मुगल बादशाह शाहजहां

शाहबुद्दीन मुहम्मद शाहजहाँ

शाहजहाँ भारत का पाचवां मुगल सम्राट था, और वह एक श्रेस्ठ मुगल सम्राट के रूप मे जाना गया है। वह अपने विशाल साम्राज्य को बढ़ाने के लिए अत्यंत उत्सुक रहता था । शाहजहाँ जब बीमार पड़ गया तब उसे अपने वारिस औरंगजेब के द्वारा 1658 मे आगरा के किले मे कैद कर दिया गया था। गैर मुस्लिमो के प्रति उसका दृस्टिकोड़ कम उदार था, वह उसके दादा एवं पिता क्रमश: जहाँगीर एवं अकबर की तुलना मे, गैर-मुस्लिमो के लिये एक रूढ़िवादी मुस्लिम था ।

प्रारम्भिक जीवन:

शाहजहाँ राजकुमार शिहाब – उद- दीन मुहम्मद खुर्रम के रूप मे जाना गया। फारसी भाषा मे उसके नाम का अर्थ “हर्षित” है एवं उसके दादा “अकबर महान” ने उसे “खुर्रम” नाम दिया।

उसके पिता ने उससे प्रभावित होकर उसे बहुत ही कम उम्र मे “शाहजहाँ बहादुर” की उपाधि दे दी थी। उसने डेक्कन मे लोदी, मेवाड़ एवं कांगड़ा के विरुद्ध असाधारण सैन्य क्षमताओ का प्रदर्शन किया। इसके अतिरिक्त शाह जहाँ को “चमत्कारी निर्माता” की उपाधि दी गयी, उसके पास पुराने किलों को फिर से रूपरेखा प्रदान करने एवं नई संरचनाओ की रूपरेखा तैयार करने की उल्लेखनीय क्षमता थी।

उपलबधियाँ:

वह शानदार स्मारक ताजमहल, मोती मस्जिद (लाहौर – जो अब पाकिस्तान मे है), दिल्ली का जामा मस्जिद, आगरा किले का खंड, और वजीर खान मस्जिद दिल्ली का लाल किला का प्रवर्तक था।

डेक्कन के राज्यों पर जीत पाने के क्रम मे शाहजहाँ के निर्देश असाधारण साबित हुये। 1936 ईस्वी तक अहमदनगर को गोलकोंडा एवं बीजापुर के साथ जोड़ दिया गया था एवं उनकी शाखाओ को समाप्त करने के लिए मजबूर किया गया। मुगल सत्ता इसके अलावा उत्तर-पश्चिम मे फैला था। कांधार के प्रमुख फारसी गवर्नर अली मर्दन खान ने उस जगह को 1638 ईस्वी मे मुगलो को समर्पित कर दिया।   

विवाह:

  • 1608 ईस्वी मे शाहजहां मात्र 15 साल की आयु का था जब उसकी सगाई 14 साल की अर्जुमंद बानो से हुयी। इसलिए राजकुमार को विवाह के लिए 5 साल का इन्तजार करना पड़ा।   

 मुमताज़ महल

  1. 1612 ईस्वी मे शाहजहां जब मात्र 20 साल का था उसकी शादी आर्जूमंद बानो से कर दी गयी, जिसे मुमताज़ महल की उपाधि दी गयी।
  2. शादी सुखमय / आनंददायक थी और शाहजहाँ आजीवन मुमताज़ महल के लिए समर्पित रहने लगा। मुमताज़ महल ने शाह जहां के 14 बच्चो को जन्म दिया जिनमे से मात्र सात वयस्कता तक जीवित रहे।
  3. मुमताज़ महल जब 40 साल की आयु की थी, अपने चौदहवे बच्चे जिसका नाम गौहरा बेगम था, को जन्म देते समय प्रसवोत्तर रक्तस्राव की वजह से उसकी मृत्यु हो गयी, और उसका जन्म स्थान बुरहानपुर था।
  4. उसके मृत शरीर को अस्थायी रूप से एक बगीचे मे दफन कर दिया गया था, जो शाहजहाँ के चाचा राजकुमार दनियाल के द्वारा ताप्ती नदी के किनारे बनाया गया था, जो एक जैनाबाद नाम से जाना जाने वाला बंद बगीचा था।
  5. मुमताज़ महल की मृत्यु ने शाह जहाँ के व्यक्तित्व पर एक महत्वपूर्ण प्रभाव डाला और ताजमहल के निर्माण के लिए एक प्रेरक कारक सिद्ध हुआ, जहाँ पर बाद मे मुमताज़ महल के मृतक शरीर को पुनः दफन किया गया था।  

मृत्यु:

जब शाहजहाँ 1658 ईस्वी मे बीमार रहने लगा उस समय शाह जहाँ और मुमताज़ महल का बड़ा पुत्र दारा शिकोह आगे आया और अपने पिता के नाम से प्रतिशासक की ज़िम्मेदारी को स्वीकार किया। उसके प्रतिशासन काल की संदेह की जानकारी मिलने के बाद दारा शिकोह के छोटे भाई शुजा जो बंगाल का वायसराय था एवं मुराद बक्स जो गुजरात का वायसराय था ने अपने स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी और एक विशिष्ट अंत लक्ष्य के साथ अपने पिता के धन पर दावा करने आगरा की ओर चल दिये।

तीसरा पुत्र औरंगजेब, अपने सभी भाईयों मे सबसे सक्षम, ने एक तैयार एवं कुशल सशस्त्र बल इकट्ठा किया और इसका मुख्य सेनापति बना। उसने आगरा के समीप दारा शिकोह के सशस्त्र बल का सामना किया और समुगढ़ की लड़ाई मे उन्हे पराजित कर दिया।

अपनी बीमारी से पूरी तरह से ठीक न होने के बावजूद, औरंगजेब ने शाह जहाँ को साम्राज्य प्रशासन के लिए अयोग्य घोषित कर दिया और औरंगजेब ने उसे आगरा किले के कक्ष मे नजरबंद कर दिया।  

जनवरी 1666 ईस्वी मे शाह जहाँ गंभीर रूप से बीमार हुआ और बिस्तर तक ही सीमित रह गया; एवं वह 22 जनवरी तक लगातार कमजोर होता गया। शाहजहाँ के पादरी काज़ी कुर्बान और आगरा के सैयद मुहम्मद कनौजी आगरा के किले आए, उसके बाद वो उसके शरीर को पास के गलियारे मे ले गए, उसे धोया एवं ढक दिया और चन्दन की लकड़ी से बने एक ताबूत मे रख दिया।

मृत शरीर को आगरा मे ताजमहल ले जाया गया और उसके सबसे प्रिय पत्नी मुमताज़ महल की कब्र के बगल मे नदी के किनारे दफना दिया गया ।

पूरा नाम

अल आजाद अबुल मुजफ्फर शहाब-उद्दीन मोहम्मद खुर्रम

जन्म

5 जनवरी 1592 ईस्वी, लाहौर, पाकिस्तान में

शासन

1628-1658 ईस्वी इस समय को मुगल वास्तुकला का 'स्वर्ण युग'  के रूप में माना जाता था

पिता

जहांगीर

माता

ताज बीबी बिलक़िस मकानी

राजवंश

मुगल साम्राज्य

धर्म

इस्लाम

मृत्यु

22 जनवरी 1666 ईस्वी, आगरा किले मे, आगरा, मुगल साम्राज्य, भारत

दफ़न

ताजमहल

 

दक्षिण भारत के यादव सम्राट, बिजयनगर साम्राज्य

विजयनगर साम्राज्य के सम्राट या शासक

साम्राज्य के इतिहास, विकास, वास्तु कृतियों और नवाचारों के बारे में अधिकांश जानकारी विदेशी यात्रियों के माध्यम से मिलती है। विजयनगर साम्राज्य की उत्पत्ति का वर्णन इतिहास के विभिन्न संस्करणों में किया गया है, कई इतिहासकारों का मत है कि विजयनगर साम्राज्य की स्थापना बुक्का राय प्रथम द्वारा की गयी थी जो कन्नड़ (होयसाल साम्राज्य के सेना कमांडर) थे जबकि अन्य का मानना है कि ये शासक तेलगू मूल के थे जिनका काकतीय साम्राज्य (अपने पतन के आसपास होयसाल साम्राज्य के उत्तरी भाग के नियंत्रक) के साथ संपर्क रहा था।

हालांकि इतिहासकारों का एकमत से मानना है कि दक्षिणी भारत में मुस्लिम प्रभाव से लड़ने के मकसद के साथ साम्राज्य के संस्थापको को एक श्रृंगेरी संत विद्यारण्य का समर्थन प्राप्त था क्योंकि ये मुस्लिम बार-बार दक्कन के हिंदू राज्यों पर हमला कर वहां के शासकों को पराजित कर रहे थे। मुस्लिम राज  में केवल एक ही साम्राज्य “होसयाल” शेष रह गया था। होयसाल साम्राज्य के राजा की मौत के बाद इसका विजयनगर साम्राज्य में विलय हो गया था जो 14 वीं शताब्दी से पहले एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में उभर कर सामने आया था।

हरिहर प्रथम को पूर्व पश्चिम समुद्रधीश्वर (पूर्वी और पश्चिमी समुद्र का प्रमुख) के रूप में जाना जाता था जिसने साम्राज्य की मजबूत नींव रखी थी और तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में चारों ओर प्रमुख क्षेत्रों पर अपना शासन मजबूत कर लिया था। बुक्का राय प्रथम ने आर्कोट, कोडावीडु के रेड्डी बंधु,  मदुरै के सुल्तान प्रमुखों को हराकर न केवल अपने साम्राज्य का पश्चिम में बल्कि तुंगभंद्रा- कृष्णा नदी के उत्तर तक विस्तार किया तथा उसका उत्तराधिकारी बना। अनेगोंडी (वर्तमान में कर्नाटक) में साम्राज्य की राजधानी स्थापित की गयी जिसे बाद में विजयनगर स्थानांतरित कर दिया गया, जहां से साम्राज्य को इसका नाम प्राप्त हुआ था।

अपनी राजसी क्षमता के साथ साम्राज्य प्रमुख रूप से दक्षिणी भारत तक फैल गया था जिसका उत्तराधिकारी हरिहर द्वितीय (बुक्का राय प्रथम का दूसरा पुत्र) था जिसने आगे चलकर अपनी साम्राज्यवादी शक्ति का पूरे दक्षिण क्षेत्र में विस्तार किया। इसके बाद साम्राज्य को देव राय प्रथम द्वारा संघटित किया गया जिसने ओड़िशा के गजपतियों को परास्त किया और साम्राज्य की सिंचाई और दुर्ग निर्माण के प्रमुख कार्यों को क्रियान्वायित किया। तत्पश्चात देव राय द्वितीय गद्दी पर आसीन हुआ जिसे संगम राजवंश का सबसे शक्तिशाली और सफल शासक के रूप में जाना जाता है। सामंती शासन की वजह आंतरिक अस्थिरता की लड़ाई रही थी। उसने श्रीलंका द्वीप पर भी आक्रमण किया और बर्मा साम्राज्य पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।

15 वीं शताब्दी के आसपास साम्राज्य में गिरावट तब तक दर्ज की गयी जब तक कंमाडर सलुवा नरसिंह देव राय और जनरल तुलुव नरस नायक नें क्रमश: 1485 और 1491 में साम्राज्य की ताकत मजबूत करने के ज्यादा प्रयास नहीं किये थे । अंत में साम्राज्य की बागडोर कृष्ण देव राय (तुलुव नरस नायक का पुत्र) के हाथों में आ गयी जिसने विद्रोही सरदारों से युद्ध किया और डेक्कन सल्तनत आक्रमणकारियों को हराकर साम्राज्य को मजबूती प्रदान की। कृष्णदेव राय के शासन में साम्राज्य अपने शिखर पर पहुंच गया था और उसने दक्षिण में अपने सभी अधीनस्थों पर सफल नियंत्रण बनाए रखा था। अपने शासन के दौरान उसने कई स्थापत्य स्मारकों के निर्माण निर्दिष्ट कर कई निर्माण कार्य पूरे भी किये थे।

अच्युत देव राय (कृष्णदेव राय का छोटे भाई) उसका उत्तराधिकारी बना और बाद में उसकी जगह 1529 में सदाशिव राय ने ली थी जबकि वास्तविक शक्ति आलिया राम राय (कृष्णदेव राय का दामाद) के हाथों में निहित थी जिसने अंततः धोखाधड़ी और फूट का फायदा उठाकर शक्ति अपने हाथों में ले ली थी और उत्तर में राजनैतिक प्रभुत्व बढ़ाने के लिए उसने बीजापुर, बरार, गोलकुंडा, अहमदनगर और बीदर की सल्तनत के बीच अशांति पैदा कर दी। कुछ सल्तनतों ने उत्तर में उसके खिलाफ एक गठबंधन का गठन कर दिया और जनवरी 1565 में विजयनगर की सेनाओं के खिलाफ भिड़ गये। विजयनगर विजयी होकर उभरा जबकि आलिया राम राय को कैद कर मौत के घाट उतार दिया गया। इससे विजयनगर साम्राज्य में साधारण सैनिकों के ऊपर अशांति और भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गयी और सल्तनतों  ने उन खंडहरों में अपनी सेना में कटौती कर दी जिसे वह कभी हासिल नहीं कर सके थे। विजयनगर में एकमात्र जीवित कंमाडर तिरुमाला देव राय (राम राय का छोटा भाई) ने एक विशाल खजाने की राशि के साथ साम्राज्य छोड़ दिया।

साम्राज्य में धीरे धीरे गिरावट आने लगी थी जबकि पुर्तगालीयों के साथ व्यापार जारी था और अंग्रजों को मद्रास की स्थापना के लिए एक जमीन आवंटित कर दी गयी थी। श्रीरंग प्रथम (तिरुमाला देव राय का पुत्र) और वेंकट द्वितीय विजयनगर साम्राज्य के अंतिम शासक थे। साम्राज्य शासन के उत्तराधिकारी राम देव राय और वेंकट तृतीय द्वारा एक दशक के लिए विस्तारित कर दिया गया था जिसके बाद साम्राज्य बीजापुर और गोलकुंडा की सल्तनत के हाथों में आ गया। विजयनगर साम्राज्य के सामंतों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था और इसका असर 18 वीं सदी तक दक्षिण भारत के इतिहास पर पड़ा। टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद 1799 में मैसूर राज्य ब्रिटिश राज के अधीन आ गया था लेकिन भारत की आजादी तक यह एक राजसी राज्य बना रहा था।

दिल्ली में लोधी वंश

लोधी वंश के पतन के कारण

लोधी साम्राज्य की स्थापना अफगानों की गजली जनजाति ने की थी। कहा जाता है कि बहलुल लोधी ने बुद्धिमानी से काम किया और उसने सैय्यदों की कमजोर स्थिति का लाभ उठाते हुए दिल्ली पहुंचने से पहले पंजाब पर कब्जा कर लिया था। उसने 19 अप्रैल 1451 को "बहलुल शाह गाजी" के खिताब के साथ दिल्ली के सिंहासन से भारत का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया. उसके गद्दी पर बैठने के बाद शर्की वंश का दमन हो गया।  

तथ्यों के अनुसार लोधी शासन के दौरान भारत में बड़े पैमाने पर अफगानों के आने की वजह से लोधी वंश ने अपनी खोई शक्तियां फिर से हासिल कर ली थी। बहलुल लोधी ने अपना साम्राज्य ग्वालियर, जौनपुर और उत्तरी उत्तर प्रदेश तक फैला लिया था और अपने सबसे बड़े बेटे बरबक शाह को जौनपुर का शासक नियुक्त कर दिया था। वह योग्य प्रशासक था, जिसने लगातार 26 वर्षों तक दिल्ली के आस– पास के प्रदेशों पर जीत हासिल की थी। 1488 ई. में जलाली में उसका निधन हो गया। दक्षिण दिल्ली के चिराग दिल्ली में आज भी उसकी कब्र मौजूद है।  

बहलुल लोधी के दूसरे बेटे सिकंदर लोधी का अपने बड़े भाई बरबक शाह के साथ सत्ता संघर्ष लगातार जारी था। सिकंदर लोधी 5 जुलाई 1489 को बहलुल लोधी का उत्तराधिकारी बन गया। सिकंदर लोधी को इतिहास में सच्चा कट्टरपंथी सुन्नी शासक कहा गया है जिसने मथुरा और नागा बंदरगाह पर भारतीय मंदिरों का विध्वंस करवाया था। उसने इस्लाम की सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए हिन्दुओं पर जजिया लगाया था। उसने 32 अंकों के गाज–ए– सिकंदरी की शुरुआत की जो किसानों को उनके द्वारा जोती गए जमीन को मापने में मदद करता था।

इतिहास में इसे निम्नलिखित कारणों की वजह से जाना जाता हैः 

  • 1504 ई में आगरा शहर की स्थापना और खूबसूरत कब्रों एवं इमारतों के निर्माण।
  • उसने आयात और निर्यात को सुगम बनाने एवं अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • किसानों को खाद्यान्न पर कर देने से छूट दी।
  • शिक्षा को बढ़ावा दिया।
  • सिकंदर एक कट्ट सुन्नी शासक था जिसमें धार्मिक सहिष्णुता का अभाव था।

सिकंदर लोधी ने ग्वालियर के किले पर फतह के लिए पांच बार कोशिश की लेकिन हर बार राजा मान सिंह से उसे मुंह की खानी पड़ी।  

1517 ई. में उसका निधन हो गया और उसके बाद उसका बेटा इब्राहिम खान लोधी, बड़े भाई जलाल–उद–दीन के साथ उत्तराधिकारी के लिए हुए युद्ध में जीत हासिल कर, दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। दोनों भाइयों के बीच हमेशा युद्ध की स्थिति बनी रहती थी।  

लोधी वंश का पतन

इब्राहिम लोधी की ताजपोशी ने एक दशक के भीतर ही लोधी साम्राज्य को बहुत नीचे ला दिया था. इसके मुख्य कारण थेः

  • जलाल–उद– दीन का समर्थन करने वाले अफगानी रईसों के बीच असंतोष. अपने भाई के प्रति नफरत की वजह से इब्राहिम लोधी ने इन पर बहुत अत्याचर किए।  
  • प्रशासनिक प्रणालियों की विफलता और व्यापार मार्गों का अवरुद्ध होना जिसकी वजह से साम्राज्य की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमारा गई थी।
  • लोधी सेना पर राजपूत राजाओं का खतरा और उनके द्वारा दी जाने वाली धमकियां।
  • बुरी आर्थिक स्थिति और उत्तराधिकार के लिए होने वाले लगातार युद्ध की वजह से राजकोष में तेजी से कमी. नतीजतन साम्राज्य कमजोर होता गया।
  • आंतरिक युद्ध जिसने साम्राज्य को कमजोर बना दिया और लोधी वंश जहीर उद दीन मोहम्मह बाबर के हाथों में चला गया जिसने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहीम लोधी को हराकर भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की।
  • लोधी साम्राज्य बड़ा हो रहा था लेकिन उसमें संचार साधनों की कमी थी जिसकी वजह से समय और प्रयासों की बर्बादी होने लगी थी। राजा की योग्यता पर से लोगों का विश्वास खोता जा रहा था।
  • इस अवधि के दौरान गुलामों की संख्या बढ़ रही थी और इन गुलामों के रखरखाव में राजकोष पर बोझ बढ़ता जा रहा था।
  • उत्तराधिकार की लड़ाई में कोई निश्चित कानून नहीं बनाया गया था। कोई भी युद्ध शुरु कर सकता था और किसी भी साम्राज्य पर अपना अधिकार स्थापित कर सकता था। 
  • अभिजात वर्गों का लालच और अक्षमता ने सैन्य संगठनों को कमजोर और निष्प्रभावी बना दिया था।
  • इस प्रकार की सैन्य सरकार से लोगों के लगातार कम होते भरोसे ने भी वंश के पतन में योगदान दिया।  
  • तैमूर द्वारा किए जाने वाले नियमित आक्रमणों ने भी सैन्य क्षमताओं को कमजोर कर दिया था।

इब्राहिम लोधी के सख्त नियमों ने उसके कई गुप्त शत्रु पैदा कर दिए थे। उनमें से एक प्रमुख शत्रु उसका चाचा और लाहौर का शासक था जिसने इब्राहीम द्वारा किए गए अपमान का बदला लेने के लिए इब्राहीम को धोखा दिया और बाबर को लोधी साम्राज्य पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। बाबर ने इब्राहीम को पानीपत की पहली लड़ाई में हरा दिया और इस तरह 1526 ई.  में लोधी वंश के 75 वर्षों के शासन का कड़वा अंत हो गया।

लोधी वंश– 1451-1526
बहलुल लोधी14511489
सिकंदर लोधी14891517
इब्राहिम लोधी15171526

 

12 वी शताब्दी में एक नई जाती राजपूत का उदय(राजा के पुत्र को राजपुत्र कहा जाता था बाद में यही राजपूत हुवा)

राजपूत वंश के दौरान सामाजिक और सांस्कृतिक विकास

राजपूत आक्रामक और बहादुर लड़ाके थे, जिसे वे अपने धर्म के रूप मे मानते थे। उन्होने गुणों और आदर्शो को महत्व दिया जो बहुत उच्च मूल सिद्धान्त थे। वे बड़े दिल वाले और उदार थे, वे अपने मूल और वंश पर गर्व अनुभव करते जो उनके लिए सर्वोच्च था। वे बहादुर, अहंकारी और बहुत ही ईमानदार कुल के थे जिन्होने शरणार्थियों और अपने दुश्मनों को पनाह भी दी थी।

लोगो के सामाजिक और सामान्य शर्ते:

  • युद्ध विजय अभियान और जीत राजपूत समाज और संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता थी।
  • समाज बुरी तरह परेशान था क्यूंकि लोगो के रहन सहन के स्तर मे काफी असमानता थी। वे जाति और धर्म प्रणालियों मे विश्वास रखते थे। 
  • मंत्री, अधिकारी, सामंत प्रमुख उच्च वर्ग के थे, इसलिए उन्होने धन जमा करने के  विशेषाधिकार का लाभ उठाया और वे विलासिता और वैभव मे जीने के आदी थे ।
  • वे कीमती कपड़ो, आभूषणों और सोने व चांदी के जेवरों मे लिप्त थे। वे कई मंजिलों वाले घर जैसे महलों मे रहा करते थे।
  • राजपूतों ने अपना गौरव अपने हरम और उनके अधीन कार्य करने वाले नौकरो की संख्या मे दिखाया।
  • दूसरी तरफ किसान भू-राजस्व और अन्य करों के बोझ तले दब रहे थे जो सामंती मालिको के द्वरा निर्दयतापूर्वक वसूले जाते थे या उनसे बेगार मजदूरी करवाते थे।

जाति प्रथा:

  • निचली जातियों को सीमान्ती मालिकों की दुश्मनी का सामना करना पड़ा जो उन्हे हेय दृष्टि से देखते थे।
  •  अधिकांश काम करने वाले जैसे बुनकर, मछुवारे, नाई इत्यादि साथ ही आदिवासियों के साथ उनके मालिक बहुत ही निर्दयी बर्ताव करते थे। 
  • नई जाति के रूप मे ‘राजपूत’ छवि निर्माण मे अत्यंत लिप्त थे और सबसे अहंकारी थे जिसने जाति प्रथा को और अधिक मजबूत बना दिया था।

महिलाओं की स्थिति:

यद्यपि महिलाओं का सम्मान अत्यधिक स्पष्ट था और जहा तक राजपूतो के गौरव की बात थी तो वो अभी भी एक अप्रामाणिक और विकलांग समाज मे रहते थे।  

  • निम्न वर्ग की राजपूत महिलाओं को वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं था। हालांकि, उच्च घरानो के परिवारों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की। महिलाओं के लिए कानून बहुत कटीले थे।
  • उन्हे अपने पुरुषो और समाज के अनुसार उच्च आदर्शो का पालन करना पड़ता था। उन्हे अपने मृतक पतियों के शव के साथ खुशी से अपने आप को बलिदान करना पड़ता था।
  • यद्यपि कोई पर्दा प्रथा नहीं थी। और ‘स्वयंवर’ जैसी शादियों का प्रचलन कई शाही परिवारों मे था, अभी भी समाज मे भ्रूण हत्या और बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं देखने को मिलती थी।

शिक्षा और विज्ञान:

राजपूत शासन काल मे केवल ब्राह्मणो और उच्च जाति के कुछ वर्गो को शिक्षित होने / शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त था।

  • उच्च शिक्षा के लिए प्रसिद्ध केंद्र बिहार के नालंदा मे था और कुछ अन्य महत्वपूर्ण केंद्र विक्रमशिला और उदन्दापुर मे थे। इस समय केवल कुछ ही शिक्षा के शैव केंद्र कश्मीर मे विकसित हुये। 
  • धर्म और दर्शन अध्ययन चर्चा के लिए लोकप्रिय विषय थे।
  • इस समय तक भी विज्ञान के ज्ञान का विकास धीमा / शिथिल था, समाज तेजी से कठोर बन गया था, सोच परंपरागत दर्शन तक ही सीमित थी, इस समय के दौरान भी विज्ञान को विकसित करने का उचित गुंजाइश या अवसर नही मिला।   

वास्तुकला:

  • राजपूत काफी महान निर्माणकर्ता थे जिनहोने अपना उदार धन और शौर्य दिखाने के लिए किलों, महलो और मंदिरो के निर्माण मे अत्यधिक धन खर्च किया। इस अवधि मे मंदिर निर्माण का कार्य अपने चरम पर पहुँच गया था।
  • कुछ महत्वपूर्ण मंदिरों मे पुरी का लिंगराज मंदिर, जगन्नाथ मंदिर और कोणार्क मे सूर्य मंदिर है। 
  • खजुराहो, पुरी और माउंट आबू राजपूतों द्वारा बनवाए गए सबसे प्रसिद्ध मंदिर माने जाते है।
  • राजपूत सिचाई के लिए नहरों, बाधों, और जलाशयो के निर्माण के लिए भी जाने जाते थे जो अभी भी अपने परिशुद्धता और उच्च गुणवत्ता के लिए माने जाते है।
  • कई शहरो जैसे जयपुर, जोधपुर, जैसलमर, बीकानेर, के नींव की स्थापना राजपूतों के द्वारा की गई थी, इन शह रों को सुंदर महलों और किलों के द्वारा सजाया गया था जो आज विरासत के शहर के नाम से जाना जाता है।
  •  अट्ठारहवीं शताब्दी मे सवाई जयसिंह के द्वारा बनवाए गए चित्तौड़ के किले मे विजय स्तम्भ, उदयपुर का लेक पैलेस, हवा महल और खगोलीय वेधशाला राजपूत वास्तुकला के कुछ आश्चर्यजनक उदाहरण है।

चित्रकारी/चित्रकला:

  • राजपूतो के कलाकृतियों को दो विद्यालयों के क्रम मे रखा जा सकता है- चित्रकला के राजस्थानी और पहाड़ी विद्यालय।
  • कलाकृतियों के विषय भक्ति धर्म से अत्यधिक प्रभावित थे और अधिकांश चित्र रामायण, महाभारत और राधा और कृष्ण के अलग-अलग स्वभावों को चित्रित करता था।
  • दोनों विद्यालयों की प्रणाली समान है और दोनों ने ही व्यक्तियों के मौलिक जीवन के दृश्यों की व्याख्या करने के लिए प्रतिभाशाली रंगो का उचित प्रयोग किया।

1236-1240 रजिया सुल्तान

रजिया सुल्तान (1236 ईश्वी-1240 ईश्वी)

रज़िया सुल्तान का जन्म 1205 मे हुआ था और उसने देश पर सन 1236 से 1240 तक शासन किया। रज़िया सुल्तान दिल्ली के सिंहासन मे हस्तक्षेप करने वाली पहली मुस्लिम महिला थी। उसने दिल्ली का शासन अपने पिता से उत्तराधिकार मे प्राप्त किया था और 1236 मे दिल्ली की सल्तनत बनी।

रज़िया सुल्तान बहुत ही बुद्धिमान, एक श्रेष्ठ प्रशासक, और अपने पिता की तरह एक बहादुर योद्धा थी।  इस तथ्य के बावजूद कि उसका प्रशासन मात्र तीन वर्षो के लिए था, इतिहास के पन्नो मे उसके कार्य सुरक्षित हो चुके है। दिल्ली मे रज़िया सुल्तान का मकबरा उन सभी स्थलो मे से एक है जो इस बहादुर महिला की स्मृतियो का स्मरण कराते है।

वह पुरुषों की तरह सुसज्जित हो कर खुले दरबार मे बैठती थी। वह एक प्रभावशाली शासक थी और उसमे एक शासक के सभी गुण थे। बचपन और किशोरावस्था मे गृहिणी समूह की महिलाओं से रज़िया का सम्पर्क बहुत कम था इसलिए वह मुस्लिम समुदाय की स्त्रियों के मूल व्यवहार को नहीं सीख पायी। वास्तव मे, सुल्तान बनने से पूर्व वह अपने पिता के प्रशासन के नियमों की तरफ आकर्षित थी। एक सुल्तान की भांति रज़िया ने अंगरखा और राजमुकुट पहना और जब वह एक हाथी पर सवार हो कर युद्ध मे भाग लेती थी तो रीति-रिवाजो के विपरीत वह अपने चेहरे को खुला रखती थी।

रज़िया का असाधारण पिता:

इल्तुत्मिश का जन्म 1210 मे हुआ और उसकी मृत्यु 1236 मे हुयी, वह एक सुलझा हुआ व्यक्ति था, अपनी पहली छोटी पुत्री जिसका जन्म कई बच्चो के बाद हुआ था के जन्मे के स्वागत के लिए भव्य उत्सव के आयोजन के लिए उसने अपने अनुयायियों को तैयार किया। उसको शिक्षित करने में उसने व्यक्तिगत रुचि ली, और जब वह मात्र 13 साल की थी सिर्फ अपने पिता के द्वारा दी गयी शिक्षा की वजह से रजिया एक कुशल धनुर्धर और घुड़सवार के रूप मे जानी गयी और वह अक्सर ही अपने पिता के साथ उसके सैन्य उपक्रमों मे जया करती थी।

जब एक बार इल्तुत्मिश ग्वालियर के हमले मे शामिल थाउसने दिल्ली को रज़िया को सौप दिया था, और वापस आने पर वह रज़िया के प्रदर्शन से बहुत आश्चर्यचकित था इसलिए उसने रज़िया को अपने उत्तराधिकारी के रूप मे चुना।

अपनी पुत्री के लिए इल्तुत्मिश की अभिव्यक्तियाँ, “मेरी यह छोटी पुत्री कई पुत्रो से श्रेष्ठ है।”

पिता की मृत्यु के पश्चात:

इल्तुत्मिश के बच्चो मे से एक, रूकनुददी्न फिरोज राजकाज मे सम्मिलित था। वह लगभग सात महीनों से दिल्ली की देखभाल कर रहा था। 1236 मे रज़िया सुल्तान ने दिल्ली के निवासियों की मदद से अपने भाई को पूर्णतया पराजित कर दिया और शासक बन गयी। 

उस समय जब रज़िया सुल्तान ने सिंहासन संभाला, सारी परिस्थितियाँ पहले की तरह हो गयी। राज्य के वज़ीर निज़ाम-अल-मुल्क जुनेदी ने वफ़ादारी करने से इंकार कर दिया, और उसने कई अन्य लोगो के साथ मिल कर सुल्तान रज़िया के खिलाफ कुछ समय के लिए युद्ध की घोषणा कर दी ।

बाद मे, तबशी मुईज्जी (जो अवध का विधि प्रमुख था) ने सुल्तान रज़िया की सहायता के लिए दिल्ली की ओर कूच किया जब तक वह गंगेस को पार करता उसका सामना उन नायको से हुआ जो शहर के विरुद्ध युद्ध कर रहे थे एवं उसे बंदी बना लिया गयाउसके बाद उसका अस्तित्व समाप्त हो गया। 

रज़िया सुल्तान के कार्य:

  • एक समझदार शासक होते हुये रज़िया सुल्तान ने अपने अधिकार क्षेत्र (प्रांत) मे विधि और पूर्ण शांति स्थापित की, जिसमे प्रत्येक व्यक्ति उसके द्वारा स्थापित किये गए नियमों और विनियमों का पालन करता था।
  • उसने राष्ट्र के आधार का विस्तार करने का प्रयास किया जिसके लिए उसने लेन-देन(विनिमय) को बढ़ावा दिया, गलियों का निर्माण एवं कुओं की खुदाई इत्यादि का कार्य करवाई।
  • इसके अतिरिक्त उसने खोज कार्यो के लिए विद्यालयों, संस्थाओं व स्थलों का निर्माण कराया और पुस्तकालय खुलवाए जिससे शोधकर्ताओं को कुरान और मुहम्मद की नीतियों पर कार्य को बढ़ावा दिया।
  • हिंदुओं ने विज्ञान, विचार, अन्तरिक्ष विज्ञान, और रचना मे वांछित योगदान दिया जिसे  विद्यालयों और कालेजों मे ध्यान केन्द्रित किया गया था।
  • यहाँ तक कि उसने शिल्पकारिता और संस्कृति के क्षेत्र मे भी योगदान दिया और विद्वानोंचित्रकारों और शिल्पकारों का समर्थन किया। 

रज़िया का पतन:

रज़िया को जमाल-उद-दीन याकूत के प्रति एकतरफा प्यार ने बहुत नुकसान पहुचाया।

उसके अन्त का कारण असंतोषजनक प्रेम था । जमाल-उद-दीन याकूत जो एक अफ्रीकन सिद्दी गुलाम था एक विशेष व्यक्ति बन गया (जो उसके लिए एक पड़ोसी देश का निवासी था) और यह अनुमान लगाया जाता था कि वह उसका जीवनसाथी रहा होगा । 

भटिंडा का प्रशासनिक प्रमुख मालिक इख्तियार-उद-अल्तुनिया, रज़िया के इस रिश्ते के खिलाफ था। कहानी यह थी कि अल्तुनिया और रज़िया युवा साथी थे। वे जैसे जैसे साथ साथ बड़े हुये, वह रज़िया पर बुरी तरह से मंत्रमुग्ध होने लगा था और उसका बागवत करना मूल रूप से रज़िया को वापस पाने की एक तकनीकी थी । तबाही तेजी से फैल गयी । याकूत का कत्ल कर दिया गया और अल्तुनिया ने रज़िया को रख लिया। जब वह भटिंडा के तुर्किश राज्यपाल के प्रतिरोध को नियंत्रित करने कि कोशिश कर रही थी, उसके दुर्भाग्यपूर्ण अभाव का लाभ उठाया उसे दिल्ली के शासन से अपदस्थ कर दिया। उसका भाई बहराम मनोनीत किया गया। 

अपने कीर्ति की रक्षा के लिए रज़िया ने समझदारीपूर्वक भटिंडा के प्रशासनिक प्रमुख अल्तुनिया से विवाह करने का निश्चय किया, और अपने साथी के साथ दिल्ली की तरफ चल दी।

13 अक्तूबर 1240 को वह बहराम से पराजित हुयी और अगले ही दिन अभागे जोड़े का कत्ल कर दिया गया।

 

 

1351 मुहम्मद बिन तुगलक

मोहम्मद बिन तुगलक (1351 ईश्वी-1388 ईश्वी)

खिलजी प्रशासन के अंतिम शासक खुसरो खान की गजनी मलिक द्वारा हत्या कर दी गयी थी, जो सिंहासन पर आसीन था और गयासुद्दीन तुगलक की उपाधि हासिल कर रखी थी। एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गयी और उसका पुत्र जौना (उलूग खान) 1325 में मोहम्मद-बिन-तुगलक की उपाधि के साथ उसका उत्तराधिकारी बना था। उसने 1325 से 1351 तक दिल्ली पर शासन किया था। मोहम्मद-बिन-तुगलक का जन्म मुल्तान के कोटला में हुआ था और दिपालपुर के राजा की पुत्री से उसका विवाह हुआ था।

वह तर्क, दर्शनशास्त्र, खगोल विज्ञान, गणित, सुलेख और भौतिक विज्ञान का विद्वान था। वह तुर्की, संस्कृत, फारसी और अरबी जैसी विभिन्न भाषाओं का अच्छा जानकार था। प्रसिद्ध यात्री इब्न बतूता ने उसके शासनकाल के दौरान भारत का दौरा किया था। वह एक ऐसा उदार सम्राट था जो समानता में विश्वास करता था। उसने जैन समुदाय के लोगों के साथ-साथ हिंदूओं को भी आजादी दे रखी थी।

मोहम्मद बिन तुगलक की एक शासक के रूप में सर्वोच्च पहचान यह थी कि उसने विभिन्न उल्लेखनीय प्रयास किए थे और कृषि के क्षेत्र में एक अलग आकर्षण पैदा किया था। वह धर्म में गहरा विश्वास रखता था और तार्किक एवं ग्रहणशील दृष्टिकोण रखता था। तर्कशक्ति, अंतरिक्ष विज्ञान, मूल कारणों और गणित के प्रति उसकी विशेष रूचि थी। वह मुस्लिम अध्यात्मवादियों के साथ-साथ हिंदू योगियों और जैन धर्म के पवित्र लोगों से बातचीत करता था, उदाहरण के लिए जौनप्रभा सूरी।

मुहम्मद बिन तुगलक के सुधार

उसने कई आधिकारिक परिवर्तन पेश करने का प्रयास किया था। लेकिन इनमें से अधिकतर में वह अपनी खिन्नता और न्याय के अभाव के कारण विफल रहा था।

उसकी पांच विनाशकारी परियोजनाएं

  1. दोआब में कराधान: सुल्तान ने गंगा और जमुना के बीच दोआब में एक मूर्खतापूर्ण बजट संबंधी परीक्षण किया था। उसने शुल्क दर में बढोत्तरी के साथ-साथ कुछ अतिरिक्त अबवाबों को पुन: प्रचलन में ला दिया था। बावजूद इसके, राज्य की हिस्सेदारी अलाउद्दीन के समय से भी आधी रहने लगी थी।
  2. राजधानी स्थानांतरण (1327): ऐसा प्रतीत होता है कि सुल्तान देवगिर को अपनी दूसरी राजधानी बनाना चाहता था जिससे वह बेहतर तरीके से दक्षिण भारत पर नियंत्रित स्थापित कर सके। देवगिर का नाम बदलकर दौलताबाद रख दिया गया था। दो या तीन साल के बाद ही मुहम्मद तुगलक दौलताबाद को छोड़ना चाहता था क्योंकि उसे आभास हो गया था कि जिस आधार पर उसने दौलताबाद को चुना था उससे वह दिल्ली से दक्षिण भारत पर नियंत्रण नहीं रख सकता है और न ही वह दौलताबाद से उत्तर पर नियंत्रण रख सकता है।
  3. टोकन मुद्रा का आरम्भ (1330): मुहम्मद ने तुगलक तांबे के सिक्के चलन में लाने का फैसला किया जिनकी कीमत चांदी के सिक्कों के बराबर ही थी। हो सकता है कि मोहम्मद तुगलक का नये सिक्कों की ढलाई से आम लोगों को दूर रखने का यह एक प्रभावी दृष्टिकोण रहा हो लेकिन वह ऐसा करने में नाकामयाब रहा था और जल्द ही अविश्वसनीय रूप से नये सिक्कों का कारोबारी भाव गिरने लगा।
  4. खुर्सी अभियान: सुल्तान का  चारों ओर व्यापक जीत का एक सपना था। उसने खुर्सी और इराक को विजय के चुना और इस कारण एक विशाल सेना को सक्रिय कर दिया था। उसको इस अभियान से निराशा हाथ लगी थी।
  5. कराची अभियान: यह अभियान चीनी हमलों का मुकाबला करने के लिए चलाया गया था। इससे उसके मन में एक विचार ने जन्म लिया जिसका उद्देश्य कुमाऊं-गढ़वाल जिलों में कुछ दुराग्रही जनजातियों को समन्वित कर उन्हें दिल्ली सल्तनत के अधीन लाना था।

इन परियोजनाओं ने मदुरै और वारंगल की स्वतंत्रता और विजयनगर और बहमनी की नींव रखने के लिए देश के कई हिस्सों में विद्रोहों को जन्म दिया था।

अंत में एक तुर्की गुलाम के खिलाफ सिंध में से जूझते समय थट्टा में उसकी मृत्यु हो गयी थी।

तुगलक वंश 
गयासुद्दीन तुगलक1320-24 ईस्वी
मोहम्मद तुगलक1324-51 ईस्वी
फिरोज शाह तुगलक1351-88 ईस्वी
मोहम्मद खान1388 ईस्वी
गयासुद्दीन तुगलक शाह II1388 ईस्वी
अबू बकर1389-90 ईस्वी
नसीरुद्दीन मोहम्मद1390-94 ईस्वी
हूंमायू1394-95 ईस्वी
नसीरुद्दीन महमूद1395-1412 ईस्वी

 

1498-1550 मीराबाई

मीरा बाई (1498 ईश्वी-1550 ईश्वी)

16वीं शताब्दी ने मीरा बाई के रूप में भगवान कृष्ण की एक आसाधारण भक्त और एक रहस्यवादी  कवियत्री देखी | प्रामाणिक दस्तावेज़ों की कमी के कारण, उसकी जीवनी के बारे में दूसरे साहित्यों से पता लगाया गया है जिसमे उसके जीवन के बारे में बताया गया है |

सन 1498 में  शाही परिवार में राजस्थान के मेड़ता के चौकरी गाँव में जन्म हुआ | मीरा ने संगीत, राजनीति, धर्म और शासन में शिक्षा प्राप्त की थी | विष्णु भक्त के अनुयायियों के परिवार में पली बड़ी मीरा का विवाह  मेवाड़ के राजकुमार भोज राज  से 1516  AD में विवाह किया | युद्ध में लगी चोटों के कारण अपने पति को खोने के बाद, मीरा का भगवान कृष्ण ( जिनको उन्होनें बचपन से ही अपने प्रेमी/पति के रूप मे मान लिया था ) की सामाजिक सम्मेलनों में निर्भयता और अनुकरणीय धार्मिक भक्ति करने के कारण  उपेक्षा की गई और उसके ससुराल वालों द्वारा कई बार  उनका उत्पीड़न करने का प्रयास किया गया , लेकिन हर बार वह  किसी तरह से चमत्कारिक ढंग से बच गई |  कई किंवदंतियों तथा लोककथाओं के विवरण में इस तरह की घटनाओं का उल्लेख किया गया है | हालांकि इतिहास के पुनर्लेखन के अटकलों के बावजूद कहानियों मे कुछ विसंगताएं इतिहासकारों के लिए  राजनीतिक लाभ का कारण बनी |

उत्तर हिन्दू परंपरा की एक प्रसिद्ध कवियत्री, मीराबाई, भक्ति आंदोलन की संस्कृति का एक सम्मानित नाम था | भगवान कृष्ण की स्तुति में पूरी भावना के साथ गायी गई कई कविताओं का श्रेय मीरा बाई को जाता है जिसमें उनके अमर स्नेह और पवित्र प्रतिबिंब को दर्शाया है, उनके भजनों की भारत भर में प्रशंसा की गई है जिसकी प्रामाणिकता की जांच कई विद्वानों द्वारा की गई है |  

कृष्ण की भक्ति में अपना पूरा  जीवन  समर्पित करने वाली मीरा ने कृष्ण को योगी व प्रेमी की तरह दर्शाया है और उनकी कविताओं मे मीरा का कृष्ण की योगिनी बनने और उनसे  आध्यात्मिक शादी के बंधन में बंध कर उसकी उत्कंठा और प्रत्याशा के बारे में बताया गया  है |

मीरा की कविताएं जिसमे छंद है उन्हे “पद” कहा गया है | लोककथाएँ में वर्णित है कि किस तरह मीरा परम आनंद में  नाचती हुई कृष्ण की भक्ति में खुद को डुबाते हुए दूसरे ही मोहावस्था में प्रवेश करती हैं और वह सभी वर्ग के  भक्तों को आकर्षित करती थी | इनकी कविताओं के संस्करन वर्तमान समय में पुस्तकों, नाटकों, चित्रों आदि में पाये जाते हैं | चित्तोडगढ़ किले की  तरह कुछ हिन्दू मंदिर भी इनको समर्पित किए गए हैं | 

हालांकि उनके काम की विश्वसनीयता  और उससे संबन्धित कहानियाँ के बारे में पर्याप्त सबूतों के लिए छानबीन  की गई है, किंवदंतियों के अनुसार, मीरा बाई ने मेवाड़ के राज्य को छोड़ दिया था और फिर कभी शाही जीवन की विलासिता की ओर आकर्षित नहीं हुईं | वह तीर्थ पर चली गईं और वृंदावन, द्वारका में रहते हुए उन्होनें अपना पूरा ध्यान कृष्ण की भक्ति की तरफ लगा दिया, जहां उनकी भक्ति का कोई विरोधी नहीं था और ना ही उन्हे किसी भी तरह की असहमति का सामना करना पड़ता था  |

यह माना जाता है कि मीरा उत्तर भक्ति संतों के विश्वास का प्रतिनिधित्व करती है जो निराकार ब्रह्मा  की  वकालत करते हैं | उनके भक्ति गीतों ने भक्ति आंदोलन के साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है | कृष्ण भक्ति में उसकी व्यक्तिगत ओर पवित्र रूप के बारे में बात करें तो  मीरा की कवितायें हिंदु देवता कृष्ण में पूर्ण समर्पण और विश्वास को दर्शाती है |

 विद्वानों का तर्क है कि 16वीं सदी के सामाजिक चरण में हिन्दू मुसलमान के संघर्ष के मध्य में मीरा लोगों के कष्ट के विकल्प के प्रतिबिंब के रूप में उभरी | और उसकी ईमानदारी और द्र्ढ़ विश्वास के प्रभाव ने  उस समय के उद्दंड सामंतों के साथ रिश्तों को भी बदल दिया |

लोगों के अनुसार, 1547 मे वह चमत्कारिक ढंग से मीरा  कृष्ण की मूर्ति में  समा  गईं, हालांकि इस बात के कोई भी सबूत नहीं हैं, मीरा ने उस समय के धार्मिक जोश को बढा दिया और उनके समर्पण ने साहित्य में बहुत बड़ा योगदान दिया है जिसमे उनका अनंत प्रेम और विश्वास दिखता है |  

सभी विपक्षियों और उनके उत्पीड़नों के प्रयासों के बावजूद,उसकी श्रद्धा और निष्ठुर भक्ति के लिए स्वतन्त्रता का  संदेश  उसके द्र्ढ  संकल्प के प्रभाव को दिखती है | उसकी कवितायें अपने अधिकारों के लिए खड़े होना और अभियुक्तों को दोषी करार कर पकड़ने तथा मानव और परमात्मा के बीच मौजूद प्यार के प्रतिबिंब को दर्शाती है |

अकबर


जलाल-उद-दीन मोहम्मद अकबर  एक नाम, जो अपने आप में विरासत है, का जन्म राजा हुमायूँ और बेगम हमीदा बानो के हुआ, जब वे वर्ष 1542 में निर्वासन में रह रहे थे |अकबर की रुचि सभी युद्ध तकनीकों को सीखने में थी और वह पूरी तरह से पढ़ने  और लिखने में उदासीन था | वास्तव में वह बिलकुल भी पढ़ा लिखा नहीं था फिर भी वह सभी चीजों के बारे में जानने का इच्छुक था | बैरम खान के मार्गदर्शन में जलाल को  13 वर्ष की बहुत ही छोटी  आयु में शहँशाह अकबर के शीर्षक से नवाज़ा गया | बैरम खान सबसे वफ़ादार और योग्य सेना प्रमुख था जोकि शुरुआत में हुमायूँ के सेना में सेनापति था और उनकी मृत्यु के बाद, बैरम खान ने हेमू की बढ़ती हुई तानाशाही को समाप्त करने में अकबर की मदद की | बैरम की कमान में अकबर की सेना ने हेमू को 1556 AD में पानीपत के द्वितीय  युद्ध में पराजित  किया था |   

प्रशासन

अकबर को बहुत सक्षम सत्तारूढ़ तकनीक के लिए जाना जाता था | वह जिससे भी वह मिलता था उससे ज्ञान एकत्र करना चाहता था | उनका अपनी प्रजा से विनम्रता से बात करने का तरीका उनकी सबसे प्रमुख विशेषता थी |

अकबर अपनी उदारता के लिए प्रसिद्ध था  परंतु वह रणनीतिक तरीके से निरपेक्ष भी था | इतनी विशाल भूमि और विभिन्न धर्मों के देश पर शासन   उसने अपनी योग्यता के दम किया  |   

अकबर के शासन में धर्म

  • अकबर कट्टर मुसलमान नहीं था बल्कि उसे सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता के लिए जाना जाता था | इसी कारण वह लोगों के बीच प्रसिद्ध था |
  • अकबर ने कई धर्मों में विवाह किए जिसके द्वारा वह एकता और एकजुटता का संदेश देता था |
  •  “सभी की एकता” में अपने विश्वास को मजबूत करने के लिए अकबर ने दीन-ए-इलाही के सिद्धांत का प्रतिपादन किया जिसके द्वारा उसने “सभी धर्म समान हैं” के सिद्धांत को फैलाया |

कला व संस्कृति

एक समर्पित  शासक होने के साथ अकबर कला और संस्कृति का  महान संरक्षक था | वह कवियों व गायकों और कला से जुड़े लोगों के साथ का आनंद लिया करते था |

इसके दिल्ली में और उसके आसपास के किले  व महल, बेजोड़ कारीगरी की श्रेष्ठ कृतियाँ हैं |  उनमे से कुछ हैं फ़तेहपुर सीकरी, इलाहाबाद का किला, और आगरा का किला इत्यादि | अकबर संगीत व कविताओं का महान अनुरागी था, इसका दरबार महान कलाकारों, विद्वानों, कवियों, और गायकों इत्यादि का अनूठा मिश्रण था जोकि अकबर व उसकी सभा मे उल्लास बनाए रखते थे |

 संस्कृति के लिए उसके इस प्यार ने उसके दरबार को नौ रत्नों से सुशोभित किया, जिन्होनें कला और ज्ञान के क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, वे निम्न हैं –

  1. बीरबल (महेश दास ) दरबार का विदूषक
  2. मियां तानसेन (तन्ना मिश्रा ) दरबार का गायक    
  3. अबुल फजल (काल गणक ) जिसने अन –ए-अकबरी लिखी
  4. फैज़ी (दरबार का कवि )
  5. महाराजा मान सिंह ( सेना सलाहाकार )
  6. फ़कीर अजीउद्दीन (सूफी गायक )
  7. मिर्ज़ा अज़ीज़ कोको (गुजरात का सूबेदार )
  8. टोडरमल ( वित्तीय सलाहाकर )
  9. अब्दुल रहीम खान-ए-खाना ( हिन्दी छन्दों के लेखक )

अकबर के जीवन में अन्य विशेषताएँ

कुछ ओर प्रमुख आदतें  जो लोगों को राहत देतीं थीं जिसके लिए अकबर को याद किया जाता था, वे हैं :

  • अकबर के शासन काल में जज़िया कर को समाप्त कर दिया गया |
  • इसने पढे लिखे हिन्दू पंडितों को महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर नियुक्त किया |
  • वह आम लोगों से बात करते थे व उनकी परेशानियों को दीवान-ए-आम में सुना करते थे |
  • वह हिन्दू, मुसलमान, और ईसाई विद्वानों से दीवान-ए-खास में महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत करते थे |

अकबर के शासन का अंत

1605 में 63 वर्ष की आयु में अकबर रक्ततिसार (पेचिश) से बुरी तरह ग्रस्त हो गए जो ठीक नहीं किया जा सका और इसने अकबर का जीवन ले लिया | अकबर को सम्मानपूर्वक तरीके से आगरा के किले में दफ़ना दिया गया |

मराठा साम्राज्य

मराठों का उत्थान - Rise of Marathas and its Causes

महाराष्ट्र में रहने वाले और मराठी बोलने वाले भारतवासी मराठा कहलाते हैं. महाराष्ट्र प्रदेश एक त्रिभुजाकार पठार और चारों ओर पहाड़ों से घिरा हुआ है. यह प्रदेश पहाड़ों, वनों और अनेक स्थानों पर ऊबड़-खाबड़ होने के कारण बड़ा दुर्गम है. महाराष्ट्र की भौगोलिक परिस्थितियों ने ही मराठों की वीर, परिश्रमी, सुदृढ़ और शक्तिशाली बना दिया. यहाँ की पथरीली, कम उपजाऊ भूमि और स्वास्थ्यप्रद जलवायु ने मराठों (marathas) में अनेक चारित्रिक गुण उत्पन्न किए. इसलिए उनका एक राजनैतिक शक्ति के रूप में उदय हुआ. चलिए brief में जानते हैं मराठों के उत्थान/उदय (rise/uprise of marathas) के बारे में.

दक्कन में मराठों का उदय (uprise of marathas)और उत्थान उत्तर मुग़ल काल की महत्त्वपूर्ण और अत्यंत आकर्षक घटना है. मराठे शिवाजी के अधीन (1627-80 ई.) स्वयं को एक शक्तिशाली जाति और स्वतंत्र राज्य के निर्माता के रूप में अनेक कारणों से उदित हो सके.

मराठों के उदय के कारण

प्राकृतिक कारण

महाराष्ट्र की प्राकृतिक परिस्थितियों ने मराठों (marathas) के चरित्र पर गहरा और अच्छा प्रभाव डाला. महाराष्ट्र के पहाड़ी प्रदेशों में वर्ष की कमी और बंजर भूमि ने मराठों में साहस और आत्म-विश्वास के गुण उत्पन्न किए और वे आलस्य और विषय-सुख के दोषों से बचे रहे. वे पहाड़ी प्रदेश के निवासी होने के कारण बहुत परिश्रमी बन गए. वे अपने प्रदेश में छापामार पद्धति का आसानी से सफलतापूर्वक प्रयोग कर सके. पहाड़ों की शृखंलाओं ने उन्हें प्राकृतिक और मजबूत किले प्रदान किए. प्राकृतिक परिस्थतियों ने उन्हें अपने शत्रुओं से युद्ध जीतने में बड़ी सहायता प्रदान की.

महाराष्ट्र में धार्मिक जागृति

मुगलों के आने से पहले ही महाराष्ट्र में अनेक महान सुधारकों ने जाति भेदभाव की निंदा की और मराठों को एकता के सूत्र में बाँधा. एकनाथ, तुकाराम, रामदास और वामन पंडित जैसे मराठा धर्म-सुधारकों ने क्रमानुसार कई वर्षों तक ईश्वर भक्ति मानव समानता, कार्य और परिश्रम की महत्ता और सिद्धांतों का प्रचार किया. उन्होंने मराठा जाति में आत्म-विश्वास और एकता के बीज बोये. शिवाजी के गुरु रामदास एक महान धर्म प्रचारक थे. उसने अपनी रचना 'दास बोध” के माध्यम से यह कार्य किया और मराठों (marathas) को बहुत प्रभावित किया.

युद्ध कला और प्रशासन में प्रशिक्षण

अहमद नगर के प्रसिद्ध सेनापति मलिक अम्बर (Malik Ambar) ने मराठों को बड़ी संख्या में अपनी सेना में भर्ती किया. अहमदनगर में मराठों ने सैनिक और प्रशासनिक पदों पर रहकर प्रशासन और सेना का प्रशिक्षण प्राप्त किया. शिवाजी के पिता शाहजी भोंसले ने अहमदनगर के कुछ इलाकों पर अपना प्रभाव स्थापित किया. उसने कर्नाटक की अशांति का लाभ उठाकर अर्ध-स्वायत्त राज्य की स्थापना करने की कोशिश की. निजामशाही शासन के अंतिम वर्षों में वह शासक निर्माता (king maker) बन गया. लेकिन दूसरे दरबारियों की ईर्ष्या के कारण उसे बीजापुर में नौकरी करनी पड़ी. इसी तरह अनेक मराठों ने बीजापुर और गोलकुंडा राज्यों में भी सेवा करके प्रशासन और शासन के विषय में प्रशिक्षण प्राप्त किया.

साहित्य और भाषा का योगदान

मराठों को जहाँ तुकाराम के भजनों ने एकता प्रदान की वहीं एकनाथ ने उन्हें अपनी मातृभाषा से प्रेम सिखलाया. मराठों (marathas) की एक भाषा, एक धर्म और सामान्य जीवन ने उसमें एकता और सहयोग भरा जिससे उन्हें अपनी शक्ति के उत्थान (rise of marathas) में सहायता मिली.

शिवाजी का व्यक्तित्व

कुछ इतिहासकारों के अनुसार मराठों के उत्थान का कारण शिवाजी जैसे योग्य कूटनीतिज्ञ, कुशल सैनिक और महान नेता था. शिवाजी के उज्जवल चरित्र और महान व्यक्तित्व का निर्माण उसकी माता जीजाबाई के कारण हुआ. उसकी शिक्षाओं और परामर्श के कारण शिवाजी मराठों (marathas) को संगठित कर सका.

दक्षिण के शिया राज्यों का मुगलों से संघर्ष

दक्षिण के शिया सुल्तानों और मुग़ल सम्राटों के बीच दीर्घकालीन युद्ध से मराठों ने अपनी शक्ति को आसानी से विकसित किया. दक्कन के शिया सुलतान और मुग़ल दोनों ही मराठों का समर्थन प्राप्त करना चाहते थे. मराठों ने इस दोनों की फूट का फायदा समय-समय पर अपनी शक्ति मजबूत करने के लिए उठाया.

दादाजी कोंडदेव का प्रभाव

आध्यात्मिक गुरु रामदास का प्रभाव

गुरु रामदास ने शिवाजी के दिल में हिंदू धर्म के प्रति कूट-कूटकर प्रेम भरा. उन्होंने उसे गाय, ब्राह्मण और धर्म तीनों की रक्षा करने की प्रेरणा दी. उन्होंने शिवाजी को निर्देश दिया कि मराठों को इकट्ठा करें और उनमें एकता की भावना करें.

पंचायती संस्थाओं का योगदान

महाराष्ट्र में देश के अन्य भागों की तरह प्रशासन की स्थानीय संस्थाएँ अर्थात् पंचायतें पूरी तरह कार्य करती रहीं. इन संस्थाओं ने मराठों (marathas) में सत्ता और स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना को जागृत किया.

मुगलों की निर्बलता

1682 से लेकर 1707 ई. तक औरंगजेब दक्षिण में ही रहा. इन वर्षों में मुग़ल सेनाओं को कभी-कभी सफलता मिली तो भी उन्हें निर्णयात्मक विजय कभी नहीं मिली. इससे शिवाजी के उत्तराधिकारियों और परवर्ती मराठा सरदारों को अपने प्रभाव शक्ति बढ़ाने का अवसर मिल गया.

971-1030 महमूद गजनवी और भारत

महमूद गजनवी (971 ईश्वी से 1030 ईश्वी)

महमूद गजनवी, गजनी का शासक था जिसने 971 से 1030 AD तक शासन किया | वह सुबक्त्गीन का पुत्र था | भारत की  धन-संपत्ति से आकर्षित होकर, गजनवी ने भारत पर कई बार आक्रमण किए | वास्तव में गजनवी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया | उसके आक्रमण का मुख्य मकसद भारत की संपत्ति को लूटना था |

1000 AD  में महमूद गजनी के आक्रमण : महमूद गजनी  ने पहली बार 1000 AD में आधुनिक अफ़्गानिस्तान और पाकिस्तान पर हमला किया था | इसने हिन्दू शासक जय पाल को पराजित किया जिसने बाद में आत्महत्या कर ली और उसका पुत्र आनंदपाल उसका उत्तराधिकारी बना |

  • गजनी ने भाटिया पर 1005 AD में आक्रमण किया |
  • गजनी ने मुल्तान पर 1006 AD में हमला किया | इसी दौरान आनंदपाल ने उस पर हमला किया |
  • गजनी के महमूद ने भटिंडा के शासक सुखपाल पर 1007 AD  में हमला किया और उसे  कुचल दिया |
  • गजनी ने पंजाब के पहाड़ियों में नगरकोट पर 1011 AD में हमला किया |
  • महमूद ने, आनंदपाल के शाही राज्य पर आक्रमण किया और उसे वैहिंद के युद्ध में, पेशावर के निकट हिन्द शाही  राजधानी में 1013 AD में हरा दिया |
  • गजनी  के महमूद ने  1014 AD में थानेसर पर कब्जा कर लिया |
  • गजनी के महमूद ने 1015 AD में कश्मीर पर आक्रमण किया |
  • इसने 1018 AD  में मथुरा पर आक्रमण किया और शासकों के गठबंधन  को हरा दिया, जिसमे चन्द्र पाल नाम का शासक भी था |
  • महमूद ने 1021 AD में कनौज के राजा चन्देल्ला गौड़ को हराकर, कनौज को जीत लिया |
  • महमूद  गजनी के द्वारा ग्वालियर पर 1023 AD में हमला हुआ और उस पर कब्जा कर लिया  |
  • महमूद गजनी ने 1025 AD में सोमनाथ मंदिर पर हमला किया ताकि मंदिर के अंदर की धन संपत्ति को लूट कर एकत्रित कर सके |
  • अपने आखिरी आक्रमण के दौरान मलेरिया के कारण महमूद गजनवी की 1030 AD में मृत्यु हो गई |

महमूद गजनवी ने क्यूँ भारत पर हमले किए ?        

वह भारत की अधिक धन संपत्ति से आकर्षित था | इसी कारण उसने भारत पर एक के बाद एक हमले किए | इसने भारत पर आक्रमण के दौरान धार्मिक आयाम को भी जोड़ा | गजनी ने सोमनाथ, कांगड़ा, मथुरा और ज्वालामुखी के मंदिरों को नष्ट कर के “मूर्ति तोड़” के रूप में नाम कमाना चाहा |

भारत पर गजनवी के हमलों का असर

यद्यपि भारत पर गजनवी के आक्रमणों का कोई गहरा राजनीतिक असर नहीं है | इन आक्रमणों ने राजपूत राजाओं की युद्ध रणनितियों की कमियों के बारे में खुलासा कर दिया | इससे एक खुलासा और हुआ कि भारत में राजनीतिक एकरूपता नहीं थी और इस बात ने भविष्य में ज्यादा हमलों को बुलावा दिया |

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...