1764 बकसर (बिहार) की लड़ाई

बक्सर की लड़ाई

बक्सर का युद्ध बंगाल के नवाब मीर कासिम,अवध के नवाब सुजाउद्दौला व मुग़ल शासक शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना और अंग्रेजों के मध्य लड़ा गया था | यही वह निर्णायक युद्ध था जिसने अंग्रेजों को अगले दो सौ वर्षों के लिए भारत के शासक के रूप में स्थापित कर दिया| यह युद्ध अंग्रेजों द्वारा फरमान और दस्तक के दुरुपयोग और उनकी विस्तारवादी व्यापारिक आकांक्षाओं का परिणाम था|

22 अक्टूबर,1764 ई.   को लड़े गए बक्सर के युद्ध में संयुक्त भारतीय सेना की पराजय हुई| बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई |1765 ई. में सुजाउद्दौला और शाह आलम ने इलाहाबाद में कंपनी गवर्नर क्लाइव के साथ संधि पर हस्ताक्षर किये| इस संधि के तहत,कंपनी को बंगाल,बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार प्रदान कर दिए गए, जिसने कंपनी को इन क्षेत्रों से राजस्व वसूली के लिए अधिकृत कर दिया|कंपनी ने अवध के नवाब से कड़ा और इलाहाबाद के क्षेत्र लेकर मुग़ल शासक को सौंप दिए,जोकि अब इलाहाबाद में अंग्रेजी सेना के संरक्षण में रहने लगा था|कंपनी ने मुगल शासक को प्रतिवर्ष 26 लाख रुपये के भुगतान का वादा किया लेकिन थोड़े समय बाद ही कंपनी द्वारा इसे बंद कर दिया गया|कंपनी ने नवाब को किसी भी आक्रमण के विरुद्ध सैन्य सहायता प्रदान करने का वादा किया लेकिन इसके लिए नवाब को भुगतान करना होगा|अतः अवध का नवाब कंपनी पर निर्भर हो गया| इसी बीच मीर जाफर को दोबारा बंगाल का नवाब बना दिया गया| उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र को नवाब की गद्दी पर बैठाया गया| कंपनी के अफसरों ने नवाब से धन ऐंठ कर व्यक्तिगत रूप से काफी लाभ कमाया|

युद्ध के लिए जिम्मेदार घटनाएँ

  • ब्रिटिशों द्वारा दस्तक और फरमान का दुरुपयोग,जिसने मीर कासिम के प्राधिकार और प्रभुसत्ता को चुनौती दी
  • ब्रिटिशों के आतंरिक व्यापार पर सभी तरह के शुल्कों की समाप्ति
  • कंपनी के कर्मचारियों का दुर्व्यवहार : उन्होंने भारतीय दस्तकारों, किसानोंऔर व्यापारियों को अपना माल सस्ते में बेचने के लिए बाध्य किया और रिश्वत व उपहार लेने की परंपरा की भी शुरुआत कर दी|
  • ब्रिटिशों का लुटेरों जैसा व्यवहार जिसने न केवल व्यापार के नियमों का उल्लंघन किया बल्कि नवाब के प्राधिकार को भी चुनौती दी|

निष्कर्ष

बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई | ब्रिटिशों की रूचि तीन तटीय क्षेत्रों कलकत्ता ,बम्बई और मद्रास में अधिक थी| अंग्रेजों व फ्रांसीसियों के बीच लड़े  गए कर्नाटक युद्ध ,प्लासी के युद्ध और बक्सर के युद्ध ने भारत में ब्रिटिश सफलता के दौर को प्रारंभ कर दिया|1765 ई. तक ब्रिटिश बंगाल,बिहार और उड़ीसा के वास्तविक शासक बन गए| अवध और कर्नाटक के नवाब(जिसे उन्होंने ही नवाब बनाया था) उन पर निर्भर हो गए|

1717 में बंगाल(बांग्लादेश भी शामिल)

बंगाल

औरंगजेब द्वारा मुर्शिद कुली खां को बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया था। गवर्नर मुर्शिद कुली खां (1717-1727 ई.) ने बंगाल की राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित कर दी। उसने अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजस्व वसूली को रोककर अपने राज्य के हितों की रक्षा का प्रयास किया। उसका दामाद शुजाउद्दीन खां उसका उत्तराधिकारी बना जिसने बिहार के सूबे  को बंगाल राज्य में मिला लिया। मुर्शिद कुली खां और उसके उत्तराधिकारी नवाबों द्वारा बंगाल, बिहार और उड़ीसा का प्रशासन स्वतंत्र शासकों की तरह किया गया फिर भी उन्होंने मुग़ल शासक को राजस्व भेजना जारी रखा। बंगाल के नवाबों का विवरण निम्नलिखित है-

  • मुर्शिद कुली खां  को औरंगजेब द्वारा बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया था। उसने अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजस्व वसूली को रोककर अपने राज्य के हितों की रक्षा का प्रयास किया।
  • शुजाउद्दीन खां  जो मुर्शिद कुली खां का दामाद था ,उसका उत्तराधिकारी बना और उसने बिहार के सूबे  को बंगाल राज्य में मिला लिया।
  • सरफराज खां  ,जो शुजा का पुत्र था , ने आलम-उद-दौला हैदर जंग की उपाधि धारण की ।
  • अली बर्दी खां  ने मुग़ल शासक को दो करोड़ रुपये का भुगतान कर फरमान प्राप्त किया और अपने शासन को वैधानिक आधार प्रदान किया। उसने अपनी सबसे छोटी पुत्री के पुत्र सिराज-उद-दौला  को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया ।
  • सिराज-उद-दौला  ने कलकत्ता में अंग्रेजों को अपनी फैक्ट्रियों की किलेबंदी करने से रोका लेकिन अंग्रेजों द्वारा उसके आदेश को न मानने के परिणामस्वरूप अंग्रेजों और सिराज-उद-दौला के मध्य प्लासी का युद्ध लड़ा गया।
  • मीर कासिम ने बर्दवान,मिदनापुर  और चिटगांव की जमींदारी अंग्रेजों को सौंप दी। उसने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए अनेक राजस्व और सैन्य सुधारों को लागू किया ।
  • मीर जाफर ने बंगाल,बिहार और उड़ीसा में मुक्त व्यापार करने का अधिकार और चौबीस परगना की ज़मींदारी  ब्रिटिशों को प्रदान कर दी। मीर कासिम से युद्ध प्रारंभ होने के बाद 1763 ई.में उसे ब्रिटिशों द्वारा दुबारा गद्दी पर बिठाया गया।
  • नज़्म-उद-दौला  मीर जाफर का पुत्र था और द्वैध शासनकाल के दौरान अंग्रेजों के हाथों की  कठपुतली मात्र था।

निष्कर्ष

औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य के पतन के साथ ही बंगाल मुर्शिद कुली खां के नेतृत्व  से स्वतंत्र हो गया। मुर्शिद कुली खां ने अपनी योग्य प्रबंधन क्षमता के द्वारा बंगाल को समृद्धता के शिखर तक पहुँचाया।

पिट्स इंडिया एक्ट 1784

पिट्स इंडिया एक्ट 1784

1773 ई. के रेग्युलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने और कंपनी के भारतीय क्षेत्रों के प्रशासन को अधिक सक्षम और उत्तरदायित्वपूर्ण बनाने के लिये अगले एक दशक के दौरान जाँच के कई दौर चले और ब्रिटिश संसद द्वारा अनेक कदम उठाये गए|

इनमें सबसे महत्पूर्ण कदम 1784 ई. में पिट्स इंडिया एक्ट को पारित किया जाना था,जिसका नाम ब्रिटेन के तत्कालीन  युवा प्रधानमंत्री विलियम पिट के नाम पर रखा गया था| इस अधिनियम द्वारा ब्रिटेन में बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल की स्थापना की गयी जिसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार भारत में कंपनी के नागरिक,सैन्य और राजस्व सम्बन्धी कार्यों पर पूर्ण नियंत्रण रखती थी|

अभी भी भारत के साथ व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार बना रहा और उसे कंपनी के अधिकारीयों को नियुक्त करने  या हटाने का अधिकार प्राप्त था |अतः ब्रिटिश  भारत पर ब्रिटिश सरकार और कंपनी दोनों के शासन अर्थात द्वैध शासन की स्थापना की गयी|

गवर्नर जनरल को महत्वपूर्ण मुद्दों पर परिषद् के निर्णय को न मानने की शक्ति प्रदान की गयी| मद्रास व बम्बई प्रेसीड़ेंसी को उसके अधीन कर दिया गया और उसे भारत में ब्रिटिश सेना,कंपनी और ब्रिटिश सरकार दोनों की सेना,का सेनापति बना दिया गया |

1784 ई. के एक्ट द्वारा स्थापित सिद्धांतों ने भारत में ब्रिटिश प्रशासन का आधार तैयार किया | सेना,पुलिस,नागरिक सेवा और न्यायालय वे प्रमुख एजेंसियां/निकाय थी जिनके माध्यम से गवर्नर जनरल शक्तियों का प्रयोग और उत्तरदायित्वों का निर्वाह करता था| कंपनी की सेना में एक बड़ा भाग भारतीय सैनिकों का भी था जिसका आकार ब्रिटिश क्षेत्र के विस्तार के साथ बढता गया और एक समय इन सिपाहियों की संख्या लगभग 200,000 हो गयी थी| इन्हें नियमित रूप से वेतन प्रदान किया जाता था और अत्याधुनिक हथियारों के प्रयोग हेतु प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता था| भारतीय शासकों के यहाँ नौकरी करने वाले सैनिकों को प्रायः ये सुविधाएँ प्राप्त नहीं थीं| आगे चलकर एक के बाद एक सफलता प्राप्त  करने के कारण कंपनी की सेना के सम्मान में वृद्धि होती गयी जिसने नए रंगरूटों को इसकी ओर आकर्षित किया| लेकिन सेना के सभी अफसर यूरोपीय थे| भारत में कंपनी की सेना के अतिरिक्त ब्रिटिश सैनिकों की भी उपस्थिति थी|

हालाँकि कंपनी की सेना में नियुक्त भारतीय सैनिकों ने अत्यधिक सक्षम होने की ख्याति अर्जित की थी ,लेकिन वे औपनिवेशिक शक्ति के भाड़े के सैनिक मात्र थे क्योकि न तो उनमे वह गर्व की भावना थी जो किसी भी राष्ट्रीय सेना के सैनिक को उत्साह प्रदान करती है और न ही पदोन्नति के बहुत अधिक अवसर उन्हें प्राप्त थे| इन्हीं कारकों ने कई बार उन्हें विद्रोह करने के लिए उकसाया जिनमें सबसे महान विद्रोह 1857 का विद्रोह था|

पिट्स इंडिया एक्ट में एक प्रावधान विजयों की नीति पर रोक लगाने से भी सम्बंधित था लेकिन उस प्रावधान को नज़रअंदाज़ कर दिया गया क्योंकि ब्रिटेन के आर्थिक हितों ,जैसे ब्रिटेन की फैक्ट्रियों से निकलने वाले तैयार माल के लिए बाज़ार बनाने और  कच्चे माल के नए स्रोतों की खोज करने, के लिए नए क्षेत्रों पर विजय प्राप्त करना जरूरी था| साथ ही इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए नए विजित क्षेत्रों पर जल्द से जल्द कानून-व्यवस्था की स्थापना करना भी आवश्यक था| अतः एक नियमित पुलिस बल की व्यवस्था की गयी ताकि कानून एवं व्यवस्था को बनाये रखा जाये|

कार्नवालिस के समय में इस बल को एक नियमित रूप प्रदान किया गया |1791 ई. में कलकत्ता के लिए पुलिस अधीक्षक की नियुक्ति की गयी और जल्दी ही अन्य शहरों में भी कोतवालों की नियुक्त किया गया |जिलों  को थानों में विभाजित किया गया और प्रत्येक थाने का प्रभार एक दरोगा को सौंपा गया|गावों के वंशानुगत पुलिस कर्मचारियों को चौकीदार बना दिया गया | बाद में जिला पुलिस अधीक्षक का पद सृजित किया गया |

हालाँकि पुलिस ने कानून एवं व्यवस्था की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन वह कभी भी लोकप्रिय नहीं बन पाई बल्कि उसने भ्रष्टाचार और सामान्य जनता को तंग करने की प्रवृत्ति के कारण बदनामी ही अर्जित की |अतः यह पूरे देश में सरकारी प्राधिकार का प्रतीक बन गयी| इसके निचले दर्जे के सिपाही को बहुत ही कम वेतन दिया जाता था सेना की ही तरह यहाँ भी उच्च पदों पर केवल यूरोपीय व्यक्ति को नियुक्त किया जाता था|

निष्कर्ष

यह एक्ट इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है कि इसने कंपनी की गतिविधियों और प्रशासन के सम्बन्ध में ब्रिटिश सरकार को सर्वोच्च नियंत्रण शक्ति प्रदान कर दी | यह पहला अवसर था जब कंपनी के अधीन क्षेत्रों को ब्रिटेन के अधीन क्षेत्र कहा गया|

फ्रांस उपनिवेश

फ्रांसीसी उपनिवेश की स्थापना

भारत आने वाले अंतिम यूरोपीय व्यापारी फ्रांसीसी थे। फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1664 ई में लुई सोलहवें के शासनकाल में भारत के साथ व्यापार करने के उद्देश्य से की गयी थी। फ्रांसीसियों ने 1668 ई में सूरत में पहली फैक्ट्री स्थापित की और 1669 ई में मसुलिपत्तनम में एक और फैक्ट्री स्थापित की।1673 ई में बंगाल के मुग़ल सूबेदार ने फ्रांसीसियों को चन्द्रनगर में बस्ती बनाने की अनुमति प्रदान कर दी।

पोंडिचेरी और फ्रांसीसी वाणिज्यिक वृद्धि: 1674 ई में  फ्रांसीसियों ने बीजापुर के सुल्तान से पोंडिचेरी नाम का गाँव प्राप्त किया और एक सम्पन्न शहर की स्थापना की जो बाद में भारत में फ्रांसीसियों का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। धीरे धीरे फ़्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी ने माहे,कराइकल, बालासोर और कासिम बाज़ार में अपनी व्यापारिक बस्तियां स्थापित कर लीं। फ्रांसीसियों का भारत आने का प्रमुख उद्देश्य व्यापर एवं वाणिज्य था।  भारत आने से लेकर 1741 ई तक फ्रांसीसियों का प्रमुख उद्देश्य ,ब्रिटिशों के समान,पूर्णतः वाणिज्यिक ही था। फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1723 ई में यनम, 1725 ई में मालाबार तट पर माहे और 1739 ई में कराइकल पर कब्ज़ा कर लिया।

फ्रांसीसियों के राजनीतिक उद्देश्य और महत्वाकांक्षा: समय के गुजरने के साथ साथ फ्रांसीसियों का उद्देश्यों में भी परिवर्तन होने लगा और भारत को अपने एक उपनिवेश के रूप में मानने लगे। 1741 ई में जोसफ फ़्रन्कोइस डूप्ले को फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी का गवर्नर बनाया जाना इस (उपनिवेश) वास्तविकता और उद्देश्य की तरफ उठाया गया पहला कदम था। उसके काल में कंपनी के राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट रूप से सामने आने लगे और कहीं कहीं तो उन्हें कंपनी के वाणिज्यिक उद्देश्यों से ज्यादा महत्व दिया जाने लगा। डूप्ले अत्यधिक बुद्धिमान था जिसने स्थानीय राजाओं की आपसी दुश्मनी का फायदा उठाया और इसे भारत में फ्रासीसी साम्राज्य की स्थापना हेतु भगवान द्वारा दिए गए मौके के रूप में स्वीकार किया। उसने अपनी चतुरता और कूटनीति के बल पर भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में सम्मानित स्थान प्राप्त किया। लेकिन ब्रिटिशों ने डूप्ले और फ्रांसीसियों के समक्ष चुनौती प्रस्तुत की जो बाद में दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष का कारण बना। डूप्ले की सेना ने मार्क्विस दी बुस्सी के नेतृत्व में हैदराबाद और केप कोमोरिन के मध्य के क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया। 1744 ई में ब्रिटिश अफसर रोबर्ट क्लाइव भारत आया जिसने डूप्ले को पराजित किया। इस पराजय के बाद 1754 ई में डूप्ले को वापस फ्रांस बुला लिया गया।

कुछ क्षेत्रों पर फ्रांसीसी प्रतिबन्ध: लाली, जिसे फ्रांसीसी सरकार द्वारा भारत से ब्रिटिशों को बाहर करने लिए भेजा गया था, को प्रारंभ में कुछ सफलता जरुर मिली ,जैसे 1758 ईमें कुद्दलौर जिले के  फोर्ट सेंट डेविड  पर विजय प्राप्त करना। लेकिन ब्रिटिशों और फ्रांसीसियों के मध्य हुई बांदीवाश की लड़ाई में हैदराबाद क्षेत्र को खो देने के कारण फ्रांसीसियों की कमर टूट गयी और इसी का फायदा उठाकर 1760 ई में ब्रिटिशों ने पोंडिचेरी की घेराबंदी कर दी। 1761 ई में ब्रिटिशों ने पोंडिचेरी को नष्ट कर दिया और अंततः फ्रांसीसी दक्षिण भारत पर पकड़ खो बैठे । बाद में 1763 ई में ब्रिटिशों के साथ हुई शान्ति-संधि की शर्तों के अधीन 1765 ई में पोंडिचेरी को फ्रांसीसियों को लौटा दिया । 1962 ई में भारत और फ्रांस के मध्य हुई एक संधि के तहत भारत में स्थित फ्रांसीसी क्षेत्रों को वैधानिक रूप से पुनः भारत में मिला लिया गया

पुर्तगाली उपनिवेश

पुर्तगाली उपनिवेश की स्थापना

पुर्तगाली पहले यूरोपीय थे जिन्होंने भारत तक सीधे समुद्री मार्ग की खोज की । 20 मई 1498 को पुर्तगाली नाविक वास्को-डी-गामा कालीकट पहुंचा, जो दक्षिण-पश्चिम भारत में स्थित एक महत्वपूर्ण समुद्री बंदरगाह है। स्थानीय राजा जमोरिन ने उसका स्वागत किया और कुछ विशेषाधिकार प्रदान किये। भारत में तीन महीने रहने के बाद वास्को-डी-गामा सामान से लदे एक जहाज के साथ वापस लौट गया और उस सामान को उसने यूरोपीय बाज़ार में अपनी यात्रा की कुल लागत के साठ गुने दाम में बेचा।

1501 ई.में वास्को-डी-गामा दूसरी बार फिर भारत आया और उसने कन्नानौर में एक व्यापारिक फैक्ट्री स्थापित की। व्यापारिक संबंधों की स्थापना हो जाने के बाद भारत में कालीकट, कन्नानौर और कोचीन प्रमुख पुर्तगाली केन्द्रों के रूप में उभरे। अरब व्यापारी, पुर्तगालियो की सफलता और प्रगति से जलने लगे और इसी जलन ने स्थानीय राजा जमोरिन और पुर्तगालियो के बीच शत्रुता को जन्म दिया। यह शत्रुता इतनी बढ़ गयी कि उन दोनों के बीच सैन्य संघर्ष की स्थिति पैदा हो गयी। राजा जमोरिन को पुर्तगालियों ने हरा दिया और इसी जीत के साथ पुर्तगालियों की सैनिक सर्वोच्चता स्थापित हो गयी।

भारत में पुर्तगाली शक्ति का उदय

1505 ई में फ्रांसिस्को दे अल्मीडा को भारत का पहला पुर्तगाली गवर्नर बनाया गया। उसकी नीतियों को ब्लू वाटर पालिसी कहा जाता था क्योकि उनका मुख्य उद्देश्य हिन्द महासागर को नियंत्रित करना था। 1509 ई में फ्रांसिस्को दे अल्मीडा की जगह अल्बुकर्क भारत में पुर्तगाली गवर्नर बनकर आया जिसने 1510 ई.में बीजापुर के सुल्तान से गोवा को अपने कब्जे में ले लिया। उसे भारत में पुर्तगाली शक्ति का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। बाद में गोवा भारत में पुर्तगाली बस्तियों का मुख्यालय बन गया। तटीय क्षेत्रों पर पकड़ और नौसेना की सर्वोच्चता ने भारत में पुर्तगालियों के स्थापित होने में काफी मदद की ।16  वीं सदी के अंत तक पुर्तगालियों ने न केवल गोवा,दमन,दीव और सालसेट पर कब्ज़ा कर लिया बल्कि भारतीय तट के सहारे विस्तृत बहुत बड़े क्षेत्र को भी अपने प्रभाव में ले लिया।

पुर्तगाली शक्ति का पतन

भारत में पुर्तगाली शक्ति अधिक समय तक टिक नहीं सकी क्योकि नए यूरोपीय व्यापारिक प्रतिद्वंदियों ने उनके सामने चुनौती पेश कर दी। विभिन्न व्यापारिक प्रतिद्वंदियों के मध्य हुए संघर्ष में पुर्तगालियों को अपने से शक्तिशाली और व्यापारिक दृष्टि से अधिक सक्षम प्रतिद्वंदी के समक्ष समर्पण करना पड़ा और धीरे धीरे वे सीमित क्षेत्रों तक सिमट कर रह गए।

पुर्तगाली शक्ति के पतन के मुख्य कारण

भारत में पुर्तगाली शक्ति के पतन के प्रमुख कारणों में निम्नलिखित शामिल है-

  • पुर्तगाल एक देश के रूप में इतना छोटा था कि वह अपने देश से दूर स्थित व्यापारिक कॉलोनी के भार को वहन नही कर सकता था।
  • उनकी समुद्री डाकुओं के रूप में प्रसिद्धि ने स्थानीय शासकों के मन में उनके विरुद्ध शत्रुता का भाव पैदा कर  दिया।
  • पुर्तगालियो की कठोर धार्मिक नीति ने उन्हें भारत के हिन्दू और मुसलमानों दोनों से दूर कर दिया।
  • इसके अतिरिक्त डच और ब्रिटिशो के भारत में आगमन ने भी पुर्तगालियो के पतन में योगदान दिया।

विडंबना यह है कि पुर्तगाली शक्ति, जो भारत में सबसे पहले आने वाली यूरोपीय शक्ति थी ,वही 1961 ई.में भारत से लौटने वाली अंतिम यूरोपीय शक्ति भी थी, जब भारत सरकार ने गोवा ,दमन और दीव को उनसे पुनः अपने कब्जे में ले लिया।

भारत को पुर्तगालियो की देन

  • उन्होंने भारत में तंबाकू की कृषि आरंभ की।
  • उन्होंने भारत के पश्चिमी और पूर्वी तट पर कैथोलिक धर्म का प्रसार किया।
  • उन्होंने 1556 ई.में गोवा में भारत की पहली प्रिंटिग प्रेस की स्थापना की। द इंडियन मेडिसनल प्लांट्स  पहला वैज्ञानिक कार्य था जिसका प्रकाशन 1563 ई.में गोवा से किया गया ।
  • सर्वप्रथम उन्होंने ही कार्टेज प्रणाली के माध्यम से यह बताया कि कैसे समुद्र और समुद्री व्यापार पर सर्वोच्चता स्थापित की जाए। इस प्रणाली के तहत कोई भी जहाज अगर पुर्तगाली क्षेत्रोँ से गुजरता है तो उसे पुर्तगालियों से परमिट लेना पडेगा अन्यथा उन्हें पकड़ा जा सकता है।
  • वे भारत और एशिया में ईसाई धर्म का प्रचार करने वाले प्रथम यूरोपीय थे।

पच्छिमी भारत में समाज सुधार

पश्चिमी भारत में सुधार आन्दोलन

सन 1867 ई. में बम्बई में प्रार्थना समाज की स्थापना की गई| महादेव गोविन्द रानाडे और रामकृष्ण भंडारकर इसके मुख्य संस्थापक थे| प्रार्थना समाज के नेता ब्रहम समाज से प्रभावित थे|उन्होंने जाति-प्रथा और छुआछुत के व्यवहार का विरोध किया| उन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए कार्य किया और विधवा-पुनर्विवाह की वकालत की| रानाडे,जोकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भी संस्थापकों में से एक थे,ने 1887 ई. में इंडियन नेशनल सोशल कांफ्रेंस  की स्थापना की जिसका उद्देश्य संपूर्ण भारत में सामाजिक सुधार के लिए प्रभावशाली तरीके से कार्य करना था| इस कांफ्रेंस का आयोजन भी प्रतिवर्ष सामाजिक समस्याओं पर चर्चा के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों के साथ ही होता था| रानाडे का मानना था कि सामाजिक सुधारों के बिना राजनीतिक व आर्थिक क्षेत्र में उन्नति संभव नहीं है| वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के बड़े समर्थक थे और घोषित किया कि भारत जैसा विशाल देश तभी कोई उन्नति कर सकता है जब हिन्दू व मुस्लिम दोनों हाथ मिलाकर एक साथ आगे बढ़ें| पश्चिमी भारत के दो अन्य महान सुधारक गोपाल हरि देशमुख लोकहितवादी और ज्योतिराव गोविंदराव फुले  ,जो ज्योतिबा या महात्मा फुले के नाम से प्रसिद्ध रहे,थे| लोकहितवादी अनेक सामजिक सुधार संगठनों से जुड़े हुए थे| उन्होंने महिलाओं की स्थिति में उत्थान के लिए कार्य किया और जाति-प्रथा की आलोचना की|

महात्मा फुले ने अपना संपूर्ण जीवन समाज के शोषित व दलित वर्गों के उत्थान और महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने को समर्पित कर दिया| उन्होंने 1848 ई. में तथाकथित निम्न वर्ग की बालिकाओं के लिए स्कूल की स्थापना की और अपनी पत्नी को शिक्षित किया ताकि वे उस स्कूल में पढ़ा सकें| 1873 ई. में उन्होंने सत्यशोधक समाज  की स्थापना की जिसमें जाति व धर्म के भेदभाव के बिना कोई भी प्रवेश पा सकता था| ये समाज के दलित व पिछड़े वर्ग के लोगों को समान अधिकार दिलाने के लिए कार्य करती थी| महात्मा फुले ने ब्राह्मणों की सर्वोच्चता का विरोध किया और ब्राह्मणों के बिना ही विवाह सम्पन्न कराने की परंपरा का प्रारंभ किया| दलितों के लिए उनके द्वारा किये गए कार्यों के कारण ही उन्हें महात्मा की उपाधि प्रदान की गयी थी|

दयानंद सरस्वती और आर्य समाज

दयानंद सरस्वती, जिनका वास्तविक नाम मूल शंकर था, का जन्म काठियाबाढ़ में 1824 ई. में हुआ था| चौदह वर्ष की उम्र में ही उन्होंने मूर्ति पूजा करने से मना कर अपने विद्रोही स्वभाव का परिचय दे दिया था| उसके तुरंत बाद उन्होंने घर छोड़ दिया और ज्ञान की खोज में अपने जीवन को समर्पित कर दिया| इस दौरान उन्होंने संस्कृत भाषा और साहित्य में प्रवीणता हासिल की 1863 ई. में उन्होंने अपने इस सिद्धांत का उपदेश देना प्रारंभ कर दिया कि ईश्वर केवल एक है जिसकी पूजा मूर्तियों के रूप में नहीं बल्कि अंतर्मन के करनी चाहिए| उन्होंने इस मत का प्रचार किया की वेदों में वह ज्ञान समाहित है जिसे ईश्वर ने मनुष्य को प्रदान किया है और आधुनिक विज्ञान से सम्बंधित जरुरी बातों को भी उनमें खोजा जा सकता है| अपने इस सन्देश के साथ उन्होंने संपूर्ण भारत का भ्रमण किया और 1875 ई. में बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की| दयानंद ने अपने उपदेशों व लेखन की भाषा के रूप में हिंदी को चुना| सत्यार्थ प्रकाश उनके द्वारा लिखी गयी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है|

हिंदी भाषा के प्रयोग के कारण उनके विचार उत्तर भारत के सामान्य जन तक पहुचनें में सक्षम हो सके| उत्तर प्रदेश, राजस्थान,गुजरात में आर्य समाज का बहुत तेजी से प्रसार हुआ और पंजाब में तो यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक व राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा| आर्य समाज के सदस्य दस सिद्धांतों का अनुसरण करते थे,जिनमें सबसे पहला सिद्धांत वेदों का अध्ययन था| अन्य सिद्धांत सदाचार व नैतिकता से सम्बंधित थे|दयानंद ने इनके लिए एक सामाजिक व्यवहार संहिता भी तैयार की थी,जिसमें जातिगत भेदभाव व सामाजिक असमानता के लिए कोई जगह नहीं थी|

आर्य समाजवादियों बाल विवाह का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया| पूरे उत्तर भारत में शिक्षा के प्रसार हेतु उन्होंने बालकों व बालिकाओं के लिए स्कूलों व कॉलेजों के एक तंत्र की स्थापना की जिसकी शुरुआत लाहौर के दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल से हुई थी,जो जल्द ही पंजाब के प्रमुख कॉलेज के रूप में विकसित हो गया| यहाँ आधुनिक तर्ज पर अंग्रेजी व हिंदी में शिक्षा प्रदान की जाती थी| दयानंद के कुछ शिष्य जो दयानंद के मूल अभिप्राय को बनाये रखना चाहते थे,ने शिक्षा की प्राचीन आश्रम पद्धति के आधार पर हरिद्वार में गुरुकुल की स्थापना की| दयानंद ने वेदों को परमसत्य माना क्योकि वे हिन्दुओं को धार्मिक विश्वासों का एक निश्चित ढांचा प्रदान करना चाहते थे| उन्होंने इस्लाम व इसाई धर्म स्वीकार कर चुके हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लेन के लिए शुद्धि आन्दोलन भी चलाया| अनेक सुधारकों ने अपने सामाजिक व धार्मिक विचारों को पुष्ट करने के लिए वेदों व अन्य प्राचीन धर्म-ग्रंथों से उदहारण प्रस्तुत किये| उन्होंने तर्क के आधार पर अपने विचारों को बल दिया जबकि कुछ अन्य ने खुले तौर पर इन प्राचीन धर्म-ग्रंथों की आलोचना भी की|शिक्षा के प्रोत्साहन,स्त्रियों के उत्थान और जाति-प्रथा के बंधनों को कमजोर करने के सन्दर्भ में दयानंद और आर्य समाज का योगदान किसी भी अन्य सुधार आन्दोलन की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण था|

पंजाब का इतिहास

पंजाब

दसवें एवं अंतिम गुरु गुरु गोविन्द सिंह  सिक्खों को एक लड़ाकू समूह के रूप में संगठित तो कर दिया था लेकिन औरंगजेब के शासनकाल तक वे कोई भी राज्य प्राप्त करने में सफल न हो सके। उनकी मृत्यु के बाद सिक्खों को बंदा बहादुर (1708-1716 ई।) के रूप में एक एक योग्य नेता प्राप्त हुआ। उन्होंने बड़ी संख्या में सिक्खों को संगठित किया और  सरहिंद  पर कब्ज़ा कर लिया। उसने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना का प्रयास किया और गुरुनानक व गुरु गोविन्द सिंह के नाम पर सिक्के चलवाए तथा अपनी मुहर लगे हुए आदेश जारी किये। उसके नेतृत्व में सिक्खों ने मुग़लों का बहादुरीपूर्वक विरोध किया और लाहौर से दिल्ली के बीच के पूरे क्षेत्र पर जमकर लूटपाट की। मुगलों के विरुद्ध अपने संघर्ष के दौरान उसे गुरुदासपुर के किले में बंदी लिया गया। उसके बाद बंदा बहादुर और उसके समर्थकों को दिल्ली भेज दिया गया जहाँ उनके साथ बहुत अमानवीय व्यवहार किया गया। बंदा बहादुर के युवा पुत्र की हत्या कर दी गयी और स्वयं उसे भी अनेक तरह से उत्पीड़ित किया और उसकी भी हत्या कर दी गयी। बंदा बहादुर के समर्थक उसे ‘सच्चा पादशाह’ (सच्चा बादशाह) कहते थे।

गुरुनानक और गुरु गोविन्द सिंह के मतों/सिद्धांतों ने लोगों के दिलों में गहरी जड़ें जमा ली थी। सिक्खों ने स्वयं को धीरे धीरे एक सिख राज्य के रूप में संगठित कर लिया।पंजाब में नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों के बाद उपजी अव्यवस्था और संदेह की स्थिति ने सिखों को एक शक्ति के रूप में उभरने में मदद की। 1764 ई में सिख अमृतसर में इकट्ठे हुए और पहली बार ‘देग,तेग और फ़तेह’ नाम से शुद्ध चांदी के सिक्के ढाले।ये पंजाब राज्य में सिख-सम्प्रभुता की पहली उद्घोषणा थी। उन्होंने स्वयं को बारह मिसलों (लोकतांत्रिक ढांचे पर आधारित सैन्य भाईचारा) में संगठित किया और पंजाब क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।इन मिसलों के प्रमुखों ने आपस में क्षेत्रों का बंटवारा कर लिया था।यहाँ तक की अहमदशाह अब्दाली भी इन मिसलों को नष्ट करने में सफल नहीं हो पाया और उसके भारत से लौटने के दो सालों के भीतर ही सरहिंद और लाहौर में उसके द्वारा नियुक्त किये गए गवर्नरों को बाहर खदेड़ दिया गया। नाभा, पटियाला और कपूरथला जैसी छोटी –छोटी जागीरों का उदय हुआ। 18वीं सदी के अंत में महाराजा रणजीत सिंह ने मिसलों को संयुक्त कर एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की।

मिसल का नाम

मिसल का संस्थापक

सिंहपुरिया मिसल

नवाब कपूर सिंह

अहलुवालिया मिसल

जस्सा सिंह

रामगढ़िया मिसल

जस्सा सिंह रामगढ़िया

फुलकियाँ मिसल

फूल सिंह

कन्हीवा मिसल

जय सिंह

भागी मिसल

हरी सिंह

सुकरचकिया मिसल

चरत सिंह

निशानवालिया मिसल

सरदार सांगत सिंह

करोढ़ सिंघिया मिसल

भगेल सिंह

नकी मिसल

हीरा सिंह

शहीदी मिसल

बाबा दीप सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध

  • अंग्रेजों ने दलीप सिंह के शासनकाल में पंजाब पर आक्रमण किया और लाहौर पर कब्ज़ा कर लिया तथा 9 मार्च 1846 ई में लाहौर की संधि  पर हस्ताक्षर हुए।
  • युद्ध हर्जाने का भुगतान न कर पाने के कारण पंजाब दरबार कंपनी को स्थानांतरित कर दिया गया। कंपनी ने समझोते में प्रमुख भूमिका निभाने वाले गुलाब  सिंह  को कश्मीर सौंप दिया।

द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध

  • संधि की शर्तों और समझौते के बावजूद पंजाब की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ था जिसने द्वितीय आंग्ला- सिख युद्ध का आधार तैयार कर दिया।
  • युद्ध के पश्चात्,लार्ड डलहौजी द्वारा पंजाब को कंपनी में मिला लिया गया और लॉरेंस को पंजाब का प्रथम कमिश्नर बनाया गया।

निष्कर्ष:

18 वीं सदी में मुग़ल साम्राज्य के विघटन और पतन का पूर्व में अधीन किये गए राजाओं और उन क्षेत्रीय नेताओं द्वारा स्वागत किया गया जो अपना खुद का एक राज्य निर्मित करना चाहते थे।पंजाब एक ऐसा ही क्षेत्र था जिसका मुग़ल साम्राज्य के कमजोर पड़ने के बाद उदय हुआ।

1928 मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट

नेहरू रिपोर्ट

12 फरवरी, 1928 को डॉ.एम.ए.अंसारी की अध्यक्षता में दिल्ली में सर्वदलीय सम्मलेन बुलाया गया जिसमे 29 संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे|इस सम्मलेन का आयोजन भारत सचिव लॉर्ड बिर्केन्हेड की चुनौती और साइमन आयोग के प्रत्युत्तर में किया गया था| बम्बई में 19मई1928 को इस सम्मलेन की बैठक में मोतीलाल नेहरु की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी जिसका उद्देश्य भारत के संविधान के की रुपरेखा व सिद्धांतों का निर्धारण करना था|

नेहरु रिपोर्ट की अनुशंसाएं

• भारत को डोमिनियन का दर्जा दिया जाये और संसदीय रूप की सरकार स्थापित की जाये जिसमे द्विसदनीय विधायिका- सीनेट और प्रतिनिधि सदन,हो|

• सीनेट का गठन सात साल के लिए चुने जाने वाले दो सौ सदस्यों से मिलकर हो और प्रतिनिध सदन में पांच साल के लिए चुने जाने वाले पांच सौ सदस्य शामिल हों|गवर्नर जनरल कार्यकारी परिषद् की सलाह पर कार्य करे जो सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी हो|

• भारत में संघीय रूप की सरकार स्थापित की जाये जिसमे अवशिष्ट शक्तियां केंद्र को प्रदान की गयीं हों |अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त कर दिया जाये क्योकि यह सांप्रदायिक भावनाओं को जाग्रत करती है और संयुक्त निर्वाचन प्रणाली स्थापित की जाये|

• पंजाब व बंगाल में समुदायों के लिए कोई सीट आरक्षित नहीं हो लेकिन उन राज्यों में,जहाँ मुस्लिम जनसंख्या उस राज्य की कुल जनसंख्या के दस प्रतिशत से भी कम है,मुस्लिमों के लिए सीटों का आरक्षण किया जा सकता है|

• न्यायपालिका विधायिका से स्वतंत्र हो|

• केंद्र में एक चौथाई मुस्लिम प्रतिनिधित्व होना चाहिए|

• सिंध को बम्बई प्रान्त से अलग किया जाये|

निष्कर्ष

नेहरु रिपोर्ट में कहा गया कि भारत के लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता है| इस रिपोर्ट ने अमेरिका के अधिकार पत्र से प्रेरणा ग्रहण की, जिसने भारत के संविधान में मूल अधिकारों सम्बन्धी प्रावधानों की आधारशिला रखी थी|

दक्षिण भारत में समाज सुधार

दक्षिण भारत में सुधार

बंगाल से शुरू होकर धार्मिक व सामाजिक सुधार आन्दोलन भारत के अन्य भागों में भी फैल गए|ब्रहम समाज से प्रेरित होकर 1864 ई. में मद्रास में वेद समाज की स्थापना की गयी| इसने जातिगत भेदभाव का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह व स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहित किया| ब्रहम समाज के समान,वेद समाज ने भी अंधविश्वासों व हिन्दू धर्म के रूढ़िवादी रीति-रिवाजों का विरोध किया और एक परमसत्ता में विश्वास व्यक्त किया| वेद समाज के सबसे प्रमुख नेता चेम्बेती श्रीधरालू नायडू थे| उन्होंने ब्रहम समाज की पुस्तकों का तमिल और तेलगू भाषा में अनुवाद किया|बाद में आंध्र प्रदेश,कर्नाटक व तमिलनाडु के कुछ शहरों में ब्रहम समाज की शाखाएं स्थापित हुईं और इसके तुरंत बाद प्रार्थना समाज की भी शाखाएं स्थापित हुईं| इन दोनों समाजों ने मिलकर सामाजिक व धार्मिक सुधारों को प्रोत्साहित करने का कार्य किया|

दक्षिण भारत के सुधार आंदोलनों के सबसे प्रमुख नेता कन्दुकुरी वीरेसलिंगम थे| इनका जन्म 1848 ई. में आंध्र प्रदेश के एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ था| उन्होंने ब्रहम समाज,विशेष रूप से केशवचन्द्र सेन,के विचारों से प्रभावित होकर स्वयं को सामाजिक सुधारों के प्रति समर्पित कर दिया| 1876 ई. में उन्होंने एक तेलगू पत्र निकाला जो लगभग पूरी तरह से सामाजिक सुधारों के प्रति समर्पित था|उनका सबसे बड़ा योगदान महिलाओं की मुक्ति के क्षेत्र में था जिसमें स्त्री शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह भी शामिल था|

केरल में नारायण गुरु द्वारा विशेष रूप से समाज के दलितों व शोषितों के उत्थान के लिए एक आन्दोलन शुरू किया गया|नारायण गुरु का जन्म 1854ई. में एक एजावा परिवार में हुआ था| एजावा व कुछ अन्य जातियों को केरल में तथाकथित हिन्दु उच्च जातियों द्वारा अछूत माना जाता था| नारायण गुरु ने संस्कृत शिक्षा प्राप्त की और स्वयं के जीवन को एजावा व अन्य दलित लोगों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया| उन्होंने ऐसे मंदिरों की स्थापना की जो जिनमें भगवान व उनकी मूर्तियों के लिए कोई स्थान नहीं था| इन्होनें प्रथम ऐसे मंदिर की स्थापना पास में रहने वाली नदी से पत्थर निकाल कर की गयी थी| इस पत्थर पर निम्नलिखित शब्द लिखे थे-“यह एक ऐसा स्थान है जहाँ सभी लोग जातिगत भेदभाव व धार्मिक शत्रुता के बिना भाईचारे के साथ रहते है| नारायण गुरु ने 1903 ई. में नारायण धर्म परिपालन योगम की स्थापना की,जो सामाजिक सुधार के लिए एक महत्वपूर्ण संगठन बन गया| उन्होंने सभी के लिए ‘एक जाति,एक धर्म और एक ईश्वर’ की वकालत की|

दक्षिण भारत के अनेक समाज सुधारकों ने स्वयं को हिन्दू मंदिरों से सम्बंधित सुधारों के साथ सम्बद्ध किया| इसी क्रम में उन्होंने हिन्दू मंदिरों में प्रचलित देवदासी प्रथा के उन्मूलन की वकालत की| उन्होंने यह मांग भी की कि मंदिरों की संपत्ति पर पुजारियों का अधिकार न होकर जनता का अधिकार होना चाहिए| बहुत से मंदिरों में तथाकथित निम्न जातियों को प्रवेश का अधिकार नहीं था,यहाँ तक कि मंदिरों से सटी हुई सड़कें भी उनके लिए प्रतिबंधित थीं| सुधारकों ने मंदिर-प्रवेश व मंदिरों से जुड़ी अन्य अनेक कुप्रथाओं को समाप्त करने के लिए सशक्त आन्दोलन चलाया|

यंग बंगाल

डेजेरियो और यंग बंगाल

बंगाल में आधुनिक आन्दोलनों की शुरुआत करने में 1817 में स्थापित कलकत्ता के हिन्दू कॉलेज की महत्वपूर्ण भूमिका थी| डेविड हेयर,जोकि राम मोहन राय के सहायक थे,ने इस कॉलेज को प्रारंभ करने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया| वे घड़ियों को बेचने के लिए स्कॉटलैंड से कलकत्ता आये थे,लेकिन बाद में बंगाल में आधुनिक शिक्षा का प्रसार ही उनके जीवन का उद्देश्य बन गया|

1826 ई. में 17 साल के युवा हेनरी विवियन डेरेजियो,जिनके पिता पुर्तगाली मूल के थे और माता एक अंग्रेज थी, ने शिक्षक के रूप में हिन्दू कॉलेज में प्रवेश किया| उन्होंने कुछ ही समय मं  कॉलेज के सबसे बेहतरीन लड़कों को अपने अपनी ओर आकर्षित कर लिया और उन्हें लगातार बंधनों से मुक्त होकर सोचने के लिए प्रेरित करते रहे और स्थापित सत्यों व प्राधिकारों के प्रति प्रश्नाकुलता का भाव जगाते रहे| डेरेजियो ने अपनी शिक्षाओं और विज्ञान,इतिहास,दर्शन, साहित्य आदि पर चर्चाओं के आयोजन के माध्यम से क्रांतिकारी विचारों को प्रोत्साहित किया| अपनी इन गतिविधियों के द्वारा डेरेजियो ने कलकत्ता के युवाओं को व्यवहारिक रूप से प्रभावित किया और उनके बीच एक बौद्धिक आन्दोलन की शुरुआत की|

डेरेजियो और यंग बंगाल

डेरेजियो के छात्रों,जिन्हें सम्मिलित रूप से यंग बंगाल कहा जाता था,ने सभी पुरानी सामाजिक परम्पराओं व रीति-रिवाजों का उपहास उड़ाया,ईश्वर के अस्तित्व को लेकर चर्चाएँ आयोजित कीं,सामाजिक व धार्मिक रूढ़ियों को चुनौती दी,विचारों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग की और महिलाओं के लिए शिक्षा की वकालत की| उन्होंने फ्रांस की क्रांति के आदर्शों और इंग्लैंड की  उदारवादी सोच को महत्व दिया|इस समूह के अत्यधिक उग्रवादी विचारों व धार्मिक मूर्तियों के प्रति आदर प्रदर्शित न करने जैसे उनके कार्यों ने बंगाल के रूढ़िवादी हिन्दुओं को नाराज कर दिया| उनका मानना था की यंग बंगाल की इस उग्र सोच के लिए डेरेजियो की शिक्षाएं जिम्मेदार है और उन्होंने हिन्दू कॉलेज के सक्षम अधिकारियों पर डेरेजयो को बर्खास्त करने के लिए दबाव डाला| डेरेजियो की बर्खास्तगी और 1831 ई. में अचानक उनकी मृत्यु के बाद भी यंग बंगाल आन्दोलन जारी रहा| नेतृत्व के आभाव में भी इस समूह के सदस्य शिक्षा व पत्रकारिता के माध्यम से अपने उग्र विचारों का प्रसार करते रहे|

विचार एवं शिक्षाएं

• डेरेजियो ने अपनी शिक्षाओं और विज्ञान,इतिहास,दर्शन, साहित्य आदि पर चर्चाओं के आयोजन के माध्यम से क्रांतिकारी विचारों को प्रोत्साहित किया|

• डेरेजियो युवा छात्रों के बीच बौद्धिक क्रांति का प्रसार करना चाहते थे|

• वे उदारवादी सोच के प्रबल समर्थक थे|

• वे विचारों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और महिलाओं के लिए शिक्षा के भी प्रबल समर्थक थे |

• सामाजिक व धार्मिक रूढ़ियों का विरोध किया |

• उन्होंने कहा कि उग्र या क्रांतिकारी विचार धर्म-दर्शन का मूल थे|

• उन्होंने पुरानी सामाजिक परम्पराओं व रीति-रिवाजों का उपहास उड़ाया,ईश्वर के अस्तित्व को लेकर चर्चाएँ आयोजित कीं|

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...