शिवाजी के उत्तराधिकारी

शिवाजी के उत्तराधिकारी

मराठा साम्राज्य या मराठा संघ,जो वर्त्तमान भारत के दक्षिण-पश्चिम भाग में स्थित है,ने 1674 से 1818 ई. तक शासन किया और अपने क्षेत्र का विस्तार किया. शिवाजी को मराठा साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है,जिन्होंने इसे संगठित रूप प्रदान किया.परन्तु पेशवाओं(साम्राज्य के प्रधान मंत्री) के अधीन इस साम्राज्य का तेजी से विस्तार हुआ. मोरे,घाटगे और निम्बालकर सर्वाधिक प्रभावशाली मराठा परिवार थे.

शम्भाजी(1680-1689 ई.)

  • वे शिवाजी के छोटे पुत्र थे जो अपने बड़े भाई राजाराम के विरुद्ध उत्तराधिकार के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद सिंहासनारुढ़ हुए.
  • उसने राजपूत-मराठा गठबंधन को टालने के लिए और दक्कन सल्तनत से अपने पुराने संबंधों की पुन:स्थापना करने के लिए,अपने पिता की विस्तारवादी नीतियों को पुनः लागू किया.
  • 1682 ई. में मुग़ल शासक औरंगजेब अपने विद्रोही पुत्र शहजादा अकबर का पीछा करते हुए दक्षिण भारत पंहुचा.शम्भाजी द्वारा शहजादा अकबर को शरण देने के कारण औरंगजेब ने उसकी हत्या करवा दी.

राजाराम(1689-1700 ई.)

  • शम्भाजी की मृत्यु के बाद शिवाजी के दूसरे पुत्र राजाराम ने शासन संभाला और मराठों की परंपरा को आगे बढाया.
  • उसने मराठों की विस्तारवादी नीति को जारी रखा और दक्कन के मुग़ल क्षेत्रों पर आक्रमण करने की परंपरा की शुरुआत की.
  • अक्टूबर 1689 में,जुल्फिकार खान के नेतृत्व में, मुग़ल सेना ने रायगढ़ पर आक्रमण कर दिया और शम्भाजी के पुरे परिवार, जिसमे उनके पुत्र शाहू भी शामिल थे, को बंदी बना लिया गया.
  • 1700 ई. में सतारा,जोकि जिंजी के पतन के मराठों की राजधानी बन गयी थी, में शंभाजी की मृत्यु हो गयी.

शिवाजी द्वितीय और ताराबाई(1700-1707 ई.)

  • राजाराम की मृत्यु के बाद उसकी विधवा ताराबाई ने अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय को गद्दी पर बिठाया और स्वयं उसकी संरक्षक बन गयी.उसने नागरिक व सैन्य दोनों सन्दर्भों में संकट के समय मराठा राज्य को स्थिरता प्रदान की.
  • मुगलों ने चितपावन ब्राहमण बालाजी विश्वनाथ के सहयोग से ताराबाई को गद्दी से उतर दिया.

शाहू(1707-1749 ई.)

  • मुग़ल शासक बहादुरशाह  ने शाहू को कैद से मुक्त कर दिया जिसके कारण ताराबाई और शाहू के मध्य मराठा गद्दी को लेकर संघर्ष प्रारंभ हो गया.शाहू ने ‘खेड़ा के युद्ध’ (12अक्टूबर,1707) में ताराबाई को परास्त कर सतारा पर कब्ज़ा कर लिया.
  • उसके शासनकाल में ही पेशवाओं की शक्ति का उदय  होना प्रारंभ हुआ और मराठा राज्य के मराठा संघ में रूपांतरण की प्रक्रिया शुरू हुई.
  • उसी के शासनकाल के दौरान मराठा राज्य दो भागों-ताराबाई के नेतृत्व में कोल्हापुर और शाहू के नेतृत्व में सतारा ,में बंट गया. इन दोनों प्रतिद्वंदी शक्तियों के मध्य शत्रुता अंततः 1731 ई. की ‘वर्ना संधि’ के द्वारा समाप्त हुई.

निष्कर्ष

अतः हम कह सकते है कि शिवाजी मराठा राज्य के संस्थापक थे लेकिन उसका अत्यधिक विस्तार पेशवा-काल के दौरान ही हुआ.

ब्यापगत का सिद्धांत

व्यपगत का सिद्धांत

व्यपगत का सिद्धांत एक साम्राज्यवाद समर्थक उपागम था जिसका उद्देश्य भारत में ब्रिटिश राज्यक्षेत्र का विस्तार करना था| इस सिद्धांत का प्रारंभ लॉर्ड डलहौजी द्वारा किया गया था| इस सिद्धांत के अनुसार वे राज्य, जिनका कोई वंशानुगत उत्तराधिकारी नहीं था, अपने शासन करने के अधिकार खो देते थे |साथ ही उत्तराधिकारी को गोद लेने पर भी उनके राज्य को वापस प्राप्त नहीं किया जा सकता था|

1818 ई. से पूर्व ,ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियाँ और गतिविधियाँ व्यापारिक थी न कि एक संप्रभु शासक की लेकिन उसके बाद उनकी महत्वाकांक्षा संपूर्ण भारत पर शासन करने की इच्छा में बदल गयी, जिसकी परिणति पहले सहायक संधि प्रणाली और अब व्यपगत सिद्धांत के रूप में देखने को मिली | इन नीतियों को अपनाने का उद्देश्य राज्य के संपूर्ण अधिकारों पर नियंत्रित स्थापित कर उन्हें  ब्रिटिश उपनिवेश बनाना था| मुख्य जटिलता उन राज्यों को लेकर थी जिनका का कोई उत्तराधिकारी नहीं था | व्यपगत की नीति ऐसे ही राज्यों को हड़पने के लिए बनायीं गयी थी | इस नीति के तहत ऐसे राज्यों से ,उत्तराधिकारी न होने के आधार पर, शासन करने का अधिकार छीन लिया गया | डलहौजी द्वारा व्यपगत के सिद्धांत के आधार पर निम्नलिखित राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया गया था-

• सतारा(1848 ई.)

• जयपुर(1849 ई.)

• संभलपुर(1849 ई.)

• बाहत(1850 ई.)

• उदयपुर(1852 ई.)

• झाँसी(1853 ई.)

• नागपुर(1854 ई.)

लेकिन कुछ समय बाद इस नीति के प्रावधानों के कारण जनता के मध्य काफी रोष पैदा हो गया और उड़ीसा के महान क्रांतिकारी सुरेन्द्र देसाई ने व्यपगत के सिद्धांत के विरोध में आवाज उठाई| आगे चलकर इसी रोष ने 1857 ई.  के विद्रोह का आधार तैयार किया|

व्यपगत के सिद्धांत के मुख्य बिंदु

• साम्राज्यवादी-समर्थक उपागम के आधार पर भारत में ब्रिटिश क्षेत्र का विस्तार करने की नीति

• यदि किसी राज्य में कोई उत्तराधिकारी नहीं है,तो उसका विलय ब्रिटिश साम्राज्य में कर लेना

• उत्तराधिकार हेतु संतान को गोद लेने पर प्रतिबन्ध

• शासकों द्वारा गोद ली गयी संतान को उपाधि और पेंशन देने पर प्रतिबन्ध

• गोद ली गयी संतान को शासक की केवल निजी संपत्ति ही उत्तराधिकार में प्राप्त होना

• उपाधियों और पेंशन की समाप्ति

निष्कर्ष

हालाँकि ,ब्रिटिश भारत में व्यापार के उद्देश्य से आये थे लेकिन संसाधनों पर एकाधिकार प्राप्त करने की उनकी महत्वाकांक्षा ने उन्हें भारत में शक्तिशाली बना दिया |व्यपगत का सिद्धांत वास्तव में विस्तारवादी नीति थी, जो किसी भी तरह से अन्य राज्यों का ब्रिटिश भारत में विलय कर भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के राज्यक्षेत्र  में विस्तार करना चाहती थी| इस नीति का प्रारंभ डलहौजी द्वारा किया गया था ताकि अन्य राज्यों को अपना उपनिवेश बनाने की शक्ति  ईस्ट इंडिया कंपनी को प्रदान की जा सके और कंपनी के राजस्व में भी वृद्धि हो सके| इस नीति के कारण एक तरफ तो जनता के मध्य ब्रिटिशों की छवि ख़राब हुई तो दूसरी तरफ इस नीति ने विभिन्न राज्यों के शासकों को ब्रिटिशों का घोर विरोधी बना दिया ,बाद में यही 1857 ई. की क्रांति का एक मुख्य कारण बना|

राजाराम मोहन राय और ब्रम्हा समाज

राममोहन रॉय और ब्रह्म समाज

सामाजिक और धार्मिक जीवन के कुछ पहलुओं के सुधार से प्रारंभ होने वाला जागरण ने समय के साथ देश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और  राजनीतिक जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित किया|18वीं सदी के उत्तरार्ध में कुछ यूरोपीय और भारतीय विद्वानों ने प्राचीन भारतीय दर्शन,विज्ञान,धर्म और साहित्य का अध्ययन प्रारंभ किया| इस अध्ययन के द्वारा भारतीय अपने प्राचीन भारतीय ज्ञान से परिचित हुए,जिसने उनमें अपनी सभ्यता के प्रति गौरव का भाव जाग्रत किया|

इसने सुधारकों को उनके सामाजिक और धार्मिक सुधारों के कार्य में भी सहयोग प्रदान किया| उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों और अमानवीय व्यवहारों व परम्पराओं के प्रति अपने संघर्ष में जनमत तैयार करने के लिए प्राचीन भारतीय ग्रंथों के ज्ञान का उपयोग किया| ऐसा करने के दौरान, उनमें से अधिकांश ने विश्वास और आस्था के स्थान पर तर्क का सहारा लिया| अतः भारतीय सामाजिक व धार्मिक सुधारकों ने अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक तरफ अपने पाश्चात्य ज्ञान का प्रयोग किया तो दूसरी तरफ प्राचीन भारतीय विचारों को भी महत्व प्रदान किया|

राजा राममोहन राय

राजा राममोहन राय का जन्म,संभवतः1772 ई. में,बंगाल के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था| उन्होंने पारंपरिक संस्कृत शिक्षा बनारस में और पारसी व अरबी का ज्ञान पटना में प्राप्त किया| बाद में उन्होंने अंग्रेजी,ग्रीक और हिब्रू भाषा भी सीखी |वे फ्रेंच और लैटिन भाषा के भी जानकार थे| उन्होंने न केवल हिन्दू बल्कि इस्लाम,ईसाई और यहूदी धर्म का भी गहन अध्ययन किया था| उन्होंने संस्कृत,बंगाली,हिंदी,पारसी और अंग्रेजी भाषा में अनेक पुस्तकें लिखी थी| उन्होंने एक बंगाली भाषा में और एक पारसी भाषा में अर्थात दो समाचार पत्र भी निकाले| मुग़ल शाशकों ने उन्हें ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की और अपने दूत के रूप में इंग्लैंड भेजा| वे 1831 ई. में इंग्लैंड पहुचे और वहीँ 1833 में उनकी मृत्यु हो गयी| वे भारत में अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक थे और मानते थे कि नवजागरण के प्रसार और विज्ञान की शिक्षा के लिए अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है|वे प्रेस की स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर थे और इसी कारण उन्होंने प्रेस पर लगे प्रतिबंधों को हटाने के लिए आन्दोलन भी चलाया|

राजा राममोहन राय का मानना था कि हिन्दू धर्म में प्रवेश कर चुकी बुराईयों को दूर करने के लिए और उसके शुध्दिकरण के लिए उस धर्म के मूल ग्रंथों के ज्ञान से लोगों को परिचित करना आवश्यक है| इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ही उन्होनें वेदों व उपनिषदों का बंगाली भाषा में अनुवाद कर प्रकाशित करने का कठिन कार्य किया|

वे एक ऐसे सार्वभौमिक धर्म के समर्थक थे जोकि एक परम-सत्ता के सिद्धांत पर आधारित था| उन्होनें मूर्ति-पूजा और अंधविश्वासों व पाखंडों का विरोध किया|

ब्रह्म समाज

धार्मिक सुधारों के क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा योगदान उनके द्वारा 1928 ई. में ब्रहम समाज की स्थापना करना था जोकि धार्मिक सुधार आन्दोलन के तहत स्थापित प्रथम महत्वपूर्ण संगठन था| उन्होनें मूर्ति-पूजा और अतार्किक अंधविश्वासों व पाखंडों का विरोध किया| ब्रहम समाज के सदस्य किसी भी धर्म पर हमले के खिलाफ थे|

सामाजिक सुधारों के अंतर्गत ब्रहम समाज का सबसे बड़ा योगदान 1829 ई. में सती प्रथा का उन्मूलन था|उन्होंने देखा था कि कैसे उनके बड़े भाई की पत्नी को जबरदस्ती सती होने के लिए विवश किया गया था| उन्हें सती प्रथा का विरोध करने के कारण रूढ़िवादी हिन्दुओं का तीव्र विरोध भी झेलना पड़ा था| राममोहन राय के अनुसार सती प्रथा का प्रमुख कारण हिन्दू महिलाओं की  अत्यधिक निम्न स्थिति थी| वे बहुविवाह के खिलाफ थे और महिलाओं को शिक्षित करने तथा उन्हें पैतृक संपत्ति प्राप्त करने के अधिकार प्रदान के पक्षधर थे|

ब्रहम समाज का प्रभाव बढता गया और देश के विभिन्न भागों में ब्रहम समाज शाखाएं खुल गयीं| ब्रहम समाज के दो महत्वपूर्ण नेता देवेन्द्रनाथ टैगोर और केशवचंद्र सेन थे| ब्रहम समाज के सन्देश को प्रसारित करने के लिए केशवचंद्र सेन ने मद्रास और बम्बई प्रेसिडेंसी की यात्राएँ की और बाद में उत्तर भारत में भी यात्राएँ कीं|1866 ई. में ब्रहम समाज का विभाजन हो गया क्योकि केशवचंद्र सेन के विचार मूल ब्रहम समाज के विचारों की तुलना में अत्यधिक क्रांतिकारी व उग्र थे|वे जाति व रीति-रिवाजों के बंधन और धर्म-ग्रंथों के प्राधिकार से मुक्ति के पक्षधर थे |उन्होंने अंतर-जातीय विवाह और विधवा-पुनर्विवाह की वकालत की और ऐसे अनेक विवाह सम्पन्न भी करायें,पर्दा-प्रथा का विरोध किया और जाति-गत विभाजन की आलोचना की|उन्होंने जाति-गत कठोरता पर हमला किया,तथाकथित हिन्दू निम्न जातियों व अन्य धर्मों के व्यक्तियों के यहाँ भोजन करने लगे,खान-पान पर लगे प्रतिबंधों का विरोध किया,अपना संपूर्ण जीवन शिक्षा के प्रसार हेतु समर्पित कर दिया और समुद्री यात्राओं पर प्रतिबन्ध जैसे पुराने हिन्दू विचारों का विरोध किया|इस आन्दोलन ने देश के अन्य भागों में भी ऐसे ही अनेक सुधार-आन्दोलनों को प्रेरित किया |लेकिन इस समूह का प्रभाव बढ़ता गया जबकि अन्य समूह,जोकि सामाजिक सुधारों के प्रति उनके उतने अधिक प्रतिबद्ध नहीं थे, का पतन हो गया|

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद

रामकृष्ण और विवेकानंद

19 वीं सदी के धार्मिक मानवों ने न तो किसी सम्प्रदाय का समर्थन किया और न ही मोक्ष का कोई नया रास्ता दिखलाया| उन्होंने ईश्वरीय चेतना का सन्देश दिया|उनके अनुसार ईश्वरीय चेतना के आभाव में परम्पराएँ रूढ़ और दमनात्मक हो जाती है और धार्मिक शिक्षाएं अपनी परिवर्तनकारी शक्ति को खोने लगती है|

रामकृष्ण मिशन (1836-1886 ई.)

रामकृष्ण परमहंस कलकत्ता के पास स्थित दक्षिणेश्वर मंदिर के पुजारी थे| अन्य धर्मों के नेताओं के संपर्क में आने के बाद उन्होंने सभी तरह के विश्वासों की पवित्रता को स्वीकार किया| उनके समय के लगभग सभी धार्मिक सुधारक, जिनमें केशवचंद्र सेन और दयानंद भी शामिल थे, उनके पास धार्मिक चर्चाएँ करने और मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए आते थे| समकालीन भारतीय विद्वानों, जिनकी अपनी संस्कृति पर आस्था पश्चिम द्वारा प्रस्तुत चुनौती के कारण डगमगाने लगी थी,के मन में रामकृष्ण की शिक्षाओं के कारण पुनः अपनी संस्कृति के प्रति आस्था का भाव मजबूत हुआ| रामकृष्ण की शिक्षाओं का प्रचार करने और उन्हें व्यवहार में लाने के लिए उनके प्रिय शिष्य विवेकानंद ने 1897 ई. में रामकृष्ण मिशन  की स्थापना की थी| मिशन का उद्देश्य समाज सेवा थी क्योकि उसका मानना था की ईश्वर की सेवा करने का सबसे बेहतर तरीका मानवों की सेवा करना है| रामकृष्ण मिशन अपनी स्थापना के समय से ही जन-गतिविधियों के शक्तिशाली केंद्र के रूप में स्थापित हो गया था| इन जन-गतिविधियों में बाढ़,सूखा और महामारी जैसी आपदाओं के समय सहायता पहुँचाना,अस्पतालों की स्थापना करना और शिक्षा संस्थाओं की स्थापना जैसे कार्य शामिल थे|

विवेकानंद(1863-1902 ई.)

विवेकानंद का चरित्र अपने गुरू के चरित्र से बिल्कुल अलग था| उन्होंने भारतीय व पश्चिमी दर्शनों का अध्ययन किया लेकिन जब तक वे रामकृष्ण से नहीं मिले उन्हें मानसिक शांति नहीं प्राप्त हुई | उनका मन केवल अध्यात्म से ही नहीं जुड़ा था  बल्कि अपनी मातृभूमि की तत्कालीन परिस्थितियाँ भी उनके मन को आंदोलित करती रहती थीं|संपूर्ण भारत में भ्रमण करने के बाद उन्होंने पाया कि गरीबी,गन्दगी,मानसिक उत्साह का अभाव और भविष्य के प्रति आशान्वित न होने जैसी परिस्थितियां हर कहीं व्याप्त है|

विवेकानंद ने स्पष्ट रूप से कहा की-“अपनी सभी प्रकार की गरीबी और पतन के लिए स्वयं हम ही जिम्मेदार हैं| उन्होंने अपने देशवासियों को अपनी मुक्ति के लिए स्वयं प्रयास करने का सन्देश दिया| उन्होंने स्वयं भी अपने देशवासियों को जाग्रत करने और उनकी कमजोरियों की ओर उनका ध्यान दिलाने का दायित्व संभाला| उन्होंने उन्हें जीवन भर संघर्ष करने और मृत्यु द्वारा नया रूप धारण करने,गरीबों के प्रति दया-भाव रखने,भूखों को भोजन उपलब्ध कराने और वृहद् स्तर पर लोगों को जागृत करने के लिए प्रेरित किया|

विवेकानंद ने 1893 ई. में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सभा में भाग लिया| इनके द्वारा वहां दिए गए भाषण ने अन्य देशों के लोगों के मन को गहराई तक प्रभावित किया और विश्व की नजर में भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा में वृद्धि की|

निष्कर्ष

रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद का दर्शन धार्मिक सौहार्द्र पर आधारित था और इस सौहार्द्र का अनुभव व्यक्तिगत ईश्वरीय चेतना के आधार पर ही किया जा सकता है|

1944 राजगोपालाचारी योजना

राजगोपालाचारी फार्मूला (1944 ई.)

द्विराष्ट्र सिद्धांत और ब्रिटिशों से भारत की स्वतंत्रता को लेकर मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अलग अलग विचारों के कारण पैदा हुए मतभेदों को सुलझाने के उद्देश्य से राजगोपालाचारी फार्मूला लाया गया था| सी. राजगोपालाचारी, जोकि कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता थे, ने मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच के राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए एक फार्मूला तैयार किया| यह फार्मूला, जिसे महात्मा गाँधी का समर्थन प्राप्त था, वास्तव में लीग की पाकिस्तान मांग की मौन स्वीकृति थी|

राजगोपालाचारी फार्मूला

• मुस्लिम लीग कांग्रेस की स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करे

• लीग कांग्रेस को केंद्र में अस्थायी सरकार के गठन में सहयोग प्रदान करे

• युद्ध की समाप्ति के बाद एक आयोग गठित किया जायेगा जो उन जिलों की पहचान करेगा जहाँ मुस्लिमों का स्पष्ट बहुमत है और इन क्षेत्रों (गैर मुस्लिमों को शामिल कर) में, यह जानने के लिए कि वे पृथक संप्रभु राज्य का गठन चाहते हैं या नहीं, वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराये जायेंगे|

• सभी दलों को चुनाव या मतदान से पूर्व विभाजन के सम्बन्ध में अपने मत और अपने विचारों को व्यक्त करने की अनुमति होगी|

• यदि विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकृति मिल जाती है तो रक्षा, वाणिज्य और संचार आदि विषयों को लेकर एक संयुक्त समझौता किया जायेगा|

• ऊपर दी गयी सभी शर्तें तभी लागू होगी जब इंग्लैंड सम्पूर्ण सत्ता भारत को हस्तांतरित कर दे|

निष्कर्ष

राजगोपालाचारी फार्मूले की मूल संकल्पना द्विराष्ट्र सिद्धांत और ब्रिटिशों से भारत की स्वतंत्रता को लेकर मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अलग अलग विचारों के कारण पैदा हुए मतभेदों को सुलझाने की थी|

1919 भारत सरकार अधिनियम

मोंटेंग्यु-चेम्सफोर्ड सुधार अर्थात भारत सरकार अधिनियम-1919

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन और उसके सहयोगी देशों द्वारा यह प्रचार किया गया की वे अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता का युद्ध लड़ रहे है |बहुत से भारतीय नेताओं ने ऐसा विश्वास किया कि ब्रिटेन युद्ध की समाप्ति पर भारत को स्वराज प्रदान किया जायेगा लेकिन ब्रिटिश सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं थी| युद्ध के बाद भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में जो बदलाव लाये गए वे मोंटेंग्यु-चेम्सफोर्ड सुधार ,जिसे भारत सरकार अधिनियम-1919 भी कहा जाता है,के परिणाम थे| इन सुधारों द्वारा केंद्रीय विधान-मंडल को द्विसदनीय बना दिया गया |इनमें से एक सदन को राज्य परिषद् और दुसरे सदन को केंद्रीय विधान सभा कहा गया |दोनों सदनों में निर्वाचित सदस्यों का बहुमत था| केंद्रीय विधायिका की शक्तियों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया ,सिवाय केंद्र में दो सदनों की स्थापना के|कार्यकारी परिषद् के सदस्य, जोकि मंत्रियों के समान थे, विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं थे अर्थात वे सत्ता में बने रह सकते थे चाहे  विधायिका के सदस्यों के बहुमत का समर्थन उन्हें प्राप्त हो या नहीं|पेंतिया विधान मंडलों की संख्या में भी वृद्धि की गयी और उनमे निर्वाचित सदस्यों को बहुमत प्रदान किया गया| प्रान्तों में प्रयुक्त द्वैध शासन प्रणाली द्वारा प्रांतीय विधान मंडलों को अधिक शक्तियां प्रदान की गयीं|

इस व्यवस्था के तहत शिक्षा और जन स्वास्थ्य जैसे विभागों को विधायिका के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों को सौंपा गया और पुलिस व वित्त जैसे महत्वपूर्ण विभागों को गवर्नर के सीधे नियंत्रण में बने रहे|गवर्नर को मंत्रियों द्वारा लिए गए किसी  भी निर्णय को अस्वीकार करने की शक्ति प्रदान की गयी| प्रान्तों में मंत्रियों और विधान मंडलों, जिनके प्रति मंत्री उत्तरदायी थे,की शक्तियां सीमित ही थी| जैसे की अगर कोई मंत्री शिक्षा के प्रसार की योजना बनता है तो उसके लिए आवश्यक धन का अनुमोदन गवर्नर द्वारा ही किया जायेगा और गवर्नर चाहे तो उस मंत्री के निर्णय को अस्वीकार भी कर सकता था|

इसके अतिरिक्त गवर्नर जनरल भी किसी प्रान्त द्वारा लिए गए निर्णय को अस्वीकार कर सकता था| केंद्रीय विधायिका के दोनों सदनों और प्रांतीय विधान मंडलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों का चुनाव करने वाले मतदाताओं की संख्या अत्यंत सीमित थी|उदहारण के लिए केंद्रीय विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों के निर्वाचन हेतु मत देने का अधिकार ब्रिटिश भारत की कुल व्यस्क जनसंख्या के केवल 1% भाग को ही प्राप्त था|सभी महत्वपूर्ण शक्तियां सपरिषद गवर्नर जनरल में निहित थी ,जोकि ब्रिटिश सरकार के प्रति उत्तरदायी बना रहा न कि भारतीय लोगों के प्रति|प्रान्तों में गवर्नर भी अपनी व्यापक शक्तियों का प्रयोग करता था|

जो भी परिवर्तन किये गए थे वे कहीं से भी स्वराज की स्थापना में सहायक नहीं थे,जिसकी उम्मीद भारतीयों को युद्ध के बाद प्राप्त होने की थी| पूरे देश में असंतोष की लहर थी और इसे दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने दमन का सहारा लिया| इसी क्रम में मार्च 1919 ई. में ,रौलेट आयोग की रिपोर्ट के आधार पर, रौलेट अधिनियम पारित किया गया|सदन ने इसका विरोध किया|

बहुत से नेताओं ने ,जोकि सदन के सदस्य थे,विरोधस्वरूप अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया| मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने त्यागपत्र में कहा कि शांति काल में कोई भी सरकार अगर इस तरह के कानून पारित करती है तो उसे किसी भी रूप में सभ्य सरकार नहीं कहा जा सकता है| इस अधिनियम के पारित होने से भारतीय जनता में रोष को बढ़ावा दिया| दमन के इस नए अधिनियम को काला कानून  कहा गया|

गाँधी,जिन्होंने रौलेट अधिनियम के विरोध हेतु सत्याग्रह सभा का निर्माण किया था, ने देशव्यापी विरोध का आह्वाहन किया| पूरे देश में 6 अप्रैल 1919 को राष्ट्रीय अवमानना दिवस  के रूप में मनाया गया| इस दिन पूरे देश में विरोध प्रदर्शनों और हड़तालों का आयोजन किया गया|पूरे देश का व्यापार थम गया| भारत में इससे पूर्व कभी भी इस तरह का संगठित विरोध प्रदर्शन देखने को नहीं मिला था|सरकार ने भी इसे दबाने के लिए कई स्थानों पर लाठी-चार्ज और गोली चलाने जैसे क्रूर उपायों का प्रयोग किया था|

अधिनियम के प्रावधान

• भारत में प्रांतीय द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना की गयी |यह एक ऐसी व्यवस्था थी मनोनीत पार्षदों और निर्वाचित सदस्यों द्वारा शासन किया जाता था| गवर्नर अभी भी प्रांतीय प्रशासन का मुखिया बना रहा|

• प्रांतीय विषयों को दो भागों- आरक्षित और हस्तांतरित में बांटा गया था|

• विधायिकाओं  का विस्तार किया गया और उसके 70% सदस्यों का निर्वाचित होना जरुरी किया| प्रथक निर्वाचन मंडलों का वर्गीय और सांप्रदायिक आधार पर विस्तार किया|

• महिलाओं को मत देने का अधिकार प्रदान किया गया|

• केंद्रीय सरकार अभी भी उत्तरदायित्वविहीन बनी रही|

निष्कर्ष

यह अधिनियम भारतीयों की आकांक्षाओं की पूर्ति करने में असफल रहा |यह वास्तव में भारत का आर्थिक शोषण करने और उसे लम्बे समय तक गुलाम बनाये रखने के उद्देश्य से लाया गया था|

1565 मैसूर

मैसूर

विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद, 1565 ई। में हिन्दू वोडियार वंश द्वारा मैसूर राज्य को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया। वोडियार वंश के अंतिम शासक चिक्का कृष्णराज द्वितीय के शासनकाल में वास्तविक सत्ता देवराज (दलवाई या सेनापति) और नंजराज (सर्वाधिकारी या वित्त एवं राजस्व नियंत्रक) के हाथों में आ गयी थी।ये क्षेत्र पेशवा और निज़ाम के बीच विवाद का विषय बन गया था। नंजराज द्वितीय कर्नाटक युद्ध में अंग्रेजों के साथ मिल गया और त्रिचुरापल्ली(तमिलनाडु) पर कब्ज़ा कर लिया।

1761 ई. में हैदर अली ,जिसने अपने जीवन की शुरुआत एक सैनिक के रूप में की थी,ने मैसूर के राजवंश को हटाकर  राज्य पर अपना कब्ज़ा कायम कर लिया। हैदर अली(1760-1782) ने मैसूर राज्य की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया ,जो  दो वोडियार भाइयों –देवराज और नंजराज द्वारा शासित था। उसे अपने राज्य की स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए निज़ाम और मराठों से भी लड़ना पड़ा।उसने निज़ाम और फ्रांसीसियों के साथ मिलकर 1767-1769 के मध्य हुए प्रथम आंग्ल –मैसूर युद्ध मे अंग्रेजों को करारी शिकस्त दी और अप्रैल 1769 में उन्हें मद्रास की संधि के रूप में अपनी शर्तें मानने पर मजबूर कर दिया। 1780-1784 ई के मध्य हुए द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध में भी उसने निज़ाम और मराठों के साथ मिलकर 1782 ई में  अंग्रेजों को हराया लेकिन युद्ध में घायल हो जाने के कारण 1782 ई में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसके पुत्र टीपू सुल्तान (1782-1799 ई) ने कमान संभाली ,जिसने वीरतापूर्वक अंग्रेजों से युद्ध लड़कर अपने राज्य की रक्षा की। टीपू सुल्तान पहला शासक था जिसने पश्चिमी पद्धतियों को अपने प्रशासन में लागू करने का प्रयास किया। उसने सैन्य प्रशिक्षण में आधुनिक तकनीकों का प्रयोग किया और आधुनिक हथियारों के उत्पादन के लिए एक कारखाना भी स्थापित किया ।उसने अंग्रेजों और निजाम व मराठों की संयुक्त सेना के विरुद्ध तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध लड़ा  अंतत; उसे श्रीरंगपट्टनम की संधि  करनी पड़ी और संधि की शर्तों के तहत टीपू को अपना आधा राज्य अंग्रेजों और उनके सहयोगियों को देना पड़ा। चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799) के दौरान लड़ते हुए उसकी मृत्यु हो गयी।

टीपू सुल्तान से जुडी महत्वपूर्ण जानकारियाँ

1.  वह श्रंगेरी के जगतगुरु शंकराचार्य का महान प्रशंसक था और उसने मराठों द्वारा नष्ट की गयी देवी शारदा  की मूर्ति के निर्माण के लिए उन्हें धन प्रदान किया।

2.  उसकी आत्मकथा का नाम तारीख-ए-खुदाई  था।

3.  उसने फ़ताहुल मुजाहिदीन नाम से एक सैन्य पुस्तक भी लिखी जिसमे राकेट साइंस और राकेट ब्रिगेड से सम्बंधित जानकारी दी गयी है।

4.  उसने अपने पिता हैदर अली द्वारा प्रारंभ की गयी लाल बाग परियोजना (बैंगलोर) को पूरा किया और कावेरी नदी पर कृष्णराज सागर बांध का निर्माण कराया।

औरंगजेब की मौत और उत्तराधिकारी

मुग़ल उत्तराधिकारी

औरंगजेब की मृत्यु ने मुग़ल साम्राज्य के पतन की नींव डाली क्योंकि उसकी मृत्यु के पश्चात उसके तीनों पुत्रों-मुअज्जम,आज़म और कामबक्श के मध्य लम्बे समय तक चलने वाले उत्तराधिकार के युद्ध ने शक्तिशाली मुग़ल साम्राज्य को कमजोर कर दिया. औरंगजेब ने अपने तीनों पुत्रों को प्रशासनिक उद्देश्य से अलग अलग क्षेत्रों का गवर्नर बना दिया था,जैसे-मुअज्ज़म काबुल का,आज़म गुजरात और कामबक्श बीजापुर का गवर्नर था .इसी कारण इन तीनों के मध्य मतभेद पैदा हुए,जिसने उत्तराधिकार को लेकर गुटबंदी को जन्म दिया.औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तरवर्ती मुग़लों के मध्य होने वाले उत्तराधिकार-युद्ध का विवरण निम्नलिखित है-

मुअज्ज़म(1707-1712 ई.)

  • वह शाह आलम प्रथम के नाम से जाना जाता था, जिसे खफी खां ने ‘शाह-ए–बेखबर’ भी कहा है क्योंकि वह शासकीय कार्यों के प्रति बहुत अधिक लापरवाह था.  
  • वह अपने दो भाइयों की हत्या करने और कामबक्श को जाजऊ के युद्ध में हराने के बाद 1707 ई. में मुग़ल राजगद्दी पर बैठा.वह अपने शासकीय अधिकारों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने वाला अंतिम मुग़ल शासक था.
  • उसने सिक्खों एवं मराठों के साथ मधुर सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया.उसने इसीलिए मराठों को दक्कन की सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार दे दिया लेकिन चौथ वसूलने का अधिकार नहीं दिया.
  • मुअज्ज़म की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों- जहाँदार शाह ,अज़ीम-उस-शाह, रफ़ी-उस-शाह और जहाँशाह, के मध्य नए सिरे से उत्तराधिकार को लेकर युद्ध प्रारंभ हो गया

जहाँदार शाह(1712-1713 ई.)

  • उसने मुगल दरबार में ईरानी गुट के नेता जुल्फिकार खान के सहयोग से अपने तीन भाइयों की हत्या के बाद राजगद्दी प्राप्त की .
  • वह जुल्फिकार खान ,जो वास्तविक शासक के रूप में कार्य करता था ,के हाथों की कठपुतली मात्र था.यहीं से शासक निर्माताओ की संकल्पना का उदय हुआ .वह अपनी प्रेमिका लाल कुंवर के भी प्रभाव में था जोकि मुग़ल शासन पर नूरजहाँ के प्रभाव की याद दिलाता है .
  • उसने मालवा के जय सिंह को ‘मिर्जा राजा’ और मारवाड़ के अजित सिंह को ‘महाराजा’ की उपाधि प्रदान की.
  • उसके द्वारा मराठों को चौथ और सरदेशमुखी वसूलने के अधिकार प्रदान करने के कदम ने मुग़ल शासन के प्रभुत्व को कमजोर बनाने की शुरुआत की.
  • उसने इजारा पद्धति अर्थात् राजस्व कृषि/अनुबंध कृषि को बढावा दिया और जजिया कर को बंद किया.
  • वह प्रथम मुग़ल शासक था जिसकी हत्या सैय्यद बंधुओं-अब्दुल्लाह खान और हुसैन अली(जो हिन्दुस्तानी गुट के नेता थे) के द्वारा कैदखाने  में की गयी थी.

फर्रुखसियर(1713-1719 ई.)

  • वह ‘साहिद-ए-मजलूम’ के नाम से जाना जाता था और  अज़ीम-उस-शाह का पुत्र था.
  • वह  सैय्यद बंधुओं के सहयोग से मुग़ल शासक बना था.
  • उसने ‘निज़ाम-उल-मुल्क’ के नाम से मशहूर चिनकिलिच खान को दक्कन का गवर्नर नियुक्त किया,जिसने बाद में स्वतंत्र राज्य-हैदराबाद की स्थापना की .
  • उसके समय में ही पेशवा बालाजी विश्वनाथ मराठा-क्षेत्र पर सरदेशमुखी और चौथ बसूली के अधिकार को प्राप्त करने के लिया मुग़ल दरबार में उपस्थित हुए थे.

रफ़ी-उद-दरजात(1719 ई.)

  • वह कुछ महीनों तक ही शासन करने वाले मुग़ल शासकों में से  एक  था.
  • उसने निकुस्सियर के विद्रोह के दौरान आगरा के किले पर कब्ज़ा कर लिया और खुद को शासक घोषित कर दिया.

रफ़ी-उद-दौला(1719 ई.)

  • वह ‘शाहजहाँ द्वितीय’ के नाम से जाना जाता है.
  • उसके शासनकाल के दौरान ही अजित सिंह अपनी विधवा पुत्री को मुग़ल हरम से वापस ले गए थे और बाद में उसने हिन्दू धर्म अपना लिया .

मुहम्मद शाह(1719-1748 ई.)

  • उसका नाम रोशन अख्तर था जोकि प्रभाव-हीन और आराम-पसंद मुग़ल शासक था.अपनी आराम-पसंदगी की प्रवृत्ति के कारण ही वह ‘रंगीला’ नाम से भी जाना जाता था.
  • उसके शासनकाल के दौरान ही मराठों ने बाजीराव के नेतृत्व में ,मुग़ल इतिहास में पहली बार,  दिल्ली पर धावा बोला.
  • इसी के शासनकाल में फारस के नादिर शाह ने ,सादत खान की सहायता से ,दिल्ली पर आक्रमण किया और करनाल के युद्ध में मुग़ल सेना को पराजित किया.

अहमद शाह(1748-1754 ई.)

  • इसके शासनकाल के दौरान नादिरशाह के पूर्व सेनापति अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर पांच बार आक्रमण किया .
  • इसे इसी के वजीर इमाद-उल-मुल्क द्वारा शासन से अपदस्थ कर आलमगीर द्वितीय को नया शासक नियुक्त किया गया .

आलमगीर द्वितीय(1754-1759ई.)

  • वह ‘अजीजुद्दीन’ के नाम से जाना जाता था .
  • इसी के शासनकाल के दौरान प्लासी का युद्ध हुआ .
  • इसे इसी के वजीर इमाद-उल-मुल्क द्वारा शासन से अपदस्थ कर शाहआलम द्वितीय को नया शासक नियुक्त किया गया

शाहआलम द्वितीय(1759-1806.)

  •  ‘अली गौहर’ के नाम से प्रसिद्ध इस मुग़ल शासक की बक्सर के युद्ध (1764ई .)में हार हुई थी .
  • इसी के शासनकाल के दौरान पानीपत की तीसरा युद्ध हुआ .
  • बक्सर के युद्ध के बाद इलाहाबाद की संधि के तहत मुगलों द्वारा बंगाल ,बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार अंग्रेजो को दे दिए जिन्हें 1772 ई. के बाद महादजी सिंधिया के सहयोग से पुनः मुगलों ने प्राप्त किया .
  • वह प्रथम मुग़ल शासक था जो ईस्ट इंडिया कम्पनी का पेंशनयाफ्ता था .

अकबर द्वितीय(1806-1837ई.)

  • वह अंग्रेजो के संरक्षण में बनने वाला प्रथम मुग़ल बादशाह था.
  • इसके शासनकाल में मुग़ल सत्ता लालकिले तक सिमटकर रह गई .

बहादुरशाह द्वितीय( 1837-1862ई.)

  • वह अकबर द्वितीय और राजपूत राजकुमारी लालबाई का पुत्र एवम् मुग़ल साम्राज्य का अंतिम शासक था.
  • इसके शासनकाल के दौरान 1857 की क्रांति हुई और उसी के बाद इसे बंदी के रूप में रंगून निर्वासित कर दिया गया जहाँ 1862 ई.में इसकी मृत्यु हो गई.
  • वह ‘जफ़र’ उपनाम से बेहतरीन उर्दू शायरी लिखा करता था.

मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारण

मुग़ल साम्राज्य का पतन एकाएक न होकर क्रमिक रूप में हुआ था,जिसके प्रमुख कारण निम्नलिखित  थे-

  • साम्राज्य का बृहद विस्तार: इतने विस्तृत साम्राज्य पर सहकारी संघवाद के बिना शासन करना आसान नहीं था. अतः मुग़ल साम्राज्य अपने आतंरिक कारणों से ही डूबने लगा .
  • केंद्रीकृत प्रशासन:इतने वृहद् साम्राज्य को विकेंद्रीकरण और विभिन्न शासकीय इकाइयों के  आपसी सहयोग के आधार पर ही शासित किया जा सकता था.
  • औरंगजेब की नीतियाँ: उसकी धार्मिक नीति,राजपूत नीति और दक्कन नीति ने असंतोष को जन्म दिया जिसके कारण मुग़ल साम्राज्य का विघटन प्रारंभ हो गया.
  • उत्तराधिकार का युद्ध: उत्तराधिकार को लेकर लम्बे समय तक चलने वाले युद्धों ने मुग़लों की प्रशासनिक इकाइयों में दरार पैदा कर दी.
  • उच्च वर्ग की कमजोरी: मुग़ल उच्च वर्ग मुग़लों के प्रति अपनी वफ़ादारी के लिए जाना जाता था लेकिन उत्तराधिकार के युद्धों के कारण उनकी वफ़ादारी बंट गयी.

निष्कर्ष

अतः शक्तिशाली मुग़ल साम्राज्य औरंगजेब की मृत्यु के बाद पतन की ओर अग्रसर हुआ जिसमें जल्दी जल्दी होने वाले सत्ता परिवर्तनों और उत्तराधिकार के युद्धों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.

मुस्लिम सुधार आंदोलन

मुस्लिम सुधार आन्दोलन

19 वीं सदी के आरम्भ में मुस्लिम उद्बोधन के चिन्ह उत्तर प्रदेश में बरेली के सर सैय्यद अहमद खां और बंगाल के शरीयतुल्ला के नेतृत्व में उभरकर सामने आये|ऐसा ईसाई मिशनरियों,पश्चिमी विचारों के प्रभाव और आधुनिक शिक्षा के कारण संभव हो सका| उन्होंने स्वयं को इस्लाम के शुद्धिकरण व उसे मजबूत बनाने और इस्लामिक शिक्षाओं के प्रोत्साहन के लिए समर्पित कर दिया था|

शरीयतुल्ला ने बंगाल के फरायजी आंदोलन की शुरुआत की, जिसने कृषकों के हित में कई कदम उठाये थे| उन्होंने मुस्लिम समाज की जाति-व्यवस्था का तीव्र विरोध किया था|

शरीयतुल्ला ने बंगाल के फरायजी आंदोलन की शुरुआत की, जिसने कृषकों के हित में कई कदम उठाये थे| उन्होंने मुस्लिम समाज में प्रचलित जाति-व्यवस्था का तीव्र विरोध किया था| 19 वीं सदी के प्रथम पचास वर्षों के दौरान दिल्ली व कलकत्ता के कुछ मुट्ठी भर लोग ही अंग्रेजी शिक्षा हासिल कर पाए थे| अधिकांश मुस्लिमों ने स्वयं को अंग्रेजी शिक्षा से दूर ही रखा, जिसका कारण उलेमाओं व मुस्लिम काजियों का रवैया और उच्च मुस्लिम वर्ग की ब्रिटिश राज के साथ मेल-मिलाप बढाने के प्रति रूचि का न होना था| सन 1857 के विद्रोह में मुस्लिमों की सक्रिय भागीदारी ने ब्रिटिशों के मन में मुस्लिमों के प्रति असंतोष का भाव पैदा कर दिया|

फिर भी जागृत और शिक्षित मुस्लिमों का एक हिस्सा के नाते शरीयतुल्ला ने शासकों के प्रति सहयोगपूर्ण नीति को अपनाने और ब्रिटिशों की सहायता से मुस्लिम समाज की सामाजिक स्थिति में सुधार लाने की जरुरत महसूस की| आधुनिक शिक्षा के प्रसार और पर्दा व बहुविवाह जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए कुछ आन्दोलन भी चलाये गए थे| नवाब अब्दुल लतीफ़ (1828-1893) द्वारा 1863 ई. में स्थापित कलकत्ता की मोहम्मदन लिटरेसी सोसाइटी उन कुछेक प्रारंभिक संस्थाओं में से एक थी जिसने इस दिशा में कदम बढाये थे|इसने शिक्षा के प्रसार,विशेष रूप से बंगाल के मुस्लिमों के बीच,के साथ साथ हिन्दू-मुस्लिम एकता को भी बढावा दिया|

वहाबी आन्दोलन

इसे ‘वलीउल्लाह आन्दोलन’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसकी शुरुआत पश्चिमी प्रभावों की प्रतिक्रियास्वरुप हुई थी| यह आन्दोलन शाह वलीउल्लाह, जिन्हें प्रथम भारतीय मुस्लिम नेता भी माना जाता है, की शिक्षाओं से प्रेरित था| यह पूरा का पूरा आन्दोलन कुरान और हदीस की शिक्षाओं पर आधारित था|

अहमदिया आन्दोलन

इस आन्दोलन की शुरुआत मिर्ज़ा गुलाम अहमद द्वारा 1889 ई. में भारतीय मुसलमानों के बीच पश्चिमी शिक्षा के प्रसार के उद्देश्य से की गयी थी|यह आन्दोलन,ब्रहम समाज के समान,उदारवादी मूल्यों पर आधारित था|

देवबंद स्कूल

यह उदारवादी आन्दोलन के विरोध में कुछ रूढ़िवादी मुस्लिम उलेमाओं द्वारा शुरू किया गया आन्दोलन था जोकि कुरान और हदीस के आधार पर इस्लाम के वास्तविक सार की शिक्षा देना चाहता था और इन्होने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जिहाद की संकल्पना का भी प्रतिपादन किया|

निष्कर्ष

19वीं सदी न केवल हिन्दू-मुस्लिम बल्कि देश के संपूर्ण समाज के लिए जागरण का काल थी| इस काल में सभी धर्मों में धर्म के नाम पर प्रचलित कुप्रथाओं को दूर करने के लिए अनेक सुधारक सामने आये और भारतीय संस्कृति व दर्शन की महानता का प्रतिपादन किया| राष्ट्रीय गौरव, आत्म-सम्मान, आत्म-निर्भरता जैसे विचारों का प्रचार-प्रसार किया गया|

माउंटबेटन योजना औऱ भारत विभाजन

माउंटबेटन योजना और भारत के विभाजन

लॉर्ड माउंटबेटन, भारत के विभाजन और सत्ता के त्वरित हस्तांतरण के लिए भारत आये। प्रारम्भ में यह सत्ता हस्तांतरण विभाजित भारत की भारतीय सरकारों को डोमिनियन के दर्जे के रूप में दी जानी थीं। 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने अपनी योजना प्रस्तुत की जिसमे भारत की राजनीतिक समस्या को हल करने के विभिन्न चरणों की रुपरेखा प्रस्तुत की गयी थी। प्रारम्भ में यह सत्ता हस्तांतरण विभाजित भारत की भारतीय सरकारों को डोमिनियन के दर्जे के रूप में दी जानी थीं।

माउंटबेटन योजना

• भारत को भारत और पाकिस्तान में विभाजित किया जायेगा

• बंगाल और पंजाब का विभाजन किया जायेगा और उत्तर पूर्वी सीमा प्रान्त और असम के सिलहट जिले में जनमत संग्रह कराया जायेगा।

• पाकिस्तान के लिए संविधान निर्माण हेतु एक पृथक संविधान सभा का गठन किया जायेगा।

• रियासतों को यह छूट होगी कि वे या तो पाकिस्तान या भारत में सम्मिलित हो जाये या फिर खुद को स्वतंत्र घोषित कर दें।

• भारत और पाकिस्तान को सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त 1947 का दिन नियत किया गया।

ब्रिटिश सरकार ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 को जुलाई 1947 में पारित कर दिया। इसमें ही वे प्रमुख प्रावधान शामिल थे जिन्हें माउंटबेटन योजना द्वारा आगे बढ़ाया गया था|

विभाजन और स्वतंत्रता

• सभी राजनीतिक दलों ने माउंटबेटन योजना को स्वीकार कर लिया|

• सर रेडक्लिफ की अध्यक्षता में दो आयोगों का ब्रिटिश सरकार ने गठन किया जिनका कार्य विभाजन की देख-रेख और नए गठित होने वाले राष्ट्रों की अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं को निर्धारित करना था|

• स्वतंत्रता के समय भारत में 562 छोटी और बड़ी रियासतें थीं

• भारत के प्रथम गृहमंत्री बल्लभभाई पटेल ने इस सन्दर्भ में कठोर नीति का पालन किया| 15 अगस्त 1947 तक जम्मू कश्मीर, जूनागढ़ व हैदराबाद जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर सभी रियासतों ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे| गोवा पर पुर्तगालियों और पुदुचेरी पर फ्रांसीसियों का अधिकार था|

निष्कर्ष

माउंटबेटन योजना, केवल भारत के विभाजन को कार्यरूप देने के लिए ही नहीं थी बल्कि पाकिस्तान की मांग द्वारा प्रभावित क्षेत्रों के लिए एक तंत्र की स्थापना की| यह तय किया कि पाकिस्तान में शामिल होने वाले क्षेत्रों का निर्णय विधान सभा के प्रतिनिधियों द्वारा किया जायेगा या फिर जनमत-संग्रह द्वारा साथ ही कैबिनेट मिशन के अनुरूप एक ही संविधान सभा होगी या फिर नए गठित राष्ट्र के लिए अलग से संविधान सभा बनायी जाएगी| अतः हम कह सकते है कि माउंटबेटन योजना का मुख्य उद्देश्य भारत का विभाजन और सत्ता का  त्वरित हस्तांतरण था। प्रारम्भ में यह सत्ता हस्तांतरण विभाजित भारत की भारतीय सरकारों को डोमिनियन के दर्जे के रूप में दी जानी थीं।

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...