1922 साइमन कमीशन

साइमन कमीशन

भारत में 1922 के बाद से जो शांति छाई हुई थी वह 1927 में आकर टूटी|इस साल ब्रिटिश सरकार ने साइमन आयोग का गठन सर जॉन साइमन के नेतृत्व में भारत में भारतीय शासन अधिनियम -1919 की कार्यप्रणाली की जांच करने और प्रशासन में  सुधार हेतु सुझाव देने के लिए किया|इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन के नाम पर इस आयोग को साइमन आयोग के नाम से जाना गया|इसकी नियुक्ति भारतीय लोगों के लिए एक झटके जैसी थी क्योकि इसके सारे सदस्य अंग्रेज थे और एक भी भारतीय सदस्य को इसमें शामिल नहीं किया गया था|सरकार ने स्वराज की मांग के प्रति कोई झुकाव प्रदर्शित नहीं किया|आयोग की संरचना ने भारतियों की शंका को सच साबित कर दिया|आयोग की नियुक्ति से पूरे भारत में विरोध प्रदर्शनों की लहर सी दौड़ गयी|

1927 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन मद्रास में आयोजित किया गया जिसमे आयोग के बहिष्कार का निर्णय लिया गया|मुस्लिम लीग ने भी इसका बहिष्कार किया|आयोग 3 फरवरी 1928 को भारत पहुंचा और इस दिन विरोधस्वरूप पुरे भारत में हड़ताल का आयोजन किया गया|उस दिन दोपहर के बाद,आयोग के गठन की निंदा करने के लिए,पूरे भारत में सभाएं की गयीं और यह घोषित किया कि भारत के लोगों का इस आयोग से कोई लेना-देना नहीं है|मद्रास में इन प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलायीं गयीं और अनेक अन्य जगहों पर लाठी-चार्ज की गयीं|आयोग जहाँ भी गया उसे विरोध प्रदर्शनों और हड़तालों का सामना करना पड़ा|केंद्रीय विधायिका ने बहुमत से यह निर्णय लिया कि उसे इस आयोग से कुछ लेना-देना नहीं है|पूरा भारत ‘साइमन वापस जाओ’ के नारे से गूँज रहा था|

पुलिस ने दमनात्मक उपायों का सहारा लिया और हजारों लोगों की पिटायी की गयी |इन्हीं विरोध प्रदर्शनों के दौरान शेर-ए-पंजाब नाम से प्रसिद्ध महान नेता लाला लाजपत राय की पुलिस द्वारा बर्बरता से पिटाई की गयी| पुलिस द्वारा की पिटायी से लगीं चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गयी|लखनऊ में नेहरु और गोविन्द बल्लभ पन्त को भी पुलिस की लाठियां खानी पड़ीं| इन लाठियों की मार ने गोविन्द बल्लभ पन्त को जीवन भर के लिए अपंग बना दिया था|
साइमन आयोग के विरोध के दौरान भारतियों ने एक बार फिर प्रदर्शित कर दिया कि वे स्वतंत्रता के एकजुट और द्रढ़प्रतिज्ञ हैं|उन्होंने स्वयं को अब एक बड़े संघर्ष के लिए तैयार कर लिया|डॉ. एम.ए.अंसारी की अध्यक्षता में मद्रास में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित किया गया और पूर्ण स्वतंत्रता की प्राप्ति को भारत के लोगों का लक्ष्य घोषित किया गया|यह प्रस्ताव नेहरु द्वारा प्रस्तुत किया गया था और एस.सत्यमूर्ति ने इसका समर्थन किया था|इसी दौरान पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को मजबूती से प्रस्तुत करने के लिए इन्डियन इंडिपेंडेंस लीग नाम के एक संगठन की स्थापना की गयी|लीग का नेतृत्व जवाहर लाल नेहरु,सुभाष चन्द्र बोस व उनके बड़े भाई शरत चन्द्र बोस,श्रीनिवास अयंगर,सत्यमूर्ति जैसे महत्वपूर्ण नेताओं ने किया|

दिसंबर 1928 में मोतीलाल नेहरु की अध्यक्षता में कलकत्ता में कांग्रेस का सम्मलेन आयोजित हुआ|इस सम्मलेन में जवाहर लाल नेहरु,सुभाष चन्द्र बोस और कई एनी नेताओं ने कांग्रेस पर पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने के लिए दबाव डाला|लेकिन कांग्रेस ने डोमिनियन दर्जे की मांग से सम्बंधित प्रस्ताव पारित किया जोकि पूर्ण स्वतंत्रता की तुलना में कमतर थी| लेकिन यह घोषित किया गया कि अगर एक साल के भीतर डोमिनियन का दर्जा भारत को प्रदान नहीं किया गया तो कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करेगी और उसकी प्राप्ति के लिए एक जन-आन्दोलन भी चलाएगी|1929 के पूरे साल के दौरान इन्डियन इंडिपेंडेंस लीग पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को लेकर लोगों को रैलियों के माध्यम से तैयार करती रही|जब तक कांग्रेस का अगला वार्षिक अधिवेशन आयोजित होता तब तक लोगों की सोच में परिवर्तन आ चुका था|

निष्कर्ष

साइमन आयोग का गठन सर जॉन साइमन के नेतृत्व में भारत में संवैधानिक प्रणाली की कार्यप्रणाली की जांच करने और उसमे बदलाव हेतु सुझाव देने के लिए किया गया था|इसका औपचारिक नाम ‘भारतीय संविधायी आयोग’ था और इसमें ब्रिटिश संसद के दो कंजरवेटिव,दो लेबर और एक लिबरल सदस्य शामिल थे|आयोग का कोई भी सदस्य भारतीय नहीं था|इसीलिए उनके भारत आगमन का स्वागत ‘साइमन वापस जाओ’ के नारे के साथ किया गया था|विरोध प्रदर्शन को शांत करने के लिए वायसराय लॉर्ड इरविन ने अक्टूबर 1929 में भारत को ‘डोमिनियन’ का दर्जा देने की घोषणा की और भविष्य के संविधान पर विचार-विमर्श करने के लिए गोलमेज सम्मेलनों को आयोजित करने की भी घोषणा की गयी|

सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930

सविनय अवज्ञा आन्दोलन

1930 में स्वतंत्रता दिवस के पालन के लीय, गाँधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन की शुरुआत की गयी जिसका प्रारंभ गाँधी जी के प्रसिद्ध दांडी मार्च से हुआ| 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से गाँधी जी और आश्रम के 78 अन्य सदस्यों ने दांडी, अहमदाबाद से 385 किमी. दूर स्थित भारत के पश्चिमी तट पर स्थित एक गाँव, के लिए पैदल यात्रा आरम्भ की| वे 6 मार्च,1930 को दांडी पहुंचे,जहाँ उन्होंने नमक कानून तोड़ा| उस समय किसी के द्वारा नमक बनाना गैर क़ानूनी था क्योकि इस पर सरकार का एकाधिकार था| गाँधी जी ने समुद्री जल के वाष्पीकरण से बने नमक को मुट्ठी में उठाकर सरकार की अवज्ञा की| नमक कानून की अवज्ञा के साथ ही पूरे देश में सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रसार हो गया|

इस आन्दोलन के प्रथम चरण में नमक बनाने की घटनाएँ पूरे देश में घटित हुई और नमक बनाना लोगों द्वारा सरकारी अवज्ञा का प्रतीक बन गया| तमिलनाडु में सी.राजगोपालाचारी ने दांडी मार्च जैसे ही एक मार्च का आयोजन तिरुचिरापल्ली से वेदारंयम तक किया| प्रसिद्ध कवयित्री सरोजिनी नायडू,जो कांग्रेस की महत्वपूर्ण नेता थी और कांग्रेस की अध्यक्ष भी रही थी, ने सरकार के धरसना (गुजरात) स्थित नमक कारखाने पर अहिंसक सत्याग्रहियों के मार्च का नेतृत्व किया| सरकार द्वरा बर्बरतापूर्वक किये गए लाठी चार्ज में 300 से अधिक लोग घायल हुए और दो लोगों की मौत हो गयी| धरना,हड़ताल व विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और बाद में कर देने से भी मना कर दिया गया| महिलाओं की बड़ी संख्या सहित लाखों लोगों ने इस आन्दोलन में भाग लिया था|

साइमन आयोग द्वारा प्रस्तावित सुधारों पर विचार करने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा नवम्बर 1930 लन्दन में प्रथम गोलमेज सम्मलेन का आयोजन किया गया| कांग्रेस,जो उस समय देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रही थी ,ने इसका बहिष्कार किया लेकिन भारतीय राजकुमारों के प्रतिनिधियों, मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा व कुछ अन्य नेताओं ने इसमें भाग लिया|इस सम्मलेन का कोई निष्कर्ष नहीं निकला| ब्रिटिश सरकार जानती थी कि कांग्रेस की भागीदारी के बिना कोई भी संवैधानिक बदलाव भारतीय लोगों द्वारा स्वीकृत नहीं होगा|

वायसराय लॉर्ड इरविन के द्वारा वर्ष 1931 के आरम्भ में कांग्रेस को द्वितीय गोलमेज सम्मलेन में भाग लेने के लिए तैयार करने हेतु प्रयास आरम्भ किये गए| अंततः गाँधी और लॉर्ड इरविन के बीच एक समझौता हुआ जिसके तहत सरकार उन सभी राजनीतिक कैदियों को छोड़ने के लिए तैयार हो गयी जिनके खिलाफ हिंसा का कोई मुक़दमा दर्ज नहीं था और कांग्रेस भी सविनय अवज्ञा आन्दोलन को स्थगित करने के लिए तैयार हो गयी थी| अनेक राष्ट्रवादी नेता इस समझौते से खुश नहीं थे|

मार्च 1931 में करांची में वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में इस समझौते को कांग्रेस द्वारा अनुमोदित कर दिया गया और कांग्रेस ने द्वितीय गोलमेज सम्मलेन में भाग लिया| सितम्बर 1931 में हुए इस सम्मलेन में भाग लेने के लिए कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में गाँधी जी को चुना गया |

कांग्रेस के करांची अधिवेशन में मूल अधिकारों व आर्थिक नीति से सम्बंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया गया| इसने देश में व्याप्त सामाजिक व आर्थिक समस्याओं से सम्बंधित राष्ट्रवादी आन्दोलन की नीति को निर्माण किया| इसमें उन मूल अधिकारों का वर्णन था जिन्हें जाति व धर्म के भेदभाव के बिना सभी लोगों को प्रदान किया जायेगा| साथ ही कुछ उद्योगों के राष्ट्रीयकरण,भारतीय उद्योगों के प्रोत्साहन और कामगारों व कृषकों के कल्याण हेतु योजनाओं का भी इसमें समर्थन किया गया था|

इस प्रस्ताव ने राष्ट्रीय आन्दोलन पर समाजवादी विचारों के बढते प्रभाव को प्रदर्शित किया| गाँधी जी,जो कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि थे,के अलावा कुछ अन्य भारतीय भी थे जिन्होंने इस सम्मलेन में भाग लिया था| इनमे भारतीय रजवाड़े, हिन्दू, मुस्लिम और सिक्ख सांप्रदायिक नेता शामिल थे| ये नेता ब्रिटिशों के हाथों की कठपुतली मात्र थे| रजवाड़े मुख्यतः शासकों के रूप में अपनी हितों को सुरक्षित करने में रूचि रखते थे|

सम्मलेन में भाग लेने के लिए सांप्रदायिक नेताओं का चयन ब्रिटिश शासकों ने किया था| उन्होंने दावा किया कि वे अपने अपने समुदायों के प्रतिनिधि है न की देश के,हालाँकि उनके अपने ही समुदाय में उनका प्रभाव बहुत सीमित था| कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में गाँधी जी ने पूरे देश का प्रतिनिधित्व किया| न तो रजवाड़े और न ही सांप्रदायिक नेता भारत की स्वतंत्रता में रूचि रखते थे| इसी कारण द्वितीय गोलमेज सम्मलेन में कोई समझौता नहीं हो सका और उसे असफल घोषित कर दिया गया|

गाँधी जी ने भारत वापस लौटकर सविनय अवज्ञा आन्दोलन को पुनः आरम्भ किया| सरकार का दमन सम्मलेन चलने के दौरान भी जारी रहा और अब तो यह और भी ज्यादा तेज हो गया था| गाँधी और अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया| सरकार द्वरा किये दमन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लगभग एक साल में 120000 लोगों को जेल में डाल दिया गया था|

आन्दोलन को 1934 में वापस ले लिया गया| कांग्रेस ने 1934 में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया जिसमे यह मांग की गयी कि लोगों द्वारा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित संवैधानिक सभा आहूत की जाये| इसमें घोषित  किया गया कि केवल ऐसी ही कोई सभा भारत के लिए संविधान का निर्माण कर सकती है| इसमें यह भी कहा गया कि सिर्फ लोगों को ही यह तय करने का अधिकार है कि वे किस प्रकार की सरकार के तहत रहना चाहते हैं| हालाँकि कांग्रेस अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल नहीं हुई लेकिन वह देश के दूसरे सबसे बड़े जन-आन्दोलन में लोगों के एक वर्ग को शामिल करने में सफल रही| इसने भारतीय समाज में बदलाव लाने के लिए क्रांतिकारी लक्ष्यों को भी स्वीकार किया|

सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रभाव

• इसने ब्रिटिश सरकार के प्रति जन आस्था को हिला दिया और स्वतंत्रता आन्दोलन की सामाजिक जड़ों को स्थापित किया,साथ ही प्रभात फेरी और पर्चे बांटने जैसे प्रचार के नए तरीकों को ख्याति दिलाई|

• इसने ब्रिटिशों की दमनकारी नमक नीति को समाप्त किया जिसका अनुसरण महाराष्ट्र ,कर्नाटक और संयुक्त प्रान्त में वन कानून की अवज्ञा करने तथा पूर्वी भारत में ग्रामीण ‘चौकीदारी कर’ अदा न करने के रूप में किया गया|

अलीगढ़ आंदोलन

सय्यद अहमद खान और अलीगढ़ आन्दोलन

मुस्लिमों के बीच शिक्षा के प्रसार और सामाजिक सुधार के लिए सबसे महत्वपूर्ण आन्दोलन सर सैय्यद अहमद खान (1817-1898 ई.) द्वारा प्रारंभ किया गया था| वे एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखते थे जिसके सदस्य मुग़ल दरबार में उपस्थित रहते थे|उन्होंने न्यायिक अधिकारी के रूप में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवाएँ प्रदान कीं और 1857 के विद्रोह,जिसमें ब्रिटिश शासकों ने मुस्लिमों को अपना ‘वास्तविक शत्रु व सबसे खतरनाक दुश्मन’ करार दिया था और उनके प्रति भेद-भाव पूर्ण नीति का अनुसरण किया था,के दौरान भी ये ब्रिटिशों के प्रति वफादार बनें रहे|

सर सैय्यद अहमद खान मुस्लिमों की दयनीय स्थिति को लेकर बहुत चिंतित थे और उनको उनके पिछड़ेपन से ऊपर उठाना उनके जीवन का उद्देश्य बन गया| उन्होंने ब्रिटिश शासकों के मन में मुस्लिमों के प्रति शत्रुता के भाव को समाप्त करने के लिए अथक प्रयास किया| उन्होंने मुस्लिमों से सादगी व शुद्धता के मूल इस्लामिक सिधान्तों की ओर लौटने की अपील की और भारत के मुस्लिमों के लिए अंग्रेजी शिक्षा की वकालत की| उनके द्वारा विज्ञान पर अत्यधिक बल देने के कारण रूढ़िवादी मुस्लिम उनसे नाराज हो गए और उन्हें इनका विरोध भी झेलना पड़ा था| लेकिन अपने साहस और विवेक के बल पर वे इन बाधाओं को पार कर गए|

1864 ई. में इन्होनें अनुवाद सोसाइटी की स्थापना की जो बाद में द साइंटिफिक सोसाइटी में बदल गयी| यह सोसाइटी अलीगढ़ में स्थित थी और विज्ञान अन्य विषयों की अंग्रेजी पुस्तकों का उर्दू भाषा में अनुवाद कर प्रकाशित करती थी,साथ ही सामाजिक सुधार से सम्बंधित उदारवादी विचारों को प्रसारित करने के लिए एक अंग्रेजी-उर्दू पत्र भी निकालती थी| उन्होंने मुस्लिम समुदाय के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार बहुत से सामाजिक पूर्वाग्रहों को समाप्त करने की वकालत की|

उनका सबसे बड़ा योगदान 1875 ई. में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज की स्थापना था| समय के साथ यह भारतीय मुस्लिमों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण शैक्षणिक संसथान बन गया| यह मानविकी व विज्ञान के विषयों से सम्बंधित शिक्षा को पूरी तरह से अंग्रेजी माध्यम में प्रदान करता था और इसके कई अध्यापक इंग्लैंड से भी आये थे| कॉलेज को देश भर प्रमुख मुस्लिमों से समर्थन प्राप्त हुआ और ब्रिटिशों ने भी इस कॉलेज के विकास में हर तरह से अपनी रूचि प्रदर्शित की|

मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज ,जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बन गया, ने वहां पढ़ने वाली पीढ़ियों को आधुनिक दृष्टिकोण से सम्पन्न बनाया| सर सैय्यद अहमद खान और मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज से सम्बद्ध मुस्लिम जागरण आन्दोलन को अलीगढ़ आन्दोलन का नाम दिया गया| उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गतिविधियों का विरोध किया| उस समय के कई अन्य नेताओं के समान उनका भी विश्वास था कि भारतीय अभी भी स्वयं शासन संभालने के लिए तैयार नहीं है और ब्रिटिश शासन के प्रति वफादार बने रहने से ही उनके हितों की सर्वोत्तम तरीके से पूर्ति हो सकती है|उन्होंने कुछ हिन्दू व मुस्लिम नेताओं के साथ मिलकर कांग्रेस का विरोध करने के लिए इंडियन पैट्रियोटिक एसोसिएशन  की स्थापना की और मुस्लिमों को कांग्रेस में शामिल होने से रोकने का प्रयास किया| उनके द्वारा हिन्दू व मुस्लिमों की एकता पर बल दिया गया|

निष्कर्ष

सर सैय्यद अहमद खान भारत के महानतम मुस्लिम सुधारकों में से एक थे| उन्होंने आधुनिक तर्कवाद व विज्ञान के प्रकाश में कुरान की व्याख्या की| उन्होंने धर्मान्धता,संकीर्ण मानसिकता व कट्टरपन का विरोध किया और स्वतंत्र सोच को बढ़ावा  देने पर बल दिया|

मुस्लिमों के बीच शिक्षा के प्रसार और सामाजिक सुधार के लिए सबसे महत्वपूर्ण आन्दोलन सर सैय्यद अहमद खान (1817-1898 ई.) द्वारा प्रारंभ किया गया था| वे एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखते थे जिसके सदस्य मुग़ल दरबार में उपस्थित रहते थे|उन्होंने न्यायिक अधिकारी के रूप में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवाएँ प्रदान कीं और 1857 के विद्रोह,जिसमें ब्रिटिश शासकों ने मुस्लिमों को अपना ‘वास्तविक शत्रु व सबसे खतरनाक दुश्मन’ करार दिया था और उनके प्रति भेद-भाव पूर्ण नीति का अनुसरण किया था,के दौरान भी ये ब्रिटिशों के प्रति वफादार बनें रहे|
सर सैय्यद अहमद खान मुस्लिमों की दयनीय स्थिति को लेकर बहुत चिंतित थे और उनको उनके पिछड़ेपन से ऊपर उठाना उनके जीवन का उद्देश्य बन गया| उन्होंने ब्रिटिश शासकों के मन में मुस्लिमों के प्रति शत्रुता के भाव को समाप्त करने के लिए अथक प्रयास किया| उन्होंने मुस्लिमों से सादगी व शुद्धता के मूल इस्लामिक सिधान्तों की ओर लौटने की अपील की और भारत के मुस्लिमों के लिए अंग्रेजी शिक्षा की वकालत की| उनके द्वारा विज्ञान पर अत्यधिक बल देने के कारण रूढ़िवादी मुस्लिम उनसे नाराज हो गए और उन्हें इनका विरोध भी झेलना पड़ा था| लेकिन अपने साहस और विवेक के बल पर वे इन बाधाओं को पार कर गए|
1864 ई. में इन्होनें अनुवाद सोसाइटी की स्थापना की जो बाद में द साइंटिफिक सोसाइटी में बदल गयी| यह सोसाइटी अलीगढ़ में स्थित थी और विज्ञान अन्य विषयों की अंग्रेजी पुस्तकों का उर्दू भाषा में अनुवाद कर प्रकाशित करती थी,साथ ही सामाजिक सुधार से सम्बंधित उदारवादी विचारों को प्रसारित करने के लिए एक अंग्रेजी-उर्दू पत्र भी निकालती थी| उन्होंने मुस्लिम समुदाय के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार बहुत से सामाजिक पूर्वाग्रहों को समाप्त करने की वकालत की|
उनका सबसे बड़ा योगदान 1875 ई. में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज की स्थापना था| समय के साथ यह भारतीय मुस्लिमों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण शैक्षणिक संसथान बन गया| यह मानविकी व विज्ञान के विषयों से सम्बंधित शिक्षा को पूरी तरह से अंग्रेजी माध्यम में प्रदान करता था और इसके कई अध्यापक इंग्लैंड से भी आये थे| कॉलेज को देश भर प्रमुख मुस्लिमों से समर्थन प्राप्त हुआ और ब्रिटिशों ने भी इस कॉलेज के विकास में हर तरह से अपनी रूचि प्रदर्शित की|
मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज ,जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बन गया, ने वहां पढ़ने वाली पीढ़ियों को आधुनिक दृष्टिकोण से सम्पन्न बनाया| सर सैय्यद अहमद खान और मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज से सम्बद्ध मुस्लिम जागरण आन्दोलन को अलीगढ़ आन्दोलन का नाम दिया गया| उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गतिविधियों का विरोध किया| उस समय के कई अन्य नेताओं के समान उनका भी विश्वास था कि भारतीय अभी भी स्वयं शासन संभालने के लिए तैयार नहीं है और ब्रिटिश शासन के प्रति वफादार बने रहने से ही उनके हितों की सर्वोत्तम तरीके से पूर्ति हो सकती है|उन्होंने कुछ हिन्दू व मुस्लिम नेताओं के साथ मिलकर कांग्रेस का विरोध करने के लिए इंडियन पैट्रियोटिक एसोसिएशन  की स्थापना की और मुस्लिमों को कांग्रेस में शामिल होने से रोकने का प्रयास किया| उनके द्वारा हिन्दू व मुस्लिमों की एकता पर बल दिया गया|
निष्कर्ष
सर सैय्यद अहमद खान भारत के महानतम मुस्लिम सुधारकों में से एक थे| उन्होंने आधुनिक तर्कवाद व विज्ञान के प्रकाश में कुरान की व्याख्या की| उन्होंने धर्मान्धता,संकीर्ण मानसिकता व कट्टरपन का विरोध किया और स्वतंत्र सोच को बढ़ावा  देने पर बल दिया|

संबैधानिक सभा

संवैधानिक सभा

कैबिनेट मिशन योजना के तहत 16 मई 1946 को संविधान सभा का गठन किया गया| इसके सदस्यों का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के तहत एकल हस्तान्तरणीय मत प्रणाली द्वारा किया गया था| संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 को दिल्ली कौंसिल चैंबर के पुस्तकालय में हुई थी जिसमे 205 सदस्यों ने भाग लिया था| लीग के प्रतिनिधि और रियासतों द्वारा नामित सदस्य इसमें शामिल नहीं हुए| 11 दिसंबर को सभा ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को इसके स्थायी अध्यक्ष के रूप में चुना|

संविधान सभा की समितियाँ

• प्रक्रिया सम्बन्धी नियम समिति, संचालन समिति,वित्त एवं स्टाफ समिति, राष्ट्रीय झंडा पर तदर्थ समिति- राजेंद्र प्रसाद

• परिचय समिति-अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर

• गृह समिति-बी.पट्टाभि सीतारम्मैया

• व्यापार समिति-के.एम.मुंशी

• संविधान सभा कार्यप्रणाली समिति-जी.वी.मावलंकर

• राज्य समिति,संघ शक्ति समिति, संघीय संविधान समिति-जवाहर लाल नेहरु

• मूल अधिकार सलाहकार समिति, अल्पसंख्यक, जनजातीय और बाह्य क्षेत्र-वल्लभ भाई पटेल

• अल्पसंख्यक उप-समिति-एच.सी.मुखर्जी

• मूल अधिकार उप-समिति-जे.बी.कृपलानी

• उत्तर-पूर्वी सीमान्त जनजातीय क्षेत्र और असम बाह्य और आंशिक बाह्य क्षेत्र उप-समिति-गोपीनाथ बारदोलई

• बाह्य और आंशिक बाह्य क्षेत्र (असम के अतिरिक्त) उप-समिति-ए.वी.ठक्कर

• प्रारूप समिति-बी.आर.अम्बेडकर

शिवाजी के उत्तराधिकारी

शिवाजी के उत्तराधिकारी

मराठा साम्राज्य या मराठा संघ,जो वर्त्तमान भारत के दक्षिण-पश्चिम भाग में स्थित है,ने 1674 से 1818 ई. तक शासन किया और अपने क्षेत्र का विस्तार किया. शिवाजी को मराठा साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है,जिन्होंने इसे संगठित रूप प्रदान किया.परन्तु पेशवाओं(साम्राज्य के प्रधान मंत्री) के अधीन इस साम्राज्य का तेजी से विस्तार हुआ. मोरे,घाटगे और निम्बालकर सर्वाधिक प्रभावशाली मराठा परिवार थे.

शम्भाजी(1680-1689 ई.)

  • वे शिवाजी के छोटे पुत्र थे जो अपने बड़े भाई राजाराम के विरुद्ध उत्तराधिकार के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद सिंहासनारुढ़ हुए.
  • उसने राजपूत-मराठा गठबंधन को टालने के लिए और दक्कन सल्तनत से अपने पुराने संबंधों की पुन:स्थापना करने के लिए,अपने पिता की विस्तारवादी नीतियों को पुनः लागू किया.
  • 1682 ई. में मुग़ल शासक औरंगजेब अपने विद्रोही पुत्र शहजादा अकबर का पीछा करते हुए दक्षिण भारत पंहुचा.शम्भाजी द्वारा शहजादा अकबर को शरण देने के कारण औरंगजेब ने उसकी हत्या करवा दी.

राजाराम(1689-1700 ई.)

  • शम्भाजी की मृत्यु के बाद शिवाजी के दूसरे पुत्र राजाराम ने शासन संभाला और मराठों की परंपरा को आगे बढाया.
  • उसने मराठों की विस्तारवादी नीति को जारी रखा और दक्कन के मुग़ल क्षेत्रों पर आक्रमण करने की परंपरा की शुरुआत की.
  • अक्टूबर 1689 में,जुल्फिकार खान के नेतृत्व में, मुग़ल सेना ने रायगढ़ पर आक्रमण कर दिया और शम्भाजी के पुरे परिवार, जिसमे उनके पुत्र शाहू भी शामिल थे, को बंदी बना लिया गया.
  • 1700 ई. में सतारा,जोकि जिंजी के पतन के मराठों की राजधानी बन गयी थी, में शंभाजी की मृत्यु हो गयी.

शिवाजी द्वितीय और ताराबाई(1700-1707 ई.)

  • राजाराम की मृत्यु के बाद उसकी विधवा ताराबाई ने अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय को गद्दी पर बिठाया और स्वयं उसकी संरक्षक बन गयी.उसने नागरिक व सैन्य दोनों सन्दर्भों में संकट के समय मराठा राज्य को स्थिरता प्रदान की.
  • मुगलों ने चितपावन ब्राहमण बालाजी विश्वनाथ के सहयोग से ताराबाई को गद्दी से उतर दिया.

शाहू(1707-1749 ई.)

  • मुग़ल शासक बहादुरशाह  ने शाहू को कैद से मुक्त कर दिया जिसके कारण ताराबाई और शाहू के मध्य मराठा गद्दी को लेकर संघर्ष प्रारंभ हो गया.शाहू ने ‘खेड़ा के युद्ध’ (12अक्टूबर,1707) में ताराबाई को परास्त कर सतारा पर कब्ज़ा कर लिया.
  • उसके शासनकाल में ही पेशवाओं की शक्ति का उदय  होना प्रारंभ हुआ और मराठा राज्य के मराठा संघ में रूपांतरण की प्रक्रिया शुरू हुई.
  • उसी के शासनकाल के दौरान मराठा राज्य दो भागों-ताराबाई के नेतृत्व में कोल्हापुर और शाहू के नेतृत्व में सतारा ,में बंट गया. इन दोनों प्रतिद्वंदी शक्तियों के मध्य शत्रुता अंततः 1731 ई. की ‘वर्ना संधि’ के द्वारा समाप्त हुई.

निष्कर्ष

अतः हम कह सकते है कि शिवाजी मराठा राज्य के संस्थापक थे लेकिन उसका अत्यधिक विस्तार पेशवा-काल के दौरान ही हुआ.

ब्यापगत का सिद्धांत

व्यपगत का सिद्धांत

व्यपगत का सिद्धांत एक साम्राज्यवाद समर्थक उपागम था जिसका उद्देश्य भारत में ब्रिटिश राज्यक्षेत्र का विस्तार करना था| इस सिद्धांत का प्रारंभ लॉर्ड डलहौजी द्वारा किया गया था| इस सिद्धांत के अनुसार वे राज्य, जिनका कोई वंशानुगत उत्तराधिकारी नहीं था, अपने शासन करने के अधिकार खो देते थे |साथ ही उत्तराधिकारी को गोद लेने पर भी उनके राज्य को वापस प्राप्त नहीं किया जा सकता था|

1818 ई. से पूर्व ,ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियाँ और गतिविधियाँ व्यापारिक थी न कि एक संप्रभु शासक की लेकिन उसके बाद उनकी महत्वाकांक्षा संपूर्ण भारत पर शासन करने की इच्छा में बदल गयी, जिसकी परिणति पहले सहायक संधि प्रणाली और अब व्यपगत सिद्धांत के रूप में देखने को मिली | इन नीतियों को अपनाने का उद्देश्य राज्य के संपूर्ण अधिकारों पर नियंत्रित स्थापित कर उन्हें  ब्रिटिश उपनिवेश बनाना था| मुख्य जटिलता उन राज्यों को लेकर थी जिनका का कोई उत्तराधिकारी नहीं था | व्यपगत की नीति ऐसे ही राज्यों को हड़पने के लिए बनायीं गयी थी | इस नीति के तहत ऐसे राज्यों से ,उत्तराधिकारी न होने के आधार पर, शासन करने का अधिकार छीन लिया गया | डलहौजी द्वारा व्यपगत के सिद्धांत के आधार पर निम्नलिखित राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया गया था-

• सतारा(1848 ई.)

• जयपुर(1849 ई.)

• संभलपुर(1849 ई.)

• बाहत(1850 ई.)

• उदयपुर(1852 ई.)

• झाँसी(1853 ई.)

• नागपुर(1854 ई.)

लेकिन कुछ समय बाद इस नीति के प्रावधानों के कारण जनता के मध्य काफी रोष पैदा हो गया और उड़ीसा के महान क्रांतिकारी सुरेन्द्र देसाई ने व्यपगत के सिद्धांत के विरोध में आवाज उठाई| आगे चलकर इसी रोष ने 1857 ई.  के विद्रोह का आधार तैयार किया|

व्यपगत के सिद्धांत के मुख्य बिंदु

• साम्राज्यवादी-समर्थक उपागम के आधार पर भारत में ब्रिटिश क्षेत्र का विस्तार करने की नीति

• यदि किसी राज्य में कोई उत्तराधिकारी नहीं है,तो उसका विलय ब्रिटिश साम्राज्य में कर लेना

• उत्तराधिकार हेतु संतान को गोद लेने पर प्रतिबन्ध

• शासकों द्वारा गोद ली गयी संतान को उपाधि और पेंशन देने पर प्रतिबन्ध

• गोद ली गयी संतान को शासक की केवल निजी संपत्ति ही उत्तराधिकार में प्राप्त होना

• उपाधियों और पेंशन की समाप्ति

निष्कर्ष

हालाँकि ,ब्रिटिश भारत में व्यापार के उद्देश्य से आये थे लेकिन संसाधनों पर एकाधिकार प्राप्त करने की उनकी महत्वाकांक्षा ने उन्हें भारत में शक्तिशाली बना दिया |व्यपगत का सिद्धांत वास्तव में विस्तारवादी नीति थी, जो किसी भी तरह से अन्य राज्यों का ब्रिटिश भारत में विलय कर भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के राज्यक्षेत्र  में विस्तार करना चाहती थी| इस नीति का प्रारंभ डलहौजी द्वारा किया गया था ताकि अन्य राज्यों को अपना उपनिवेश बनाने की शक्ति  ईस्ट इंडिया कंपनी को प्रदान की जा सके और कंपनी के राजस्व में भी वृद्धि हो सके| इस नीति के कारण एक तरफ तो जनता के मध्य ब्रिटिशों की छवि ख़राब हुई तो दूसरी तरफ इस नीति ने विभिन्न राज्यों के शासकों को ब्रिटिशों का घोर विरोधी बना दिया ,बाद में यही 1857 ई. की क्रांति का एक मुख्य कारण बना|

राजाराम मोहन राय और ब्रम्हा समाज

राममोहन रॉय और ब्रह्म समाज

सामाजिक और धार्मिक जीवन के कुछ पहलुओं के सुधार से प्रारंभ होने वाला जागरण ने समय के साथ देश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और  राजनीतिक जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित किया|18वीं सदी के उत्तरार्ध में कुछ यूरोपीय और भारतीय विद्वानों ने प्राचीन भारतीय दर्शन,विज्ञान,धर्म और साहित्य का अध्ययन प्रारंभ किया| इस अध्ययन के द्वारा भारतीय अपने प्राचीन भारतीय ज्ञान से परिचित हुए,जिसने उनमें अपनी सभ्यता के प्रति गौरव का भाव जाग्रत किया|

इसने सुधारकों को उनके सामाजिक और धार्मिक सुधारों के कार्य में भी सहयोग प्रदान किया| उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों और अमानवीय व्यवहारों व परम्पराओं के प्रति अपने संघर्ष में जनमत तैयार करने के लिए प्राचीन भारतीय ग्रंथों के ज्ञान का उपयोग किया| ऐसा करने के दौरान, उनमें से अधिकांश ने विश्वास और आस्था के स्थान पर तर्क का सहारा लिया| अतः भारतीय सामाजिक व धार्मिक सुधारकों ने अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक तरफ अपने पाश्चात्य ज्ञान का प्रयोग किया तो दूसरी तरफ प्राचीन भारतीय विचारों को भी महत्व प्रदान किया|

राजा राममोहन राय

राजा राममोहन राय का जन्म,संभवतः1772 ई. में,बंगाल के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था| उन्होंने पारंपरिक संस्कृत शिक्षा बनारस में और पारसी व अरबी का ज्ञान पटना में प्राप्त किया| बाद में उन्होंने अंग्रेजी,ग्रीक और हिब्रू भाषा भी सीखी |वे फ्रेंच और लैटिन भाषा के भी जानकार थे| उन्होंने न केवल हिन्दू बल्कि इस्लाम,ईसाई और यहूदी धर्म का भी गहन अध्ययन किया था| उन्होंने संस्कृत,बंगाली,हिंदी,पारसी और अंग्रेजी भाषा में अनेक पुस्तकें लिखी थी| उन्होंने एक बंगाली भाषा में और एक पारसी भाषा में अर्थात दो समाचार पत्र भी निकाले| मुग़ल शाशकों ने उन्हें ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की और अपने दूत के रूप में इंग्लैंड भेजा| वे 1831 ई. में इंग्लैंड पहुचे और वहीँ 1833 में उनकी मृत्यु हो गयी| वे भारत में अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक थे और मानते थे कि नवजागरण के प्रसार और विज्ञान की शिक्षा के लिए अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है|वे प्रेस की स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर थे और इसी कारण उन्होंने प्रेस पर लगे प्रतिबंधों को हटाने के लिए आन्दोलन भी चलाया|

राजा राममोहन राय का मानना था कि हिन्दू धर्म में प्रवेश कर चुकी बुराईयों को दूर करने के लिए और उसके शुध्दिकरण के लिए उस धर्म के मूल ग्रंथों के ज्ञान से लोगों को परिचित करना आवश्यक है| इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ही उन्होनें वेदों व उपनिषदों का बंगाली भाषा में अनुवाद कर प्रकाशित करने का कठिन कार्य किया|

वे एक ऐसे सार्वभौमिक धर्म के समर्थक थे जोकि एक परम-सत्ता के सिद्धांत पर आधारित था| उन्होनें मूर्ति-पूजा और अंधविश्वासों व पाखंडों का विरोध किया|

ब्रह्म समाज

धार्मिक सुधारों के क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा योगदान उनके द्वारा 1928 ई. में ब्रहम समाज की स्थापना करना था जोकि धार्मिक सुधार आन्दोलन के तहत स्थापित प्रथम महत्वपूर्ण संगठन था| उन्होनें मूर्ति-पूजा और अतार्किक अंधविश्वासों व पाखंडों का विरोध किया| ब्रहम समाज के सदस्य किसी भी धर्म पर हमले के खिलाफ थे|

सामाजिक सुधारों के अंतर्गत ब्रहम समाज का सबसे बड़ा योगदान 1829 ई. में सती प्रथा का उन्मूलन था|उन्होंने देखा था कि कैसे उनके बड़े भाई की पत्नी को जबरदस्ती सती होने के लिए विवश किया गया था| उन्हें सती प्रथा का विरोध करने के कारण रूढ़िवादी हिन्दुओं का तीव्र विरोध भी झेलना पड़ा था| राममोहन राय के अनुसार सती प्रथा का प्रमुख कारण हिन्दू महिलाओं की  अत्यधिक निम्न स्थिति थी| वे बहुविवाह के खिलाफ थे और महिलाओं को शिक्षित करने तथा उन्हें पैतृक संपत्ति प्राप्त करने के अधिकार प्रदान के पक्षधर थे|

ब्रहम समाज का प्रभाव बढता गया और देश के विभिन्न भागों में ब्रहम समाज शाखाएं खुल गयीं| ब्रहम समाज के दो महत्वपूर्ण नेता देवेन्द्रनाथ टैगोर और केशवचंद्र सेन थे| ब्रहम समाज के सन्देश को प्रसारित करने के लिए केशवचंद्र सेन ने मद्रास और बम्बई प्रेसिडेंसी की यात्राएँ की और बाद में उत्तर भारत में भी यात्राएँ कीं|1866 ई. में ब्रहम समाज का विभाजन हो गया क्योकि केशवचंद्र सेन के विचार मूल ब्रहम समाज के विचारों की तुलना में अत्यधिक क्रांतिकारी व उग्र थे|वे जाति व रीति-रिवाजों के बंधन और धर्म-ग्रंथों के प्राधिकार से मुक्ति के पक्षधर थे |उन्होंने अंतर-जातीय विवाह और विधवा-पुनर्विवाह की वकालत की और ऐसे अनेक विवाह सम्पन्न भी करायें,पर्दा-प्रथा का विरोध किया और जाति-गत विभाजन की आलोचना की|उन्होंने जाति-गत कठोरता पर हमला किया,तथाकथित हिन्दू निम्न जातियों व अन्य धर्मों के व्यक्तियों के यहाँ भोजन करने लगे,खान-पान पर लगे प्रतिबंधों का विरोध किया,अपना संपूर्ण जीवन शिक्षा के प्रसार हेतु समर्पित कर दिया और समुद्री यात्राओं पर प्रतिबन्ध जैसे पुराने हिन्दू विचारों का विरोध किया|इस आन्दोलन ने देश के अन्य भागों में भी ऐसे ही अनेक सुधार-आन्दोलनों को प्रेरित किया |लेकिन इस समूह का प्रभाव बढ़ता गया जबकि अन्य समूह,जोकि सामाजिक सुधारों के प्रति उनके उतने अधिक प्रतिबद्ध नहीं थे, का पतन हो गया|

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद

रामकृष्ण और विवेकानंद

19 वीं सदी के धार्मिक मानवों ने न तो किसी सम्प्रदाय का समर्थन किया और न ही मोक्ष का कोई नया रास्ता दिखलाया| उन्होंने ईश्वरीय चेतना का सन्देश दिया|उनके अनुसार ईश्वरीय चेतना के आभाव में परम्पराएँ रूढ़ और दमनात्मक हो जाती है और धार्मिक शिक्षाएं अपनी परिवर्तनकारी शक्ति को खोने लगती है|

रामकृष्ण मिशन (1836-1886 ई.)

रामकृष्ण परमहंस कलकत्ता के पास स्थित दक्षिणेश्वर मंदिर के पुजारी थे| अन्य धर्मों के नेताओं के संपर्क में आने के बाद उन्होंने सभी तरह के विश्वासों की पवित्रता को स्वीकार किया| उनके समय के लगभग सभी धार्मिक सुधारक, जिनमें केशवचंद्र सेन और दयानंद भी शामिल थे, उनके पास धार्मिक चर्चाएँ करने और मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए आते थे| समकालीन भारतीय विद्वानों, जिनकी अपनी संस्कृति पर आस्था पश्चिम द्वारा प्रस्तुत चुनौती के कारण डगमगाने लगी थी,के मन में रामकृष्ण की शिक्षाओं के कारण पुनः अपनी संस्कृति के प्रति आस्था का भाव मजबूत हुआ| रामकृष्ण की शिक्षाओं का प्रचार करने और उन्हें व्यवहार में लाने के लिए उनके प्रिय शिष्य विवेकानंद ने 1897 ई. में रामकृष्ण मिशन  की स्थापना की थी| मिशन का उद्देश्य समाज सेवा थी क्योकि उसका मानना था की ईश्वर की सेवा करने का सबसे बेहतर तरीका मानवों की सेवा करना है| रामकृष्ण मिशन अपनी स्थापना के समय से ही जन-गतिविधियों के शक्तिशाली केंद्र के रूप में स्थापित हो गया था| इन जन-गतिविधियों में बाढ़,सूखा और महामारी जैसी आपदाओं के समय सहायता पहुँचाना,अस्पतालों की स्थापना करना और शिक्षा संस्थाओं की स्थापना जैसे कार्य शामिल थे|

विवेकानंद(1863-1902 ई.)

विवेकानंद का चरित्र अपने गुरू के चरित्र से बिल्कुल अलग था| उन्होंने भारतीय व पश्चिमी दर्शनों का अध्ययन किया लेकिन जब तक वे रामकृष्ण से नहीं मिले उन्हें मानसिक शांति नहीं प्राप्त हुई | उनका मन केवल अध्यात्म से ही नहीं जुड़ा था  बल्कि अपनी मातृभूमि की तत्कालीन परिस्थितियाँ भी उनके मन को आंदोलित करती रहती थीं|संपूर्ण भारत में भ्रमण करने के बाद उन्होंने पाया कि गरीबी,गन्दगी,मानसिक उत्साह का अभाव और भविष्य के प्रति आशान्वित न होने जैसी परिस्थितियां हर कहीं व्याप्त है|

विवेकानंद ने स्पष्ट रूप से कहा की-“अपनी सभी प्रकार की गरीबी और पतन के लिए स्वयं हम ही जिम्मेदार हैं| उन्होंने अपने देशवासियों को अपनी मुक्ति के लिए स्वयं प्रयास करने का सन्देश दिया| उन्होंने स्वयं भी अपने देशवासियों को जाग्रत करने और उनकी कमजोरियों की ओर उनका ध्यान दिलाने का दायित्व संभाला| उन्होंने उन्हें जीवन भर संघर्ष करने और मृत्यु द्वारा नया रूप धारण करने,गरीबों के प्रति दया-भाव रखने,भूखों को भोजन उपलब्ध कराने और वृहद् स्तर पर लोगों को जागृत करने के लिए प्रेरित किया|

विवेकानंद ने 1893 ई. में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सभा में भाग लिया| इनके द्वारा वहां दिए गए भाषण ने अन्य देशों के लोगों के मन को गहराई तक प्रभावित किया और विश्व की नजर में भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा में वृद्धि की|

निष्कर्ष

रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद का दर्शन धार्मिक सौहार्द्र पर आधारित था और इस सौहार्द्र का अनुभव व्यक्तिगत ईश्वरीय चेतना के आधार पर ही किया जा सकता है|

1944 राजगोपालाचारी योजना

राजगोपालाचारी फार्मूला (1944 ई.)

द्विराष्ट्र सिद्धांत और ब्रिटिशों से भारत की स्वतंत्रता को लेकर मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अलग अलग विचारों के कारण पैदा हुए मतभेदों को सुलझाने के उद्देश्य से राजगोपालाचारी फार्मूला लाया गया था| सी. राजगोपालाचारी, जोकि कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता थे, ने मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच के राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए एक फार्मूला तैयार किया| यह फार्मूला, जिसे महात्मा गाँधी का समर्थन प्राप्त था, वास्तव में लीग की पाकिस्तान मांग की मौन स्वीकृति थी|

राजगोपालाचारी फार्मूला

• मुस्लिम लीग कांग्रेस की स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करे

• लीग कांग्रेस को केंद्र में अस्थायी सरकार के गठन में सहयोग प्रदान करे

• युद्ध की समाप्ति के बाद एक आयोग गठित किया जायेगा जो उन जिलों की पहचान करेगा जहाँ मुस्लिमों का स्पष्ट बहुमत है और इन क्षेत्रों (गैर मुस्लिमों को शामिल कर) में, यह जानने के लिए कि वे पृथक संप्रभु राज्य का गठन चाहते हैं या नहीं, वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराये जायेंगे|

• सभी दलों को चुनाव या मतदान से पूर्व विभाजन के सम्बन्ध में अपने मत और अपने विचारों को व्यक्त करने की अनुमति होगी|

• यदि विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकृति मिल जाती है तो रक्षा, वाणिज्य और संचार आदि विषयों को लेकर एक संयुक्त समझौता किया जायेगा|

• ऊपर दी गयी सभी शर्तें तभी लागू होगी जब इंग्लैंड सम्पूर्ण सत्ता भारत को हस्तांतरित कर दे|

निष्कर्ष

राजगोपालाचारी फार्मूले की मूल संकल्पना द्विराष्ट्र सिद्धांत और ब्रिटिशों से भारत की स्वतंत्रता को लेकर मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अलग अलग विचारों के कारण पैदा हुए मतभेदों को सुलझाने की थी|

1919 भारत सरकार अधिनियम

मोंटेंग्यु-चेम्सफोर्ड सुधार अर्थात भारत सरकार अधिनियम-1919

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन और उसके सहयोगी देशों द्वारा यह प्रचार किया गया की वे अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता का युद्ध लड़ रहे है |बहुत से भारतीय नेताओं ने ऐसा विश्वास किया कि ब्रिटेन युद्ध की समाप्ति पर भारत को स्वराज प्रदान किया जायेगा लेकिन ब्रिटिश सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं थी| युद्ध के बाद भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में जो बदलाव लाये गए वे मोंटेंग्यु-चेम्सफोर्ड सुधार ,जिसे भारत सरकार अधिनियम-1919 भी कहा जाता है,के परिणाम थे| इन सुधारों द्वारा केंद्रीय विधान-मंडल को द्विसदनीय बना दिया गया |इनमें से एक सदन को राज्य परिषद् और दुसरे सदन को केंद्रीय विधान सभा कहा गया |दोनों सदनों में निर्वाचित सदस्यों का बहुमत था| केंद्रीय विधायिका की शक्तियों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया ,सिवाय केंद्र में दो सदनों की स्थापना के|कार्यकारी परिषद् के सदस्य, जोकि मंत्रियों के समान थे, विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं थे अर्थात वे सत्ता में बने रह सकते थे चाहे  विधायिका के सदस्यों के बहुमत का समर्थन उन्हें प्राप्त हो या नहीं|पेंतिया विधान मंडलों की संख्या में भी वृद्धि की गयी और उनमे निर्वाचित सदस्यों को बहुमत प्रदान किया गया| प्रान्तों में प्रयुक्त द्वैध शासन प्रणाली द्वारा प्रांतीय विधान मंडलों को अधिक शक्तियां प्रदान की गयीं|

इस व्यवस्था के तहत शिक्षा और जन स्वास्थ्य जैसे विभागों को विधायिका के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों को सौंपा गया और पुलिस व वित्त जैसे महत्वपूर्ण विभागों को गवर्नर के सीधे नियंत्रण में बने रहे|गवर्नर को मंत्रियों द्वारा लिए गए किसी  भी निर्णय को अस्वीकार करने की शक्ति प्रदान की गयी| प्रान्तों में मंत्रियों और विधान मंडलों, जिनके प्रति मंत्री उत्तरदायी थे,की शक्तियां सीमित ही थी| जैसे की अगर कोई मंत्री शिक्षा के प्रसार की योजना बनता है तो उसके लिए आवश्यक धन का अनुमोदन गवर्नर द्वारा ही किया जायेगा और गवर्नर चाहे तो उस मंत्री के निर्णय को अस्वीकार भी कर सकता था|

इसके अतिरिक्त गवर्नर जनरल भी किसी प्रान्त द्वारा लिए गए निर्णय को अस्वीकार कर सकता था| केंद्रीय विधायिका के दोनों सदनों और प्रांतीय विधान मंडलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों का चुनाव करने वाले मतदाताओं की संख्या अत्यंत सीमित थी|उदहारण के लिए केंद्रीय विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों के निर्वाचन हेतु मत देने का अधिकार ब्रिटिश भारत की कुल व्यस्क जनसंख्या के केवल 1% भाग को ही प्राप्त था|सभी महत्वपूर्ण शक्तियां सपरिषद गवर्नर जनरल में निहित थी ,जोकि ब्रिटिश सरकार के प्रति उत्तरदायी बना रहा न कि भारतीय लोगों के प्रति|प्रान्तों में गवर्नर भी अपनी व्यापक शक्तियों का प्रयोग करता था|

जो भी परिवर्तन किये गए थे वे कहीं से भी स्वराज की स्थापना में सहायक नहीं थे,जिसकी उम्मीद भारतीयों को युद्ध के बाद प्राप्त होने की थी| पूरे देश में असंतोष की लहर थी और इसे दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने दमन का सहारा लिया| इसी क्रम में मार्च 1919 ई. में ,रौलेट आयोग की रिपोर्ट के आधार पर, रौलेट अधिनियम पारित किया गया|सदन ने इसका विरोध किया|

बहुत से नेताओं ने ,जोकि सदन के सदस्य थे,विरोधस्वरूप अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया| मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने त्यागपत्र में कहा कि शांति काल में कोई भी सरकार अगर इस तरह के कानून पारित करती है तो उसे किसी भी रूप में सभ्य सरकार नहीं कहा जा सकता है| इस अधिनियम के पारित होने से भारतीय जनता में रोष को बढ़ावा दिया| दमन के इस नए अधिनियम को काला कानून  कहा गया|

गाँधी,जिन्होंने रौलेट अधिनियम के विरोध हेतु सत्याग्रह सभा का निर्माण किया था, ने देशव्यापी विरोध का आह्वाहन किया| पूरे देश में 6 अप्रैल 1919 को राष्ट्रीय अवमानना दिवस  के रूप में मनाया गया| इस दिन पूरे देश में विरोध प्रदर्शनों और हड़तालों का आयोजन किया गया|पूरे देश का व्यापार थम गया| भारत में इससे पूर्व कभी भी इस तरह का संगठित विरोध प्रदर्शन देखने को नहीं मिला था|सरकार ने भी इसे दबाने के लिए कई स्थानों पर लाठी-चार्ज और गोली चलाने जैसे क्रूर उपायों का प्रयोग किया था|

अधिनियम के प्रावधान

• भारत में प्रांतीय द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना की गयी |यह एक ऐसी व्यवस्था थी मनोनीत पार्षदों और निर्वाचित सदस्यों द्वारा शासन किया जाता था| गवर्नर अभी भी प्रांतीय प्रशासन का मुखिया बना रहा|

• प्रांतीय विषयों को दो भागों- आरक्षित और हस्तांतरित में बांटा गया था|

• विधायिकाओं  का विस्तार किया गया और उसके 70% सदस्यों का निर्वाचित होना जरुरी किया| प्रथक निर्वाचन मंडलों का वर्गीय और सांप्रदायिक आधार पर विस्तार किया|

• महिलाओं को मत देने का अधिकार प्रदान किया गया|

• केंद्रीय सरकार अभी भी उत्तरदायित्वविहीन बनी रही|

निष्कर्ष

यह अधिनियम भारतीयों की आकांक्षाओं की पूर्ति करने में असफल रहा |यह वास्तव में भारत का आर्थिक शोषण करने और उसे लम्बे समय तक गुलाम बनाये रखने के उद्देश्य से लाया गया था|

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...