1539 का हुमायूँ और बिहार का राजा शेरशाह सूरी की लड़ाई

चौसा  युद्ध - हुमायूँ Vs. शेरशाह 25 जून, 1539

आज हम चौसा के युद्के विषय में आपसे बात करेंगे. यह युद्ध हुमायूँ और शेरशाह के बीच हुआ था. चलिए देखते हैं इस युद्ध में कौन जीता, कौन हारा, ये युद्ध कब हुआ, क्या कारण  थे इस युद्ध के और इसके क्या परिणाम सामने आये.

चौसा का युद्ध

हमायूँ  का प्रबलतम शत्रु शेर खाँ था. बंगाल में विजय के बाद हुमायूँ निश्चिंत होकर आराम फरमाने लगा. बंगाल में हुमायूँ को आराम करता देख शेर खाँ ने क्रमशः चुनार, बनारस, जौनपुर, कन्नौज, पटना, इत्यादि पर अधिकार कर लिया. इन घटनाओं ने हुमायूँ को विचलित कर दिया. मलेरिया के प्रकोप से हुमायूँ की सेना कमजोर पड़ गयी थी इसलिए हुमायूँ ने सेना की एक छोटी से टुकड़ी छोड़कर आगरा के लिए कूच कर गया.

हमायूँ के वापस लौटने की सूचना पाकर शेर खाँ उर्फ़ शेरशाह ने मार्ग में ही हुमायूँ को घेरने का निश्चय किया. हुमायूँ ने वापसी में अनेक गलतियाँ कीं. सबसे पहले उसने अपनी सेना को दो भागों में बाँट दिया था. सेना की एक टुकड़ी दिलावर खाँ के अधीन मुंगेर (बिहार) पर आक्रमण करने को भेजी गई थी. सेना की दूसरी टुकड़ी के साथ हुमायूँ खुद आगे बढ़ा. हुमायूँ के सैन्य सलाहकारों ने उसे सलाह दिया था कि वह गंगा के उत्तरी किनारे से चलता हुआ जौनपुर पहुँचे और गंगा पार कर के शेरशाह/शेरखाँ पर हमला करे परन्तु उसने उन लोगों की बात नहीं मानी. वह गंगा पार कर दक्षिण मार्ग से ग्रैंड ट्रंक रोड से चला. यह मार्ग शेर खाँ के नियंत्रण में था. कर्मनासा नदी (Karmanasa River, Uttar Pradesh) के किनारे चौसा (Chausa) नामक स्थान पर उसे शेरशाह के होने का पता चला. इसलिए वह नहीं पार कर शेरशाह पर आक्रमण करने को उतारू हो उठा, लेकिन यहाँ भी उसने लापरवाही बरती. उसने तत्काल शेर खाँ पर आक्रमण करने को उतारू हो उठा, लेकिन यहाँ भी उसने लापरवाही बरती. उसने तत्काल शेरशाह पर आक्रमण नहीं किया. वह तीन महीनों तक गंगा नदी के किनारे समय बरबाद करता रहा. शेर खाँ ने इस बीच उसे धोखे से शान्ति-वार्ता में उलझाए रखा और अपनी तैयारी करता रहा. वस्तुतः वह बरसात की प्रतीक्षा कर रहा था.

शेरशाह की कूटनीति

वर्षा के शुरू होते ही शेर खाँ ने आक्रमण की योजना बनाई. हुमायूं का शिविर गंगा और कर्मनासा नदी के बीच एक नीची जगह पर था. अतः बरसात का पानी इसमें भर गया. मुगलों का तोपखाना नाकाम हो गया और सेना में अव्यवस्था व्याप्त गई. इसका लाभ उठा कर 25 जून, 1539 की रात्री में शेरशाह ने मुग़ल छावनी पर अचानक धोखे से आक्रमण कर दिया. मुग़ल खेमे में खलबली मच गई. सैनिक प्राण बचाने के लिए गंगा नदी में कूद गए. उनमें कुछ डूबे और कुछ अफगान सेनाओं के द्वारा मारे गए. हुमायूँ खुद भी अपनी जान बचाकर गंगा पार कर भाग गया. उसका परिवार खेमे में ही रह गया. हुमायूँ कुछ विश्वासी मुगलों की सहायता से आगरा पहुँच सका. हुमायूँ की पूरी सेना नष्ट हो गई.

युद्ध के परिणाम

  1. चौसा के युद्ध (Chausa War) के बाद हुमायूँ का पतन तय हो गया. उसकी सेना नष्ट हो चुकी थी. उसके परिवार के कुछ सदस्य भी इस युद्ध में मारे गए.
  2. अफगानों की शक्ति और महत्त्वाकांक्षाएँ पुनः बढ़ गयीं. अब वे मुगलों को भगाकर आगरा पर अधिकार करने की योजनाएँ बनाने लगे.
  3. शेर खाँ ने अब शेरशाह की उपाधि धारण कर ली.
  4. शेरशाह ने अपने नाम का 'खुतबा” पढ़वाया. सिक्के ढलवाये और फरमान जारी किए.
  5. उसने जलाल खाँ को भेजकर बंगाल पर अधिकार कर लिया और खुद बनारस, जौनपुर और लखनऊ होता हुआ कन्नौज जा पहुँचा.

800 सौ से लेकर 1200 ईस्वी का चोल राजवंश

चोल प्रशासन से जुड़े महत्वपूर्ण स्थानों की सूची

850 ईस्वी से 1200 ईस्वी के बीच दक्षिण भारत में चोल एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरे थेl इस दौरान तुंगभद्रा से आगे तक शासन करने वाले राष्ट्रकूटों और बाद में उनके उत्तराधिकारी कल्याणी के चालुक्यों के साथ उनका संघर्ष जारी रहाl चोल वंश की स्थापना विजयालय ने की थी जो पहले पल्लवों का सामंत थाl इस लेख में हम चोल प्रशासन स्थानों की सूची का विवरण दे रहे हैl

 

चोल प्रशासन से जुड़े महत्वपूर्ण स्थानों की सूची

चोल प्रशासन से जुड़े स्थान

इन स्थानों का महत्व

तंजावुर (तंजौर)

यह चोल साम्राज्य की राजधानी थी, जहां राजराज प्रथम ने बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया थाl

वेल्लूर

यहाँ परान्तक प्रथम ने पांड्यों और श्रीलंका की संयुक्त सेना को हराया थाl

अनुराधापुरा

चोलों के शासन के दौरान यह श्रीलंका की राजधानी थी जिसे राजराज प्रथम ने नष्ट कर दिया थाl

पोलन्नरुवा

राजराज प्रथम ने इस श्रीलंकाई शहर को अपने साम्राज्य में मिला लिया थाl

अन्नाई मंगलम

यह वह गांव था जहां एक शैलेन्द्र शासक को चूड़ामणि विहार बनाने की अनुमति दी गई थीl

गंगईकोंडचोलपुरम

कावेरीपट्टनम के निकट स्थित इस शहर की स्थापना राजेंद्र प्रथम द्वारा अपने उत्तर भारत के सफल अभियान की समाप्ति के बाद किया गया थाl

चिदंबरम

चोल राजाओं का यहाँ राज्याभिषेक होता थाl

उत्तरमेरूर

चोल प्रशासन से संबंधित 10वीं शताब्दी के दो शिलालेख यहां से मिले हैंl

नागापट्टनम

कोरोमंडल तट पर स्थित नागापट्टम में शैलेंद्र शासकों ने राजराज प्रथम के समय में विहार का निर्माण किया थाl

मुमादी चोलमंडलम

राजराज प्रथम ने जीते गए श्रीलंकाई प्रांतों को एक नया प्रांत बनाकर उसे यह नाम दिया थाl

शुरुआत में चोलों को राष्ट्रकूटों के खिलाफ अपनी स्थिति को बरकरार रखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी, लेकिन 10वीं सदी के अंत तक विजयालय के उत्तराधिकारियों जैसे आदित्य प्रथम चोल के नेतृत्व में चोलों की शक्ति में तेजी से बढ़ोतरी हुईl उसने कांची के पल्लवों का अस्तित्व मिटा दियाl इस अवधि में राजनीति या समाज में किसी भी उल्लेखनीय घटना का वर्णन नहीं किया गया है, हालांकि उद्योग, व्यापार और कला अपनी सामान्य गति से आगे बढ़ रही थीl

मध्यकालीन भारत का इतिहास: एक समग्र अध्ययन सामग्री

1486 ईस्वी के बंगाल के भगवान चैतन्य महाप्रभु

चैतन्य महाप्रभु के विषय में जानकारी - Chaitanya Prabhu

चैतन्य महाप्रभु (Chaitanya Prabhu) के विषय में आज संक्षिप्त जानकारी (Brief Information), उनकी जीवनी (biography in Hindi) के विषय में हम चर्चा करेंगे. महाप्रभु वैष्णव सम्प्रदाय संतों में सर्वाधिक महान और लोकप्रिय संत थे.

चैतन्य महाप्रभु की जीवनी Biography

  1. उनका जन्म 18 फरवरी, 1486 ई. को हुआ था.
  2. उनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र और माता का नाम शची देवी था.
  3. चैतन्य प्रभु ने अपने सुधारवादी आन्दोलन से बंगाल और उड़ीसा में एक नवीन चेतना जागृत की.
  4. जीवन के प्रारम्भ में से ही उन्होंने उच्चकोटि की साहित्यिक प्रतिभा का परिचय दिया.
  5. चौबीस वर्ष की अवस्था में वे संसार त्यागकर साधू हो गए.
  6. उन्होंने अपना शेष जीवन भक्ति और प्रेम के सन्देश प्रसार में व्यतीत किया.
  7. उन्होंने कृष्ण को अपना आराध्य देव माना.

Chaitanya Prabhu प्रभु (Short Notes/Essay)

  1. प्रारम्भिक सूफियों की तरह ही उन्होंने संगीत मंडलियाँ जोड़ी और कीर्तन को आध्यात्मिक अनुभूति के लिए प्रयोग किया, जिनमें (कीर्तन में) नाम लेने से बाह्य संसार का ध्यान नहीं रहता.
  2. वे बहुत समय तक वृन्दावन भी रहे लेकिन अपना अधिकांश समय लगभग सारे भारत का भ्रमण करने और भक्ति प्रचार में व्यतीत किया.
  3. उनका प्रभाव व्यापक था. उनके कीर्तनों में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही जाते थे.
  4. इनमें निम्न जाति के लोग भी थे.
  5. चैतन्य ने वैदिक धार्मिक ग्रन्थों और मूर्तिपूजा का विरोध नहीं किया लेकिन उन्हें परम्परावादी नहीं कहा जा सकता क्योंकि जाति प्रथा और वर्णव्यस्था को चैतन्य महाप्रभु ने नहीं माना.
  6. वे सांप्रदायिक नहीं थे, उनके विचारों में सगुण भक्ति का स्वर प्रधान था.

चैतन्य प्रभु के उपदेश (Teachings)

चैतन्य के उपदेशों (Teachings of Chaitanya Mahaprabhu) का सारांश सक्षेप में यह है कि, 'यदि कोई व्यक्ति कृष्ण की उपासना करता है और गुरु की सेवा करता है तो वह माया के जाल से मुक्त हो जाता है और ईश्वर से एकीकृत हो जाता है”. महाप्रभु ने ब्राह्मणवाद और कर्मकांडों की निंदा की. उनका मुख्य उद्देश्य सामजिक असमानता को दूर कर पददलित वर्ग को ऊँचा उठाना था. वे हिन्दू-मुस्लिम के बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण पैदा करना चाहते थे. वह मानववादी थे और दलित वर्ग की दुर्दशा पर उन्हें बहुत दुःख होता था

1529 का घाघरा का युद्ध और अकबर

घाघरा का युद्ध - Battle of Ghaghra 1529

आज हम घाघरा के युद्ध (Battle of Ghaghra in Hindi) के विषय में पढ़ने वाले हैं. यह युद्ध 1529 ई. में बाबर और अफगानों के बीच लड़ा गया था. यह युद्ध पानीपत युद्ध (1526) और खनवा के युद्ध (1527) के ठीक बाद लड़ा गया. घाघरा बिहार में है जिसका नाम बिहार में बहने वाली नदी घाघरा के नाम पर पड़ा है.

खनवा के युद्ध में राजपूतों पर अपना प्रभाव स्थापित करने के बाद बाबर ने फिर से अफगान विद्रोहियों की तरफ ध्यान दिया. फर्मुली और नूहानी सरदार अभी भी बाबर की सत्ता को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया था. वे हमेशा कुछ न कुछ विद्रोह करते रहते थे. जिस समय बाबर चंदेरी अभियान में व्यस्त था, अफगानों ने अवध में विद्रोह कर दिया. शमसाबाद और कन्नौज पर अधिकार कर वे बिहार के अफगान शासक की सहायता से आगरा विजय की योजना बना रहे थे. अफगान विद्रोहियों को बंगाल का सुलतान नुसरतशाह भी सहायता पहुँचा रहा था. इससे अफगानों के हौसले बड़े हुए थे. बाबर अब अफगानों को और अधिक मौका देना नहीं चाहता था. अतः चंदेरी विजय के पश्चात उसने अफगानों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया.

घाघरा का युद्ध

चंदेरी से बाबर अवध की तरफ बढ़ा. उसके आने की खबर सुनते ही अफगान नेता बिब्बन बंगाल भाग लिया. बाबर ने लखनऊ पर अधिकार कर लिया. इधर बिहार में अफगान महमूद लोदी के नेतृत्व में अपने आप को संगठित कर रहे थे. बंगाल के सुलतान से भी उन्हें सहायता मिल रही थी. अफगानों ने बनारस से आगे बढ़ते हुए चुनार का दुर्ग घेर लिया. इन घटनाओं की सूचना पाकर बाबर तेजी से बिहार की तरफ बढ़ा. उसके आने का समाचार सुनकर अफगान डर कर चुनार का घेरा छोड़कर भाग गए. बाबर ने महमूद लोदी को शरण नहीं देने का निर्देश दिया पर नुसरतशाह द्वारा उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया गया. फलतः, 6 मई, 1529 को घाघरा के निकट बाबर और अफगानों की मुठभेड़ हुई. अफगान इस युद्ध में बुरी तरह हार गए. महमूद लोदी ने भागकर बंगाल में शरण ली. नुसरतशाह ने बाबर से संधि कर ली. दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर आक्रमण नहीं करने और एक-दूसरे के शत्रुओं को शरण नहीं देने का वचन दिया. महमूद लोदी को बंगाल में ही एक जागीर दे दी गई. शेर खां के प्रयासों से बाबर ने बिहार के शासक जलालुद्दीन के राज्य के कुछ भागों को लेकर और उससे अपनी अधीनता स्वीकार करवा कर उसे प्रशासक के रूप में बना रहने दिया. इस प्रकार, घाघरा के युद्ध (Battle of Ghaghra) के बाद अफगानों की शक्ति पर थोड़े समय के लिए पूर्णतः अंकुश लग गया.

अंतिम युद्ध

घाघरा का युद्ध (Battle of Ghaghra) भारत में बाबर का अंतिम युद्ध था. भारत में लड़े गए युद्धों के परिणामस्वरूप बाबर एक बड़े राज्य का स्वामी बन गया. उसका राज्य सिन्धु से बिहार और हिमालय से ग्वालियर और चंदेरी तक फैला हुआ था. उसने भारत में मुगलों की सत्ता स्थापित कर दी थी. भारत में बाबर का अधिकांश समय युद्ध कर के ही बीता. इसलिए वह कभी भी प्रशासनिक व्यवस्था की तरफ ध्यान नहीं दे सका. अंतिम समय में वह काबुल जाना चाहता था. वह लाहौर तक गया भी, पर हुमायूँ की बीमारी के कारण उसे आगरा वापस आना पड़ा. खुद बाबर का स्वास्थ्य भी लगातार ख़राब हो रहा था. महल में भी षड्यंत्र हो रहे थे. ऐसी स्थिति में 23 दिसम्बर, 1530 को बाबर ने हुमायूँ को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया. 26 दिसम्बर, 1530 को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गई.

1469 ईस्वी की महान घटना, गुरु नानक

गुरुनानक

1469 AD में गुरु नानक का जन्म तलवंडी (वर्तमान में लाहौर, पाकिस्तान) के हिन्दू परिवार के महाजन जाति  में  मेहता कालू (पिता ) और माता  तृप्ता देवी  के घर हुआ, गुरु नानक प्रथम सिख  गुरु बने और सिख धर्म की नींव रखी | (वर्तमान समय में इनका जन्मदिवस कार्तिक  माह की  15वीं पूर्णिमा को मनाया जाता है ) आध्यात्मिक झुकाव, दुनिया और उसके सिद्धांतों के बारे में जागरूकता और दिव्य विषयों के प्रति रुचि के बारे में टिप्पणियाँ उनके जीवन के प्रारम्भिक काल से मिलती हैं जहां प्रतीकों  और घटनाओं के बारे में  नैतिकता और सार्वभौमिकता की विवेचना की गई है | नानक के पूर्व जीवन के बारे में हमे जानकारी 1475 AD में मिलती है जब वह अपनी बहन (बीबी नानकी) के साथ सुल्तानपुर चले गए जहां बीबी नानकी का विवाह हुआ | 16 वर्ष की उम्र में नानक ने दौलत खान लोदी के शासन में कार्य करना शुरू कर दिया |  नानक में दिव्य गुणों की पहचान सबसे पहली बार स्थानीय जमींदार राज बुल्लर और नानक की बहन बीबी नानकी ने की | इसके बाद उन्हें यात्राओं के लिए प्रोत्साहित किया गया और इन्होनें अपने जीवन के 25 साल विभिन्न स्थानों  पर उपदेश दिये इस समय के दौरान बने भजनों  ने नानक की  सोच के अनुसार सामाजिक परेशानियाँ व उनके समाधानों के बारे में बताया | 30 वर्ष की उम्र में उन्हें एक सपना हुआ और वह अपने अनुष्ठान शुद्धि से नहीं लौटे उनके वस्त्र एक तालाब के किनारे तैरते पाये गए, तीन दिन तक गायब रहने के बाद वह फिर से सामने आए और शांत रहे तथा उन्होनें स्पष्ट किया कि उन्हें ईश्वर की  सभा में अमृत(जीवन का अमृत) दिया गया  और इन्हे ईश्वर के द्वारा उनकी सच्ची शिक्षाओं के प्रचार करने का आदेश दिया गया है |

भविष्य में नानक को गुरु माना  गया और उन्होनें सिख धर्म को जन्म दिया | सिख धर्म अपने बुनियादी  सिद्धांतों  में दयालुता, शांति और मानवीय सिद्धांतों को सिखाता है |

गुरुनानक ने यह पुष्टि कि है कि सभी मनुष्य एक समान हैं और वह गरीबों और दलितों को ज्यादा महत्व देते थे तथा महिलाओं की समानता पर प्रमुखता से बल देते  थे | वह महिलाओं को उच्च दर्जा देते थे और उन्हे श्रेष्ठ मानते थे | नानक को मुगल शासक बाबर के अत्याचारों और असभ्यता  की निंदा व उसके धर्मतंत्र के बारे में जिरह करने के लिए गिरफ्तार किया गया |

गुरु नानक ने पूरी तरह से प्रचलित पारंपरिक प्रथाओं को उलट दिया और बिना किसी शक के निस्वार्थ सेवा, ईश्वर की प्रशंसा और विश्वास पर बल दिया | इन्होनें वेदों को निरर्थक बताया और हिन्दू धर्म में जाति प्रथा की परंपरा पर प्रश्न उठाए | इन्होनें  लोगों को सिखाया कि  ईश्वर सब में बसते  हैं और उनकी सर्वज्ञता ,निराकार अनंत और बाहरी व सर्व सच की विद्यमान की स्वयं की प्रकृति के बारे में बताया |  इन्होनें आध्यात्मिक समानता, भाईचारा ,सामाजिक व राजनीतिक गुणों व अच्छाइयों के मंच की  स्थापना की |   

नानक ने बताया है कि  निस्वार्थ सेवा के द्वारा ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है तथा ईश्वर की कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं है | इसलिए आदर्श रूप से ईश्वर ही  मुख्य कर्ता हैं | इसलिए हमें हमेशा पाखंड व झूठ  से बचना चाहिए क्यूंकि ये व्यर्थ के कार्यों को दिखाता है | |सिख धर्म के अनुसार नानक की शिक्षाएं तीन प्रकार से संपादित हैं –वंद चक्को (जरूरतमन्द की मदद करना व साझा करना ), कीरत करो (बिना धोखे के शुद्ध जीवन जीना ), नाम जपना ( खुशहाल जीवन व्यतीत करने के लिए ईश्वर को याद करना )

नानक ने ईश्वर की पूजा करने को व उन्हें प्रत्येक कर्म में याद रखने को महत्व दिया था | उन्होनें अपने मन का अनुसरण करने से बेहतर प्रबद्ध व्यक्ति का अनुसरण करने का सुझाव दिया | इनकी शिक्षाएं गुरु ग्रंथ साहिब(जिसमे 947 काव्य स्त्रोत व प्रार्थनाएँ हैं ) में संग्रहीत हैं और गहन विचारों के छन्द गुरुमुखी में दर्ज़ हैं जिसका ज्ञान आज तक भी अनश्वर है | पुजारियों व काजियों द्वारा गुमराह करने से व परस्पर विरोधी संदेश देने से लोगों की दुर्दशा देखने पर गुरु नानक ने लोगों को आध्यत्मिक सच का मार्गदर्शन करने के लिए पर्यटन शुरू किया | उन्होनें चारों दिशाओं में भाई मर्दाना(उनके सहयोगी ) के साथ हजारों किलोमीटर की पद यात्रा की और सभी धर्मों, जाति व संस्कृति के लोगों से मिले | उनकी यात्राओं को उदासीस कहा गया | जन्मसखी ( जीवन के बारे मे जानकारी व खाते)  और वर्स (छन्द) नानक के जीवन के प्रथम जीवन स्त्रोत है जिसे आज तक मान्यता प्राप्त है |गुरदास (गुरु ग्रंथ साहिब की नक्काशी ) | नानक के जीवन के बारे में पहले के जीवन स्त्रोत हैं जन्मसखी और वर्स अर्थात जीवन काल और छन्द| गुरु नानक के जीवन के विधर्म लेख की सही जानकारी देने के लिए भाई मनि सिंह द्वारा ज्ञान रत्नावली लिखी गई थी |

ख़िलजी वंश और शासन काल

खिलजी वंश के तहत आर्थिक नीति और प्रशासन

खिलजी शासकों ने मध्य एशिया में अपने वंश की छाप छोड़ी थी और ये तुर्की मूल के थे। भारत में दिल्ली आने से पहले वे वर्तमान के अफगानिस्तान में लंबे समय तक रहे थे। खिलजी वंश के महत्वपूर्ण शासक थे:

  1. जलाल उद दीन खिलजी: तुर्की, फारसी, अरबी जनसमूहों के एक मुस्लिम मुखियाओं के समूहों तथा विशिष्ट भारतीय-मुस्लिमों द्वारा जलाल-उद-दीन फ़िरोज़ खिलजी को सुल्तान के रूप में नियुक्त किया गया था।
  2. अलाउद्दीन खिलजी: जूना खान, जिसे बाद में अलाउद्दीन खिलजी के रूप में जाना जाता था वह जलाल-उद-दीन का भतीजा और दामाद था। उसने हिंदू डेक्कन प्रायद्वीप, देवगिरी पर आक्रमण किया था जो महाराष्ट्र के हिंदुओं की राजधानी थी। 1296 में वह दिल्ली वापस लौटा और अपने चाचा और ससुर की हत्या कर सुल्तान के रूप में सत्ता प्राप्त की।
  3. अंतिम खिलजी सुल्तान:
  • अलादीन खिलजी की मृत्यु दिसंबर 1315 में हो गयी थी। तत्पश्चात् मलिक काफूर सुल्तान के रूप में गद्दी पर आसीन हुआ था।
  • मलिक काफूर की मृत्यु के बाद मुस्लिम मुखियाओं द्वारा उमर शिहाब-उद-दीन को सुल्तान के रूप में प्रस्तुत किया गया और यदि वह किसी भी तरह वह मारा गया तो उसके बड़े भाई कुतुब-उद-दीन मुबारक शाह को उसके विकल्प के रूप में तैयार किया गया था।
  • मुबारक शाह ने 4 वर्षों तक शासन किया और खुसरो खान ने 1320 में उसकी हत्या कर दी।
  • दिल्ली में मुस्लिम मुखियाओं द्वारा खुसरो खान को सत्ताविहीन करने के लिए गाजी मलिक को आमंत्रित किया और खुसरो खान की हत्या कर वह गयासुद्दीन तुग़लक़ के रूप में वह तुगलक प्रशासन का पहला अग्रणी सुल्तान बना था।

आर्थिक नीति

खिलजी वंश के तहत आर्थिक नीति और प्रशासन में बहुत कठोर थे और यह सब राजा के हाथों में निहित थी। किसानों, व्यापारी और आम आदमी की स्थिति बहुत खराब थी और कभी-कभी पोषण करना भी मुश्किल हो जाता था। कुछ नीतियां इस प्रकार थी:

  • खिलजी शासकों विशेष रूप से अलाउद्दीन खिलजी ने सिर्फ अपने खजाने को बढ़ाने के लिए अपने खर्च करने के दृष्टिकोण को बदल दिया था और अपने दायित्वों का निर्वहन करने तथा युद्धों का विस्तार करने के लिए उसने खजाने को एकत्र किया।
  • उसने कृषि व्यवसाय करों को सीधे-सीधे 20% से 50% तक बढा दिया था जो अनाज और ग्रामीण उपज के रुप में या नकदी के साथ देय होता था और उसने किश्तों में भुगतान को समाप्त कर दिया था।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने सल्तनत में गैर मुसलमानों पर चार प्रकार के कर लगा रखे थे जिनमें जजिया या सर्वेक्षण कर, खराज या भूमि कर, कारी या गृह कर और क्षेत्र कर के रूप में चारी शामिल था।
  • वह इसके अलावा उसने यह घोषणा की थी कि उसके दिल्ली स्थित अधिकारियों के साथ पड़ोसी मुस्लिम जागीरदार, खुत, मुक्कदीम, चौधरी और जमींदार सभी खड़ी उपज के उत्पादन का आधा हिस्सा लागत के रूप में जब्त कर सकते हैं।
  • मुस्लिम जागीरदारों के लिए मजदूरी निर्धारण को हटा दिया गया था और मजदूरी को केंद्रीय संगठन द्वारा एकत्रित किया जाता था।
  • राज्य में सभी कृषि व्यवसाय उपजों, जानवरों और गुलामों पर एक प्रकार का गुणवत्ता नियंत्रण था।
  • बाजारों को शहना-ए-मंडी कहा जाता था। मुस्लिम जहाज माल व्यापारियों को खरीदने तथा व्यापार के लिए इन मंडियों में विशेष लाइसेंस मिले हुए थे।
  • इन व्यापारियों के अलावा शहरी क्षेत्रों में अन्य कोई भी किसानों से खरीदने की पेशकश नहीं कर सकता था।
  • यहां जासूसों की विशाल व्यवस्था की गयी थी जो मंडी का निरीक्षण करते थे और उनके पास यह अधिकार था कि कोई भी जो प्रस्तावित सीमा से अधिक बेचता या खरीदता है तो वे उसे जब्त कर सकते थे।
  • जीविका के निजी एकत्रीकरण पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। वितरण प्रणाली अलाउद्दीन द्वारा शुरू की गयी थी और यहां गुणवत्ता नियंत्रण की एक प्रणाली विद्यमान थी।
  • ये खर्चों पर नियंत्रण के अलावा उन लोगों को मजदूरी के बारे में अवगत कराते थे जिन्हें इसका लाभ नहीं नहीं मिलता था।
  • अलाउद्दीन खिलजी की मौत के बाद गुणवत्ता नियंत्रण की विधि ज्यादा कारगर साबित नहीं हो सकी थी।

सन 1527 का खानवा युद्ध और उसके बाद का भारत

खानवा का युद्ध - Battle of Khanwa 1527

पानीपत के बाद बाबर द्वारा भारत में लड़े गए युद्धों में सबसे महत्त्वपूर्ण खानवा का युद्ध था. जहाँ पानिपत के युद्ध ने बाबर को दिल्ली और आगरा का शासक बना दिया, वहीं खानवा के युद्ध (Battle of Khanwa) ने बाबर के प्रबलतम शत्रु राणा सांगा का अंत कर बाबर की विजयों को एक स्थायित्व प्रदान किया.

खानवा युद्ध के कारण

बाबर (Babar) और राणा सांगा के बीच युद्ध के अनेक कारण थे. इनमें से कुछ निम्नलिखित थे -

  1. राणा सांगा (Rana Sanga) भी अफगानों की सत्ता समाप्त कर अपना राज्य स्थापित करना चाहता था. उसने अपनी शक्ति बहुत बढ़ा ली थी. उसके राज्य की सीमा आगरा के निकट तक पहुँच गई थी. बाबर को उससे किसी भी समय खतरा उत्पन्न हो सकता था.
  2. राणा सांगा समझता था कि बाबर भी अन्य मध्य एशियाई लूटेरों की तरह लूट-पाट करके चला जायेगा. फिर उसके जाने के बाद वह दिल्ली पर अधिकार कर लेगा. परन्तु जब उसे अहसास हुआ कि बाबर दिल्ली छोड़कर कहीं नहीं जाने वाला तो वह सोच में पड़ गया.
  3. सिन्धु-गंगा घाटी में बाबर के वर्चस्व ने सांगा के लिए खतरा बढ़ा दिया. उसने बाबर को देश से भगाने का निर्णय लिया.
  4. इसी बीच जब बाबर ने अफगान विद्रोहियों को कुचलने का निर्णय लिया तब अनेक अफगान सरदार राणा सांगा के शरण में जा पहुँचे. इनमें प्रमुख थे इब्राहीम लोदी का भाई महमूद लोदी और मेवात का सूबेदार हसन खां मेवाती. इन लोगों ने राणा सांगा को बाबर के विरुद्ध युद्ध करने को उकसाया और अपनी सहायता का वचन भी दिया.
  5. राणा सांगा बाबर द्वारा कालपी, बयाना, आगरा और धौलपुर पर अधिकार किए जाने से गुस्से में था क्योंकि वह इन क्षेत्रों को अपने साम्राज्य के अन्दर मानता था.

खानवा का युद्ध

राणा सांगा ने बाबर पर आक्रमण करने के पहले ही अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली थी. उसकी सहायता के लिए हसन खां मेवाती, महमूद लोदी और अनेक राजपूत सरदार अपनी-अपनी सेना के साथ एकत्रित हो गए. वह हौसले के साथ एक विशाल सेना के साथ बयाना और आगरा पर अधिकार करने के लिए बढ़ा. बायाना के शासक ने बाबर से सहायता माँगी. बाबर ने ख्वाजा मेंहदी को मदद के रूप में भेजा पर राणा सांगा ने उसे परास्त कर बयाना पर अधिकार कर लिया. सीकरी के पास भी आरंभिक मुठभेड़ में मुग़ल सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. लगातार मिल रही पराजय से मुग़ल सैनिक आतंकित हो गए. उनका मनोबल गिर गया.

अपनी सेना का मनोबल गिरते देखकर बाबर ने धैर्य से काम लिया. उसने 'जिहाद” की घोषणा की. उसने शराब न पीने की कसम खाई. उसने मुसलामानों पर से तमगा (एक प्रकार का सीमा कर) भी उठा लिया और अपनी सेना को कई तरह के प्रलोभन दिए . उसने अपने-अपने सैनिकों से निष्ठापूर्वक युद्ध करने और प्रतिष्ठा की सुरक्षा करने का वचन लिया. फलस्वरूप बाबर के सैनकों में उत्साह का संचार हुआ.

बाबर राणा सांगा का मुकाबला करने के लिए फतेहपुर सिकरी के निकट खानवा नामक जगह पर पहुँचा. राणा सांगा उसकी प्रतीक्षा में था. बाबर ने जिस चक्रव्यूह-रचना का प्रयोग पानीपत में किया था उसी रचना को खानवा में भी किया . 16 मार्च, 1527 को खानवा के मैदान में दोनों सेनाओं की मुठभेड़ हुई. राजपूत वीरता से लड़े पर बाबर ने गोला-बारूद का जमकर इस्तेमाल कर राणा के सेना को पराजित कर दिया. राणा रणक्षेत्र से भाग निकला ताकि वह पुनः बाबर से युद्ध कर सके. पर कालांतर में उसके ही सामंतों ने उसे विष देकर मार डाला. बाबर के लिए यह एक बड़ी जीत थी.

युद्ध के परिणाम

  1. खानवा का युद्ध बाबर के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण इसलिए था कि क्योंकि उसने एक वीर शासक को हराया और यह बात पूरे भारत में फ़ैल गई. इस युद्ध ने उसे भारत में पाँव फैलाने का अवसर प्रदान किया.
  2. इस युद्ध के बाद राजपूत-अफगानों का संयुक्त 'राष्ट्रीय मोर्चा” ख़त्म हो गया.
  3. भारत में 'हिन्दू राज्य” राज्य स्थापित करने का सपना भंग हो गया.
  4. खानवा युद्ध के बाद बाबर की शक्ति का आकर्षण केंद्र अब काबुल नहीं रहा, बल्कि आगरा-दिल्ली बन गया.

कबीर 15 वी शताब्दी के महान संत

कबीर

एक महान संत, कवि, समाज सुधारक
15वीं सदी ने कबीर के रूप में एक ऐसे  रहस्यवादी सूफी  कवि व संत को देखा जिसने धर्म, समाज और राजनीतिक दर्शनशास्त्र पर प्रभाव डाला जिसका असर आज तक दिखाई देता है |
माना जाता है कि उनका जन्म बुनकर परिवार में हुआ, उनके जन्म के बारे में  भिन्न-भिन्न जानकारियों  की वजह से हिन्दू और मुसलमानों  के बीच  अक्सर उनकी पहचान को लेकर विभिन्न विचार रखे गए हैं | भारत में सबसे प्रसिद्ध कवि और सबसे उद्ध्त लेखक, कबीर ने अपने जीवन काल में 1498-1518 AD के दौरान प्रभावशाली कवितायें बनाईं जिसका प्रभाव भक्ति आंदोलन पर पड़ा और उनके छंदों का उल्लेख सिख धर्म के आदि ग्रंथ में भी संग्रहीत  हैं |
कबीर, भक्ति काल के कवि व संत स्वामी रामानन्द (एक ऐसा व्यक्ति जिसका लक्ष्य इस्लाम, ईसाई धर्म और ब्राह्मण के सिद्धांतों को मिश्रित करना था ) के शिष्य बन गए  अतः कबीर की कविताएं उनके गुरु के  विचारों के विलय का एक प्रतिबिंब है और शैली में काल्पनिक स्थानीय भाषा की मान्यता को दर्शाता है | शैली में स्थानीय  भाषा का प्रयोग किया गया है , जीवन की विशेषताओं व ईश्वर के प्रति श्रद्धा पर केन्द्रित कविताओं  में  हिन्दी, अवधि, ब्रज, और भोजपुरी बोलियों का प्रयोग किया गया है
कबीर की कविताओं में उस समय की सामुदायिक गतिशीलता और तर्कसंगत सोच को अभिव्यक्त किया गया है | जीवन के प्रति उसके दार्शनिक आकलन ने आज की पीढ़ी को उदार  विचारों  की पहुँच  दी है | उनका  संश्लेषण  दोनों संस्कृतियाँ  हिन्दू धर्म और इस्लाम व सिख  धर्म  सहित  का मुख्य स्त्रोत बना है | हिन्दू व इस्लाम धर्म  और उनकी  अर्थहीन परम्पराओं रीति-रिवाजों आलोचना करने  के लिए उन्हे जाना जाता है, वह दावा करते हैं कि दोनों  धर्मों ने क्रमशः वेद और कुरान की  गलत व्याखाया की  है और जीवन के सार को  नज़रअंदाज़ कर दिया है | उन्होने सुझाव दिया है कि जीने का सही तरीका धर्म के मार्ग के माध्यम से है, सभी लोग ईश्वर के प्रतिबिंब हैं और अतः सब बराबर हैं, उन्होनें ईश्वर को समझने और चिंतन करने  के लिए राम-राम के मंत्र का प्रचार किया | दोनों धर्मों(हिन्दू व इस्लाम ) का गंभीरता से आकलन करते हुए कबीर अपने विचारों के लिए लड़े हालांकि उन्हे दोनों संप्रदायों के द्वारा धमकाया गया, उन्होनें इसका स्वागत किया व उन्हे ईश्वर के ओर नजदीक ले जाने के लिए आभार प्रकट किया |  
कबीर ने बुनियादी धार्मिक सिद्धांतों में जीवात्मा और परमात्मा को संघटित किया और इनकी  राय के अनुसार इन दोनों की एकता के साथ ही मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है | कबीर द्वारा रचित, ज्ञान की मौखिक कविताओं को उनके अनुयायियों द्वारा “वाणी” कहा गया  जिसमे दोहे, श्लोक थे और इन्हें वास्तविकता का सबूत माना जाता था | कबीर की विरासत  को कबीरपंथ के माध्यम से जीवित रखा गया  जिसे धार्मिक संप्रदायों और इनके सदस्यों द्वारा पहचान मिली जिन्हें  कबीरपंथी कहा जाता है |
इनकी साहित्यिक कृतियाँ इस प्रकार हैं कबीर बीजक, कबीर परछाई, आदि ग्रंथ, आदि ग्रंथ और कबीर ग्रंथावली |
शाश्वत रूप से उनके काम में अभिव्यक्ति और रहस्यमय भावना और व्यापक मान्यताओं के रूपकों के साथ  धर्मों के प्रतीक की सहजता है |हालांकि, कबीर की उनके दोहों में महिलाओं के प्रति ब्यान के लिए आलोचना की गई थी | यह तर्क दिया गया है कि  कबीर की कविताओं में दोहरी व्याखाया है और इसलिए इनमे अंतर हो सकता है |
कबीर ने अपने जीवन काल का ज़्यादातर समय वाराणसी में बिताया और ये बताया गया है कि वाराणसी विशाल हिन्दू पुजारियों के प्रभाव का केंद्र था, उनके द्वारा पारंपरिक प्रथाओं को कम आँकने के लिए उनकी बहुत आलोचना की गई |  उन्हे 1495 AD में लगभग 60 वर्ष की उम्र में वाराणसी से बाहर निकाल दिया गया, उसके बाद वह अपने अनुयायियों के साथ उत्तरी भारत की तरफ चले गए और निर्वासन का जीवन व्यतीत किया | प्राप्त जानकारी के अनुसार उन्होनें 1518 AD में  आखिरी सांस गोरखपुर के नजदीक मगहर में ली |
उनके जन्म की  तरह ही उनकी मृत्यु भी अनेक विवादों  से घिरी रही, जबकि  कुछ का मानना था कि कबीर एक ब्राह्मण के पुत्र थे जिनको एक बेऔलाद मुसलमान दंपति ने गोद ले लिया , आम राय यह है कि वह एक मुसलमान परिवार में पैदा हुए थे | दोनों धर्मों के बेहतरीन विचारों के प्रचार के कारण उनके अनुयायियों के बीच उनके अंतिम संस्कार को लेकर बहस हो गई | पौराणिक कथाओं के अनुसार उनके मृत देह के ऊपर फूल मिले थे और मुसलमानों ने उन्हीं  फूलों को दफनाया जबकि हिंदुओं ने उन फूलों का  अंतिम संस्कार किया |

अमीर खुसरो मुगल काल के कवि

अमीर खुसरो की रचनाएँ - Amir Khusro Books in Hindi

दिल्ली सल्तनतकालीन अन्य लेखकों में अमीर खुसरो का नाम सर्वाधिक उल्लेखनीय है. जबकि सही अर्थों में वह इतिहासकार नहीं था. उनका जन्म 1253 ई. में हुआ था. वह एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे जिसका कई पीढ़ियों से राजदरबार से घनिष्ठ सम्बन्ध था. वह कैकूबाद, जलालुद्दीन खिलजी, अलाउद्दीन खिलजी, मुबारकशाह व गयासुद्दीन तुगलक के अंतर्गत शाही सेवा में रहे. अमीर खुसरो सूफियों - विशेष रूप से निजामुद्दीन औलिया के काफी नजदीक थे और उन्होंने अपने काव्य व संगीत के माध्यम से भारत की सूफी संस्कृति के निर्माण में महान योगदान दिया था. चलिए चर्चा करते हैं अमीर खुसरो (Amir Khusro) द्वारा रचित ग्रन्थ, किताबों (Books) के बारे में.

अमीर खुसरो का झुकाव

इतिहास लिखना अमीर खुसरो की मूल चिंता नहीं थी. इसलिए सच पूछा जाए तो एक इतिहासकार के रूप में उनका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता. परन्तु अपनी कविताओं में उन्होंने प्रायः ऐतिहासिक विषयों को लिया है. इस प्रकार की सभी कृतियाँ, रचनाएँ सन 1289-1325 के बीच रची गई थीं. इनमें से कुछ की रचना के लिए उनसे ख़ास तौर पर कहा गया था जबकि कुछ अन्य उन्होंने अपने शाही रक्षकों को खुश करने के लिए लिखी थीं. वह निष्पक्ष इतिहासकार नहीं थे.

अमीर खुसरो की किताबें

किरान-उस-सादेन

ऐतिहासिक विषय को लेकर उसकी पहली रचना है - 'किरान-उस-सादेन” जो उन्होंने 1289 ई. में लिखी थी. इसमें बुगरा खां और उसके बेटे कैकुबाद के मिलन का वर्णन है. इसमें दिल्ली, उसकी इमारतों, शाही दरबार, अमीरों और अफसरों के सामजिक जीवन के विषय में दिलचस्प विवरण दिए गए हैं. इस रचना द्वारा उन्होंने मंगोलों के प्रति अपनी घृणा भी प्रकट की है.

मिफता-उल-फुतूह

मिफता-उल-फुतूह की रचना उन्होंने 1291 ई में की. इस रचने में उन्होंने जलालुद्दीन खिलजी के सैन्य अभियानों, मालिक छज्जू का विद्रोह व उसका दमन, रणथम्बौर पर सुलतान की चढ़ाई और अन्य स्थानों की विजय पर विचार किया है.

खजाइन-उल-फुतूह

खजाइन-उल-फुतूह में, जिसे तारीख-ए-अलाई के नाम से भी जाना जाता है, अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के पहले 15 वर्षों का चाटुकारितापूर्ण विवरण है. यद्यपि यह रचना मूलतः साहित्यिक है परन्तु फिर भी इसका अपना महत्त्व है क्योंकि अलाउद्दीन खिलजी का समसामयिक विवरण केवल इसी पुस्तक में मिलता है. इसमें उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी द्वारा गुजरात, चित्तौड़, मालवा और वारंगल की विजय के विषय में लिखा है. इसमें हमें मालिक काफूर के दक्कन अभियानों का आँखों देखा विवरण मिलता है और भौगोलिक और सैन्य विवरणों की दृष्टि से यह काफी प्रसिद्ध है. इसमें भारत का बड़ा ही अच्छा चित्रण है और साथ ही अलाउद्दीन के भवनों व प्रशासनिक सुधारों का वर्णन किया गया है. परन्तु अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल पर विचार करते समय उनकी दृष्टि आलोचनात्मक नहीं रही है.

आशिका

अमीर खुसरो की एक अन्य रचना 'आशिका” का सम्बन्ध गुजरात के राजकरन की पुत्री देवलरानी और अलाउद्दीन के पुत्र खिज्रखां की प्रेमकथा से है. इसमें अलाउद्दीन की गुजरात व आलवा विजय के बारे में चर्चा की गई है. साथ ही उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों की स्थालाकृति (topography) का वर्णन भी किया है. इसमें वे मंगोलों द्वारा स्वयं अपने कैद किये जाने की चर्चा भी करते हैं.

नूह सिपिहर

एक अन्य पुस्तक जहाँ हिन्दुस्तान और उसके लोगों का अच्छा चित्रण हुआ है वह नूह सिपिहर (Nuh Sipihr) है. इसमें मुबारक खिलजी का बड़ा ही चातुकारतापूर्ण विवरण है. उन्होंने मुबारकशाह के भवनों के विजयों के साथ-साथ जलवायु, सब्जियों, फलों, भाषाओं, दर्शनरम जीवन जैसे विषयों पर विचार किया है. इसमें तत्कालीन सामजिक स्थिति का बड़ा ही जीवंत चित्रण देखने को मिलता है.

तुगलकनामा

खुसरो की अंतिम ऐतिहासिक मसनवी है तुगलकनामा. इसमें खुशरोशाह के विरुद्ध गयासुद्दीन तुगलक की विजय का चित्रण है. पूरी कहानी को धार्मिक रंग में प्रस्तुत किया गया है. इसमें गयासुद्दीन सत् तत्वों का प्रतीक है और उसे असत् तत्वों के अमीर खुसरोशाह के साथ संघर्ष करते दिखाया गया है.

अमीर खुसरो (Amir Khusro) का एक मजबूत पहलू यह है कि उन्होंने बहुत-सी तिथियाँ दी हैं और उनके द्वारा दिया गया कालक्रम बरनी की अपेक्षा कहीं अधिक विश्ववसनीय है. उनकी रचनाएँ तत्कालीन सामजिक स्थितियों पर भी काफी प्रकाश डालती है और यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी ओर उस समय के अन्य इतिहासकारों का ख़ास ध्यान नहीं गया था.

हिन्दू धर्म विध्वंसक औरंगजेब (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, हिन्दुस्तान, म्यांमार, श्री लंका)

अबुल मुजफ्फर मुहि-उद-द्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब

औरंगज़ेब का जन्म 14 अक्टूबर 1618 AD में दोहाद  में हुआ | वह शाहजहां और मुमताज़ महल की संतान था  | इसका  इंतकाल (मृत्यु ) 20 फरवरी 1707 AD में अहमदनगर में हुआ और इसे खुलदाबाद में दफनाया गया |

औरंगज़ेब आखिरी शक्तिशाली मुगल सम्राट और सम्राट शाहजहाँ व मुमताज़ महल की तीसरी संतान था  जिसने मुगल साम्राज्य को समृद्धि के स्तर तक पहुंचाया | उसकी रणनीतियाँ उसके कट्टरपन  के बारे मे बताती  हैं |

 शुरुआती  जीवन

औरंगजेब एक ईमानदार और  समर्पित किशोर की तरह पला बढ़ा। इसने कट्टर मुस्लिम से विवाह किया | बहुत ही कम आयु में इसमे सशस्त्र बालों के लक्षण दिखाई दिये और इसके प्रबंधकीय कौशल से हर कोई आश्चर्यचकित था  जिसके परिणामस्वरूप इसका  अपने बड़े भाई दारा शिकोहा से विवाद हो गया जिसका स्वभाव तेज़ व अस्थिर था तथा जिसे औरंगज़ेब के पिता द्वारा सिंहासन का वारिस बना दिया गया था |

1646 AD से 1647 AD तक औरंगज़ेब ने अद्वितीय उत्कृष्टता के साथ सैनिकों को उज़्बेक और पर्शिया के खिलाफ आदेश दिया | 1657 AD में जब शाहजहां गिर गए, तब दोनों भाइयों के बीच का तनाव उन्हें सत्ता के युद्ध की तरफ ले गया |

परंतु शाहजहाँ के अप्रत्याशित स्वास्थ्य लाभ ने दोनों बच्चों के बीच के सत्ता के संघर्ष को समाप्त कर दिया | 1675 AD से 1659 AD तक सत्ता के युद्ध में औरंगज़ेब ने उसकी अंतरराष्ट्रीय सैन्य योग्यता, अधिक्रमण की अपनी असाधारण सैन्य शक्ति के बारे में परिचय दिया  जिसका परिणाम था कि दारा 1658 AD में समूरगढ़ में हार गया जिसके बाद उसने(औरंगज़ेब) अपने पिता (शाहजहाँ) को आगरा में अपने ही शाही निवास में बंदी बना लिया |  

भारत के सम्राट

1680 AD के आसपास औरंगज़ेब पूरी तरह से उत्तर पश्चिम को पर्शिया और मध्य एशियाई तुर्क और मराठा शासक शिवाजी से बचाने में व्यस्त हो गया  जिन्होनें दो बार सूरत के बन्दरगाह को लूटा था /

औरंगज़ेब ने विजय के लिए  अपने परदादा अकबर के नियम को अपनाया, दुश्मन की जासूसी करना, उससे मिलनसार संबंध बनाना, व शाही सेवा के द्वारा उनके जीवन व राज्य के रहस्यों के बारे मे पता लगाना | इस प्रकार , स्वतंत्र मराठा राज्य के नेता के रूप में, शिवाजी को पराजित कर, उन्हे आगरा, समझौते के लिए बुलाया गया (1666 AD) तथा उन्हें उच्च स्थान दिया गया, परंतु यह योजना 1680 AD में शिवाजी के दक्कन मे भाग जाने और वहाँ मृत्यु हो जाने से असफल हो गई |

1680 AD के आसपास के बाद औरंगज़ेब के शासन ने मन की स्थिति के परिवर्तन के साथ रणनीति मे परिवर्तन को अनुभव किया | इसने फिर से 1679 AD में गैर मुसलमानों पर सर्वाधिक सर्वेक्षण कर लगा दिया जिसे अकबर के शासन काल के दौरान हटा दिया गया था | बीजापुर के दक्कन राज्य मे अस्थिरता ने एक लंबे आर्थिक संकट को प्रोत्साहित किया जोकि मराठों से युद्ध के बाद विकसित हुआ  था |  शिवाजी के पुत्र सांभाजी को पकड़ लिया गया व 1689 AD में हत्या कर दी गई और जिसका परिणाम यह था कि  औरंगजेब का  साम्राज्य विभाजित हो  गया |

औरंगज़ेब ने दक्षिण में अनुपस्थिति के कारण उत्तरी प्रांत पर अपना नियंत्रण खो दिया जोकि पहले था | इसका परिणाम यह हुआ कि संगठन कमजोर हो गया | 1675 AD  में औरंगज़ेब ने सिख गुरु, तेग बहादुर को पकड़ा व हत्या कर दी जिन्होनें इस्लाम धर्म को अपनाने से मना कर दिया था, गुरु तेग बहादुर के आगे के गुरुओं ने औरंगजेब के शासन की नीतियों का खुल कर विरोध किया |

मृत्यु

1689 AD तक लगभग दक्षिण भारत के सभी हिस्से मुगल साम्राज्य का हिस्सा बन गए थे और गोलकोंडा की उपलब्धि के बाद, औरंगज़ेब शायद सबसे अमीर और सबसे धनवान जीवित व्यक्ति था | औरंगज़ेब के विशाल राजसी युद्ध, मुगल साम्राज्यों  के क्षेत्रों पर अवरोध उत्त्प्न करती थी और यह उसके प्रतिद्वंधियों को उसके विरुद्ध उसके  महत्व को अलंकृत  करती थीं | औरंगजेब के युद्धों  को प्रांतीय नवाबों की कमी के कारण परेशानी हुई |

मुसलमानों का दृष्टिकोण औरंगज़ेब  से भिन्न था | ज़्यादातर मुस्लिम इतिहासकारों का मत था कि जब साम्राज्य पतन की कगार पर खड़ा था, उस समय  औरंगजेब सबसे शक्तिशाली अंतिम मुगल सम्राट था | महत्वपूर्ण विद्रोहों को सिखों व मराठों द्वारा सुलझा लिया गया जिन्होनें निर्जन स्थानों मे फैली  मुगल साम्राज्य की जड़ों  को उखाड़ फेंका था  |

औरंगजेब भी अपने पूर्वजों की तरह ही सोचता था कि  राजसी धनराशि को अपने साम्राज्य के नागरिकों के लिए उपयोग किया जाना चाहिए |प्रशासन के भारी काम में व्यस्त रहते हुए भी वह अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कुरान की  आयतों की नकल कर पैसा कमाने का समय निकाल लेता था | छोटे संगमरमर से निर्मित मस्जिद का निर्माण औरंगजेब द्वारा करवाया गया था, जिसे मोती मस्जिद के रूप में जाना गया, और यह दिल्ली के लाल किले  के प्रांगण में स्थित है | दूसरी तरफ, उसके लगातार युद्धों ने, खासकर मराठों के साथ, ने उसके राज्य को आर्थिक दिवालियापन की कगार पर  ला  दिया  था /

1706 AD के अपने अंतिम युद्ध में औरंगज़ेब मराठों के विरुद्ध था और इस युद्ध में उसे मुगल सशस्त्र बल में  नए उन्नत प्रमुखों  का सहयोग मिला जो थे सय्यद, हसन आली खान बरहा, सादत आली खान और आसफ जह-ई और दाऊद खान |

 जीवन के अंतिम दिनों में औरंगज़ेब बीमार हो गया और वह चाहता था कि  उसके साम्राज्य के निवासियों को जानकारी होनी चाहिए कि वह अभी जीवित है | औरंगज़ेब का 20 फरवरी 1707 AD मे 88 वर्ष की आयु में अहमदनगर मे देहांत हो गया  |

कमजोर शासकों के अनुक्रम, उत्तराधिकार के लिए युद्ध और अमीर वर्ग के लोगों द्वारा शासन को उखाड़ फेंकने की साजिशें, मुगल शक्ति के कमजोर होने के अनिवार्य कारण बने, वास्तव  में यह सब  अंतिम मुगल सम्राट  औरंगजेब की मृत्यु के बाद हुआ  |

बहादुर शाह I, औरंगजेब के पुत्र को राजगद्दी मिल गई तथा वह साम्राज्य जिसने मुगल शासक औरंगजेब के शासन के दौरान समृद्धि को छुआ था, परंतु औरंगजेब के अधिक विस्तार क्षेत्र और बहादुर शाह के कमजोर सैन्य और आत्मबल  साम्राज्य को पतन के द्वार पर ले गई |

बहादुर शाह ने राजगद्दी को संभालने के बाद, मुगल साम्राज्य की समस्याओं को उजागर किया  | औरंगजेब की मृत्यु के कई वर्षों के बाद भी मुगल सम्राट की शक्तियाँ दिल्ली की सीमा के आसपास तक ही सीमित रह गईं थी |

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...