सन 1833 का चार्टर अधिनियम

1833 ई. का चार्टर अधिनियम

1833 ई. का चार्टर अधिनियम इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्रांति का परिणाम था ताकि इंग्लैंड में मुक्त व्यापार नीति के आधार पर बड़ी मात्रा में उत्पादित माल हेतु बाज़ार के रूप में भारत का उपयोग किया जा सके| अतः चार्टर अधिनियम उदारवादी संकल्पना के आधार पर तैयार किया गया था| ब्रिटिश संसद के इस अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को अगले बीस वर्षों तक भारत पर शासन करने का अधिकार प्रदान कर दिया गया|

चार्टर अधिनियम की विशेषतायें

• इस अधिनियम द्वारा कंपनी के अधीन क्षेत्रों व भारत के उपनिवेशीकरण को वैधता प्रदान कर दी गयी|

• इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक कंपनी का दर्जा समाप्त कर दिया गया  और वह अब केवल प्रशासनिक निकाय मात्र रह गयी थी|

• बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा| लॉर्ड विलियम बेंटिक को “ब्रिटिश भारत का प्रथम गवर्नर जनरल” बनाया गया|

• सपरिषद गवर्नर जनरल को कंपनी के नागरिक व सैन्य संबंधों के नियंत्रण, अधीक्षण और निर्देशित करने की शक्ति प्रदान की गयी| केंद्रीय सरकार का राजस्व वृद्धि और व्यय पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया गया| अतः सभी वित्तीय व प्रशासनिक शक्तियों का केन्द्रीकरण गवर्नर जनरल के हाथों में कर दिया गया|

• गवर्नर जनरल की परिषद् के सदस्यों की संख्या,जिसे पिट्स इंडिया एक्ट द्वारा घटाकर तीन कर दिया गया था, को पुनः बढ़ाकर चार कर दिया|

1813 ईस्वी का अंग्रेजी सरकार का चार्टर अधिनियम

1813 का चार्टर अधिनियम

लम्बे समय तक चले नैपोलियन युद्ध और महाद्वीपीय प्रणाली के क्रियान्वयन के कारण .ब्रिटिश व्यापार में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गयी| दूसरी ओर, ब्रिटिश व्यापारी लगातार कंपनी-व्यापार को सभी निजी व्यापारियों हेतु खोलने की मांग कर रहे थे| अतः उनकी मांगों को पूरा करने के लिए चार्टर अधिनियम पारित किया गया | इसे 1813 ई. का ईस्ट इंडिया कंपनी अधिनियम भी कहा गया| यह ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एक ऐसा अधिनियम था जिसने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को जारी रखा|

अधिनियम के प्रावधान

• इसने भारत में ब्रिटिशों की संवैधानिक स्थिति की व्याख्या के माध्यम से ब्रिटिश भारत पर ब्रिटेन के राजा की सम्प्रभुता साबित की गयी |

• यह अधिनियम स्थानीय निकायों को ,सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक-क्षेत्र  में आने वाले लोगों पर, कर लगाने का भी अधिकार प्रदान करता है|

• भारत में प्रांतीय सरकारों व न्यायालयों की शक्तियों के संदर्भ में यूरोपीय ब्रिटिशों के मामलों को मजबूती प्रदान की गयी|

• भारतीय साहित्य के नवीनीकरण और विज्ञान के उत्थान हेतु वित्तीय प्रावधानों को शामिल किया गया|

• इस अधिनियम में यह भी शामिल था कि मिशनरीज भारत में जाकर ईसाई धर्म का  प्रसार कर सकते है|

इस्लाम समाज में परिवर्तन का जरिया सूफी

सूफी मत - सूफी विचारधारा (Sufism in Hindi)

भारत में आने से पहले सूफी मत ने स्वयं को पूर्ण रूप से विकसित कर लिया था. बारहवीं सदी में भारत में आने से पूर्व तक इसमें प्रार्थना-उपवास, मन्त्र-पूजा, पीर-मुरीद आदि सभी परम्परायें विकसित हो चुकी थीं. चलिए जानते हैं सूफी मत भारत में कब आया और इसके प्रवर्तकों कौन थे? इस आर्टिकल में हम सूफी सिलसिले (Sufi Orders) के बारे में (Sufism in Hindi) भी जानेंगे; जैसे - चिश्ती सिलसिला, सुहारवर्दी, कादिरी (Qadiriyya), शत्तारी (Shattari Silsila), कुब्रबिया (Kubrawiyya), फिरदौस (Firdausi), नक्शबंदी (naqshbandi) सिलसिला आदि.

सूफी मत की नींव

प्रारम्भ में सूफी लोग (आठवीं व नवीं सदी में) अरब में दिखाई पड़े और लम्बे समय तक उनकी पहचान उनके पहनावे ऊनी वस्त्रों से की जाने लगी. साधारणतः सफ का अर्थ ऊन या भेड़-बेकरी के ऊनी कपड़े से होता है जो साफ से बने वस्त्र पहनता था, वह सूफी कहलाता था.इब्नुलअरबी प्रथम व्यक्ति था जिसने सूफी मत में महत्त्वपूर्ण सिद्धांत वहदत्त-उल-वुजूद (wahdat ul wajood) दिया. जिसका अर्थ है, ईश्वर सर्वव्याप्त है व सभी में उसकी झलक है, उससे कुछ भी अलग नहीं है, सभी मनुष्य समान हैं. सूफियों के निवास स्थान खानकाह कहलाते थे जबकि उनकी वाणी महफूजात (ग्रन्थ) में थी.

सैयद मुहम्मद हाफिज के मतानुसार ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (1192 ई. में मोहम्मद गौरी के साथ आये) ने भारत में सूफी मत का प्रारम्भ किया.

आइने अकबरी

आइने अकबरी में अबुल फजल ने 14 सूफी सिलसिलों का वर्णन किया है जो निम्न हैं -

      1. चिश्ती
      2. सुहरावर्दी
      3. कादिरी
      4. शत्तारी
      5. हबीबी
      6. तफूरी
      7. जुनैदी
      8. करबी
      9. सकती
      10. इयादी
      11. तूसी
      12. दुबरी
      13. अधमी
      14. फिरदौसी

सूफीवाद की तीन सीढियाँ

सूफीवाद की तीन सीढ़ियाँ ईश्वर में लीन होने की -

  1. फ़नाफिस्सेख (अपने पीर में समा जाना)
  2. फना किर्रसूक (अपने रसूल में समाना)
  3. फनाफिल्लाह  (अपने आपको ईश्वर में समा देना)

फरीदुद्दीन की सात घाटियाँ

सूफी कवी संत फरीदुद्दीन अत्तार ने कहा ईश्वर को प्रेम से पा सकते हैं जिनके लिए इन्होने सात घाटियों को पार करना आवश्यक बताया जो निम्न हैं -

  1. खोज घाटी - यहाँ साधक को भौतिक वस्तुओं को त्याग देना चाहिए. साधक को परम ज्योति प्राप्त होने पर इसे छोड़ देना चाहिए.
  2. परम ज्योति स्पर्श - इस ज्योति को पाकर साधक अनंत घाटी की ओर जाता है. यहाँ साधक के रहस्यमयी जीवन का आरम्भ होता है.
  3. मारीफात घाटी - इस घाटी में साधक को सत्य का ज्ञान प्राप्त हो जाता है,
  4. अनासक्ति घाटी - इसमें साधक को ईश्वरीय प्रेम प्राप्त हो जाता है.
  5. आनंद घाटी - इसमें साधक ईश्वरीय सौन्दर्य को प्राप्त कर आनंद की अनुभूति होती है.
  6. कौतूहल घाटी - यह साधक की अंतर्दृष्टि का पुनः लोप हो जाता है व साधक अन्धकार में जाता मह्सूत करता है.
  7. हकीकत घाटी - इसमें साधक को आत्मा या परमात्मा की आत्मा में एकाकार हो जाता है. इस घाटी यात्रा को पूरा कर साधक इश्क हकीकी को प्राप्त हो जाता है.

SUFI ORDERS

चिश्ती सिलसिला

मुइनुद्दीन चिश्ती

इस सिलसिला (Chishti Order) का प्रवर्तक ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (1192 ई.) था. ख्वाजा मुइनुद्दीन शुरुआत में लाहौर आया और बाद में अजमेर में बस गया. यहीं पर चिश्ती सिलसिले का प्रांरभ किया. इसके अन्य महत्त्वपूर्ण संतों में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकों (12वीं व 13वीं सदी), फरीदुद्दीन मसूद गज-ए-शंकर (हरियाणा), शेख निजामुद्दीन औलिया (13वीं व 14वीं सदी), शेख अधी सेराज, नूर क़ुतुब आलम (पांडुओक), शेख हुसामुद्दीन मामिकपूरी, बुरहानुद्दीन गरीब और दक्षिण के हजरत गेसूदराज अजोधन (पंजाब) आदि प्रमुख थे.

भारत में चिश्ती सिलसिला अजमेर (राजस्थान), दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार, उड़ीसा, बंगाल व दक्षिण भारत में फैला. बाबा फरीद मसूद के काव्य गीत आदिग्रंथ में शामिल किये गए हैं. इसके प्रमुख शिष्य (शेख) हजरत निजामुद्दीन औलिया थे.

  • चिश्ती संत यौगिक क्रियाओं में, समाज सेवा में, अद्वैतवाद में विश्वास रखते थे.
  • चिश्ती संत धन संचय, शासक वर्ग के सम्पर्क में रहना, संन्यास परम्पराओं में विश्वास नहीं रखते थे.

निजामुद्दीन औलिया

सात सुल्तानों को देखने वाले बदायूँ में जन्म निजामुद्दीन औलिया महबूब-ए-इलाही ने अपना कर्मक्षेत्र दिल्ली के पास गयासपुर में बनाया. इनकी लोकप्रियता से परेशान हो गयासुद्दीन तुगलक ने इन्हें दिल्ली छोड़ देने का आदेश दिया जिस पर इन्होने 'हुजूर दिल्ली दूर अस्त” कहा.

सुल्तान महमूद तुगलक ने इनकी इच्छा से विरुद्ध इनका मकबरा दिल्ली में बनवाया. औलिया संगीत में अत्यधिक रूचि रखते थे जिसके कारण इन पर मुकदमा चलाया गया. अमीर खुसरो औलिया के एक शिष्य थे.

सुहारवर्दी सिलसिला (Suhrawardiyya)

इस सिलसिले का संस्थापक जलालुद्दीन तबरीजी और बहाउद्दीन जकारिया थे. चिश्ती सिलसिले के विपरीत सुहारवर्दी आरामपसंद जीवन में विश्वास रखते थे. ये राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेते थे. सुहारवर्दियों का मानना था कि 'यदि दिल निर्मल है तो धन के संचय और वितरण दोनों में दोष नहीं है”.

कादिरी सिलसिला

इसका संस्थापक सैय्यद मुहम्मद गिलानी (भारत में) था. कादिर पन्थ के प्रसिद्ध संत मियाँ मीर (मीर मुहम्मद) था. शाहजहाँ का पुत्र दाराशिकोह भी कादिरी मत को मानता था.

इस पंथ का संस्थापक शाह अब्दुल्ला था. इस पन्थ का मुख्य संत ग्वालियर के मुहम्मद गौस था. वह हाजी हमीद हसन के शिष्य था. गौस की रचित पुस्तकें 'जवाहर-ए-खामशाह” व 'खालिद-ए-मुखाजिन” हैं. इस मत की मान्यता है कि पीर या शेख अन्य संतों, पैगम्बरों - ईश्वर तक से सीधा सम्पर्क रखने में समर्थ है.

कुब्रबिया सिलसिला

इसका प्रवर्तक नज्मुद्दीन-अल-कुबरा था. इसका प्रसार मात्र कश्मीर में ही रहा.

फिरदौस सिलसिला

यह भारत में अपने पैर नहीं पसार सका.

नक्शबंदी सिलसिला

इसका संस्थापक ख्वाजा बली बिल्ला था. यह सबसे रुढ़िवादी सूफी संत था. यह अकबर की उदार नीतियों का कड़ा विरोधी था.

सिख धर्म

सिख धर्म का संक्षिप्त इतिहास और व्यापक जानकारी - History of Sikhism in Hindi

सिख धर्म के लोग गुरुनानक देव के अनुयायी हैं. गुरुनानक देव का कालखंड 1469-1539 ई. है. सिख धर्म के लोग मुख्यतया पंजाब में रहते हैं. वे सभी धर्मों में निहित आधारभूत सत्य में विश्वास रखते हैं और उनका दृष्टिकोण धार्मिक अथवा साम्प्रदायिक पक्षपात से रहित और उदार है. 1538 ई. में गुरु नानक की मृत्यु के बाद सिखों का मुखिया गुरु कहलाने लगा. सिख धर्म का इतिहास बलिदानों का इतिहास है. आज हम इस आर्टिकल में सिख धर्म के दस गुरुओं और सिख धर्म के गौरवपूर्ण इतिहास (History) को आपके सामने रखेंगे. सिख धर्म के इतिहास (Brief History of Sikh Dharma) में गुरुओं की लिस्ट (Sikh Guru List) कुछ इस तरह है -

  1. गुरुनानक देव (1469-1539)
  2. अंगद (1539-1552)
  3. अमरदास (1552-1574)
  4. रामदास (1574-1581)
  5. अर्जुन (1581-1606)
  6. हरगोविन्द (1606-1645)
  7. हरराय (1645-1661)
  8. हरकिशन (1661-1664)
  9. तेग बहादुर (1664-1675)
  10. गुरु गोविन्द सिंह (1675-1708)

गुरु नानक

गुरु नानक (Guru Nanak) के सिख धर्म के प्रवर्तक थे. 1469 ई. में लाहौर के निकट तलवंडी अथवा आधुनिक ननकाना साहिब में खत्री परिवार में वे उत्पन्न हुए. वे साधु स्वभाव के धर्म-प्रचारक थे. उन्होंने अपना पूरा जीवन हिन्दू और इस्लाम धर्म की उन अच्छी बातों के प्रचार में लगाया जो समस्त मानव समाज के लिए कल्याणकारी है. गुरुनानक ने अत्यधिक तपस्या और अत्यधिक सांसारिक भोगविलास, अहंभाव और आडम्बर, स्वार्थपरता और असत्य बोलने से दूर रहने की शिक्षा दी. उन्होंने सभी को अपने धर्म का उपदेश दिया, फलतः हिन्दू और  मुसलामान, दोनों ही उनके अनुयायी हो गए. उनके स्वचरित पवित्र पद तथा शिक्षाएँ (बानियाँ) सिखों के धर्मग्रन्थ 'ग्रन्थ साहिब” में संकलित हैं. नानक देव की मृत्यु 1539 में  हुई.

गुरु अंगद

गुरु अंगद (Guru Angada) सिखों के दूसरे गुरु हुए. इनको गुरु नानक देव ने ही इस पद  के लिए मनोनीत किया था. नानक इनको अपने शिष्यों में सबसे अधिक मानते थे और अपने दोनों पुत्रों को छोड़कर उन्होंने अंगद को ही अपना उत्तराधिकारी चुना. गुरु अंगद श्रेष्ठ चरित्रवान व्यक्ति और सिखों के उच्चकोटि के नेता थे जिन्होंने अनुयायियों का 14 वर्ष तक नेतृत्व किया.

गुरु अमरदास

गुरु अमरदास (Guru Amardas) सिखों के तीसरे गुरु थे. वे चरित्रवान और सदाचारी थे. उन्होंने सिख धर्म का व्यापक ढंग से प्रचार किया.

गुरु रामदास

चौथे गुरु रामदास (Guru Ramdas) अत्यंत साधु प्रकृति के व्यक्ति थे. उन्होंने अमृतसर में एक जलाशय से युक्त भू-भाग दान दिया, जिसपर आगे चलकर स्वर्ण मंदिर (golden temple) का निर्माण हुआ.

गुरु अर्जुन

सिख धर्म के इतिहास (Sikh Dharma History) में गुरु अर्जुन का महत्त्वपूर्ण स्थान है. पाँचवें गुरु अर्जुन (Guru Arjuna)ने  सिखों के 'आदि ग्रन्थ” नामक धर्म ग्रन्थ का संकलन किया, जिसमें उनके पूर्व के चारों गुरुओं और कुछ हिन्दू और मुसलमान संतों की वाणी संकलित है. उन्होंने खालसा पंथ की आर्थिक स्थिति को दृढ़ता प्रदान करने के लिए प्रत्येक सिख से धार्मिक चंदा वसूल (धार्मिक कर) करने की प्रथा चलाई. जहाँगीर के आदेश पर गुरु अर्जुन का इस कारण वध कर दिया गया कि गुरु अर्जुन ने जहाँगीर के विद्रोही बेटे शहजादा खुसरो को दयापूर्वक शरण दिया था.

गुरु हरगोविंद

गुरु अर्जुन के पुत्र गुरु हरगोविंद (Guru Hargobind Sahib Ji)ने  सिखों का सैनिक संगठन किया. उन्होंने एक छोटी-सी सिखों की सेना एकत्र की. गुरु अर्जुन ने शाहजहाँ के विरुद्ध विद्रोह करके एक युद्ध में शाही सेना को हरा भी दिया. किन्तु बाद में उनको कश्मीर के पर्वतीय प्रदेश में शरण लेनी पड़ी.

गुरु हरराय और गुरु किशन

गुरु हरराय (Guru Har Rai) और गुरु किशन (Guru Kishan) के काल में कोई उल्लेखनीय घटना नहीं घटी. उन्होंने गुरु अर्जुन द्वारा प्रचलित धार्मिक चंदे की प्रथा और उनके पुत्र हर गोविन्द की की सैनिक-संगठन की नीति का अनुसरण करके खालसा पंथ को और भी शक्तिशाली बनाया.

तेग बहादुर

नवें गुरु तेग बहादुर (Guru Teg Bahadurको औरंगजेब की दुष्ट प्रकृति का सामना करना पड़ा.  उसने गुरु तेग बहादुर को बंदी बनाकर उनके सामने प्रस्ताव रखा कि या तो इस्लाम धर्म स्वीकार करो अथवा प्राण देने को तैयार हो जाओ. बाद में उनका सिर दुष्ट औरंगजेब ने काट डाला. उनकी शहादत का समस्त सिख सम्प्रदाय, उनके पुत्र और अगले गुरु गोविन्द सिंह पर गंभीर प्रभाव पड़ा.

गुरु गोविन्द सिंह

गुरु गोविन्द सिंह (Guru Gobind Singh)  ने भली-भांति विचार करके शांतिप्रिय सिख सम्प्रदाय को सैनिक संगठन का रूप दिया जो दृढ़तापूर्वक मुसलामानों के अतिक्रमण और अत्याचारों का सामना कर सके. साथ ही उन्होंने सिखों में ऐसी अनुशासन की भावना भरी कि वे लड़ाकू शक्ति बन गए. उन्होंने अपने पंथ का नाम खालसा (पवित्र) रखा. साथ ही समस्त सिख समुदाय को एकता-सूत्र में बाँध कर के विचार से सिखों के केश, कच्छ, कड़ा, कृपाण और कंघा - पाँच वस्तुओं को आवश्यक रूप में धारण करने का आदेश दिया. उन्होंने पाहुल प्रथा का शुभारम्भ किया जिसके अनुसार सभी सिख समूह में जात-बंधन तोड़ने के उद्देश्य से एक ही कटोरे में प्रसाद ग्रहण करते थे.

गुरु गोविन्द सिंह ने स्थानीय मुग़ल हाकिमों से कई युद्ध किये, जिनमें उनके दो बालक पुत्र मारे भी गए. पर इससे वे हतोत्साहित नहीं हुए. अपनी मृत्यु तक सिखों का संगठन करते रहे. 1708 ई. में एक अफगान ने उनकी हत्या कर दी.

आगे चलकर गुरु गोविन्द सिंह की रचनाएँ भी संकलित हुईं और यह संकलन 'गुरु ग्रन्थ साहब” का परिशिष्ट (appendix) बना.  समस्त सिख समुदाय उनका इतना आदर करता था कि उनकी मृत्यु के बाद गुरु पद ही समाप्त कर दिया गया. वैसे उनके मृत्यु के बाद ही बंदा वीर ने सिखों का नेतृत्व भार संभाल लिया. वीर वंदा के नेतृत्व में 1708 ई. से लेकर 1716 ई. तक सिख निरंतर मुगलों से लोहा लेते रहे, पर 1716 ई. में बंदा वीर बंदी बना लिया गया और बादशाह फर्रुखशियर (1713-1719ई.) की आज्ञा से हाथियों से रौंदवादकर उसकी निर्मम हत्या कर दी गई.

सिख धर्म पर प्रहार - काला इतिहास (Black History)

सैकड़ों सिखों को घोर यातनाएँ दी गयीं फिर भी इन अत्याचारों से खासला पंथ की सैनिक शक्ति को दबाया नहीं जा सका. गुरु के अभाव में, व्यक्तिगत नेतृत्व के स्थान पर, संगठन का भार कई व्यक्तियों के एक समूह पर आ पड़ा, जिन्होंने अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार अपने सहधर्मियों का संगठन किया.00

सल्तनत काल(सुल्तान काल) मे भारत( ईरान, इराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड और आज का बचा हिंदुस्तान यह सब हिंदुस्तान ही था)

सल्तनत काल के दौरान छोटे राज्य

राज्य मे नियम और विनियम नहीं था, कोई भी अपने आप को शासक घोषित कर सकता था। वंश और राजशाही का अधिक औचित्य नहीं था। रईसों ने राजा निर्माता का स्थान ग्रहण कर रखा था और कमजोर सुल्तानों को अपने नियंत्रण मे रख कर गद्दी/ सिंहासन पर अपनी पकड़ को बनाए रखा था । वह राज्य जो एक बार अपने न्यायिक और प्रशासनिक गौरव के लिए जाना जाता था अब वह अराजकता और अशांति के अधीन था जो विघटन का मुख्य कारण था। इसने अनेक छोटे कमजोर राज्यों को भी जन्म दिया जो सल्तनत के शासकों के खिलाफ खड़े हुये, जो प्रत्यक्ष तौर पर देश मे विस्तार का कारण रहा।

उनमे से कुछ राज्य इस प्रकार थे

जौनपुर (1401 ईस्वी): इसका उदय मलिक-उश-शर्क के शासन मे हुआ, तैमूर के हमले के बाद शर्क ने इस भ्रम का फायदा उठाया और अपने सत्तारूढ़ शक्ति की पूर्ण स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। उसके उत्तराधिकारी इतिहास मे शरीकी के रूप मे जाने जाते थे। हुसैन शाह शरीकी वंश का आखिरी शासक था।

मालवा (1435 ईस्वी):  इस प्रांत को 1305 ईस्वी मे अलाउद्दीन खिल्जी के सल्तनत के अधीन कर लिया गया। यह अपने राज्यपाल दिहावन खान घूरी (जो एक कमजोर और फीका शासक के रूप मे जाना जाता था) तक मजबूत और एकीकृत रहा, और 1435 ईस्वी मे अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी थी । इस विशाल राज्य का विस्तार सतपुड़ा से गुजरात की सीमाओं और बुंदेलखंड के क्षेत्र से मेवाड़ और बूंदी तक हुआ।

मालवा वर्ष 1531 ईस्वी मे गुजरात का एक एकीकृत अंग बन गया और अंत मे 1562 ईस्वी मे मुगलों द्वारा हड़प लिया गया। 

गुजरात (1397 ईस्वी) : 1397  ईस्वी मे मुजफ्फरी राजवंश ने गुजरात का पदभार संभाल लिया जो जफर खान के शासन के अधीन था। मुजफ्फर शाह ने इस सत्तारूढ़ शक्ति के खिलाफ विद्रोह कर दिया और मुजफ्फरी राजवंश की स्थापना किया।

उसने जबरदस्ती सुल्तान मुजफ्फर शाह की उपाधि लिया। उसके अधीन इस वंश ने 1573 ईस्वी तक राज्यों पर नियंत्रण किया। उसके राज्य काल के दौरान उसने निज़ाम शाह बहमनी को नागरिक आक्रामकता से बचाया। बाद मे वह पुर्तगाली सेना के द्वारा मारा गया, और 1573 ईस्वी मे अकबर ने गुजरात को अपने साम्राज्य मे शामिल कर लिया।

राजस्थान:

इस काल के दौरान राजस्थान मे 3 प्रमुख स्वतंत्र राज्य थे:

1.  मेवाड़ (1303 ईस्वी)

  • 1303 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा चित्तौड़ की राजधानी पर कब्जा कर इसे जब्त किया गया था। बाद में उग्र राजपूत राजाओं ने खिलजी को अपने कब्जे में ले लिया था।
  • बहादुर राजपूत शासक राणा हामिद ने जल्द ही 1326 ईस्वी में खिलजी के चंगुल से मेवाड़ को छुड़ा लिया था।
  • उसे मेवाड़ पर विजय के उपलक्ष्य में चित्तौड़ में प्रसिद्ध 'विजय स्तंभ' का निर्माण करने के लिए जाना जाता है।
  • छोटी सेना होने की वजह से वह खनुवा मे 1527 ईस्वी मे बाबर से हार गए थे।
  • 1615 ईस्वी में मेवाड़ ने जहांगीर के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया था।

 2.  आमेर (या अंबर) (1561 ईस्वी)

  • कछुवाह राजपूत जो महान योद्धा और निर्माणकर्ता थे, ने दशवी शताब्दी मे किलों के शहर की स्थापना किया।
  •  इस तथ्य के अलावा कि अंबर एक राजपूत राज्य था मुगल आधिपत्य को स्वीकार करने वाला यह पहला राज्य था।
  • यह एक हकीकत है कि आमेर के शासक भारमल ने अकबर के प्रभुत्व को 1561 मे मान्यता प्रदान की और मुगल साम्राज्य के गरिमा और विस्तार मे अत्यधिक योगदान दिया।

कश्मीर ( 1339 ईस्वी)

कश्मीर के प्रथम मुस्लिम सुल्तान, शाह मिर्ज़ा को शम्स-उद-दिन शाह के नाम से भी जाना जाता था जिसका सिंहासन 1339 ईस्वी मे जब्त कर लिया गया था । मिर्जा को हिंदुओं का उत्पीड़न करने के लिए जाना जाता था जिसके कारण हिंदुओं के हितों की रक्षा के लिए उसे उसके भाई शाह खान के द्वारा अपदस्थ कर दिया गया। सिकंदर को ज़ैन-उल-अबिदीन की उपाधि से नवाजा गया क्यूकि वह एक योग्य शासक था।  

ज़ैन-उल-अबिदीन को “कश्मीर का अकबर” के नाम से भी जाना था। उसने उन ब्राह्मणो को वापस बुलाया जो मिर्जा के विश्वासघात की वजह से कश्मीर छोड़ कर भाग गए थे। उसने महाभारत और राजतरंगिनी का फारसी भाषा मे अनुवाद भी करवाया। कश्मीर के राज्य को अकबर ने 1586 मे हड़प लिया था।

बंगाल:

इख्तियार-उद-दिन मुहम्मद-बिन-बख्तियार खल्जी ने 1204 ईस्वी मे बंगाल को दिल्ली सल्तनत का एक भाग बनाया। लेकिन राजधानी से दूर होने की वजह से दिल्ली से बंगाल पर शासन करने मे हमेशा कठिनाईया उत्पन्न होती थी।

यह ग्याश-उद-दिन तुग़लक के शासन के अधीन था, बंगाल तीन स्वतंत्र प्रशासनिक प्रभाग मे विभाजित किया गया था जिनके नाम क्रमशः लखनौती, सतगांव और सोनारगांव थे।

बंगाल 1410 ईस्वी तक सैफ-उद-दिन हमज़ा शाह के शासन के अधीन था। बाद मे हमज़ा, ग्याश-उद-दिन ने अपने आप को एक स्वतंत्र शासक के रूप मे स्थापित किया।

ग्याश-उद-दिन मुहम्मद शाह वंश का आखिरी राजा था। 1538 ईस्वी मे बंगाल के प्रांत पर शेर शाह सूरी ने कब्जा कर लिया था।

उड़ीसा (1706)

1076 ईस्वी से 1148 ईस्वी तक राजा अनंतवर्मन के अधीन उड़ीसा राज्य ने अपने पूर्ण गौरव और प्रख्याति को देखा। अनंतवर्मन कला और साहित्य के महान संरक्षक थे। वह एक महान विजेता थे जिसे पुरी मे प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर के जीत के रूप मे देखा जाता है। उन्हे कुछ योग्य शासको के द्वारा सफल बनाया गया जब तक कि फिरोज शाह तुग़लक ने राज्य पर आक्रमण और पुरी मे जगन्नाथ मंदिर को अपवित्र नहीं किया था।  

कामरूप और असम (1305 ईस्वी)

तेरहवीं शताब्दी तक कामरूप के राज्य का इतिहास स्पष्ट नहीं है।  अहोम ने ब्रह्मपुत्र घाटी मे उत्तरी बर्मा से प्रवेश किया और तेरहवी सदी के पहले भाग मे अपने पूर्वी क्षेत्र मे एक राज्य की स्थापना की । इतिहास मे इस वंश के संस्थापक सुकाफा थे। सत्तरहवी शताब्दी मे अहोम राज्य मुगल आक्रमणों का निशाना बने।

खानदेश (1388 ईस्वी)

1388 ईस्वी मे राजधानी बुरहानपुर मे राजा मलिक के योग्य शासन मे, ताप्ती की घाटी मे खानदेश के छोटे राज्य स्वतंत्र हुये। इसके शासक फरुक्की वंश के नाम से जाने गए। उनकी मृत्यु के पश्चात दो राज्य फिर से अलग संस्थाएं बन गए । 1601 ईस्वी मे राज्य पर अकबर ने कब्जा कर था।

हिन्दू साम्राज्य, बीर शिवाजी महाराज

शिवाजी की जीवनी 

शिवाजी का जन्म शाहजी भोंसले की प्रथम पत्नी जीजाबाई की कोख से 10 अप्रैल, 1627 ई. को शिवनेर के दुर्ग में हुआ था. शिवनेर का दुर्ग पूना से उत्तर जुन्नार नगर के पास था. उनकी जन्म-तिथि के सम्बन्ध में इतिहासकारों के बीच मतभेद है. कई जन्म-तिथियों का उल्लेख किया गया है जिनमें 20 अप्रैल, 1627, 19 फरवरी 1630 और 9 मार्च 1630 ई. विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं.

शिवाजी का बचपन

शिक्षा

शिवाजी  को हैदरअली और रणजीत सिंह की तरह नियमित शिक्षा नहीं मिली थी. उनकी माँ पैत्रिक जागीरदारी में ही रहती थीं. शाहजी भोंसले ने अपने विश्वासी सेवक दादाजी कोणदेव को शिवाजी का संरक्षक नियुक्त किया था. दादाजी कोणदेव एक वयोवृद्ध अनुभवी विद्वान् थे. उन्होंने शिवाजी की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें मौखिक रूप से रामायण, महाभारत और अन्य धार्मिक ग्रन्थों से अवगत करवा दिया था. मानसिक विकास के साथ-साथ दादाजी कोणदेव ने शिवाजी को युद्ध-कला की शिक्षा दी थी. दादाजी कोणदेव से ही शिवाजी को प्रशासन का ज्ञान भी प्राप्त हुआ था. अतः जीजाबाई के अतिरिक्त दादाजी कोणदेव का प्रभाव शिवाजी के जीवन और चरित्र-निर्माण पर सबसे अधिक पड़ा था.

चरित्र-विकास

मराठा रक्त

शिवाजी की धमनी में मराठा और यादव का रक्त प्रवाहित हो रहा था. स्वाभाविक रूप से वंश-परम्परा के अनुकूल उनमें साहस, वीरता और स्वाभिमान की कमी नहीं थी. उन्होंने अपने संरक्षक दादाजी कोणदेव की सलाह के अनुसार बीजापुर के सुल्तान की सेवा करना अस्वीकार कर दिया था. उन्होंने स्वतंत्र और साहसिक जीवन व्यतीत करना अधिक श्रेयस्कर माना. उस समय बीजापुर का राज्य आपसी संघर्ष और विदेशी आक्रमण के संकटकाल से गुजर रहा था. अतः पतन के तरफ बढ़ रहे सुल्तान की सेवा करने के बदले वे मावलों को संगठित करने लगे. मावल प्रदेश पश्चिम घाट के पास 90 मील लम्बा और 19 मील चौड़ा एक विशाल प्रदेश था जो पहाड़ियों और घाटियों से आच्छादित था. इस प्रदेश में कोली और मराठा जाति के लोग रहते थे जो संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करने के फलस्वरूप परिश्रमी और कुशल सैनिक माने जाते थे. शिवाजी मावल प्रदेश के निवासियों के साथ सम्पर्क स्थापित कर उनके विभिन्न भागों से परिचित हो गए. मावल युवकों को अपने पक्ष में लाकर शिवाजी ने दुर्ग-निर्माण का कार्य प्रारम्भ कर दिया. मावल जातियों का सहयोग शिवाजी के लिए वैसा ही महत्त्वपूर्ण साबित हुआ जैसा शेरशाह के लिए अफगानों का सहयोग. अफगानों के सहयोग के बल पर शेरशाह ने अफगान साम्राज्य की स्थापना की थी उसी तरह शिवाजी भी मावलों के सहयोग के बल पर एक स्वतंत्र राष्ट्र स्थापित करना चाहते थे.

विवाह

 

शिवाजी का मूल्यांकन

शिवाजी के व्यक्तित्व और चरित्र में कुछ ऐसे आकर्षक तत्त्व थे जिन्होंने उन्हें साधारण व्यक्तित्व से ऊपर उठाकर विरल व्यक्तित्व की श्रेणी में रख दिया. बाल्यकाल में माता के द्वारा जिन आदर्शों का पालन करने की शिक्षा उन्हें दी गई थी, उनका व्यावहारिक जीवन में अक्षरशः पालन कर उन्होंने माता के प्रति असीम भक्ति का परिचय दिया था. एक सफल और योग्य सैनिक और सेनानायक के सभी गुण शिवाजी के व्यक्तित्व में विद्यमान थे.

मृत्यु

1680 ई. में क्षत्रपति शिवाजी की मृत्यु हो गयी. वे अपने पीछे ऐसा साम्राज्य छोड़ गए जिसका मुगलों से संघर्ष जारी रह गया. उनकी मृत्यु के तुरंत बाद, 1681 में, औरंगजेब ने मराठों, आदिल शाही और गोलकुंडा के प्रदेशों पर कब्जा करने के लिए दक्षिण में आक्रामक सैन्य अभियान चलाया.

मुगल बादशाह शाहजहां

शाहबुद्दीन मुहम्मद शाहजहाँ

शाहजहाँ भारत का पाचवां मुगल सम्राट था, और वह एक श्रेस्ठ मुगल सम्राट के रूप मे जाना गया है। वह अपने विशाल साम्राज्य को बढ़ाने के लिए अत्यंत उत्सुक रहता था । शाहजहाँ जब बीमार पड़ गया तब उसे अपने वारिस औरंगजेब के द्वारा 1658 मे आगरा के किले मे कैद कर दिया गया था। गैर मुस्लिमो के प्रति उसका दृस्टिकोड़ कम उदार था, वह उसके दादा एवं पिता क्रमश: जहाँगीर एवं अकबर की तुलना मे, गैर-मुस्लिमो के लिये एक रूढ़िवादी मुस्लिम था ।

प्रारम्भिक जीवन:

शाहजहाँ राजकुमार शिहाब – उद- दीन मुहम्मद खुर्रम के रूप मे जाना गया। फारसी भाषा मे उसके नाम का अर्थ “हर्षित” है एवं उसके दादा “अकबर महान” ने उसे “खुर्रम” नाम दिया।

उसके पिता ने उससे प्रभावित होकर उसे बहुत ही कम उम्र मे “शाहजहाँ बहादुर” की उपाधि दे दी थी। उसने डेक्कन मे लोदी, मेवाड़ एवं कांगड़ा के विरुद्ध असाधारण सैन्य क्षमताओ का प्रदर्शन किया। इसके अतिरिक्त शाह जहाँ को “चमत्कारी निर्माता” की उपाधि दी गयी, उसके पास पुराने किलों को फिर से रूपरेखा प्रदान करने एवं नई संरचनाओ की रूपरेखा तैयार करने की उल्लेखनीय क्षमता थी।

उपलबधियाँ:

वह शानदार स्मारक ताजमहल, मोती मस्जिद (लाहौर – जो अब पाकिस्तान मे है), दिल्ली का जामा मस्जिद, आगरा किले का खंड, और वजीर खान मस्जिद दिल्ली का लाल किला का प्रवर्तक था।

डेक्कन के राज्यों पर जीत पाने के क्रम मे शाहजहाँ के निर्देश असाधारण साबित हुये। 1936 ईस्वी तक अहमदनगर को गोलकोंडा एवं बीजापुर के साथ जोड़ दिया गया था एवं उनकी शाखाओ को समाप्त करने के लिए मजबूर किया गया। मुगल सत्ता इसके अलावा उत्तर-पश्चिम मे फैला था। कांधार के प्रमुख फारसी गवर्नर अली मर्दन खान ने उस जगह को 1638 ईस्वी मे मुगलो को समर्पित कर दिया।   

विवाह:

  • 1608 ईस्वी मे शाहजहां मात्र 15 साल की आयु का था जब उसकी सगाई 14 साल की अर्जुमंद बानो से हुयी। इसलिए राजकुमार को विवाह के लिए 5 साल का इन्तजार करना पड़ा।   

 मुमताज़ महल

  1. 1612 ईस्वी मे शाहजहां जब मात्र 20 साल का था उसकी शादी आर्जूमंद बानो से कर दी गयी, जिसे मुमताज़ महल की उपाधि दी गयी।
  2. शादी सुखमय / आनंददायक थी और शाहजहाँ आजीवन मुमताज़ महल के लिए समर्पित रहने लगा। मुमताज़ महल ने शाह जहां के 14 बच्चो को जन्म दिया जिनमे से मात्र सात वयस्कता तक जीवित रहे।
  3. मुमताज़ महल जब 40 साल की आयु की थी, अपने चौदहवे बच्चे जिसका नाम गौहरा बेगम था, को जन्म देते समय प्रसवोत्तर रक्तस्राव की वजह से उसकी मृत्यु हो गयी, और उसका जन्म स्थान बुरहानपुर था।
  4. उसके मृत शरीर को अस्थायी रूप से एक बगीचे मे दफन कर दिया गया था, जो शाहजहाँ के चाचा राजकुमार दनियाल के द्वारा ताप्ती नदी के किनारे बनाया गया था, जो एक जैनाबाद नाम से जाना जाने वाला बंद बगीचा था।
  5. मुमताज़ महल की मृत्यु ने शाह जहाँ के व्यक्तित्व पर एक महत्वपूर्ण प्रभाव डाला और ताजमहल के निर्माण के लिए एक प्रेरक कारक सिद्ध हुआ, जहाँ पर बाद मे मुमताज़ महल के मृतक शरीर को पुनः दफन किया गया था।  

मृत्यु:

जब शाहजहाँ 1658 ईस्वी मे बीमार रहने लगा उस समय शाह जहाँ और मुमताज़ महल का बड़ा पुत्र दारा शिकोह आगे आया और अपने पिता के नाम से प्रतिशासक की ज़िम्मेदारी को स्वीकार किया। उसके प्रतिशासन काल की संदेह की जानकारी मिलने के बाद दारा शिकोह के छोटे भाई शुजा जो बंगाल का वायसराय था एवं मुराद बक्स जो गुजरात का वायसराय था ने अपने स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी और एक विशिष्ट अंत लक्ष्य के साथ अपने पिता के धन पर दावा करने आगरा की ओर चल दिये।

तीसरा पुत्र औरंगजेब, अपने सभी भाईयों मे सबसे सक्षम, ने एक तैयार एवं कुशल सशस्त्र बल इकट्ठा किया और इसका मुख्य सेनापति बना। उसने आगरा के समीप दारा शिकोह के सशस्त्र बल का सामना किया और समुगढ़ की लड़ाई मे उन्हे पराजित कर दिया।

अपनी बीमारी से पूरी तरह से ठीक न होने के बावजूद, औरंगजेब ने शाह जहाँ को साम्राज्य प्रशासन के लिए अयोग्य घोषित कर दिया और औरंगजेब ने उसे आगरा किले के कक्ष मे नजरबंद कर दिया।  

जनवरी 1666 ईस्वी मे शाह जहाँ गंभीर रूप से बीमार हुआ और बिस्तर तक ही सीमित रह गया; एवं वह 22 जनवरी तक लगातार कमजोर होता गया। शाहजहाँ के पादरी काज़ी कुर्बान और आगरा के सैयद मुहम्मद कनौजी आगरा के किले आए, उसके बाद वो उसके शरीर को पास के गलियारे मे ले गए, उसे धोया एवं ढक दिया और चन्दन की लकड़ी से बने एक ताबूत मे रख दिया।

मृत शरीर को आगरा मे ताजमहल ले जाया गया और उसके सबसे प्रिय पत्नी मुमताज़ महल की कब्र के बगल मे नदी के किनारे दफना दिया गया ।

पूरा नाम

अल आजाद अबुल मुजफ्फर शहाब-उद्दीन मोहम्मद खुर्रम

जन्म

5 जनवरी 1592 ईस्वी, लाहौर, पाकिस्तान में

शासन

1628-1658 ईस्वी इस समय को मुगल वास्तुकला का 'स्वर्ण युग'  के रूप में माना जाता था

पिता

जहांगीर

माता

ताज बीबी बिलक़िस मकानी

राजवंश

मुगल साम्राज्य

धर्म

इस्लाम

मृत्यु

22 जनवरी 1666 ईस्वी, आगरा किले मे, आगरा, मुगल साम्राज्य, भारत

दफ़न

ताजमहल

 

दक्षिण भारत के यादव सम्राट, बिजयनगर साम्राज्य

विजयनगर साम्राज्य के सम्राट या शासक

साम्राज्य के इतिहास, विकास, वास्तु कृतियों और नवाचारों के बारे में अधिकांश जानकारी विदेशी यात्रियों के माध्यम से मिलती है। विजयनगर साम्राज्य की उत्पत्ति का वर्णन इतिहास के विभिन्न संस्करणों में किया गया है, कई इतिहासकारों का मत है कि विजयनगर साम्राज्य की स्थापना बुक्का राय प्रथम द्वारा की गयी थी जो कन्नड़ (होयसाल साम्राज्य के सेना कमांडर) थे जबकि अन्य का मानना है कि ये शासक तेलगू मूल के थे जिनका काकतीय साम्राज्य (अपने पतन के आसपास होयसाल साम्राज्य के उत्तरी भाग के नियंत्रक) के साथ संपर्क रहा था।

हालांकि इतिहासकारों का एकमत से मानना है कि दक्षिणी भारत में मुस्लिम प्रभाव से लड़ने के मकसद के साथ साम्राज्य के संस्थापको को एक श्रृंगेरी संत विद्यारण्य का समर्थन प्राप्त था क्योंकि ये मुस्लिम बार-बार दक्कन के हिंदू राज्यों पर हमला कर वहां के शासकों को पराजित कर रहे थे। मुस्लिम राज  में केवल एक ही साम्राज्य “होसयाल” शेष रह गया था। होयसाल साम्राज्य के राजा की मौत के बाद इसका विजयनगर साम्राज्य में विलय हो गया था जो 14 वीं शताब्दी से पहले एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में उभर कर सामने आया था।

हरिहर प्रथम को पूर्व पश्चिम समुद्रधीश्वर (पूर्वी और पश्चिमी समुद्र का प्रमुख) के रूप में जाना जाता था जिसने साम्राज्य की मजबूत नींव रखी थी और तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में चारों ओर प्रमुख क्षेत्रों पर अपना शासन मजबूत कर लिया था। बुक्का राय प्रथम ने आर्कोट, कोडावीडु के रेड्डी बंधु,  मदुरै के सुल्तान प्रमुखों को हराकर न केवल अपने साम्राज्य का पश्चिम में बल्कि तुंगभंद्रा- कृष्णा नदी के उत्तर तक विस्तार किया तथा उसका उत्तराधिकारी बना। अनेगोंडी (वर्तमान में कर्नाटक) में साम्राज्य की राजधानी स्थापित की गयी जिसे बाद में विजयनगर स्थानांतरित कर दिया गया, जहां से साम्राज्य को इसका नाम प्राप्त हुआ था।

अपनी राजसी क्षमता के साथ साम्राज्य प्रमुख रूप से दक्षिणी भारत तक फैल गया था जिसका उत्तराधिकारी हरिहर द्वितीय (बुक्का राय प्रथम का दूसरा पुत्र) था जिसने आगे चलकर अपनी साम्राज्यवादी शक्ति का पूरे दक्षिण क्षेत्र में विस्तार किया। इसके बाद साम्राज्य को देव राय प्रथम द्वारा संघटित किया गया जिसने ओड़िशा के गजपतियों को परास्त किया और साम्राज्य की सिंचाई और दुर्ग निर्माण के प्रमुख कार्यों को क्रियान्वायित किया। तत्पश्चात देव राय द्वितीय गद्दी पर आसीन हुआ जिसे संगम राजवंश का सबसे शक्तिशाली और सफल शासक के रूप में जाना जाता है। सामंती शासन की वजह आंतरिक अस्थिरता की लड़ाई रही थी। उसने श्रीलंका द्वीप पर भी आक्रमण किया और बर्मा साम्राज्य पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।

15 वीं शताब्दी के आसपास साम्राज्य में गिरावट तब तक दर्ज की गयी जब तक कंमाडर सलुवा नरसिंह देव राय और जनरल तुलुव नरस नायक नें क्रमश: 1485 और 1491 में साम्राज्य की ताकत मजबूत करने के ज्यादा प्रयास नहीं किये थे । अंत में साम्राज्य की बागडोर कृष्ण देव राय (तुलुव नरस नायक का पुत्र) के हाथों में आ गयी जिसने विद्रोही सरदारों से युद्ध किया और डेक्कन सल्तनत आक्रमणकारियों को हराकर साम्राज्य को मजबूती प्रदान की। कृष्णदेव राय के शासन में साम्राज्य अपने शिखर पर पहुंच गया था और उसने दक्षिण में अपने सभी अधीनस्थों पर सफल नियंत्रण बनाए रखा था। अपने शासन के दौरान उसने कई स्थापत्य स्मारकों के निर्माण निर्दिष्ट कर कई निर्माण कार्य पूरे भी किये थे।

अच्युत देव राय (कृष्णदेव राय का छोटे भाई) उसका उत्तराधिकारी बना और बाद में उसकी जगह 1529 में सदाशिव राय ने ली थी जबकि वास्तविक शक्ति आलिया राम राय (कृष्णदेव राय का दामाद) के हाथों में निहित थी जिसने अंततः धोखाधड़ी और फूट का फायदा उठाकर शक्ति अपने हाथों में ले ली थी और उत्तर में राजनैतिक प्रभुत्व बढ़ाने के लिए उसने बीजापुर, बरार, गोलकुंडा, अहमदनगर और बीदर की सल्तनत के बीच अशांति पैदा कर दी। कुछ सल्तनतों ने उत्तर में उसके खिलाफ एक गठबंधन का गठन कर दिया और जनवरी 1565 में विजयनगर की सेनाओं के खिलाफ भिड़ गये। विजयनगर विजयी होकर उभरा जबकि आलिया राम राय को कैद कर मौत के घाट उतार दिया गया। इससे विजयनगर साम्राज्य में साधारण सैनिकों के ऊपर अशांति और भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गयी और सल्तनतों  ने उन खंडहरों में अपनी सेना में कटौती कर दी जिसे वह कभी हासिल नहीं कर सके थे। विजयनगर में एकमात्र जीवित कंमाडर तिरुमाला देव राय (राम राय का छोटा भाई) ने एक विशाल खजाने की राशि के साथ साम्राज्य छोड़ दिया।

साम्राज्य में धीरे धीरे गिरावट आने लगी थी जबकि पुर्तगालीयों के साथ व्यापार जारी था और अंग्रजों को मद्रास की स्थापना के लिए एक जमीन आवंटित कर दी गयी थी। श्रीरंग प्रथम (तिरुमाला देव राय का पुत्र) और वेंकट द्वितीय विजयनगर साम्राज्य के अंतिम शासक थे। साम्राज्य शासन के उत्तराधिकारी राम देव राय और वेंकट तृतीय द्वारा एक दशक के लिए विस्तारित कर दिया गया था जिसके बाद साम्राज्य बीजापुर और गोलकुंडा की सल्तनत के हाथों में आ गया। विजयनगर साम्राज्य के सामंतों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था और इसका असर 18 वीं सदी तक दक्षिण भारत के इतिहास पर पड़ा। टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद 1799 में मैसूर राज्य ब्रिटिश राज के अधीन आ गया था लेकिन भारत की आजादी तक यह एक राजसी राज्य बना रहा था।

दिल्ली में लोधी वंश

लोधी वंश के पतन के कारण

लोधी साम्राज्य की स्थापना अफगानों की गजली जनजाति ने की थी। कहा जाता है कि बहलुल लोधी ने बुद्धिमानी से काम किया और उसने सैय्यदों की कमजोर स्थिति का लाभ उठाते हुए दिल्ली पहुंचने से पहले पंजाब पर कब्जा कर लिया था। उसने 19 अप्रैल 1451 को "बहलुल शाह गाजी" के खिताब के साथ दिल्ली के सिंहासन से भारत का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया. उसके गद्दी पर बैठने के बाद शर्की वंश का दमन हो गया।  

तथ्यों के अनुसार लोधी शासन के दौरान भारत में बड़े पैमाने पर अफगानों के आने की वजह से लोधी वंश ने अपनी खोई शक्तियां फिर से हासिल कर ली थी। बहलुल लोधी ने अपना साम्राज्य ग्वालियर, जौनपुर और उत्तरी उत्तर प्रदेश तक फैला लिया था और अपने सबसे बड़े बेटे बरबक शाह को जौनपुर का शासक नियुक्त कर दिया था। वह योग्य प्रशासक था, जिसने लगातार 26 वर्षों तक दिल्ली के आस– पास के प्रदेशों पर जीत हासिल की थी। 1488 ई. में जलाली में उसका निधन हो गया। दक्षिण दिल्ली के चिराग दिल्ली में आज भी उसकी कब्र मौजूद है।  

बहलुल लोधी के दूसरे बेटे सिकंदर लोधी का अपने बड़े भाई बरबक शाह के साथ सत्ता संघर्ष लगातार जारी था। सिकंदर लोधी 5 जुलाई 1489 को बहलुल लोधी का उत्तराधिकारी बन गया। सिकंदर लोधी को इतिहास में सच्चा कट्टरपंथी सुन्नी शासक कहा गया है जिसने मथुरा और नागा बंदरगाह पर भारतीय मंदिरों का विध्वंस करवाया था। उसने इस्लाम की सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए हिन्दुओं पर जजिया लगाया था। उसने 32 अंकों के गाज–ए– सिकंदरी की शुरुआत की जो किसानों को उनके द्वारा जोती गए जमीन को मापने में मदद करता था।

इतिहास में इसे निम्नलिखित कारणों की वजह से जाना जाता हैः 

  • 1504 ई में आगरा शहर की स्थापना और खूबसूरत कब्रों एवं इमारतों के निर्माण।
  • उसने आयात और निर्यात को सुगम बनाने एवं अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • किसानों को खाद्यान्न पर कर देने से छूट दी।
  • शिक्षा को बढ़ावा दिया।
  • सिकंदर एक कट्ट सुन्नी शासक था जिसमें धार्मिक सहिष्णुता का अभाव था।

सिकंदर लोधी ने ग्वालियर के किले पर फतह के लिए पांच बार कोशिश की लेकिन हर बार राजा मान सिंह से उसे मुंह की खानी पड़ी।  

1517 ई. में उसका निधन हो गया और उसके बाद उसका बेटा इब्राहिम खान लोधी, बड़े भाई जलाल–उद–दीन के साथ उत्तराधिकारी के लिए हुए युद्ध में जीत हासिल कर, दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। दोनों भाइयों के बीच हमेशा युद्ध की स्थिति बनी रहती थी।  

लोधी वंश का पतन

इब्राहिम लोधी की ताजपोशी ने एक दशक के भीतर ही लोधी साम्राज्य को बहुत नीचे ला दिया था. इसके मुख्य कारण थेः

  • जलाल–उद– दीन का समर्थन करने वाले अफगानी रईसों के बीच असंतोष. अपने भाई के प्रति नफरत की वजह से इब्राहिम लोधी ने इन पर बहुत अत्याचर किए।  
  • प्रशासनिक प्रणालियों की विफलता और व्यापार मार्गों का अवरुद्ध होना जिसकी वजह से साम्राज्य की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमारा गई थी।
  • लोधी सेना पर राजपूत राजाओं का खतरा और उनके द्वारा दी जाने वाली धमकियां।
  • बुरी आर्थिक स्थिति और उत्तराधिकार के लिए होने वाले लगातार युद्ध की वजह से राजकोष में तेजी से कमी. नतीजतन साम्राज्य कमजोर होता गया।
  • आंतरिक युद्ध जिसने साम्राज्य को कमजोर बना दिया और लोधी वंश जहीर उद दीन मोहम्मह बाबर के हाथों में चला गया जिसने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहीम लोधी को हराकर भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की।
  • लोधी साम्राज्य बड़ा हो रहा था लेकिन उसमें संचार साधनों की कमी थी जिसकी वजह से समय और प्रयासों की बर्बादी होने लगी थी। राजा की योग्यता पर से लोगों का विश्वास खोता जा रहा था।
  • इस अवधि के दौरान गुलामों की संख्या बढ़ रही थी और इन गुलामों के रखरखाव में राजकोष पर बोझ बढ़ता जा रहा था।
  • उत्तराधिकार की लड़ाई में कोई निश्चित कानून नहीं बनाया गया था। कोई भी युद्ध शुरु कर सकता था और किसी भी साम्राज्य पर अपना अधिकार स्थापित कर सकता था। 
  • अभिजात वर्गों का लालच और अक्षमता ने सैन्य संगठनों को कमजोर और निष्प्रभावी बना दिया था।
  • इस प्रकार की सैन्य सरकार से लोगों के लगातार कम होते भरोसे ने भी वंश के पतन में योगदान दिया।  
  • तैमूर द्वारा किए जाने वाले नियमित आक्रमणों ने भी सैन्य क्षमताओं को कमजोर कर दिया था।

इब्राहिम लोधी के सख्त नियमों ने उसके कई गुप्त शत्रु पैदा कर दिए थे। उनमें से एक प्रमुख शत्रु उसका चाचा और लाहौर का शासक था जिसने इब्राहीम द्वारा किए गए अपमान का बदला लेने के लिए इब्राहीम को धोखा दिया और बाबर को लोधी साम्राज्य पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। बाबर ने इब्राहीम को पानीपत की पहली लड़ाई में हरा दिया और इस तरह 1526 ई.  में लोधी वंश के 75 वर्षों के शासन का कड़वा अंत हो गया।

लोधी वंश– 1451-1526
बहलुल लोधी14511489
सिकंदर लोधी14891517
इब्राहिम लोधी15171526

 

12 वी शताब्दी में एक नई जाती राजपूत का उदय(राजा के पुत्र को राजपुत्र कहा जाता था बाद में यही राजपूत हुवा)

राजपूत वंश के दौरान सामाजिक और सांस्कृतिक विकास

राजपूत आक्रामक और बहादुर लड़ाके थे, जिसे वे अपने धर्म के रूप मे मानते थे। उन्होने गुणों और आदर्शो को महत्व दिया जो बहुत उच्च मूल सिद्धान्त थे। वे बड़े दिल वाले और उदार थे, वे अपने मूल और वंश पर गर्व अनुभव करते जो उनके लिए सर्वोच्च था। वे बहादुर, अहंकारी और बहुत ही ईमानदार कुल के थे जिन्होने शरणार्थियों और अपने दुश्मनों को पनाह भी दी थी।

लोगो के सामाजिक और सामान्य शर्ते:

  • युद्ध विजय अभियान और जीत राजपूत समाज और संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता थी।
  • समाज बुरी तरह परेशान था क्यूंकि लोगो के रहन सहन के स्तर मे काफी असमानता थी। वे जाति और धर्म प्रणालियों मे विश्वास रखते थे। 
  • मंत्री, अधिकारी, सामंत प्रमुख उच्च वर्ग के थे, इसलिए उन्होने धन जमा करने के  विशेषाधिकार का लाभ उठाया और वे विलासिता और वैभव मे जीने के आदी थे ।
  • वे कीमती कपड़ो, आभूषणों और सोने व चांदी के जेवरों मे लिप्त थे। वे कई मंजिलों वाले घर जैसे महलों मे रहा करते थे।
  • राजपूतों ने अपना गौरव अपने हरम और उनके अधीन कार्य करने वाले नौकरो की संख्या मे दिखाया।
  • दूसरी तरफ किसान भू-राजस्व और अन्य करों के बोझ तले दब रहे थे जो सामंती मालिको के द्वरा निर्दयतापूर्वक वसूले जाते थे या उनसे बेगार मजदूरी करवाते थे।

जाति प्रथा:

  • निचली जातियों को सीमान्ती मालिकों की दुश्मनी का सामना करना पड़ा जो उन्हे हेय दृष्टि से देखते थे।
  •  अधिकांश काम करने वाले जैसे बुनकर, मछुवारे, नाई इत्यादि साथ ही आदिवासियों के साथ उनके मालिक बहुत ही निर्दयी बर्ताव करते थे। 
  • नई जाति के रूप मे ‘राजपूत’ छवि निर्माण मे अत्यंत लिप्त थे और सबसे अहंकारी थे जिसने जाति प्रथा को और अधिक मजबूत बना दिया था।

महिलाओं की स्थिति:

यद्यपि महिलाओं का सम्मान अत्यधिक स्पष्ट था और जहा तक राजपूतो के गौरव की बात थी तो वो अभी भी एक अप्रामाणिक और विकलांग समाज मे रहते थे।  

  • निम्न वर्ग की राजपूत महिलाओं को वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं था। हालांकि, उच्च घरानो के परिवारों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की। महिलाओं के लिए कानून बहुत कटीले थे।
  • उन्हे अपने पुरुषो और समाज के अनुसार उच्च आदर्शो का पालन करना पड़ता था। उन्हे अपने मृतक पतियों के शव के साथ खुशी से अपने आप को बलिदान करना पड़ता था।
  • यद्यपि कोई पर्दा प्रथा नहीं थी। और ‘स्वयंवर’ जैसी शादियों का प्रचलन कई शाही परिवारों मे था, अभी भी समाज मे भ्रूण हत्या और बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं देखने को मिलती थी।

शिक्षा और विज्ञान:

राजपूत शासन काल मे केवल ब्राह्मणो और उच्च जाति के कुछ वर्गो को शिक्षित होने / शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त था।

  • उच्च शिक्षा के लिए प्रसिद्ध केंद्र बिहार के नालंदा मे था और कुछ अन्य महत्वपूर्ण केंद्र विक्रमशिला और उदन्दापुर मे थे। इस समय केवल कुछ ही शिक्षा के शैव केंद्र कश्मीर मे विकसित हुये। 
  • धर्म और दर्शन अध्ययन चर्चा के लिए लोकप्रिय विषय थे।
  • इस समय तक भी विज्ञान के ज्ञान का विकास धीमा / शिथिल था, समाज तेजी से कठोर बन गया था, सोच परंपरागत दर्शन तक ही सीमित थी, इस समय के दौरान भी विज्ञान को विकसित करने का उचित गुंजाइश या अवसर नही मिला।   

वास्तुकला:

  • राजपूत काफी महान निर्माणकर्ता थे जिनहोने अपना उदार धन और शौर्य दिखाने के लिए किलों, महलो और मंदिरो के निर्माण मे अत्यधिक धन खर्च किया। इस अवधि मे मंदिर निर्माण का कार्य अपने चरम पर पहुँच गया था।
  • कुछ महत्वपूर्ण मंदिरों मे पुरी का लिंगराज मंदिर, जगन्नाथ मंदिर और कोणार्क मे सूर्य मंदिर है। 
  • खजुराहो, पुरी और माउंट आबू राजपूतों द्वारा बनवाए गए सबसे प्रसिद्ध मंदिर माने जाते है।
  • राजपूत सिचाई के लिए नहरों, बाधों, और जलाशयो के निर्माण के लिए भी जाने जाते थे जो अभी भी अपने परिशुद्धता और उच्च गुणवत्ता के लिए माने जाते है।
  • कई शहरो जैसे जयपुर, जोधपुर, जैसलमर, बीकानेर, के नींव की स्थापना राजपूतों के द्वारा की गई थी, इन शह रों को सुंदर महलों और किलों के द्वारा सजाया गया था जो आज विरासत के शहर के नाम से जाना जाता है।
  •  अट्ठारहवीं शताब्दी मे सवाई जयसिंह के द्वारा बनवाए गए चित्तौड़ के किले मे विजय स्तम्भ, उदयपुर का लेक पैलेस, हवा महल और खगोलीय वेधशाला राजपूत वास्तुकला के कुछ आश्चर्यजनक उदाहरण है।

चित्रकारी/चित्रकला:

  • राजपूतो के कलाकृतियों को दो विद्यालयों के क्रम मे रखा जा सकता है- चित्रकला के राजस्थानी और पहाड़ी विद्यालय।
  • कलाकृतियों के विषय भक्ति धर्म से अत्यधिक प्रभावित थे और अधिकांश चित्र रामायण, महाभारत और राधा और कृष्ण के अलग-अलग स्वभावों को चित्रित करता था।
  • दोनों विद्यालयों की प्रणाली समान है और दोनों ने ही व्यक्तियों के मौलिक जीवन के दृश्यों की व्याख्या करने के लिए प्रतिभाशाली रंगो का उचित प्रयोग किया।

मणिपुर में CRPF को खुली छूट मिली news

मणिपुर में CRPF का सख्त संदेश 🚨 मणिपुर में तैनात CRPF जवानों को संबोधित करते हुए महानिदेशक जी. पी. सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा— "यदि...