1236-1240 रजिया सुल्तान

रजिया सुल्तान (1236 ईश्वी-1240 ईश्वी)

रज़िया सुल्तान का जन्म 1205 मे हुआ था और उसने देश पर सन 1236 से 1240 तक शासन किया। रज़िया सुल्तान दिल्ली के सिंहासन मे हस्तक्षेप करने वाली पहली मुस्लिम महिला थी। उसने दिल्ली का शासन अपने पिता से उत्तराधिकार मे प्राप्त किया था और 1236 मे दिल्ली की सल्तनत बनी।

रज़िया सुल्तान बहुत ही बुद्धिमान, एक श्रेष्ठ प्रशासक, और अपने पिता की तरह एक बहादुर योद्धा थी।  इस तथ्य के बावजूद कि उसका प्रशासन मात्र तीन वर्षो के लिए था, इतिहास के पन्नो मे उसके कार्य सुरक्षित हो चुके है। दिल्ली मे रज़िया सुल्तान का मकबरा उन सभी स्थलो मे से एक है जो इस बहादुर महिला की स्मृतियो का स्मरण कराते है।

वह पुरुषों की तरह सुसज्जित हो कर खुले दरबार मे बैठती थी। वह एक प्रभावशाली शासक थी और उसमे एक शासक के सभी गुण थे। बचपन और किशोरावस्था मे गृहिणी समूह की महिलाओं से रज़िया का सम्पर्क बहुत कम था इसलिए वह मुस्लिम समुदाय की स्त्रियों के मूल व्यवहार को नहीं सीख पायी। वास्तव मे, सुल्तान बनने से पूर्व वह अपने पिता के प्रशासन के नियमों की तरफ आकर्षित थी। एक सुल्तान की भांति रज़िया ने अंगरखा और राजमुकुट पहना और जब वह एक हाथी पर सवार हो कर युद्ध मे भाग लेती थी तो रीति-रिवाजो के विपरीत वह अपने चेहरे को खुला रखती थी।

रज़िया का असाधारण पिता:

इल्तुत्मिश का जन्म 1210 मे हुआ और उसकी मृत्यु 1236 मे हुयी, वह एक सुलझा हुआ व्यक्ति था, अपनी पहली छोटी पुत्री जिसका जन्म कई बच्चो के बाद हुआ था के जन्मे के स्वागत के लिए भव्य उत्सव के आयोजन के लिए उसने अपने अनुयायियों को तैयार किया। उसको शिक्षित करने में उसने व्यक्तिगत रुचि ली, और जब वह मात्र 13 साल की थी सिर्फ अपने पिता के द्वारा दी गयी शिक्षा की वजह से रजिया एक कुशल धनुर्धर और घुड़सवार के रूप मे जानी गयी और वह अक्सर ही अपने पिता के साथ उसके सैन्य उपक्रमों मे जया करती थी।

जब एक बार इल्तुत्मिश ग्वालियर के हमले मे शामिल थाउसने दिल्ली को रज़िया को सौप दिया था, और वापस आने पर वह रज़िया के प्रदर्शन से बहुत आश्चर्यचकित था इसलिए उसने रज़िया को अपने उत्तराधिकारी के रूप मे चुना।

अपनी पुत्री के लिए इल्तुत्मिश की अभिव्यक्तियाँ, “मेरी यह छोटी पुत्री कई पुत्रो से श्रेष्ठ है।”

पिता की मृत्यु के पश्चात:

इल्तुत्मिश के बच्चो मे से एक, रूकनुददी्न फिरोज राजकाज मे सम्मिलित था। वह लगभग सात महीनों से दिल्ली की देखभाल कर रहा था। 1236 मे रज़िया सुल्तान ने दिल्ली के निवासियों की मदद से अपने भाई को पूर्णतया पराजित कर दिया और शासक बन गयी। 

उस समय जब रज़िया सुल्तान ने सिंहासन संभाला, सारी परिस्थितियाँ पहले की तरह हो गयी। राज्य के वज़ीर निज़ाम-अल-मुल्क जुनेदी ने वफ़ादारी करने से इंकार कर दिया, और उसने कई अन्य लोगो के साथ मिल कर सुल्तान रज़िया के खिलाफ कुछ समय के लिए युद्ध की घोषणा कर दी ।

बाद मे, तबशी मुईज्जी (जो अवध का विधि प्रमुख था) ने सुल्तान रज़िया की सहायता के लिए दिल्ली की ओर कूच किया जब तक वह गंगेस को पार करता उसका सामना उन नायको से हुआ जो शहर के विरुद्ध युद्ध कर रहे थे एवं उसे बंदी बना लिया गयाउसके बाद उसका अस्तित्व समाप्त हो गया। 

रज़िया सुल्तान के कार्य:

  • एक समझदार शासक होते हुये रज़िया सुल्तान ने अपने अधिकार क्षेत्र (प्रांत) मे विधि और पूर्ण शांति स्थापित की, जिसमे प्रत्येक व्यक्ति उसके द्वारा स्थापित किये गए नियमों और विनियमों का पालन करता था।
  • उसने राष्ट्र के आधार का विस्तार करने का प्रयास किया जिसके लिए उसने लेन-देन(विनिमय) को बढ़ावा दिया, गलियों का निर्माण एवं कुओं की खुदाई इत्यादि का कार्य करवाई।
  • इसके अतिरिक्त उसने खोज कार्यो के लिए विद्यालयों, संस्थाओं व स्थलों का निर्माण कराया और पुस्तकालय खुलवाए जिससे शोधकर्ताओं को कुरान और मुहम्मद की नीतियों पर कार्य को बढ़ावा दिया।
  • हिंदुओं ने विज्ञान, विचार, अन्तरिक्ष विज्ञान, और रचना मे वांछित योगदान दिया जिसे  विद्यालयों और कालेजों मे ध्यान केन्द्रित किया गया था।
  • यहाँ तक कि उसने शिल्पकारिता और संस्कृति के क्षेत्र मे भी योगदान दिया और विद्वानोंचित्रकारों और शिल्पकारों का समर्थन किया। 

रज़िया का पतन:

रज़िया को जमाल-उद-दीन याकूत के प्रति एकतरफा प्यार ने बहुत नुकसान पहुचाया।

उसके अन्त का कारण असंतोषजनक प्रेम था । जमाल-उद-दीन याकूत जो एक अफ्रीकन सिद्दी गुलाम था एक विशेष व्यक्ति बन गया (जो उसके लिए एक पड़ोसी देश का निवासी था) और यह अनुमान लगाया जाता था कि वह उसका जीवनसाथी रहा होगा । 

भटिंडा का प्रशासनिक प्रमुख मालिक इख्तियार-उद-अल्तुनिया, रज़िया के इस रिश्ते के खिलाफ था। कहानी यह थी कि अल्तुनिया और रज़िया युवा साथी थे। वे जैसे जैसे साथ साथ बड़े हुये, वह रज़िया पर बुरी तरह से मंत्रमुग्ध होने लगा था और उसका बागवत करना मूल रूप से रज़िया को वापस पाने की एक तकनीकी थी । तबाही तेजी से फैल गयी । याकूत का कत्ल कर दिया गया और अल्तुनिया ने रज़िया को रख लिया। जब वह भटिंडा के तुर्किश राज्यपाल के प्रतिरोध को नियंत्रित करने कि कोशिश कर रही थी, उसके दुर्भाग्यपूर्ण अभाव का लाभ उठाया उसे दिल्ली के शासन से अपदस्थ कर दिया। उसका भाई बहराम मनोनीत किया गया। 

अपने कीर्ति की रक्षा के लिए रज़िया ने समझदारीपूर्वक भटिंडा के प्रशासनिक प्रमुख अल्तुनिया से विवाह करने का निश्चय किया, और अपने साथी के साथ दिल्ली की तरफ चल दी।

13 अक्तूबर 1240 को वह बहराम से पराजित हुयी और अगले ही दिन अभागे जोड़े का कत्ल कर दिया गया।

 

 

1351 मुहम्मद बिन तुगलक

मोहम्मद बिन तुगलक (1351 ईश्वी-1388 ईश्वी)

खिलजी प्रशासन के अंतिम शासक खुसरो खान की गजनी मलिक द्वारा हत्या कर दी गयी थी, जो सिंहासन पर आसीन था और गयासुद्दीन तुगलक की उपाधि हासिल कर रखी थी। एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गयी और उसका पुत्र जौना (उलूग खान) 1325 में मोहम्मद-बिन-तुगलक की उपाधि के साथ उसका उत्तराधिकारी बना था। उसने 1325 से 1351 तक दिल्ली पर शासन किया था। मोहम्मद-बिन-तुगलक का जन्म मुल्तान के कोटला में हुआ था और दिपालपुर के राजा की पुत्री से उसका विवाह हुआ था।

वह तर्क, दर्शनशास्त्र, खगोल विज्ञान, गणित, सुलेख और भौतिक विज्ञान का विद्वान था। वह तुर्की, संस्कृत, फारसी और अरबी जैसी विभिन्न भाषाओं का अच्छा जानकार था। प्रसिद्ध यात्री इब्न बतूता ने उसके शासनकाल के दौरान भारत का दौरा किया था। वह एक ऐसा उदार सम्राट था जो समानता में विश्वास करता था। उसने जैन समुदाय के लोगों के साथ-साथ हिंदूओं को भी आजादी दे रखी थी।

मोहम्मद बिन तुगलक की एक शासक के रूप में सर्वोच्च पहचान यह थी कि उसने विभिन्न उल्लेखनीय प्रयास किए थे और कृषि के क्षेत्र में एक अलग आकर्षण पैदा किया था। वह धर्म में गहरा विश्वास रखता था और तार्किक एवं ग्रहणशील दृष्टिकोण रखता था। तर्कशक्ति, अंतरिक्ष विज्ञान, मूल कारणों और गणित के प्रति उसकी विशेष रूचि थी। वह मुस्लिम अध्यात्मवादियों के साथ-साथ हिंदू योगियों और जैन धर्म के पवित्र लोगों से बातचीत करता था, उदाहरण के लिए जौनप्रभा सूरी।

मुहम्मद बिन तुगलक के सुधार

उसने कई आधिकारिक परिवर्तन पेश करने का प्रयास किया था। लेकिन इनमें से अधिकतर में वह अपनी खिन्नता और न्याय के अभाव के कारण विफल रहा था।

उसकी पांच विनाशकारी परियोजनाएं

  1. दोआब में कराधान: सुल्तान ने गंगा और जमुना के बीच दोआब में एक मूर्खतापूर्ण बजट संबंधी परीक्षण किया था। उसने शुल्क दर में बढोत्तरी के साथ-साथ कुछ अतिरिक्त अबवाबों को पुन: प्रचलन में ला दिया था। बावजूद इसके, राज्य की हिस्सेदारी अलाउद्दीन के समय से भी आधी रहने लगी थी।
  2. राजधानी स्थानांतरण (1327): ऐसा प्रतीत होता है कि सुल्तान देवगिर को अपनी दूसरी राजधानी बनाना चाहता था जिससे वह बेहतर तरीके से दक्षिण भारत पर नियंत्रित स्थापित कर सके। देवगिर का नाम बदलकर दौलताबाद रख दिया गया था। दो या तीन साल के बाद ही मुहम्मद तुगलक दौलताबाद को छोड़ना चाहता था क्योंकि उसे आभास हो गया था कि जिस आधार पर उसने दौलताबाद को चुना था उससे वह दिल्ली से दक्षिण भारत पर नियंत्रण नहीं रख सकता है और न ही वह दौलताबाद से उत्तर पर नियंत्रण रख सकता है।
  3. टोकन मुद्रा का आरम्भ (1330): मुहम्मद ने तुगलक तांबे के सिक्के चलन में लाने का फैसला किया जिनकी कीमत चांदी के सिक्कों के बराबर ही थी। हो सकता है कि मोहम्मद तुगलक का नये सिक्कों की ढलाई से आम लोगों को दूर रखने का यह एक प्रभावी दृष्टिकोण रहा हो लेकिन वह ऐसा करने में नाकामयाब रहा था और जल्द ही अविश्वसनीय रूप से नये सिक्कों का कारोबारी भाव गिरने लगा।
  4. खुर्सी अभियान: सुल्तान का  चारों ओर व्यापक जीत का एक सपना था। उसने खुर्सी और इराक को विजय के चुना और इस कारण एक विशाल सेना को सक्रिय कर दिया था। उसको इस अभियान से निराशा हाथ लगी थी।
  5. कराची अभियान: यह अभियान चीनी हमलों का मुकाबला करने के लिए चलाया गया था। इससे उसके मन में एक विचार ने जन्म लिया जिसका उद्देश्य कुमाऊं-गढ़वाल जिलों में कुछ दुराग्रही जनजातियों को समन्वित कर उन्हें दिल्ली सल्तनत के अधीन लाना था।

इन परियोजनाओं ने मदुरै और वारंगल की स्वतंत्रता और विजयनगर और बहमनी की नींव रखने के लिए देश के कई हिस्सों में विद्रोहों को जन्म दिया था।

अंत में एक तुर्की गुलाम के खिलाफ सिंध में से जूझते समय थट्टा में उसकी मृत्यु हो गयी थी।

तुगलक वंश 
गयासुद्दीन तुगलक1320-24 ईस्वी
मोहम्मद तुगलक1324-51 ईस्वी
फिरोज शाह तुगलक1351-88 ईस्वी
मोहम्मद खान1388 ईस्वी
गयासुद्दीन तुगलक शाह II1388 ईस्वी
अबू बकर1389-90 ईस्वी
नसीरुद्दीन मोहम्मद1390-94 ईस्वी
हूंमायू1394-95 ईस्वी
नसीरुद्दीन महमूद1395-1412 ईस्वी

 

1498-1550 मीराबाई

मीरा बाई (1498 ईश्वी-1550 ईश्वी)

16वीं शताब्दी ने मीरा बाई के रूप में भगवान कृष्ण की एक आसाधारण भक्त और एक रहस्यवादी  कवियत्री देखी | प्रामाणिक दस्तावेज़ों की कमी के कारण, उसकी जीवनी के बारे में दूसरे साहित्यों से पता लगाया गया है जिसमे उसके जीवन के बारे में बताया गया है |

सन 1498 में  शाही परिवार में राजस्थान के मेड़ता के चौकरी गाँव में जन्म हुआ | मीरा ने संगीत, राजनीति, धर्म और शासन में शिक्षा प्राप्त की थी | विष्णु भक्त के अनुयायियों के परिवार में पली बड़ी मीरा का विवाह  मेवाड़ के राजकुमार भोज राज  से 1516  AD में विवाह किया | युद्ध में लगी चोटों के कारण अपने पति को खोने के बाद, मीरा का भगवान कृष्ण ( जिनको उन्होनें बचपन से ही अपने प्रेमी/पति के रूप मे मान लिया था ) की सामाजिक सम्मेलनों में निर्भयता और अनुकरणीय धार्मिक भक्ति करने के कारण  उपेक्षा की गई और उसके ससुराल वालों द्वारा कई बार  उनका उत्पीड़न करने का प्रयास किया गया , लेकिन हर बार वह  किसी तरह से चमत्कारिक ढंग से बच गई |  कई किंवदंतियों तथा लोककथाओं के विवरण में इस तरह की घटनाओं का उल्लेख किया गया है | हालांकि इतिहास के पुनर्लेखन के अटकलों के बावजूद कहानियों मे कुछ विसंगताएं इतिहासकारों के लिए  राजनीतिक लाभ का कारण बनी |

उत्तर हिन्दू परंपरा की एक प्रसिद्ध कवियत्री, मीराबाई, भक्ति आंदोलन की संस्कृति का एक सम्मानित नाम था | भगवान कृष्ण की स्तुति में पूरी भावना के साथ गायी गई कई कविताओं का श्रेय मीरा बाई को जाता है जिसमें उनके अमर स्नेह और पवित्र प्रतिबिंब को दर्शाया है, उनके भजनों की भारत भर में प्रशंसा की गई है जिसकी प्रामाणिकता की जांच कई विद्वानों द्वारा की गई है |  

कृष्ण की भक्ति में अपना पूरा  जीवन  समर्पित करने वाली मीरा ने कृष्ण को योगी व प्रेमी की तरह दर्शाया है और उनकी कविताओं मे मीरा का कृष्ण की योगिनी बनने और उनसे  आध्यात्मिक शादी के बंधन में बंध कर उसकी उत्कंठा और प्रत्याशा के बारे में बताया गया  है |

मीरा की कविताएं जिसमे छंद है उन्हे “पद” कहा गया है | लोककथाएँ में वर्णित है कि किस तरह मीरा परम आनंद में  नाचती हुई कृष्ण की भक्ति में खुद को डुबाते हुए दूसरे ही मोहावस्था में प्रवेश करती हैं और वह सभी वर्ग के  भक्तों को आकर्षित करती थी | इनकी कविताओं के संस्करन वर्तमान समय में पुस्तकों, नाटकों, चित्रों आदि में पाये जाते हैं | चित्तोडगढ़ किले की  तरह कुछ हिन्दू मंदिर भी इनको समर्पित किए गए हैं | 

हालांकि उनके काम की विश्वसनीयता  और उससे संबन्धित कहानियाँ के बारे में पर्याप्त सबूतों के लिए छानबीन  की गई है, किंवदंतियों के अनुसार, मीरा बाई ने मेवाड़ के राज्य को छोड़ दिया था और फिर कभी शाही जीवन की विलासिता की ओर आकर्षित नहीं हुईं | वह तीर्थ पर चली गईं और वृंदावन, द्वारका में रहते हुए उन्होनें अपना पूरा ध्यान कृष्ण की भक्ति की तरफ लगा दिया, जहां उनकी भक्ति का कोई विरोधी नहीं था और ना ही उन्हे किसी भी तरह की असहमति का सामना करना पड़ता था  |

यह माना जाता है कि मीरा उत्तर भक्ति संतों के विश्वास का प्रतिनिधित्व करती है जो निराकार ब्रह्मा  की  वकालत करते हैं | उनके भक्ति गीतों ने भक्ति आंदोलन के साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है | कृष्ण भक्ति में उसकी व्यक्तिगत ओर पवित्र रूप के बारे में बात करें तो  मीरा की कवितायें हिंदु देवता कृष्ण में पूर्ण समर्पण और विश्वास को दर्शाती है |

 विद्वानों का तर्क है कि 16वीं सदी के सामाजिक चरण में हिन्दू मुसलमान के संघर्ष के मध्य में मीरा लोगों के कष्ट के विकल्प के प्रतिबिंब के रूप में उभरी | और उसकी ईमानदारी और द्र्ढ़ विश्वास के प्रभाव ने  उस समय के उद्दंड सामंतों के साथ रिश्तों को भी बदल दिया |

लोगों के अनुसार, 1547 मे वह चमत्कारिक ढंग से मीरा  कृष्ण की मूर्ति में  समा  गईं, हालांकि इस बात के कोई भी सबूत नहीं हैं, मीरा ने उस समय के धार्मिक जोश को बढा दिया और उनके समर्पण ने साहित्य में बहुत बड़ा योगदान दिया है जिसमे उनका अनंत प्रेम और विश्वास दिखता है |  

सभी विपक्षियों और उनके उत्पीड़नों के प्रयासों के बावजूद,उसकी श्रद्धा और निष्ठुर भक्ति के लिए स्वतन्त्रता का  संदेश  उसके द्र्ढ  संकल्प के प्रभाव को दिखती है | उसकी कवितायें अपने अधिकारों के लिए खड़े होना और अभियुक्तों को दोषी करार कर पकड़ने तथा मानव और परमात्मा के बीच मौजूद प्यार के प्रतिबिंब को दर्शाती है |

अकबर


जलाल-उद-दीन मोहम्मद अकबर  एक नाम, जो अपने आप में विरासत है, का जन्म राजा हुमायूँ और बेगम हमीदा बानो के हुआ, जब वे वर्ष 1542 में निर्वासन में रह रहे थे |अकबर की रुचि सभी युद्ध तकनीकों को सीखने में थी और वह पूरी तरह से पढ़ने  और लिखने में उदासीन था | वास्तव में वह बिलकुल भी पढ़ा लिखा नहीं था फिर भी वह सभी चीजों के बारे में जानने का इच्छुक था | बैरम खान के मार्गदर्शन में जलाल को  13 वर्ष की बहुत ही छोटी  आयु में शहँशाह अकबर के शीर्षक से नवाज़ा गया | बैरम खान सबसे वफ़ादार और योग्य सेना प्रमुख था जोकि शुरुआत में हुमायूँ के सेना में सेनापति था और उनकी मृत्यु के बाद, बैरम खान ने हेमू की बढ़ती हुई तानाशाही को समाप्त करने में अकबर की मदद की | बैरम की कमान में अकबर की सेना ने हेमू को 1556 AD में पानीपत के द्वितीय  युद्ध में पराजित  किया था |   

प्रशासन

अकबर को बहुत सक्षम सत्तारूढ़ तकनीक के लिए जाना जाता था | वह जिससे भी वह मिलता था उससे ज्ञान एकत्र करना चाहता था | उनका अपनी प्रजा से विनम्रता से बात करने का तरीका उनकी सबसे प्रमुख विशेषता थी |

अकबर अपनी उदारता के लिए प्रसिद्ध था  परंतु वह रणनीतिक तरीके से निरपेक्ष भी था | इतनी विशाल भूमि और विभिन्न धर्मों के देश पर शासन   उसने अपनी योग्यता के दम किया  |   

अकबर के शासन में धर्म

  • अकबर कट्टर मुसलमान नहीं था बल्कि उसे सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता के लिए जाना जाता था | इसी कारण वह लोगों के बीच प्रसिद्ध था |
  • अकबर ने कई धर्मों में विवाह किए जिसके द्वारा वह एकता और एकजुटता का संदेश देता था |
  •  “सभी की एकता” में अपने विश्वास को मजबूत करने के लिए अकबर ने दीन-ए-इलाही के सिद्धांत का प्रतिपादन किया जिसके द्वारा उसने “सभी धर्म समान हैं” के सिद्धांत को फैलाया |

कला व संस्कृति

एक समर्पित  शासक होने के साथ अकबर कला और संस्कृति का  महान संरक्षक था | वह कवियों व गायकों और कला से जुड़े लोगों के साथ का आनंद लिया करते था |

इसके दिल्ली में और उसके आसपास के किले  व महल, बेजोड़ कारीगरी की श्रेष्ठ कृतियाँ हैं |  उनमे से कुछ हैं फ़तेहपुर सीकरी, इलाहाबाद का किला, और आगरा का किला इत्यादि | अकबर संगीत व कविताओं का महान अनुरागी था, इसका दरबार महान कलाकारों, विद्वानों, कवियों, और गायकों इत्यादि का अनूठा मिश्रण था जोकि अकबर व उसकी सभा मे उल्लास बनाए रखते थे |

 संस्कृति के लिए उसके इस प्यार ने उसके दरबार को नौ रत्नों से सुशोभित किया, जिन्होनें कला और ज्ञान के क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, वे निम्न हैं –

  1. बीरबल (महेश दास ) दरबार का विदूषक
  2. मियां तानसेन (तन्ना मिश्रा ) दरबार का गायक    
  3. अबुल फजल (काल गणक ) जिसने अन –ए-अकबरी लिखी
  4. फैज़ी (दरबार का कवि )
  5. महाराजा मान सिंह ( सेना सलाहाकार )
  6. फ़कीर अजीउद्दीन (सूफी गायक )
  7. मिर्ज़ा अज़ीज़ कोको (गुजरात का सूबेदार )
  8. टोडरमल ( वित्तीय सलाहाकर )
  9. अब्दुल रहीम खान-ए-खाना ( हिन्दी छन्दों के लेखक )

अकबर के जीवन में अन्य विशेषताएँ

कुछ ओर प्रमुख आदतें  जो लोगों को राहत देतीं थीं जिसके लिए अकबर को याद किया जाता था, वे हैं :

  • अकबर के शासन काल में जज़िया कर को समाप्त कर दिया गया |
  • इसने पढे लिखे हिन्दू पंडितों को महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर नियुक्त किया |
  • वह आम लोगों से बात करते थे व उनकी परेशानियों को दीवान-ए-आम में सुना करते थे |
  • वह हिन्दू, मुसलमान, और ईसाई विद्वानों से दीवान-ए-खास में महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत करते थे |

अकबर के शासन का अंत

1605 में 63 वर्ष की आयु में अकबर रक्ततिसार (पेचिश) से बुरी तरह ग्रस्त हो गए जो ठीक नहीं किया जा सका और इसने अकबर का जीवन ले लिया | अकबर को सम्मानपूर्वक तरीके से आगरा के किले में दफ़ना दिया गया |

मराठा साम्राज्य

मराठों का उत्थान - Rise of Marathas and its Causes

महाराष्ट्र में रहने वाले और मराठी बोलने वाले भारतवासी मराठा कहलाते हैं. महाराष्ट्र प्रदेश एक त्रिभुजाकार पठार और चारों ओर पहाड़ों से घिरा हुआ है. यह प्रदेश पहाड़ों, वनों और अनेक स्थानों पर ऊबड़-खाबड़ होने के कारण बड़ा दुर्गम है. महाराष्ट्र की भौगोलिक परिस्थितियों ने ही मराठों की वीर, परिश्रमी, सुदृढ़ और शक्तिशाली बना दिया. यहाँ की पथरीली, कम उपजाऊ भूमि और स्वास्थ्यप्रद जलवायु ने मराठों (marathas) में अनेक चारित्रिक गुण उत्पन्न किए. इसलिए उनका एक राजनैतिक शक्ति के रूप में उदय हुआ. चलिए brief में जानते हैं मराठों के उत्थान/उदय (rise/uprise of marathas) के बारे में.

दक्कन में मराठों का उदय (uprise of marathas)और उत्थान उत्तर मुग़ल काल की महत्त्वपूर्ण और अत्यंत आकर्षक घटना है. मराठे शिवाजी के अधीन (1627-80 ई.) स्वयं को एक शक्तिशाली जाति और स्वतंत्र राज्य के निर्माता के रूप में अनेक कारणों से उदित हो सके.

मराठों के उदय के कारण

प्राकृतिक कारण

महाराष्ट्र की प्राकृतिक परिस्थितियों ने मराठों (marathas) के चरित्र पर गहरा और अच्छा प्रभाव डाला. महाराष्ट्र के पहाड़ी प्रदेशों में वर्ष की कमी और बंजर भूमि ने मराठों में साहस और आत्म-विश्वास के गुण उत्पन्न किए और वे आलस्य और विषय-सुख के दोषों से बचे रहे. वे पहाड़ी प्रदेश के निवासी होने के कारण बहुत परिश्रमी बन गए. वे अपने प्रदेश में छापामार पद्धति का आसानी से सफलतापूर्वक प्रयोग कर सके. पहाड़ों की शृखंलाओं ने उन्हें प्राकृतिक और मजबूत किले प्रदान किए. प्राकृतिक परिस्थतियों ने उन्हें अपने शत्रुओं से युद्ध जीतने में बड़ी सहायता प्रदान की.

महाराष्ट्र में धार्मिक जागृति

मुगलों के आने से पहले ही महाराष्ट्र में अनेक महान सुधारकों ने जाति भेदभाव की निंदा की और मराठों को एकता के सूत्र में बाँधा. एकनाथ, तुकाराम, रामदास और वामन पंडित जैसे मराठा धर्म-सुधारकों ने क्रमानुसार कई वर्षों तक ईश्वर भक्ति मानव समानता, कार्य और परिश्रम की महत्ता और सिद्धांतों का प्रचार किया. उन्होंने मराठा जाति में आत्म-विश्वास और एकता के बीज बोये. शिवाजी के गुरु रामदास एक महान धर्म प्रचारक थे. उसने अपनी रचना 'दास बोध” के माध्यम से यह कार्य किया और मराठों (marathas) को बहुत प्रभावित किया.

युद्ध कला और प्रशासन में प्रशिक्षण

अहमद नगर के प्रसिद्ध सेनापति मलिक अम्बर (Malik Ambar) ने मराठों को बड़ी संख्या में अपनी सेना में भर्ती किया. अहमदनगर में मराठों ने सैनिक और प्रशासनिक पदों पर रहकर प्रशासन और सेना का प्रशिक्षण प्राप्त किया. शिवाजी के पिता शाहजी भोंसले ने अहमदनगर के कुछ इलाकों पर अपना प्रभाव स्थापित किया. उसने कर्नाटक की अशांति का लाभ उठाकर अर्ध-स्वायत्त राज्य की स्थापना करने की कोशिश की. निजामशाही शासन के अंतिम वर्षों में वह शासक निर्माता (king maker) बन गया. लेकिन दूसरे दरबारियों की ईर्ष्या के कारण उसे बीजापुर में नौकरी करनी पड़ी. इसी तरह अनेक मराठों ने बीजापुर और गोलकुंडा राज्यों में भी सेवा करके प्रशासन और शासन के विषय में प्रशिक्षण प्राप्त किया.

साहित्य और भाषा का योगदान

मराठों को जहाँ तुकाराम के भजनों ने एकता प्रदान की वहीं एकनाथ ने उन्हें अपनी मातृभाषा से प्रेम सिखलाया. मराठों (marathas) की एक भाषा, एक धर्म और सामान्य जीवन ने उसमें एकता और सहयोग भरा जिससे उन्हें अपनी शक्ति के उत्थान (rise of marathas) में सहायता मिली.

शिवाजी का व्यक्तित्व

कुछ इतिहासकारों के अनुसार मराठों के उत्थान का कारण शिवाजी जैसे योग्य कूटनीतिज्ञ, कुशल सैनिक और महान नेता था. शिवाजी के उज्जवल चरित्र और महान व्यक्तित्व का निर्माण उसकी माता जीजाबाई के कारण हुआ. उसकी शिक्षाओं और परामर्श के कारण शिवाजी मराठों (marathas) को संगठित कर सका.

दक्षिण के शिया राज्यों का मुगलों से संघर्ष

दक्षिण के शिया सुल्तानों और मुग़ल सम्राटों के बीच दीर्घकालीन युद्ध से मराठों ने अपनी शक्ति को आसानी से विकसित किया. दक्कन के शिया सुलतान और मुग़ल दोनों ही मराठों का समर्थन प्राप्त करना चाहते थे. मराठों ने इस दोनों की फूट का फायदा समय-समय पर अपनी शक्ति मजबूत करने के लिए उठाया.

दादाजी कोंडदेव का प्रभाव

आध्यात्मिक गुरु रामदास का प्रभाव

गुरु रामदास ने शिवाजी के दिल में हिंदू धर्म के प्रति कूट-कूटकर प्रेम भरा. उन्होंने उसे गाय, ब्राह्मण और धर्म तीनों की रक्षा करने की प्रेरणा दी. उन्होंने शिवाजी को निर्देश दिया कि मराठों को इकट्ठा करें और उनमें एकता की भावना करें.

पंचायती संस्थाओं का योगदान

महाराष्ट्र में देश के अन्य भागों की तरह प्रशासन की स्थानीय संस्थाएँ अर्थात् पंचायतें पूरी तरह कार्य करती रहीं. इन संस्थाओं ने मराठों (marathas) में सत्ता और स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना को जागृत किया.

मुगलों की निर्बलता

1682 से लेकर 1707 ई. तक औरंगजेब दक्षिण में ही रहा. इन वर्षों में मुग़ल सेनाओं को कभी-कभी सफलता मिली तो भी उन्हें निर्णयात्मक विजय कभी नहीं मिली. इससे शिवाजी के उत्तराधिकारियों और परवर्ती मराठा सरदारों को अपने प्रभाव शक्ति बढ़ाने का अवसर मिल गया.

971-1030 महमूद गजनवी और भारत

महमूद गजनवी (971 ईश्वी से 1030 ईश्वी)

महमूद गजनवी, गजनी का शासक था जिसने 971 से 1030 AD तक शासन किया | वह सुबक्त्गीन का पुत्र था | भारत की  धन-संपत्ति से आकर्षित होकर, गजनवी ने भारत पर कई बार आक्रमण किए | वास्तव में गजनवी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया | उसके आक्रमण का मुख्य मकसद भारत की संपत्ति को लूटना था |

1000 AD  में महमूद गजनी के आक्रमण : महमूद गजनी  ने पहली बार 1000 AD में आधुनिक अफ़्गानिस्तान और पाकिस्तान पर हमला किया था | इसने हिन्दू शासक जय पाल को पराजित किया जिसने बाद में आत्महत्या कर ली और उसका पुत्र आनंदपाल उसका उत्तराधिकारी बना |

  • गजनी ने भाटिया पर 1005 AD में आक्रमण किया |
  • गजनी ने मुल्तान पर 1006 AD में हमला किया | इसी दौरान आनंदपाल ने उस पर हमला किया |
  • गजनी के महमूद ने भटिंडा के शासक सुखपाल पर 1007 AD  में हमला किया और उसे  कुचल दिया |
  • गजनी ने पंजाब के पहाड़ियों में नगरकोट पर 1011 AD में हमला किया |
  • महमूद ने, आनंदपाल के शाही राज्य पर आक्रमण किया और उसे वैहिंद के युद्ध में, पेशावर के निकट हिन्द शाही  राजधानी में 1013 AD में हरा दिया |
  • गजनी  के महमूद ने  1014 AD में थानेसर पर कब्जा कर लिया |
  • गजनी के महमूद ने 1015 AD में कश्मीर पर आक्रमण किया |
  • इसने 1018 AD  में मथुरा पर आक्रमण किया और शासकों के गठबंधन  को हरा दिया, जिसमे चन्द्र पाल नाम का शासक भी था |
  • महमूद ने 1021 AD में कनौज के राजा चन्देल्ला गौड़ को हराकर, कनौज को जीत लिया |
  • महमूद  गजनी के द्वारा ग्वालियर पर 1023 AD में हमला हुआ और उस पर कब्जा कर लिया  |
  • महमूद गजनी ने 1025 AD में सोमनाथ मंदिर पर हमला किया ताकि मंदिर के अंदर की धन संपत्ति को लूट कर एकत्रित कर सके |
  • अपने आखिरी आक्रमण के दौरान मलेरिया के कारण महमूद गजनवी की 1030 AD में मृत्यु हो गई |

महमूद गजनवी ने क्यूँ भारत पर हमले किए ?        

वह भारत की अधिक धन संपत्ति से आकर्षित था | इसी कारण उसने भारत पर एक के बाद एक हमले किए | इसने भारत पर आक्रमण के दौरान धार्मिक आयाम को भी जोड़ा | गजनी ने सोमनाथ, कांगड़ा, मथुरा और ज्वालामुखी के मंदिरों को नष्ट कर के “मूर्ति तोड़” के रूप में नाम कमाना चाहा |

भारत पर गजनवी के हमलों का असर

यद्यपि भारत पर गजनवी के आक्रमणों का कोई गहरा राजनीतिक असर नहीं है | इन आक्रमणों ने राजपूत राजाओं की युद्ध रणनितियों की कमियों के बारे में खुलासा कर दिया | इससे एक खुलासा और हुआ कि भारत में राजनीतिक एकरूपता नहीं थी और इस बात ने भविष्य में ज्यादा हमलों को बुलावा दिया |

मुगल काल की मनसबदारी प्रथा

मनसबदारी व्यवस्था क्या थी? Mansabdari System in Hindi

मुगलों द्वारा विकसित मनसबदारी व्यवस्था (Mansabdari System) ऐसी थी जिसका भारत के बाहर कोई उदाहरण नहीं मिलता. मनसबदारी व्यवस्था की उत्पत्ति संभवतः विश्वविख्यात  मंगोल विजेता और आक्रमणकारी चंगेज खां के काल में हुई थी जिसने अपनी सेना को दशमलव के आधार पर संगठित किया था. इसमें सबसे छोटा एकांश (unit या इकाई) दस का था और सबसे ऊँचा दस हजार (तोमान) का था जिसके सेनाध्यक्ष को खान कहकर पुकारा जाता था. मंगोल की इस सैन्यव्यवस्था ने कुछ सीमा तक दिल्ली सल्तनत की सैन्यव्यवस्था को प्रभावित किया क्योंकि इस काल में हम एक सौ और एक हजार के सेनाध्यक्षों (सदी और हजारा) के बारे में सुनते हैं. लेकिन बाबर और हुमायूँ के काल में मनसबदारी प्रथा थी या नहीं इस बारे में इतिहासकार अभी तक कुछ भी ज्ञात नहीं कर सके हैं. इसलिए मनसबदारी व्यवस्था की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में काफी मतभेद है. वर्तमान प्रमाण के आधार पर ऐसा लगता है कि मनसबदारी व्यवस्था का प्रारम्भ अकबर ने अपने शासन काल के उन्नीसवें वर्ष (1575) में किया था.

अकबर जागीरदारी प्रथा के स्थान पर मनसबदारी प्रथा लाया

सम्राट् अकबर सेना के महत्त्व को भली-भांति जानता था. उसे पता था कि एक स्थायी और शक्तिशाली सेना के अभाव में न तो शांति स्थापित की जा सकती है और न ही साम्राज्य की रक्षा और विस्तार किया जा सकता है. अकबर से पूर्व जागीदारी प्रथा के आधार पर सेना एकत्र करने की प्रथा प्रचलित थी. उसने देखा कि जागीरदार निश्चित संख्या में न घोड़े रखते हैं और न ही घुड़सवार या सैनिक रखते हैं. इसके विपरीत वे सरकारी धन को अपनी विलासता पर खर्च कर लेते थे. अकबर ने जागीरदारी प्रथा के स्थान पर मनसबदारी प्रथा (Mansabdari System) के आधार पर सेना को संगठित किया. मनसबदारी सेना को संगठित करने की ऐसी व्यवस्था थी जिसमें प्रत्येक मनसबदार अपनी-अपनी श्रेणी और पद (मनसब) के अनुसार घुड़सवार सैनिक रखता था. इस व्यवस्था में मनसबदार सम्राट् से प्रति माह नकद वेतन प्राप्त करता था.

मनसब शब्द का अर्थ

'मनसब” फारसी भाषा का शब्द है. इस शब्द का अर्थ है पद, दर्जा या ओहदा. जिस व्यक्ति को सम्राट् मनसब देता था, उस व्यक्ति को मनसबदार (Mansabdar) कहा जाता था. अकबर ने अपने प्रत्येक सैनिक और असैनिक अधिकारी को कोई-न-कोई मनसब (पद) अवश्य दिया. इन पदों को उसने जात या सवार नामक दो भागों में विभाजित किया. जात का अर्थ है व्यक्तिगत पद या ओहदा और सवार का अर्थ घुड़सवारों की उस निश्चित संख्या से है जिसे किसी मनसबदार को अपने अधिकार में रखने का अधिकार होता था. इस तरह मनसब शब्द केवल सैनिक व्यवस्था का ही शब्द नहीं अपितु इसका अर्थ है वह पद जिसपर सैनिक और गैर-सैनिक अधिकारी को नियुक्त किया जाता या रखा जाता था. दूसरे शब्दों में, मनसब पद प्रतिष्ठा अथवा अधिकार प्राप्त करने की स्थिति थी. इससे व्यक्ति का पद, स्थान और वेतन निर्धारित होता था. इसके सही अर्थ को समझने के लिए इसकी विशेषताओं की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है.

मनसबदारी व्यवस्था की विशेषताएँ

मनसबदारों का श्रेणियों में विभाजन

अकबर ने जात और सवार मनसबदारों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया था -

    1. जिस व्यक्ति को जितना अधिक ऊँचा जात (व्यक्तिगत) मनसब दिया जाता था, वह उतने ही अधिक घुड़सवार रखने का अधिकारी भी होता था और उसे प्रथम श्रेणी का मनसब कहा जाता था. अकबर के काल में सबसे छोटा या निम्न मनसब (पद) दस सिपाहियों के ऊपर अधिकार रखने का था और उच्चतम दस हजार घुड़सवारों पर अधिकार रखने का था. बाद में अकबर ने उच्चतम मनसब की सीमा बढ़ाकर 12 हजार कर दी थी.
    2. जो मनसबदार अपने जात (व्यक्तिगत) से आधी संख्या या आधे से अधिक घुड़सवार रख सकता था, वह दूसरी श्रेणी का मनसबदार होता था.
    3. जिस मनसबदार को अपने जात (व्यक्तिगत पद) से आधे से कम घुड़सवार रखने का अधिकार था, उसे तीसरी श्रेणी का मनसबदार कहा जाता था.

सभी मनसबदारों को एक घुड़सवार के लिए दो घोड़े रखने अनिवार्य होते थे. किसी भी मनसबदार को जात पद के अनुसार ही सवार रखने की अनुमति थी.

मनसबदारों की नियुक्ति

मनसबदारों की नियुक्ति सम्राट् स्वयं करता था और उसकी मर्जी होने तक ही वे पद पर बने रह सकते थे. प्रायः सात हजार का मनसब राजघराने के लोगों या बहुत ही महत्त्वपूर्ण और विश्वसनीय सरदारों जैसे राजा मानसिंह, मिर्जा शाहरुख और मिर्जा अजीज कोका को ही दिया गया. सम्राट् ने राजकुमारों को ही 12 हजार तक मनसब दिए.

मनसबदारों का वेतन

मुग़ल मनसबदारों को बहुत अच्छा वेतन मिलता था. उन्हें प्रायः नकद में वेतन दिया जाता था. परन्तु कभी-कभी जागीर का राजस्व भी वेतन के स्थान पर दे दिया जाता था. उन्हें अपनी व्यक्तिगत आय और वेतन से ही अपने स्वयं के अधीन घुड़सवारों और घोड़ों का खर्च चलाना होता था. इतना होने पर भी अकबर के काल में मनसबदार बहुत सुखी और ठाट का जीवन गुजारते थे क्योंकि उस समय उनको आय-कर नहीं देना होता था और रुपये की क्रय-शक्ति आज की तुलना में बहुत ही अधिक थी. प्रथम श्रेणी के पञ्चहजारी मनसबदार को 30,000 रुपये प्रतिमास, द्वितीय श्रेणी के पञ्चहजारी को 29,000 रुपये प्रति मास और तृतीय श्रेणी के पञ्चहजारी को 28,000 रुपये प्रति मास वेतन मिलता था. इसके अतिरिक्त मनसबदार को प्रत्येक सवार के लिए दो रुपये प्रति मास के हिसाब से अतिरिक्त वेतन भी मिलता था.

मनसबदारों के कार्य

मनसबदार सैनिक-अभियानों में भेजे जा सकते थे. उन्हें विद्रोह रोकने, नए प्रदेश जीतने आदि के साथ-साथ अपने पद से सम्बन्धी और समय-समय पर सौंपे गए गैर-सैनिक और प्रशासनिक कार्य भी करने पड़ते थे.

मनसबदारों पर पाबंदी

अकबर ने मनसबदारों को अपनी मनमानी करने से रोकने के लिए इस बात का विशेष ध्यान रखा कि वे केवल अनुभवी और कुशल सवारों को ही भर्ती करे. उसके अधीन प्रत्येक सवार का हुलिया (खाता रखना) नोट करने की और घोड़े को दागने की प्रथा भी शुरू की गई. समय-समय पर बादशाह स्वयं उसकी सेना का निरीक्षण करता था या वह खुद किसी समिति को उनकी सेना-निरीक्षण हेतु नियुक्त भी कर सकता था. मनसबदारों को प्रत्येक घुड़सवार के पीछे अरबी या ईराकी नस्ल के दो घोड़े रखने होते थे. हर माह अपने (यदि नकद हो तो) वेतन लेने के लिए स्वयं सम्राट् के पास आना होता था. मृत्यु हो जाने पर उसकी संचित पूँजी जब्त कर ली जाती थी. इन पाबंदियों ने मुगलों की सैनिक शक्ति को बहुत सुदृढ़ कर दिया.

मिश्रित सवार

अकबर ने इस बात की व्यवस्था की कि मनसबदारों के सवारों में मिश्रित अर्थात् सभी जातियों (मुग़ल, पठान, राजपूत आदि) के सैनिक और घुड़सवार हों. प्रारम्भ में मुग़ल और राजपूत मनसबदारों को इस बात की छूट थी कि वे अपनी-अपनी जाति के ही सवार रखें लेकिन धीरे-धीरे उसने भी मिश्रित सवारों की पद्धति को अपनाया. इस तरह अकबर ने सेना में जाति और विशिष्टता की भावना को निर्बल करने का प्रयास किया ताकि तुर्कों का वर्चस्व बना रहे.

अनेक तरह के सैनिक कार्य करने वालों की भर्ती

मुग़ल सेना में घुड़सवारों के अतिरिक्त तीरंदाज, बंदूकची, खन्दक खोदने वाले भी भर्ती किये जाते थे. इनके वेतन अलग-अलग होते थे. ईरानी और तुर्की सवारों को अधिक वेतन दिया जाता था लेकिन शेष सभी सवारों का औसत वेतन 20 रु. प्रति मास था. पैदल सैनिक का वेतन बहुत कम होता था. उसे केवल 3 रु. प्रति माह वेतन मिलता था.

भारत पर तैमूर लंग का आक्रमण

भारत पर तैमूर का आक्रमण

मध्य एशियाई देशों पर जीत हासिल करने के बाद उसने सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत पर नजरें गड़ाईं। भारत में वह दिल से लूट– पाट करना चाहता था।

उसकी ज्वलंत इच्छा इसलिए भी उसे भारत ले आई क्योंकि इस अवधि में भारत कमजोर शासकों के अधीन था और यहां पूर्ण राजनीतिक अराजकता एवं लोगों के बीच असंतोष फैला था।

ऐसा, फिरोज शाह तुगलक की मौत की वजह से हो रहा था। इसलिए यह समय भारत में तैमूर के आने के लिये सबसे अच्छा समय था।

ऐतिहासिक कालक्रम में यह बहुत स्पष्ट लिखा है कि तैमूर भी भारत में काफिर हिन्दुओं को उनके पापों के शुद्धिकरण के नाम पर इस्लाम धर्म अपनाने और गाजी का खिताब हासिल करने के इरादे से भारत आया था। इसके अलावा, उसके भारत आने का मकसद चंगेज खान के सपनों को भी पूरा करना था।

तैमूर अपनी सेना के साथ भारत में दाखिल हुआ और साल 1398 में दिल्ली पहुंचा।

उसने देश में खूब लूट– पाट की। क्रूर नरसंहार, लूटपाट और महिलाओं का अपमान इस हद तक पहुंच गया कि लोगों ने अपनी बेटियों एवं बहनों का विवाह बहुत कम उम्र में ही करने का फैसला कर लिया था।

इतिहास यह भी बताता है कि पूरे एक वर्ष तक भारत आतंक और गरीबी की चपेट में था क्योंकि यहां के लोगों का धन सेना ने छीन लिया था। यहां अराजकता और रक्तपात अपने चरम पर था। पूरा देश पूरी तरह से बर्बाद कर दिया गया था। तथ्यों के अनुसार इस युद्ध में एक लाख से अधिक भारतीयों को मार डाला गया था।

तैमूर का आक्रमण एक शैतानी दिमाग, जो कभी चैन से नहीं रहता था, की करतूत के सिवा कुछ नहीं था। उसकी नासमझी भरे जुनून और गलत मनोविज्ञान का नतीजा दीर्धकालिक असफलता रही। परिस्थितियों को सामान्य होने में काफी वक्त लग गया।

तैमूर ने सिर्फ संपत्ति लूटने के लिए सैंकड़ों खूबसूरत इमारतों और मंदिरों को नष्ट कर दिया। तैमूर के आक्रमण के बाद, भारत लगभग अपनी पूरी संपत्ति गंवा चुका था और आर्थिक आपदा के चरम पर था। उसकी सेना ने खड़ी फसलों को रौंद डाला और तैयार फसलों को जला दिया। खुले आसमान के नीचे पड़े शव और विनाश ने बीमारियों को बढाया और भोजन की कमी पैदा कर दी। इस आक्रमण का प्रभाव इतना अधिक था कि कोई भी अन्य तुगलक शासक अपनी शक्ति न तो फिर से हासिल कर सका और न ही गद्दी पर दुबारा बैठ सका। देश पूरी तरह से टूटने की कगार पर था।

इस घटना ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दे दिया जिसके बाद मुगल वंश की स्थापना हुई।

1802 ईस्ट इंडिया कंपनी

बेसिन की संधि, 1802 का भारतीय इतिहास में महत्त्व

अठारहवीं सदी के आते-आते मराठा साम्राज्य की आंतरिक एकता छिन्न-भिन्न हो गयी और विकेंद्रीकरण की शक्ति प्रबल हो गयी थी. जब मराठा संघ ऐसी बुरी स्थिति से गुजर रहा था तो वेलेजली जिया साम्राज्यवादी ईस्ट इंडिया कंपनी का गवर्नर जनरल बनकर आया. उसने आते ही मराठों के ऊपर भी अपना साम्राज्यवादी चक्र चलाना शुरू किया . जब तक नाना फड़नवीस जिन्दा रहा तब तक वह मराठों के पारस्परिक कलह और प्रतिस्पर्द्धा को रोकने में सफल रहा परन्तु उसकी मृत्यु के बाद मराठा सरदारों के बीच आपसी युद्ध शुरू हुआ. होल्कर ने सिंधिया और पेशवा की संयुक्त सेना को पूना के निकट पराजित किया. पेशवा बाजीराव द्वितीय ने बेसिन में शरण ली और 31 दिसम्बर, 1802 में सहायक संधि स्वीकार कर ली. यह समझौता बेसिन की संधि (Treaty of Bassein) के नाम से जाना जाता है.

बाजीराव II और अंग्रेजों के बीच समझौता

बेसिन की संधि (Treaty of Bassein) के अनुसार दोनों पक्षों ने संकट के समय एक-दूसरे का साथ देने का वचन दिया. पेशवा बाजीराव द्वितीय को अंग्रेजों ने 6000 सैनिक तथा तोपखाना दिए और बदले में पेशवा ने 26 लाख रु. दिए. पेशवा ने यह भी वचन दिया की बिना अंग्रेजों की स्वीकृति के वह किसी यूरोपियन को अपने यहाँ नौकरी नहीं देगा और किसी दूसरे राज्य के साथ भी युद्ध संधि या पत्र-व्यवहार नहीं करेगा. इस प्रकार बेसिन की संधि का भारतीय इतहास में एक  विशिष्ट महत्त्व है क्योंकि इसके द्वारा मराठों ने अपने सम्मान और स्वतंत्रता के अंग्रेजों के हाथों बेच दिया जिससे महाराष्ट्र की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा. दूसरी ओर अंग्रेजों को पश्चिम भारत में पैर जमाने का एक अच्छा मौका मिल गया.

हालाँकि यह संधि सभी मराठी सरदारों को मंजूर नहीं था इसलिए बाद में जाकर द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध हुआ जिसके विषय में हम बाद में पढेंगे.

बाबर 1483

बाबर (ज़हीर-उद-दीन मुहम्मद)

बाबर का जन्म 14 फरवरी, 1483 AD में फरगाना में हुआ था जोकि अब उज्बेकिस्तान में है |सम्राट बाबर भारत में मुग़ल साम्राज्य का  संस्थापक था | इसका नाम बाबर  पर्शियन भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ है सिंह ( शेर) | बाबर अपने पिता की तरफ से तैमुरलेन  का उत्तरधिकारी और अपने माता की तरफ से गंघिस खान के उत्तराधिकारी था |बाबर के जन्म के दौरान, पश्चिमी मध्य एशिया में रहने वाले  मंगोलों के पूर्वजों ने तुर्क और पर्शिया के लोगों के साथ अंतर्जातीय विवाह करना आरंभ कर दिया और उनके रहन - सहन को अपना लिया तथा पर्शिया से ज्यादा प्रभावित होने के कारण उन्होनें इस्लाम धर्म को अपना लिया |

बाबर ने राजगद्दी संभाली

1494 AD में बाबर के पिता  का अचानक देहांत हो गया और उस वक्त बाबर केवल 11 वर्ष का था | उसने अपने पिता की राजगद्दी संभाली | 1497 AD से बाबर ने प्रसिद्ध समरकन्द  में सिल्क रोड नखलिस्तान शहर  पर आक्रमण कर आधिपत्य जमा लिया परंतु कुछ ही वर्षों  के बाद उसने अपना नियंत्रण खो दिया क्यूंकि वह दूसरे स्थानों पर अपने आधिपत्य को मजबूत करने में व्यस्त था |

अफगानिस्तान में निर्वासन

बेघर राजकुमार मध्य एशिया में कुछ समर्थक पाने के लिए  तीन साल तक घूमता रहा ताकि वे इसे इसके पिता की राजगद्दी पाने में मदद करें | अंत में 1504 AD में उसने दक्षिण पूर्व की तरफ रुख किया और बर्फ़ से ढके हिन्द कुश  पर्वतों को  पार कर अफगानिस्तान पहुंचा | जब बाबर 21 वर्ष का हो गया उसने काबुल पर विजय प्राप्त की और काबुल पर अधिकार जमा कर  उसे अपना नया राज्य बनाया |

लोदी के तख़्ता पलट का न्यौता

1521 में दक्षिणी विस्तार के लिए बाबर के पास तख़्ता पलट का मौका आया  | दिल्ली सल्तनत के सुल्तान, इब्राहिम लोदी ने अपने प्रशंसकों कों सेना और सभा में स्थान देने तथा निर्धन वर्ग के लोगों पर शासन करने के कारण उसे प्रजा द्वारा नापसंद किया जाने लगा |इससे अफगान की प्रजा इब्राहिम लोदी से  इतनी परेशान हो गई थी कि उन्होनें दिल्ली सल्तनत में बाबर कों बुला कर इब्राहिम लोदी का तख़्ता पलट कर राजगद्दी लेने के लिए कहा |

पानीपत का प्रथम युद्ध 

बाबर ने आखिरकार अप्रैल 1526 AD  में इब्राहिम लोदी के खिलाफ युद्ध आरंभ कर दिया और उसके सशस्त्र सेना ने सुल्तान इब्राहिम कों बाहर निकाल दिया | इब्राहिम लोदी और बाबर के बीच में हुआ युद्ध, पानीपत का प्रथम युद्ध कहलाया और इस युद्ध ने दिल्ली सल्तनत का पतन सुनिश्चित किया |

राजपूत युद्ध

बाबर अपने पूर्वजों की तरह ही अपनी राजधानी आगरा में बनाने के लिए आतुर था | राजपूत जानते थे कि  मुगल सेनाएँ पानीपत के युद्ध के बाद कमजोर हो गईं होगी | इसलिए राजपुताना राजकुमारों ने लोदी की सेना से बड़ी सेना एकत्रित की और मेवाड़ के राणा सांगा के नेतृत्व में बाबर के विरुद्ध युद्ध करने चले गए | बाबर की सशस्त्र सेना राजपूतों के साथ युद्ध में कामयाब रही और मार्च 1527 AD में खनवा के युद्ध में उन पर काबू पाने में सफल रहे |

बाबर की मृत्यु

1530 AD में बाबर बीमार  हो गया | इसका बहनोई बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूँ (बाबर का ज्येष्ठ पुत्र ) कों मारकर  राजगद्दी कों हासिल करना चाहता था | हुमायूँ राजगद्दी  पर अपना अधिकार जताने के लिए आगरा के लिए तुरंत रवाना हो गया, परंतु वह गंभीर रूप से बीमार हो गया, पूर्वजों के मतानुसार, बाबर ने ईश्वर से उसकी ज़िंदगी के बदले हुमायूँ की जिंदगी बख्शने के लिए प्रार्थना की | 5 जनवरी 1531, को 47 वर्ष की उम्र में इसका देहांत हो गया और उस वक़्त हुमायूँ 22 वर्ष का था जब उसने साम्राज्य संभाला |

मणिपुर में CRPF को खुली छूट मिली news

मणिपुर में CRPF का सख्त संदेश 🚨 मणिपुर में तैनात CRPF जवानों को संबोधित करते हुए महानिदेशक जी. पी. सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा— "यदि...