1469 ईस्वी की महान घटना, गुरु नानक

गुरुनानक

1469 AD में गुरु नानक का जन्म तलवंडी (वर्तमान में लाहौर, पाकिस्तान) के हिन्दू परिवार के महाजन जाति  में  मेहता कालू (पिता ) और माता  तृप्ता देवी  के घर हुआ, गुरु नानक प्रथम सिख  गुरु बने और सिख धर्म की नींव रखी | (वर्तमान समय में इनका जन्मदिवस कार्तिक  माह की  15वीं पूर्णिमा को मनाया जाता है ) आध्यात्मिक झुकाव, दुनिया और उसके सिद्धांतों के बारे में जागरूकता और दिव्य विषयों के प्रति रुचि के बारे में टिप्पणियाँ उनके जीवन के प्रारम्भिक काल से मिलती हैं जहां प्रतीकों  और घटनाओं के बारे में  नैतिकता और सार्वभौमिकता की विवेचना की गई है | नानक के पूर्व जीवन के बारे में हमे जानकारी 1475 AD में मिलती है जब वह अपनी बहन (बीबी नानकी) के साथ सुल्तानपुर चले गए जहां बीबी नानकी का विवाह हुआ | 16 वर्ष की उम्र में नानक ने दौलत खान लोदी के शासन में कार्य करना शुरू कर दिया |  नानक में दिव्य गुणों की पहचान सबसे पहली बार स्थानीय जमींदार राज बुल्लर और नानक की बहन बीबी नानकी ने की | इसके बाद उन्हें यात्राओं के लिए प्रोत्साहित किया गया और इन्होनें अपने जीवन के 25 साल विभिन्न स्थानों  पर उपदेश दिये इस समय के दौरान बने भजनों  ने नानक की  सोच के अनुसार सामाजिक परेशानियाँ व उनके समाधानों के बारे में बताया | 30 वर्ष की उम्र में उन्हें एक सपना हुआ और वह अपने अनुष्ठान शुद्धि से नहीं लौटे उनके वस्त्र एक तालाब के किनारे तैरते पाये गए, तीन दिन तक गायब रहने के बाद वह फिर से सामने आए और शांत रहे तथा उन्होनें स्पष्ट किया कि उन्हें ईश्वर की  सभा में अमृत(जीवन का अमृत) दिया गया  और इन्हे ईश्वर के द्वारा उनकी सच्ची शिक्षाओं के प्रचार करने का आदेश दिया गया है |

भविष्य में नानक को गुरु माना  गया और उन्होनें सिख धर्म को जन्म दिया | सिख धर्म अपने बुनियादी  सिद्धांतों  में दयालुता, शांति और मानवीय सिद्धांतों को सिखाता है |

गुरुनानक ने यह पुष्टि कि है कि सभी मनुष्य एक समान हैं और वह गरीबों और दलितों को ज्यादा महत्व देते थे तथा महिलाओं की समानता पर प्रमुखता से बल देते  थे | वह महिलाओं को उच्च दर्जा देते थे और उन्हे श्रेष्ठ मानते थे | नानक को मुगल शासक बाबर के अत्याचारों और असभ्यता  की निंदा व उसके धर्मतंत्र के बारे में जिरह करने के लिए गिरफ्तार किया गया |

गुरु नानक ने पूरी तरह से प्रचलित पारंपरिक प्रथाओं को उलट दिया और बिना किसी शक के निस्वार्थ सेवा, ईश्वर की प्रशंसा और विश्वास पर बल दिया | इन्होनें वेदों को निरर्थक बताया और हिन्दू धर्म में जाति प्रथा की परंपरा पर प्रश्न उठाए | इन्होनें  लोगों को सिखाया कि  ईश्वर सब में बसते  हैं और उनकी सर्वज्ञता ,निराकार अनंत और बाहरी व सर्व सच की विद्यमान की स्वयं की प्रकृति के बारे में बताया |  इन्होनें आध्यात्मिक समानता, भाईचारा ,सामाजिक व राजनीतिक गुणों व अच्छाइयों के मंच की  स्थापना की |   

नानक ने बताया है कि  निस्वार्थ सेवा के द्वारा ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है तथा ईश्वर की कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं है | इसलिए आदर्श रूप से ईश्वर ही  मुख्य कर्ता हैं | इसलिए हमें हमेशा पाखंड व झूठ  से बचना चाहिए क्यूंकि ये व्यर्थ के कार्यों को दिखाता है | |सिख धर्म के अनुसार नानक की शिक्षाएं तीन प्रकार से संपादित हैं –वंद चक्को (जरूरतमन्द की मदद करना व साझा करना ), कीरत करो (बिना धोखे के शुद्ध जीवन जीना ), नाम जपना ( खुशहाल जीवन व्यतीत करने के लिए ईश्वर को याद करना )

नानक ने ईश्वर की पूजा करने को व उन्हें प्रत्येक कर्म में याद रखने को महत्व दिया था | उन्होनें अपने मन का अनुसरण करने से बेहतर प्रबद्ध व्यक्ति का अनुसरण करने का सुझाव दिया | इनकी शिक्षाएं गुरु ग्रंथ साहिब(जिसमे 947 काव्य स्त्रोत व प्रार्थनाएँ हैं ) में संग्रहीत हैं और गहन विचारों के छन्द गुरुमुखी में दर्ज़ हैं जिसका ज्ञान आज तक भी अनश्वर है | पुजारियों व काजियों द्वारा गुमराह करने से व परस्पर विरोधी संदेश देने से लोगों की दुर्दशा देखने पर गुरु नानक ने लोगों को आध्यत्मिक सच का मार्गदर्शन करने के लिए पर्यटन शुरू किया | उन्होनें चारों दिशाओं में भाई मर्दाना(उनके सहयोगी ) के साथ हजारों किलोमीटर की पद यात्रा की और सभी धर्मों, जाति व संस्कृति के लोगों से मिले | उनकी यात्राओं को उदासीस कहा गया | जन्मसखी ( जीवन के बारे मे जानकारी व खाते)  और वर्स (छन्द) नानक के जीवन के प्रथम जीवन स्त्रोत है जिसे आज तक मान्यता प्राप्त है |गुरदास (गुरु ग्रंथ साहिब की नक्काशी ) | नानक के जीवन के बारे में पहले के जीवन स्त्रोत हैं जन्मसखी और वर्स अर्थात जीवन काल और छन्द| गुरु नानक के जीवन के विधर्म लेख की सही जानकारी देने के लिए भाई मनि सिंह द्वारा ज्ञान रत्नावली लिखी गई थी |

ख़िलजी वंश और शासन काल

खिलजी वंश के तहत आर्थिक नीति और प्रशासन

खिलजी शासकों ने मध्य एशिया में अपने वंश की छाप छोड़ी थी और ये तुर्की मूल के थे। भारत में दिल्ली आने से पहले वे वर्तमान के अफगानिस्तान में लंबे समय तक रहे थे। खिलजी वंश के महत्वपूर्ण शासक थे:

  1. जलाल उद दीन खिलजी: तुर्की, फारसी, अरबी जनसमूहों के एक मुस्लिम मुखियाओं के समूहों तथा विशिष्ट भारतीय-मुस्लिमों द्वारा जलाल-उद-दीन फ़िरोज़ खिलजी को सुल्तान के रूप में नियुक्त किया गया था।
  2. अलाउद्दीन खिलजी: जूना खान, जिसे बाद में अलाउद्दीन खिलजी के रूप में जाना जाता था वह जलाल-उद-दीन का भतीजा और दामाद था। उसने हिंदू डेक्कन प्रायद्वीप, देवगिरी पर आक्रमण किया था जो महाराष्ट्र के हिंदुओं की राजधानी थी। 1296 में वह दिल्ली वापस लौटा और अपने चाचा और ससुर की हत्या कर सुल्तान के रूप में सत्ता प्राप्त की।
  3. अंतिम खिलजी सुल्तान:
  • अलादीन खिलजी की मृत्यु दिसंबर 1315 में हो गयी थी। तत्पश्चात् मलिक काफूर सुल्तान के रूप में गद्दी पर आसीन हुआ था।
  • मलिक काफूर की मृत्यु के बाद मुस्लिम मुखियाओं द्वारा उमर शिहाब-उद-दीन को सुल्तान के रूप में प्रस्तुत किया गया और यदि वह किसी भी तरह वह मारा गया तो उसके बड़े भाई कुतुब-उद-दीन मुबारक शाह को उसके विकल्प के रूप में तैयार किया गया था।
  • मुबारक शाह ने 4 वर्षों तक शासन किया और खुसरो खान ने 1320 में उसकी हत्या कर दी।
  • दिल्ली में मुस्लिम मुखियाओं द्वारा खुसरो खान को सत्ताविहीन करने के लिए गाजी मलिक को आमंत्रित किया और खुसरो खान की हत्या कर वह गयासुद्दीन तुग़लक़ के रूप में वह तुगलक प्रशासन का पहला अग्रणी सुल्तान बना था।

आर्थिक नीति

खिलजी वंश के तहत आर्थिक नीति और प्रशासन में बहुत कठोर थे और यह सब राजा के हाथों में निहित थी। किसानों, व्यापारी और आम आदमी की स्थिति बहुत खराब थी और कभी-कभी पोषण करना भी मुश्किल हो जाता था। कुछ नीतियां इस प्रकार थी:

  • खिलजी शासकों विशेष रूप से अलाउद्दीन खिलजी ने सिर्फ अपने खजाने को बढ़ाने के लिए अपने खर्च करने के दृष्टिकोण को बदल दिया था और अपने दायित्वों का निर्वहन करने तथा युद्धों का विस्तार करने के लिए उसने खजाने को एकत्र किया।
  • उसने कृषि व्यवसाय करों को सीधे-सीधे 20% से 50% तक बढा दिया था जो अनाज और ग्रामीण उपज के रुप में या नकदी के साथ देय होता था और उसने किश्तों में भुगतान को समाप्त कर दिया था।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने सल्तनत में गैर मुसलमानों पर चार प्रकार के कर लगा रखे थे जिनमें जजिया या सर्वेक्षण कर, खराज या भूमि कर, कारी या गृह कर और क्षेत्र कर के रूप में चारी शामिल था।
  • वह इसके अलावा उसने यह घोषणा की थी कि उसके दिल्ली स्थित अधिकारियों के साथ पड़ोसी मुस्लिम जागीरदार, खुत, मुक्कदीम, चौधरी और जमींदार सभी खड़ी उपज के उत्पादन का आधा हिस्सा लागत के रूप में जब्त कर सकते हैं।
  • मुस्लिम जागीरदारों के लिए मजदूरी निर्धारण को हटा दिया गया था और मजदूरी को केंद्रीय संगठन द्वारा एकत्रित किया जाता था।
  • राज्य में सभी कृषि व्यवसाय उपजों, जानवरों और गुलामों पर एक प्रकार का गुणवत्ता नियंत्रण था।
  • बाजारों को शहना-ए-मंडी कहा जाता था। मुस्लिम जहाज माल व्यापारियों को खरीदने तथा व्यापार के लिए इन मंडियों में विशेष लाइसेंस मिले हुए थे।
  • इन व्यापारियों के अलावा शहरी क्षेत्रों में अन्य कोई भी किसानों से खरीदने की पेशकश नहीं कर सकता था।
  • यहां जासूसों की विशाल व्यवस्था की गयी थी जो मंडी का निरीक्षण करते थे और उनके पास यह अधिकार था कि कोई भी जो प्रस्तावित सीमा से अधिक बेचता या खरीदता है तो वे उसे जब्त कर सकते थे।
  • जीविका के निजी एकत्रीकरण पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। वितरण प्रणाली अलाउद्दीन द्वारा शुरू की गयी थी और यहां गुणवत्ता नियंत्रण की एक प्रणाली विद्यमान थी।
  • ये खर्चों पर नियंत्रण के अलावा उन लोगों को मजदूरी के बारे में अवगत कराते थे जिन्हें इसका लाभ नहीं नहीं मिलता था।
  • अलाउद्दीन खिलजी की मौत के बाद गुणवत्ता नियंत्रण की विधि ज्यादा कारगर साबित नहीं हो सकी थी।

सन 1527 का खानवा युद्ध और उसके बाद का भारत

खानवा का युद्ध - Battle of Khanwa 1527

पानीपत के बाद बाबर द्वारा भारत में लड़े गए युद्धों में सबसे महत्त्वपूर्ण खानवा का युद्ध था. जहाँ पानिपत के युद्ध ने बाबर को दिल्ली और आगरा का शासक बना दिया, वहीं खानवा के युद्ध (Battle of Khanwa) ने बाबर के प्रबलतम शत्रु राणा सांगा का अंत कर बाबर की विजयों को एक स्थायित्व प्रदान किया.

खानवा युद्ध के कारण

बाबर (Babar) और राणा सांगा के बीच युद्ध के अनेक कारण थे. इनमें से कुछ निम्नलिखित थे -

  1. राणा सांगा (Rana Sanga) भी अफगानों की सत्ता समाप्त कर अपना राज्य स्थापित करना चाहता था. उसने अपनी शक्ति बहुत बढ़ा ली थी. उसके राज्य की सीमा आगरा के निकट तक पहुँच गई थी. बाबर को उससे किसी भी समय खतरा उत्पन्न हो सकता था.
  2. राणा सांगा समझता था कि बाबर भी अन्य मध्य एशियाई लूटेरों की तरह लूट-पाट करके चला जायेगा. फिर उसके जाने के बाद वह दिल्ली पर अधिकार कर लेगा. परन्तु जब उसे अहसास हुआ कि बाबर दिल्ली छोड़कर कहीं नहीं जाने वाला तो वह सोच में पड़ गया.
  3. सिन्धु-गंगा घाटी में बाबर के वर्चस्व ने सांगा के लिए खतरा बढ़ा दिया. उसने बाबर को देश से भगाने का निर्णय लिया.
  4. इसी बीच जब बाबर ने अफगान विद्रोहियों को कुचलने का निर्णय लिया तब अनेक अफगान सरदार राणा सांगा के शरण में जा पहुँचे. इनमें प्रमुख थे इब्राहीम लोदी का भाई महमूद लोदी और मेवात का सूबेदार हसन खां मेवाती. इन लोगों ने राणा सांगा को बाबर के विरुद्ध युद्ध करने को उकसाया और अपनी सहायता का वचन भी दिया.
  5. राणा सांगा बाबर द्वारा कालपी, बयाना, आगरा और धौलपुर पर अधिकार किए जाने से गुस्से में था क्योंकि वह इन क्षेत्रों को अपने साम्राज्य के अन्दर मानता था.

खानवा का युद्ध

राणा सांगा ने बाबर पर आक्रमण करने के पहले ही अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली थी. उसकी सहायता के लिए हसन खां मेवाती, महमूद लोदी और अनेक राजपूत सरदार अपनी-अपनी सेना के साथ एकत्रित हो गए. वह हौसले के साथ एक विशाल सेना के साथ बयाना और आगरा पर अधिकार करने के लिए बढ़ा. बायाना के शासक ने बाबर से सहायता माँगी. बाबर ने ख्वाजा मेंहदी को मदद के रूप में भेजा पर राणा सांगा ने उसे परास्त कर बयाना पर अधिकार कर लिया. सीकरी के पास भी आरंभिक मुठभेड़ में मुग़ल सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. लगातार मिल रही पराजय से मुग़ल सैनिक आतंकित हो गए. उनका मनोबल गिर गया.

अपनी सेना का मनोबल गिरते देखकर बाबर ने धैर्य से काम लिया. उसने 'जिहाद” की घोषणा की. उसने शराब न पीने की कसम खाई. उसने मुसलामानों पर से तमगा (एक प्रकार का सीमा कर) भी उठा लिया और अपनी सेना को कई तरह के प्रलोभन दिए . उसने अपने-अपने सैनिकों से निष्ठापूर्वक युद्ध करने और प्रतिष्ठा की सुरक्षा करने का वचन लिया. फलस्वरूप बाबर के सैनकों में उत्साह का संचार हुआ.

बाबर राणा सांगा का मुकाबला करने के लिए फतेहपुर सिकरी के निकट खानवा नामक जगह पर पहुँचा. राणा सांगा उसकी प्रतीक्षा में था. बाबर ने जिस चक्रव्यूह-रचना का प्रयोग पानीपत में किया था उसी रचना को खानवा में भी किया . 16 मार्च, 1527 को खानवा के मैदान में दोनों सेनाओं की मुठभेड़ हुई. राजपूत वीरता से लड़े पर बाबर ने गोला-बारूद का जमकर इस्तेमाल कर राणा के सेना को पराजित कर दिया. राणा रणक्षेत्र से भाग निकला ताकि वह पुनः बाबर से युद्ध कर सके. पर कालांतर में उसके ही सामंतों ने उसे विष देकर मार डाला. बाबर के लिए यह एक बड़ी जीत थी.

युद्ध के परिणाम

  1. खानवा का युद्ध बाबर के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण इसलिए था कि क्योंकि उसने एक वीर शासक को हराया और यह बात पूरे भारत में फ़ैल गई. इस युद्ध ने उसे भारत में पाँव फैलाने का अवसर प्रदान किया.
  2. इस युद्ध के बाद राजपूत-अफगानों का संयुक्त 'राष्ट्रीय मोर्चा” ख़त्म हो गया.
  3. भारत में 'हिन्दू राज्य” राज्य स्थापित करने का सपना भंग हो गया.
  4. खानवा युद्ध के बाद बाबर की शक्ति का आकर्षण केंद्र अब काबुल नहीं रहा, बल्कि आगरा-दिल्ली बन गया.

कबीर 15 वी शताब्दी के महान संत

कबीर

एक महान संत, कवि, समाज सुधारक
15वीं सदी ने कबीर के रूप में एक ऐसे  रहस्यवादी सूफी  कवि व संत को देखा जिसने धर्म, समाज और राजनीतिक दर्शनशास्त्र पर प्रभाव डाला जिसका असर आज तक दिखाई देता है |
माना जाता है कि उनका जन्म बुनकर परिवार में हुआ, उनके जन्म के बारे में  भिन्न-भिन्न जानकारियों  की वजह से हिन्दू और मुसलमानों  के बीच  अक्सर उनकी पहचान को लेकर विभिन्न विचार रखे गए हैं | भारत में सबसे प्रसिद्ध कवि और सबसे उद्ध्त लेखक, कबीर ने अपने जीवन काल में 1498-1518 AD के दौरान प्रभावशाली कवितायें बनाईं जिसका प्रभाव भक्ति आंदोलन पर पड़ा और उनके छंदों का उल्लेख सिख धर्म के आदि ग्रंथ में भी संग्रहीत  हैं |
कबीर, भक्ति काल के कवि व संत स्वामी रामानन्द (एक ऐसा व्यक्ति जिसका लक्ष्य इस्लाम, ईसाई धर्म और ब्राह्मण के सिद्धांतों को मिश्रित करना था ) के शिष्य बन गए  अतः कबीर की कविताएं उनके गुरु के  विचारों के विलय का एक प्रतिबिंब है और शैली में काल्पनिक स्थानीय भाषा की मान्यता को दर्शाता है | शैली में स्थानीय  भाषा का प्रयोग किया गया है , जीवन की विशेषताओं व ईश्वर के प्रति श्रद्धा पर केन्द्रित कविताओं  में  हिन्दी, अवधि, ब्रज, और भोजपुरी बोलियों का प्रयोग किया गया है
कबीर की कविताओं में उस समय की सामुदायिक गतिशीलता और तर्कसंगत सोच को अभिव्यक्त किया गया है | जीवन के प्रति उसके दार्शनिक आकलन ने आज की पीढ़ी को उदार  विचारों  की पहुँच  दी है | उनका  संश्लेषण  दोनों संस्कृतियाँ  हिन्दू धर्म और इस्लाम व सिख  धर्म  सहित  का मुख्य स्त्रोत बना है | हिन्दू व इस्लाम धर्म  और उनकी  अर्थहीन परम्पराओं रीति-रिवाजों आलोचना करने  के लिए उन्हे जाना जाता है, वह दावा करते हैं कि दोनों  धर्मों ने क्रमशः वेद और कुरान की  गलत व्याखाया की  है और जीवन के सार को  नज़रअंदाज़ कर दिया है | उन्होने सुझाव दिया है कि जीने का सही तरीका धर्म के मार्ग के माध्यम से है, सभी लोग ईश्वर के प्रतिबिंब हैं और अतः सब बराबर हैं, उन्होनें ईश्वर को समझने और चिंतन करने  के लिए राम-राम के मंत्र का प्रचार किया | दोनों धर्मों(हिन्दू व इस्लाम ) का गंभीरता से आकलन करते हुए कबीर अपने विचारों के लिए लड़े हालांकि उन्हे दोनों संप्रदायों के द्वारा धमकाया गया, उन्होनें इसका स्वागत किया व उन्हे ईश्वर के ओर नजदीक ले जाने के लिए आभार प्रकट किया |  
कबीर ने बुनियादी धार्मिक सिद्धांतों में जीवात्मा और परमात्मा को संघटित किया और इनकी  राय के अनुसार इन दोनों की एकता के साथ ही मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है | कबीर द्वारा रचित, ज्ञान की मौखिक कविताओं को उनके अनुयायियों द्वारा “वाणी” कहा गया  जिसमे दोहे, श्लोक थे और इन्हें वास्तविकता का सबूत माना जाता था | कबीर की विरासत  को कबीरपंथ के माध्यम से जीवित रखा गया  जिसे धार्मिक संप्रदायों और इनके सदस्यों द्वारा पहचान मिली जिन्हें  कबीरपंथी कहा जाता है |
इनकी साहित्यिक कृतियाँ इस प्रकार हैं कबीर बीजक, कबीर परछाई, आदि ग्रंथ, आदि ग्रंथ और कबीर ग्रंथावली |
शाश्वत रूप से उनके काम में अभिव्यक्ति और रहस्यमय भावना और व्यापक मान्यताओं के रूपकों के साथ  धर्मों के प्रतीक की सहजता है |हालांकि, कबीर की उनके दोहों में महिलाओं के प्रति ब्यान के लिए आलोचना की गई थी | यह तर्क दिया गया है कि  कबीर की कविताओं में दोहरी व्याखाया है और इसलिए इनमे अंतर हो सकता है |
कबीर ने अपने जीवन काल का ज़्यादातर समय वाराणसी में बिताया और ये बताया गया है कि वाराणसी विशाल हिन्दू पुजारियों के प्रभाव का केंद्र था, उनके द्वारा पारंपरिक प्रथाओं को कम आँकने के लिए उनकी बहुत आलोचना की गई |  उन्हे 1495 AD में लगभग 60 वर्ष की उम्र में वाराणसी से बाहर निकाल दिया गया, उसके बाद वह अपने अनुयायियों के साथ उत्तरी भारत की तरफ चले गए और निर्वासन का जीवन व्यतीत किया | प्राप्त जानकारी के अनुसार उन्होनें 1518 AD में  आखिरी सांस गोरखपुर के नजदीक मगहर में ली |
उनके जन्म की  तरह ही उनकी मृत्यु भी अनेक विवादों  से घिरी रही, जबकि  कुछ का मानना था कि कबीर एक ब्राह्मण के पुत्र थे जिनको एक बेऔलाद मुसलमान दंपति ने गोद ले लिया , आम राय यह है कि वह एक मुसलमान परिवार में पैदा हुए थे | दोनों धर्मों के बेहतरीन विचारों के प्रचार के कारण उनके अनुयायियों के बीच उनके अंतिम संस्कार को लेकर बहस हो गई | पौराणिक कथाओं के अनुसार उनके मृत देह के ऊपर फूल मिले थे और मुसलमानों ने उन्हीं  फूलों को दफनाया जबकि हिंदुओं ने उन फूलों का  अंतिम संस्कार किया |

अमीर खुसरो मुगल काल के कवि

अमीर खुसरो की रचनाएँ - Amir Khusro Books in Hindi

दिल्ली सल्तनतकालीन अन्य लेखकों में अमीर खुसरो का नाम सर्वाधिक उल्लेखनीय है. जबकि सही अर्थों में वह इतिहासकार नहीं था. उनका जन्म 1253 ई. में हुआ था. वह एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे जिसका कई पीढ़ियों से राजदरबार से घनिष्ठ सम्बन्ध था. वह कैकूबाद, जलालुद्दीन खिलजी, अलाउद्दीन खिलजी, मुबारकशाह व गयासुद्दीन तुगलक के अंतर्गत शाही सेवा में रहे. अमीर खुसरो सूफियों - विशेष रूप से निजामुद्दीन औलिया के काफी नजदीक थे और उन्होंने अपने काव्य व संगीत के माध्यम से भारत की सूफी संस्कृति के निर्माण में महान योगदान दिया था. चलिए चर्चा करते हैं अमीर खुसरो (Amir Khusro) द्वारा रचित ग्रन्थ, किताबों (Books) के बारे में.

अमीर खुसरो का झुकाव

इतिहास लिखना अमीर खुसरो की मूल चिंता नहीं थी. इसलिए सच पूछा जाए तो एक इतिहासकार के रूप में उनका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता. परन्तु अपनी कविताओं में उन्होंने प्रायः ऐतिहासिक विषयों को लिया है. इस प्रकार की सभी कृतियाँ, रचनाएँ सन 1289-1325 के बीच रची गई थीं. इनमें से कुछ की रचना के लिए उनसे ख़ास तौर पर कहा गया था जबकि कुछ अन्य उन्होंने अपने शाही रक्षकों को खुश करने के लिए लिखी थीं. वह निष्पक्ष इतिहासकार नहीं थे.

अमीर खुसरो की किताबें

किरान-उस-सादेन

ऐतिहासिक विषय को लेकर उसकी पहली रचना है - 'किरान-उस-सादेन” जो उन्होंने 1289 ई. में लिखी थी. इसमें बुगरा खां और उसके बेटे कैकुबाद के मिलन का वर्णन है. इसमें दिल्ली, उसकी इमारतों, शाही दरबार, अमीरों और अफसरों के सामजिक जीवन के विषय में दिलचस्प विवरण दिए गए हैं. इस रचना द्वारा उन्होंने मंगोलों के प्रति अपनी घृणा भी प्रकट की है.

मिफता-उल-फुतूह

मिफता-उल-फुतूह की रचना उन्होंने 1291 ई में की. इस रचने में उन्होंने जलालुद्दीन खिलजी के सैन्य अभियानों, मालिक छज्जू का विद्रोह व उसका दमन, रणथम्बौर पर सुलतान की चढ़ाई और अन्य स्थानों की विजय पर विचार किया है.

खजाइन-उल-फुतूह

खजाइन-उल-फुतूह में, जिसे तारीख-ए-अलाई के नाम से भी जाना जाता है, अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के पहले 15 वर्षों का चाटुकारितापूर्ण विवरण है. यद्यपि यह रचना मूलतः साहित्यिक है परन्तु फिर भी इसका अपना महत्त्व है क्योंकि अलाउद्दीन खिलजी का समसामयिक विवरण केवल इसी पुस्तक में मिलता है. इसमें उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी द्वारा गुजरात, चित्तौड़, मालवा और वारंगल की विजय के विषय में लिखा है. इसमें हमें मालिक काफूर के दक्कन अभियानों का आँखों देखा विवरण मिलता है और भौगोलिक और सैन्य विवरणों की दृष्टि से यह काफी प्रसिद्ध है. इसमें भारत का बड़ा ही अच्छा चित्रण है और साथ ही अलाउद्दीन के भवनों व प्रशासनिक सुधारों का वर्णन किया गया है. परन्तु अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल पर विचार करते समय उनकी दृष्टि आलोचनात्मक नहीं रही है.

आशिका

अमीर खुसरो की एक अन्य रचना 'आशिका” का सम्बन्ध गुजरात के राजकरन की पुत्री देवलरानी और अलाउद्दीन के पुत्र खिज्रखां की प्रेमकथा से है. इसमें अलाउद्दीन की गुजरात व आलवा विजय के बारे में चर्चा की गई है. साथ ही उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों की स्थालाकृति (topography) का वर्णन भी किया है. इसमें वे मंगोलों द्वारा स्वयं अपने कैद किये जाने की चर्चा भी करते हैं.

नूह सिपिहर

एक अन्य पुस्तक जहाँ हिन्दुस्तान और उसके लोगों का अच्छा चित्रण हुआ है वह नूह सिपिहर (Nuh Sipihr) है. इसमें मुबारक खिलजी का बड़ा ही चातुकारतापूर्ण विवरण है. उन्होंने मुबारकशाह के भवनों के विजयों के साथ-साथ जलवायु, सब्जियों, फलों, भाषाओं, दर्शनरम जीवन जैसे विषयों पर विचार किया है. इसमें तत्कालीन सामजिक स्थिति का बड़ा ही जीवंत चित्रण देखने को मिलता है.

तुगलकनामा

खुसरो की अंतिम ऐतिहासिक मसनवी है तुगलकनामा. इसमें खुशरोशाह के विरुद्ध गयासुद्दीन तुगलक की विजय का चित्रण है. पूरी कहानी को धार्मिक रंग में प्रस्तुत किया गया है. इसमें गयासुद्दीन सत् तत्वों का प्रतीक है और उसे असत् तत्वों के अमीर खुसरोशाह के साथ संघर्ष करते दिखाया गया है.

अमीर खुसरो (Amir Khusro) का एक मजबूत पहलू यह है कि उन्होंने बहुत-सी तिथियाँ दी हैं और उनके द्वारा दिया गया कालक्रम बरनी की अपेक्षा कहीं अधिक विश्ववसनीय है. उनकी रचनाएँ तत्कालीन सामजिक स्थितियों पर भी काफी प्रकाश डालती है और यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी ओर उस समय के अन्य इतिहासकारों का ख़ास ध्यान नहीं गया था.

हिन्दू धर्म विध्वंसक औरंगजेब (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, हिन्दुस्तान, म्यांमार, श्री लंका)

अबुल मुजफ्फर मुहि-उद-द्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब

औरंगज़ेब का जन्म 14 अक्टूबर 1618 AD में दोहाद  में हुआ | वह शाहजहां और मुमताज़ महल की संतान था  | इसका  इंतकाल (मृत्यु ) 20 फरवरी 1707 AD में अहमदनगर में हुआ और इसे खुलदाबाद में दफनाया गया |

औरंगज़ेब आखिरी शक्तिशाली मुगल सम्राट और सम्राट शाहजहाँ व मुमताज़ महल की तीसरी संतान था  जिसने मुगल साम्राज्य को समृद्धि के स्तर तक पहुंचाया | उसकी रणनीतियाँ उसके कट्टरपन  के बारे मे बताती  हैं |

 शुरुआती  जीवन

औरंगजेब एक ईमानदार और  समर्पित किशोर की तरह पला बढ़ा। इसने कट्टर मुस्लिम से विवाह किया | बहुत ही कम आयु में इसमे सशस्त्र बालों के लक्षण दिखाई दिये और इसके प्रबंधकीय कौशल से हर कोई आश्चर्यचकित था  जिसके परिणामस्वरूप इसका  अपने बड़े भाई दारा शिकोहा से विवाद हो गया जिसका स्वभाव तेज़ व अस्थिर था तथा जिसे औरंगज़ेब के पिता द्वारा सिंहासन का वारिस बना दिया गया था |

1646 AD से 1647 AD तक औरंगज़ेब ने अद्वितीय उत्कृष्टता के साथ सैनिकों को उज़्बेक और पर्शिया के खिलाफ आदेश दिया | 1657 AD में जब शाहजहां गिर गए, तब दोनों भाइयों के बीच का तनाव उन्हें सत्ता के युद्ध की तरफ ले गया |

परंतु शाहजहाँ के अप्रत्याशित स्वास्थ्य लाभ ने दोनों बच्चों के बीच के सत्ता के संघर्ष को समाप्त कर दिया | 1675 AD से 1659 AD तक सत्ता के युद्ध में औरंगज़ेब ने उसकी अंतरराष्ट्रीय सैन्य योग्यता, अधिक्रमण की अपनी असाधारण सैन्य शक्ति के बारे में परिचय दिया  जिसका परिणाम था कि दारा 1658 AD में समूरगढ़ में हार गया जिसके बाद उसने(औरंगज़ेब) अपने पिता (शाहजहाँ) को आगरा में अपने ही शाही निवास में बंदी बना लिया |  

भारत के सम्राट

1680 AD के आसपास औरंगज़ेब पूरी तरह से उत्तर पश्चिम को पर्शिया और मध्य एशियाई तुर्क और मराठा शासक शिवाजी से बचाने में व्यस्त हो गया  जिन्होनें दो बार सूरत के बन्दरगाह को लूटा था /

औरंगज़ेब ने विजय के लिए  अपने परदादा अकबर के नियम को अपनाया, दुश्मन की जासूसी करना, उससे मिलनसार संबंध बनाना, व शाही सेवा के द्वारा उनके जीवन व राज्य के रहस्यों के बारे मे पता लगाना | इस प्रकार , स्वतंत्र मराठा राज्य के नेता के रूप में, शिवाजी को पराजित कर, उन्हे आगरा, समझौते के लिए बुलाया गया (1666 AD) तथा उन्हें उच्च स्थान दिया गया, परंतु यह योजना 1680 AD में शिवाजी के दक्कन मे भाग जाने और वहाँ मृत्यु हो जाने से असफल हो गई |

1680 AD के आसपास के बाद औरंगज़ेब के शासन ने मन की स्थिति के परिवर्तन के साथ रणनीति मे परिवर्तन को अनुभव किया | इसने फिर से 1679 AD में गैर मुसलमानों पर सर्वाधिक सर्वेक्षण कर लगा दिया जिसे अकबर के शासन काल के दौरान हटा दिया गया था | बीजापुर के दक्कन राज्य मे अस्थिरता ने एक लंबे आर्थिक संकट को प्रोत्साहित किया जोकि मराठों से युद्ध के बाद विकसित हुआ  था |  शिवाजी के पुत्र सांभाजी को पकड़ लिया गया व 1689 AD में हत्या कर दी गई और जिसका परिणाम यह था कि  औरंगजेब का  साम्राज्य विभाजित हो  गया |

औरंगज़ेब ने दक्षिण में अनुपस्थिति के कारण उत्तरी प्रांत पर अपना नियंत्रण खो दिया जोकि पहले था | इसका परिणाम यह हुआ कि संगठन कमजोर हो गया | 1675 AD  में औरंगज़ेब ने सिख गुरु, तेग बहादुर को पकड़ा व हत्या कर दी जिन्होनें इस्लाम धर्म को अपनाने से मना कर दिया था, गुरु तेग बहादुर के आगे के गुरुओं ने औरंगजेब के शासन की नीतियों का खुल कर विरोध किया |

मृत्यु

1689 AD तक लगभग दक्षिण भारत के सभी हिस्से मुगल साम्राज्य का हिस्सा बन गए थे और गोलकोंडा की उपलब्धि के बाद, औरंगज़ेब शायद सबसे अमीर और सबसे धनवान जीवित व्यक्ति था | औरंगज़ेब के विशाल राजसी युद्ध, मुगल साम्राज्यों  के क्षेत्रों पर अवरोध उत्त्प्न करती थी और यह उसके प्रतिद्वंधियों को उसके विरुद्ध उसके  महत्व को अलंकृत  करती थीं | औरंगजेब के युद्धों  को प्रांतीय नवाबों की कमी के कारण परेशानी हुई |

मुसलमानों का दृष्टिकोण औरंगज़ेब  से भिन्न था | ज़्यादातर मुस्लिम इतिहासकारों का मत था कि जब साम्राज्य पतन की कगार पर खड़ा था, उस समय  औरंगजेब सबसे शक्तिशाली अंतिम मुगल सम्राट था | महत्वपूर्ण विद्रोहों को सिखों व मराठों द्वारा सुलझा लिया गया जिन्होनें निर्जन स्थानों मे फैली  मुगल साम्राज्य की जड़ों  को उखाड़ फेंका था  |

औरंगजेब भी अपने पूर्वजों की तरह ही सोचता था कि  राजसी धनराशि को अपने साम्राज्य के नागरिकों के लिए उपयोग किया जाना चाहिए |प्रशासन के भारी काम में व्यस्त रहते हुए भी वह अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कुरान की  आयतों की नकल कर पैसा कमाने का समय निकाल लेता था | छोटे संगमरमर से निर्मित मस्जिद का निर्माण औरंगजेब द्वारा करवाया गया था, जिसे मोती मस्जिद के रूप में जाना गया, और यह दिल्ली के लाल किले  के प्रांगण में स्थित है | दूसरी तरफ, उसके लगातार युद्धों ने, खासकर मराठों के साथ, ने उसके राज्य को आर्थिक दिवालियापन की कगार पर  ला  दिया  था /

1706 AD के अपने अंतिम युद्ध में औरंगज़ेब मराठों के विरुद्ध था और इस युद्ध में उसे मुगल सशस्त्र बल में  नए उन्नत प्रमुखों  का सहयोग मिला जो थे सय्यद, हसन आली खान बरहा, सादत आली खान और आसफ जह-ई और दाऊद खान |

 जीवन के अंतिम दिनों में औरंगज़ेब बीमार हो गया और वह चाहता था कि  उसके साम्राज्य के निवासियों को जानकारी होनी चाहिए कि वह अभी जीवित है | औरंगज़ेब का 20 फरवरी 1707 AD मे 88 वर्ष की आयु में अहमदनगर मे देहांत हो गया  |

कमजोर शासकों के अनुक्रम, उत्तराधिकार के लिए युद्ध और अमीर वर्ग के लोगों द्वारा शासन को उखाड़ फेंकने की साजिशें, मुगल शक्ति के कमजोर होने के अनिवार्य कारण बने, वास्तव  में यह सब  अंतिम मुगल सम्राट  औरंगजेब की मृत्यु के बाद हुआ  |

बहादुर शाह I, औरंगजेब के पुत्र को राजगद्दी मिल गई तथा वह साम्राज्य जिसने मुगल शासक औरंगजेब के शासन के दौरान समृद्धि को छुआ था, परंतु औरंगजेब के अधिक विस्तार क्षेत्र और बहादुर शाह के कमजोर सैन्य और आत्मबल  साम्राज्य को पतन के द्वार पर ले गई |

बहादुर शाह ने राजगद्दी को संभालने के बाद, मुगल साम्राज्य की समस्याओं को उजागर किया  | औरंगजेब की मृत्यु के कई वर्षों के बाद भी मुगल सम्राट की शक्तियाँ दिल्ली की सीमा के आसपास तक ही सीमित रह गईं थी |

मुगल बादशाह अकबर की प्रसासनिक ब्यावस्था

अकबर की प्रशासनिक, धार्मिक, सैन्य और न्यायिक व्यवस्था

Important Information about Akbar

  1. हुमायूँ के मरने के बाद राजपाठ की जिम्मेदारी बैरम खां ने संभाली क्योंकि अकबर उस समय उम्र में छोटा था. हाँ भले ही बाद में अकबर ने उसे मरवा दिया. इसलिए परीक्षा में आपसे पूछा जा सकता है कि अकबर ने किसे अपने रास्ते से हटा कर सारी शक्ति अपने हाथों में केन्द्रित कर ली?
  2. बैरम को रास्ते से हटाने में अतका खैल ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिससे वह अकबर को अपने प्रभाव में ले ले और वही हुआ भी.
  3. यदि हत्या की बात की तो जाए, तो अकबर के हाथ भी खून से रंगे थे, चलिए जानते हैं कि उसने किसको किसको खुद टपकाया या कहिये टपकवाया — पहला तो हुआ बैरम खां, फिर अधम खां, अपने मामा ख्वाजा मुअज्जम और कई अन्य कई सगे-सम्बन्धी. (ऐसे में अकबर को आज के जमाने में बाल सुधार गृह में डाल दिया जाता)
  4. इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि जिन परिस्थितियों में अकबर का राज्यारोहण हुआ था, उस समय मुगलों के भारत में अनेक दुश्मन थे, अकबर अगर सभी प्रभावशाली राज्यों पर अपना अंकुश नहीं रखता तो उसके खुद की सत्ता खतरे में पड़ जाती. इसलिए अकबर ने शुरूआती दौर में साम्राज्यवादी नीति को अपनाया.
  5. उसने मालवा, जौनपुर, चुनार, जयपुर, मेड़ता, गोंडवाना, मेवाड़, रणथम्भौर, कालिंजर, मारवाड़ (जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर), गुजरात (अहमदाबाद, खम्बात)आदि कई जगहों पर अपने जीत का परचम लहराया.
  6. मालवा में बाजबहादुर को, जौनपुर में अफगानी शेर खां, चुनार में अफगानी शासक आसफ खां, जयपुर में कछवाहा राजपूत, मेड़ता में जयमल, गोंडवाना (मध्य प्रदेश) में रानी दुर्गावती का अल्पव्यस्क पुत्र वीर नारायण को, मेवाड़ में सिसोदिया राजपूत राणा उदय सिंह, रणथम्भौर में हाड़ा राजपूत राजा राय सुरजन, कालिंजर में राजा रामचंद्र, गुजरात में अहमदाबाद में मुजफ्फर खां और अन्य अनेक सरदारों को और खम्बात में मिर्जाओं (मिर्जा के नेता इब्राहीम हुसैन मिर्जा) और पुर्तगालियों को, बंगाल में दाउद को हराया.
  7. लगातार मिल रही जीतों के बीच अकबर को एक बार हार का भी सामना पड़ा. बंगाल, बिहार और उड़ीसा के शासक सुलेमानी कारारानी ने अकबर को हराया था. अकबर इसलिए हारा क्योंकि वह उस समय गुजरात में अपनी जड़ें जमा रहा था.
  8. अकबर का अंतिम युद्ध खानदेश के साथ हुआ. अली खां जो खुद अकबर का वफादार था, उसका बेटा अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था. इसलिए अकबर ने खानदेश पर आक्रमण करने का निर्णय लिया.
  9. 1572-82 का समय अकबर की धार्मिक नीति को समर्पित है. इसी समय इबादतखाना (प्रार्थना भवन) की स्थापना हुई, मजहर की घोषणा हुई और दीन-ए-इलाही अथवा तौहीद-ए-इलाही की स्थापना हुई.
  10. जून, 1579 में अकबर ने फैजी के सुझाव पर इमाम का पद ग्रहण किया जिससे प्रधान सदर और उलेमा के अधिकार अब अकबर के हाथों में आ गए.
  11. अकबर ने खलीफा के सामान स्वयं ही खुतबा पढ़ा और जमींबोस (राजगद्दी के सामने जमीन चूमने की प्रथा) और सिजदा (सम्राट के सामने झुककर अभिवादन करने की प्रथा) की प्रथा आरम्भ की.
  12. अकबर के दरबार में आने-जाने की घोषणा नगाड़ा बजाकर की जाती थी. यह प्रथा चौकी अथवा तस्लीम-ए-चौकी कहलाती थी.
  13. धार्मिक क्षेत्र में अकबर का सबसे महत्त्वपूर्ण और विवादास्पद कार्य था तौहीद-ए-ईलाही अथवा दीन-ए-ईलाही की स्थापना की. दीन-ए-ईलाही के विषय में और भी detail में पढ़ें >> दीन-ए-ईलाही
  14. अकबर के अधीन पाँच प्रमुख मंत्रियों अथवा अधिकारियों का उल्लेख मिलता है - वकील, वजीर अथवा दीवान, सद्र-उस-सद्र, मीर बख्शी और खानसामा (मीर सामाँ).
  15. वजीर प्रशासनिक मामलों के अतिरिक्त वित्त विभाग भी देखता था. वजीर की स्थिति प्रधानमंत्री जैसी थी.
  16. वजीर अथवा दीवानए-आला की सहायता के लिए अनेक पदाधिकारी नियुक्त किये गए थे, जैसे - दीवान-ए-खालसा (राज्य की भूमि की देखभाल करने वाला), दीवान-ए-तन (सरकारी कर्चारियों के वेतन और जागीर की देखभाल करनेवाला), मुस्तौफी (आय-व्यय का निरीक्षक), वाकया-ए-नवीस (राजकीय फरमानों और दस्तावेजों को सुरक्षित रखनेवाला पदाधिकारी) और मुशरिफ (दफ्तर की देखभाल करने वाला).
  17. काजी-उल-कजात प्रधान न्यायाधीश था जो पधान मुफ़्ती की सहयोग से न्याय का कार्य देखता था.
  18. मुहतसिब का मुख्य कार्य यह देखना था कि राज्य की जनता नैतिक नियमों का पालन ठीक ढंग से करे.
  19. मीर-ए-आतिश अथवा दारोगा-ए-तोपखाना शाही तोपखाना का प्रधान होता था.
  20. दारोगा-ए-डाकचौकी सूचना और गुप्तचर विभाग का प्रधान था.
  21. मीर मुंशी का काम बादशाह की आज्ञा और फरमानों को लिखना और उसका उचित प्रसारण करना था.
  22. अकबर ने सेना का संगठन मनसबदारी व्यवस्था के आधार पर किया था. इस व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक सरदार और सैनिक पदाधिकारी का मनसब (पद) निश्चित किया गया.
  23. उसने मनसबदारों की दो श्रेणियाँ बनाई थी - जात और सवार.
  24. अकबर की सेना में मनसबदारों की सेना के अतिरिक्त अहदी और दाखिली सैनिकों की टुकड़ियाँ भी थीं.
  25. अकबर ने भूमि और राजस्व-व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण सुधार किए थे. अकबर के समय में राज्य की समस्त भूमि खालसा, जागीर, जमींदारी और सुयूरघल अथवा इनाम में विभाजित थीं.
  26. राज्य की ओर से धार्मिक व्यक्तियों, विद्वानों इत्यादि को वजीफा, इनाम, सुयूरघल अथवा मदादीमशाह के रूप में जमीन दान दी जाती थी.
  27. अकबर के समय जमीन की चार श्रेणियाँ बनायीं गईं - पोलज, परती, छच्छर और बंजर.
  28. लगान वसूली का काम करोड़ी को सौंपा गया. यह व्यवस्था संतोषप्रद नहीं थी इसलिए 1580 ई. में दहशाळा प्रबंध अथवा जाब्ती-व्यवस्था लागू की गई जिसके अनुसार राज्य किसानों से उपज का 1/3 नकद लगान के रूप में लेता था. 
  29. कई क्षेत्रों में कंकूत व्यवस्था (किसानों द्वारा पिछले वर्षों में दी गई लगान के आधार पर अनुमानित लगानप्रचलित थी.
  30. किसानों के लिए तकावी ऋण की व्यवस्था की गई.
  31. सूबे का प्रशासन केंद्र से मिलता-जुलता था. सूबे का प्रधान सूबेदार अथवा सिपहसालार होता था. सूबे के अन्य अधिकारी थे बख्शी, सद्र, काजी, मीरअदल और मुफ़्ती.
  32. कोतवाल, मीरबहार (चुंगी वसूल करने वालातथा वाकिया नवीस भी प्रशासन में सहायता पहुँचाते थे.
  33. सूबा क्रमशः सरकार और परगना में विभाजित था.
  34. सरकार का सर्वोच्च पदाधिकारी फौजदार कहलाता था.
  35. आमिल भूमि-व्यवस्था और लगान-सम्बन्धी कार्य देखता था.
  36. परगना के शासन की जिम्मेवारी शिकदार, आमिल (मुंसिफ), और क़ानूनगो की थी. इनकी सहायता के लिए फोतेदार (कोषाध्यक्षऔर लेखक भी रहते थे.
  37. 1563 ई. में अकबर ने तीर्थयात्रा कर और 1564 ई. में जजिया कर हटा दिया.
  38. अकबर ने एक ऐसा सामजिक वातावरण तैयार करने का प्रयास किया जिसमें राज्य की समस्त जनता मिल-जुलकर सुख-शांति से रह सके. ऐसा मुग़ल साम्राज्य की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए आवश्यक था. अकबर की यह नीति सुलहकुल के नाम से विख्यात है.
  39. अकबर के दरबार में 9 प्रमुख व्यक्ति (नवरत्न) स्थाई रूप से रहते थे जिनमें बीरबल अकबर से अत्यधिक निकट था.
  40. अबुलफजल अकबर के दरबार के एक प्रसिद्ध विद्वान् थे जिन्होंने अकबरनामा और आइने-अकबरी की रचना की.
  41. गीता, महाभारत, रामायण, पंचतंत्र, सिहासन बत्तीसी, बाइबल, कुरान इत्यादि का अनुवाद फारसी में हुआ.
  42. अकबर के कार्यों को ध्यान में रहते हुए इतिहासकारों ने उसे एक 'राष्ट्रीय सम्राट” (National Monarch) का दर्जा मिला

मुगल बादशाह अकबर का शासनकाल(1526)

अकबर का जीवनकाल और साम्राज्य - Akbar's Life Story in Hindi

अकबर का उत्तर भारत पर विजय

अकबर मुग़लवंश का तीसरा बादशाह था. वह अपने पिता हुमायूं की मृत्यु के बाद 1556 ई. में सिंहासन पर बैठा. उस समय उसके अधीन कोई ख़ास इलाका नहीं था. उसी वर्ष पानीपत की दूसरी लड़ाई में उसने हेमू पर विजय पाई जो अफगनों के सूर राजवंश का समर्थक था. अब वह पंजाब, दिल्ली, आगरा और पास-पड़ोस के क्षेत्र का स्वामी बन गया. अगले पाँच वर्षों में अकबर ने इस क्षेत्र में अपने राज्य को मजबूत बनाया और पूर्व में गंगा-यमुना के संगम इलाहाबाद तक और मध्य भारत में ग्वालियर और राजस्थान में अजमेर तक अपना राज्य फैलाया. अगले 20 वर्षों में अकबर ने कश्मीर, सिंध और उड़ीसा को छोड़कर पूरे उत्तर भारत को जीत लिया. 1592 ई. तक उसने इन तीनों राज्यों को भी अपने राज्य में मिला लिया. इसके पहले 1581 ई. में उसने अपने छोटे भाई हकीम की बगावत का दमन किया जिसने अपने को काबुल का स्वतंत्र सुल्तान घोषित कर दिया था. दस वर्ष बाद अकबर ने कंधार जीत लिया और बलूचिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया.

दक्षिण भारत पर विजय और अकबर की मृत्यु

उत्तर भारत को जीतने के बाद उसने दक्षिण भारत को जीतने की कोशिश की. 1600 ई. में उसने अहमदनगर पर हमला किया और 1601 ई. में खान देश के असीरगढ़ को जीत लिया. यह उसके जीवन की अंतिम विजय थी. चार साल बाद उसकी मृत्यु हुई. उस समय उसका साम्राज्य पश्चिम में काबुल से पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में हिमालय की तराई से दक्षिण में नर्मदा नदी के किनारे तक फैला था.

अकबर का साम्राज्य

अकबर का साम्राज्य 15 सूबों में बँटा था -

  1. काबुल
  2. लाहौर (पंजाब) जिसमें कश्मीर भी शामिल था
  3. मुल्तान-सिंध
  4. दिल्ली
  5. आगरा
  6. अवध
  7. इलाहाबाद
  8. अजमेर
  9. अहमदाबाद
  10. मालवा
  11. बिहार
  12. बंगाल-उड़ीसा
  13. खानदेश
  14. बरार और
  15. अहमदनगर

कुशल प्रशासक

अकबर केवल एक विजेता ही नहीं था वरन् कुशल प्रशासक और साम्राज्य का संस्थापक भी था. उसने ऐसी प्रशासन व्यवस्था की जो उसके पहले के राज्यों की व्यवस्था से उच्चकोटि की थी. उसका राजतंत्र उसके व्यक्तिगत स्वेच्छाचारी शासन और नौकरशाही पर आश्रित था. उसका उद्देश्य बादशाह के व्यक्तिगत अधिकार और राजकोष को बढ़ाना था. बादशाह के हुक्म को उसके मनसबदार पूरा करते थे. मनसबदारों की 3-3 श्रेणियाँ थी, जिनके मंसब 10 से लेकर पाँच हजार तक के होते थे. इन मनसबदारों को वेतन नकद दिया जाता था. उनके ऊपर अंकुश रखने के लिए अनेक नियम बनाये गए थे, विशेष रूप से सवारों की फर्जी सूची रखने पर. हर एक सूबे में एक सूबेदार रहता था जिसको नवाब नाजिम भी कहा जाता है. वह भी अपना छोटा दरबार करता था जैसे कि तुर्क व अफगान सुलतानों के राज में होता था. लेकिन अकबर ने सूबेदारों पर अंकुश लगाया और सूबे के वित्तीय मामलों की देखभाल करने के लिए 'दीवान” नामक नया अधिकारी नियुक्त किया.

राजस्व बढ़ाने के लिए राजा टोडरमल की सहायता से अकबर ने भूमि की नाप जोख और पैमाइश कराकर मालगुजारी की नयी व्यवस्था की. रैयत और काश्तकारों से लगान की वसूली की सीधी व्यवस्था चलाई गई. उपज का तिहाई हिस्सा लगान के रूप में नकद अथवा अनाज के रूप में लिया जाता था और उसकी वसूली सरकारी अफसर करते थे.

हिन्दू के प्रति उसका व्यवहार

भारत के मुसलमान शासकों में अकबर का स्थान सबसे ऊपर रखा जाता है. उसके पहले के शासकों ने यहाँ की हिन्दू प्रजा का ख्याल नहीं रखा और उनमें और बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा में लगातार संघर्ष और शत्रुता का व्यवहार चलता रहता था. अकबर ने अपने शासक के आरंभिक वर्षों में यह अनुभव किया कि हिन्दुस्तान का बादशाह केवल मुसलामानों का ही शासक नहीं होना चाहिए. यहाँ के सम्राट को यदि अपने राज्य को मजबूत बनाना है तो उसे हिन्दुओं की राजभक्ति भी प्राप्त करना चाहिए. उसे हिन्दू-मुसलमान, यह भेदभाव नहीं करना चाहिए. इसलिए उसने उदार नीति अपनाई. उसने तीर्थ-यात्राओं के ऊपर लगनेवाले जजिया कर को समाप्त कर दिया जो केवल हिन्दुओं पर लगाया जाता था. उसने हिन्दुओं को भी उनकी प्रतिभा के अनुशासित पदों पर नियुक्त किया. अकबर को राजपूतों का समर्थन मिला और उनकी वीरता के आधार पर अकबर ने अपना साम्राज्य काबुल से बंगाल तक फैलाया.

एक राजपूत सरदार जिसका नाम बीरबल था, वह अपनी इच्छा से बादशाह अकबर की सेवा में आ गया और उसका मुँह-लगा स्नेहपात्र बन गया. अकबर ने उसे 'राजा” की पदवी दी. बीरबल बहादुर सेनापति होने के साथ-साथ एक प्रतिभाशाली कवि भी था. अकबर ने उसे 'कविराय” की उपाधि से सम्मानित किया था. बीरबल 1586 ई. में पश्चिमोत्तर सीमा के युसूफजाई कबीले पर चढ़ाई करने के लिए मुग़ल सेना का नायक बनाकर भेजा गया और वहाँ युद्ध में मारा गया.

दीन इलाही

अकबर ने हिन्दू और इस्लाम दोनों धर्मों की अच्छी बातों को लेकर नया मत चलाने का प्रयत्न किया. इसी उद्देश्य से उसने 1582 ई. में 'दीन इलाही” का प्रचलन किया. उसमें कुरान, हिन्दू धर्मशास्त्रों और बाइबिल के सिद्धांतों का समन्वय किया गया था. अकबर सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता के सिद्धांत को मानता था. उसने अपने नए धर्म को दूसरों पर लादने का प्रयास नहीं किया. दीन इलाही एकेश्वरवाद पर आधारित था किन्तु उसमें थोड़ा बहुदेववाद का भी पुट था. इसका उद्देश्य सार्वभौम धार्मिक सहिष्णुता की स्थापना करना था. भारत में, जो धार्मिक भेदभाव से बहुत पीड़ित था, इस प्रकार की सहिष्णुता एक राष्ट्रीय आवश्यकता थी. यह धर्म तर्क पर आधारित था. बहुत कम लोगों ने ही 'दीन इलाही” को कबूल किया. अकबर की मृत्यु के बाद यह धर्म लुप्त हो गया.

यदुवंशी सम्राट हर्षबर्धन

हर्षवर्धन काल

हर्षवर्धन पुष्यभूति राजवंश से संबंध रखता था जिसकी स्थापना नरवर्धन ने 5वीं या छठी शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में की थी। यह केवल थानेश्वर के राजा प्रभाकर वर्धन (हर्षवर्धन के पिता) के अधीन था। पुष्यभूति समृद्ध राजवंश था और इसने महाराजाधिराज का खिताब प्राप्त किया था। हर्षवर्धन 606 ईस्वी में 16 वर्ष की आयु में तब सिंहासन का उत्तराधिकारी बना था जब उसके भाई राज्यवर्धन की शशांक द्वारा हत्या कर दी गयी थी जो गौड और मालवा के राजाओं का दमन करने निकला था। हर्ष को स्कालोट्टारपथनाथ के रूप में भी जाना जाता था। सिंहासन पर बैठने के बाद उसने अपनी बहन राज्यश्री को बचाया और एक असफल प्रयास के साथ शशांक की तरफ बढा था।

अपने दूसरे अभियान में, शशांक की मौत के बाद, उसने मगध और शशांक के साम्राज्य पर विजय प्राप्त की थी। उसने कन्नौज में अपनी राजधानी स्थापित की। एक बड़ी सेना के साथ, हर्षवर्धन ने अपने साम्राज्य को पंजाब से उत्तरी उड़ीसा तथा हिमालय से नर्मदा नदी के तट तक विस्तारित किया।  उसने नर्मदा से आगे भी अपने साम्राज्य को विस्तारित करने की कोशिश की लेकिन ऐसा करने में वह विफल रहा था। उसे बादामी के चालुक्य राजा पुलकेसिन द्वितीय के हाथों हार का सामना करना पड़ा था।  बाणभट्ट द्वारा लिखित “हर्षचरित्र” हर्ष की अवधि में एक सफल दस्तावेज के रूप में मौजूद है। चीनी विद्वान ह्वेनसांग जिसने हर्ष के शासन के दौरान यहा का दौरा किया था, की रचनाओं में भी हर्ष और हर्ष की अवधि के दौरान के भारत, के बारे में काफी विस्तार से वर्णन किया गया है। 647 ईस्वी में हर्षवर्धन की मृत्यु के साथ ही उसके साम्राज्य का भी अंत हो गया।

प्रशासन

हर्ष के साम्राज्य में राजस्व को चार भागों में विभाजित किया गया था। पहला भाग राजा पर खर्च किया जाता था। दूसरा भाग विद्वानों पर खर्च किया जाता था। तीसरा भाग सरकारी कर्मचारियों पर खर्च किया जाता था और चौथे भाग को धार्मिक गतिविधियों पर खर्च किया जाता था।

सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था:

हर्ष के राज्य का दौरा करने वाले ह्वेनसांग के अनुसार, भारतीय समाज में जातीय व्यवस्था अस्तित्व में थी। इसके अलावा कई मिश्रित और उप जातियों का भी उदय हुआ था। ह्वेनसांग ने अछूत और जातिच्युत के अस्तित्व का भी उल्लेख किया है। इस अवधि के दौरान महिलाओं की स्थिति में भी काफी गिरावट आई थी। लेकिन फिर भी महिलाएं पुरुषों के अधीन नहीं मानी जाती थी। धार्मिक क्षेत्र में ब्राह्मणवाद का प्रभुत्व बौद्ध धर्म के पतन का कारण बना था। वैष्णव, शैव और जैन धर्म भी अस्तित्व में थे। हर्ष को उदार और धर्मनिरपेक्ष राजा माना जाता था। राजस्व का मुख्य स्रोत भूमि की उपज का छठा हिस्सा होती थी। कुछ अन्य कर बंदरगाहों,  घाटों आदि पर लगाए गए थे। शाही भूमि से प्राप्त लाभ, खदानों और जागीरदारी से अर्जित शाही खजाना भी राजस्व के स्त्रोत थे।

महत्वपूर्ण हस्तियां:

हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान दो महत्वपूर्ण हस्तियां थीं।

क) बाणभट्ट हर्ष के दरबार में एक कवि थे। उन्होंने हर्षवर्धन की जीवनी 'हर्षचरित' की रचना की जिसमें उन्होंने विस्तृत जानकारी के साथ हर्ष की शक्ति के उदय तक की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया है। यह संस्कृत भाषा में लिखित थी। उन्होंने 'कादम्बरी' नामक एक नाटक भी लिखा था।

ख) ह्वेनसांग जो एक चीनी तीर्थयात्री था उसने भी हर्ष के साम्राज्य का दौरा किया था। चीन वापस जाने के बाद एक उसने 'शि-यू-की' (पश्चिम की दुनिया) नामक एक पुस्तक लिखी थी। हर्षवर्धन के साथ-साथ ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक में दो अन्य राजाओं- पल्लव वंश के नरसिंह वर्मन और चालुक्य वंश के पुलकेसिन द्वितीय की भी प्रशंसा की थी। वह अफगानिस्तान के माध्यम से मध्य एशिया में आया था और उसी मार्ग के माध्यम से वापस चला गया। ह्वेनसांग ने नालंदा में अध्ययन किया था और बाद में नौ वर्षों तक वहां शिक्षण भी किया था।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • हर्षवर्धन, सीखने वालों के लिए एक महान संरक्षक था और उसने खुद संस्कृत नाटकों, नागनंद, रत्नावली और प्रियदर्शिका की रचना की थी।
  • उसने कई विश्राम गृहों और अस्पतालों का निर्माण करवाया था।
  • ह्वेनसांग ने कन्नौज में आयोजित भव्य सभा के बारे में उल्लेख किया है जिसमें बीस राजाओं, चार हजार बौद्ध भिक्षुओं और तीन हजार जैन तथा ब्राह्मणों ने भाग लिया था।
  • हर्ष हर पांच साल के अंत में, प्रयाग (इलाहाबाद) में महामोक्ष हरिषद नामक एक धार्मिक उत्सव का आयोजन करता था। यहां पर वह दान समारोह आयोजित करता था।
  • हर्षवर्धन ने अपनी आय को चार बराबर भागों में बांट रखा था जिनके नाम--शाही परिवार के लिए, सेना तथा प्रशासन के लिए, धार्मिक निधि के लिए और गरीबों और बेसहारों के लिए थे।
  • ह्वेनसांग के अनुसार, हर्षवर्धन के पास एक कुशल सरकार थी। उसने यह भी उल्लेख किया है कि वहां परिवार पंजीकृत नहीं किये गये थे और कोई बेगार नहीं था। लेकिन नियमित रूप से होने वाली डकैती के बारे में उसे शिकायत थी।  
  • पुलकेसिन द्वितीय के हाथों हर्षवर्धन की हार का उल्लेख ऐहोल शिलालेख (कर्नाटक) में किया गया है। वह पहला उत्तर भारतीय राजा था जिसे दक्षिण भारतीय राजा के हाथों पराजय का सामना करना पड़ा था।

महत्वपूर्ण घटनाएँ

  • वर्धन वंश की स्थापना पांचवी सदी के अंत या छठी शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ के आसपास नरवर्धन द्वारा की गयी थी।
  • हर्षवर्धन अपने बड़े भाई राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद सोलह साल की उम्र में 606 ईस्वी में सिंहासन पर आसीन हुआ था।
  • हर्ष ने अपनी बहन राज्यश्री को छुड़ाया था जिसे शशांक ने उसके पति ग्रहवर्मन की हत्या के बाद बंदी बना लिया था।
  • ह्वेनसांग ने 631 ईस्वी में हर्ष के दरबार का दौरा किया था।
  • हर्ष को 637 ईस्वी में पुलकेसिन द्वितीय से हार का सामना करना पड़ा था।
  • 643 ईस्वी में ह्वेनसांग के लिए कन्नौज में भव्य सभा का आयोजन किया गया था।
  • 647 ईस्वी में हर्ष का निधन हो गया था।

 

भारतीय 16 राजधानी

सोलह महाजनपद - प्रमुख राज्यों का संक्षिप्त विवरण

सोलह महाजनपद और उनकी राजधानी 

अंग

यह महाजनपद मगध राज्य के पूर्व में स्थित था. इसकी राजधानी चंपा थी. आधुनिक भागलपुर और मुंगेर का क्षेत्र इसी जनपद में शामिल था. गौतम बुद्ध के समय में इस राज्य का मगध के साथ संघर्ष चलता रहा. संभवतः प्रारभ में अंग ने कुछ समय के लिए मगध को पराजित कर अपने में शामिल कर लिया. लेकिन शीघ्र ही इस जनपद की शक्ति क्षीण हो गयी और बिम्बिसार नामक शासक ने न केवल मगध को अंग से स्वतंत्र कराया बल्कि उसने अंग को भी अपने अधीन किया. कालांतर में यह राज्य मगध राज्य का ही हिस्सा बन गया.

मगध

बौद्ध साहित्य में इस राज्य की राजधानी (गिरिव्रज या राजगीर) और निवासियों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है. वर्तमान पटना और गया जिलों के क्षेत्र इसके अंग थे. अथर्ववेद में भी इस राज्य का उल्लेख है.

काशी

इसकी राजधानी वाराणसी (बनारस) थी. काशी के कौसल, मगध और अंग राज्यों से सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे और प्रायः उसे उसने संघर्षरत रहना पड़ा. गौतम बुद्ध के समय में काशी राज्य का राजनैतिक पतन हो गया.

वृज्जि या वज्जि संघ

यह महाजनपद मगध के उत्तर में स्थित था. यह संघ आठ कुलों के संयोंग से बना और इनमें चार (विदेह, ज्ञातृक, वज्जि और लिच्छवि) कुल अधिक प्रमुख थे. विशाल इस संघ की राजधानी थी.

कोसल

इन जनपद की सीमाएँ पूर्व में सदानीर नदी (गण्डक), पश्चिम में पंचाल, सर्पिका या स्यन्दिका नदी (सई नदी) दक्षिण और उत्तर में नेपाल की तलपटी थी. सरयू नदी इसे (कोसल जनपद को) दो भागों में विभाजित करती थी. एक उत्तरी कोसल जिसकी राजधानी श्रावस्ती थी और दूसरा दक्षिणी कोसल, जिसकी राजधानी कुशावती थी.

मल्ल

यह जनपद वज्जि संघ के उत्तर में स्थित एक पहाड़ी राज्य था. इसके दो भाग थे जिनमें एक की राजधानी कुशीनगर (जहाँ महात्मा बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ) और दूसरे भाग की राजधानी पावा (जहाँ वर्धमान महावीर को निर्वाण मिला) थी.

चेदि

यह महाजनपद यमुना नदी के किनारे स्थित था. यह आधुनिक बुन्देलखंड के पूर्वी भाग और उसके समीपवर्ती भूखंड में फैला हुआ था. महाभारत के अनुसार 'शुक्तिमती” इसकी राजधानी थी लेकिन 'चेतियजातक” के अनुसार 'सोत्थिवती” इसकी राजधानी थी. महाभारत के अनुसार शिशुपाल यहीं का शासक था.

वत्स

काशी के पश्चिम भाग में प्रयाग के आसपास क्षेत्र में यह जनपद स्थित था. कौशाम्बी इसकी राजधानी थी. बुद्ध के समय में इसका शासक उदयन था.

कुरु

उत्तर वैदिक साहित्य में इस जनपद के पर्याप्त विवरण प्राप्त होते हैं. इसके थानेश्वर (हरियाणा राज्य में) दिल्ली और मेरठ का क्षेत्र सम्मिलित थे. इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ (हस्तिनापुर) थी.

पंचाल

यह जनपद उत्तर वैदिक काल में ही प्रसिद्ध था. इसमें वर्तमान रूबेलखंड और उसके समीप के कुछ जिले सम्मिलित थे. इसके दो भाग थे - उत्तरी पंचाल और दक्षिणी पंचाल. उत्तरी पंचाल की राजधानी अहिच्छत्र और दक्षिणी पंचाल की राजधानी काम्पिल्य थी. मूलतः यह जनपद एक राजतंत्र था लेकिन संभवतः कौटिल्य के काल में यहाँ गणतंत्रीय शासन व्यवस्था हो गयी.

मत्स्य

इस जनपद में आधुनिक राजस्थान राज्य के जयपुर और अलवर जिले शामिल थे. विराट नगर संभवतः इसकी राजधानी थी. सम्भवतः यह जनपद कभी चेदि राज्य के अधीन रहा था.

शूरसेन

मथुरा और उसके आसपास के क्षेत्र इस जनपद में शामिल थे. आधुनिक मथुरा नगर ही इसकी राजधानी था. बौद्ध ग्रन्थों में अयन्तिपुत्र शूरसेन राज्य का उल्लेख मिलता है. वह बौद्ध धर्म का अनुयायी और संरक्षक था.

अस्सक या अस्मक

यह राज्य गोदावरी नदी के किनारे पर स्थित था. पाटेन अथवा पोटन इसकी राजधानी थी. पुराणों के अनुसार इस महाजनपद के शासक इक्ष्वाकु वंश के थे. जातक कथाओं में भी इस जनपद के अनेक राजाओं के नामों की जानकारी मिलती है.

अवन्ति

अवंति राजतंत्र में लगभग उज्जैन प्रदेश और उसके आसपास के जिले थे. पुराणों के अनुसार पुणिक नामक सेनापति ने यदुवंशीय वीतिहोत्र नामक शासक की हत्या करके अपने पुत्र प्रद्योत को अवन्ति की गद्दी पर बैठाया. इसके अंतिम शासक नन्दवर्धन को मगध के शासक शिशुनाग ने पराजित किया और इसे अपने साम्राज्य का अंग बना लिया. यह महाजनपद दो भागों में विभाजित था. उत्तरी भाग की राजधानी उज्जयिनी और दक्षिणी भाग की राजधानी महिष्मति थी.

कम्बोज

यह राज्य गांधार के पड़ोस में था. कश्मीर के कुछ भाग जैसे राजोरी और हजार जिले इसमें शामिल थे. संभवतः राजपुर या हाटक इसकी राजधानी थी.

गांधार

इस जनपद में वर्तमान पेशावर, रावलपिण्डी और कुछ कश्मीर का भाग भी शामिल था. तक्षशिला इसकी राजधानी थी. गांधार का राजा पुमकुसाटी गौतम बुद्ध और बिम्बिसार का समकालीन था. उसने अवंति के राजा प्रद्योत से कई युद्ध किए और उसे पराजित किया. इसकी राजधानी विद्या का केंद्र था. देश-विदेश से विद्यार्थी यहाँ शिक्षा प्राप्त करने आते थे.

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...