1764 इस्वी का बकसर(बिहार) की लड़ाई

बक्सर का युद्ध - 1764 

आज हम बक्सर के युद्ध (Battle of Buxar) के बारे में चर्चा करेंगे. मैं आज ही अपना पोस्ट देख रहा था तो मैंने पाया कि मैंने मध्यकालीन इतिहास के कई छोटे-छोटे युद्ध के विषय में लिख डाला है पर बक्सर का युद्ध भूल ही गया. इसलिए आज आपके सामने बक्सर के युद्ध के बारे में लिखने का फैसला किया है. यह युद्ध क्यों हुआ, क्या कारण (causes) थे, किसके-किसके बीच हुआ और इसके क्या परिणाम (results) सामने आये, ये सब की चर्चा करूँगा.

भूमिका और कारण

1757 के प्लासी युद्ध में मीरकासिम (Mir Qasim) की हार हुई और अंग्रेज़ों ने उसके स्थान पर मीरजाफर को बिठा दिया. मीरजाफर से अंग्रेज़ पैसा और सुविधाएँ इच्छानुसार प्राप्त करने लगे. उधर मीरकासिम पुनः बंगाल के बागडोर अपने हाथ में लेना चाहता था. इसने अवध के नवाब शुजाउद्दौला (Shuja-ud-Daula), जो कि मुग़ल शासक शाहआलम का प्रधानमंत्री भी था, को अंग्रेजों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए तैयार किया. इसके लिए शुजाउद्दौला ने शाहआलम की ओर से एक धमकी भरी चिट्ठी अंग्रेजों को भेजी. इस चिट्ठी में आरोप लगाया गया था कि अंग्रेज़ उनको दी गई सुविधाओं का अतिक्रमण कर रहे हैं और बंगाल का आर्थिक दोहन कर रहे हैं. अंग्रेजों की ओर से इस मामले में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. अंततः शुजाउद्दौला और मीरकासिम ने धैर्य खो दिया और अप्रैल 1764 में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी.

मीरकासिम, शुजाउद्दौला और शाहआलम

मीरकासिम अवध के नवाब शुजाउद्दौला और सम्राट शाहआलम (Shah Alam) से संधि कर बंगाल पर अधिकार के लिए पटना पहुँचा. सम्मिलित सेना के आगमन की सूचना पाकर अंग्रेजी सेना का प्रधान घबरा गया. शुजाउद्दौला के सैनिकों की संख्या 1,50,000 थी जिसमें 40,000 लड़ाई के योग्य थे. शेष संख्या भीड़ मात्र ही थी. सम्राट शाहआलम और मीरकासिम के पास अपनी कोई सेना नहीं थी. सेना के प्रधान ने बक्सर के बदले पटना लौटने का सन्देश अंग्रेज-सेना को दिया. फलतः पटना की घेराबंदी की गई. परन्तु शुजाउद्दौला की सेना में भी अनेक विश्वाघाती व्यक्ति थे. उदाहरण के लिए, सिताबराय का पुत्र महाराजा कल्याण सिंह अवध की सेना में एक ऊँचे पद पर था. सिताबराय अंग्रेजों का मित्र था और उसका मुंशी साधोराम शुजाउद्दौला की सैनिक गतिविधियों की जानकारी पाकर अंग्रेजों को भेजता था. पटने की की घेराबंदी कारगर नहीं हुई. बरसात का मौसम था. इसलिए पटना के बदले शुजाउद्दौला ने बक्सर में ही बरसात बिताने का निश्चय किया.

इस बीच अंग्रेजी सेना के प्रधान के बदले मेजर हेक्टर मुनरो (Hector Munro) को अंग्रेजों ने सेनापति नियुक्त कर पटना भेजा. मुनरो जुलाई, 1764 ई. में पटना पहुँचा. उसे भय था कि देर होने पर मराठों और अफगानों का सहयोग पाकर शुजाउद्दौला अंग्रेजों को पराजित कर सकता है. इसलिए मुनरो ने जल्द युद्ध का निर्णय लिया. मुनरो के आगमन के बाद कुछ भारतीय सैनिकों ने विद्रोह किया जिसे मुनरो ने शांत कर दिया और सभी विद्रोहियों को तोप से उड़ा दिया. मुनरो ने रोहतास के किलेदार साहूमल को प्रलोभन देकर अपने पक्ष में मिला लिया और रोहतास पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया.

बक्सर का युद्ध

मुनरो सोन नदी पार कर बक्सर पहुँचा. 23 अक्टूबर, 1764 ई. को अँगरेज़ और तथाकथित तीन शक्तियों की सम्मिलित सेना के बीच युद्ध प्रारम्भ हुआ. शुजाउद्दौला ने प्रतिदिन सैनिक खर्च के नाम पर मीरकासिम से 11 लाख रुपये की माँग की, परन्तु उतनी रकम पूरी नहीं करने पर वह मीरकासिम से असंतुष्ट हो गया. शुजाउद्दौला ने मीरकासिम की सारी संपत्ति छीन ली. वह खुद बिहार पर अधिकार चाहता था. दूसरी तरफ सम्राट शाहआलम के पास अपनी कोई सेना नहीं थी. वह स्वयं दिल्ली की गद्दी पाने के लिए सहायता का इच्छुक था और अंग्रेजों का आश्वासन पाकर युद्ध के प्रति उदासीन हो चुका था. ऐसी परिस्थिति में बक्सर का युद्ध (Battle of Buxar) प्रातः 9 बजे से आरम्भ हुआ और दोपहर 12 बजे के पहले ही समाप्त हो गया था. युद्ध में भयंकर गोलाबारी हुई. शुजाउद्दौला की सेना मात्र भीड़ के सामान थी. अंग्रेजी तोपों के सामने अवध की घुड़सवार फ़ौज कोई काम न आ सकी. विजय अंग्रेजों की हुई. दोनों पक्षों की ओर से काफी सेना हताहत हुई पर नवाब की सेना में मरनेवालों की संख्या काफी अधिक थी. शुजाउद्दौला को अपनी सेना पीछे हटा लेनी पड़ी.

शुजाउद्दौला और अंग्रेजों की संधि

बक्सर के युद्ध (Battle of Buxar) में मिली पराजय के बाद सम्राट शाहआलम ने अंग्रेजी सेना के साथ डेरा डाला. अंग्रेजों ने बादशाह का स्वागत किया और शुजाउद्दौला के दीवान राजा बेनीबहादुर के जरिये शुजाउद्दौला से संधि करनी चाही. पर शुजाउद्दौला ने संधि की बात अस्वीकार कर दी. इसलिए नवाब शुजाउद्दौला और अंग्रेजों के बीच चुनार और कड़ा (इलाहाबाद) के पास लड़ाइयाँ हुईं. युद्ध में हार मिलने पर शुजाउद्दौला को अंग्रेजों के साथ संधि करनी पड़ी. अंग्रेजों और शुजाउद्दौला के बीच संधि करने में राजा सिताबराय की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण थी. शुजाउद्दौला को 60 लाख रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में अंग्रेजों को देने पड़े. इलाहबाद का किला और कड़ा का क्षेत्र मुगम बादशाह शाहआलम के लिए छोड़ देने पड़े. गाजीपुर और पड़ोस का क्षेत्र अंग्रेजों को देना पड़ा. एक अंग्रेज़ वकील को अवध के दरबार में रहने की आज्ञा दी गई और दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के शत्रु को अपना शत्रु समझने का आश्वासन दिया.

मीरकासिम का सपना चकनाचूर हो गया. सम्पत्ति छीन लिए जाने के साथ-साथ शुजाउद्दौला ने उसे अपमानित भी किया. मीरकासिम दिल्ली चला गया जहाँ शरणार्थी के रूप में अपना शेष जीवन अत्यंत कठनाई में व्यतीत किया.

परिणाम (Results)

भारत के निर्णायक युद्धों में बक्सर के युद्ध का परिणाम अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है. बक्सर का युद्ध बंगाल में तीसरी क्रांति का प्रतीक था. पहली क्रान्ति प्लासी के युद्ध से शुरू हुई और 1760 ई. में मीरजाफर को हटाकार मीरकासिम को नवाब बनाने के साथ दूसरी क्रान्ति पूरी हुई. अंग्रेजों द्वारा बंगाल में जो नाटक खेला जा रहा था उसके तीसरे और अंतिम दृश्य का पटाक्षेप बक्सर के युद्ध (Battle of Buxar) के रूप में हुआ.

    1. बंगाल पर अंग्रेजों का वास्तविक रूप से अधिकार हो गया और उत्तर भारत का राजनीति पर उनका प्रभाव बढ़ गया.
    2. बक्सर के युद्ध में अवध के नवाब शुजाउद्दौला की पराजय से उत्तर भारत में कोई दूसरी शक्ति नहीं रही जो अंग्रेजों का विरोध कर सकती थी.
    3. शुजाउद्दौला ने अंग्रेजों के साथ मित्रता कर ली और दिल्ली का सम्राट शाहआलाम बंगाल के नवाब की तरह अंग्रेजों की सैनिक सहायता पर निर्भर रहने लगा.
    4. शाहआलम अंग्रेजों का वास्तविक अधिकार बंगाल और बिहार में स्वीकार करने को तैयार था. मुग़ल सम्राट नाममात्र का अपना अधिकार सुरक्षित रखकर अंग्रेजों से किसी प्रकार समझौता करना चाहता था.
    5. बंगाल के नवाब के अधिकार को ख़त्म कर दिया गया. बंगाल के नवाब को सीमित संख्या में सेना रखने की इजाजत दी गई ताकि भविष्य में वह मीरकासिम की तरह अंग्रेजों का विरोध न कर सके.
    6. बंगाल के नवाब के यहाँ एक अंग्रेज़ प्रतिनिधि रहने लगा ताकि अंग्रेजों के खिलाफ कोई षड्यंत्र न रचा जाए.
    7. बक्सर के युद्ध में अंग्रेजों को जितनी हानि उठानी पड़ी उसकी क्षतिपूर्ति मीरजाफर को करनी पड़ी.
    8. इस प्रकार बंगाल का नवाब मीरजाफर, अवध का नवाब शुजाउद्दौला और दिल्ली सम्राट शाहआलम तीनों अंग्रेजों की दया पर निर्भर थे.

स्वाभविक रूप से बक्सर के युद्ध (Battle of Buxar) के बाद भारतीय राजनीति में अंग्रेजों के प्रभुत्व और प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई. बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिल जाने से अंग्रेजों की माली हालत अच्छी हो गई. उत्तर भारत में सत्ता-विस्तार का द्वार खुल गया. मराठों के साथ संघर्ष करने के लिए अंग्रेज़ तत्पर हो गए और अंत में भारत-विजय करने में वे सफल रहे.

1757 इस्वी का प्लासी का युद्ध और भारत

प्लासी का युद्ध -  1757 

प्लासी का युद्ध  बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कंपनी के संघर्ष का परिणाम था. इस युद्ध के अत्यंत महत्त्वपूर्ण तथा स्थाई परिणाम निकले. 1757 ई. में हुआ प्लासी का युद्ध ऐसा युद्ध था जिसने भारत में अंग्रेजों की सत्ता की स्थापना कर दी.

बंगाल की तत्कालीन स्थिति और अंग्रेजी स्वार्थ ने East India Company को बंगाल की राजनीति में हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान किया. अलीवर्दी खां, जो पहले बिहार का नायब-निजाम था, ने औरंगजेब की मृत्यु के बाद आई राजनैतिक उठा-पटक का भरपूर लाभ उठाया. उसने अपनी शक्ति बहुत बढ़ा ली. वह एक महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था. उसने बंगाल के तत्कालीन नवाब सरफराज खां को युद्ध में हराकर मार डाला और स्वयं नवाब बन गया.

9 अप्रैल को अलीवर्दी खां की मृत्यु हो गई. अलीवर्दी खां की अपनी कोई संतान नहीं थी इसलिए उसकी मृत्यु के बाद अगला नवाब कौन होगा, इसके लिए कुछ लोगों में उत्तराधिकार के लिए षड्यंत्र होने शुरू हो गए. पर अलीवर्दी ने अपने जीवनकाल में ही अपनी सबसे छोटी बेटी के पुत्र सिराजुद्दौला को उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया था. अंततः वही हुआ भी. सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना.

सिराजुद्दौला

सिराजुद्दौला भले ही नवाब बन गया पर उसे कई विरोधियों का सामना करना पड़ा. उसकी सबसे बड़ी विरोधी और प्रतिद्वंदी उसके परिवार से ही थी और वह थी उसकी मौसी. उसकी मौसी का नाम घसीटी बेगम था. घसीटी बेगम का पुत्र शौकतगंज जो स्वयं पूर्णिया (बिहार) का शासक था, उसने अपने दीवान अमीनचंद और मित्र जगत सेठ के साथ सिराजुद्दौला को परास्त करने का सपना देखा. मगर सिराजुद्दौला पहले से ही सावधान हो चुका था. उसने सबसे पहले घसीटी बेगम को कैद किया और उसका सारा धन जब्त कर लिया. इससे शौकतगंज भयभीत हो गया और उनसे सिराजुद्दौला के प्रति वफादार रहने का वचन दिया. पर सिराजुद्दौला ने बाद में उसे युद्ध में हराकर मार डाला.

इधर ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी स्थिति मजबूत कर चुकी थी. दक्षिण में फ्रांसीसियों को हराकर अंग्रेजों के हौसले बुलंद थे. मगर वे बंगाल में भी अपना प्रभुत्व जमाना चाहते थे. पर अलीवर्दी खां ने पहले से ही सिराजुद्दौला को सलाह दे दिया था कि किसी भी हालत में अंग्रेजों का दखल बंगाल में नहीं होना चाहिए. इसलिए सिराजुद्दौला भी अंग्रेजों को लेकर सशंकित था.

सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच संघर्ष

  1. सिराजुद्दौला ने अंग्रेजों को फोर्ट विलियम किले को नष्ट करने का आदेश दिया जिसको अंग्रेजों ने ठुकरा दिया. गुस्साए नवाब ने मई, 1756 में आक्रमण कर दिया. 20 जून, 1756 ई. में कासिमबाजार पर नवाब का अधिकार भी हो गया.
  2. उसके बाद सिराजुद्दौला ने फोर्ट विलियम पर भी अधिकार कर लिया. अधिकार होने के पहले ही अंग्रेज़ गवर्नर ड्रेक ने अपनी पत्नी और बच्चों के साथ भागकर फुल्टा नामक एक द्वीप में शरण ले ली. कलकत्ता में बची-खुची अंग्रेजों की सेना को आत्मसमर्पण करना पड़ा. अनेक अंग्रेजों को बंदी बनाकर और मानिकचंद के जिम्मे कलकत्ता का भार सौंपकर नवाब अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद लौट गया.
  3. ऐसी ही परिस्थिति में 'काली कोठरी” की दुर्घटना (The Black Hole Tragedy) घटी जिसने अंग्रेजों और बंगाल के नवाब के सम्बन्ध को और भी कटु बना दिए. कहा जाता है कि 146 अंग्रेजों, जिनमें उनकी स्त्रियाँ और बच्चे भी थे, को फोर्ट विलियम के एक कोठरी में बंद कर दिया गया था जिसमें दम घुटने से कई लोगों की मौत हो गई थी.
  4. जब इस घटना की खबर मद्रास पहुँची तो अंग्रेज़ बहुत गुस्से में आ गए और उन्होंने सिराजुद्दौला से बदला लेने की ठान ली. शीघ्र ही मद्रास से क्लाइव (Lord Clive) और वाटसन थल सेना लेकर कलकत्ता की ओर बढ़े और नवाब के अधिकारीयों को रिश्वत देकर अपने पक्ष में कर लिया. परिणामस्वरूप मानिकचंद ने बिना किसी प्रतिरोध के कलकत्ता अंग्रेजों को सौंप दी. बाद में अंग्रेजों ने हुगली पर भी अधिकार कर लिया. ऐसी स्थिति में बाध्य होकर नवाब को अंग्रेजों से समझौता करना पड़ा.

अलीनगर की संधि

9 फ़रवरी, 1757 को क्लाइव ने नवाब के साथ एक संधि (अलीनगर संधि) की जिसके अनुसार मुग़ल सम्राट द्वारा अंग्रेजों को दी गई सारी सुविधायें वापस मिली जानी थीं. नवाब को लाचार होकर अंग्रेजों को सारी जब्त फैक्टरियाँ और संपत्तियाँ लौटाने के लिए बाध्य होना पड़ा. कम्पनी को नवाब की तरफ से हर्जाने की रकम भी मिली. नवाब अन्दर ही अन्दर बहुत अपमानित महसूस कर रहा था.

प्लासी का युद्ध

अंग्रेज़ इस संधि से भी संतुष्ट नहीं हुए. वे सिराजुद्दौला को गद्दी से हटाकर किसी वफादार नवाब को बिठाना चाहते थे जो उनके कहे अनुसार काम करे और उनके काम में रोड़ा न डाले. क्लाइव ने नवाब के खिलाफ षड्यंत्र करना शुरू कर दिया. उसने मीरजाफर (Mir Jafar) से एक गुप्त संधि की और उसे नवाब बनाने का लोभ दिया. इसके बदले में मीरजाफर ने अंग्रेजों को कासिम बाजार, ढाका और कलकत्ता की किलेबंदी करने, 1 करोड़ रुपये देने और उसकी सेना का व्यय सहन करने का आश्वासन दिया. इस षड्यंत्र में जगत सेठ, राय दुर्लभ और अमीचंद भी अंग्रेजों से जुड़ गए.

अब क्लाइव ने नवाब पर अलीनगर की संधि भंग करने का आरोप लगाया. इस समय नवाब की स्थिति अत्यंत दयनीय थी. दरबारी-षड्यंत्र और अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण से उत्पन्न खतरे की स्थिति ने उसे और भी भयभीत कर दिया. उसने मीरजाफर को अपनी तरफ करने की कोशिश भी की पर असफल रहा. नवाब की कमजोरी को भाँपकर क्लाइव ने सेना के साथ प्रस्थान किया. नवाब भी राजधानी छोड़कर आगे बढ़ा. 23 जून, 1757 को प्लासी के मैदान में दोनों सेनाओं की मुठभेड़ हुई. यह युद्ध नाममात्र का युद्ध था. नवाब की सेना के एक बड़े भाग ने युद्ध में हिस्सा नहीं लिया. आंतरिक कमजोरी के बावजूद सिराजुद्दौला की सेना, जिसका नेतृत्व मीरमदन और मोहनलाल कर रहे थे, ने अंग्रेजों की सेना का डट कर सामना किया. परन्तु मीरजाफर के विश्वासघात के कारण सिराजुद्दौला को हारना पड़ा. वह जान बचाकर भागा, परन्तु मीरजाफर के पुत्र मीरन ने उसे पकड़वा कर मार डाला.

युद्ध के परिणाम

प्लासी के युद्ध (The Battle of Plassey) के परिणाम अत्यंत ही व्यापक और स्थायी निकले. इसका प्रभाव कम्पनी, बंगाल और भारतीय इतिहास पर पड़ा.

  1. मीरजाफर को क्लाइव ने बंगाल का नवाब घोषित कर दिया. उसने कंपनी और क्लाइव को बेशुमार धन दिया और संधि के अनुसार अंग्रेजों को भी कई सुविधाएँ मिलीं.
  2. बंगाल की गद्दी पर एक ऐसा नवाब आ गया जो अंग्रेजों के हाथों की कठपुतली मात्र था.
  3. प्लासी के युद्ध (The Battle of Plassey) ने बंगाल की राजनीति पर अंग्रेजों का नियंत्रण कायम कर दिया.
  4. अंग्रेज़ अब व्यापारी से राजशक्ति के स्रोत बन गये.
  5. इसका नैतिक परिणाम भारतीयों पर बहुत ही बुरा पड़ा. एक व्यापारी कंपनी ने भारत आकर यहाँ से सबसे अमीर प्रांत के सूबेदार को अपमानित करके गद्दी से हटा दिया और मुग़ल सम्राट तमाशा देखते रह गए.
  6. आर्थिक दृष्टिकोण से भी अंग्रेजों ने बंगाल का शोषण करना शुरू कर दिया.
  7. इसी युद्ध से प्रेरणा लेकर क्लाइव ने आगे बंगाल में अंग्रेजी सत्ता स्थापित कर ली.
  8. बंगाल से प्राप्त धन के आधार पर अंग्रेजों ने दक्षिण में फ्रांसीसियों पर विजय प्राप्त कर लिया.

750-1000 इस्वी का भारत

पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट

750-1000 ईस्वी के मध्य उत्तर भारत और डेक्कन में कई शक्तिशाली साम्राज्य पैदा हुए। जिनमें पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट सबसे महत्वपूर्ण थे।

पाल:

पाल राजवंश की स्थापना 750 ईस्वी में गोपाल द्वारा की गयी थी जो पहले एक मुखिया था लेकिन बाद में बंगाल का राजा बन गया था। वास्तव में वह बंगाल का पहला बौद्ध राजा था। गौ़ड राजवंश को उनके गढ़ कामरूप में शिकस्त देने के बाद उसने अपना प्रभुत्व स्थापित किया था। जब उसकी मृत्यु हुयी थी तब बंगाल और बिहार के अधिकांश हिस्से उसके नियंत्रण में थे। बिहार के ओदंतपुरी में एक मठ के निर्माण का श्रेय गोपाल को जाता है।

गोपाल का उत्तराधिकारी धर्मपाल बना था। उसने 770-810 ईस्वी की अवधि के दौरान शासन किया था। उसके शासनकाल के दौरान पाल साम्राज्य उत्तर और पूर्वी भारत में सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बन गया था।

उसने गुर्जर प्रतिहार और राष्ट्रकूटों के खिलाफ एक लंबे समय तक युद्ध लड़ा। गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय के खिलाफ अपनी शर्मनाक हार के बावजूद वह पाल साम्राज्य की प्रतिष्ठा बचाने में कामयाब रहा और अपने साम्राज्य को पूरे बंगाल तथा बिहार तक विस्तारित किया।

एक प्रसिद्ध बौद्ध राजा धर्मपाल ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की जो भारत में बौद्ध धर्म के अध्ययन का एक प्रसिद्ध केंद्र था। यह विश्वविद्यालय बिहार में भागलपुर के कहलगांव में स्थित है।

धर्मपाल का उत्तराधिकारी देवपाल बना था। उसने अपने साम्राज्य को असम, ओडिशा और कामरूप तक विस्तारित किया। उसके शासनकाल के दौरान पाल सेनाओं ने एक बहुत ही सफल अभियान को अंजाम दिया था।

देवपाल के बाद ऐसे राजा सिंहासन पर विराजमान हुए जो बहुत ही कम जाने जाने थे। तत्पश्चात महिपाल पाल साम्राज्य का राजा बन गया था। उसने 995 ईसवी से 1043 ईसवी तक शासन किया था। उसे पाल राजवंश के दूसरे संस्थापक के रूप में जाना जाता है, उसने पाल साम्राज्य के सभी खोए हुए प्रदेशों को फिर से हासिल कर लिया था।

महिपाल के उत्तराधिकारी कमजोर थे और साम्राज्य पर अपनी पकड़ बरकरार नहीं रख सके थे।

प्रतिहार

गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना 6 वीं शताब्दी ईस्वी में हरीचंद्र द्वारा की गयी थी। वे 11 वीं सदी तक प्रभावशाली बने रहे थे। यह कहा जाता है कि उनका उदय उज्जैन या मंदसौर से हुआ था। नागभट्ट- प्रथम इस वंश का पहला महत्वपूर्ण शासक था। उसने 730 ईसवी से 756 ईसवी तक शासन किया था। उनके साम्राज्य में ग्वालियर,  भरूच और मालवा शामिल था। उसके साम्राज्य की राजधानी अवनि थी।

नागभट्ट प्रथम की उपलब्धि: उसने जुनैद, अरब कमांडर और उसके उत्तराधिकारी तमिन को राजस्थान के युद्ध में पराजित कर दिया था। इससे उसने सफलतापूर्वक अरब आक्रमण के खिलाफ पश्चिमी सीमाओं का बचाव किया था।

वत्सराज एक नये राजा के रूप में नागभट्ट प्रथम का उत्तराधिकारी बना और पाल राजा धर्मपाल को हराकर उसने कन्नौज पर अधिकार स्थापित कर लिया था।

नागभट्ट द्वितीय 805 ईस्वी के आसपास वत्सराज का उत्तराधिकारी बना था। वास्तव में, वह गुर्जर प्रतिहार राजवंश का सबसे प्रख्यात राजा था। उसे, विशेषकर 815 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए जाना जाता है। मंदिर को 725 ईस्वी में जूनायड की अरब सेनाओं ने नष्ट कर दिया गया था।

मिहिरभोज इस वंश का अन्य मुख्य राजा था। उसका शासनकाल 885 ईस्वी तक चला था। वह एक महान साम्राज्य निर्माता था। उसने युद्धों की एक श्रृखंलाओं में विजय प्राप्त करने के बाद गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान के प्रदेशों पर कब्जा कर लिया था। उसने अधिवर्हा का खिताब प्राप्त किया था और ग्वालियर में तेली मंदिर का निर्माण किया था।

हालांकि, 10 वीं सदी में गुर्जर प्रतिहारों की शक्ति में कमी आयी थी और उनके राजा भोज द्वितीय को पाल राजा महिपाल-प्रथम द्वारा शिकस्त का सामना करना पडा था। जल्द ही साम्राज्य विघटित हो गया और सामंतों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था।

राष्ट्रकूट

राष्ट्रकूट कन्नड़ मूल के थे और उनकी मातृभाषा कन्नड़ थी। राष्ट्रकूट वंश की स्थापना 8 वीं सदी में दन्तिदुर्ग द्वारा की गयी थी। उसने डेक्कन में राष्ट्रकूटों को एक सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उसने गुर्जरों को हराने के बाद मालवा पर आधिपत्य कर लिया था। उसने कीर्तिवर्मन द्वितीय को भी पराजित कर चालुक्य राज्य पर आधिपत्य स्थापित कर लिया था।

उसका उत्तराधिकारी कृष्ण प्रथम था जो एक महान साम्राज्य निर्माता था। कृष्ण प्रथम ने वेंगी के पूर्वी चालुक्यों और गंगों के खिलाफ विजय प्राप्त की थी। उसे एलोरा की चट्टानों को काटकर विशालकाय कैलाश मंदिर के निर्माण के लिए जाना जाता है। उसका उत्ताराधिकारी गोविंदा तृतीय रहा था।

अमोघवर्ष प्रथम (815-880 ईस्वी) गोविंदा तृतीय का उत्तराधिकारी बना जिसका शासनकाल अपने सांस्कृतिक विकास के लिए लोकप्रिय था। उसने जैन धर्म का पालन किया। वह कन्नड़ भाषा लिखित एक प्रसिद्ध पुस्तक कविराजमार्ग का भी लेखक था। वह राष्ट्रकूट राजधानी मलखेड या मन्याखेड़ का भी वास्तुकार था।

अमोघवर्ष प्रथम का उत्तराधिकारी कृष्ण तृतीय (936-968 ईस्वी) बना था। जिसे पड़ोसी राज्यों के खिलाफ अपने विजयी अभियान के लिए जाना जाता था। उसने तक्कोतम में चोलों के खिलाफ विजय प्राप्त की थी।

उसने तंजौर के साथ-साथ रामेश्वरम पर भी कब्जा कर लिया था। अमोघवर्ष ने कई मंदिरों का भी निर्माण करवाया था जिनमें रामेश्वरम का कृष्णस्वारा मंदिर भी शामिल था।

उसकी मृत्यु के बाद राष्ट्रकूटों की शक्ति में कमी आई थी।

अकबर का दीन ए ईलाही धर्म

दीन-ए-ईलाही - Din-i-Illahi Information in Hindi

दीन-ए-ईलाही (Din-i-Illahi) अथवा तौहीद-ए-ईलाही की स्थापना धार्मिक क्षेत्र में अकबर का सबसे महत्त्वपूर्ण और विवादास्पद कार्य था. इबादतखाना बंद करवाने और महजर की घोषणा के बाद भी अकबर धार्मिक मामलों में अत्यधिक रूचि लेता था. अपने अनुभव, विद्वानों के विचारों से अकबर इस निर्णय पर पहुँचा कि सभी धर्मों का मूल तत्त्व एक ही है. भले ही लोगों के पास अलग-अलग भगवान् के नाम हैं पर सभी धर्म अदृश्य शक्ति की सार्वभौमिकता को ही स्वीकार करते हैं और उसकी कृपा से सांसारिक कष्टों से निवारण चाहते हैं.

धार्मिक विभिन्नताओं और मतभेदों को दूर करने के लिए, सम्पूर्ण देश में एकता और सामंजस्य की स्थापना करने के उद्देश्य से अकबर ने एक ऐसी धर्म की कल्पना की जिसमें सभी धर्मों की अच्छी बातें सम्मिलित हों और जिसे हर कोई सहज स्वीकार कर ले.

अकबर की मंशा

दीन-ए-ईलाही (Din-i-Illahi) को एक धर्म के रूप में पेश करने के पीछे अकबर की दो मंशाएँ थीं. पहला कि सभी जातियों और धार्मिक सम्प्रदाय के लोग एक सूत्र में बंध जाएँ जिससे उसके साम्राज्य में स्थिरता आये और सभी राजा और धर्म के प्रति एक ही दृष्टिकोण रखें. दूसरी मंशा यह थी कि अकबर खुद को राष्ट्रीय सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित करवाना चाहता था. उसकी इच्छा थी कि प्रजा उसे भगवान् का प्रतिनिधि मान ले और विद्रोहात्मक रवैया त्याग दे. नए धर्म का उद्देश्य सभी धर्मों में समन्वय और एकता स्थापित करना भी था.

दीन-ए-ईलाही का निर्माण

1582 ई. में अकबर ने धार्मिक नेताओं, महत्त्वपूर्ण सरदारों और अन्य गण्यमान्य व्यक्तियों की सभा बुलाई और उनसे अनुरोध किया कि वे कोई ऐसा मार्ग निकालें जिससे साम्प्रदायिक भेदभाव को भूलकर सभी व्यक्ति शास्वत धर्म के सार्वभौम, सर्वमान्य आचरणयुक्त सिद्धांतों के अनुयायी बन सकें. फलतः अकबर ने 1582 ई. में तौहीद-ए-इलाही (दैवी एकेश्वरवाद) की घोषणा की जो बाद में दीन-ए-ईलाही (ईश्वर का धर्म) के नाम से विख्यात हुआ. सच तो यह है कि दीन-ए-ईलाही (Din-i-Illahi) किसी प्रकार का धर्म नहीं था. यह एक ऐसा विचार था जिससे कुछ व्यक्तियों का समूह अकबर के विचारों से सहमत था और उसे अपना धर्म गुरु मानता था.

दीन-ए-ईलाही का स्वरूप

  1. अकबर के धर्म का पालन करने वालों को निश्चित नियमों का पालन करना पड़ता था.
  2. गुरु सर्वोच्च माना जाता था.
  3. दबिस्तान मजाहिब में इस धर्म के पालन करने वालों के लिए दिशा-निर्देश दिए गए थे.
  4. दीन-ए-ईलाही (Din-i-Illahi) के अनुयायियों को यह स्वीकार करना पड़ता था कि ईश्वर एक है और उसका प्रतिनिधि अकबर है और वे उसके शिष्य हैं.
  5. हर रविवार को अकबर अपने शिष्यों को दीक्षा देकर इस धर्म में प्रवेश करवाता था.
  6. नए शिष्य को अकबर के सामने ही धर्म स्वीकार करना पड़ता था. इसके बदले अकबर उसे पगड़ी पहनाता था जिसपर 'अल्लाह हो अकबर” लिखा होता था.
  7. इस धर्म को स्वीकार करने वालों को अपने मूल धर्म को छोड़ने की अनिवार्यता नहीं थी.
  8. नए धर्म के अवलम्बियों के लिए निरामिष होना जरूरी था.
  9. दान आदि कर्मों पर विशेष बल दिया गया था.
  10. सम्राट के प्रति श्रद्धा और भक्ति तथा अग्नि की पूजा अनिवार्य थी.
  11. रजस्वला और गर्भवती स्त्रियों के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने पर भी पाबंदी थी.
  12. दीन-ए-ईलाही (Din-i-Illahi) में चार श्रेणी के अनुयायी थे. पहली श्रेणी में जो अनुयायी आते थे वे अकबर के लिए अपनी सम्पत्ति समर्पित करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे. दूसरी श्रेणी में जो आते थे वे सम्पत्ति एवं अपना जीवन अर्पण करने को भी तैयार रहते थे. तीसरी श्रेणी के अनुयायी धन और जीवन के साथ-साथ सम्राट के लिए अपनी संतान को भी निछावर करने को तैयार थे. अंतिम या चौथी श्रेणी में जो सदस्य थे वे अपना सब कुछ सम्राट के लिए अर्पण करने को तैयार रहते थे.

Din-i-Illahi का प्रसार

अब प्रश्न उठता है कि दीन-ए-ईलाही को कितने लोगों ने स्वीकारा? दरअसल अकबर का यह धर्म अधिक व्यापक नहीं हो पाया. अकबर के जीवनकाल में ही इस धर्म को मानने वालों की संख्या कम थी. न हिन्दू ने और न मुसलमान ने इस धर्म को स्वीकारा. राज्य के 22 महत्त्वपूर्ण लोगों ने ही दीन-ए-ईलाही (Din-i-Illahi) धर्म को स्वीकारा. इन 22 महत्त्वपूर्ण लोगों में बीरबल ही एकमात्र हिन्दू था जिसने दीन-ए-ईलाही को स्वीकारा. कट्टर मुसलामानों ने अकबर के द्वारा इस्लाम धर्म और प्रथाओं पर किये गए किए गए आघातों के कारण उसके इस नए धर्म को ठुकरा दिया. सूफी संत शेख़ अहमद सरहिंदी (Shaykh Ahmad Sirhindi) ने अकबर के इस धर्म का प्रबल विरोध किया. उसका मानना था कि अकबर का यह धर्म इस्लाम की अवमानना करने के बराबर है. नए धर्म के लोकप्रिय नहीं होने के पीछे अनेक कारण थे. एक कारण यह भी हो सकता है कि अकबर ने दीन-ए-ईलाही धर्म को स्वीकारने के लिए जनता को बाध्य नहीं किया. यह धर्म अकबर के इर्द-गिर्द सम्मानित लोगों में ही सिमटकर रह गया. अकबर की मृत्यु के बाद दीन-ए-ईलाही भी समाप्त हो गया.

14 वी शाताब्दी और दिल्ली का सल्तनत(अफगानिस्तान, पाकिस्तान,बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड और इंडिया ये सब हिन्दुस्तान ही था)

दिल्ली सल्तनत के दौरान आर्थिक स्थितियां

एक यात्री इब्न बतूता जो चौदहवीं शताब्दी के दौरान उत्तरी अफ्रीका से भारत आया था, के अनुसार राज्य में कृषि की स्थिति अत्यंत संपन्न थी। मिट्टी काफी उपजाऊ थी जिस पर प्रति वर्ष दो फसलों का उत्पादन किया जाता था। चावल साल में तीन बार बोया जाता था। इस अवधि के दौरान कई खूबसूरत मस्जिदों, महलों, किलों और स्मारकों का निर्माण किया गया था जिससे इस अवधि की भव्यता के बारे में पता चलता है। इस अवधि के दौरान, सुल्तानों, स्वतंत्र प्रांतीय राज्यों के शासकों और रईसों के पास अकूत धन संपदा थी जिससे वे राजशी और खुशी का जीवन व्यतीत करते थे।

कृषि

  • कृषि, व्यवसाय का एक प्रमुख स्रोत था।
  • भूमि, उत्पादन का स्रोत होती थी। उपज आम तौर पर पर्याप्त होती थी।
  • पुरूष, फसलों की देखभाल और कटाई करते थे;
  • महिलाएं जानवरों की देखभाल करती थी।

 कृषि समाज के अन्य भाग थे:

  • बढ़ई, जो औजार बनाते थे 
  • लोहार, लौह उपकरणों की आपूर्ति करता था।
  • कुम्हार, घर के बर्तन बनाता था।
  • मोची, जूते सीने का काम करता था।
  • पुजारी, शादी और अन्य समारोहों को संपन्न कराता था।
  • यहां कुछ सहायक कार्य भी होते थे जिनमें साहूकार, धोबी, सफाई कर्मचारी, चरवाहे और नाई शामिल थे।
  • खेती पूरे गांव के जीवन की धुरी थी।
  • प्रमुख फसलों में दलहन, गेहूं, चावल, गन्ना, जूट और कपास शामिल थे।
  • औषधीय जड़ी बूटियों और  मसालों का भी निर्यात किया जाता था।
  • उत्पादन स्थानीय खपत के लिए किया जाता था।
  • कस्बे, कृषि उत्पादों और औद्योगिक वस्तुओं के वितरण के केंद्र के रूप में कार्य करते थे।
  • राज्य वस्तु के रूप में उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा रख लेता था।

उद्योग

  • यहां पर ग्रामीण और कुटीर उद्योग थे।
  • यहां पर कार्यरत श्रमिक परिवार के सदस्य होते थे।
  • रूढ़िवादी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता था।
  • इस अवधि के दौरान बुनाई और कपास की कताई जैसे कुटीर उद्योग होते थे।
  • सुल्तान जिन बडें उद्यमों का निर्माण कार्य अपने हाथों में लेते थे उन्हें "कारखानो" के रूप में जाना जाता था।
  • शिल्पकार सीधे तौर पर अधिकारियों की निगरानी में कार्यरत होते थे।
  • वस्त्र उद्योग इस समय के सबसे बड़े उद्योगों में से एक था।

व्यापार एवं वाणिज्य

  • सुल्तानों के शासनकाल के दौरान अंतर्देशीय और विदेशी व्यापार में काफी समृद्धि हुयी थी।
  • आंतरिक व्यापार के लिए व्यापारियों और दुकानदारों के विभिन्न वर्ग होते थे।
  • प्रमुख रुप से उत्तर के गुजराती,  दक्षिण के छेती,  राजपूताना के बंजारे मुख्य व्यापारी होते थे।
  • वस्तुओं के बड़े सौदों 'मंडियों'  में किये जाते थे।
  • मूल बैंकरों या बैंको का उपयोग ऋण देने के लिए और जमा प्राप्त करने के लिए किया जाता था।
  • आयात की मुख्य वस्तुए रेशम, मखमल, कशीदाकारी सामान, घोड़े, बंदूकें, बारूद, और कुछ कीमती धातुएं होती थी।
  • निर्यात की मुख्य वस्तुएं अनाज, कपास, कीमती पत्थर, इंडिगो, खाल, अफीम, मसाले और चीनी होते थे।
  • वाणिज्य में भारत से प्रभावित देशों में इराक, फारस, मिस्र, पूर्वी अफ्रीका, मलाया, जावा, सुमात्रा, चीन, मध्य एशिया और अफगानिस्तान शामिल थे।
  • जलमार्ग पर नावीय परिवहन और समुंद्री व्यापार वर्तमान की तुलना में अत्यधिक विकसित था।
  • बंगाल, चीनी और चावल के साथ नाजुक मलमल और रेशम का निर्यात करता था।
  • कोरोमंडल का तट कपड़े का एक केंद्र बन गया था।
  • गुजरात अब विदेशी माल का प्रवेश बिंदु हो गया था।

यूरोपीय व्यापार

  • 16 वीं सदी के मध्य और 18 वीं सदी के मध्य के बीच भारत के विदेशी व्यापार में तेजी वृद्धि हुयी थी।
  • इसका मुख्य कारण विभिन्न यूरोपीय कंपनियों की व्यापारिक गतिविधियां थी जो इस अवधि के दौरान भारत आई थीं।
  • लेकिन 7वीं शताब्दी ईस्वी से उनका समुद्री व्यापार अरबों के हाथों में चला गया जिनका हिंद महासागर और लाल सागर में बोलबाला था।
  • अरबों, और वेनेटियनों द्वारा भारतीय व्यापार के इस एकाधिकार को पुर्तगालियों द्वारा भारत के साथ प्रत्यक्ष व्यापार की मांग से तोड़ा जा सका था।
  • भारत में पुर्तगालियों का आगमन अन्य यूरोपीय समुदाय के आगमन के बाद हुआ था और जल्द ही भारत के तटीय और समुद्री व्यापार पर गोरों ने एकाधिकार स्थापित कर लिया था।

कर प्रणाली:

दिल्ली सल्तनत के सुल्तान द्वारा पांच श्रेणियों में कर एकत्र किया जाता था जिससे साम्राज्य की आर्थिक प्रणाली में गिरावट आयी थी।

ये कर थे:

  • उशर,
  • खराज,
  • खम्स,
  • जजिया और
  • जकात।
  • व्यय की मुख्य वस्तुएं सेना के रखरखाव, नागरिक अधिकारियों के वेतन और सुल्तान के निजी व्यय पर खर्च किये जाते थे।

परिवहन और संचार:

  • परिवहन के सस्ते और पर्याप्त साधन थे।
  • सड़कों पर सुरक्षा संतोषजनक थी और बीमा द्वारा कवर किया जा सकता था।
  • इस समय में मुख्य राजमार्गों के 5 कोस पर सरायों के साथ यात्रा करना यूरोप की तुलना में अच्छा था। इस कारण लोगों में सुरक्षा की भावना होती थी।
  • मुगलों ने सड़कों और सरायों की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया था जिससे संचार आसान हो गया था।
  • सम्राज्य में प्रवेश के समय माल पर वस्तु कर लगाया जाता था।
  • सड़क मामलों या राहदरी को अवैध घोषित किया गया था, हालांकि कुछ स्थानीय राजाओं के कुछ लोगों द्वारा इसे एकत्र करना जारी रखा गया था जिसका प्रयोग अच्छी सड़कों को बनाए रखने के लिए किया जाता था।
  • सल्तनत काल उस अवधि के दौरान सबसे स्वर्णिम दौर था जिसका फायदा भारतीय दोनों ने उठाया था।

 

पानीपत(हरियाणा) की लड़ाई और बदलता भारत

तीनों पानीपत युद्धों का संक्षिप्त विवरण 

पानीपत की प्रथम लड़ाई

पानीपत में तीन भाग्यनिर्णायक लडाईयाँ यहाँ हुई, जिन्होंने भारतीय इतिहास की धारा ही मोड़ दी. पानीपत की पहली लड़ाई -Panipat War 1 21 अप्रैल, 1526 ई. को दिल्ली के सुलतान इब्राहीम लोदी और मुग़ल आक्रमणकारी बाबर के बीच हुई. इब्राहीम के पास एक लाख संख्या तक की फ़ौज थी. उधर बाबर के पास मात्र 12,000 फ़ौज तथा बड़ी संख्या में तोपें थीं. रणविद्या, सैन्य-सञ्चालन की श्रेष्ठता और विशेषकर तोपों के नए और प्रभावशाली प्रयोग के कारण बाबर ने इब्राहीम लोदी के ऊपर निर्णयात्मक विजय प्राप्त की. लोदी ने रणभूमि में ही प्राण त्याग दिया. पानीपत की पहली लड़ाई के फलस्वरूप दिल्ली और आगरा पर बाबर का दखल हो गया और उससे भारत में मुग़ल राजवंश का प्रचालन हुआ.

पानीपत की दूसरी लड़ाई

पानीपत की दूसरी लड़ाई -Panipat War 2 ( 5 नवम्बर, 1556 ई. को अफगान बादशाह आदिलशाह सूर के योग्य हिन्दू सेनापति और मंत्री हेमू और अकबर के बीच हुई, जिसने अपने पिता हुमायूँ से दिल्ली का तख़्त पाया था. हेमू के पास अकबर से कहीं अधिक बड़ी सेना थी. उसके पास 1500 हाथी भी थे. प्रारम्भ में मुग़ल सेना के मुकाबले में हेमू को सफलता प्राप्त हुई परन्तु संयोगवश एक तीर हेमू के आँख में घुस गया और यह घटना युद्ध में जीत रहे हेमू के हार का कारण बन गई. तीर लगने से हेमू अचेत होकर गिर पड़ा और उसकी सेना भाग खड़ी हुई. हेमू को गिरफ्तार कर लिया गया और उसे किशोर अकबर के सामने ले जाया गया. अकबर ने उसका सर धड़ से अलग कर दिया. पानीपत की दूसरी लड़ाई के फलस्वरूप दिल्ली और आगरा अकबर के कब्जे में आ गए. इस लड़ाई के फलस्वरूप दिल्ली के तख़्त के लिए मुगलों और अफगानों के बीच चलनेवाला संघर्ष अंतिम रूप से मुगलों के पक्ष में निर्णीत हो गया और अगले तीन सौ वर्षों तक दिल्ली का तख़्त मुगलों के पास रहा.

पानीपत की तीसरी लड़ाई -

पानीपत की तीसरी लड़ाई -Panipat War 3 ने भारत का भाग्य निर्णय कर दिया जो उस समय अधर में लटक रहा था. पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 ई. में हुआ. अफगान का रहने वाला अहमद अब्दाली वहाँ का नया-नया बादशाह बना था. अफगानिस्तान पर अधिकार जमाने के बाद उसने हिन्दुस्तान पर भी कई बार चढ़ाई की और दिल्ली के दरबार की निर्बलता और अमीरों के पारस्परिक वैमनस्य के कारण अहमद अब्दाली को किसी प्रकार की रुकावट का सामना नहीं करना पड़ा. पंजाब के सूबेदार की पराजय के बाद भयभीत दिल्ली-सम्राट ने पंजाब को अफगान के हवाले कर दिया. जीते हुए देश पर अपना सूबेदार नियुक्त कर अब्दाली अपने देश को लौट गया. उसकी अनुपस्थिति में मराठों ने पंजाब पर धावा बोलकर, अब्दाली के सूबेदार को बाहर कर दिया और लाहौर पर अधिकार जमा लिया. इस समाचार को सुनकर अब्दाली क्रोधित हो गया और बड़ी सेना ले कर मराठों को पराजित करने के लिए अफगानिस्तान से रवाना हुआ. मराठों ने भी एक बड़ी सेना एकत्र की, जिसका अध्यक्ष सदाशिवराव और सहायक अध्यक्ष पेशवा का बेटा विश्वासराव था. दोनों वीर अनेक मराठा सेनापतियों तथा पैदल-सेना, घोड़े, हाथी के साथ  पूना से रवाना हुए. होल्कर, सिंधिया, गायकवाड़ और अन्य मराठा-सरदारों ने भी उनकी सहायता की. राजपूतों ने भी मदद भेजी और 30 हजार सिपाही लेकर भरतपुर (राजस्थान) का जाट-सरदार सूरजमल भी उनसे आ मिला. मराठा-दल में सरदारों की एक राय न होने के कारण, अब्दाली की सेना पर फ़ौरन आक्रमण न हो सका. पहले हमले में तो मराठों को विजय मिला पर विश्वासराव मारा गया. इसके बाद जो भयंकर युद्ध हुआ उसमें सदाशिवराव मारा गया. मराठों का साहस भंग हो गया. पानीपत की पराजय तथा पेशवा की मृत्यु से सारा महाराष्ट्र निराशा के अन्धकार में डूब गया और उत्तरी भारत से मराठों का प्रभुत्व उठ गया.

1539 का हुमायूँ और बिहार का राजा शेरशाह सूरी की लड़ाई

चौसा  युद्ध - हुमायूँ Vs. शेरशाह 25 जून, 1539

आज हम चौसा के युद्के विषय में आपसे बात करेंगे. यह युद्ध हुमायूँ और शेरशाह के बीच हुआ था. चलिए देखते हैं इस युद्ध में कौन जीता, कौन हारा, ये युद्ध कब हुआ, क्या कारण  थे इस युद्ध के और इसके क्या परिणाम सामने आये.

चौसा का युद्ध

हमायूँ  का प्रबलतम शत्रु शेर खाँ था. बंगाल में विजय के बाद हुमायूँ निश्चिंत होकर आराम फरमाने लगा. बंगाल में हुमायूँ को आराम करता देख शेर खाँ ने क्रमशः चुनार, बनारस, जौनपुर, कन्नौज, पटना, इत्यादि पर अधिकार कर लिया. इन घटनाओं ने हुमायूँ को विचलित कर दिया. मलेरिया के प्रकोप से हुमायूँ की सेना कमजोर पड़ गयी थी इसलिए हुमायूँ ने सेना की एक छोटी से टुकड़ी छोड़कर आगरा के लिए कूच कर गया.

हमायूँ के वापस लौटने की सूचना पाकर शेर खाँ उर्फ़ शेरशाह ने मार्ग में ही हुमायूँ को घेरने का निश्चय किया. हुमायूँ ने वापसी में अनेक गलतियाँ कीं. सबसे पहले उसने अपनी सेना को दो भागों में बाँट दिया था. सेना की एक टुकड़ी दिलावर खाँ के अधीन मुंगेर (बिहार) पर आक्रमण करने को भेजी गई थी. सेना की दूसरी टुकड़ी के साथ हुमायूँ खुद आगे बढ़ा. हुमायूँ के सैन्य सलाहकारों ने उसे सलाह दिया था कि वह गंगा के उत्तरी किनारे से चलता हुआ जौनपुर पहुँचे और गंगा पार कर के शेरशाह/शेरखाँ पर हमला करे परन्तु उसने उन लोगों की बात नहीं मानी. वह गंगा पार कर दक्षिण मार्ग से ग्रैंड ट्रंक रोड से चला. यह मार्ग शेर खाँ के नियंत्रण में था. कर्मनासा नदी (Karmanasa River, Uttar Pradesh) के किनारे चौसा (Chausa) नामक स्थान पर उसे शेरशाह के होने का पता चला. इसलिए वह नहीं पार कर शेरशाह पर आक्रमण करने को उतारू हो उठा, लेकिन यहाँ भी उसने लापरवाही बरती. उसने तत्काल शेर खाँ पर आक्रमण करने को उतारू हो उठा, लेकिन यहाँ भी उसने लापरवाही बरती. उसने तत्काल शेरशाह पर आक्रमण नहीं किया. वह तीन महीनों तक गंगा नदी के किनारे समय बरबाद करता रहा. शेर खाँ ने इस बीच उसे धोखे से शान्ति-वार्ता में उलझाए रखा और अपनी तैयारी करता रहा. वस्तुतः वह बरसात की प्रतीक्षा कर रहा था.

शेरशाह की कूटनीति

वर्षा के शुरू होते ही शेर खाँ ने आक्रमण की योजना बनाई. हुमायूं का शिविर गंगा और कर्मनासा नदी के बीच एक नीची जगह पर था. अतः बरसात का पानी इसमें भर गया. मुगलों का तोपखाना नाकाम हो गया और सेना में अव्यवस्था व्याप्त गई. इसका लाभ उठा कर 25 जून, 1539 की रात्री में शेरशाह ने मुग़ल छावनी पर अचानक धोखे से आक्रमण कर दिया. मुग़ल खेमे में खलबली मच गई. सैनिक प्राण बचाने के लिए गंगा नदी में कूद गए. उनमें कुछ डूबे और कुछ अफगान सेनाओं के द्वारा मारे गए. हुमायूँ खुद भी अपनी जान बचाकर गंगा पार कर भाग गया. उसका परिवार खेमे में ही रह गया. हुमायूँ कुछ विश्वासी मुगलों की सहायता से आगरा पहुँच सका. हुमायूँ की पूरी सेना नष्ट हो गई.

युद्ध के परिणाम

  1. चौसा के युद्ध (Chausa War) के बाद हुमायूँ का पतन तय हो गया. उसकी सेना नष्ट हो चुकी थी. उसके परिवार के कुछ सदस्य भी इस युद्ध में मारे गए.
  2. अफगानों की शक्ति और महत्त्वाकांक्षाएँ पुनः बढ़ गयीं. अब वे मुगलों को भगाकर आगरा पर अधिकार करने की योजनाएँ बनाने लगे.
  3. शेर खाँ ने अब शेरशाह की उपाधि धारण कर ली.
  4. शेरशाह ने अपने नाम का 'खुतबा” पढ़वाया. सिक्के ढलवाये और फरमान जारी किए.
  5. उसने जलाल खाँ को भेजकर बंगाल पर अधिकार कर लिया और खुद बनारस, जौनपुर और लखनऊ होता हुआ कन्नौज जा पहुँचा.

800 सौ से लेकर 1200 ईस्वी का चोल राजवंश

चोल प्रशासन से जुड़े महत्वपूर्ण स्थानों की सूची

850 ईस्वी से 1200 ईस्वी के बीच दक्षिण भारत में चोल एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरे थेl इस दौरान तुंगभद्रा से आगे तक शासन करने वाले राष्ट्रकूटों और बाद में उनके उत्तराधिकारी कल्याणी के चालुक्यों के साथ उनका संघर्ष जारी रहाl चोल वंश की स्थापना विजयालय ने की थी जो पहले पल्लवों का सामंत थाl इस लेख में हम चोल प्रशासन स्थानों की सूची का विवरण दे रहे हैl

 

चोल प्रशासन से जुड़े महत्वपूर्ण स्थानों की सूची

चोल प्रशासन से जुड़े स्थान

इन स्थानों का महत्व

तंजावुर (तंजौर)

यह चोल साम्राज्य की राजधानी थी, जहां राजराज प्रथम ने बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया थाl

वेल्लूर

यहाँ परान्तक प्रथम ने पांड्यों और श्रीलंका की संयुक्त सेना को हराया थाl

अनुराधापुरा

चोलों के शासन के दौरान यह श्रीलंका की राजधानी थी जिसे राजराज प्रथम ने नष्ट कर दिया थाl

पोलन्नरुवा

राजराज प्रथम ने इस श्रीलंकाई शहर को अपने साम्राज्य में मिला लिया थाl

अन्नाई मंगलम

यह वह गांव था जहां एक शैलेन्द्र शासक को चूड़ामणि विहार बनाने की अनुमति दी गई थीl

गंगईकोंडचोलपुरम

कावेरीपट्टनम के निकट स्थित इस शहर की स्थापना राजेंद्र प्रथम द्वारा अपने उत्तर भारत के सफल अभियान की समाप्ति के बाद किया गया थाl

चिदंबरम

चोल राजाओं का यहाँ राज्याभिषेक होता थाl

उत्तरमेरूर

चोल प्रशासन से संबंधित 10वीं शताब्दी के दो शिलालेख यहां से मिले हैंl

नागापट्टनम

कोरोमंडल तट पर स्थित नागापट्टम में शैलेंद्र शासकों ने राजराज प्रथम के समय में विहार का निर्माण किया थाl

मुमादी चोलमंडलम

राजराज प्रथम ने जीते गए श्रीलंकाई प्रांतों को एक नया प्रांत बनाकर उसे यह नाम दिया थाl

शुरुआत में चोलों को राष्ट्रकूटों के खिलाफ अपनी स्थिति को बरकरार रखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी, लेकिन 10वीं सदी के अंत तक विजयालय के उत्तराधिकारियों जैसे आदित्य प्रथम चोल के नेतृत्व में चोलों की शक्ति में तेजी से बढ़ोतरी हुईl उसने कांची के पल्लवों का अस्तित्व मिटा दियाl इस अवधि में राजनीति या समाज में किसी भी उल्लेखनीय घटना का वर्णन नहीं किया गया है, हालांकि उद्योग, व्यापार और कला अपनी सामान्य गति से आगे बढ़ रही थीl

मध्यकालीन भारत का इतिहास: एक समग्र अध्ययन सामग्री

1486 ईस्वी के बंगाल के भगवान चैतन्य महाप्रभु

चैतन्य महाप्रभु के विषय में जानकारी - Chaitanya Prabhu

चैतन्य महाप्रभु (Chaitanya Prabhu) के विषय में आज संक्षिप्त जानकारी (Brief Information), उनकी जीवनी (biography in Hindi) के विषय में हम चर्चा करेंगे. महाप्रभु वैष्णव सम्प्रदाय संतों में सर्वाधिक महान और लोकप्रिय संत थे.

चैतन्य महाप्रभु की जीवनी Biography

  1. उनका जन्म 18 फरवरी, 1486 ई. को हुआ था.
  2. उनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र और माता का नाम शची देवी था.
  3. चैतन्य प्रभु ने अपने सुधारवादी आन्दोलन से बंगाल और उड़ीसा में एक नवीन चेतना जागृत की.
  4. जीवन के प्रारम्भ में से ही उन्होंने उच्चकोटि की साहित्यिक प्रतिभा का परिचय दिया.
  5. चौबीस वर्ष की अवस्था में वे संसार त्यागकर साधू हो गए.
  6. उन्होंने अपना शेष जीवन भक्ति और प्रेम के सन्देश प्रसार में व्यतीत किया.
  7. उन्होंने कृष्ण को अपना आराध्य देव माना.

Chaitanya Prabhu प्रभु (Short Notes/Essay)

  1. प्रारम्भिक सूफियों की तरह ही उन्होंने संगीत मंडलियाँ जोड़ी और कीर्तन को आध्यात्मिक अनुभूति के लिए प्रयोग किया, जिनमें (कीर्तन में) नाम लेने से बाह्य संसार का ध्यान नहीं रहता.
  2. वे बहुत समय तक वृन्दावन भी रहे लेकिन अपना अधिकांश समय लगभग सारे भारत का भ्रमण करने और भक्ति प्रचार में व्यतीत किया.
  3. उनका प्रभाव व्यापक था. उनके कीर्तनों में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही जाते थे.
  4. इनमें निम्न जाति के लोग भी थे.
  5. चैतन्य ने वैदिक धार्मिक ग्रन्थों और मूर्तिपूजा का विरोध नहीं किया लेकिन उन्हें परम्परावादी नहीं कहा जा सकता क्योंकि जाति प्रथा और वर्णव्यस्था को चैतन्य महाप्रभु ने नहीं माना.
  6. वे सांप्रदायिक नहीं थे, उनके विचारों में सगुण भक्ति का स्वर प्रधान था.

चैतन्य प्रभु के उपदेश (Teachings)

चैतन्य के उपदेशों (Teachings of Chaitanya Mahaprabhu) का सारांश सक्षेप में यह है कि, 'यदि कोई व्यक्ति कृष्ण की उपासना करता है और गुरु की सेवा करता है तो वह माया के जाल से मुक्त हो जाता है और ईश्वर से एकीकृत हो जाता है”. महाप्रभु ने ब्राह्मणवाद और कर्मकांडों की निंदा की. उनका मुख्य उद्देश्य सामजिक असमानता को दूर कर पददलित वर्ग को ऊँचा उठाना था. वे हिन्दू-मुस्लिम के बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण पैदा करना चाहते थे. वह मानववादी थे और दलित वर्ग की दुर्दशा पर उन्हें बहुत दुःख होता था

1529 का घाघरा का युद्ध और अकबर

घाघरा का युद्ध - Battle of Ghaghra 1529

आज हम घाघरा के युद्ध (Battle of Ghaghra in Hindi) के विषय में पढ़ने वाले हैं. यह युद्ध 1529 ई. में बाबर और अफगानों के बीच लड़ा गया था. यह युद्ध पानीपत युद्ध (1526) और खनवा के युद्ध (1527) के ठीक बाद लड़ा गया. घाघरा बिहार में है जिसका नाम बिहार में बहने वाली नदी घाघरा के नाम पर पड़ा है.

खनवा के युद्ध में राजपूतों पर अपना प्रभाव स्थापित करने के बाद बाबर ने फिर से अफगान विद्रोहियों की तरफ ध्यान दिया. फर्मुली और नूहानी सरदार अभी भी बाबर की सत्ता को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया था. वे हमेशा कुछ न कुछ विद्रोह करते रहते थे. जिस समय बाबर चंदेरी अभियान में व्यस्त था, अफगानों ने अवध में विद्रोह कर दिया. शमसाबाद और कन्नौज पर अधिकार कर वे बिहार के अफगान शासक की सहायता से आगरा विजय की योजना बना रहे थे. अफगान विद्रोहियों को बंगाल का सुलतान नुसरतशाह भी सहायता पहुँचा रहा था. इससे अफगानों के हौसले बड़े हुए थे. बाबर अब अफगानों को और अधिक मौका देना नहीं चाहता था. अतः चंदेरी विजय के पश्चात उसने अफगानों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया.

घाघरा का युद्ध

चंदेरी से बाबर अवध की तरफ बढ़ा. उसके आने की खबर सुनते ही अफगान नेता बिब्बन बंगाल भाग लिया. बाबर ने लखनऊ पर अधिकार कर लिया. इधर बिहार में अफगान महमूद लोदी के नेतृत्व में अपने आप को संगठित कर रहे थे. बंगाल के सुलतान से भी उन्हें सहायता मिल रही थी. अफगानों ने बनारस से आगे बढ़ते हुए चुनार का दुर्ग घेर लिया. इन घटनाओं की सूचना पाकर बाबर तेजी से बिहार की तरफ बढ़ा. उसके आने का समाचार सुनकर अफगान डर कर चुनार का घेरा छोड़कर भाग गए. बाबर ने महमूद लोदी को शरण नहीं देने का निर्देश दिया पर नुसरतशाह द्वारा उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया गया. फलतः, 6 मई, 1529 को घाघरा के निकट बाबर और अफगानों की मुठभेड़ हुई. अफगान इस युद्ध में बुरी तरह हार गए. महमूद लोदी ने भागकर बंगाल में शरण ली. नुसरतशाह ने बाबर से संधि कर ली. दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर आक्रमण नहीं करने और एक-दूसरे के शत्रुओं को शरण नहीं देने का वचन दिया. महमूद लोदी को बंगाल में ही एक जागीर दे दी गई. शेर खां के प्रयासों से बाबर ने बिहार के शासक जलालुद्दीन के राज्य के कुछ भागों को लेकर और उससे अपनी अधीनता स्वीकार करवा कर उसे प्रशासक के रूप में बना रहने दिया. इस प्रकार, घाघरा के युद्ध (Battle of Ghaghra) के बाद अफगानों की शक्ति पर थोड़े समय के लिए पूर्णतः अंकुश लग गया.

अंतिम युद्ध

घाघरा का युद्ध (Battle of Ghaghra) भारत में बाबर का अंतिम युद्ध था. भारत में लड़े गए युद्धों के परिणामस्वरूप बाबर एक बड़े राज्य का स्वामी बन गया. उसका राज्य सिन्धु से बिहार और हिमालय से ग्वालियर और चंदेरी तक फैला हुआ था. उसने भारत में मुगलों की सत्ता स्थापित कर दी थी. भारत में बाबर का अधिकांश समय युद्ध कर के ही बीता. इसलिए वह कभी भी प्रशासनिक व्यवस्था की तरफ ध्यान नहीं दे सका. अंतिम समय में वह काबुल जाना चाहता था. वह लाहौर तक गया भी, पर हुमायूँ की बीमारी के कारण उसे आगरा वापस आना पड़ा. खुद बाबर का स्वास्थ्य भी लगातार ख़राब हो रहा था. महल में भी षड्यंत्र हो रहे थे. ऐसी स्थिति में 23 दिसम्बर, 1530 को बाबर ने हुमायूँ को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया. 26 दिसम्बर, 1530 को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गई.

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...