मुगल बादशाह अकबर की प्रसासनिक ब्यावस्था

अकबर की प्रशासनिक, धार्मिक, सैन्य और न्यायिक व्यवस्था

Important Information about Akbar

  1. हुमायूँ के मरने के बाद राजपाठ की जिम्मेदारी बैरम खां ने संभाली क्योंकि अकबर उस समय उम्र में छोटा था. हाँ भले ही बाद में अकबर ने उसे मरवा दिया. इसलिए परीक्षा में आपसे पूछा जा सकता है कि अकबर ने किसे अपने रास्ते से हटा कर सारी शक्ति अपने हाथों में केन्द्रित कर ली?
  2. बैरम को रास्ते से हटाने में अतका खैल ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिससे वह अकबर को अपने प्रभाव में ले ले और वही हुआ भी.
  3. यदि हत्या की बात की तो जाए, तो अकबर के हाथ भी खून से रंगे थे, चलिए जानते हैं कि उसने किसको किसको खुद टपकाया या कहिये टपकवाया — पहला तो हुआ बैरम खां, फिर अधम खां, अपने मामा ख्वाजा मुअज्जम और कई अन्य कई सगे-सम्बन्धी. (ऐसे में अकबर को आज के जमाने में बाल सुधार गृह में डाल दिया जाता)
  4. इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि जिन परिस्थितियों में अकबर का राज्यारोहण हुआ था, उस समय मुगलों के भारत में अनेक दुश्मन थे, अकबर अगर सभी प्रभावशाली राज्यों पर अपना अंकुश नहीं रखता तो उसके खुद की सत्ता खतरे में पड़ जाती. इसलिए अकबर ने शुरूआती दौर में साम्राज्यवादी नीति को अपनाया.
  5. उसने मालवा, जौनपुर, चुनार, जयपुर, मेड़ता, गोंडवाना, मेवाड़, रणथम्भौर, कालिंजर, मारवाड़ (जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर), गुजरात (अहमदाबाद, खम्बात)आदि कई जगहों पर अपने जीत का परचम लहराया.
  6. मालवा में बाजबहादुर को, जौनपुर में अफगानी शेर खां, चुनार में अफगानी शासक आसफ खां, जयपुर में कछवाहा राजपूत, मेड़ता में जयमल, गोंडवाना (मध्य प्रदेश) में रानी दुर्गावती का अल्पव्यस्क पुत्र वीर नारायण को, मेवाड़ में सिसोदिया राजपूत राणा उदय सिंह, रणथम्भौर में हाड़ा राजपूत राजा राय सुरजन, कालिंजर में राजा रामचंद्र, गुजरात में अहमदाबाद में मुजफ्फर खां और अन्य अनेक सरदारों को और खम्बात में मिर्जाओं (मिर्जा के नेता इब्राहीम हुसैन मिर्जा) और पुर्तगालियों को, बंगाल में दाउद को हराया.
  7. लगातार मिल रही जीतों के बीच अकबर को एक बार हार का भी सामना पड़ा. बंगाल, बिहार और उड़ीसा के शासक सुलेमानी कारारानी ने अकबर को हराया था. अकबर इसलिए हारा क्योंकि वह उस समय गुजरात में अपनी जड़ें जमा रहा था.
  8. अकबर का अंतिम युद्ध खानदेश के साथ हुआ. अली खां जो खुद अकबर का वफादार था, उसका बेटा अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था. इसलिए अकबर ने खानदेश पर आक्रमण करने का निर्णय लिया.
  9. 1572-82 का समय अकबर की धार्मिक नीति को समर्पित है. इसी समय इबादतखाना (प्रार्थना भवन) की स्थापना हुई, मजहर की घोषणा हुई और दीन-ए-इलाही अथवा तौहीद-ए-इलाही की स्थापना हुई.
  10. जून, 1579 में अकबर ने फैजी के सुझाव पर इमाम का पद ग्रहण किया जिससे प्रधान सदर और उलेमा के अधिकार अब अकबर के हाथों में आ गए.
  11. अकबर ने खलीफा के सामान स्वयं ही खुतबा पढ़ा और जमींबोस (राजगद्दी के सामने जमीन चूमने की प्रथा) और सिजदा (सम्राट के सामने झुककर अभिवादन करने की प्रथा) की प्रथा आरम्भ की.
  12. अकबर के दरबार में आने-जाने की घोषणा नगाड़ा बजाकर की जाती थी. यह प्रथा चौकी अथवा तस्लीम-ए-चौकी कहलाती थी.
  13. धार्मिक क्षेत्र में अकबर का सबसे महत्त्वपूर्ण और विवादास्पद कार्य था तौहीद-ए-ईलाही अथवा दीन-ए-ईलाही की स्थापना की. दीन-ए-ईलाही के विषय में और भी detail में पढ़ें >> दीन-ए-ईलाही
  14. अकबर के अधीन पाँच प्रमुख मंत्रियों अथवा अधिकारियों का उल्लेख मिलता है - वकील, वजीर अथवा दीवान, सद्र-उस-सद्र, मीर बख्शी और खानसामा (मीर सामाँ).
  15. वजीर प्रशासनिक मामलों के अतिरिक्त वित्त विभाग भी देखता था. वजीर की स्थिति प्रधानमंत्री जैसी थी.
  16. वजीर अथवा दीवानए-आला की सहायता के लिए अनेक पदाधिकारी नियुक्त किये गए थे, जैसे - दीवान-ए-खालसा (राज्य की भूमि की देखभाल करने वाला), दीवान-ए-तन (सरकारी कर्चारियों के वेतन और जागीर की देखभाल करनेवाला), मुस्तौफी (आय-व्यय का निरीक्षक), वाकया-ए-नवीस (राजकीय फरमानों और दस्तावेजों को सुरक्षित रखनेवाला पदाधिकारी) और मुशरिफ (दफ्तर की देखभाल करने वाला).
  17. काजी-उल-कजात प्रधान न्यायाधीश था जो पधान मुफ़्ती की सहयोग से न्याय का कार्य देखता था.
  18. मुहतसिब का मुख्य कार्य यह देखना था कि राज्य की जनता नैतिक नियमों का पालन ठीक ढंग से करे.
  19. मीर-ए-आतिश अथवा दारोगा-ए-तोपखाना शाही तोपखाना का प्रधान होता था.
  20. दारोगा-ए-डाकचौकी सूचना और गुप्तचर विभाग का प्रधान था.
  21. मीर मुंशी का काम बादशाह की आज्ञा और फरमानों को लिखना और उसका उचित प्रसारण करना था.
  22. अकबर ने सेना का संगठन मनसबदारी व्यवस्था के आधार पर किया था. इस व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक सरदार और सैनिक पदाधिकारी का मनसब (पद) निश्चित किया गया.
  23. उसने मनसबदारों की दो श्रेणियाँ बनाई थी - जात और सवार.
  24. अकबर की सेना में मनसबदारों की सेना के अतिरिक्त अहदी और दाखिली सैनिकों की टुकड़ियाँ भी थीं.
  25. अकबर ने भूमि और राजस्व-व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण सुधार किए थे. अकबर के समय में राज्य की समस्त भूमि खालसा, जागीर, जमींदारी और सुयूरघल अथवा इनाम में विभाजित थीं.
  26. राज्य की ओर से धार्मिक व्यक्तियों, विद्वानों इत्यादि को वजीफा, इनाम, सुयूरघल अथवा मदादीमशाह के रूप में जमीन दान दी जाती थी.
  27. अकबर के समय जमीन की चार श्रेणियाँ बनायीं गईं - पोलज, परती, छच्छर और बंजर.
  28. लगान वसूली का काम करोड़ी को सौंपा गया. यह व्यवस्था संतोषप्रद नहीं थी इसलिए 1580 ई. में दहशाळा प्रबंध अथवा जाब्ती-व्यवस्था लागू की गई जिसके अनुसार राज्य किसानों से उपज का 1/3 नकद लगान के रूप में लेता था. 
  29. कई क्षेत्रों में कंकूत व्यवस्था (किसानों द्वारा पिछले वर्षों में दी गई लगान के आधार पर अनुमानित लगानप्रचलित थी.
  30. किसानों के लिए तकावी ऋण की व्यवस्था की गई.
  31. सूबे का प्रशासन केंद्र से मिलता-जुलता था. सूबे का प्रधान सूबेदार अथवा सिपहसालार होता था. सूबे के अन्य अधिकारी थे बख्शी, सद्र, काजी, मीरअदल और मुफ़्ती.
  32. कोतवाल, मीरबहार (चुंगी वसूल करने वालातथा वाकिया नवीस भी प्रशासन में सहायता पहुँचाते थे.
  33. सूबा क्रमशः सरकार और परगना में विभाजित था.
  34. सरकार का सर्वोच्च पदाधिकारी फौजदार कहलाता था.
  35. आमिल भूमि-व्यवस्था और लगान-सम्बन्धी कार्य देखता था.
  36. परगना के शासन की जिम्मेवारी शिकदार, आमिल (मुंसिफ), और क़ानूनगो की थी. इनकी सहायता के लिए फोतेदार (कोषाध्यक्षऔर लेखक भी रहते थे.
  37. 1563 ई. में अकबर ने तीर्थयात्रा कर और 1564 ई. में जजिया कर हटा दिया.
  38. अकबर ने एक ऐसा सामजिक वातावरण तैयार करने का प्रयास किया जिसमें राज्य की समस्त जनता मिल-जुलकर सुख-शांति से रह सके. ऐसा मुग़ल साम्राज्य की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए आवश्यक था. अकबर की यह नीति सुलहकुल के नाम से विख्यात है.
  39. अकबर के दरबार में 9 प्रमुख व्यक्ति (नवरत्न) स्थाई रूप से रहते थे जिनमें बीरबल अकबर से अत्यधिक निकट था.
  40. अबुलफजल अकबर के दरबार के एक प्रसिद्ध विद्वान् थे जिन्होंने अकबरनामा और आइने-अकबरी की रचना की.
  41. गीता, महाभारत, रामायण, पंचतंत्र, सिहासन बत्तीसी, बाइबल, कुरान इत्यादि का अनुवाद फारसी में हुआ.
  42. अकबर के कार्यों को ध्यान में रहते हुए इतिहासकारों ने उसे एक 'राष्ट्रीय सम्राट” (National Monarch) का दर्जा मिला

मुगल बादशाह अकबर का शासनकाल(1526)

अकबर का जीवनकाल और साम्राज्य - Akbar's Life Story in Hindi

अकबर का उत्तर भारत पर विजय

अकबर मुग़लवंश का तीसरा बादशाह था. वह अपने पिता हुमायूं की मृत्यु के बाद 1556 ई. में सिंहासन पर बैठा. उस समय उसके अधीन कोई ख़ास इलाका नहीं था. उसी वर्ष पानीपत की दूसरी लड़ाई में उसने हेमू पर विजय पाई जो अफगनों के सूर राजवंश का समर्थक था. अब वह पंजाब, दिल्ली, आगरा और पास-पड़ोस के क्षेत्र का स्वामी बन गया. अगले पाँच वर्षों में अकबर ने इस क्षेत्र में अपने राज्य को मजबूत बनाया और पूर्व में गंगा-यमुना के संगम इलाहाबाद तक और मध्य भारत में ग्वालियर और राजस्थान में अजमेर तक अपना राज्य फैलाया. अगले 20 वर्षों में अकबर ने कश्मीर, सिंध और उड़ीसा को छोड़कर पूरे उत्तर भारत को जीत लिया. 1592 ई. तक उसने इन तीनों राज्यों को भी अपने राज्य में मिला लिया. इसके पहले 1581 ई. में उसने अपने छोटे भाई हकीम की बगावत का दमन किया जिसने अपने को काबुल का स्वतंत्र सुल्तान घोषित कर दिया था. दस वर्ष बाद अकबर ने कंधार जीत लिया और बलूचिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया.

दक्षिण भारत पर विजय और अकबर की मृत्यु

उत्तर भारत को जीतने के बाद उसने दक्षिण भारत को जीतने की कोशिश की. 1600 ई. में उसने अहमदनगर पर हमला किया और 1601 ई. में खान देश के असीरगढ़ को जीत लिया. यह उसके जीवन की अंतिम विजय थी. चार साल बाद उसकी मृत्यु हुई. उस समय उसका साम्राज्य पश्चिम में काबुल से पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में हिमालय की तराई से दक्षिण में नर्मदा नदी के किनारे तक फैला था.

अकबर का साम्राज्य

अकबर का साम्राज्य 15 सूबों में बँटा था -

  1. काबुल
  2. लाहौर (पंजाब) जिसमें कश्मीर भी शामिल था
  3. मुल्तान-सिंध
  4. दिल्ली
  5. आगरा
  6. अवध
  7. इलाहाबाद
  8. अजमेर
  9. अहमदाबाद
  10. मालवा
  11. बिहार
  12. बंगाल-उड़ीसा
  13. खानदेश
  14. बरार और
  15. अहमदनगर

कुशल प्रशासक

अकबर केवल एक विजेता ही नहीं था वरन् कुशल प्रशासक और साम्राज्य का संस्थापक भी था. उसने ऐसी प्रशासन व्यवस्था की जो उसके पहले के राज्यों की व्यवस्था से उच्चकोटि की थी. उसका राजतंत्र उसके व्यक्तिगत स्वेच्छाचारी शासन और नौकरशाही पर आश्रित था. उसका उद्देश्य बादशाह के व्यक्तिगत अधिकार और राजकोष को बढ़ाना था. बादशाह के हुक्म को उसके मनसबदार पूरा करते थे. मनसबदारों की 3-3 श्रेणियाँ थी, जिनके मंसब 10 से लेकर पाँच हजार तक के होते थे. इन मनसबदारों को वेतन नकद दिया जाता था. उनके ऊपर अंकुश रखने के लिए अनेक नियम बनाये गए थे, विशेष रूप से सवारों की फर्जी सूची रखने पर. हर एक सूबे में एक सूबेदार रहता था जिसको नवाब नाजिम भी कहा जाता है. वह भी अपना छोटा दरबार करता था जैसे कि तुर्क व अफगान सुलतानों के राज में होता था. लेकिन अकबर ने सूबेदारों पर अंकुश लगाया और सूबे के वित्तीय मामलों की देखभाल करने के लिए 'दीवान” नामक नया अधिकारी नियुक्त किया.

राजस्व बढ़ाने के लिए राजा टोडरमल की सहायता से अकबर ने भूमि की नाप जोख और पैमाइश कराकर मालगुजारी की नयी व्यवस्था की. रैयत और काश्तकारों से लगान की वसूली की सीधी व्यवस्था चलाई गई. उपज का तिहाई हिस्सा लगान के रूप में नकद अथवा अनाज के रूप में लिया जाता था और उसकी वसूली सरकारी अफसर करते थे.

हिन्दू के प्रति उसका व्यवहार

भारत के मुसलमान शासकों में अकबर का स्थान सबसे ऊपर रखा जाता है. उसके पहले के शासकों ने यहाँ की हिन्दू प्रजा का ख्याल नहीं रखा और उनमें और बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा में लगातार संघर्ष और शत्रुता का व्यवहार चलता रहता था. अकबर ने अपने शासक के आरंभिक वर्षों में यह अनुभव किया कि हिन्दुस्तान का बादशाह केवल मुसलामानों का ही शासक नहीं होना चाहिए. यहाँ के सम्राट को यदि अपने राज्य को मजबूत बनाना है तो उसे हिन्दुओं की राजभक्ति भी प्राप्त करना चाहिए. उसे हिन्दू-मुसलमान, यह भेदभाव नहीं करना चाहिए. इसलिए उसने उदार नीति अपनाई. उसने तीर्थ-यात्राओं के ऊपर लगनेवाले जजिया कर को समाप्त कर दिया जो केवल हिन्दुओं पर लगाया जाता था. उसने हिन्दुओं को भी उनकी प्रतिभा के अनुशासित पदों पर नियुक्त किया. अकबर को राजपूतों का समर्थन मिला और उनकी वीरता के आधार पर अकबर ने अपना साम्राज्य काबुल से बंगाल तक फैलाया.

एक राजपूत सरदार जिसका नाम बीरबल था, वह अपनी इच्छा से बादशाह अकबर की सेवा में आ गया और उसका मुँह-लगा स्नेहपात्र बन गया. अकबर ने उसे 'राजा” की पदवी दी. बीरबल बहादुर सेनापति होने के साथ-साथ एक प्रतिभाशाली कवि भी था. अकबर ने उसे 'कविराय” की उपाधि से सम्मानित किया था. बीरबल 1586 ई. में पश्चिमोत्तर सीमा के युसूफजाई कबीले पर चढ़ाई करने के लिए मुग़ल सेना का नायक बनाकर भेजा गया और वहाँ युद्ध में मारा गया.

दीन इलाही

अकबर ने हिन्दू और इस्लाम दोनों धर्मों की अच्छी बातों को लेकर नया मत चलाने का प्रयत्न किया. इसी उद्देश्य से उसने 1582 ई. में 'दीन इलाही” का प्रचलन किया. उसमें कुरान, हिन्दू धर्मशास्त्रों और बाइबिल के सिद्धांतों का समन्वय किया गया था. अकबर सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता के सिद्धांत को मानता था. उसने अपने नए धर्म को दूसरों पर लादने का प्रयास नहीं किया. दीन इलाही एकेश्वरवाद पर आधारित था किन्तु उसमें थोड़ा बहुदेववाद का भी पुट था. इसका उद्देश्य सार्वभौम धार्मिक सहिष्णुता की स्थापना करना था. भारत में, जो धार्मिक भेदभाव से बहुत पीड़ित था, इस प्रकार की सहिष्णुता एक राष्ट्रीय आवश्यकता थी. यह धर्म तर्क पर आधारित था. बहुत कम लोगों ने ही 'दीन इलाही” को कबूल किया. अकबर की मृत्यु के बाद यह धर्म लुप्त हो गया.

यदुवंशी सम्राट हर्षबर्धन

हर्षवर्धन काल

हर्षवर्धन पुष्यभूति राजवंश से संबंध रखता था जिसकी स्थापना नरवर्धन ने 5वीं या छठी शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में की थी। यह केवल थानेश्वर के राजा प्रभाकर वर्धन (हर्षवर्धन के पिता) के अधीन था। पुष्यभूति समृद्ध राजवंश था और इसने महाराजाधिराज का खिताब प्राप्त किया था। हर्षवर्धन 606 ईस्वी में 16 वर्ष की आयु में तब सिंहासन का उत्तराधिकारी बना था जब उसके भाई राज्यवर्धन की शशांक द्वारा हत्या कर दी गयी थी जो गौड और मालवा के राजाओं का दमन करने निकला था। हर्ष को स्कालोट्टारपथनाथ के रूप में भी जाना जाता था। सिंहासन पर बैठने के बाद उसने अपनी बहन राज्यश्री को बचाया और एक असफल प्रयास के साथ शशांक की तरफ बढा था।

अपने दूसरे अभियान में, शशांक की मौत के बाद, उसने मगध और शशांक के साम्राज्य पर विजय प्राप्त की थी। उसने कन्नौज में अपनी राजधानी स्थापित की। एक बड़ी सेना के साथ, हर्षवर्धन ने अपने साम्राज्य को पंजाब से उत्तरी उड़ीसा तथा हिमालय से नर्मदा नदी के तट तक विस्तारित किया।  उसने नर्मदा से आगे भी अपने साम्राज्य को विस्तारित करने की कोशिश की लेकिन ऐसा करने में वह विफल रहा था। उसे बादामी के चालुक्य राजा पुलकेसिन द्वितीय के हाथों हार का सामना करना पड़ा था।  बाणभट्ट द्वारा लिखित “हर्षचरित्र” हर्ष की अवधि में एक सफल दस्तावेज के रूप में मौजूद है। चीनी विद्वान ह्वेनसांग जिसने हर्ष के शासन के दौरान यहा का दौरा किया था, की रचनाओं में भी हर्ष और हर्ष की अवधि के दौरान के भारत, के बारे में काफी विस्तार से वर्णन किया गया है। 647 ईस्वी में हर्षवर्धन की मृत्यु के साथ ही उसके साम्राज्य का भी अंत हो गया।

प्रशासन

हर्ष के साम्राज्य में राजस्व को चार भागों में विभाजित किया गया था। पहला भाग राजा पर खर्च किया जाता था। दूसरा भाग विद्वानों पर खर्च किया जाता था। तीसरा भाग सरकारी कर्मचारियों पर खर्च किया जाता था और चौथे भाग को धार्मिक गतिविधियों पर खर्च किया जाता था।

सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था:

हर्ष के राज्य का दौरा करने वाले ह्वेनसांग के अनुसार, भारतीय समाज में जातीय व्यवस्था अस्तित्व में थी। इसके अलावा कई मिश्रित और उप जातियों का भी उदय हुआ था। ह्वेनसांग ने अछूत और जातिच्युत के अस्तित्व का भी उल्लेख किया है। इस अवधि के दौरान महिलाओं की स्थिति में भी काफी गिरावट आई थी। लेकिन फिर भी महिलाएं पुरुषों के अधीन नहीं मानी जाती थी। धार्मिक क्षेत्र में ब्राह्मणवाद का प्रभुत्व बौद्ध धर्म के पतन का कारण बना था। वैष्णव, शैव और जैन धर्म भी अस्तित्व में थे। हर्ष को उदार और धर्मनिरपेक्ष राजा माना जाता था। राजस्व का मुख्य स्रोत भूमि की उपज का छठा हिस्सा होती थी। कुछ अन्य कर बंदरगाहों,  घाटों आदि पर लगाए गए थे। शाही भूमि से प्राप्त लाभ, खदानों और जागीरदारी से अर्जित शाही खजाना भी राजस्व के स्त्रोत थे।

महत्वपूर्ण हस्तियां:

हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान दो महत्वपूर्ण हस्तियां थीं।

क) बाणभट्ट हर्ष के दरबार में एक कवि थे। उन्होंने हर्षवर्धन की जीवनी 'हर्षचरित' की रचना की जिसमें उन्होंने विस्तृत जानकारी के साथ हर्ष की शक्ति के उदय तक की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया है। यह संस्कृत भाषा में लिखित थी। उन्होंने 'कादम्बरी' नामक एक नाटक भी लिखा था।

ख) ह्वेनसांग जो एक चीनी तीर्थयात्री था उसने भी हर्ष के साम्राज्य का दौरा किया था। चीन वापस जाने के बाद एक उसने 'शि-यू-की' (पश्चिम की दुनिया) नामक एक पुस्तक लिखी थी। हर्षवर्धन के साथ-साथ ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक में दो अन्य राजाओं- पल्लव वंश के नरसिंह वर्मन और चालुक्य वंश के पुलकेसिन द्वितीय की भी प्रशंसा की थी। वह अफगानिस्तान के माध्यम से मध्य एशिया में आया था और उसी मार्ग के माध्यम से वापस चला गया। ह्वेनसांग ने नालंदा में अध्ययन किया था और बाद में नौ वर्षों तक वहां शिक्षण भी किया था।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • हर्षवर्धन, सीखने वालों के लिए एक महान संरक्षक था और उसने खुद संस्कृत नाटकों, नागनंद, रत्नावली और प्रियदर्शिका की रचना की थी।
  • उसने कई विश्राम गृहों और अस्पतालों का निर्माण करवाया था।
  • ह्वेनसांग ने कन्नौज में आयोजित भव्य सभा के बारे में उल्लेख किया है जिसमें बीस राजाओं, चार हजार बौद्ध भिक्षुओं और तीन हजार जैन तथा ब्राह्मणों ने भाग लिया था।
  • हर्ष हर पांच साल के अंत में, प्रयाग (इलाहाबाद) में महामोक्ष हरिषद नामक एक धार्मिक उत्सव का आयोजन करता था। यहां पर वह दान समारोह आयोजित करता था।
  • हर्षवर्धन ने अपनी आय को चार बराबर भागों में बांट रखा था जिनके नाम--शाही परिवार के लिए, सेना तथा प्रशासन के लिए, धार्मिक निधि के लिए और गरीबों और बेसहारों के लिए थे।
  • ह्वेनसांग के अनुसार, हर्षवर्धन के पास एक कुशल सरकार थी। उसने यह भी उल्लेख किया है कि वहां परिवार पंजीकृत नहीं किये गये थे और कोई बेगार नहीं था। लेकिन नियमित रूप से होने वाली डकैती के बारे में उसे शिकायत थी।  
  • पुलकेसिन द्वितीय के हाथों हर्षवर्धन की हार का उल्लेख ऐहोल शिलालेख (कर्नाटक) में किया गया है। वह पहला उत्तर भारतीय राजा था जिसे दक्षिण भारतीय राजा के हाथों पराजय का सामना करना पड़ा था।

महत्वपूर्ण घटनाएँ

  • वर्धन वंश की स्थापना पांचवी सदी के अंत या छठी शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ के आसपास नरवर्धन द्वारा की गयी थी।
  • हर्षवर्धन अपने बड़े भाई राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद सोलह साल की उम्र में 606 ईस्वी में सिंहासन पर आसीन हुआ था।
  • हर्ष ने अपनी बहन राज्यश्री को छुड़ाया था जिसे शशांक ने उसके पति ग्रहवर्मन की हत्या के बाद बंदी बना लिया था।
  • ह्वेनसांग ने 631 ईस्वी में हर्ष के दरबार का दौरा किया था।
  • हर्ष को 637 ईस्वी में पुलकेसिन द्वितीय से हार का सामना करना पड़ा था।
  • 643 ईस्वी में ह्वेनसांग के लिए कन्नौज में भव्य सभा का आयोजन किया गया था।
  • 647 ईस्वी में हर्ष का निधन हो गया था।

 

भारतीय 16 राजधानी

सोलह महाजनपद - प्रमुख राज्यों का संक्षिप्त विवरण

सोलह महाजनपद और उनकी राजधानी 

अंग

यह महाजनपद मगध राज्य के पूर्व में स्थित था. इसकी राजधानी चंपा थी. आधुनिक भागलपुर और मुंगेर का क्षेत्र इसी जनपद में शामिल था. गौतम बुद्ध के समय में इस राज्य का मगध के साथ संघर्ष चलता रहा. संभवतः प्रारभ में अंग ने कुछ समय के लिए मगध को पराजित कर अपने में शामिल कर लिया. लेकिन शीघ्र ही इस जनपद की शक्ति क्षीण हो गयी और बिम्बिसार नामक शासक ने न केवल मगध को अंग से स्वतंत्र कराया बल्कि उसने अंग को भी अपने अधीन किया. कालांतर में यह राज्य मगध राज्य का ही हिस्सा बन गया.

मगध

बौद्ध साहित्य में इस राज्य की राजधानी (गिरिव्रज या राजगीर) और निवासियों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है. वर्तमान पटना और गया जिलों के क्षेत्र इसके अंग थे. अथर्ववेद में भी इस राज्य का उल्लेख है.

काशी

इसकी राजधानी वाराणसी (बनारस) थी. काशी के कौसल, मगध और अंग राज्यों से सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे और प्रायः उसे उसने संघर्षरत रहना पड़ा. गौतम बुद्ध के समय में काशी राज्य का राजनैतिक पतन हो गया.

वृज्जि या वज्जि संघ

यह महाजनपद मगध के उत्तर में स्थित था. यह संघ आठ कुलों के संयोंग से बना और इनमें चार (विदेह, ज्ञातृक, वज्जि और लिच्छवि) कुल अधिक प्रमुख थे. विशाल इस संघ की राजधानी थी.

कोसल

इन जनपद की सीमाएँ पूर्व में सदानीर नदी (गण्डक), पश्चिम में पंचाल, सर्पिका या स्यन्दिका नदी (सई नदी) दक्षिण और उत्तर में नेपाल की तलपटी थी. सरयू नदी इसे (कोसल जनपद को) दो भागों में विभाजित करती थी. एक उत्तरी कोसल जिसकी राजधानी श्रावस्ती थी और दूसरा दक्षिणी कोसल, जिसकी राजधानी कुशावती थी.

मल्ल

यह जनपद वज्जि संघ के उत्तर में स्थित एक पहाड़ी राज्य था. इसके दो भाग थे जिनमें एक की राजधानी कुशीनगर (जहाँ महात्मा बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ) और दूसरे भाग की राजधानी पावा (जहाँ वर्धमान महावीर को निर्वाण मिला) थी.

चेदि

यह महाजनपद यमुना नदी के किनारे स्थित था. यह आधुनिक बुन्देलखंड के पूर्वी भाग और उसके समीपवर्ती भूखंड में फैला हुआ था. महाभारत के अनुसार 'शुक्तिमती” इसकी राजधानी थी लेकिन 'चेतियजातक” के अनुसार 'सोत्थिवती” इसकी राजधानी थी. महाभारत के अनुसार शिशुपाल यहीं का शासक था.

वत्स

काशी के पश्चिम भाग में प्रयाग के आसपास क्षेत्र में यह जनपद स्थित था. कौशाम्बी इसकी राजधानी थी. बुद्ध के समय में इसका शासक उदयन था.

कुरु

उत्तर वैदिक साहित्य में इस जनपद के पर्याप्त विवरण प्राप्त होते हैं. इसके थानेश्वर (हरियाणा राज्य में) दिल्ली और मेरठ का क्षेत्र सम्मिलित थे. इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ (हस्तिनापुर) थी.

पंचाल

यह जनपद उत्तर वैदिक काल में ही प्रसिद्ध था. इसमें वर्तमान रूबेलखंड और उसके समीप के कुछ जिले सम्मिलित थे. इसके दो भाग थे - उत्तरी पंचाल और दक्षिणी पंचाल. उत्तरी पंचाल की राजधानी अहिच्छत्र और दक्षिणी पंचाल की राजधानी काम्पिल्य थी. मूलतः यह जनपद एक राजतंत्र था लेकिन संभवतः कौटिल्य के काल में यहाँ गणतंत्रीय शासन व्यवस्था हो गयी.

मत्स्य

इस जनपद में आधुनिक राजस्थान राज्य के जयपुर और अलवर जिले शामिल थे. विराट नगर संभवतः इसकी राजधानी थी. सम्भवतः यह जनपद कभी चेदि राज्य के अधीन रहा था.

शूरसेन

मथुरा और उसके आसपास के क्षेत्र इस जनपद में शामिल थे. आधुनिक मथुरा नगर ही इसकी राजधानी था. बौद्ध ग्रन्थों में अयन्तिपुत्र शूरसेन राज्य का उल्लेख मिलता है. वह बौद्ध धर्म का अनुयायी और संरक्षक था.

अस्सक या अस्मक

यह राज्य गोदावरी नदी के किनारे पर स्थित था. पाटेन अथवा पोटन इसकी राजधानी थी. पुराणों के अनुसार इस महाजनपद के शासक इक्ष्वाकु वंश के थे. जातक कथाओं में भी इस जनपद के अनेक राजाओं के नामों की जानकारी मिलती है.

अवन्ति

अवंति राजतंत्र में लगभग उज्जैन प्रदेश और उसके आसपास के जिले थे. पुराणों के अनुसार पुणिक नामक सेनापति ने यदुवंशीय वीतिहोत्र नामक शासक की हत्या करके अपने पुत्र प्रद्योत को अवन्ति की गद्दी पर बैठाया. इसके अंतिम शासक नन्दवर्धन को मगध के शासक शिशुनाग ने पराजित किया और इसे अपने साम्राज्य का अंग बना लिया. यह महाजनपद दो भागों में विभाजित था. उत्तरी भाग की राजधानी उज्जयिनी और दक्षिणी भाग की राजधानी महिष्मति थी.

कम्बोज

यह राज्य गांधार के पड़ोस में था. कश्मीर के कुछ भाग जैसे राजोरी और हजार जिले इसमें शामिल थे. संभवतः राजपुर या हाटक इसकी राजधानी थी.

गांधार

इस जनपद में वर्तमान पेशावर, रावलपिण्डी और कुछ कश्मीर का भाग भी शामिल था. तक्षशिला इसकी राजधानी थी. गांधार का राजा पुमकुसाटी गौतम बुद्ध और बिम्बिसार का समकालीन था. उसने अवंति के राजा प्रद्योत से कई युद्ध किए और उसे पराजित किया. इसकी राजधानी विद्या का केंद्र था. देश-विदेश से विद्यार्थी यहाँ शिक्षा प्राप्त करने आते थे.

सिंधु घाटी सभ्यता औऱ बैदिक सभ्यता

सिन्धु घाटी सभ्यता और वैदिक सभ्यता के मध्य अंतर

  1. ऋग्वैदिक सभ्यता ग्रामीण संस्कृति लगती है जबकि सिन्धु सभ्यता के लोग सुनियोजित नागरिक जीवन से भलीभाँति परिचित थे.
  2. आर्य धातुओं में सोने और चाँदी से परिचित थे और यजुर्वेद में लोहे के प्रयोग के भी निश्चित सन्दर्भ मिलते हैं. सिन्धु सभ्यता के लोग सोने, चाँदी का प्रयोग करते थे, किन्तु उन्होंने चांदी का उपयोग सोने से अधिक किया. ताम्बे और कांसे के विभिन्न आयुधों और उपकरणों का निर्माण करना वे जानते थे, किन्तु वे लोहे से परिचित नहीं थे.
  3. ऋग्वैदिक आर्यों के जीवन में अश्व का बड़ा महत्त्व था. किन्तु इस विषय में निश्चित साक्ष्य नहीं है कि सिन्धु सभ्यता के लोग अश्व से परिचित थे.
  4. वेदों में व्याघ्र का उल्लेख नहीं मिलता और हाथी का बहुत कम उल्लेख मिलता है. पर सिन्धु सभ्यता की मुद्राओं पर व्याघ्र और हाथी दोनों ही का पर्याप्त मात्रा में अंकन उपलब्ध है.
  5. आर्य विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण करते थे. वे रक्षा उपायों में कवच बनाना जानते थे, जबकि सिन्धु सभ्यता के किसी भी स्थल की खुदाई से निश्चित रूप से रक्षा सम्बन्धी कोई भी वस्तु अभी तक नहीं मिली.
  6. आर्य गाय को विशेष आदर देते थे. पर सिन्धु सभ्यता में मुद्राओं और अन्य कला-कृतियों से लगता है कि गाय की विशेष महत्ता नहीं थीं, गाय की अपेक्षा बैल का अधिक महत्त्व था.
  7. आर्य संभवतः मूर्तिपूजक नहीं थे. दूसरी ओर सिन्धु सभ्यता के लोग मूर्तिपूजक थे.
  8. सिन्धु सभ्यता के स्थलों से नारी मूर्तियाँ प्रभूत संख्या में उपलब्ध होने से प्रतीत होता है कि सिन्धु सभ्यता के देवताओं में मातृदेवी को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था. आर्यों में पुरुष देवता अधिक महत्त्वपूर्ण रहे हैं. देवियों का महत्त्व अपेक्षाकृत कम है.
  9. मार्शल ने मोहेनजोदड़ों और हड़प्पा में अग्निकुंडों के अवशेषों के नहीं मिलने से यह निष्कर्ष निकाला कि यहाँ पर यज्ञादि का प्रचलन नहीं रहा होगा. जबकि आर्यों के धार्मिक जीवन में यज्ञों का अत्यंत महत्त्व रहा है.
  10. सिन्धु सभ्यता की मुद्राओं और अन्य उपकरणों से स्पष्ट है कि लोग लिखना जानते थे किन्तु आर्यों के विषय में कुछ विद्वानों की धारणा है कि वे लिखना नहीं जानते थे किन्तु आर्यों के विषय में कुछ विद्वानों की धारणा है कि वे लिखना नहीं जानते थे और अध्ययन-अध्यापन मौखिक रूप से करते थे.
  11. ऋग्वेद में असुरों के दुर्गों का उल्लेख है और हम यह जानते हैं कि सिन्धु सभ्यता के सभी प्रमुख नगर दुर्ग में थे.
  12. अनार्यों को चपटी नाकवाला भी कहा गया है. हड़प्पा संस्कृति की कुछ मूर्तियों में भी चपटी नासिका दिखलाई गई हैं. आर्यों की नाक प्रखर होती थीं.

सातवाहन राजवंश

सातवाहन का युग

सातवाहन ने  भारतीय  राज्यों के  उनके शासकों की छवि के साथ वाले  सिक्के जारी किए | इन्होने सांस्कृतिक पुल का निर्माण किया और व्यापार में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की और अपने विचारों और संस्कृति को इंडो गंगा के मैदान से भारत के दक्षिण के सिरे तक आदान प्रदान किया |  

सातवाहन के लोग खेती और लोहे के बारे में पूर्ण रूप से परिचित थे |

सामाजिक संगठन

सातवाहन साम्राज्य का समाज चार वर्गों के अस्तित्व को दर्शाता है :

  • प्रथम वर्ग उन लोगों से बना है जो जिलों का देखरेख और नियंत्रण करते थे  |
  • द्वितीय वर्ग अधिकारियों से बना था |
  • तीसरा वर्ग में  किसान और वैद्यों आते थे |
  • चौथे वर्ग में आम नागरिक आते थे |

परिवार का मुखिया गृहपति था |

प्रशासन का स्वरूप

सातवाहन साम्राज्य पाँच प्रान्तों में विभाजित था | नासिक के पश्चिमी प्रांत पर अभिरस का शासन था | इक्ष्वाकू ने कृष्ण-गुंटूर प्रांत के पूर्वी प्रांत में शासन किया | चौतस ने दक्षिण पश्चिमी भाग पर कब्जा किया और अपने प्रांत का उत्तर  और पूर्व तक विस्तार किया | पहलाव ने दक्षिण पूर्वी भाग पर नियंत्रण किया |

अधिकारियों को आमात्य और महामंत्र के रूप में जाना जाता था | सेनापति को प्रांतीय राज्यपाल के तौर पर नियुक्त किया जाता था | गौल्मिका के पास सैन्य पलटनों का जिम्मा होता था जिसमे 9 हाथी, 9 रथ, 25 घोड़े और 45 पैदल सैनिक होते थे |

सातवाहन राज्य में तीन दर्जे के सामंत थे | उच्च दर्जा राजा का होता था जिसके पास सिक्कों के छापने का अधिकार था जबकि दूसरा दर्जा महाभोज का और तीसरा दर्जा सेनापति का था |

हमे कतक और स्कंधावरस जैसे शब्दों की जानकारी हमें इस युग  के अभिलेखों से मिलती है |

धर्म :

बौद्ध और ब्राह्मण धर्म दोनों सातवाहन शासन के दौरान प्रचलित हुए | विभिन्न संप्रदाय के लोगों के बीच राज्य में विभिन्न धर्म में धार्मिक सहिष्णुता का अस्तित्व रहा |

वास्तुकला

सातवाहन के शासन के दौरान, चैत्य और विहार बड़ी महीनता के साथ ठोस चट्टानों से काटे गए | चैत्य बौद्ध के मंदिर थे और मोनास्ट्री को विहार के नाम से भी जाना जाता था | सबसे प्रसिद्ध चैत्य पश्चिमी दक्कन के नाशिक, करले इत्यादि में स्थित है | इस समय में चट्टानों से काटकर बनाया गया वास्तुशिल्प भी मौजूद  था |  

भाषा

सातवाहना के शासकों ने दस्तावेज़ों पर आधिकारिक भाषा के रूप में प्राकृत भाषा का इस्तेमाल किया | सभी अभिलेखों को प्राकृत भाषा में बनाया गया और ब्रहमी लिपि में लिखा गया |

महत्व और पतन

सातवाहन ने शुंग और मगध के कनव के साथ अपना साम्राज्य को स्थापित करने के लिए मुक़ाबला किया | बाद में इन्होने भारत के बहुत बड़े हिस्से को विदेशी आक्रमणकारियों जैसे पहलाव, शक और यवना से बचाने के लिए एक बड़ी भूमिक अदा की | गौतमीपुत्र सत्कर्णी और श्री यजना सत्कर्णी इस राजवंश के  कुछ प्रमुख शासक थे |

कुछ समय के  लिए सातवाहन ने पश्चिमी क्षत्रपस के साथ संघर्ष किया | तीसरी सदी AD में साम्राज्य छोटे छोटे राज्यों में बाँट गया |

साम्राट अशोक का जीवन

सम्राट अशोक के विषय में व्यापक जानकारी, कलिंग आक्रमण और शिलालेख

अशोक (लगभग 273-232 ई.पू.) मौर्य वंश का तीसरा सम्राट था. मौर्य वंश के संस्थापक उसके पितामह चन्द्र गुप्त मौर्य (लगभग 322-298 ई.पू.) थे. चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद उसका पिता बिन्दुसार (लगभग 298 ई.पू.-273 ई.पू.) गद्दी पर बैठा था. सिंहली इतिहास में सुरक्षित जनश्रुतियों के अनुसार अशोक अपने पिता बिन्दुसार के अनेक पुत्रों में से एक था और जिस समय बिन्दुसार की मृत्यु हुई उस समय अशोक मालवा में उज्जैन में राजप्रतिनिधि था. कुछ इतिहासकार कहते हैं कि राजपद के उत्तराधिकार के लिए भयंकर भ्रातृयुद्ध हुआ जिसमें उसके 99 भाई मारे गए और अशोक गद्दी पर बैठा. वैसे अशोक के शिलालेखों में इस भ्रातृयुद्ध का कोई संकेत नहीं मिलता है. इसके विपरीत शिलालेख संख्या 5 से प्रकट होता है कि अशोक अपने भाई-बहनों, परिवार के प्रति शुभचिंतक था. गद्दी पर बैठने के चार वर्ष बाद तक उसका राज्यभिषेक नहीं हुआ. इसे इस बात का प्रमाण माना जाता है कि उसको राजा बनाने के प्रश्न पर कुछ विरोध हुआ होगा.

अशोक सीरिया के राजा Antiochus II (261-246 ई.पू.) और कुछ अन्य यवन (यूनानी) राजाओं का समसामयिक था जिनका उल्लेख शिलालेख संख्या 8 में है. इससे पता चलता है कि अशोक ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में राज किया किन्तु उसके राज्याभिषेक की सही समय का पता नहीं चलता है. उसने 40 वर्ष राज्य किया. इसलिए शायद राज्याभिषेक के समय वह युवक ही रहा होगा.

अशोक का पूरा नाम अशोकवर्धन था. उसके लेखों में उसे सदैव 'देवानामपिय” (देवताओं का प्रिय) और 'पियदर्शिन्” (प्रियदर्शी) संबोधित किया गया है. केवल यास्की के लघु शिलालेख में उसको 'देवानाम्-पिय अशोक” लिखा गया है.

कलिंग पर आक्रमण

अशोक के राज्यकाल के प्रारंभिक 12 वर्षों का कोई सुनिश्चित विवरण उपलब्ध नहीं है. इस काल में अपने पूर्ववर्ती राजाओं की तरह वह भी सामाजिक कार्यक्रमों, शिकार, मांस भोजन और यात्राओं में प्रवृत्त रहता था. किन्तु उसके राज्यकाल के 13वें वर्ष में उसके जीवन में एक बड़ा बदलाव आ गया. इस वर्ष राज्याभिषेक के आठ वर्ष बाद, उसने बंगाल की खाड़ी के तटवर्ती राज्य कलिंग पर आक्रमण किया. कलिंग राज्य उस समय महानदी और गोदावरी के बीच क्षेत्र में विस्तृत था. इस युद्ध के कारण का पता नहीं चलता है, लेकिन उसने कलिंग को विजय करके उसे अपने राज्य में मिला लिया. इस युद्ध में भयंकर रक्तपात हुआ. एक लाख व्यक्ति मारे गए और डेढ़ लाख बंदी बना लिए गए तथा कई लाख व्यक्ति युद्ध के आनेवाली अकाल, महामारी आदि विभीषिकाओं से नष्ट हो गए. अशोक को लाखों मनुष्यों के इस विनाश और उत्पीड़न से बहुत पश्चाताप हुआ और वह युद्ध से घृणा करने लगा. इसके  बाद ही अशोक अपने शिलालेखों के अनुसार 'धम्म” (धर्म) में प्रवृत्त हुआ. यहाँ धम्म का आशय बौद्ध धर्म लिया जाता है और वह शीघ्र ही बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया. बौद्ध मतावलंबी होने के बाद अशोक का व्यक्तित्व एक दम बदल गया.

आठवें शिलालेख में जो संभवतः कलिंग विजय के चार वर्ष बाद तैयार किया गया था, अशोक ने घोषणा की - 'कलिंग देश में जितने आदमी मारे गए, मरे या कैद हुए उसके सौवें या हजारवें हिस्से का नाश भी अब देवताओं के प्रिय को बड़े दुःख का, कारण होगा”. उसने यह भी घोषणा की कि '(आप) विश्वास रखें कि जहाँ तक क्षमा का व्यवहार हो सकता हैं, वहां तक राजा हम लोगों के साथ क्षमा का बर्ताव करेगा.”

बौद्ध धर्म का रुख

कलिंग-विजय के बाद अशोक व्यक्तिगत रूप से बौद्ध मतावलंबी हो गया था. यह बात इससे सिद्ध होती है कि उसने अपने को यास्की के लघु शिलालेख संख्या 1 में बौद्ध-शाक्य बतलाया है और भाब्रू के शिलालेख में तीन रत्नों (बुद्ध, धर्म और संघ) में अपनी आस्था व्यक्त  की है. सारनाथ के शिलालेख से स्पष्ट है कि उसने केवल बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्राएँ कीं और बौद्ध भिक्षु संघ की एकता बनाए रखने का प्रयत्न किया. इससे भी यही प्रकट होता है कि वह बौद्ध मतावलंबी था.

सम्राट समुंद्रगुप्त

समुद्रगुप्त और उसकी विजयें - Samudragupta's Conquests in Hindi

समुद्रगुप्त महाराजा चन्द्रगुप्त का पुत्र और उत्तराधिकारी था. हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग स्तम्भ प्रशस्ति की चौथी पंक्ति में चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा Samudragupta को भरी सभा में राज्य प्रदान करने का वर्णन दिया हुआ है. विद्वानों की राय है कि संभवतः चन्द्रगुप्त प्रथम ने समुद्रगुप्त की योग्यता को ध्याम में रखकर और अपने पुत्रों में गृह-युद्ध को रोकने के लिए ऐसा किया होगा. सिंहासन प्राप्ति के बाद उसने विजय प्राप्ति का कार्यक्रम शुरू किया. वह एक कुशल योद्धा था. इतिहासकार वी.ए. स्मिथ ने उसे भारत का नेपोलियन (Napoleon of India) कहा है.

समुद्रगुप्त

समुद्रगुप्त की वीरता, सैनिक अभियानों व सफलताओं को देखकर उसे महान इतिहासकार द्वारा दी गई यह उपाधि ठीक प्रतीत होती है. जिस समय वह सिंहासन पर बैठा उस समय गुप्त राज्य बहुत छोटा था. सारा देश अनेक छोटे-छोटे भागों में बंटा हुआ था. इन राज्यों में पस्पर शत्रुता देखी जाती थी. समुद्रगुप्त ने उनमें से अनेक राज्यों को जीतकर एक शक्तिशाली साम्राज्य बनाने का निश्चय किया. उसने उत्तर-भारत के नौ राज्यों को हराकर अपने राज्य में मिलाया. उसने दक्षिण-भारत के 12 राज्यों से युद्ध किया परन्तु उन्हें अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया. इससे पता चलता है कि Samudragupta वीर होने के साथ-साथ दूरदर्शी भी था.

समुद्रगुप्त की विजयें (Conquests)

समुद्रगुप्त मौर्य वंश के महान शासक अशोक के ठीक विपरीत था. अशोक शान्ति व लोगों के दिल में राज करने पर विश्वास रखता था, परन्तु उसकी तुलना में समुद्रगुप्त अधिक क्रोध वाला और हिंसक था. कौशाम्बी में भी अशोक स्तम्भ है, उस पर समुद्रगुप्त की प्रशस्ति अंकित है. इस लेख में Samudragupta के जीवन के प्रायः सभी पहलुओं की जानकारी प्राप्त होती है. समुद्रगुप्त का दरबारी कवि श्री हरिषेण के प्रयाग प्रशस्ति लेख में उन जनगणों और देशों के नाम गिनाये हैं जिनको समुद्रगुप्त ने जीता था. उसकी प्रमुख विजयें कुछ इस प्रकार थीं -

उत्तर भारत की विजय

प्रयाग प्रशस्ति द्वारा जानकारी मिलती है कि समुद्रगुप्त ने उत्तर-भारत के नौ राज्यों को जीतकर अपने साम्राज्य में मिलाया. वे राज्य थे - वाकाटक राज्य, मतिल राज्य, नागवंश का राज्य, पुष्करण का राज्य, नागसेन, मथुरा के राज, नागसेन, रामनगर के राज्य, असम राकी, नागवंशी राज्य, नन्दिन और कोटवंशीय राज्य. कोटवंश के राजाओं ने तो समुद्रगुप्त के विरुद्ध कई राज्यों का एक संघ ही बना लिया था. परन्तु उन सभी राज्यों को हारना पड़ा. Samudragupta ने उत्तर-भारत के इन राज्यों को मिलाकर अपने साम्राज्य को बढ़ाया.

पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश की विजय

समुद्रगुप्त के लेख से मालूम पड़ता है कि समुद्रगुप्त के समय उत्तर-पश्चिमी भारत और पंजाब में अनेक गणतंत्रीय जातियाँ थीं. हरिषेण के कथनानुसार इन नौ जातियों ने Samudragupta की अधीनता स्वीकार कर ली थी. ये जातियाँ - मालवा, अमीर, काक, मुद्रक, यौधेय, सकानिक, नागार्जुन, खरपारिक और प्रार्जुन थीं.

मध्य भारत के अन्य नरेशों के राज्यों की विजय

त्तर भारत और दक्षिण भारत के मध्य राज्यों को समुद्रगुप्त ने हरकार भी अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया. वे उसके केवल अधीन राज्य थे क्योंकि वे उसे केवल कर देते थे. ये राज्य आदिवासियों के थे. ये राज्य उसे कर देने के साथ-साथ विशेष मौकों पर सैनिक सहायता भी देते थे.

सीमान्त कबीलाई राज्यों पर विजय

Samudragupta के लगातार राज्य और प्रभाव की बढ़ते देखकर बंगाल, असम, नेपाल आदि अनेक सीमान्त राज्यों ने उसको कर देना स्वीकार कर लिया और उसकी अधीनता स्वीकार कर ली.

दक्षिण भारत के राज्यों की विजय

एक विशाल सेना की सहायता से उसने दक्षिणी भारत के सभी राज्यों को हरा दिया. परन्तु उसने इनकी पाटलिपुत्र से दूरी के कारण अपने साम्राज्य में शामिल नहीं किया. वह इनसे केवल कर (tax) लेता था.

विदेशी शक्तियों व श्रीलंका से सम्बन्ध

कहा जाता है कि समुद्रगुप्त ने शक, कुषाण जैसी विदेशी शक्तियों और श्रीलंका से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए. गुप्त राज्यों की गरुड़ की मूर्ति से अंकित मुद्रा इन राज्यों ने स्वीकार की. इस शर्त को शायद Samudragupta ने उस पर लादा हो. इससे पता चलता है कि वह बराबर के राज्य नहीं थे. जहाँ तक श्रीलंका का प्रश्न है एक परवर्ती चीन (Later Chinese Source) में साक्ष्य मिलता है कि श्रीलंका के राजा मेघवर्ण (352-379 ई.) ने कुछ उपहार भेजकर गुप्त राजा (संभवतः Samudragupta) से गया में एक बौद्ध विहार बनवाने की अनुमति माँगी थी. आज्ञा मिल गई और बौद्ध गया में श्रीलंका के राजा महाबोधिसंघाराम नामक विहार बनवाया. इससे स्पष्ट है कि भारत और श्रीलंका में उस समय अच्छे सम्बन्ध थे और Samudragupta धर्मनिरपेक्षता की नीति में विश्वास रखता था. श्रीलंका के राजा ने अपना राजदूत उसके दरबार में भेजा. मेघवर्मन (श्रीलंका) ने उसकी अनुमति प्राप्त करके 'बौद्ध मंदिर” महाबोधिसंघाराम (Mahabodhi Sangharama) का निर्माण किया.

भारतीय वेदों का ज्ञान

वेदों के विषय में संक्षिप्त विवरण - Vedas in Hindi

वेद सनातन धर्म के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं. यहीं नहीं, ये विश्व के सबसे पुरानी कृतियाँ हैं. इन्हें संसार का आदिग्रंथ कहा जा सकता है. इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, मैं आपको बताना चाहूँगा कि वेद शब्द का अर्थ 'ज्ञान” होता है. मूलतः वेद एक ही था. कालांतर में व्यास के द्वारा चार भागों में बाँटा गया. ये भाग अर्थात् संहिताएँ हैं -  ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद (Rigveda, Samveda, Yajurveda and Atharvaveda - four vedas). इनके प्रधान विषय क्रमशः प्राथना-मन्त्र, ऋचा-गायन, यज्ञ-मन्त्र और औषधीय ज्ञान हैं. वेदों का काल निश्चित नहीं है. इन्हें अपौरुषेय बताया गया है अर्थात् ये मानव रचित नहीं हैं, ऐसा माना जाता है. परन्तु कई ऋचाओं के रचनाकार ऋषियों के नाम ऋचाओं में मिलते हैं. इनमें पुरुष और स्त्रियाँ दोनों सम्मिलित हैं. अतः वेदों के रचनाकार का निर्धारण एक कठिन कार्य है. कुछ लोग इन्हें ईशा के 6000 वर्ष पूर्व के मानते हैं और कुछ इनका रचनाकाल 1500 ई.पू. बतलाते हैं. प्रत्येक वेद के अपने-अपने ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् तथा उपवेद (Brahman, Aranyak, Upnishada and Upveda) हैं. इनका वर्णन नीचे द्रष्टव्य है -

ऋग्वेद (Rig Veda)

चार वेदों में ऋग्वेद सबसे प्राचीन है. ऋग्वेद शब्द ऋक् (ऋचा अथवा मन्त्र) तथा वेद (विद् अर्थात् ज्ञान) से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है ज्ञान के सूक्त. ऋग्वेद (Rig veda)की संहिता (text) में 10 मंडल, 1028 सूक्त और 10, 580 ऋचाएँ हैं. ऋग्वेद के अनेक मन्त्र यज्ञ से सम्बंधित हैं परन्तु उसमें कुछ ऐसे मन्त्र भी मिलते हैं जिन्हें आदिकालीन धार्मिक कविता का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण कहा जा सकता है.  ऋग्वेद (Rig veda) का रचनाकाल चाहे जो भी निर्धारित हो, इतना निश्चयपूर्ण कहा जा सकता है कि ऋग्वेद में भारतीय आर्यों के प्राचीनतम युग का इतिहास और उस युग की धार्मिक, सामजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक अवस्था का ज्ञान प्राप्त होता है.

i) ब्राह्मण - ऐतरेय ब्राह्मण और कौशीतकी ब्राह्मण

ii) आरण्यक - ऐतरेय आरण्यक, कौशीतकी

iii) उपनिषद् - ऐतरेय उपनिषद्

iv) उपवेद - आयुर्वेद

सामवेद (Samveda)

इस वेद में कुल 1549 ऋचाएँ हैं जिनमें से 75 को छोड़कर सभी ऋग्वेद संहिता (Rigved Samhita) से ली गई हैं. सामवेद (Samveda) की ऋचाओं का गान विविध वैदिक यज्ञों के अवसर पर होता था. सामवेद (Samveda) को संगीत-शास्त्र का आदि ग्रन्थ माना जाता है.

i) ब्राह्मण:-  पंचविश ब्राह्मण, जैमिनीय ब्राह्मण और सद्विंश ब्राह्मण

ii) आरण्यक:- तवलकर, छान्दोग्य

iii) उपनिषद्:- छान्दोग्य, जैमिनीय और केन उपनिषद्

iv) उपवेद:- गन्धर्ववेद

यजुर्वेद (Yajurveda)

यजुर्वेद (Yajurveda) की दो शाखाएँ हैं - कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद. कृष्ण यजुर्वेद दक्षिण भारत और शुक्ल यजुर्वेद उत्तर भारत में प्रचलित है. यजुर्वेद (Yajurveda) में 18 काण्ड हैं. यजुर्वेद में 3988 मन्त्र हैं. गायत्री मन्त्र और महामृत्युंजय मन्त्र यजुर्वेद में ही हैं. यजुर्वेद (Yajurveda) का प्रधान विषय यज्ञ कार्य है.

i) ब्राह्मण - तैत्तिरीय ब्राह्मण

ii) आरण्यक - वृहदारण्यक, तैत्तिरीय और मैत्रायणी

iii) उपनिषद् - मुण्डक उपनिषद्, ईशावास्योपनिषद्, माण्डुक्य उपनिषद् और प्रश्न उपनिषद्

iv) उपवेद:- धनुर्वेद

अथर्ववेद (Atharva Veda )

अथर्वेद में 20 अध्याय और 5687 मन्त्र हैं. अथर्ववेद (Atharvaveda) के 8 खंड हैं. अथर्वेद गद्य-पद्य-मिश्रित है. इसमें औषाधियों, जादू-टोनों आदि विषय हैं. कुछ विद्वानों के अनुसार इस वेद के कई अंश ऋग्वेद (Rig veda) से प्राचीनतर हैं.

i) ब्राह्मण - गोपथ ब्राह्मण

ii) आरण्यक - इसका कोई स्वतंत्र आरण्यक नहीं है. यजुर्वेद के आरण्यक के कुछ अंश अथर्ववेद (Atharvaveda) के आरण्यक के रूप में जाने जाते हैं.

iii) उपनिषद् - इसका कोई स्वतंत्र उपनिषद् भी नहीं है. यजुर्वेद (Yajurveda) के उपनिषद् के कुछ अंश अथर्ववेद (Atharvaveda) के उपनिषद् के रूप में जाने जाते हैं.

iv) उपवेद:- स्थापत्यवेद

विदेशी नागरिक जो भारत आये

विदेशी यात्री - Foreign Travellers in Indian History

List of foreign travellers who came in India in Hindi

मैगस्थनीज

मौर्यकालीन इतिहास (Mauryan History) जानने का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत मैगस्थनीज (Megasthenes) द्वारा लिखी गई पुस्तक इंडिका है. मैगस्थनीज यूनानी था, जिसे यूनानी शासक सेल्यूकस ने अपना दूत बनाकर चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा था. वह 302 ई.पू. से 298 ई.पू. तक मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में रहा. दुर्भाग्यवश उसका मूल ग्रन्थ नष्ट हो गया है, किन्तु बाद के यूनानी यात्रियों - स्ट्रेबो, प्लिनी, एरियन आदि के द्वारा दिए गए उद्धरणों से मैगस्थनीज के विवरण के सम्बन्ध में जानकारी मिलती है. शानबैक ने उसके द्वारा दिए गए विवरण का संग्रह कर अंग्रेजी अनुवाद किया है.

डायमेकस

इसे सीरिया के शासक एंटिओकस प्रथम (Antiochus I) के द्वारा बिंदुसार के दरबार में दूत बनाकर भेजा गया था. स्ट्रेबो के लेखों में हमें डायमेकस के द्वारा दिए गए विवरण प्राप्त होते हैं. उसके विवरण के अनुसार बिंदुसार ने सीरियन नरेश से अंजीर, मीठी शराब और यूनानी दार्शनिक मौर्य दरबार में भेजने को कहा था. सीरियन नरेश ने मीठी शराब और अंजीर तो भेज दी, पर यूनानी दार्शनिक भेजने में असमर्थता व्यक्त की.

डायोनिसियस (Dionysius)

यह मिस्र के राजा टॉलमी फिलाडेल्फस का राजदूत था, जो मौर्य सम्राट् बिंदुसार के दरबार में आया था. डायमेकस की ही भाँति स्ट्रैबो आदि परवर्ती यूनानी लेखकों के विवरणों में इसके तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक दशाओं पर उद्धरण मिलते हैं.

फाह्यान

Fahien नामक चीनी बौद्ध यात्री चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में भारत आया था. इसका मुख्य उद्देश्य बौद्ध ग्रन्थों का अध्ययन और अनुशीलन करना था. धार्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण इसने भारत की धार्मिक अवस्था विशेषकर बौद्ध धर्म की स्थिति पर विशेष प्रकाश डाला है. यहाँ तक कि अपने वृत्तान्त में वह भारतीय सम्राट् के नाम का उल्लेख तक नहीं करता. उस समय की सामाजिक व्यवस्था का इसके द्वारा विशेष वर्णन मिलता है.

ह्वेनसांग

यह बौद्ध चीनी यात्री (Chinese traveller) सम्राट हर्षवर्द्धन के शासनकाल में भारत आया था. यह चौदह (629-43 ई.) वर्ष भारत में रहा. उसने लगभग सम्पूर्ण भारत का परिभ्रमण किया. वह कुछ वर्ष सम्राट हर्षवर्धन के दरबार (कन्नौज) में रहा. उसने अपने अनुभवों को 'सी-यू-की” नामक पुस्तक में लेखबद्ध किया. ह्वेनसांग (Hwen Ts'ang) का विवरण ऐतिहासिक दृष्टिकोण से कहीं अधिक तथ्यात्मक है.  ह्वेनसांग के अनुसार - सम्राट शीलादित्य (हर्ष) अपने राज्य की 3/4 आय धार्मिक कार्यों पर व्यय करता था, सती प्रथा का चलन था, दंड विधान कठोर था, लोग ईमानदार थे और मांस, प्याज व मद्यपान का सेवन नहीं करते थे, जाति प्रथा कठोर थी. ह्वेनसांग को तीर्थयात्रियों का राजकुमार (prince of pilgrims) कहा जाता है.

इत्सिंग 

I-tsing चीनी (671-95 ई.) बौद्ध यात्री (Buddhist traveller) था. इसने अपनी पुष्तक प्रमुख बौद्ध भिक्षुओं की आत्मकथाएँ में समकालीन भारत का वर्णन किया है.

अलबरुनी

11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी का प्रमुख दरबारी उसके साथ भारत आया था. अपने ग्रन्थ 'तहकीक-ए-हिन्द” में इसने भारत के सबंध में अपना विस्तृत विवरण दिया है. Alberuni के अनुसार भारतीय समाज 16 जातियों में विभाजित था. उसकी किताब में ब्राह्मणों को विशेषाधिकार, वैश्य जाति की दशा में गिरावट, बाल विवाह, सती प्रथा और विधवा विवाह जैसी कुप्रथाओं का वर्णन है.

मार्को पोलो

मार्को पोलो एक इटली का यात्री (Italian traveller) था जो 13वीं शताब्दी में विश्व भ्रमण के उद्देश्य से निकला और 1292 ई. में भारत के पांड्य राज्य के कयाल बंदरगाह पर आया. उस समय वहाँ पांड्य शासिका रुद्रम्बा देवी शासन कर रही थी. उसने अपने यात्रा वृत्तांत को 'The Travels” नामक पुस्तक में लिखा, जिसमें दक्षिण के राज्यों की आश्चर्यजनक आर्थिक समृद्धि, विदेशी व्यापार और वाणिज्य का वर्णन किया गया है. इसने भारत भ्रमण 1292-93 ई. में किया था. इसकी एक अन्य पुस्तक सर मार्कोपोलो की पुस्तक में भारत के आर्थिक इतिहास (Economic history of India) का वर्णन है.

चाऊ जू कुआ

यह चीनी व्यापारी (1225-54 ई) था जिसने चु-फाण-ची नामक पुस्तक  में भारत का व्यापारिक वर्णन किया है.

निकोलो कोंटी

Niccolò de' Conti विजयनगर आने वाला पहला विदेशी यात्री था. निकोलो कोंटी इटली का निवासी था जिसने विजयनगर साम्राज्य की यात्रा की. वह विजयनगर के राजा देवराय प्रथम के शासनकाल में 1420-21 ई. में पहुँचा. उसने अपनी यात्रा के विवरणों को लैटिन भाषा में लिखा. मूल विवरण खो चुके हैं. उसने विजयनगर साम्राज्य के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी दी है. इसने यहाँ के शहर, राजदरबार, प्रथाओं, त्योहारों का वर्णन किया है.

अब्दुररज्जाक

यह फारस का राजदूत था और 1442-43 ई. में विजयनगर के राजा देवराज द्वितीय के दरबार में आया था. उसने अपने विवरण में विजयनगर राज्य के व्यापार, उद्योगों, बन्दरगाहों, कृषि, निवासियों के रहन-सहन और रीति-रिवाजों, खजाने आदि का अच्छा वर्णन किया है. उसने लिखा है, 'राजा के महल में कई तहखाने हैं और उनमें सोना इस प्रकार भरा हुआ है कि वह ढेर लगता है.” विजयनगर के विषय में इसने लिखा कि 'मैंने पूरे विश्व में इसके समान दूसरा नगर नहीं देखा.”

बारबोसा

पुर्तगाली यात्री (Portuguese traveller) डुआर्ट बारबोसा (Duarte Barbosa) कृष्णदेव राय के समय में विजयनगर की यात्रा पर आया था. यह (1510-16 ई.) पुर्तगाली गवर्नर अल्बुकर्क का दुभाषिया (translator) था. विजयनगर की सामाजिक दशा, अर्थव्यवस्था और राज्य की नीतियों आदि के बारे में उसके द्वारा दिया गया विवरण ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. कृष्णदेव राय की प्रशंसा करते हुए उसने लिखा है 'राजा इतनी स्वतंत्रता देता है कि कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से आ-जा सकता है.” इसने अपना यात्रा का वृत्तांत 'The book of Duarte Barbosa” नामक पुस्तक में लिखा है. इसने सती प्रथा का वर्णन है.

डोमिनगोस पेरेज

यह एक पुर्तगाली था जो 1510 ई. में विजयनगर के शासक कृष्णदेव राय के दरबार में आया. उसने अपने यात्रा विवरण में विजयनगर का तथ्यपूर्ण वर्णन किया है. उसने तत्कालीन सामाजिक बुराइयों का वर्णन अपनी पुस्तक डोमिनगोस की कथा (Story of Domingos) में - बलि प्रथा, पशु यज्ञों, सती प्रथा, जातिगत बंधन, वेश्यावृत्ति, देवदासी प्रथा आदि का स्पष्ट वर्णन किया है.

विलियम हॉकिन्स

विलियम हॉकिन्स इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम द्वारा भेजा गया राजदूत था जो 1608 ई.जहाँगीर के दरबार में पहुंचा. वह 1611 ई. तक जहाँगीर के दरबार में रहा.  में जहाँगीर के समय कौन यात्री हेक्टर नामक जहाज से अहमदाबाद आया था

विलियम फिंच

फिंच हाकिंस के साथ ही 1608 में सूरत बंदरगाह पर उतरा था. उसने 17वीं शताब्दी के भारत के व्यापारिक मार्गों, सूरत, बुरहारनपुर, उज्जैन, फतेहपुर सीकरी जैसे विख्यात नगरों, दुर्गों और जेलों, धार्मिक परम्पराओं आदि का विस्तृत वर्णन किया है. सलीम और अनारकली की कथा का उल्लेख करने वाला वह एकमात्र विदेशी यात्री था.

थॉमस रो

ब्रिटिश दूत था, जिसने 1615 ई. में जहाँगीर के साथ मांडू और अहमदाबाद की यात्रा की. उसने मुग़ल साम्राज्य और अपनी यात्रा का विवरण अपनी पुस्तक A voice to East Indies में दिया है. उसने मुग़ल दरबार में होने वाले षड्यंत्रों और भ्रष्टाचार के विषय में लिखा है. यह भारत में चार वर्ष रहा.

बर्नियर 

यह भारत में 1658-1668 ई. के बीच रहा. यह फ्रेंच यात्री (French traveller), जो पेशे से चिकित्सक था, औरंगजेब के शासनकाल में भारत आया. इसने लगभग पूरे भारत की यात्रा की थी. इसने अपने ग्रन्थ 'Travels in the Mughal Empire” में तत्कालीन हिंदू-मुस्लिम समाज के तौर-तरीकों और रस्म-रिवाजों और व्यापार-वाणिज्य आदि का सजीव और तथ्यपूर्ण विवरण लिखा है.

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...