पच्छिमी भारत में समाज सुधार

पश्चिमी भारत में सुधार आन्दोलन

सन 1867 ई. में बम्बई में प्रार्थना समाज की स्थापना की गई| महादेव गोविन्द रानाडे और रामकृष्ण भंडारकर इसके मुख्य संस्थापक थे| प्रार्थना समाज के नेता ब्रहम समाज से प्रभावित थे|उन्होंने जाति-प्रथा और छुआछुत के व्यवहार का विरोध किया| उन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए कार्य किया और विधवा-पुनर्विवाह की वकालत की| रानाडे,जोकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भी संस्थापकों में से एक थे,ने 1887 ई. में इंडियन नेशनल सोशल कांफ्रेंस  की स्थापना की जिसका उद्देश्य संपूर्ण भारत में सामाजिक सुधार के लिए प्रभावशाली तरीके से कार्य करना था| इस कांफ्रेंस का आयोजन भी प्रतिवर्ष सामाजिक समस्याओं पर चर्चा के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों के साथ ही होता था| रानाडे का मानना था कि सामाजिक सुधारों के बिना राजनीतिक व आर्थिक क्षेत्र में उन्नति संभव नहीं है| वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के बड़े समर्थक थे और घोषित किया कि भारत जैसा विशाल देश तभी कोई उन्नति कर सकता है जब हिन्दू व मुस्लिम दोनों हाथ मिलाकर एक साथ आगे बढ़ें| पश्चिमी भारत के दो अन्य महान सुधारक गोपाल हरि देशमुख लोकहितवादी और ज्योतिराव गोविंदराव फुले  ,जो ज्योतिबा या महात्मा फुले के नाम से प्रसिद्ध रहे,थे| लोकहितवादी अनेक सामजिक सुधार संगठनों से जुड़े हुए थे| उन्होंने महिलाओं की स्थिति में उत्थान के लिए कार्य किया और जाति-प्रथा की आलोचना की|

महात्मा फुले ने अपना संपूर्ण जीवन समाज के शोषित व दलित वर्गों के उत्थान और महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने को समर्पित कर दिया| उन्होंने 1848 ई. में तथाकथित निम्न वर्ग की बालिकाओं के लिए स्कूल की स्थापना की और अपनी पत्नी को शिक्षित किया ताकि वे उस स्कूल में पढ़ा सकें| 1873 ई. में उन्होंने सत्यशोधक समाज  की स्थापना की जिसमें जाति व धर्म के भेदभाव के बिना कोई भी प्रवेश पा सकता था| ये समाज के दलित व पिछड़े वर्ग के लोगों को समान अधिकार दिलाने के लिए कार्य करती थी| महात्मा फुले ने ब्राह्मणों की सर्वोच्चता का विरोध किया और ब्राह्मणों के बिना ही विवाह सम्पन्न कराने की परंपरा का प्रारंभ किया| दलितों के लिए उनके द्वारा किये गए कार्यों के कारण ही उन्हें महात्मा की उपाधि प्रदान की गयी थी|

दयानंद सरस्वती और आर्य समाज

दयानंद सरस्वती, जिनका वास्तविक नाम मूल शंकर था, का जन्म काठियाबाढ़ में 1824 ई. में हुआ था| चौदह वर्ष की उम्र में ही उन्होंने मूर्ति पूजा करने से मना कर अपने विद्रोही स्वभाव का परिचय दे दिया था| उसके तुरंत बाद उन्होंने घर छोड़ दिया और ज्ञान की खोज में अपने जीवन को समर्पित कर दिया| इस दौरान उन्होंने संस्कृत भाषा और साहित्य में प्रवीणता हासिल की 1863 ई. में उन्होंने अपने इस सिद्धांत का उपदेश देना प्रारंभ कर दिया कि ईश्वर केवल एक है जिसकी पूजा मूर्तियों के रूप में नहीं बल्कि अंतर्मन के करनी चाहिए| उन्होंने इस मत का प्रचार किया की वेदों में वह ज्ञान समाहित है जिसे ईश्वर ने मनुष्य को प्रदान किया है और आधुनिक विज्ञान से सम्बंधित जरुरी बातों को भी उनमें खोजा जा सकता है| अपने इस सन्देश के साथ उन्होंने संपूर्ण भारत का भ्रमण किया और 1875 ई. में बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की| दयानंद ने अपने उपदेशों व लेखन की भाषा के रूप में हिंदी को चुना| सत्यार्थ प्रकाश उनके द्वारा लिखी गयी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है|

हिंदी भाषा के प्रयोग के कारण उनके विचार उत्तर भारत के सामान्य जन तक पहुचनें में सक्षम हो सके| उत्तर प्रदेश, राजस्थान,गुजरात में आर्य समाज का बहुत तेजी से प्रसार हुआ और पंजाब में तो यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक व राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा| आर्य समाज के सदस्य दस सिद्धांतों का अनुसरण करते थे,जिनमें सबसे पहला सिद्धांत वेदों का अध्ययन था| अन्य सिद्धांत सदाचार व नैतिकता से सम्बंधित थे|दयानंद ने इनके लिए एक सामाजिक व्यवहार संहिता भी तैयार की थी,जिसमें जातिगत भेदभाव व सामाजिक असमानता के लिए कोई जगह नहीं थी|

आर्य समाजवादियों बाल विवाह का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया| पूरे उत्तर भारत में शिक्षा के प्रसार हेतु उन्होंने बालकों व बालिकाओं के लिए स्कूलों व कॉलेजों के एक तंत्र की स्थापना की जिसकी शुरुआत लाहौर के दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल से हुई थी,जो जल्द ही पंजाब के प्रमुख कॉलेज के रूप में विकसित हो गया| यहाँ आधुनिक तर्ज पर अंग्रेजी व हिंदी में शिक्षा प्रदान की जाती थी| दयानंद के कुछ शिष्य जो दयानंद के मूल अभिप्राय को बनाये रखना चाहते थे,ने शिक्षा की प्राचीन आश्रम पद्धति के आधार पर हरिद्वार में गुरुकुल की स्थापना की| दयानंद ने वेदों को परमसत्य माना क्योकि वे हिन्दुओं को धार्मिक विश्वासों का एक निश्चित ढांचा प्रदान करना चाहते थे| उन्होंने इस्लाम व इसाई धर्म स्वीकार कर चुके हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लेन के लिए शुद्धि आन्दोलन भी चलाया| अनेक सुधारकों ने अपने सामाजिक व धार्मिक विचारों को पुष्ट करने के लिए वेदों व अन्य प्राचीन धर्म-ग्रंथों से उदहारण प्रस्तुत किये| उन्होंने तर्क के आधार पर अपने विचारों को बल दिया जबकि कुछ अन्य ने खुले तौर पर इन प्राचीन धर्म-ग्रंथों की आलोचना भी की|शिक्षा के प्रोत्साहन,स्त्रियों के उत्थान और जाति-प्रथा के बंधनों को कमजोर करने के सन्दर्भ में दयानंद और आर्य समाज का योगदान किसी भी अन्य सुधार आन्दोलन की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण था|

पंजाब का इतिहास

पंजाब

दसवें एवं अंतिम गुरु गुरु गोविन्द सिंह  सिक्खों को एक लड़ाकू समूह के रूप में संगठित तो कर दिया था लेकिन औरंगजेब के शासनकाल तक वे कोई भी राज्य प्राप्त करने में सफल न हो सके। उनकी मृत्यु के बाद सिक्खों को बंदा बहादुर (1708-1716 ई।) के रूप में एक एक योग्य नेता प्राप्त हुआ। उन्होंने बड़ी संख्या में सिक्खों को संगठित किया और  सरहिंद  पर कब्ज़ा कर लिया। उसने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना का प्रयास किया और गुरुनानक व गुरु गोविन्द सिंह के नाम पर सिक्के चलवाए तथा अपनी मुहर लगे हुए आदेश जारी किये। उसके नेतृत्व में सिक्खों ने मुग़लों का बहादुरीपूर्वक विरोध किया और लाहौर से दिल्ली के बीच के पूरे क्षेत्र पर जमकर लूटपाट की। मुगलों के विरुद्ध अपने संघर्ष के दौरान उसे गुरुदासपुर के किले में बंदी लिया गया। उसके बाद बंदा बहादुर और उसके समर्थकों को दिल्ली भेज दिया गया जहाँ उनके साथ बहुत अमानवीय व्यवहार किया गया। बंदा बहादुर के युवा पुत्र की हत्या कर दी गयी और स्वयं उसे भी अनेक तरह से उत्पीड़ित किया और उसकी भी हत्या कर दी गयी। बंदा बहादुर के समर्थक उसे ‘सच्चा पादशाह’ (सच्चा बादशाह) कहते थे।

गुरुनानक और गुरु गोविन्द सिंह के मतों/सिद्धांतों ने लोगों के दिलों में गहरी जड़ें जमा ली थी। सिक्खों ने स्वयं को धीरे धीरे एक सिख राज्य के रूप में संगठित कर लिया।पंजाब में नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों के बाद उपजी अव्यवस्था और संदेह की स्थिति ने सिखों को एक शक्ति के रूप में उभरने में मदद की। 1764 ई में सिख अमृतसर में इकट्ठे हुए और पहली बार ‘देग,तेग और फ़तेह’ नाम से शुद्ध चांदी के सिक्के ढाले।ये पंजाब राज्य में सिख-सम्प्रभुता की पहली उद्घोषणा थी। उन्होंने स्वयं को बारह मिसलों (लोकतांत्रिक ढांचे पर आधारित सैन्य भाईचारा) में संगठित किया और पंजाब क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।इन मिसलों के प्रमुखों ने आपस में क्षेत्रों का बंटवारा कर लिया था।यहाँ तक की अहमदशाह अब्दाली भी इन मिसलों को नष्ट करने में सफल नहीं हो पाया और उसके भारत से लौटने के दो सालों के भीतर ही सरहिंद और लाहौर में उसके द्वारा नियुक्त किये गए गवर्नरों को बाहर खदेड़ दिया गया। नाभा, पटियाला और कपूरथला जैसी छोटी –छोटी जागीरों का उदय हुआ। 18वीं सदी के अंत में महाराजा रणजीत सिंह ने मिसलों को संयुक्त कर एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की।

मिसल का नाम

मिसल का संस्थापक

सिंहपुरिया मिसल

नवाब कपूर सिंह

अहलुवालिया मिसल

जस्सा सिंह

रामगढ़िया मिसल

जस्सा सिंह रामगढ़िया

फुलकियाँ मिसल

फूल सिंह

कन्हीवा मिसल

जय सिंह

भागी मिसल

हरी सिंह

सुकरचकिया मिसल

चरत सिंह

निशानवालिया मिसल

सरदार सांगत सिंह

करोढ़ सिंघिया मिसल

भगेल सिंह

नकी मिसल

हीरा सिंह

शहीदी मिसल

बाबा दीप सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध

  • अंग्रेजों ने दलीप सिंह के शासनकाल में पंजाब पर आक्रमण किया और लाहौर पर कब्ज़ा कर लिया तथा 9 मार्च 1846 ई में लाहौर की संधि  पर हस्ताक्षर हुए।
  • युद्ध हर्जाने का भुगतान न कर पाने के कारण पंजाब दरबार कंपनी को स्थानांतरित कर दिया गया। कंपनी ने समझोते में प्रमुख भूमिका निभाने वाले गुलाब  सिंह  को कश्मीर सौंप दिया।

द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध

  • संधि की शर्तों और समझौते के बावजूद पंजाब की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ था जिसने द्वितीय आंग्ला- सिख युद्ध का आधार तैयार कर दिया।
  • युद्ध के पश्चात्,लार्ड डलहौजी द्वारा पंजाब को कंपनी में मिला लिया गया और लॉरेंस को पंजाब का प्रथम कमिश्नर बनाया गया।

निष्कर्ष:

18 वीं सदी में मुग़ल साम्राज्य के विघटन और पतन का पूर्व में अधीन किये गए राजाओं और उन क्षेत्रीय नेताओं द्वारा स्वागत किया गया जो अपना खुद का एक राज्य निर्मित करना चाहते थे।पंजाब एक ऐसा ही क्षेत्र था जिसका मुग़ल साम्राज्य के कमजोर पड़ने के बाद उदय हुआ।

1928 मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट

नेहरू रिपोर्ट

12 फरवरी, 1928 को डॉ.एम.ए.अंसारी की अध्यक्षता में दिल्ली में सर्वदलीय सम्मलेन बुलाया गया जिसमे 29 संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे|इस सम्मलेन का आयोजन भारत सचिव लॉर्ड बिर्केन्हेड की चुनौती और साइमन आयोग के प्रत्युत्तर में किया गया था| बम्बई में 19मई1928 को इस सम्मलेन की बैठक में मोतीलाल नेहरु की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी जिसका उद्देश्य भारत के संविधान के की रुपरेखा व सिद्धांतों का निर्धारण करना था|

नेहरु रिपोर्ट की अनुशंसाएं

• भारत को डोमिनियन का दर्जा दिया जाये और संसदीय रूप की सरकार स्थापित की जाये जिसमे द्विसदनीय विधायिका- सीनेट और प्रतिनिधि सदन,हो|

• सीनेट का गठन सात साल के लिए चुने जाने वाले दो सौ सदस्यों से मिलकर हो और प्रतिनिध सदन में पांच साल के लिए चुने जाने वाले पांच सौ सदस्य शामिल हों|गवर्नर जनरल कार्यकारी परिषद् की सलाह पर कार्य करे जो सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी हो|

• भारत में संघीय रूप की सरकार स्थापित की जाये जिसमे अवशिष्ट शक्तियां केंद्र को प्रदान की गयीं हों |अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त कर दिया जाये क्योकि यह सांप्रदायिक भावनाओं को जाग्रत करती है और संयुक्त निर्वाचन प्रणाली स्थापित की जाये|

• पंजाब व बंगाल में समुदायों के लिए कोई सीट आरक्षित नहीं हो लेकिन उन राज्यों में,जहाँ मुस्लिम जनसंख्या उस राज्य की कुल जनसंख्या के दस प्रतिशत से भी कम है,मुस्लिमों के लिए सीटों का आरक्षण किया जा सकता है|

• न्यायपालिका विधायिका से स्वतंत्र हो|

• केंद्र में एक चौथाई मुस्लिम प्रतिनिधित्व होना चाहिए|

• सिंध को बम्बई प्रान्त से अलग किया जाये|

निष्कर्ष

नेहरु रिपोर्ट में कहा गया कि भारत के लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता है| इस रिपोर्ट ने अमेरिका के अधिकार पत्र से प्रेरणा ग्रहण की, जिसने भारत के संविधान में मूल अधिकारों सम्बन्धी प्रावधानों की आधारशिला रखी थी|

दक्षिण भारत में समाज सुधार

दक्षिण भारत में सुधार

बंगाल से शुरू होकर धार्मिक व सामाजिक सुधार आन्दोलन भारत के अन्य भागों में भी फैल गए|ब्रहम समाज से प्रेरित होकर 1864 ई. में मद्रास में वेद समाज की स्थापना की गयी| इसने जातिगत भेदभाव का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह व स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहित किया| ब्रहम समाज के समान,वेद समाज ने भी अंधविश्वासों व हिन्दू धर्म के रूढ़िवादी रीति-रिवाजों का विरोध किया और एक परमसत्ता में विश्वास व्यक्त किया| वेद समाज के सबसे प्रमुख नेता चेम्बेती श्रीधरालू नायडू थे| उन्होंने ब्रहम समाज की पुस्तकों का तमिल और तेलगू भाषा में अनुवाद किया|बाद में आंध्र प्रदेश,कर्नाटक व तमिलनाडु के कुछ शहरों में ब्रहम समाज की शाखाएं स्थापित हुईं और इसके तुरंत बाद प्रार्थना समाज की भी शाखाएं स्थापित हुईं| इन दोनों समाजों ने मिलकर सामाजिक व धार्मिक सुधारों को प्रोत्साहित करने का कार्य किया|

दक्षिण भारत के सुधार आंदोलनों के सबसे प्रमुख नेता कन्दुकुरी वीरेसलिंगम थे| इनका जन्म 1848 ई. में आंध्र प्रदेश के एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ था| उन्होंने ब्रहम समाज,विशेष रूप से केशवचन्द्र सेन,के विचारों से प्रभावित होकर स्वयं को सामाजिक सुधारों के प्रति समर्पित कर दिया| 1876 ई. में उन्होंने एक तेलगू पत्र निकाला जो लगभग पूरी तरह से सामाजिक सुधारों के प्रति समर्पित था|उनका सबसे बड़ा योगदान महिलाओं की मुक्ति के क्षेत्र में था जिसमें स्त्री शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह भी शामिल था|

केरल में नारायण गुरु द्वारा विशेष रूप से समाज के दलितों व शोषितों के उत्थान के लिए एक आन्दोलन शुरू किया गया|नारायण गुरु का जन्म 1854ई. में एक एजावा परिवार में हुआ था| एजावा व कुछ अन्य जातियों को केरल में तथाकथित हिन्दु उच्च जातियों द्वारा अछूत माना जाता था| नारायण गुरु ने संस्कृत शिक्षा प्राप्त की और स्वयं के जीवन को एजावा व अन्य दलित लोगों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया| उन्होंने ऐसे मंदिरों की स्थापना की जो जिनमें भगवान व उनकी मूर्तियों के लिए कोई स्थान नहीं था| इन्होनें प्रथम ऐसे मंदिर की स्थापना पास में रहने वाली नदी से पत्थर निकाल कर की गयी थी| इस पत्थर पर निम्नलिखित शब्द लिखे थे-“यह एक ऐसा स्थान है जहाँ सभी लोग जातिगत भेदभाव व धार्मिक शत्रुता के बिना भाईचारे के साथ रहते है| नारायण गुरु ने 1903 ई. में नारायण धर्म परिपालन योगम की स्थापना की,जो सामाजिक सुधार के लिए एक महत्वपूर्ण संगठन बन गया| उन्होंने सभी के लिए ‘एक जाति,एक धर्म और एक ईश्वर’ की वकालत की|

दक्षिण भारत के अनेक समाज सुधारकों ने स्वयं को हिन्दू मंदिरों से सम्बंधित सुधारों के साथ सम्बद्ध किया| इसी क्रम में उन्होंने हिन्दू मंदिरों में प्रचलित देवदासी प्रथा के उन्मूलन की वकालत की| उन्होंने यह मांग भी की कि मंदिरों की संपत्ति पर पुजारियों का अधिकार न होकर जनता का अधिकार होना चाहिए| बहुत से मंदिरों में तथाकथित निम्न जातियों को प्रवेश का अधिकार नहीं था,यहाँ तक कि मंदिरों से सटी हुई सड़कें भी उनके लिए प्रतिबंधित थीं| सुधारकों ने मंदिर-प्रवेश व मंदिरों से जुड़ी अन्य अनेक कुप्रथाओं को समाप्त करने के लिए सशक्त आन्दोलन चलाया|

यंग बंगाल

डेजेरियो और यंग बंगाल

बंगाल में आधुनिक आन्दोलनों की शुरुआत करने में 1817 में स्थापित कलकत्ता के हिन्दू कॉलेज की महत्वपूर्ण भूमिका थी| डेविड हेयर,जोकि राम मोहन राय के सहायक थे,ने इस कॉलेज को प्रारंभ करने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया| वे घड़ियों को बेचने के लिए स्कॉटलैंड से कलकत्ता आये थे,लेकिन बाद में बंगाल में आधुनिक शिक्षा का प्रसार ही उनके जीवन का उद्देश्य बन गया|

1826 ई. में 17 साल के युवा हेनरी विवियन डेरेजियो,जिनके पिता पुर्तगाली मूल के थे और माता एक अंग्रेज थी, ने शिक्षक के रूप में हिन्दू कॉलेज में प्रवेश किया| उन्होंने कुछ ही समय मं  कॉलेज के सबसे बेहतरीन लड़कों को अपने अपनी ओर आकर्षित कर लिया और उन्हें लगातार बंधनों से मुक्त होकर सोचने के लिए प्रेरित करते रहे और स्थापित सत्यों व प्राधिकारों के प्रति प्रश्नाकुलता का भाव जगाते रहे| डेरेजियो ने अपनी शिक्षाओं और विज्ञान,इतिहास,दर्शन, साहित्य आदि पर चर्चाओं के आयोजन के माध्यम से क्रांतिकारी विचारों को प्रोत्साहित किया| अपनी इन गतिविधियों के द्वारा डेरेजियो ने कलकत्ता के युवाओं को व्यवहारिक रूप से प्रभावित किया और उनके बीच एक बौद्धिक आन्दोलन की शुरुआत की|

डेरेजियो और यंग बंगाल

डेरेजियो के छात्रों,जिन्हें सम्मिलित रूप से यंग बंगाल कहा जाता था,ने सभी पुरानी सामाजिक परम्पराओं व रीति-रिवाजों का उपहास उड़ाया,ईश्वर के अस्तित्व को लेकर चर्चाएँ आयोजित कीं,सामाजिक व धार्मिक रूढ़ियों को चुनौती दी,विचारों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग की और महिलाओं के लिए शिक्षा की वकालत की| उन्होंने फ्रांस की क्रांति के आदर्शों और इंग्लैंड की  उदारवादी सोच को महत्व दिया|इस समूह के अत्यधिक उग्रवादी विचारों व धार्मिक मूर्तियों के प्रति आदर प्रदर्शित न करने जैसे उनके कार्यों ने बंगाल के रूढ़िवादी हिन्दुओं को नाराज कर दिया| उनका मानना था की यंग बंगाल की इस उग्र सोच के लिए डेरेजियो की शिक्षाएं जिम्मेदार है और उन्होंने हिन्दू कॉलेज के सक्षम अधिकारियों पर डेरेजयो को बर्खास्त करने के लिए दबाव डाला| डेरेजियो की बर्खास्तगी और 1831 ई. में अचानक उनकी मृत्यु के बाद भी यंग बंगाल आन्दोलन जारी रहा| नेतृत्व के आभाव में भी इस समूह के सदस्य शिक्षा व पत्रकारिता के माध्यम से अपने उग्र विचारों का प्रसार करते रहे|

विचार एवं शिक्षाएं

• डेरेजियो ने अपनी शिक्षाओं और विज्ञान,इतिहास,दर्शन, साहित्य आदि पर चर्चाओं के आयोजन के माध्यम से क्रांतिकारी विचारों को प्रोत्साहित किया|

• डेरेजियो युवा छात्रों के बीच बौद्धिक क्रांति का प्रसार करना चाहते थे|

• वे उदारवादी सोच के प्रबल समर्थक थे|

• वे विचारों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और महिलाओं के लिए शिक्षा के भी प्रबल समर्थक थे |

• सामाजिक व धार्मिक रूढ़ियों का विरोध किया |

• उन्होंने कहा कि उग्र या क्रांतिकारी विचार धर्म-दर्शन का मूल थे|

• उन्होंने पुरानी सामाजिक परम्पराओं व रीति-रिवाजों का उपहास उड़ाया,ईश्वर के अस्तित्व को लेकर चर्चाएँ आयोजित कीं|

डच उपनिवेश की स्थापना भारत में

डच उपनिवेश की स्थापना

हॉलैंड (वर्त्तमान नीदरलैंड) के निवासी डच कहलाते है। पुर्तगालियो के बाद डचों ने भारत में अपने कदम रखे। ऐतिहासिक दृष्टि से डच समुद्री व्यापार में निपुण थे। 1602 ईमें नीदरलैंड की यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गयी और डच सरकार द्वारा उसे भारत सहित ईस्ट इंडिया के साथ व्यापार करने की अनुमति प्रदान की गयी।

डचों का उत्थान

1605 ई में डचों ने आंध्र प्रदेश के मुसलीपत्तनम में अपनी पहली फैक्ट्री स्थापित की। बाद में उन्होंने भारत के अन्य भागों में भी अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित किये। डच सूरत और डच बंगाल की स्थापना क्रमशः 1616 और 1627 में की गयी थी। डचों ने 1656 ई में पुर्तगालियों से सीलोन जीत लिया और 1671 ई में पुर्तगालियों के मालाबार तट पर स्थित किलों पर भी कब्ज़ा कर लिया। पुर्तगालियों से नागापट्टिनम जीतने के बाद डच काफी सक्षम गए और दक्षिण भारत में अपने पैर जमा लिए। उन्होंने काली मिर्च और मसालों के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक लाभ कमाया। कपास, अफीम, नील, रेशम और चावल वे प्रमुख भारतीय वस्तुएं है जिनका व्यापार डचों द्वारा किया जाता था।

डच सिक्के

डचों ने भारत में रहने के दौरान सिक्कों की ढलाई पर भी हाथ आजमाए। जैसे जैसे उनके व्यापार में वृद्धि होती गयी उन्होंने कोचीन, मूसलीपत्तनम, नागापट्टिनम , पोंडिचेरी और पुलीकट में टकसालों की स्थापना की। पुलीकट स्थित टकसाल से भगवान वेंकटेश्वर (भगवान विष्णु) के चित्र वाले सोने के पैगोडा  सिक्के जारी किये गए। डचों द्वारा जारी किये गए सभी सिक्के स्थानीय सिक्का ढलाई के नमूनों पर आधारित थे।

डच शक्ति का पतन

भारतीय उप-महाद्वीप पर डचों की उपस्थिति 1605 ई से लेकर 1825 ई तक रही थी। पूर्व के साथ व्यापार में ब्रिटिश शक्ति के उदय ने डचों के व्यापारिक हितों के प्रति एक चुनौती प्रस्तुत की जिसके परिणामस्वरूप दोनों के मध्य खूनी संघर्ष हुए। इन संघर्षों में स्पष्ट रूप से ब्रिटिशों की विजय हुई क्योकि उनके पास अधिक संसाधन थे। अम्बोयना में डचों द्वारा कुछ ब्रिटिश व्यापारियों की नृशंस हत्या ने परिस्थितियों को और बिगाड़ दिया। ब्रिटिशों द्वारा एक के बाद एक लगभग सभी डच क्षेत्रों को अपने कब्जे में ले लिया गया।

मालाबार क्षेत्र में डच शक्ति की घोर पराजय

डच-अंग्रेज संघर्ष के मध्य त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा द्वारा 1741 ई में कोलाचेल के युद्ध में डच ईस्ट इंडिया कंपनी को पराजित करने के साथ ही मालाबार क्षेत्र में डच शक्ति का पूर्णतः पतन हो गया।

ब्रिटिशों के साथ संधियाँ और संघर्ष

हालाँकि 1814 ई की एंग्लो-डच संधि के तहत डच कोरोमंडल और डच बंगाल पुनः डच शासन के अधीन आ गए थे लेकिन 1824 ई में हस्ताक्षरित एंग्लो-डच संधि के प्रावधानों के तहत फिर से ब्रिटिश शासन के अधीन आ गए क्योकि इस संधि के तहत डचों के लिये 1 मार्च 1825 ई तक सारी संपत्ति और क्षेत्रों को हस्तांतरित करना बाध्यकारी बना दिया गया। 1825 ई के मध्य तक डच भारत में अपने सभी व्यापारिक क्षेत्रों से वंचित हो चुके थे। एक समझौते के तहत ब्रिटिशों ने आपसी अदला-बदली के तरीके के आधार पर खुद को  इंडोनेशिया के साथ व्यापार से अलग कर लिया और बदले में डचों ने भारत के साथ अपना व्यापार बंद कर दिया।

भारत में डेनिश औपनिवेशिक क्षेत्र

डेनमार्क से सम्बंधित किसी भी व्यक्ति या वस्तु को डेनिश  कहा जाता है। डेनमार्क द्वारा लगभग  225 वर्षों तक भारत में अपने उपनिवेश बनाये रखे गए। भारत में स्थापित डेनिश बस्तियों मे त्रंकोबार (तमिलनाडु) ,सेरामपुर (पश्चिम बंगाल) और निकोबार द्वीप शामिल थे।

डेनिश व्यापारिक एकाधिकार की स्थापना

एक डच साहसी मर्सलिस दे बोशौवेर ने भारतीय उप-महाद्वीप में डेनिश हस्तक्षेप के लिए प्रेरणा प्रदान की। वह सहयोगी दलों से सभी तरह के व्यापार पर एकाधिकार के वादे के साथ पुर्तगालियों के विरुद्ध सैन्य सहयोग चाहता था। उसकी अपील ने डेनमार्क-नॉर्वे के राजा क्रिस्चियन चतुर्थ को प्रभावित किया  जिसने बाद में 1616 ई में एक चार्टर जारी किया जिसके तहत डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी को डेनमार्क और एशिया के मध्य होने वाले व्यापार पर बारह वर्षों के लिए एकाधिकार प्रदान कर दिया गया।

डेनिश चार्टर्ड कंपनियां

दो डेनिश चार्टर्ड कंपनियां थी। प्रथम कंपनी डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी  थी ,जिसका कार्यकाल 1616 ई से लेकर  1650 ई तक था। डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी और स्वीडिश ईस्ट इंडिया कंपनी मिलकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से ज्यादा चाय का आयात करती थीं और उसमे से अधिकांश को अत्यधिक लाभ पर अवैध तरीके से ब्रिटेन में बेचता था। इस कंपनी का 1650 ई में विलय कर दिया गया। दूसरी कंपनी 1670  ई से लेकर 1729 ई तक सक्रिय रही । 1730  ई में एशियाटिक कंपनी के रूप में इसकी पुनः स्थापना की गयी। 1732 ई में इसे शाही लाइसेंस प्रदान कर अगले चालीस वर्षों के लिए आशा अंतरीप के पूर्व से होने वाले डेनिश व्यापार पर एकाधिकार प्रदान कर दिया गया। 1750 ई तक भारत से 27 जहाज भेजे गए जिनमे से 22 जहाज सफलतापूर्वक यात्रा पूरी कर कोपेनहेगेन पहुचे। लेकिन 1722 ई में कंपनी ने अपना एकाधिकार खो दिया।

सेरामपुर मिशन प्रेस

यहाँ यह उल्लेख करना जरुरी है कि सेरामपुर मिशन प्रेस की स्थापना ,जोकि एक ऐतिहासिक एवं युगांतरकारी  कदम था, सेरामपुर में डेनिश मिशनरी द्वारा  1799 ई में की गयी थी। 1801 ई से लेकर 1832 ई तक सेरामपुर मिशन प्रेस ने 40 विभिन्न भाषाओं में  किताबों की 212,000  प्रतियाँ छापीं।

भारत में डेनिश बस्तियों की समाप्ति

नेपोलियन युद्ध (1803-1815 ई।) के दौरान ब्रिटिशों ने डेनिश जहाजों पर हमला कर डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत के साथ होने वाले व्यापर को नष्ट कर दिया और अंततः डेनिश बस्तियों पर कब्ज़ा कर उन्हें ब्रिटिश भारत का हिस्सा बना लिया। अंतिम डच बस्ती सेरामपुर  को 1845 ई में डेनमार्क द्वारा ब्रिटेन को हस्तांतरित कर दिया गया।

राजपूत

राजपूत

औरंगजेब की धार्मिक और प्रशासनिक नीतियों से असंतुष्ट होकर मेवाड (उदयपुर) ,मारवाड (जोधपुर) और आमेर (जयपुर) जैसे प्रमुख राजपूत राज्य मुग़ल साम्राज्य से अलग हो गए।जोधपुर और जयपुर के शासकों को गुजरात और मालवा का मुग़ल गवर्नर नियुक्त किया गया था। एक समय तो ऐसा लगा कि राजपूत मुगल साम्राज्य में अपनी स्थिति और प्रभाव को फिर से प्राप्त कर रहें है और जाटों एवं मराठों के विरुद्ध मुग़ल साम्राज्य के प्रमुख सहयोगी के रूप में उभर रहे है। जोधपुर और जयपुर के राजाओं ने उत्तरवर्ती मुगलों के काल में मुग़ल साम्राज्य के काफी बड़े हिस्से को अपने प्रभाव में ले लिया।औरंगजेब की मृत्यु के बाद जोधपुर और जयपुर के राजा दिल्ली की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाने लगे।

इस समय के सबसे प्रमुख राजपूत राजा आमेर के सवाई राजा जय सिंह थे जिन्हें पहले सूरत और बाद में आगरा का गवर्नर नियुक्त किया गया था। उन्होंने जयपुर जैसे सुन्दर शहर की स्थापना की और दिल्ली, जयपुर ,वाराणसी ,उज्जैन और मथुरा में नक्षत्र वेधशालाओं (जंतर-मंतर) का निर्माण कराया। आगरा से लेकर सूरत तक के क्षेत्र का उनके हाथों में होने से उन्हें अपने राज्य को मजबूत और समृद्ध बनाने में मदद मिली।जाटों,मराठों और अन्य क्षेत्रीय राज्यों के उदय होने से अपने राज्य के बाहर उनकी जागीरें कम होने लगी और उनका प्रभाव भी धीरे-धीरे कम होने लगा।

हालाँकि, राजपूतों की राजनीतिक शक्ति का ह्रास हो गया था लेकिन एक राजस्थानी समूह का देश की अर्थव्यवस्था में प्रभाव बढ़ गया था। ये वे व्यापारी थे जो उस समय गुजरात ,दिल्ली,आगरा के महत्वपूर्ण केन्द्रों के बीच होने वाले व्यापार में शामिल थे।साम्राज्य के पतन के साथ ही इन केन्द्रों का व्यवसायिक महत्व भी कम होने लगा। अतः ये व्यापारी नए केन्द्रों की और बढ़े और बंगाल, अवध एवं दक्कन में व्यापार और वाणिज्य को नियंत्रित करने लगे।

निष्कर्ष

राजपूतों ने सम्राट औरंगजेब की नीतियों से असंतुष्ट होकर स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। मुग़ल साम्राज्य के टूटने से संपूर्ण भारत की राजनीतिक परिस्थितियाँ बदल गयीं ।इन बदलती परिस्थितियों के कारण पूरे भारत के राजनीतिक,आर्थिक और सैन्य गठबंधनों में आमूल-चूल बदलाव आ गया।

जाट

जाट

मुग़ल शासक औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह करने के बाद 17 वीं सदी में शक्तिशाली भरतपुर राज्य की स्थापना के साथ जाट राज्य अस्तित्व में आया। विद्रोही मुख्यतः हरियाणा,पंजाब और गंगा दोआब के पश्चिमी भाग के ग्रामीण इलाकों में केन्द्रित थे और पूर्वी क्षेत्र में अनेक छोटे छोटे राज्य मिलते थे। ये प्राचीन व मध्यकालीन कृषक के साथ साथ महान योद्धा भी थे जिन्हें हिन्दू और मुस्लिम शासकों द्वारा सैनिक के रूप भर्ती किया गया था।

आगरा क्षेत्र के कुछ महत्वाकांक्षी जाट ज़मींदारों का मुग़ल,राजपूत और अफगानों के साथ संघर्ष भी हुआ क्योकि वे जाट जमींदार एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना करना चाहते थे। सूरजमल एकमात्र जाट नेता था,  जिसने बिखरे हुए जाटों को एक शक्तिशाली राज्य के रूप में संगठित किया। कुछ प्रमुख जाट नेताओं का विवरण निम्नलिखित है-

  • गोकला: वह तिलपत का जमींदार था जिसने 1669 ई.में जाट विद्रोह का नेतृत्व किया था।लेकिन मुग़ल गवर्नर हसन अली द्वारा विद्रोह को दबा दिया गया और गोकला की मृत्यु हो गयी।
  • राजाराम: वह सिंसना का जमींदार था जिसने 1685 ई.में जाट विद्रोह का नेतृत्व किया।अमर के रजा बिशन सिंह कछवाहा द्वारा इस विद्रोह को दबा दिया गया।
  • चुडामन: वह राजाराम का भतीजा था जिसने 1704 ई.में मुगलों को हराकर सिंसनी पर कब्ज़ा कर लिया। इसने भरतपुर राज्य की स्थापना की और बहादुर शाह ने इसे मनसब प्रदान किया था। इसने बंदा बहादुर के विरुद्ध मुग़ल अभियान में मुगलों का साथ दिया था।
  • बदन सिंह: वह चुडामन का भतीजा था जिसे अहमद शाह अब्दाली ने राजा की उपाधि प्रदान की थी। उसे जाट राज्य भरतपुर का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
  • सूरजमल: वह बदनसिंह द्वारा गोद लिया गया पुत्र था ।उसे जाट शक्ति का प्लेटो  और जाट अफलातून  भी कहा जाता है क्योंकि उसने जाट राज्य को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया था। उसने दिल्ली,आगरा और मेवाड के क्षेत्रों में जाट अभियानों का नेतृत्व किया और पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों की सहायता करने के लिए भी सहमत हुआ। पठानों द्वारा दिल्ली के पास उसकी हत्या कर दी गयी।

निष्कर्ष

17 वीं सदी में मुगलों के विघटन के कारण जाटों के रूप में एक नयी लड़ाकू जाति का उदय हुआ,जिन्होंने स्वयं को  मध्य एशिया से भारत में प्रवेश करने वाले इंडो-सीथियन का वंशज घोषित किया। हालाँकि उन्होंने राज्य का गठन तो किया लेकिन उनकी आतंरिक संरचना जनजातीय संघ जैसी ही बनी रही।

1905 का बंगाल बिभाजन

उग्रपंथ और बंगाल विभाजन

उग्रपंथियों का राजनीतिक उदय कांग्रेस के अन्दर ही बंगाल विभाजन विरोधी प्रदर्शनों से हुआ था|जब ब्रिटिश सरकार ने बंगाल के लोगों द्वारा किये जा रहे जन प्रदर्शनों के बावजूद बंगाल के विभाजन को रद्द करने से मना कर दिया तो अनेक युवा नेताओं का सरकार से मोहभंग हो गया, इन्हें ही नव-राष्ट्रवादी या उग्रपंथी कहा गया| लाला लाजपत राय,बाल गंगाधर तिलक,बिपिन चंद्र पाल और अरविन्द घोष प्रमुख उग्रपंथी नेता थे|उन्हें उग्रपंथी कहा गया क्योकि उनका मानना था कि सफलता केवल उग्र माध्यमों से ही प्राप्त की जा सकती है|

उग्रपंथ के उदय के कारण

1.नरमपंथियों/उदारवादियों द्वारा सिवाय भारतीय परिषद् अधिनियम(1909) के तहत विधान परिषदों के विस्तार के,कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल न कर पाना |

2.1896-97 के प्लेग और अकाल,जो भारत के लोगों की आर्थिक स्थिति में ह्रास का कारण बना,के बाद भी ब्रिटिशों की शोषणकारी नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया|

3.दक्षिण अफ्रीका में भारतियों के साथ रंग-भेद|

4.1904-05 की रूस-जापान युद्ध की घटना ने राष्ट्रीय जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी|

प्रमुख उग्रपंथी/गरमपंथी

• बाल गंगाधर तिलक: इन्हें ‘लोकमान्य’  भी कहा जाता है| इनके द्वारा निकाले गए ‘मराठा’(अंग्रेजी में) व ‘केसरी’(हिंदी में) नाम के साप्ताहिक पत्रों ने ब्रिटिश शासन पर हमलों में क्रांतिकारी भूमिका निभाई|1916 में इन्होने पूना में होमरूल लीग की स्थापना की और नारा दिया कि “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मै इसे लेकर रहूँगा”|

• लाला लाजपत राय:इन्हें ‘शेरे-पंजाब’ या ‘पंजाब का शेर’ कहा जाता था|इन्होने स्वदेशी आन्दोलन  में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी| ‘साइमन वापस जाओ’ का नारा इन्होने ही दिया था|

• बिपिन चन्द्र पाल:ये पहले उदारवादी थे लेकिन बाद में उग्रपंथी बन गए| इन्होने स्वदेशी आन्दोलन  में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी|अपने प्रभावशाली भाषणों व लेखन के द्वारा इन्होनें राष्ट्रवाद के विचार को देश के कोने-कोने तक पहुँचाया|

• अरविन्द घोष:ये एक अन्य उग्रपंथी नेता थे जिन्होनें स्वदेशी आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई थी|

बंगाल का विभाजन

बंगाल विभाजन भारत में ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्जन ने 1905 में लागू किया किया था जिसके कारण निम्नलिखित थे-

• बंगाली राष्ट्रवाद की ताकत को तोड़ना क्योकि बंगाल भारतीय राष्ट्रवाद का केंद्र था|

• बंगाल में हिन्दुओं व मुस्लिमों को विभाजित करना|

• यह दर्शाना की ब्रिटिश सरकार इतनी शक्तिशाली है कि वह जो चाहे कर सकती है|

लेकिन विभाजन ने स्वतंत्रता संग्राम के प्रति जन को जागृत कर जन-आन्दोलन का रूप दे दिया जिसका परिणाम बहिष्कार और स्वदेशी आन्दोलन के रूप में दिखाई दिया|

जलियांवाला बाग

जलियाँवाला बाग

जलियांवाला बाग हत्याकांड ने ब्रिटिशों के अमानवीय चेहरे को सामने ला दिया |ब्रिटिश सैनिकों ने एक लगभग बंद मैदान में हो रही जनसभा में एकत्रित निहत्थी भीड़ पर, बगैर किसी चेतावनी के, जनरल डायर के आदेश पर गोली चला दी  गई क्योकि  वे प्रतिबन्ध के बावजूद जनसभा कर रहे थे|

13 अप्रैल को यहाँ एकत्रित यह भीड़ दो राष्ट्रीय नेताओं –सत्यपाल और डॉ.सैफुद्दीन किचलू ,की गिरफ्तारी का विरोध कर रही थी| अचानक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी जनरल डायर ने अपनी सेना को निहत्थी भीड़ पर,तितर-बितर होने का मौका दिए बगैर, गोली चलाने के आदेश दे दिए और 10 मिनट तक या तब तक गोलियां चलती रहीं जब तक वे ख़त्म नहीं हो गयीं| इन 10 मिनटों, (कांग्रेस की गणना के अनुसार) एक हजार लोग मारे गए और लगभग दो हजार लोग घायल हुए| गोलियों के निशान अभी भी जलियांवाला बाग़ में देखे जा सकते है,जिसे कि अब राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया है| यह नरसंहार पूर्व-नियोजित था और जनरल डायर ने गर्व के साथ घोषित किया कि उसने ऐसा सबक सिखाने के लिए किया था और अगर वे लोग सभा जारी रखते तो उन सबको वह मार डालता| उसे अपने किये पर कोई शर्मिंदगी नहीं थी| जब वह इंग्लैंड गया तो कुछ अंग्रेजों ने उसका स्वागत करने के लिए चंदा इकट्ठा किया| जबकि कुछ अन्य डायर के इस जघन्य कृत्य से आश्चर्यचकित थे और उन्होंने जांच की मांग की | एक ब्रिटिश अख़बार ने इसे आधुनिक इतिहास का सबसे ज्यादा खून-खराबे वाला नरसंहार कहा|

21 वर्ष बाद ,13 मार्च,1940 को,एक क्रांतिकारी भारतीय ऊधम सिंह ने माइकल ओ डायर की गोली मारकर ह्त्या कर दी क्योंकि जलियांवाला हत्याकांड की घटना के समय वही पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर था| नरसंहार ने भारतीय लोगों में गुस्सा भर दिया जिसे दबाने के लिए सरकार को पुनः बर्बरता का सहारा लेना पड़ा| पंजाब के लोगों पर अत्याचार किये गए,उन्हें खुले पिंजड़ों में रखा गया और उन पर कोड़े बरसाए गए| अख़बारों पर प्रतिबन्ध लगा दिए गए और उनके संपादकों को या तो जेल में डाल दिया गया या फिर उन्हें निर्वासित कर दिया गया| एक आतंक का साम्राज्य ,जैसा कि 1857 के विद्रोह के दमन के दौरान पैदा हुआ था,चारों तरफ फैला हुआ था| रविन्द्रनाथ टैगोर ने अंग्रेजों द्वारा उन्हें प्रदान की गयी नाईटहुड की उपाधि वापस कर दी| ये नरसंहार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ|

दिसंबर,1919 में अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ| इसमें किसानों सहित बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया| यह स्पष्ट है कि इस नरसंहार ने आग में घी का काम किया और लोगों में दमन के विरोध और स्वतंत्रता के प्रति इच्छाशक्ति को और प्रबल कर दिया|

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...