1906 मुस्लिम लीग की स्थापना

मुस्लिम लीग की स्थापना

बंगाल के विभाजन ने सांप्रदायिक विभाजन को भी जन्म दे दिया| 30 दिसंबर,1906 को ढाका के नवाब आगा खां और नवाब मोहसिन-उल-मुल्क  के नेतृत्व में भारतीय मुस्लिमों के अधिकारों की रक्षा के लिए मुस्लिम लीग का गठन किया गया| प्रारंभ में इसे ब्रिटिशों द्वारा काफी सहयोग मिला लेकिन जब इसने स्व-शासन के विचार को अपना लिया,तो ब्रिटिशों से मिलने वाला सहयोग समाप्त हो गया|1908 में लीग के अमृतसर अधिवेशन में सर सैय्यद अली इमाम की अध्यक्षता में मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की गयी जिसे ब्रिटिशों ने 1909 के मॉर्ले-मिन्टो सुधारों द्वारा पूरा कर दिया|मौलाना मुहम्मद अली ने अपने लीग विरोधी विचारों का प्रचार-प्रसार करने के लिए  अंग्रेजी जर्नल ‘कामरेड’  और उर्दू पत्र ‘हमदर्द’  को प्रारंभ किया| उन्होंने ‘अल-हिलाल’ की भी शुरुआत की जोकि उनके राष्ट्रवादी विचारों का मुखपत्र था|

मुस्लिम लीग को प्रोत्साहित करने वाले कारक

• ब्रिटिश योजना- ब्रिटिश भारतीयों को साम्प्रदायिक आधार पर बाँटना चाहते थे और इसीलिए उन्होंने भारतीय राजनीति में विभाजनकारी प्रवृत्ति का समावेश किया,इसका प्रमाण पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था करना  और ब्राह्मणों व गैर-ब्राह्मणों के बीच जातिगत राजनीति का खेल खेलना थे|

• शिक्षा का अभाव-मुस्लिम पश्चिमी व तकनीकी शिक्षा से अछूते थे|

• मुस्लिमों की संप्रभुता का पतन-1857 की क्रांति ने ब्रिटिशों को यह सोचने पर मजबूर किया कि मुस्लिम उनकी औपनिवेशिक नीतियों के लिए खतरा हो सकते है क्योकि मुग़ल सत्ता को हटाकर ही उन्होंने अपने शासन की नींव रखी थी|

• धार्मिक भावनाओं की अभिव्यक्ति-अधिकतर इतिहासकारों और उग्र-राष्ट्रवादियों ने भारतीय सामासिक संस्कृति के एक पक्ष को ही महिमामंडित किया| उन्होंने शिवाजी,राणा प्रताप आदि की तो प्रशंसा की लेकिन अकबर,शेरशाह सूरी,अलाउद्दीन खिलजी,टीपू सुल्तान आदि के बारे  में मौन बने रहे|

• भारत का आर्थिक पिछड़ापन- औद्योगीकीकरण के अभाव में बेरोजगारी ने भीषण रूप धारण कर लिया था और घरेलु उद्योगों के प्रति ब्रिटिशों का रवैया दयनीय था|

लीग के गठन के उद्देश्य

• भारतीय मुस्लिमों में ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा को प्रोत्साहित करना

• भारतीय मुस्लिमों के राजनीतिक व अन्य अधिकारों की रक्षा करना और उनकी जरुरतों व उम्मीदों को सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना

• मुस्लिमों में अन्य समुदायों के प्रति विरोध भाव को कम करना

1924 मुडिमैन समिति

मुडीमैन समिति (1924)

भारतीय नेताओं की मांगों को पूरा करने और 1920 के दशक के आरंभिक वर्षों में स्वराज पार्टी द्वारा स्वीकृत किये गए प्रस्ताव को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश सरकार ने सर अलेक्जेंडर मुडीनमैन की अध्यक्षता में एक समिति,जिसे मुडीनमैन समिति के नाम से भी जाना जाता है,गठित की| समिति में ब्रिटिशों के अतिरिक्त चार भारतीय सदस्य भी शामिल थे| भारतीय सदस्यों में निम्नलिखित शामिल थे-

a. सर शिवास्वामी अय्यर,

b. डॉ.आर.पी.परांजपे,

c. सर तेज बहादुर सप्रे

d. मोहम्मद अली जिन्ना

इस समिति के गठन के पीछे का कारण भारतीय परिषद् अधिनियम,1919 के तहत 1921 में स्थापित संविधान और द्वैध शासन प्रणाली की कामकाज की समीक्षा करना था| इस समिति की रिपोर्ट को 1925 में प्रस्तुत किया गया जो दो भागों में विभाजित थी-अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक रिपोर्ट|

• बहुसंख्यक/बहुमत रिपोर्ट: इसमें सरकारी कर्मचारी और निष्ठावान लोग शामिल थे| इन्होने घोषित किया कि द्वैध शासन स्थापित नहीं हो सका है | उनका यह भी मानना था कि प्रणाली को सही तरह से मौका नहीं दिया गया है अतः केवल छोटे-मोटे बदलावों की अनुशंसा की|

• अल्पसंख्यक/अल्पमत रिपोर्ट: इसमें केवल गैर-सरकारी भारतीय शामिल थे | इसका मानना था कि 1919 का एक्ट असफल साबित हुआ है| इसमें यह भी बताया गया कि स्थायी और भविष्य की प्रगति को स्वयं प्रेरित करने वाले संविधान में क्या क्या शामिल होना चाहिए|

अतः इस समिति ने शाही आयोग/रॉयल कमीशन की नियुक्ति की सिफारिश की| भारत सचिव लॉर्ड बिर्केनहेड ने कहा कि बहुमत/बहुसंख्यक की रिपोर्ट के आधार पर कदम उठाये जायेंगे|

1935 का भारत सरकार अधिनियम जो बाद में आजाद भारत का संविधान बना

भारत सरकार अधिनियम - 1935

भारत सरकार अधिनियम -1935 ब्रिटिश संसद द्वारा अगस्त,1935 में भारत शासन हेतु पारित किया सर्वाधिक विस्तृत अधिनियम था| इसमें वर्मा सरकार अधिनियम-1935 भी शामिल था| भारत सरकार अधिनियम-1935  में यह अधिकथित था कि,यदि आधे भारतीय राज्य संघ में शामिल होने के लिए सहमत होते है तो, भारत को एक संघ बनाया जा सकता है| इस स्थिति में उन्हें केंद्रीय विधायिका के दोनों सदनों में अधिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया जायेगा, लेकिन संघ से सम्बंधित प्रावधानों को लागू नहीं किया जा सका| इस अधिनियम में स्वतंत्रता की बात तो दूर , भारत को डोमिनियन का दर्जा देने की भी कोई चर्चा नहीं की गयी थी|

1935 के अधिनियम ने प्रान्तों की तत्कालीन स्थिति में सुधार किया था क्योंकि इसमें प्रांतीय स्वायत्तता  के प्रावधान को शामिल किया गया था| इस व्यवस्था के अनुसार प्रांतीय सरकारों के मंत्रियों को विधायिका के प्रति उत्तरदायी बनाया गया, साथ ही विधायिका के अधिकारों में वृद्धि भी की गयी| हालाँकि पुलिस जैसे कुछ विषय अभी भी सरकार के प्राधिकार में ही थे| मतदान के अधिकार भी सीमित ही रहे क्योंकि अभी भी कुल जनसंख्या के 14% भाग को ही मतदान करने का अधिकार प्राप्त था| गवर्नर जनरल और गवर्नरों की नियुक्ति अभी भी ब्रिटिश सरकार के द्वारा की जाती थी और वे विधायिका के प्रति उत्तरदायी भी नहीं थे| यह अधिनियम कभी भी उन उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर पाया जिनकी प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय आन्दोलन संघर्ष कर रहा था|

अधिनियम के प्रावधान

• इस अधिनियम ने द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त किया|

• ब्रिटिश भारत और कुछ या सभी रियासतों के लिए भारत संघ की स्थापना का प्रयास किया|

• प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की स्थापना की और मत देने के अधिकार का विस्तार किया गया और 35 मिलियन लोगों को मत देने का अधिकार प्रदान कर दिया|

• प्रान्तों को भी आंशिक रूप से पुनर्संगठित किया|

• सिंध प्रान्त को बम्बई से अलग कर दिया गया|

• बिहार एवं उड़ीसा प्रांत को बिहार और उड़ीसा नाम के दो अलग-अलग प्रान्तों में बाँट दिया गया|

• बर्मा को भारत से पूर्णतः अलग कर दिया गया|

• अदन को भी भारत से अलग कर एक स्वतंत्र उपनिवेश बना दिया|

• प्रांतीय सदनों की सदस्यता में भी बदलाव किया गया ताकि और अधिक निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों को उसमें शामिल किया जा सके| अब ये भारतीय सदस्य बहुमत प्राप्त कर सरकार भी बना सकते थे|

• संघीय न्यायालय की स्थापना की गयी|

निष्कर्ष

इस अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य भारत सरकार को ब्रिटिश सम्राट के अधीन लाना था| अतः भारत सरकार के अधिकारों का स्रोत ब्रिटिश सम्राट था| यह संकल्पना ,जोकि डोमिनियन संविधान से मिलती-जुलती थी, पूर्व में पारित किये गए भारतीय अधिनियमों में अनुपस्थित थी|

हालाँकि 1935 के अधिनियम में प्रांतीय स्वंत्रता जैसे कुछ उपयोगी और महत्वपूर्ण सुधार शामिल थे लेकिन फिर भी भारत सरकार अधिनियम-1935 भारत के संवैधानिक विकास के इतिहास का वह बिंदु था जहाँ से पीछे की ओर नहीं लौटा जा सकता था|

19 वी सदी और भारत में ब्रिटिश शासन

ब्रिटिश शासन में सामाजिक अधिनियम

19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिशों की नीतियों ने हालाँकि तत्कालीन सामाजिक समाज में व्याप्त बुराइयों के उन्मूलन में सहयोग दिया लेकिन धीरे-धीरे भारत की सामाजिक-धार्मिक बुनावट को कमजोर करने का कार्य भी किया क्योकि वे मुख्यतः अंग्रेजी सोच व समझ पर आधारित थीं|
प्राच्यवाद के व्याख्याताओं ने कहा कि भारतीय समाज को आधुनिकीकरण और पश्चिमीकरण की आवश्यकता है|उन्हें अनेक विचारधाराओं की तीव्र आलोचना का सामना करना पड़ा|विलियम विल्बरफोर्स व चार्ल्स ग्रांट जैसे व्यक्तियों के अनुसार ‘भारतीय समाज अंधविश्वासों,मूर्ति पूजा व पुजारियों की तानाशाही से भरा पड़ा है|’
उन्होंने भारत का आधुनिकीकरण ईसाई मिशनरियों के माध्यम से करना चाहा | ब्रिटिशों ने भारत के सामाजिक व्यवहारों में अनेक परिवर्तन किये| ब्रिटिशों ने महिलाओं की स्थिति को सुधारने और अनेक सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाये-
बालिका भ्रूण हत्या:यह प्रथा उच्च वर्ग के बंगालियों व राजपूतों, जोकि महिलाओं को आर्थिक बोझ मानते थे, में बहुत प्रचलित थी| अतः भारतीय समाज की सोच में सुधार लाने के क्रम में 1795 व 1804 के बंगाल रेगुलेशन एक्ट ने बालिका शिशु की हत्या को अवैध घोषित किया और 1870 में बालिका शिशु हत्या पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए एक अधिनियम भी पारित किया गया था| इस अधिनियम के द्वारा माता-पिता द्वारा सभी बच्चों के जन्म का पंजीकरण कराना अनिवार्य बना दिया गया और बालिका शिशु के सन्दर्भ में जन्म के बाद के कुछ वर्षों तक भी निगरानी  रखने की व्यवस्था थी| इसे वैसे क्षेत्रों में विशेष रूप से लागू किया गया जहाँ यह प्रथा अधिक प्रचलन में थी|
सती प्रथा की समाप्ति: यह राजा राममोहन राय के प्रयासों से प्रभावित था| ब्रिटिश सरकार ने सती प्रथा या विधवा स्त्री को जिन्दा जलाने की प्रथा को समाप्त करने का निर्णय लिया और इसे आपराधिक हत्या घोषित कर दिया|1829 का सती प्रथा उन्मूलन कानून पहले बंगाल तक सीमित था लेकिन 1830  में उसे कुछ संसोधनों के साथ मद्रास व बम्बई प्रेसिडेसियों में भी लागू कर दिया गया|
दास प्रथा का उन्मूलन: यह एक अन्य कुप्रथा थी जो ब्रिटिशों की नजर में आई और उन्होंने 1833 के चार्टर अधिनियम द्वारा भारत में दास प्रथा को समाप्त कर दिया तथा 1843 के पांचवे एक्ट द्वारा इस प्रथा को क़ानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया और गैर-क़ानूनी घोषित किया गया|
विधवा पुनर्विवाह: ब्रहम समाज ने इसे सर्वाधिक महत्व प्रदान किया और लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया| विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक महिला कॉलेज,विश्वविद्यालय ,संगठनों की स्थापना की गयी और वैदिक युग से विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में प्रमाण जुटाए गए |
बाल विवाह पर रोक: 1872 का नेटिव मैरिज एक्ट (सिविल मैरिज एक्ट) इसे रोकने के उद्देश्य से ही लाया गया था लेकिन वह अधिक प्रभावी नहीं रहा क्योकि वह हिन्दू,मुस्लिम व अन्य कई धर्मों पर लागू नहीं होता था|1891 ई. में बी.एम.मालाबारी के प्रयासों से एज ऑफ़ कंसेंट एक्ट पारित किया गया और 12 वर्षा से कम उम्र की लड़की के विवाह पर रोक लगा दी गयी| अंततः स्वतंत्रता के बाद बाल विवाह निरोध (संशोधन) अधिनियम द्वारा इसमें बदलाव किया गया और विवाह की आयु लड़की के लिए 18 वर्ष व लड़के के लिए 21 वर्ष निर्धारित की गयी|

1927 की बटलर समिति

बटलर समिति (1927 ई.)

भारतीय राज्य समिति ने सर हार्टकोर्ट बटलर की अध्यक्षता में 1927 में एक समिति गठित की, जिसे बटलर समिति भी कहा जाता है| इस समिति का गठन परमसत्ता और देशी राजाओं के बीच के संबंधों की जांच और स्पष्टीकरण के लिया किया गया था| समिति ने 16 राज्यों का दौरा किया और 1929 में अपनी रिपोर्ट दाखिल की|

समिति की अनुशंसाएं

• परमसत्ता और राज्यों के बीच के सम्बन्ध केवल समझौता भर नहीं है बल्कि जीवित और वृद्धिशील सम्बन्ध हैं,जिनका निर्धारण परिस्थितियों और नीतियों के तहत हुआ है जिसमे इतिहास और सिद्धांत भी शामिल है|

• ब्रिटिश परमसत्ता रियासतों की रक्षा करती है|

• राज्य का स्थानांतरण स्वयं उनके समझौते के बिना भारतीय विधायिका के प्रति उत्तरदायी ब्रिटिश भारत की नयी सरकार को नहीं करना चाहिए|

निष्कर्ष

इसके गठन के उद्देश्य परमसत्ता और भारतीय राजाओं के मध्य के संबंधों की जाँच करना और उनके मध्य के इन संबंधों की बेहतरी के लिए सुझाव देना था ताकि ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों के बीच संतोषजनक संबंधों की स्थापना की जा सके|

1764 बकसर (बिहार) की लड़ाई

बक्सर की लड़ाई

बक्सर का युद्ध बंगाल के नवाब मीर कासिम,अवध के नवाब सुजाउद्दौला व मुग़ल शासक शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना और अंग्रेजों के मध्य लड़ा गया था | यही वह निर्णायक युद्ध था जिसने अंग्रेजों को अगले दो सौ वर्षों के लिए भारत के शासक के रूप में स्थापित कर दिया| यह युद्ध अंग्रेजों द्वारा फरमान और दस्तक के दुरुपयोग और उनकी विस्तारवादी व्यापारिक आकांक्षाओं का परिणाम था|

22 अक्टूबर,1764 ई.   को लड़े गए बक्सर के युद्ध में संयुक्त भारतीय सेना की पराजय हुई| बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई |1765 ई. में सुजाउद्दौला और शाह आलम ने इलाहाबाद में कंपनी गवर्नर क्लाइव के साथ संधि पर हस्ताक्षर किये| इस संधि के तहत,कंपनी को बंगाल,बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार प्रदान कर दिए गए, जिसने कंपनी को इन क्षेत्रों से राजस्व वसूली के लिए अधिकृत कर दिया|कंपनी ने अवध के नवाब से कड़ा और इलाहाबाद के क्षेत्र लेकर मुग़ल शासक को सौंप दिए,जोकि अब इलाहाबाद में अंग्रेजी सेना के संरक्षण में रहने लगा था|कंपनी ने मुगल शासक को प्रतिवर्ष 26 लाख रुपये के भुगतान का वादा किया लेकिन थोड़े समय बाद ही कंपनी द्वारा इसे बंद कर दिया गया|कंपनी ने नवाब को किसी भी आक्रमण के विरुद्ध सैन्य सहायता प्रदान करने का वादा किया लेकिन इसके लिए नवाब को भुगतान करना होगा|अतः अवध का नवाब कंपनी पर निर्भर हो गया| इसी बीच मीर जाफर को दोबारा बंगाल का नवाब बना दिया गया| उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र को नवाब की गद्दी पर बैठाया गया| कंपनी के अफसरों ने नवाब से धन ऐंठ कर व्यक्तिगत रूप से काफी लाभ कमाया|

युद्ध के लिए जिम्मेदार घटनाएँ

  • ब्रिटिशों द्वारा दस्तक और फरमान का दुरुपयोग,जिसने मीर कासिम के प्राधिकार और प्रभुसत्ता को चुनौती दी
  • ब्रिटिशों के आतंरिक व्यापार पर सभी तरह के शुल्कों की समाप्ति
  • कंपनी के कर्मचारियों का दुर्व्यवहार : उन्होंने भारतीय दस्तकारों, किसानोंऔर व्यापारियों को अपना माल सस्ते में बेचने के लिए बाध्य किया और रिश्वत व उपहार लेने की परंपरा की भी शुरुआत कर दी|
  • ब्रिटिशों का लुटेरों जैसा व्यवहार जिसने न केवल व्यापार के नियमों का उल्लंघन किया बल्कि नवाब के प्राधिकार को भी चुनौती दी|

निष्कर्ष

बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई | ब्रिटिशों की रूचि तीन तटीय क्षेत्रों कलकत्ता ,बम्बई और मद्रास में अधिक थी| अंग्रेजों व फ्रांसीसियों के बीच लड़े  गए कर्नाटक युद्ध ,प्लासी के युद्ध और बक्सर के युद्ध ने भारत में ब्रिटिश सफलता के दौर को प्रारंभ कर दिया|1765 ई. तक ब्रिटिश बंगाल,बिहार और उड़ीसा के वास्तविक शासक बन गए| अवध और कर्नाटक के नवाब(जिसे उन्होंने ही नवाब बनाया था) उन पर निर्भर हो गए|

1717 में बंगाल(बांग्लादेश भी शामिल)

बंगाल

औरंगजेब द्वारा मुर्शिद कुली खां को बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया था। गवर्नर मुर्शिद कुली खां (1717-1727 ई.) ने बंगाल की राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित कर दी। उसने अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजस्व वसूली को रोककर अपने राज्य के हितों की रक्षा का प्रयास किया। उसका दामाद शुजाउद्दीन खां उसका उत्तराधिकारी बना जिसने बिहार के सूबे  को बंगाल राज्य में मिला लिया। मुर्शिद कुली खां और उसके उत्तराधिकारी नवाबों द्वारा बंगाल, बिहार और उड़ीसा का प्रशासन स्वतंत्र शासकों की तरह किया गया फिर भी उन्होंने मुग़ल शासक को राजस्व भेजना जारी रखा। बंगाल के नवाबों का विवरण निम्नलिखित है-

  • मुर्शिद कुली खां  को औरंगजेब द्वारा बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया था। उसने अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजस्व वसूली को रोककर अपने राज्य के हितों की रक्षा का प्रयास किया।
  • शुजाउद्दीन खां  जो मुर्शिद कुली खां का दामाद था ,उसका उत्तराधिकारी बना और उसने बिहार के सूबे  को बंगाल राज्य में मिला लिया।
  • सरफराज खां  ,जो शुजा का पुत्र था , ने आलम-उद-दौला हैदर जंग की उपाधि धारण की ।
  • अली बर्दी खां  ने मुग़ल शासक को दो करोड़ रुपये का भुगतान कर फरमान प्राप्त किया और अपने शासन को वैधानिक आधार प्रदान किया। उसने अपनी सबसे छोटी पुत्री के पुत्र सिराज-उद-दौला  को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया ।
  • सिराज-उद-दौला  ने कलकत्ता में अंग्रेजों को अपनी फैक्ट्रियों की किलेबंदी करने से रोका लेकिन अंग्रेजों द्वारा उसके आदेश को न मानने के परिणामस्वरूप अंग्रेजों और सिराज-उद-दौला के मध्य प्लासी का युद्ध लड़ा गया।
  • मीर कासिम ने बर्दवान,मिदनापुर  और चिटगांव की जमींदारी अंग्रेजों को सौंप दी। उसने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए अनेक राजस्व और सैन्य सुधारों को लागू किया ।
  • मीर जाफर ने बंगाल,बिहार और उड़ीसा में मुक्त व्यापार करने का अधिकार और चौबीस परगना की ज़मींदारी  ब्रिटिशों को प्रदान कर दी। मीर कासिम से युद्ध प्रारंभ होने के बाद 1763 ई.में उसे ब्रिटिशों द्वारा दुबारा गद्दी पर बिठाया गया।
  • नज़्म-उद-दौला  मीर जाफर का पुत्र था और द्वैध शासनकाल के दौरान अंग्रेजों के हाथों की  कठपुतली मात्र था।

निष्कर्ष

औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य के पतन के साथ ही बंगाल मुर्शिद कुली खां के नेतृत्व  से स्वतंत्र हो गया। मुर्शिद कुली खां ने अपनी योग्य प्रबंधन क्षमता के द्वारा बंगाल को समृद्धता के शिखर तक पहुँचाया।

पिट्स इंडिया एक्ट 1784

पिट्स इंडिया एक्ट 1784

1773 ई. के रेग्युलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने और कंपनी के भारतीय क्षेत्रों के प्रशासन को अधिक सक्षम और उत्तरदायित्वपूर्ण बनाने के लिये अगले एक दशक के दौरान जाँच के कई दौर चले और ब्रिटिश संसद द्वारा अनेक कदम उठाये गए|

इनमें सबसे महत्पूर्ण कदम 1784 ई. में पिट्स इंडिया एक्ट को पारित किया जाना था,जिसका नाम ब्रिटेन के तत्कालीन  युवा प्रधानमंत्री विलियम पिट के नाम पर रखा गया था| इस अधिनियम द्वारा ब्रिटेन में बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल की स्थापना की गयी जिसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार भारत में कंपनी के नागरिक,सैन्य और राजस्व सम्बन्धी कार्यों पर पूर्ण नियंत्रण रखती थी|

अभी भी भारत के साथ व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार बना रहा और उसे कंपनी के अधिकारीयों को नियुक्त करने  या हटाने का अधिकार प्राप्त था |अतः ब्रिटिश  भारत पर ब्रिटिश सरकार और कंपनी दोनों के शासन अर्थात द्वैध शासन की स्थापना की गयी|

गवर्नर जनरल को महत्वपूर्ण मुद्दों पर परिषद् के निर्णय को न मानने की शक्ति प्रदान की गयी| मद्रास व बम्बई प्रेसीड़ेंसी को उसके अधीन कर दिया गया और उसे भारत में ब्रिटिश सेना,कंपनी और ब्रिटिश सरकार दोनों की सेना,का सेनापति बना दिया गया |

1784 ई. के एक्ट द्वारा स्थापित सिद्धांतों ने भारत में ब्रिटिश प्रशासन का आधार तैयार किया | सेना,पुलिस,नागरिक सेवा और न्यायालय वे प्रमुख एजेंसियां/निकाय थी जिनके माध्यम से गवर्नर जनरल शक्तियों का प्रयोग और उत्तरदायित्वों का निर्वाह करता था| कंपनी की सेना में एक बड़ा भाग भारतीय सैनिकों का भी था जिसका आकार ब्रिटिश क्षेत्र के विस्तार के साथ बढता गया और एक समय इन सिपाहियों की संख्या लगभग 200,000 हो गयी थी| इन्हें नियमित रूप से वेतन प्रदान किया जाता था और अत्याधुनिक हथियारों के प्रयोग हेतु प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता था| भारतीय शासकों के यहाँ नौकरी करने वाले सैनिकों को प्रायः ये सुविधाएँ प्राप्त नहीं थीं| आगे चलकर एक के बाद एक सफलता प्राप्त  करने के कारण कंपनी की सेना के सम्मान में वृद्धि होती गयी जिसने नए रंगरूटों को इसकी ओर आकर्षित किया| लेकिन सेना के सभी अफसर यूरोपीय थे| भारत में कंपनी की सेना के अतिरिक्त ब्रिटिश सैनिकों की भी उपस्थिति थी|

हालाँकि कंपनी की सेना में नियुक्त भारतीय सैनिकों ने अत्यधिक सक्षम होने की ख्याति अर्जित की थी ,लेकिन वे औपनिवेशिक शक्ति के भाड़े के सैनिक मात्र थे क्योकि न तो उनमे वह गर्व की भावना थी जो किसी भी राष्ट्रीय सेना के सैनिक को उत्साह प्रदान करती है और न ही पदोन्नति के बहुत अधिक अवसर उन्हें प्राप्त थे| इन्हीं कारकों ने कई बार उन्हें विद्रोह करने के लिए उकसाया जिनमें सबसे महान विद्रोह 1857 का विद्रोह था|

पिट्स इंडिया एक्ट में एक प्रावधान विजयों की नीति पर रोक लगाने से भी सम्बंधित था लेकिन उस प्रावधान को नज़रअंदाज़ कर दिया गया क्योंकि ब्रिटेन के आर्थिक हितों ,जैसे ब्रिटेन की फैक्ट्रियों से निकलने वाले तैयार माल के लिए बाज़ार बनाने और  कच्चे माल के नए स्रोतों की खोज करने, के लिए नए क्षेत्रों पर विजय प्राप्त करना जरूरी था| साथ ही इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए नए विजित क्षेत्रों पर जल्द से जल्द कानून-व्यवस्था की स्थापना करना भी आवश्यक था| अतः एक नियमित पुलिस बल की व्यवस्था की गयी ताकि कानून एवं व्यवस्था को बनाये रखा जाये|

कार्नवालिस के समय में इस बल को एक नियमित रूप प्रदान किया गया |1791 ई. में कलकत्ता के लिए पुलिस अधीक्षक की नियुक्ति की गयी और जल्दी ही अन्य शहरों में भी कोतवालों की नियुक्त किया गया |जिलों  को थानों में विभाजित किया गया और प्रत्येक थाने का प्रभार एक दरोगा को सौंपा गया|गावों के वंशानुगत पुलिस कर्मचारियों को चौकीदार बना दिया गया | बाद में जिला पुलिस अधीक्षक का पद सृजित किया गया |

हालाँकि पुलिस ने कानून एवं व्यवस्था की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन वह कभी भी लोकप्रिय नहीं बन पाई बल्कि उसने भ्रष्टाचार और सामान्य जनता को तंग करने की प्रवृत्ति के कारण बदनामी ही अर्जित की |अतः यह पूरे देश में सरकारी प्राधिकार का प्रतीक बन गयी| इसके निचले दर्जे के सिपाही को बहुत ही कम वेतन दिया जाता था सेना की ही तरह यहाँ भी उच्च पदों पर केवल यूरोपीय व्यक्ति को नियुक्त किया जाता था|

निष्कर्ष

यह एक्ट इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है कि इसने कंपनी की गतिविधियों और प्रशासन के सम्बन्ध में ब्रिटिश सरकार को सर्वोच्च नियंत्रण शक्ति प्रदान कर दी | यह पहला अवसर था जब कंपनी के अधीन क्षेत्रों को ब्रिटेन के अधीन क्षेत्र कहा गया|

फ्रांस उपनिवेश

फ्रांसीसी उपनिवेश की स्थापना

भारत आने वाले अंतिम यूरोपीय व्यापारी फ्रांसीसी थे। फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1664 ई में लुई सोलहवें के शासनकाल में भारत के साथ व्यापार करने के उद्देश्य से की गयी थी। फ्रांसीसियों ने 1668 ई में सूरत में पहली फैक्ट्री स्थापित की और 1669 ई में मसुलिपत्तनम में एक और फैक्ट्री स्थापित की।1673 ई में बंगाल के मुग़ल सूबेदार ने फ्रांसीसियों को चन्द्रनगर में बस्ती बनाने की अनुमति प्रदान कर दी।

पोंडिचेरी और फ्रांसीसी वाणिज्यिक वृद्धि: 1674 ई में  फ्रांसीसियों ने बीजापुर के सुल्तान से पोंडिचेरी नाम का गाँव प्राप्त किया और एक सम्पन्न शहर की स्थापना की जो बाद में भारत में फ्रांसीसियों का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। धीरे धीरे फ़्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी ने माहे,कराइकल, बालासोर और कासिम बाज़ार में अपनी व्यापारिक बस्तियां स्थापित कर लीं। फ्रांसीसियों का भारत आने का प्रमुख उद्देश्य व्यापर एवं वाणिज्य था।  भारत आने से लेकर 1741 ई तक फ्रांसीसियों का प्रमुख उद्देश्य ,ब्रिटिशों के समान,पूर्णतः वाणिज्यिक ही था। फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1723 ई में यनम, 1725 ई में मालाबार तट पर माहे और 1739 ई में कराइकल पर कब्ज़ा कर लिया।

फ्रांसीसियों के राजनीतिक उद्देश्य और महत्वाकांक्षा: समय के गुजरने के साथ साथ फ्रांसीसियों का उद्देश्यों में भी परिवर्तन होने लगा और भारत को अपने एक उपनिवेश के रूप में मानने लगे। 1741 ई में जोसफ फ़्रन्कोइस डूप्ले को फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी का गवर्नर बनाया जाना इस (उपनिवेश) वास्तविकता और उद्देश्य की तरफ उठाया गया पहला कदम था। उसके काल में कंपनी के राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट रूप से सामने आने लगे और कहीं कहीं तो उन्हें कंपनी के वाणिज्यिक उद्देश्यों से ज्यादा महत्व दिया जाने लगा। डूप्ले अत्यधिक बुद्धिमान था जिसने स्थानीय राजाओं की आपसी दुश्मनी का फायदा उठाया और इसे भारत में फ्रासीसी साम्राज्य की स्थापना हेतु भगवान द्वारा दिए गए मौके के रूप में स्वीकार किया। उसने अपनी चतुरता और कूटनीति के बल पर भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में सम्मानित स्थान प्राप्त किया। लेकिन ब्रिटिशों ने डूप्ले और फ्रांसीसियों के समक्ष चुनौती प्रस्तुत की जो बाद में दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष का कारण बना। डूप्ले की सेना ने मार्क्विस दी बुस्सी के नेतृत्व में हैदराबाद और केप कोमोरिन के मध्य के क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया। 1744 ई में ब्रिटिश अफसर रोबर्ट क्लाइव भारत आया जिसने डूप्ले को पराजित किया। इस पराजय के बाद 1754 ई में डूप्ले को वापस फ्रांस बुला लिया गया।

कुछ क्षेत्रों पर फ्रांसीसी प्रतिबन्ध: लाली, जिसे फ्रांसीसी सरकार द्वारा भारत से ब्रिटिशों को बाहर करने लिए भेजा गया था, को प्रारंभ में कुछ सफलता जरुर मिली ,जैसे 1758 ईमें कुद्दलौर जिले के  फोर्ट सेंट डेविड  पर विजय प्राप्त करना। लेकिन ब्रिटिशों और फ्रांसीसियों के मध्य हुई बांदीवाश की लड़ाई में हैदराबाद क्षेत्र को खो देने के कारण फ्रांसीसियों की कमर टूट गयी और इसी का फायदा उठाकर 1760 ई में ब्रिटिशों ने पोंडिचेरी की घेराबंदी कर दी। 1761 ई में ब्रिटिशों ने पोंडिचेरी को नष्ट कर दिया और अंततः फ्रांसीसी दक्षिण भारत पर पकड़ खो बैठे । बाद में 1763 ई में ब्रिटिशों के साथ हुई शान्ति-संधि की शर्तों के अधीन 1765 ई में पोंडिचेरी को फ्रांसीसियों को लौटा दिया । 1962 ई में भारत और फ्रांस के मध्य हुई एक संधि के तहत भारत में स्थित फ्रांसीसी क्षेत्रों को वैधानिक रूप से पुनः भारत में मिला लिया गया

पुर्तगाली उपनिवेश

पुर्तगाली उपनिवेश की स्थापना

पुर्तगाली पहले यूरोपीय थे जिन्होंने भारत तक सीधे समुद्री मार्ग की खोज की । 20 मई 1498 को पुर्तगाली नाविक वास्को-डी-गामा कालीकट पहुंचा, जो दक्षिण-पश्चिम भारत में स्थित एक महत्वपूर्ण समुद्री बंदरगाह है। स्थानीय राजा जमोरिन ने उसका स्वागत किया और कुछ विशेषाधिकार प्रदान किये। भारत में तीन महीने रहने के बाद वास्को-डी-गामा सामान से लदे एक जहाज के साथ वापस लौट गया और उस सामान को उसने यूरोपीय बाज़ार में अपनी यात्रा की कुल लागत के साठ गुने दाम में बेचा।

1501 ई.में वास्को-डी-गामा दूसरी बार फिर भारत आया और उसने कन्नानौर में एक व्यापारिक फैक्ट्री स्थापित की। व्यापारिक संबंधों की स्थापना हो जाने के बाद भारत में कालीकट, कन्नानौर और कोचीन प्रमुख पुर्तगाली केन्द्रों के रूप में उभरे। अरब व्यापारी, पुर्तगालियो की सफलता और प्रगति से जलने लगे और इसी जलन ने स्थानीय राजा जमोरिन और पुर्तगालियो के बीच शत्रुता को जन्म दिया। यह शत्रुता इतनी बढ़ गयी कि उन दोनों के बीच सैन्य संघर्ष की स्थिति पैदा हो गयी। राजा जमोरिन को पुर्तगालियों ने हरा दिया और इसी जीत के साथ पुर्तगालियों की सैनिक सर्वोच्चता स्थापित हो गयी।

भारत में पुर्तगाली शक्ति का उदय

1505 ई में फ्रांसिस्को दे अल्मीडा को भारत का पहला पुर्तगाली गवर्नर बनाया गया। उसकी नीतियों को ब्लू वाटर पालिसी कहा जाता था क्योकि उनका मुख्य उद्देश्य हिन्द महासागर को नियंत्रित करना था। 1509 ई में फ्रांसिस्को दे अल्मीडा की जगह अल्बुकर्क भारत में पुर्तगाली गवर्नर बनकर आया जिसने 1510 ई.में बीजापुर के सुल्तान से गोवा को अपने कब्जे में ले लिया। उसे भारत में पुर्तगाली शक्ति का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। बाद में गोवा भारत में पुर्तगाली बस्तियों का मुख्यालय बन गया। तटीय क्षेत्रों पर पकड़ और नौसेना की सर्वोच्चता ने भारत में पुर्तगालियों के स्थापित होने में काफी मदद की ।16  वीं सदी के अंत तक पुर्तगालियों ने न केवल गोवा,दमन,दीव और सालसेट पर कब्ज़ा कर लिया बल्कि भारतीय तट के सहारे विस्तृत बहुत बड़े क्षेत्र को भी अपने प्रभाव में ले लिया।

पुर्तगाली शक्ति का पतन

भारत में पुर्तगाली शक्ति अधिक समय तक टिक नहीं सकी क्योकि नए यूरोपीय व्यापारिक प्रतिद्वंदियों ने उनके सामने चुनौती पेश कर दी। विभिन्न व्यापारिक प्रतिद्वंदियों के मध्य हुए संघर्ष में पुर्तगालियों को अपने से शक्तिशाली और व्यापारिक दृष्टि से अधिक सक्षम प्रतिद्वंदी के समक्ष समर्पण करना पड़ा और धीरे धीरे वे सीमित क्षेत्रों तक सिमट कर रह गए।

पुर्तगाली शक्ति के पतन के मुख्य कारण

भारत में पुर्तगाली शक्ति के पतन के प्रमुख कारणों में निम्नलिखित शामिल है-

  • पुर्तगाल एक देश के रूप में इतना छोटा था कि वह अपने देश से दूर स्थित व्यापारिक कॉलोनी के भार को वहन नही कर सकता था।
  • उनकी समुद्री डाकुओं के रूप में प्रसिद्धि ने स्थानीय शासकों के मन में उनके विरुद्ध शत्रुता का भाव पैदा कर  दिया।
  • पुर्तगालियो की कठोर धार्मिक नीति ने उन्हें भारत के हिन्दू और मुसलमानों दोनों से दूर कर दिया।
  • इसके अतिरिक्त डच और ब्रिटिशो के भारत में आगमन ने भी पुर्तगालियो के पतन में योगदान दिया।

विडंबना यह है कि पुर्तगाली शक्ति, जो भारत में सबसे पहले आने वाली यूरोपीय शक्ति थी ,वही 1961 ई.में भारत से लौटने वाली अंतिम यूरोपीय शक्ति भी थी, जब भारत सरकार ने गोवा ,दमन और दीव को उनसे पुनः अपने कब्जे में ले लिया।

भारत को पुर्तगालियो की देन

  • उन्होंने भारत में तंबाकू की कृषि आरंभ की।
  • उन्होंने भारत के पश्चिमी और पूर्वी तट पर कैथोलिक धर्म का प्रसार किया।
  • उन्होंने 1556 ई.में गोवा में भारत की पहली प्रिंटिग प्रेस की स्थापना की। द इंडियन मेडिसनल प्लांट्स  पहला वैज्ञानिक कार्य था जिसका प्रकाशन 1563 ई.में गोवा से किया गया ।
  • सर्वप्रथम उन्होंने ही कार्टेज प्रणाली के माध्यम से यह बताया कि कैसे समुद्र और समुद्री व्यापार पर सर्वोच्चता स्थापित की जाए। इस प्रणाली के तहत कोई भी जहाज अगर पुर्तगाली क्षेत्रोँ से गुजरता है तो उसे पुर्तगालियों से परमिट लेना पडेगा अन्यथा उन्हें पकड़ा जा सकता है।
  • वे भारत और एशिया में ईसाई धर्म का प्रचार करने वाले प्रथम यूरोपीय थे।

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...