस्लिम लीग की बैठक हंगामे के बीच स्थगित कर दी गई. जिन्ना की चौदह मांगों (fourteen demands/points of Jinnah) को पेशावर के जमैयत-उल-उल्मा द्वारा पहले स्वीकृति दी गई. राष्ट्रवादी मुसलमानों के द्वारा साम्प्रदायिक निर्वाचन को राजनीतिक निर्वाचन का रूप देने का प्रयास असफल कर दिया गया.

चंपारण का किसान आंदोलन

चंपारण का किसान आन्दोलन - Peasant Movement of Champaran

20वीं शताब्दी के शुरुआती चरणों में चंपारण के किसानों (farmers of Champaran) का भी आन्दोलन (movement) हुआ जिसकी गूँज पूरे भारत में हुई. इस आन्दोलन का महत्त्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यहीं से महात्मा महात्मा गाँधी जी भारतीय राजनीति में सक्रिय रूप से प्रवेश होता है. सत्याग्रह की शुरुआत चंपारण से ही हुआ.

उत्तर बिहार में नेपाल से सटे हुए चंपारण में नील की खेती की प्रथा थी. इस क्षेत्र में बागान मालिकों को जमीन की ठेकेदारी अंग्रेजों द्वारा दी गई थी. बागान मालिकों ने 'तीन कठिया प्रणाली” लागू कर राखी थी. तीन कठिया प्रणाली के अनुसार हर किसान को अपनी खेती के लायक जमीन के 15% भाग में नील की खेती करनी पड़ती थी. दरअसल नील (indigo) नकदी फसल (cash crop) माना जाता था. नकदी अर्थात् जिसको बेचने से अच्छी-खासी आमदनी होती थी. किसान खुद के उगाये नील को बाहर नहीं बेच सकते थे. उन्हें बाज़ार मूल्य से कम कीमत पर बागान मालिकों को बेचना पड़ता था. यह किसानों पर अत्याचार था. उनका आर्थिक शोषण था. ऊपर से नील की खेती से खेत की उर्वरता भी कम हो जाती थी.

किसानों पर अत्याचार

1900 ई. के बाद जब नील की खपत लोग कम करने लगे तो नील (indigo) का दाम बाजार में गिरने लगा. बागान मालिकों को घाटे का सामना करना पड़ा. मगर इस घाटे की भरपाई अंग्रेजों के इशारों पर बागान मालिक उल्टा किसानों से ही करने लगे. किसानों पर नए-नए कर आरोपित किए जाने लगे. यदि कोई किसान नील की खेती नहीं करना चाहता तो उसे अपने मालिक को एक बड़ी राशि 'तवान” के रूप में देनी पड़ती थी. उनसे बेगार भी लिया जाता था. चंपारण की खेती करनेवाले किसानों की स्थिति बंगाल के किसानों से भी अत्यधिक दयनीय थी.

नील की खेती के दौरान हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध चंपारण में किसानों (farmers of Champaran) ने हर बार विरोध प्रकट किया. 1905-08 के बीच मध्य मोतिहारी और बेतिया से सटे हुए इलाकों में किसानों ने पहली बार बड़े पैमाने पर आन्दोलन का सहारा लिया. इस आन्दोलन के दौरान हिंसा भी हुई लेकिन सरकार और नील किसानों पर इसका कोई अधिक प्रभाव नहीं पड़ा. किसानों पर आन्दोलन करने के लिए मुक़दमे चलाये गए. अनेक किसानों को जेल में डाल दिया गया. लेकिन किसानों ने हिम्मत नहीं हारी. वे अंत तक संघर्ष करते रहे.

गाँधीजी का आगमन

इस आन्दोलन में किसानों की सहायता कुछ सम्पन्न किसानों और कुछ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने भी की. 1916 ई. में गांधीजी को राजकुमार शुक्ल के द्वारा चंपारण में आमंत्रित किया गया. 1917 ई. में गाँधीजी चंपारण आये. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ अनुग्रह नारायण सिंह, आचार्य कृपलानी और अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं के सहयोग से उन्होंने चंपारण की दयनीय स्थिति का जायजा लिया. बड़ी संख्या में किसान निलहों (बागान मालिकों) के अत्याचारों की शिकायत लेकर गाँधीजी के शरण में पहुँचे. गाँधीजी ने किसानों को अहिंसात्मक और असहयोगात्मक रवैया अपनाने का आग्रह किया. इससे किसानों में उत्साह का नया संचार हुआ और उनके बीच एकता बढ़ी.

चंपारण आन्दोलन - A Successful Movement

सरकार गाँधीजी की लोकप्रियता को देखकर चिंतित हो उठी. उन्हें जबरन गिरफ्तार कर लिया गया और बिना सर-पाँव के आधार पर उनपर मुकदमा चलाया जाने लगा. लेकिन गाँधीजी को शीघ्र ही छोड़ दिया गया. किसानों के  शिकायतों की जाँच के लिए सरकार ने एक समिति बनाई. इस समिति में गाँधीजी को भी एक सदस्य के रूप में रखा गया. समिति की सिफारिशों के आधार पर चंपारण कृषि अधिनियम (Champaran Agrarian Act) बना. इस अधिनियम के जरिये तिनकठिया-प्रणाली को खत्म कर दिया गया. किसानों को इससे बहुत बड़ी राहत मिली. किसानों में नई चेतना जगी और वे भी राष्ट्रीय आन्दोलन को अपना समर्थन देने लगे.

किसान आंदोलन, खेड़ा 1918

खेड़ा सत्याग्रह - एक किसान आन्दोलन 1918

आज हम खेड़ा सत्याग्रह (Kheda Movement) के विषय में पढ़ने वाले हैं. खेड़ा एक जगह का नाम है जो गुजरात में है. चंपारण के किसान आन्दोलन के बाद खेड़ा (गुजरात) में भी 1918 ई. में एक किसान आन्दोलन हुआ. गाँधीजी ने खेड़ा में भी किसानों की बदतर हालत को सुधारने का अथक प्रयास किया. खेड़ा में भी बढ़े लगान और अन्य शोषणों से किसान वर्ग पीड़ित था. कभी-कभी किसान जमींदारों को लगान न देकर अपना आक्रोश प्रकट करते थे. 1918 ई. में सूखा के कारण फसल नष्ट हो गयी. ऐसी स्थिति में किसानों की कठिनाइयाँ बढ़ गईं.

भूमिकर नियमों के अनुसार यदि किसी वर्ष फसल साधारण स्तर से 25% कम हो तो वैसी स्थिति में किसानों को भूमिकर में पूरी छूट मिलनी थी. बम्बई सरकार के पदाधिकारी सूखा के बावजूद यह मानने को तैयार नहीं थे कि उपज कम हुई है. अतः वे किसानों छूट देने को तैयार नहीं थे. लगान चुकाने हेतु किसानों पर लगातार दबाव डाला जाता था.

खेड़ा सत्याग्रह

चंपारण के बाद गाँधीजी ने खेड़ा के किसानों की ओर ध्यान दिया. उन्होंने किसानों को एकत्रित किया और सरकारी कार्रवाइयों के खिलाफ सत्याग्रह करने के लिए उकसाया. किसानों ने भी गाँधीजी का भरपूर साथ दिया. किसानों ने अंग्रेजों  किए सरकार को लगान देना बंद कर दिया. जो किसान लगान देने लायक थे उन्होंने भी लगान देना बंद कर दिया. सरकार ने सख्ती से पेश आने और कुर्की की धमकियाँ दी पर उससे भी किसान नहीं डरे. इस आन्दोलन में बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया. अनेक किसानों को जेल में डाल दिया गया.

जून, 1918 ई. तक खेड़ा का यह किसान आन्दोलन (Kheda Movement) एक व्यापक रूप ले चुका था. किसान के इस गुस्से और निडर भाव को देखते हुए सरकार को उनके सामने झुकना पड़ा और अंततः सरकार ने किसानों को लगान में छूट देने का वादा किया. पते की बात ये है कि इसी आन्दोलन के दौरान सरदार वल्लभभाई गाँधीजी के संपर्क में आये और कालान्तर में पटेल गाँधीजी के पक्के अनुयायी बन गए.

चंपारण और खेड़ा आन्दोलन का महत्त्व

चंपारण और खेड़ा के किसान आन्दोलनों (Champaran and Kheda Satyagraha) के महत्त्व की बारे में यदि बात करें तो ये दोनों आन्दोलन पूर्व के आन्दोलनों की तुलना में बहुत शांत तरीके से संपन्न किए गए थे. किसानों ने सत्याग्रह कर के सरकार को विवश कर दिया कि वह उनकी दशा में सुधार लाये. दोनों आन्दोलनों में किसानों की जीत हुई. इन आन्दोलनों से किसानों के साथ-साथ पूरे भारतवर्ष में उत्साह का संचार हुआ और आत्मविश्वास की भावना जगी. 1919 ई. के बाद किसानों ने अधिक संगठित रूप से आन्दोलन किए. किसान सभा नामक शक्तिशाली किसान संगठन की स्थापना भी हुई.

चितफ

चित्तरंजन दास (1870-1925 ई.) Biography in Hindi

चित्तरंजन दास का प्रारम्भिक जीवन (Biography)

बंगाल के इने-गिने प्रसिद्ध वकीलों में देशबन्धु चित्तरंजन दास का नाम था. उनका जन्म 1870 ई. में मुंशीगंज जिले, बांग्लादेश में हुआ था. उनके पिता का नाम भुवन मोहन दास और माता का नाम निस्तारिणी देवी था. इनका जन्म एक वैद्य-ब्राहमण परिवार में हुआ था. कांग्रेस के प्रति आकर्षण होने के बाद चित्तरंजन दास ने राष्ट्र-सेवा को अपना लक्ष्य बना लिया था. 1917 ई. में उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय सहयोग देना प्रारम्भ किया और 1919 ई. के अधिनियम की कटु आलोचना की.

शिक्षा

दास परिवार में कई वकील थे. चित्तरंजन दास के चाचा दुर्गा मोहन दास ब्रह्म समाज से जुड़े थे. चित्तरंजन ने पढ़ाई Emmanuel College, Cambridge से की. लन्दन में उनकी मुलाक़ात अरबिंद घोष, अतुल प्रसाद सेन और सरोजनी नायडू से हुई.

गाँधीजी से खिन्न

मोतीलाल नेहरु और चित्तरंजन दास दोनों एक-दूसरे के पृष्ठपोषक और सहायक थे. चित्तरंजन दास ने भी गाँधी द्वारा पेश किए असहयोग आन्दोलन के प्रस्ताव पर अपनी असहमति व्यक्त की थी. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने जब असहयोग आन्दोलन के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया तो एक अनुशासित कार्यकर्ता की तरह चित्तरंजन दास ने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया. चित्तरंजन दास गांधी द्वारा अचानक आन्दोलन को स्थगित करने के पक्ष में नहीं थे. जेल के अन्दर बंद रहने के बावजूद चित्तरंजन दास ने असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने पर अपनी तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए यह कहा था कि 'महात्मा जी किसी अभियान का प्रारम्भ शानदार ढंग से करते हैं, वे उसे निपुणतापूर्वाग आगे बढ़ाते हैं, उन्हें एक के बाद एक सफलता मिलती जाती है, यहाँ तक की वे अपने अभियान के चरम शिखर पहुँच जाते हैं, परन्तु इसके बाद उनकी हिम्मत टूट जाती और वे लड़खड़ाने लगते हैं.

कांग्रेस से अलग

चित्तरंजन दास निडर और ओजस्वी वक्ता थे. 1922 ई. में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया. अध्यक्ष की हैसियत से चित्तरंजन दास ने सरकार के विरुद्ध विधानसभाओं में संघर्ष करने और निर्वाचन में भाग लेने का प्रस्ताव रखा. कांग्रेस ने चित्तरंजन दास के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया. फलतः चित्तरंजन दास कांग्रेस से अलग हो गए और पंडित मोतीलाल नेहरु के सहयोग से 'स्वराज दल” की स्थापना कर ली. स्वराज दल का मुख्य उद्देश भारत की स्वतंत्रता था. भारत को स्वतंत्र बनाने के लिए वे कांग्रेस का विरोध करने को तैयार थे. स्वराज दल को चित्तरंजन दास के परिश्रम के बल पर बंगाल विधानसभा में सफलता मिली और बंगाल विधान परिषद् में वे स्वराज पार्टी के नेता निर्वाचित हुए. बंगाल में चित्तरंजन दास के विरोध के कारण द्वैध शासन  असफल रहा. स्वराज पार्टी को बंगाल में मंत्रिमंडल बनाने का निमंत्रण दिया गया. परन्तु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया. उनके कड़े विरोध प्रकट करने के चलते सरकार को वैधानिक सुधार करना पड़ा. वह सुख को छोड़कर राष्ट्रीय संग्राम में कूद पड़े और उनका त्याग और बलिदान राष्ट्रीय आन्दोलन का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गया था. कर्मठ नेता का देहांत 16 जून, 1925 ई. को हुआ. बंगाल ह नहीं पूरा राष्ट्र उन्हें देशबन्धु के नाम से पुकारता था.

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...