1793 का चार्टर अधिनियम

चार्टर अधिनियम,1793

1793 ई. में पारित चार्टर अधिनियम द्वारा कंपनी के भारत के साथ व्यापारिक एकाधिकार को अगले बीस वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया और गवर्नर जनरल के अधिकार क्षेत्र में बम्बई और मद्रास के गवर्नर को भी शामिल कर दिया| सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को खुले सागर तक बढ़ा दिया |वे नागरिक सेवा के किसी भी सदस्य को शांति –न्यायाधीश के रूप में नियुक्त कर सकते थे|वे प्रेसीडेंसी नगरों के लिए सफाई कर्मचारी भी नियुक्त कर सकते थे और बिना लाइसेंस के शराब की बिक्री पर प्रतिबन्ध भी लगा सकते थे|
अधिनियम की विशेषताएं
• अधिनियम कम्पनी को व्यापारिक विशेषाधिकार प्रदान करता है और अगले बीस वर्षों के लिए उन्हें नवीनीकृत करता है|
•  गवर्नर जनरल के अधिकार क्षेत्र में बम्बई और मद्रास के गवर्नर को भी शामिल कर दिया |

खिलाफत और असहयोग आंदोलन

खिलाफ़त और असहयोग आन्दोलन

ब्रिटिश शासन के प्रति बढ़ते क्रोध ने खिलाफत आन्दोलन और असहयोग आन्दोलन को जन्म दिया| तुर्की ने प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन के विरुद्ध भाग लिया था| तुर्की,जोकि पराजित देशों में से एक था,के साथ ब्रिटेन ने अन्याय किया|1919 ई. में मोहम्मद अली और शौकत अली (अली बंधुओं के नाम से प्रसिद्ध), मौलाना अबुल कलाम आज़ाद,हसरत मोहानी व कुछ अन्य के नेतृत्व में तुर्की के साथ हुए अन्याय के विरोध में खिलाफत आन्दोलन चलाया गया| तुर्की के सुल्तान को खलीफा अर्थात मुस्लिमों का धर्मगुरु भी माना जाता था| अतः तुर्की के साथ हुए अन्याय के मुद्दे को लेकर जो आन्दोलन शुरू हुआ,उसे ही खिलाफत आन्दोलन कहा गया| इसने असहयोग का आह्वाहन किया| खिलाफत के मुद्दे को लेकर शुरू हुआ आन्दोलन जल्द ही स्वराज और पंजाब में दमन के विरोध में चलाये जा रहे आन्दोलन के साथ मिल गया| गाँधी जी नेतृत्व में 1920 ई. में कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में पहली बार और बाद में नागपुर के कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में सरकार के विरुद्ध संघर्ष हेतु एक नए कार्यक्रम को स्वीकृत किया गया | नागपुर अधिवेशन,जिसमे 15000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था,में कांग्रेस के संविधान में संशोधन किया गया और “वैधानिक व शांतिपूर्ण तरीकों से भारतीयों के द्वारा स्वराज्य की प्राप्ति” को कांग्रेस के संविधान का प्रथम प्रावधान बना दिया गया|

यह आन्दोलन तुर्की और पंजाब में हुए अन्याय के विरोध और स्वराज्य की प्राप्ति के लिए शुरू हुआ था| इसमें अपनाये गए तरीकों के कारण इसे असहयोग आन्दोलन कहा गया, इसकी शुरुआत ब्रिटिशों द्वारा भारतीयों को प्रदान की जाने वाली ‘सर’ की उपाधि की वापसी के साथ हुई| सुब्रमण्यम अय्यर और रबिन्द्रनाथ टैगोर पहले ही ऐसा कर चुके थे| अगस्त 1920 में गाँधी ने अपनी कैसर-ए-हिन्द की उपाधि लौटा दी | अन्य लोगों ने भी ऐसा ही किया| ब्रिटिश सरकार से इन उपाधियों का प्राप्त करना अब भारतीयों के लिए सम्मान का विषय नहीं रह गया अतः सरकार के साथ असहयोग किया गया| बाद में विधायिकाओं का भी बहिष्कार किया गया|

अनेक लोगों ने विधायिकाओं के चुनाव में अपना मत देने से इंकार कर दिया| हजारों छात्रों व शिक्षकों ने स्कूलों व कॉलेजों को छोड़ दिया| जामिया मिलिया इस्लामिया,अलीगढ (जो बाद में दिल्ली में स्थापित हो गया था) और कशी विद्यापीठ,बनारस जैसे नए शिक्षा संस्थानों की स्थापना राष्ट्रवादियों द्वारा की गयी| सरकारी कर्मचारियों ने अपनी नौकरी छोड़ दी,वकीलों ने न्यायालयों का बहिष्कार किया,विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गयी और पूरे देश में बंद व हड़तालों का आयोजन किया गया| आन्दोलन को अपार सफलता मिली और गोलीबारी व गिरफ्तारियां इसे रोक न सकीं|

वर्ष 1921 की समाप्ति से पूर्व तक लगभग 30,000 लोगों को जेल में डाल दिया गया था| इनमे कई प्रमुख नेता भी शामिल थे| गाँधी जी को किसी भी तरह से अभी गिरफ्तार नहीं किया जा सका था| केरल के कुछ हिस्सों में विद्रोह भड़क गया जिसमे ज्यादातर विद्रोही मोपला किसान थे,इसीलिए इसे मोपला विद्रोह कहा गया| विद्रोह को क्रूर तरीकों से दबा दिया गया | 2000 से ज्यादा मोपला विद्रोही मार दिए गए और 45,000 को गिरफ्तार कर लिया गया| एक स्थान से दुसरे स्थान पर ले जाते समय 67 कैदियों की एक रेलवे वैगन में दम घुटने से हुई मृत्यु इस क्रूरता का ही जीता जागता उदाहरण था|

1921 का कांग्रेस अधिवेशन अहमदाबाद में आयोजित हुआ था जिसकी अध्यक्षता हकीम अजमल खान  ने की थी| इस अधिवेशन में आन्दोलन को जारी रखने का निर्णय किया गया और असहयोग आन्दोलन के अंतिम चरण की शुरुआत करने का भी निर्णय किया गया|इस चरण की शुरुआत लोगों से कर अदा न करने की अपील के साथ होनी थी| इसकी शुरुआत गांधीजी ने गुजरात के बारदोली से की | यह चरण बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि जब लोग सरकार को कर अदा करना से मन कर देंगे तो सरकार की वैधानिकता पर ही प्रश्नचिह्न लग जायेगा| गाँधी जी हमेशा इस बात पर बल दिया कि पूरा आन्दोलन शंतिपूर्ण ढंग से होना चाहिए| लेकिन लोग स्वयं को संयमित नहीं रख सके |उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में 5 फरवरी ,1922 को पुलिस ने बगैर किसी पूर्व सूचना के प्रदर्शन कर रही भीड़ पर गोली चला दी | लोगों ने गुस्से में आकर पुलिस स्टेशन पर धावा बोल दिया और उसमे आग लगा दी| पुलिस स्टेशन के अन्दर कैद 22 पुलिस वाले इस आग में मारे गए| चूँकि गाँधी जी ने यह शर्त रखी थी कि पूरा आन्दोलन शंतिपूर्ण होगा अतः इस घटना की खबर सुनने के बाद ही उन्होंने आन्दोलन को वापस ले लिया |

10 मार्च,1922 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और छह साल की सजा सुनाई गयी| इस आन्दोलन को वापस लेने के साथ ही राष्ट्रवादी आन्दोलन का एक और चरण समाप्त हो गया| इस आन्दोलन में पुरे देश से लोगों ने बड़ी संख्या में भाग लिया था| यह गावों तक फ़ैल गया था| लोगों ने खुलकर सरकार का विरोध किया और स्वराज्य की मांग की | आन्दोलन ने हिन्दुओं व मुस्लिमों के बीच एकता को मजबूत किया | इस आन्दोलन का प्रसिद्द नारा ‘हिन्दू मुसलमान की जय’ था|

क्रिप्स मिशन

क्रिप्स मिशन

सन 1942 की शुरुआत में युद्ध की परिस्थियों ने ब्रिटिशों को भारतीय नेताओं से बात करने पर मजबूर कर दिया| दक्षिण पूर्व एशिया के विभिन्न देशों में जापानी सेना के हाथों ब्रिटिश सेना को हार का सामना करना पड़ा था|जापानियों ने भारत के भी कई क्षेत्रों पर हवाई हमले किये थे|इसी समय ब्रिटिश मंत्रिमंडल के सदस्य सर स्टैफोर्ड क्रिप्स को भारतीय नेताओं  के साथ बात करने के लिए भारत भेजा गया| इसे क्रिप्स मिशन के नाम से जाना गया| यह वार्ता विफल रही| ब्रिटिश,भारत में वास्तविक राष्ट्रीय सरकार की स्थापना करने के इच्छुक नहीं थे| उन्होंने रजवाड़ों के हितों को बढावा देने का भी प्रयास किया| हालाँकि उन्होंने संविधान सभा की मांग स्वीकार ली थी लेकिन इस बात पर जोर दिया कि सभा में भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व रजवाड़ों द्वारा नामित सदस्यों के द्वारा किया जाये और राज्यों की जनता का इसमें कोई प्रतिनिधितित्व न हो|

क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव

• डोमिनियन के दर्जे के साथ एक भारतीय संघ की स्थापना की जाएगी जो कि राष्ट्रमंडल के साथ संबंधों को तय करने के लिए स्वतंत्र होगा साथ संयुक्त राष्ट्र व अन्य अंतर्राष्ट्रीय निकायों में भागीदारी के लिए वह स्वतंत्र होगा|

• युद्ध की समाप्ति के बाद एक नए संविधान का निर्माण करने के लिए संवैधानिक सभा बुलाई जाएगी|इस सभा के सदस्य आंशिक रूप से प्रांतीय सभाओं के द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार चुने जायेंगे और आंशिक रूप से रजवाड़ों द्वारा नामित किये जायेंगे|

• ब्रिटिश सरकार नए संविधान को निम्नलिखित शर्तों पर ही स्वीकार करेगी: (क) जो भी प्रान्त संघ में शामिल नहीं होना चाहता है वह अपना अलग संघ और अलग संविधान निर्मित कर सकता है| (ब) नए संविधान का निर्माण करने वाला निकाय और ब्रिटिश सरकार शक्तियों के हस्तांतरण और प्रजातीय व धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए एक संधि करेगा|

• गवर्नर जनरल का पद यथावत रहेगा और भारत की रक्षा का दायित्व ब्रिटिश हाथों में ही बना रहेगा|

निष्कर्ष

क्रिप्स मिशन द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिशों के प्रति भारतीयों का पूर्ण सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य भेजा गया था| जब स्टैफोर्ड क्रिप्स वापस गए तो अपने पीछे हताशा और कड़वाहट से भरे भारतीयों को छोड़ गये, जिनके मन में अभी भी फासीवादी आक्रोश के शिकार लोगों के प्रति संवेदना थी, जो यह महसूस करते थे कि देश की वर्तमान परिस्थितियाँ असहनीय हो चुकी है और अब समय आ गया है कि साम्राज्यवाद पर अंतिम और निर्णायक प्रहार किया जाये|

कैबिनेट मिसन प्लान

कैबिनेट मिशन प्लान

22 जनवरी को कैबिनेट मिशन को भेजने का निर्णय लिया गया था और 19 फरवरी, 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री सी.आर.एटली की सरकार ने हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में कैबिनेट मिशन के गठन और भारत छोड़ने की योजना की घोषणा की| तीन ब्रिटिश कैबिनेट सदस्यों का उच्च शक्ति सम्पन्न मिशन, जिसमे भारत सचिव लॉर्ड पैथिक लारेंस, बोर्ड ऑफ़ ट्रेड के अध्यक्ष सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और नौसेना प्रमुख ए.वी.अलेक्जेंडर शामिल थे, 24 मार्च, 1946 को दिल्ली पहुँचा|

मिशन के प्रस्ताव

• मिशन ने ब्रिटिश भारत के निर्वाचित प्रतिनिधियों और भारतीय रजवाड़ों से संविधान के निर्माण के सम्बन्ध में विचार-विमर्श कर एक समझौते को तैयार करने का प्रस्ताव रखा|

• संवैधानिक निकाय के गठन का प्रस्ताव

• प्रमुख भारतीय दलों के समर्थन से एक कार्यकारी परिषद् के गठन का प्रस्ताव

मिशन का उद्देश्य

• भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के मध्य के राजनीतिक गतिरोध को दूर करना और साम्प्रदायिक विवादों को रोकना था| इन दोनों में इस बात को लेकर मतभेद था कि एकीकृत या विभाजित कौन सा विकल्प ब्रिटिश भारत के लिए बेहतर होगा?

• कांग्रेस पार्टी चाहती थी कि केंद्र में एक सशक्त सरकार हो जिसकी शक्तियां प्रांतीय सरकारों की तुलना में अधिक हों|

• जिन्ना के नेतृत्व में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग भारत को अविभाजित रखना चाहती थी लेकिन तभी जब मुस्लिमों को कुछ राजनीतिक सुरक्षोपाय प्रदान किये जाये, जैसे कि विधायिकाओं में समानता की गारंटी|

• 1945 में हुए शिमला सम्मलेन के बाद 16 मई,1946 को कैबिनेट मिशन योजना की घोषणा की गयी|

मिशन की अनुशंसाएं

• भारत की एकता को बनाये रखा जाये|

• इसने सभी भारतीय क्षेत्रों को मिलाकर एक बहुत ही कमजोर संघ के गठन का प्रस्ताव रखा, जिसे केवल रक्षा, विदेशी मामलों और संचार पर ही नियंत्रण प्राप्त था|संघ को यह शक्ति प्राप्त होगी कि वह इन सभी विषयों के प्रबंधन के लिए आवश्यक वित्त जुटा सके|

• संघीय शक्तियों के अतिरिक्त अन्य सभी शक्तियां और अवशिष्ट शक्तियां ब्रिटिश भारत के प्रान्तों को प्रदान की गयीं|

• एक संविधान निर्मात्री निकाय या संविधान सभा का चुनाव किया जाये जिसमे सभी राज्यों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में निश्चित सीटें प्रदान की जाएँ|

• इसने प्रस्तावित संविधान सभा में 292 सदस्यों को ब्रिटिश भारत से और 93 सदस्यों को रियासतों से शामिल करने का प्रस्ताव रखा |

• मिशन ने केंद्र में तत्काल अंतरिम सरकार के गठन को प्रस्तावित किया,जिसे सभी राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त हो और जिसके सभी विभाग भारतीय के पास हों|

निष्कर्ष

कैबिनेट मिशन का प्रमुख उद्देश्य भारत में सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण के तरीकों को खोजना और संविधान का निर्माण करने वाले तंत्र के बारे में सुझाव देना था| अंतरिम सरकार का गठन करना भी इसका एक उद्देश्य था|

उत्तर भारत का एक राज्य अवध

अवध

अवध उत्तर भारत का ऐतिहासिक क्षेत्र  था , जिसमे वर्त्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तर पूर्वी भाग शामिल था। प्राचीन कोसल प्रदेश  के नाम की राजधानी अयोध्या  के नाम पर इसका नाम  अवध पड़ा था। सोलहवीं सदी में यह मुग़ल साम्राज्य का हिस्सा बन गया और 1856 ई. में इसे ब्रिटिश  साम्राज्य में मिला लिया गया। 1722 ई. में ,मुग़ल बादशाह मुहमदशाह द्वारा फारस के शिया सादत खां  को अवध का सूबेदार बनाये जाने के बाद अवध सूबे  को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया। सादत खां ने सैय्यद बंधुओं  को हटाने में सहयोग दिया। बादशाह ने सादत खां को नादिरशाह के साथ वार्ता के लिए नियुक्त किया ताकि वह एक बड़ी रकम के भुगतान के एवज में अपने देश लौट जाये और शहर को तबाह करने से उसे रोका जा सके। लेकिन जब नादिरशाह को उस रकम का भुगतान नहीं किया गया तो उसका परिणाम दिल्ली की जनता को नरसंहार के रूप में भुगतना पड़ा। सादत खां ने भी शर्म और अपमान के कारण आत्महत्या कर ली ।

सादत खां के बाद अवध का अगला नवाब सफदरजंग बना जिसे मुग़ल साम्राज्य का वजीर भी नियुक्त किया गया था। उसका पुत्र शुजाउद्दौला उसका उत्तराधिकारी बना। अवध ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया जिसमे मुस्लिमों के साथ साथ हिन्दू ,नागा,सन्यासी  भी शामिल थे।अवध के शासक का प्राधिकार दिल्ली के पूर्व में स्थित रूहेलखंड क्षेत्र तक था। उत्तर –पश्चिमी सीमान्त की पर्वत श्रंखलाओं से  बड़ी संख्या में अफ़ग़ान ,जिन्हें रोहिल्ला कहा जाता था ,वहाँ आकर बस गए थे।अवध के नवाबों का विवरण निम्नलिखित है-

  • सादत खां बुरहान-उल-मुल्क (1722-1739 ई।): इन्होने 1722 ई. में अवध की स्वायत्त राज्य के रूप में स्थापना की उसे मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह द्वारा गवर्नर नियुक्त किया गया था ।उसने नादिरशाह के आक्रमण के समय साम्राज्य की गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अंततः इज्ज़त और सम्मान की खातिर आत्महत्या कर ली।
  • सफ़दर जंग अब्दुल मंसूर (1739-1754 ई।): वह सादत खां का दामाद था जिसने 1748 ई. में अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध मानपुर के युद्ध में भाग लिया था।
  • शुजाउद्दौला (1754-1775 ई।): वह सफदरजंग का पुत्र और अहमदशाह अब्दाली का सहयोगी था। उसने अंग्रेजों के सहयोग से रोहिल्लों को हराकर 1755 ई. में रूहेलखंड को अपने साम्राज्य में मिला लिया था।
  • आसफ-उद-दौला: वह लखनऊ की संस्कृति को प्रोत्साहित करने और इमामबाड़ा तथा रूमी दरवाजा जैसी ऐतिहासिक इमारतें बनवाने के लिए प्रसिद्ध है। उसने 1755 ई. में अंग्रेजों के साथ फ़ैजाबाद की संधि की।
  • वाजिद अली शाह: वह अवध का अंतिम नवाब था जिसे अख्तरप्रिया और जान-ए-आलम नाम से जाना जाता है। उसके समय में ही ब्रिटिश गवेर्नर जनरल लार्ड डलहौजी द्वारा अवध को कुशासन के आधार पर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया था। वह शास्त्रीय संगीत और नृत्य का शौक़ीन था जिसने कालका-बिंदा जैसे कलाकार भाइयों को अपने दरबार में शरण दी थी।

निष्कर्ष

अवध अपनी उपजाऊ भूमि के कारण के हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है । अंग्रेजों ने भी अपने स्वार्थ के लिए इसकी उपजाऊ भूमि का दोहन किया।  इसीलिए अंग्रेजों ने 1856 ई. में इसे अपने साम्राज्य में मिला लिया।

1919 का अपराधी एक्ट

अराजक और रिवोल्यूशनरी अपराध अधिनियम, 1919

गवर्नर जनरल चेम्सफोर्ड ने 1917 में जस्टिस सिडनी रौलट की अध्यक्षता में एक समिति गठित की| इस समिति का गठन विद्रोह की प्रकृति को समझने और सुझाव देने के लिए किया गया था| इसे ‘रौलट समिति’ के नाम से भी जाना जाता है| इस अधिनियम, जोकि किसी भी क्षेत्र/भाग पर लागू किया जा सकता था, में किसी भी व्यक्ति को कार्यपालिका के नियंत्रण में लाने के लिए दो तरह के उपाय शामिल थे-दंडात्मक और प्रतिबंधात्मक| इस अधिनियम के तहत सरकार किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती थी और बिना सुनवाई के दो साल तक कैद में रख सकती थी|

अधिनियम के प्रावधान

• गवर्नर जनरल को इस अधिनियम को किसी भी क्षेत्र में लागू करने का अधिकार दिया गया

• अधिनियम में अपराधों की त्वरित सुनवाई की व्यवस्था की गयी

• जन सुरक्षा के दृष्टिकोण से किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर जेल में डाला जा सकता था

• भारत रक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को न छोड़ा जाये

• ऐसे मुकदमों की सुनवाई का अधिकार ज्यूरी पर छोड़ दिया गया था|

निष्कर्ष

ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था में यह अधिनियम उस समय की राजनीतिक गतिविधियों और चर्चित स्वतंत्रताओं पर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से लाया गया था| इस अधिनियम, जोकि किसी भी क्षेत्र/भाग पर लागू किया जा सकता था, में किसी भी व्यक्ति को कार्यपालिका के नियंत्रण में लाने के लिए दो तरह के उपाय शामिल थे-दंडात्मक और प्रतिबंधात्मक|

1940 का अगस्त प्रस्ताव

अगस्त प्रस्ताव

भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को शिमला से एक वक्तव्य जारी किया, जिसे अगस्त प्रस्ताव कहा गया|यह प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा ब्रिटेन से भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य को लेकर पूछे गए सवाल के जबाव में लाया गया था|

अगस्त प्रस्ताव के प्रावधान

• सलाहकारी युद्ध परिषद् की स्थापना

• युद्ध के पश्चात भारत के संविधान निर्माण के लिए प्रतिनिधिक भारतीय निकाय की स्थापना करना

• वायसराय की कार्यकारी परिषद् का तत्काल विस्तार

• अल्पसंख्यकों को यह आश्वासन दिया गया कि ब्रिटिश सरकार,शासन के किसी ऐसे तंत्र को सत्ता नहीं सौंपेगी जिसके प्राधिकार को भारतीय राष्ट्रीय जीवन के किसी बड़े और शक्तिशाली तबके द्वारा स्वीकार न किया गया हो

यह प्रथम अवसर था जब भारतीयों के संविधान निर्माण के अधिकार को स्वीकार किया गया और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की| कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया| जवाहर लाल नेहरु ने कहा कि डोमिनियन दर्जे का सिद्धांत अब मृतप्राय हो चुका है| गाँधी ने कहा कि इस घोषणा नेराष्ट्रवादियों और ब्रिटिश शासकों के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है| मुस्लिम लीग इसमें दिए गए वीटो अधिकार के चलते खुश थी और उसने कहा कि राजनीतिक गतिरोध को दूर करने का एकमात्र उपाय विभाजन है| कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत की गयी मांगों को स्वीकार न करने से व्याप्त व्यापक असंतोष के सन्दर्भ में गाँधी ने वर्धा में हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में अपनी व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा को शुरू करने की योजना को प्रस्तुत किया|

निष्कर्ष

यह भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो के द्वारा जारी किया गया औपचारिक वक्तव्य था,जिसने संविधान निर्माण प्रक्रिया की नींव रखी और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की|

भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को शिमला से एक वक्तव्य जारी किया, जिसे अगस्त प्रस्ताव कहा गया|यह प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा ब्रिटेन से भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य को लेकर पूछे गए सवाल के जबाव में लाया गया था|
अगस्त प्रस्ताव के प्रावधान
• सलाहकारी युद्ध परिषद् की स्थापना
• युद्ध के पश्चात भारत के संविधान निर्माण के लिए प्रतिनिधिक भारतीय निकाय की स्थापना करना
• वायसराय की कार्यकारी परिषद् का तत्काल विस्तार
• अल्पसंख्यकों को यह आश्वासन दिया गया कि ब्रिटिश सरकार,शासन के किसी ऐसे तंत्र को सत्ता नहीं सौंपेगी जिसके प्राधिकार को भारतीय राष्ट्रीय जीवन के किसी बड़े और शक्तिशाली तबके द्वारा स्वीकार न किया गया हो
यह प्रथम अवसर था जब भारतीयों के संविधान निर्माण के अधिकार को स्वीकार किया गया और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की| कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया| जवाहर लाल नेहरु ने कहा कि डोमिनियन दर्जे का सिद्धांत अब मृतप्राय हो चुका है| गाँधी ने कहा कि इस घोषणा नेराष्ट्रवादियों और ब्रिटिश शासकों के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है| मुस्लिम लीग इसमें दिए गए वीटो अधिकार के चलते खुश थी और उसने कहा कि राजनीतिक गतिरोध को दूर करने का एकमात्र उपाय विभाजन है| कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत की गयी मांगों को स्वीकार न करने से व्याप्त व्यापक असंतोष के सन्दर्भ में गाँधी ने वर्धा में हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में अपनी व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा को शुरू करने की योजना को प्रस्तुत किया|  
निष्कर्ष
यह भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो के द्वारा जारी किया गया औपचारिक वक्तव्य था,जिसने संविधान निर्माण प्रक्रिया की नींव रखी और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की|

1946 की अंतरिम सरकार

अंतरिम सरकार

2 सितम्बर 1946, को नवनिर्वाचित संविधान सभा ने भारत की अंतरिम सरकार का गठन किया जोकि 15 अगस्त 1947 तक अस्तित्व में बनी रही|अंतरिम सरकार की कार्यकारी शाखा का कार्य वायसराय की कार्यकारी परिषद करती थी जिसकी अध्यक्षता वायसराय द्वारा की जाती थी| इसमें कांग्रेस द्वारा नामित 3 मुस्लिम सदस्यों सहित कुल 12 सदस्य शामिल थे| भारत में ब्रिटिशों के आने के बाद यह प्रथम अवसर था जब भारत की सरकार भारतीयों के हाथों में थी| 26 अक्टूबर को लीग द्वारा नामित 5 सदस्य इसमें शामिल हुए और इन नए सदस्यों के लिए स्थान बनाने के लिए कांग्रेस द्वारा नियुक्त सदस्यों में हेर-फेर किया गया (दो सीटें पहले से ही खाली थीं इसके अलावा शरत बोस, सैय्यद अली जहीर व सर शफात अहमद खान ने त्यागपत्र दे दिया)| सरकार के सभी चौदह सदस्यों के विभाग निम्नलिखित थे-

अंतरिम सरकार के सदस्य

पंडित जवाहर लाल नेहरु

कार्यकारी परिषद् के उपाध्यक्ष,विदेश विभाग, राष्ट्रमंडल से सम्बंधित मामले

वल्लभभाई पटेल

गृह, सुचना एवं प्रसारण

बलदेव सिंह

रक्षा

डॉ.जॉन

उद्योग एवं आपूर्ति

सी.राजगोपालाचारी

शिक्षा

सी.एच.भाभा

कार्य, खनन एवं शक्ति

राजेंद्र प्रसाद

खाद्य एवं कृषि

आसफ अली

रेलवे

जगजीवन राम

श्रम

लियाकत अली

वित्त

टी.टी.चुंदरीगर

वाणिज्य

अब्दुल रब नश्तर

संचार

गजान्फर अली खान

स्वास्थ्य    

जोगेंद्र नाथ मंडल

विधि

निष्कर्ष
अगस्त 1946 में कांग्रेस ने अंतरिम सरकार में शामिल होने का निर्णय लिया ताकि ब्रिटिश सरकार के लिए सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को सरल बनाया जा सके| अंतरिम सरकार ने 2 सितम्बर 1946 से कार्य करना आरम्भ किया|

अंग्रेजी उपनिवेशवाद

अंग्रेज उपनिवेश की स्थापना

अंग्रेजों का भारत आगमन और ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना का प्रमुख कारण पुर्तगाली व्यापारियों द्वारा भारत में अपनी वस्तुओं को बेचने से होने वाला अत्यधिक लाभ था जिसने ब्रिटिश व्यापारियों को भारत के साथ व्यापार करने के लिए प्रोत्साहित किया । अतः पुर्तगाली व्यापारियों की व्यापारिक सफलता से प्रेरित होकर अंग्रेज व्यापारियों के एक समूह –मर्चेंट एडवेंचरर्स ने 1599 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की । महारानी स्वयं भी ईस्ट इंडिया कंपनी की साझेदार/शेयरहोल्डर थीं|

पश्चिम और दक्षिण में विस्तार

बाद में 1608 ई. में  ईस्ट इंडिया कंपनी ने शाही संरक्षण प्राप्त करने के लिए कैप्टन हॉकिन्स  को मुग़ल शासक जहाँगीर के दरबार में भेजा । वह भारत के पश्चिमी तट पर अपनी फैक्ट्रियां स्थापित करने हेतु शाही परमिट प्राप्त करने में सफल रहा। 1605 ई. में इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम ने सर थॉमस रो को कंपनी के लिए और अधिक छूटें प्राप्त करने के उद्देश्य से जहाँगीर के दरबार में भेजा। रो बहुत कुटनीतिज्ञ था और अपनी कूटनीति के बल पर वह  पूरे मुग़ल क्षेत्र पर स्वन्त्रतापूर्वक व्यापार करने हेतु शाही चार्टर प्राप्त करने में सफल रहा । बाद के वर्षों में ईस्ट इंडिया कंपनी अपने आधार को विस्तृत करती गयी । कंपनी को पुर्तगाली, डच और फ़्रांसीसी व्यापारियों द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। निर्णायक क्षण तब आया जब 1662 ई. में इंग्लैंड के चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन से हुआ और इंग्लैंड को बम्बई. दहेज़ के रूप में प्राप्त हुआ । इंग्लैंड द्वारा 1668 ई. में बम्बई. को दस पौंड प्रतिवर्ष की दर पर ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया। कंपनी ने अपने पश्चिमी तट पर अपना व्यापारिक मुख्यालय सूरत से बम्बई. स्थानांतरित कर दिया। 1639 ई. में  ईस्ट इंडिया कंपनी ने स्थानीय राजा से मद्रास को पट्टे पर प्राप्त कर लिया और वहां पर अपनी फैक्ट्री की सुरक्षा हेतु फोर्ट सेंट जॉर्ज का निर्माण कराया । बाद में मद्रास कंपनी का दक्षिण भारतीय  मुख्यालय बन गया।

पूर्व में कंपनी का विस्तार

दक्षिण एवं पश्चिमी भारत में सफलतापूर्वक अपनी फैक्ट्रियां स्थापित करने के बाद कंपनी ने पूर्व की ओर ध्यान केन्द्रित किया । कम्पनी ने पूर्व में अपना ध्यान मुख्य रूप से मुग़ल प्रान्त बंगाल पर लगाया। बंगाल के गवर्नर सुजाउद्दीन ने 1651 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल में अपनी व्यापारिक गतिविधियां चलने हेतु अनुमति प्रदान कर दी। हुगली में एक फैक्ट्री स्थापित की गयी और 1668 ई. में फैक्ट्री स्थापित करने हेतु सुतानती,गोविंदपुर व कोलकाता नाम के तीन गावों को खरीद लिया गया। बाद में फैक्ट्री की सुरक्षा के लिए उसके चारों ओर फोर्ट विलियम  का निर्माण कराया गया। इसी स्थान पर वर्त्तमान कोलकाता शहर का विकास हुआ|

फर्रुख्सियर द्वारा जारी शाही फरमान

मुग़ल शासक फर्रुख्सियर ने 1717 ई. में शाही फरमान जारी कर कंपनी को बंगाल में कुछ व्यापारिक विशेषाधिकार प्रदान कर दिए ,जिसमे बगैर कर अदा किये बंगाल में ब्रिटिश वस्तुओं के आयात-निर्यात की अनुमति भी शामिल थी। इस फरमान द्वारा कंपनी को वस्तुओं की आवाजाही हेतु दस्तक (पास ) जारी करने का अधिकार भी प्रदान कर दिया गया।

व्यापार एवं वाणिज्य के क्षेत्र में मजबूती से स्थापित होने के बाद कंपनी ने  भारत में सत्ता प्राप्त करने के सपने देखना शुरू कर दिया|

भारत में ब्रिटिश सत्ता के उदय में सहायक प्रमुख कारक

प्रमुख कारण,जिन्होनें ब्रिटिशों को लगभग दो सौ वर्षों तक भारत पर शासन करने का अवसर प्रदान किया,निम्नलिखित है-

  • 1707 ई. में  औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही भारत में मुग़ल साम्राज्य का पतन की ओर अग्रसर होना तथा भारत में मुगलों जैसी किसी केंद्रीय शक्ति का उपस्थित न होना |
  • तत्कालीन भारतीय शासकों में राजनीतिक एकजुटता का आभाव था और वे प्रायः अपनी सुरक्षा हेतु अंग्रेजों की मदद पर निर्भर थे । ऐसे में अंग्रेजों ने उनकी कमजोरी का फायदा उठाया और अपने हित के लिए राज्यों के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करने लगे|

यूरोपीय शक्तियों के बीच संघर्ष

भारत में प्रमुख यूरोपीय शक्तियाँ: पुर्तगाली,डच ,अंग्रेज और फ्रांसीसी चार प्रमुख यूरोपीय शक्तियां थी जो व्यापारिक संबंधों की स्थापना हेतु भारत आये लेकिन बाद में उन्होंने यहाँ अपने उपनिवेश स्थापित किये। इन यूरोपीय शक्तियों के बीच वाणिज्यिक और राजनीतिक प्रभुता हेतु छोटे-मोटे संघर्ष होते रहते थे लेकिन अंत में ब्रिटिश सबसे ताकतवर शक्ति के रूप में उभरे जिन्होंने अन्य तीनों शक्तियों को पीछे छोड़ लगभग दो सौ सालों तक भारत पर शासन किया। भारत में सबसे पहले पुर्तगाली आये जिन्होनें अपनी फैक्ट्रियां और औपनिवेशिक बस्तियां स्थापित की । डचों के साथ उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा लेकिन डच उनके सामने कमजोर साबित हुए और पुर्तगाली व ब्रिटिशों की प्रतिस्पर्धा के सामने टिक न सकने के कारण डच वापस चले गए|

मुख्य प्रतिस्पर्धी: ब्रिटिशों को भारत में प्रवेश करने के समय से ही डच,पुर्तगाली और फ़्रांसीसी शक्तियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी थी लेकिन पुर्तगाली व डच प्रतिस्पर्धी न तो अधिक गंभीर थे और न ही अधिक सक्षम । अतः ब्रिटिशों के सबसे मजबूत प्रतिद्वंदी फ्रांसीसी थे,जो भारत में सबसे बाद में आये थे। ब्रिटिशों द्वारा भारत के व्यापार एवं वाणिज्य पर पूर्ण एकाधिकार प्राप्त करने के प्रयासों ने फ्रांसीसियों के साथ उनके संघर्ष को जन्म दिया|1744 ई. से लेकर 1763 ई. के मध्य के 20  वर्षों में वाणिज्यिक व क्षेत्रीय नियंत्रण के उद्देश्यों को लेकर ब्रिटिशों व फ्रांसीसियों के मध्य तीन बड़े युद्ध लड़ें गए। अंतिम और निर्णायक युद्ध 22 जनवरी, 1763 ई. को बांडीवाश में लड़ा गया था|

कर्नाटक युद्ध: कर्नाटक और हैदराबाद दोनों राज्यों में उत्तराधिकार को लेकर विवाद था जिसने ब्रिटिश और फ्रांसीसी शक्तियों के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने के द्वार खोल दिए । इन दोनों यूरोपीय शक्तियों अपनी आपसी शत्रुता की आड़ में कर्नाटक और हैदराबाद के उत्तराधिकार हेतु अलग-अलग भारतीय दावेदारों का समर्थन किया । उत्तराधिकार के इस संघर्ष में पोंडिचेरी के गवर्नर डूप्ले के नेतृत्व में फ्रांसीसियों की जीत हुई. और अपने दावेदारों को गद्दी पर बिठाने के एवज में उन्हें उत्तरी सरकार का क्षेत्र प्राप्त हुआ जिसे फ्रांसीसी अफसर बुस्सी ने सात सालों तक नियंत्रित किया। लेकिन फ्रांसीसियों की यह जीत बहुत कम समय की थी क्योकि 1751 ई. में रोबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में ब्रिटिश शक्ति ने युद्ध की परिस्थितियाँ बदल दी थी। रोबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में ब्रिटिश शक्ति ने एक साल बाद ही उत्तराधिकार हेतु फ्रांसीसी समर्थित दावेदारों को पराजित कर दिया|अंततः फ्रांसीसियों को ब्रिटिशों के साथ त्रिचुरापल्ली की संधि करनी पड़ी|

अगले सात वर्षीय युद्ध (1756-1763 ई.।) अर्थात तृतीय कर्नाटक युद्ध  में दोनों यूरोपीय शक्तियों की शत्रुता फिर से सामने आ गयी । इस युद्ध की शुरुआत फ्रांसीसी सेनापति काउंट दे लाली द्वारा मद्रास पर आक्रमण के साथ हुई. थी |लाली को ब्रिटिश सेनापति सर आयरकूट द्वारा हरा दिया गया|1761 ई. में ब्रिटिशों ने पोंडिचेरी पर कब्ज़ा कर लिया और लाली को जिंजी और कराइकल के समर्पण हेतु बाध्य कर दिया|अतः फ्रांसीसी बांडीवाश में लडे गये तीसरे कर्नाटक युद्ध(1760 ई.) में हार गए और बाद में यूरोप में उन्हें ब्रिटेन के साथ पेरिस की संधि  करनी पड़ी|

ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना

कर्नाटक के युद्ध में प्राप्त विजय ने भारत में ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना हेतु जमीन तैयार कर दी थी और साथ ही फ्रांसीसियों के भारतीय साम्राज्य के सपने को चकनाचूर कर दिया था। इस जीत के बाद भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का कोई. यूरोपीय प्रतिद्वंदी नहीं बचा था। ब्रिटिशों को सर आयरकूट,मेजर स्ट्रिंगर लॉरेंस ,रोबर्ट क्लाइव  जैसे कुशल नेतृत्वकर्ताओं के साथ साथ एक मजबूत नौसैनिक शक्ति होने का भी लाभ मिला। इन कारकों के कारण ही वे भारत के विश्वसनीय शासक बन सके|

1909 का भारतीय परिसद अधिनियम

1909 ई. का भारतीय परिषद् अधिनियम

1909 ई. के भारत शासन अधिनियम को ,भारत सचिव और वायसराय के नाम पर, मॉर्ले-मिन्टो सुधार भी कहा जाता है|इसका निर्माण उदारवादियों को संतुष्ट करने के लिए किया गया था| इस अधिनियम द्वारा केंद्रीय व प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों  की संख्या में वृद्धि की गयी लेकिन इन परिषदों में अभी भी निर्वाचित सदस्यों की संख्या कुल सदस्य संख्या के आधे से भी कम थी अर्थात अभी भी नामनिर्देशित सदस्यों का बहुमत बना रहा| साथ ही निर्वाचित सदस्यों का निर्वाचन भी जनता द्वारा न होकर जमींदारों,व्यापारियों,उद्योगपतियों,विश्वविद्यालयों और  स्थानीय निकायों द्वारा किया जाता था| ब्रिटिशों ने सांप्रदायिक निर्वाचन मंडल का भी प्रारंभ किया जिसका उद्देश्य हिन्दू व मुस्लिमों के बीच मतभेद पैदा कर उनकी एकता को ख़त्म करना था| इस व्यवस्था के तहत परिषद् की कुछ सीटें मुस्लिमों के लिए आरक्षित कर दी गयी जिनका निर्वाचन भी मुस्लिमों मतदाताओं द्वारा ही किया जाना था|

इस व्यवस्था के द्वारा ब्रिटिश मुस्लिमों को राष्ट्रवादी आन्दोलन से अलग करना चाहते थे| उन्होंने मुस्लिमों को बहकाया कि उनके हित अन्य भारतीयों से अलग है | भारत के राष्ट्रवादी आन्दोलन को कमजोर करने के लिए अंग्रेज लगातार सम्प्रदायवाद को बढ़ावा देने वाली नीतियों का अनुसरण करते रहे| सम्प्रदायवाद के प्रसार ने भारतीय एकता और स्वतंत्रता के आन्दोलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1909 ई. के अपने अधिवेशन में इस अधिनियम के अन्य सुधारों का तो स्वागत किया लेकिन धर्म के आधार पर प्रथक निर्वाचक मंडलों की स्थापना के प्रावधान का विरोध किया|

मॉर्ले-मिन्टो सुधारों ने परिषदों की शक्तियों में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किया |इन सुधारों ने,स्वराज तो दूर, प्रतिनिधिक सरकार की स्थापना की ओर भी कोई कदम नहीं बढ़ाया | वास्तव में भारत सचिव ने स्वयं कहा कि भारत में संसदीय सरकार की स्थापना का उनका बिलकुल इरादा नहीं है| जिस निरंकुश सरकार की स्थापना 1857 के विद्रोह के बाद की गयी थी,उसमे मॉर्ले-मिन्टो सुधारों के बाद भी कोई बदलाव नहीं आया था |इतना अंतर जरुर आया कि सरकार अपनी पसंद के कुछ भारतीयों को उच्च पदों पर नियुक्त करने लगी| सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा ,जो बाद में लॉर्ड सिन्हा बन गए ,गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् में सदस्य नियुक्त होने वाले प्रथम भारतीय थे| बाद में उन्हें एक प्रान्त का गवर्नर बना दिया गया| वे भारत में पूरे ब्रिटिश शासनकाल के दौरान इतने उच्च पद पर पहुँचने वाले एकमात्र भारतीय थे| वे 1911 में दिल्ली में आयोजित किये गए शाही दरबार,जिसमें ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम और उनकी महारानी उपस्थित हुई थीं, में भी उपस्थित रहे थे| दरवार में भर्तिया रजवाड़े भी शामिल हुए जिन्होंने ब्रिटिश सम्राट के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट की| इस दरवार में दो महत्वपूर्ण घोषणाएं की गयीं ,प्रथम -1905 ई. से प्रभावी बंगाल के विभाजन को रद्द कर दिया गया ,द्वितीय –ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानन्तरित कर दी गयी|

अधिनियम की विशेषताएं

• इस अधिनियम ने विधान परिषदों की सदस्य संख्या का विस्तार किया और प्रत्यक्ष निर्वाचन को प्रारंभ किया|

• एक भारतीय को गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् का सदस्य नियुक्त किया गया |

• केंद्रीय विधान परिषद् के  निर्वाचित सदस्यों की संख्या 27 थी( जो 2 विशेष निर्वाचन मंडल ,13 सामान्य निर्वाचन मंडल और 12 वर्गीय निर्वाचन मंडल अर्थात 6 जमींदारों द्वारा निर्वाचित  व 6 मुस्लिम क्षेत्रों से निर्वाचित सदस्यों से मिलकर बनते थे)

• सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् में सदस्य नियुक्त होने वाले प्रथम भारतीय थे|

• ‘प्रथक निर्वाचन मंडल ‘ के सिद्धांत का प्रारंभ किया गया|लॉर्ड मिन्टो को ‘सांप्रदायिक निर्वाचन मंडल का पिता’ कहा गया |

निष्कर्ष

1909 ई. के भारत शासन अधिनियम का निर्माण उदारवादियों को संतुष्ट करने के लिए और ‘प्रथक निर्वाचन मंडल ‘ के सिद्धांत द्वारा मुस्लिमों को राष्ट्रीय आन्दोलन से अलग करने के लिए किया गया था|

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...