सन 1892 का भारत शासन अधिनियम

1892 ई. का अधिनियम

ब्रिटेन की संसद द्वारा 1892 ई. में पारित किये गए अधिनियम ने विधान परिषदों की सदस्य संख्या में वृद्धि कर उन्हें सशक्त बनाया, जिसने भारत में संसदीय प्रणाली की आधारशिला रखी| इस अधिनियम से पूर्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 1885 ई. से लेकर 1889 ई. तक के अपने अधिवेशनों में कुछ मांगे प्रस्तुत कर चुकी थी जिनमें से प्रमुख मांगे निम्नलिखित थीं-

• आईसीएस परीक्षा भारत और इंग्लैंड दोनों जगह आयोजित की जाये|

• परिषदों में सुधर किये जाएँ और नामनिर्देशन के स्थान पर निर्वाचन प्रणाली को अपनाया जाये|

• ऊपरी वर्मा का विलय न किया जाये|

• सैन्य व्यय में कटौती की जाये|

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की इन मांगों ने इस अधिनियम के निर्माण की भूमिका तैयार कर दी|

अधिनियम के प्रावधान

• केंद्रीय और प्रांतीय दोनों विधान परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गयी|

• विश्वविद्यालयों ,ज़मींदारों,नगरपालिकाओं आदि को प्रांतीय परिषद् के सदस्यों को अनुमोदित करने के लिए अधिकृत कर दिया गया| इस प्रावधान द्वारा प्रतिनिधित्व के सिद्धांत  को प्रारंभ किया गया|

• इस अधिनियम द्वारा परिषद् के सदस्यों को वार्षिक वित्तीय विवरण अर्थात बजट पर बहस करने का अधिकार प्रदान किया गया|

• गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद् में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 16 तक कर दी गयी|

• इस अधिनियम के अनुसार परिषद् के 2/5 सदस्य गैर-सरकारी हो सकते थे|

• इस अधिनियम ने परिषदों के अतिरिक्त सदस्यों को जनहित के मुद्दों पर प्रश्न पूछने का अधिकार प्रदान किया|

• प्रांतीय परिषदों में भी अतिरिक्त सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गयी,जैसे-बंगाल में इनकी संख्या 20 और अवध में 15 कर दी गयी|

निष्कर्ष

1892 ई. में पारित किये गए अधिनियम ने भारत में संसदीय प्रणाली की आधारशिला रखी और भारत के संवैधानिक विकास में मील का पत्थर साबित हुआ| इस अधिनियम द्वारा भारत में पहली बार चुनाव प्रणाली की शुरुआत की गयी| इन सबके बावजूद यह अधिनियम राष्ट्रीय मांगों की पूर्ति करने में सफल नहीं हो पाया और न ही कोई महत्वपूर्ण योगदान दे सका|

सन 1861 का भारत शासन अधिनियम, प्रशासन

1861 का अधिनियम

भारतीय परिषद् अधिनियम-1861 का निर्माण देश के प्रशासन में भारतीयों को शामिल करने के उद्देश्य से बनाया गया था|इस अधिनियम ने सरकार की शक्तियों और कार्यकारी व विधायी उद्देश्य हेतु गवर्नर जनरल की परिषद् की संरचना में बदलाव किया| यह प्रथम अवसर था जब गवर्नर जनरल की परिषद् के सदस्यों को अलग-अलग विभाग सौंपकर विभागीय प्रणाली की शुरुआत की| इस अधिनियम के अनुसार बम्बई व मद्रास की परिषदों को अपने लिए कानून व उसमें संशोधन करने की शक्ति पुनः प्रदान की  गयी जब कि अन्य प्रान्तों में अर्थात बंगाल में 1862 में,उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रान्त में 1886 में और बर्मा व पंजाब में 1897 में इन परिषदों की स्थापना की गयी|

अधिनियम के मुख्य बिंदु

• तीन अलग-अलग प्रेसीडेंसियों(बम्बई,मद्रास और बंगाल) को एक सामान्य प्रणाली के तहत लाया गया|

• इस अधिनियम द्वारा विधान परिषदों की स्थापना की गयी|

• इस अधिनियम द्वारा वायसराय की परिषद् में विधिवेत्ता के रूप में एक पांचवें सदस्य को शामिल किया गया|

•  वायसराय की परिषदों का विस्तार किया गया और कानून निर्माण के उद्देश्य से अतिरिक्त सदस्यों की संख्या न्यूनतम 6 और अधिकतम 12 तक कर दी गयी| ये सदस्य गवर्नर जनरल द्वारा नामित किये जाते थे और इनका कार्यकाल दो साल था|अतः कुल सदस्य संख्या बढ़कर 17 हो गयी|

• इन नामांकित सदस्यों के कम से कम आधे सदस्य गैर-सरकारी होना जरुरी था|

•  इस अधिनियम के अनुसार बम्बई व मद्रास की परिषदों को अपने लिए कानून व उसमें संशोधन करने की शक्ति पुनः प्रदान की  गयी जब कि अन्य प्रान्तों में अर्थात बंगाल में 1862 में,उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रान्त में 1886 में और बर्मा व पंजाब में 1897 में इन परिषदों की स्थापना की गयी|

• कैनिंग ने 1859 ई. में विभागीय प्रणाली की शुरुआत की जिसके तहत गवर्नर जनरल की परिषद् के सदस्यों को अलग-अलग विभाग सौंपे गए | कोई भी सदस्य अपने विभाग से सम्बंधित मामलों में अंतिम और निर्णायक आदेश जारी कर सकता था|

• लॉर्ड कैनिंग ने 1862 ई. में तीन भारतीय सदस्यों को अपनी परिषद् में शामिल किया जिनमें बनारस के राजा,पटियाला के राजा और सर दिनकर राव शामिल थे|

निष्कर्ष

भारतीय परिषद् अधिनियम-1861 भारतीयों को प्रशासन में भागीदारी प्रदान कर और भारत में कानून निर्माण की त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया को सुधार कर भारतीय आकांक्षाओं की पूर्ति की |अतः इस अधिनियम द्वारा भारत में प्रशासनिक प्रणाली की स्थापना की गयी जोकि भारत में ब्रिटिश शासन के अंत तक जारी रही|

सन 1858 का ब्रिटिश शासन अधिनियम

1858 ई. का भारत सरकार अधिनियम

अगस्त 1858 ई. में ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम पारित कर भारत में कंपनी के शासन को समाप्त कर दिया| इस अधिनियम द्वारा भारत के शासन का नियंत्रण ब्रिटिश सम्राट को सौंप दिया गया| इस समय विक्टोरिया ब्रिटेन की महारानी थीं| ब्रिटेन का सर्वोच्च निकाय ब्रिटिश संसद थी जिसके प्रति ब्रिटेन की सरकार उत्तरदायी थी| ब्रिटेन की सरकार द्वारा किये जाने वाले सभी कार्य सम्राट के नाम पर किये जाते थे| ब्रिटेन की सरकार के एक मंत्री ,जिसे भारत सचिव कहा जाता था ,को भारतीय सरकार का उत्तरदायित्व सौंपा गया | चूँकि ब्रिटेन की सरकार  संसद के प्रति उत्तरदायी थी अतः भारत के लिए भी सर्वोच्च निकाय ब्रिटेन की संसद ही थी| इस अधिनियम द्वारा  भारत के गवर्नर जनरल को वायसराय , जिसका अर्थ था-सम्राट का प्रतिनिधि ,कहा जाने लगा|   महारानी विक्टोरिया द्वारा एक घोषणा की गयी जिसे लार्ड कैनिंग द्वारा 1 नवम्बर,1858 ई.  इलाहाबाद के दरबार में पढ़ा गया|

• उद्घोषणा में सभी भारतीय राजाओं के अधिकारों के सम्मान वादा किया गया और भारत में ब्रिटिश क्षेत्रों के विस्तार पर रोक लगा दी गयी|

• इसमें लोगों के प्राचीन अधिकारों व परम्पराओं आदि के सम्मान और न्याय,सद्भाव व धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण करने का वादा किया गया |

• इसमें घोषित किया गया कि प्रत्येक व्यक्ति ,जाति और धर्म के भेदभाव के बिना,केवल अपनी योग्यता और शिक्षा के आधार पर प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश पाने का हक़दार होगा|

• घोषणा में एक तरफ राजाओं को सुरक्षा का आश्वासन दिया गया तो दूसरी तरफ मध्य वर्ग से भी विकास हेतु अवसरों को उपलब्ध कराने का वादा किया|

लेकिन धीरे धीरे यह साबित हो गया कि जिस अवसर की समानता की बात उद्घोषणा में की गयी उसे लागू नहीं किया गया| भारत की प्राचीन परम्पराओं के प्रति सम्मान के नाम पर ब्रिटिशों ने सामाजिक बुराइयों को संरक्षण देने की नीति अपना ली | अतः विदेशी शासकों द्वारा सामाजिक सुधारों की ओर बहुत ही कम ध्यान दिया गया और जब भी भारतीय नेताओं ने इन सुधारों की मांग की तो उनका विरोध किया गया |

1858 ई. के बाद भारतीयों के हितों को पुनः ब्रिटेन के हितों के अधीनस्थ बना दिया गया |ब्रिटेन व अन्य साम्राज्यवादी ताकतों के संघर्ष में भारत का उपयोग ब्रिटेन के आर्थिक हितों की पूर्ति के माध्यम के रूप में किया गया|भारत के संसाधनों का प्रयोग विश्व के अन्य भागों में ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की पूर्ति और अन्य देशों के विरुद्ध चलाये गए महंगे युद्धों की पूर्ति हेतु किया गया|

निष्कर्ष

महारानी विक्टोरिया द्वारा की गयी उद्घोषणा 1857 ई. के विद्रोह का परिणाम थी और इस उद्घोषणा में यह विश्वास दिलाया गया कि भारतीय लोगों के साथ जाति,धर्म,रंग और प्रजाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा |इसमें भारतीय राजाओं को भी यह विश्वास दिलाया गया की उनकी प्रतिष्ठा,अधिकार और गरिमा का सम्मान किया जायेगा और उनके अधीनस्थ क्षेत्रों पर किसी तरह का अतिक्रमण नहीं किया जायेगा|

सन 1857 का विद्रोह

1857 का विद्रोह (कारण और असफलताए)

सन1857 का विद्रोह उत्तरी और मध्य भारत में ब्रिटिश अधिग्रहण के विरुद्ध उभरे सैन्य असंतोष व जन-विद्रोह का परिणाम था| सैन्य असंतोष की घटनाएँ जैसे- छावनी क्षेत्र में आगजनी आदि जनवरी से ही प्रारंभ हो गयी थीं लेकिन बाद में मई में इन छिटपुट घटनाओं ने सम्बंधित क्षेत्र में एक व्यापक आन्दोलन या विद्रोह का रूप ले लिया| इस विद्रोह ने भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के शासन को समाप्त कर दिया और अगले 90 वर्षों के लिए भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश भाग को ब्रिटिश सरकार (ब्रिटिश राज) के प्रत्यक्ष शासन के अधीन लाने का रास्ता तैयार कर दिया|

विद्रोह के कारण

चर्बीयुक्त कारतूसों के प्रयोग और सैनिकों से सम्बंधित मुद्दों को इस विद्रोह का मुख्य कारण माना गया लेकिन वर्त्तमान शोध द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि कारतूसों का प्रयोग न तो विद्रोह का एकमात्र कारण था और न ही मुख्य कारण | वास्तव में यह विद्रोह सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक आदि अनेक कारणों का सम्मिलित परिणाम था|

• सामजिक और धार्मिक कारण: ब्रिटिशों ने भारतीयों के सामजिक-धार्मिक जीवन में दखल न देने की नीति से हटकर सती-प्रथा उन्मूलन (1829) और हिन्दू-विधवा पुनर्विवाह(1856) जैसे अधिनियम पारित किये | ईसाई मिशनरियों को भारत में प्रवेश करने और धर्म प्रचार करने की अनुमति प्रदान कर दी गयी|1950 ई. के धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम के द्वारा हिन्दुओं के परंपरागत कानूनों में संशोधन किया गया |इस अधिनियम के अनुसार धर्म परिवर्तन करने के कारण किसी भी पुत्र को उसके पिता की संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकेगा|

• आर्थिक कारण: ब्रिटिश शासन ने ग्रामीण आत्मनिर्भरता को समाप्त कर दिया | कृषि के वाणिज्यीकरण ने कृषक-वर्ग पर बोझ को बढ़ा दिया| इसके अलावा मुक्त व्यापार नीति को अपनाने,उद्योगों की स्थापना को हतोत्साहित करने और धन के बहिर्गमन आदि कारकों ने अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से नष्ट कर दिया|

• सैन्य कारण: भारत में ब्रिटिश उपनिवेश के विस्तार ने सिपाहियों की नौकरी की परिस्थितियों को बुरी तरह से प्रभावित किया |उन्हें बगैर किसी अतिरिक्त भत्ते के भुगतान के अपने घरों से दूर नियुक्तियां प्रदान की जाती थीं|सैन्य असंतोष का महत्वपूर्ण कारण जनरल सर्विस एन्लिस्टमेंट एक्ट ,1856 था,जिसके द्वारा सिपाहियों को आवश्यकता पड़ने पर समुद्र पार करने को अनिवार्य बना दिया गया | 1954 के डाक कार्यालय अधिनियम द्वारा सिपाहियों को मिलने वाली मुफ्त डाक सुविधा भी वापस ले ली गयी|

• राजनीतिक कारण: भारत में ब्रिटिश क्षेत्र का अंतिम रूप से विस्तार डलहौजी के शासन काल में हुआ था| डलहौजी ने 1849 ई. में घोषणा की कि बहादुरशाह द्वितीय के उत्तराधिकारियों को लाल किला छोड़ना होगा| बाघट और उदयपुर के सम्मिलन को किसी भी तरह से रद्द कर दिया गया और वे अपने शासक-घरानों के अधीन बने रहे| जब डलहौजी ने करौली (राजस्थान) पर व्यपगत के सिद्धांत को लागू करने की कोशिश की तो उसके निर्णय को कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स द्वारा निरस्त कर दिया गया|

1857 के विद्रोह से जुड़े विभिन्न नेता

बैरकपुर

मंगल पांडे

दिल्ली

बहादुरशाह द्वितीय ,जनरल बख्त खां

दिल्ली

हाकिम अहसानुल्लाह(बहादुरशाह द्वितीय का मुख्या सलाहकार)

लखनऊ

 

बेगम हजरत महल,बिजरिस कादिर,अहमदुल्लाह(अवध के पूर्व नवाब के

सलाहकार)

कानपुर

 

नाना साहिब ,राव साहिब(नाना साहिब के भतीजे),तांत्या

टोपे,अज़ीमुल्लाह खान (नाना साहिब के सलाहकार)

झाँसी

रानी लक्ष्मीबाई

बिहार(जगदीशपुर)

कुंवर सिंह ,अमर सिंह

इलाहाबाद और

बनारस

 

मौलवी लियाकत अली

फैजाबाद

 

मौलवी अहमदुल्लाह (इन्होनें विद्रोह को अंग्रजों के विरुद्ध जिहाद के   

रूप में घोषित किया) 

फर्रूखाबाद

तुफजल हसन खान

बिजनौर

मोहम्मद खान

मुरादाबाद

अब्दुल अली खान

बरेली

खान बहादुर खान

मंदसौर

फिरोजशाह

ग्वालियर/कानपुर

तांत्या टोपे

असम

कंदपरेश्वर सिंह ,मनीराम दत्ता

उड़ीसा

सुरेन्द्र शाही ,उज्जवल शाही

कुल्लू

राजा प्रताप सिंह

राजस्थान

जयदयाल सिंह ,हरदयाल सिंह

गोरखपुर

गजधर सिंह

मथुरा

सेवी सिंह ,कदम सिंह      

विद्रोह से सम्बंधित ब्रिटिश अधिकारी

जनरल जॉन निकोल्सन

 

20 सितम्बर,1857 को दिल्ली पर अधिकार किया( जल्द ही

लड़ाई में मिले घाव के कारण निकोल्सन की मृत्यु हो गयी|)

मेजर हडसन

दिल्ली में बहादुरशाह के पुत्रों व पोतों की हत्या कर दी|

सर ह्यूग व्हीलर

 

 

 

26 जून 1857 तक नाना साहिब की सेना का सामना किया

|27 तारीख को ब्रिटिश सेना ने इलाहाबाद से सुरक्षित

निकलने का आश्वासन प्राप्त करने के बाद आत्मसमर्पण कर

दिया|

जनरल नील

 

 

 

 

जून 1857 में बनारस और इलाहाबाद को पुनः अपने कब्जे

में लिया |नाना साहिब की सेना द्वारा अंग्रेजों की हत्या के

प्रतिशोधस्वरुप उसने कानपुर में भारतीयों की हत्या

की|विद्रोहियों से संघर्ष के दौरान लखनऊ में उसकी मृत्यु हो

गयी|

सर कॉलिन काम्पबेल

 

 

 

इन्होनें 6 दिसंबर 1857 को अंतिम रूप से कानपुर पर

कब्ज़ा किया | 21 मार्च 1858 को अंतिम रूप से लखनऊ

पर कब्ज़ा कर लिया |5 मई 1858 को बरेली को पुनः प्राप्त

किया|

हेनरी लॉरेंस

 

 

अवध के मुख्य प्रशासक, जिनकी हत्या विद्रोहियों द्वारा 2

जुलाई 1857 को लखनऊ रेजीडेंसी पर कब्जे के दौरान कर

दी गयी थी |

मेजर जनरल हैवलॉक

 

17 जुलाई 1857 को नाना साहिब की सेना को हराया

|दिसंबर 1857 को लखनऊ में इनकी मृत्यु हो गयी|

विलियम टेलर और आयर

अगस्त 1857 में आरा में विद्रोह का दमन किया|

ह्यूग रोज

 

 

झाँसी में विद्रोह का दमन किया और 20 जून 1858 को 

ग्वालियर पर पुनः कब्ज़ा किया |उन्होंने संपूर्ण मध्य भारत

और बुंदेलखंड को पुनः ब्रिटिश शासन के अधीन ला दिया|

कर्नल ओंसेल

बनारस पर कब्ज़ा किया|

निष्कर्ष:

1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी |हालाँकि इसका आरम्भ सैनिको के विद्रोह द्वारा हुआ था लेकिन यह कम्पनी के प्रशासन से असंतुष्ट और विदेशी शासन को नापसंद करने वालों की शिकायतों व समस्याओं की सम्मिलित अभिव्यक्ति थी|

सन 1833 का चार्टर अधिनियम

1833 ई. का चार्टर अधिनियम

1833 ई. का चार्टर अधिनियम इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्रांति का परिणाम था ताकि इंग्लैंड में मुक्त व्यापार नीति के आधार पर बड़ी मात्रा में उत्पादित माल हेतु बाज़ार के रूप में भारत का उपयोग किया जा सके| अतः चार्टर अधिनियम उदारवादी संकल्पना के आधार पर तैयार किया गया था| ब्रिटिश संसद के इस अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को अगले बीस वर्षों तक भारत पर शासन करने का अधिकार प्रदान कर दिया गया|

चार्टर अधिनियम की विशेषतायें

• इस अधिनियम द्वारा कंपनी के अधीन क्षेत्रों व भारत के उपनिवेशीकरण को वैधता प्रदान कर दी गयी|

• इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक कंपनी का दर्जा समाप्त कर दिया गया  और वह अब केवल प्रशासनिक निकाय मात्र रह गयी थी|

• बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा| लॉर्ड विलियम बेंटिक को “ब्रिटिश भारत का प्रथम गवर्नर जनरल” बनाया गया|

• सपरिषद गवर्नर जनरल को कंपनी के नागरिक व सैन्य संबंधों के नियंत्रण, अधीक्षण और निर्देशित करने की शक्ति प्रदान की गयी| केंद्रीय सरकार का राजस्व वृद्धि और व्यय पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया गया| अतः सभी वित्तीय व प्रशासनिक शक्तियों का केन्द्रीकरण गवर्नर जनरल के हाथों में कर दिया गया|

• गवर्नर जनरल की परिषद् के सदस्यों की संख्या,जिसे पिट्स इंडिया एक्ट द्वारा घटाकर तीन कर दिया गया था, को पुनः बढ़ाकर चार कर दिया|

1813 ईस्वी का अंग्रेजी सरकार का चार्टर अधिनियम

1813 का चार्टर अधिनियम

लम्बे समय तक चले नैपोलियन युद्ध और महाद्वीपीय प्रणाली के क्रियान्वयन के कारण .ब्रिटिश व्यापार में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गयी| दूसरी ओर, ब्रिटिश व्यापारी लगातार कंपनी-व्यापार को सभी निजी व्यापारियों हेतु खोलने की मांग कर रहे थे| अतः उनकी मांगों को पूरा करने के लिए चार्टर अधिनियम पारित किया गया | इसे 1813 ई. का ईस्ट इंडिया कंपनी अधिनियम भी कहा गया| यह ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक ऐसा अधिनियम था जिसने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को जारी रखा|

अधिनियम के प्रावधान

• इसने भारत में ब्रिटिशों की संवैधानिक स्थिति की व्याख्या के माध्यम से ब्रिटिश भारत पर ब्रिटेन के राजा की सम्प्रभुता साबित की गयी |

• यह अधिनियम स्थानीय निकायों को ,सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक-क्षेत्र  में आने वाले लोगों पर, कर लगाने का भी अधिकार प्रदान करता है|

• भारत में प्रांतीय सरकारों व न्यायालयों की शक्तियों के संदर्भ में यूरोपीय ब्रिटिशों के मामलों को मजबूती प्रदान की गयी|

• भारतीय साहित्य के नवीनीकरण और विज्ञान के उत्थान हेतु वित्तीय प्रावधानों को शामिल किया गया|

• इस अधिनियम में यह भी शामिल था कि मिशनरीज भारत में जाकर ईसाई धर्म का  प्रसार कर सकते है|

इस्लाम समाज में परिवर्तन का जरिया सूफी

सूफी मत - सूफी विचारधारा (Sufism in Hindi)

भारत में आने से पहले सूफी मत ने स्वयं को पूर्ण रूप से विकसित कर लिया था. बारहवीं सदी में भारत में आने से पूर्व तक इसमें प्रार्थना-उपवास, मन्त्र-पूजा, पीर-मुरीद आदि सभी परम्परायें विकसित हो चुकी थीं. चलिए जानते हैं सूफी मत भारत में कब आया और इसके प्रवर्तकों कौन थे? इस आर्टिकल में हम सूफी सिलसिले (Sufi Orders) के बारे में (Sufism in Hindi) भी जानेंगे; जैसे - चिश्ती सिलसिला, सुहारवर्दी, कादिरी (Qadiriyya), शत्तारी (Shattari Silsila), कुब्रबिया (Kubrawiyya), फिरदौस (Firdausi), नक्शबंदी (naqshbandi) सिलसिला आदि.

सूफी मत की नींव

प्रारम्भ में सूफी लोग (आठवीं व नवीं सदी में) अरब में दिखाई पड़े और लम्बे समय तक उनकी पहचान उनके पहनावे ऊनी वस्त्रों से की जाने लगी. साधारणतः सफ का अर्थ ऊन या भेड़-बेकरी के ऊनी कपड़े से होता है जो साफ से बने वस्त्र पहनता था, वह सूफी कहलाता था.इब्नुलअरबी प्रथम व्यक्ति था जिसने सूफी मत में महत्त्वपूर्ण सिद्धांत वहदत्त-उल-वुजूद (wahdat ul wajood) दिया. जिसका अर्थ है, ईश्वर सर्वव्याप्त है व सभी में उसकी झलक है, उससे कुछ भी अलग नहीं है, सभी मनुष्य समान हैं. सूफियों के निवास स्थान खानकाह कहलाते थे जबकि उनकी वाणी महफूजात (ग्रन्थ) में थी.

सैयद मुहम्मद हाफिज के मतानुसार ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (1192 ई. में मोहम्मद गौरी के साथ आये) ने भारत में सूफी मत का प्रारम्भ किया.

आइने अकबरी

आइने अकबरी में अबुल फजल ने 14 सूफी सिलसिलों का वर्णन किया है जो निम्न हैं -

      1. चिश्ती
      2. सुहरावर्दी
      3. कादिरी
      4. शत्तारी
      5. हबीबी
      6. तफूरी
      7. जुनैदी
      8. करबी
      9. सकती
      10. इयादी
      11. तूसी
      12. दुबरी
      13. अधमी
      14. फिरदौसी

सूफीवाद की तीन सीढियाँ

सूफीवाद की तीन सीढ़ियाँ ईश्वर में लीन होने की -

  1. फ़नाफिस्सेख (अपने पीर में समा जाना)
  2. फना किर्रसूक (अपने रसूल में समाना)
  3. फनाफिल्लाह  (अपने आपको ईश्वर में समा देना)

फरीदुद्दीन की सात घाटियाँ

सूफी कवी संत फरीदुद्दीन अत्तार ने कहा ईश्वर को प्रेम से पा सकते हैं जिनके लिए इन्होने सात घाटियों को पार करना आवश्यक बताया जो निम्न हैं -

  1. खोज घाटी - यहाँ साधक को भौतिक वस्तुओं को त्याग देना चाहिए. साधक को परम ज्योति प्राप्त होने पर इसे छोड़ देना चाहिए.
  2. परम ज्योति स्पर्श - इस ज्योति को पाकर साधक अनंत घाटी की ओर जाता है. यहाँ साधक के रहस्यमयी जीवन का आरम्भ होता है.
  3. मारीफात घाटी - इस घाटी में साधक को सत्य का ज्ञान प्राप्त हो जाता है,
  4. अनासक्ति घाटी - इसमें साधक को ईश्वरीय प्रेम प्राप्त हो जाता है.
  5. आनंद घाटी - इसमें साधक ईश्वरीय सौन्दर्य को प्राप्त कर आनंद की अनुभूति होती है.
  6. कौतूहल घाटी - यह साधक की अंतर्दृष्टि का पुनः लोप हो जाता है व साधक अन्धकार में जाता मह्सूत करता है.
  7. हकीकत घाटी - इसमें साधक को आत्मा या परमात्मा की आत्मा में एकाकार हो जाता है. इस घाटी यात्रा को पूरा कर साधक इश्क हकीकी को प्राप्त हो जाता है.

SUFI ORDERS

चिश्ती सिलसिला

मुइनुद्दीन चिश्ती

इस सिलसिला (Chishti Order) का प्रवर्तक ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (1192 ई.) था. ख्वाजा मुइनुद्दीन शुरुआत में लाहौर आया और बाद में अजमेर में बस गया. यहीं पर चिश्ती सिलसिले का प्रांरभ किया. इसके अन्य महत्त्वपूर्ण संतों में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकों (12वीं व 13वीं सदी), फरीदुद्दीन मसूद गज-ए-शंकर (हरियाणा), शेख निजामुद्दीन औलिया (13वीं व 14वीं सदी), शेख अधी सेराज, नूर क़ुतुब आलम (पांडुओक), शेख हुसामुद्दीन मामिकपूरी, बुरहानुद्दीन गरीब और दक्षिण के हजरत गेसूदराज अजोधन (पंजाब) आदि प्रमुख थे.

भारत में चिश्ती सिलसिला अजमेर (राजस्थान), दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार, उड़ीसा, बंगाल व दक्षिण भारत में फैला. बाबा फरीद मसूद के काव्य गीत आदिग्रंथ में शामिल किये गए हैं. इसके प्रमुख शिष्य (शेख) हजरत निजामुद्दीन औलिया थे.

  • चिश्ती संत यौगिक क्रियाओं में, समाज सेवा में, अद्वैतवाद में विश्वास रखते थे.
  • चिश्ती संत धन संचय, शासक वर्ग के सम्पर्क में रहना, संन्यास परम्पराओं में विश्वास नहीं रखते थे.

निजामुद्दीन औलिया

सात सुल्तानों को देखने वाले बदायूँ में जन्म निजामुद्दीन औलिया महबूब-ए-इलाही ने अपना कर्मक्षेत्र दिल्ली के पास गयासपुर में बनाया. इनकी लोकप्रियता से परेशान हो गयासुद्दीन तुगलक ने इन्हें दिल्ली छोड़ देने का आदेश दिया जिस पर इन्होने 'हुजूर दिल्ली दूर अस्त” कहा.

सुल्तान महमूद तुगलक ने इनकी इच्छा से विरुद्ध इनका मकबरा दिल्ली में बनवाया. औलिया संगीत में अत्यधिक रूचि रखते थे जिसके कारण इन पर मुकदमा चलाया गया. अमीर खुसरो औलिया के एक शिष्य थे.

सुहारवर्दी सिलसिला (Suhrawardiyya)

इस सिलसिले का संस्थापक जलालुद्दीन तबरीजी और बहाउद्दीन जकारिया थे. चिश्ती सिलसिले के विपरीत सुहारवर्दी आरामपसंद जीवन में विश्वास रखते थे. ये राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेते थे. सुहारवर्दियों का मानना था कि 'यदि दिल निर्मल है तो धन के संचय और वितरण दोनों में दोष नहीं है”.

कादिरी सिलसिला

इसका संस्थापक सैय्यद मुहम्मद गिलानी (भारत में) था. कादिर पन्थ के प्रसिद्ध संत मियाँ मीर (मीर मुहम्मद) था. शाहजहाँ का पुत्र दाराशिकोह भी कादिरी मत को मानता था.

इस पंथ का संस्थापक शाह अब्दुल्ला था. इस पन्थ का मुख्य संत ग्वालियर के मुहम्मद गौस था. वह हाजी हमीद हसन के शिष्य था. गौस की रचित पुस्तकें 'जवाहर-ए-खामशाह” व 'खालिद-ए-मुखाजिन” हैं. इस मत की मान्यता है कि पीर या शेख अन्य संतों, पैगम्बरों - ईश्वर तक से सीधा सम्पर्क रखने में समर्थ है.

कुब्रबिया सिलसिला

इसका प्रवर्तक नज्मुद्दीन-अल-कुबरा था. इसका प्रसार मात्र कश्मीर में ही रहा.

फिरदौस सिलसिला

यह भारत में अपने पैर नहीं पसार सका.

नक्शबंदी सिलसिला

इसका संस्थापक ख्वाजा बली बिल्ला था. यह सबसे रुढ़िवादी सूफी संत था. यह अकबर की उदार नीतियों का कड़ा विरोधी था.

सिख धर्म

सिख धर्म का संक्षिप्त इतिहास और व्यापक जानकारी - History of Sikhism in Hindi

सिख धर्म के लोग गुरुनानक देव के अनुयायी हैं. गुरुनानक देव का कालखंड 1469-1539 ई. है. सिख धर्म के लोग मुख्यतया पंजाब में रहते हैं. वे सभी धर्मों में निहित आधारभूत सत्य में विश्वास रखते हैं और उनका दृष्टिकोण धार्मिक अथवा साम्प्रदायिक पक्षपात से रहित और उदार है. 1538 ई. में गुरु नानक की मृत्यु के बाद सिखों का मुखिया गुरु कहलाने लगा. सिख धर्म का इतिहास बलिदानों का इतिहास है. आज हम इस आर्टिकल में सिख धर्म के दस गुरुओं और सिख धर्म के गौरवपूर्ण इतिहास (History) को आपके सामने रखेंगे. सिख धर्म के इतिहास (Brief History of Sikh Dharma) में गुरुओं की लिस्ट (Sikh Guru List) कुछ इस तरह है -

  1. गुरुनानक देव (1469-1539)
  2. अंगद (1539-1552)
  3. अमरदास (1552-1574)
  4. रामदास (1574-1581)
  5. अर्जुन (1581-1606)
  6. हरगोविन्द (1606-1645)
  7. हरराय (1645-1661)
  8. हरकिशन (1661-1664)
  9. तेग बहादुर (1664-1675)
  10. गुरु गोविन्द सिंह (1675-1708)

गुरु नानक

गुरु नानक (Guru Nanak) के सिख धर्म के प्रवर्तक थे. 1469 ई. में लाहौर के निकट तलवंडी अथवा आधुनिक ननकाना साहिब में खत्री परिवार में वे उत्पन्न हुए. वे साधु स्वभाव के धर्म-प्रचारक थे. उन्होंने अपना पूरा जीवन हिन्दू और इस्लाम धर्म की उन अच्छी बातों के प्रचार में लगाया जो समस्त मानव समाज के लिए कल्याणकारी है. गुरुनानक ने अत्यधिक तपस्या और अत्यधिक सांसारिक भोगविलास, अहंभाव और आडम्बर, स्वार्थपरता और असत्य बोलने से दूर रहने की शिक्षा दी. उन्होंने सभी को अपने धर्म का उपदेश दिया, फलतः हिन्दू और  मुसलामान, दोनों ही उनके अनुयायी हो गए. उनके स्वचरित पवित्र पद तथा शिक्षाएँ (बानियाँ) सिखों के धर्मग्रन्थ 'ग्रन्थ साहिब” में संकलित हैं. नानक देव की मृत्यु 1539 में  हुई.

गुरु अंगद

गुरु अंगद (Guru Angada) सिखों के दूसरे गुरु हुए. इनको गुरु नानक देव ने ही इस पद  के लिए मनोनीत किया था. नानक इनको अपने शिष्यों में सबसे अधिक मानते थे और अपने दोनों पुत्रों को छोड़कर उन्होंने अंगद को ही अपना उत्तराधिकारी चुना. गुरु अंगद श्रेष्ठ चरित्रवान व्यक्ति और सिखों के उच्चकोटि के नेता थे जिन्होंने अनुयायियों का 14 वर्ष तक नेतृत्व किया.

गुरु अमरदास

गुरु अमरदास (Guru Amardas) सिखों के तीसरे गुरु थे. वे चरित्रवान और सदाचारी थे. उन्होंने सिख धर्म का व्यापक ढंग से प्रचार किया.

गुरु रामदास

चौथे गुरु रामदास (Guru Ramdas) अत्यंत साधु प्रकृति के व्यक्ति थे. उन्होंने अमृतसर में एक जलाशय से युक्त भू-भाग दान दिया, जिसपर आगे चलकर स्वर्ण मंदिर (golden temple) का निर्माण हुआ.

गुरु अर्जुन

सिख धर्म के इतिहास (Sikh Dharma History) में गुरु अर्जुन का महत्त्वपूर्ण स्थान है. पाँचवें गुरु अर्जुन (Guru Arjuna)ने  सिखों के 'आदि ग्रन्थ” नामक धर्म ग्रन्थ का संकलन किया, जिसमें उनके पूर्व के चारों गुरुओं और कुछ हिन्दू और मुसलमान संतों की वाणी संकलित है. उन्होंने खालसा पंथ की आर्थिक स्थिति को दृढ़ता प्रदान करने के लिए प्रत्येक सिख से धार्मिक चंदा वसूल (धार्मिक कर) करने की प्रथा चलाई. जहाँगीर के आदेश पर गुरु अर्जुन का इस कारण वध कर दिया गया कि गुरु अर्जुन ने जहाँगीर के विद्रोही बेटे शहजादा खुसरो को दयापूर्वक शरण दिया था.

गुरु हरगोविंद

गुरु अर्जुन के पुत्र गुरु हरगोविंद (Guru Hargobind Sahib Ji)ने  सिखों का सैनिक संगठन किया. उन्होंने एक छोटी-सी सिखों की सेना एकत्र की. गुरु अर्जुन ने शाहजहाँ के विरुद्ध विद्रोह करके एक युद्ध में शाही सेना को हरा भी दिया. किन्तु बाद में उनको कश्मीर के पर्वतीय प्रदेश में शरण लेनी पड़ी.

गुरु हरराय और गुरु किशन

गुरु हरराय (Guru Har Rai) और गुरु किशन (Guru Kishan) के काल में कोई उल्लेखनीय घटना नहीं घटी. उन्होंने गुरु अर्जुन द्वारा प्रचलित धार्मिक चंदे की प्रथा और उनके पुत्र हर गोविन्द की की सैनिक-संगठन की नीति का अनुसरण करके खालसा पंथ को और भी शक्तिशाली बनाया.

तेग बहादुर

नवें गुरु तेग बहादुर (Guru Teg Bahadurको औरंगजेब की दुष्ट प्रकृति का सामना करना पड़ा.  उसने गुरु तेग बहादुर को बंदी बनाकर उनके सामने प्रस्ताव रखा कि या तो इस्लाम धर्म स्वीकार करो अथवा प्राण देने को तैयार हो जाओ. बाद में उनका सिर दुष्ट औरंगजेब ने काट डाला. उनकी शहादत का समस्त सिख सम्प्रदाय, उनके पुत्र और अगले गुरु गोविन्द सिंह पर गंभीर प्रभाव पड़ा.

गुरु गोविन्द सिंह

गुरु गोविन्द सिंह (Guru Gobind Singh)  ने भली-भांति विचार करके शांतिप्रिय सिख सम्प्रदाय को सैनिक संगठन का रूप दिया जो दृढ़तापूर्वक मुसलामानों के अतिक्रमण और अत्याचारों का सामना कर सके. साथ ही उन्होंने सिखों में ऐसी अनुशासन की भावना भरी कि वे लड़ाकू शक्ति बन गए. उन्होंने अपने पंथ का नाम खालसा (पवित्र) रखा. साथ ही समस्त सिख समुदाय को एकता-सूत्र में बाँध कर के विचार से सिखों के केश, कच्छ, कड़ा, कृपाण और कंघा - पाँच वस्तुओं को आवश्यक रूप में धारण करने का आदेश दिया. उन्होंने पाहुल प्रथा का शुभारम्भ किया जिसके अनुसार सभी सिख समूह में जात-बंधन तोड़ने के उद्देश्य से एक ही कटोरे में प्रसाद ग्रहण करते थे.

गुरु गोविन्द सिंह ने स्थानीय मुग़ल हाकिमों से कई युद्ध किये, जिनमें उनके दो बालक पुत्र मारे भी गए. पर इससे वे हतोत्साहित नहीं हुए. अपनी मृत्यु तक सिखों का संगठन करते रहे. 1708 ई. में एक अफगान ने उनकी हत्या कर दी.

आगे चलकर गुरु गोविन्द सिंह की रचनाएँ भी संकलित हुईं और यह संकलन 'गुरु ग्रन्थ साहब” का परिशिष्ट (appendix) बना.  समस्त सिख समुदाय उनका इतना आदर करता था कि उनकी मृत्यु के बाद गुरु पद ही समाप्त कर दिया गया. वैसे उनके मृत्यु के बाद ही बंदा वीर ने सिखों का नेतृत्व भार संभाल लिया. वीर वंदा के नेतृत्व में 1708 ई. से लेकर 1716 ई. तक सिख निरंतर मुगलों से लोहा लेते रहे, पर 1716 ई. में बंदा वीर बंदी बना लिया गया और बादशाह फर्रुखशियर (1713-1719ई.) की आज्ञा से हाथियों से रौंदवादकर उसकी निर्मम हत्या कर दी गई.

सिख धर्म पर प्रहार - काला इतिहास (Black History)

सैकड़ों सिखों को घोर यातनाएँ दी गयीं फिर भी इन अत्याचारों से खासला पंथ की सैनिक शक्ति को दबाया नहीं जा सका. गुरु के अभाव में, व्यक्तिगत नेतृत्व के स्थान पर, संगठन का भार कई व्यक्तियों के एक समूह पर आ पड़ा, जिन्होंने अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार अपने सहधर्मियों का संगठन किया.00

सल्तनत काल(सुल्तान काल) मे भारत( ईरान, इराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड और आज का बचा हिंदुस्तान यह सब हिंदुस्तान ही था)

सल्तनत काल के दौरान छोटे राज्य

राज्य मे नियम और विनियम नहीं था, कोई भी अपने आप को शासक घोषित कर सकता था। वंश और राजशाही का अधिक औचित्य नहीं था। रईसों ने राजा निर्माता का स्थान ग्रहण कर रखा था और कमजोर सुल्तानों को अपने नियंत्रण मे रख कर गद्दी/ सिंहासन पर अपनी पकड़ को बनाए रखा था । वह राज्य जो एक बार अपने न्यायिक और प्रशासनिक गौरव के लिए जाना जाता था अब वह अराजकता और अशांति के अधीन था जो विघटन का मुख्य कारण था। इसने अनेक छोटे कमजोर राज्यों को भी जन्म दिया जो सल्तनत के शासकों के खिलाफ खड़े हुये, जो प्रत्यक्ष तौर पर देश मे विस्तार का कारण रहा।

उनमे से कुछ राज्य इस प्रकार थे

जौनपुर (1401 ईस्वी): इसका उदय मलिक-उश-शर्क के शासन मे हुआ, तैमूर के हमले के बाद शर्क ने इस भ्रम का फायदा उठाया और अपने सत्तारूढ़ शक्ति की पूर्ण स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। उसके उत्तराधिकारी इतिहास मे शरीकी के रूप मे जाने जाते थे। हुसैन शाह शरीकी वंश का आखिरी शासक था।

मालवा (1435 ईस्वी):  इस प्रांत को 1305 ईस्वी मे अलाउद्दीन खिल्जी के सल्तनत के अधीन कर लिया गया। यह अपने राज्यपाल दिहावन खान घूरी (जो एक कमजोर और फीका शासक के रूप मे जाना जाता था) तक मजबूत और एकीकृत रहा, और 1435 ईस्वी मे अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी थी । इस विशाल राज्य का विस्तार सतपुड़ा से गुजरात की सीमाओं और बुंदेलखंड के क्षेत्र से मेवाड़ और बूंदी तक हुआ।

मालवा वर्ष 1531 ईस्वी मे गुजरात का एक एकीकृत अंग बन गया और अंत मे 1562 ईस्वी मे मुगलों द्वारा हड़प लिया गया। 

गुजरात (1397 ईस्वी) : 1397  ईस्वी मे मुजफ्फरी राजवंश ने गुजरात का पदभार संभाल लिया जो जफर खान के शासन के अधीन था। मुजफ्फर शाह ने इस सत्तारूढ़ शक्ति के खिलाफ विद्रोह कर दिया और मुजफ्फरी राजवंश की स्थापना किया।

उसने जबरदस्ती सुल्तान मुजफ्फर शाह की उपाधि लिया। उसके अधीन इस वंश ने 1573 ईस्वी तक राज्यों पर नियंत्रण किया। उसके राज्य काल के दौरान उसने निज़ाम शाह बहमनी को नागरिक आक्रामकता से बचाया। बाद मे वह पुर्तगाली सेना के द्वारा मारा गया, और 1573 ईस्वी मे अकबर ने गुजरात को अपने साम्राज्य मे शामिल कर लिया।

राजस्थान:

इस काल के दौरान राजस्थान मे 3 प्रमुख स्वतंत्र राज्य थे:

1.  मेवाड़ (1303 ईस्वी)

  • 1303 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा चित्तौड़ की राजधानी पर कब्जा कर इसे जब्त किया गया था। बाद में उग्र राजपूत राजाओं ने खिलजी को अपने कब्जे में ले लिया था।
  • बहादुर राजपूत शासक राणा हामिद ने जल्द ही 1326 ईस्वी में खिलजी के चंगुल से मेवाड़ को छुड़ा लिया था।
  • उसे मेवाड़ पर विजय के उपलक्ष्य में चित्तौड़ में प्रसिद्ध 'विजय स्तंभ' का निर्माण करने के लिए जाना जाता है।
  • छोटी सेना होने की वजह से वह खनुवा मे 1527 ईस्वी मे बाबर से हार गए थे।
  • 1615 ईस्वी में मेवाड़ ने जहांगीर के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया था।

 2.  आमेर (या अंबर) (1561 ईस्वी)

  • कछुवाह राजपूत जो महान योद्धा और निर्माणकर्ता थे, ने दशवी शताब्दी मे किलों के शहर की स्थापना किया।
  •  इस तथ्य के अलावा कि अंबर एक राजपूत राज्य था मुगल आधिपत्य को स्वीकार करने वाला यह पहला राज्य था।
  • यह एक हकीकत है कि आमेर के शासक भारमल ने अकबर के प्रभुत्व को 1561 मे मान्यता प्रदान की और मुगल साम्राज्य के गरिमा और विस्तार मे अत्यधिक योगदान दिया।

कश्मीर ( 1339 ईस्वी)

कश्मीर के प्रथम मुस्लिम सुल्तान, शाह मिर्ज़ा को शम्स-उद-दिन शाह के नाम से भी जाना जाता था जिसका सिंहासन 1339 ईस्वी मे जब्त कर लिया गया था । मिर्जा को हिंदुओं का उत्पीड़न करने के लिए जाना जाता था जिसके कारण हिंदुओं के हितों की रक्षा के लिए उसे उसके भाई शाह खान के द्वारा अपदस्थ कर दिया गया। सिकंदर को ज़ैन-उल-अबिदीन की उपाधि से नवाजा गया क्यूकि वह एक योग्य शासक था।  

ज़ैन-उल-अबिदीन को “कश्मीर का अकबर” के नाम से भी जाना था। उसने उन ब्राह्मणो को वापस बुलाया जो मिर्जा के विश्वासघात की वजह से कश्मीर छोड़ कर भाग गए थे। उसने महाभारत और राजतरंगिनी का फारसी भाषा मे अनुवाद भी करवाया। कश्मीर के राज्य को अकबर ने 1586 मे हड़प लिया था।

बंगाल:

इख्तियार-उद-दिन मुहम्मद-बिन-बख्तियार खल्जी ने 1204 ईस्वी मे बंगाल को दिल्ली सल्तनत का एक भाग बनाया। लेकिन राजधानी से दूर होने की वजह से दिल्ली से बंगाल पर शासन करने मे हमेशा कठिनाईया उत्पन्न होती थी।

यह ग्याश-उद-दिन तुग़लक के शासन के अधीन था, बंगाल तीन स्वतंत्र प्रशासनिक प्रभाग मे विभाजित किया गया था जिनके नाम क्रमशः लखनौती, सतगांव और सोनारगांव थे।

बंगाल 1410 ईस्वी तक सैफ-उद-दिन हमज़ा शाह के शासन के अधीन था। बाद मे हमज़ा, ग्याश-उद-दिन ने अपने आप को एक स्वतंत्र शासक के रूप मे स्थापित किया।

ग्याश-उद-दिन मुहम्मद शाह वंश का आखिरी राजा था। 1538 ईस्वी मे बंगाल के प्रांत पर शेर शाह सूरी ने कब्जा कर लिया था।

उड़ीसा (1706)

1076 ईस्वी से 1148 ईस्वी तक राजा अनंतवर्मन के अधीन उड़ीसा राज्य ने अपने पूर्ण गौरव और प्रख्याति को देखा। अनंतवर्मन कला और साहित्य के महान संरक्षक थे। वह एक महान विजेता थे जिसे पुरी मे प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर के जीत के रूप मे देखा जाता है। उन्हे कुछ योग्य शासको के द्वारा सफल बनाया गया जब तक कि फिरोज शाह तुग़लक ने राज्य पर आक्रमण और पुरी मे जगन्नाथ मंदिर को अपवित्र नहीं किया था।  

कामरूप और असम (1305 ईस्वी)

तेरहवीं शताब्दी तक कामरूप के राज्य का इतिहास स्पष्ट नहीं है।  अहोम ने ब्रह्मपुत्र घाटी मे उत्तरी बर्मा से प्रवेश किया और तेरहवी सदी के पहले भाग मे अपने पूर्वी क्षेत्र मे एक राज्य की स्थापना की । इतिहास मे इस वंश के संस्थापक सुकाफा थे। सत्तरहवी शताब्दी मे अहोम राज्य मुगल आक्रमणों का निशाना बने।

खानदेश (1388 ईस्वी)

1388 ईस्वी मे राजधानी बुरहानपुर मे राजा मलिक के योग्य शासन मे, ताप्ती की घाटी मे खानदेश के छोटे राज्य स्वतंत्र हुये। इसके शासक फरुक्की वंश के नाम से जाने गए। उनकी मृत्यु के पश्चात दो राज्य फिर से अलग संस्थाएं बन गए । 1601 ईस्वी मे राज्य पर अकबर ने कब्जा कर था।

हिन्दू साम्राज्य, बीर शिवाजी महाराज

शिवाजी की जीवनी 

शिवाजी का जन्म शाहजी भोंसले की प्रथम पत्नी जीजाबाई की कोख से 10 अप्रैल, 1627 ई. को शिवनेर के दुर्ग में हुआ था. शिवनेर का दुर्ग पूना से उत्तर जुन्नार नगर के पास था. उनकी जन्म-तिथि के सम्बन्ध में इतिहासकारों के बीच मतभेद है. कई जन्म-तिथियों का उल्लेख किया गया है जिनमें 20 अप्रैल, 1627, 19 फरवरी 1630 और 9 मार्च 1630 ई. विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं.

शिवाजी का बचपन

शिक्षा

शिवाजी  को हैदरअली और रणजीत सिंह की तरह नियमित शिक्षा नहीं मिली थी. उनकी माँ पैत्रिक जागीरदारी में ही रहती थीं. शाहजी भोंसले ने अपने विश्वासी सेवक दादाजी कोणदेव को शिवाजी का संरक्षक नियुक्त किया था. दादाजी कोणदेव एक वयोवृद्ध अनुभवी विद्वान् थे. उन्होंने शिवाजी की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें मौखिक रूप से रामायण, महाभारत और अन्य धार्मिक ग्रन्थों से अवगत करवा दिया था. मानसिक विकास के साथ-साथ दादाजी कोणदेव ने शिवाजी को युद्ध-कला की शिक्षा दी थी. दादाजी कोणदेव से ही शिवाजी को प्रशासन का ज्ञान भी प्राप्त हुआ था. अतः जीजाबाई के अतिरिक्त दादाजी कोणदेव का प्रभाव शिवाजी के जीवन और चरित्र-निर्माण पर सबसे अधिक पड़ा था.

चरित्र-विकास

मराठा रक्त

शिवाजी की धमनी में मराठा और यादव का रक्त प्रवाहित हो रहा था. स्वाभाविक रूप से वंश-परम्परा के अनुकूल उनमें साहस, वीरता और स्वाभिमान की कमी नहीं थी. उन्होंने अपने संरक्षक दादाजी कोणदेव की सलाह के अनुसार बीजापुर के सुल्तान की सेवा करना अस्वीकार कर दिया था. उन्होंने स्वतंत्र और साहसिक जीवन व्यतीत करना अधिक श्रेयस्कर माना. उस समय बीजापुर का राज्य आपसी संघर्ष और विदेशी आक्रमण के संकटकाल से गुजर रहा था. अतः पतन के तरफ बढ़ रहे सुल्तान की सेवा करने के बदले वे मावलों को संगठित करने लगे. मावल प्रदेश पश्चिम घाट के पास 90 मील लम्बा और 19 मील चौड़ा एक विशाल प्रदेश था जो पहाड़ियों और घाटियों से आच्छादित था. इस प्रदेश में कोली और मराठा जाति के लोग रहते थे जो संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करने के फलस्वरूप परिश्रमी और कुशल सैनिक माने जाते थे. शिवाजी मावल प्रदेश के निवासियों के साथ सम्पर्क स्थापित कर उनके विभिन्न भागों से परिचित हो गए. मावल युवकों को अपने पक्ष में लाकर शिवाजी ने दुर्ग-निर्माण का कार्य प्रारम्भ कर दिया. मावल जातियों का सहयोग शिवाजी के लिए वैसा ही महत्त्वपूर्ण साबित हुआ जैसा शेरशाह के लिए अफगानों का सहयोग. अफगानों के सहयोग के बल पर शेरशाह ने अफगान साम्राज्य की स्थापना की थी उसी तरह शिवाजी भी मावलों के सहयोग के बल पर एक स्वतंत्र राष्ट्र स्थापित करना चाहते थे.

विवाह

 

शिवाजी का मूल्यांकन

शिवाजी के व्यक्तित्व और चरित्र में कुछ ऐसे आकर्षक तत्त्व थे जिन्होंने उन्हें साधारण व्यक्तित्व से ऊपर उठाकर विरल व्यक्तित्व की श्रेणी में रख दिया. बाल्यकाल में माता के द्वारा जिन आदर्शों का पालन करने की शिक्षा उन्हें दी गई थी, उनका व्यावहारिक जीवन में अक्षरशः पालन कर उन्होंने माता के प्रति असीम भक्ति का परिचय दिया था. एक सफल और योग्य सैनिक और सेनानायक के सभी गुण शिवाजी के व्यक्तित्व में विद्यमान थे.

मृत्यु

1680 ई. में क्षत्रपति शिवाजी की मृत्यु हो गयी. वे अपने पीछे ऐसा साम्राज्य छोड़ गए जिसका मुगलों से संघर्ष जारी रह गया. उनकी मृत्यु के तुरंत बाद, 1681 में, औरंगजेब ने मराठों, आदिल शाही और गोलकुंडा के प्रदेशों पर कब्जा करने के लिए दक्षिण में आक्रामक सैन्य अभियान चलाया.

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...