सिंधु घाटी सभ्यता औऱ बैदिक सभ्यता

सिन्धु घाटी सभ्यता और वैदिक सभ्यता के मध्य अंतर

  1. ऋग्वैदिक सभ्यता ग्रामीण संस्कृति लगती है जबकि सिन्धु सभ्यता के लोग सुनियोजित नागरिक जीवन से भलीभाँति परिचित थे.
  2. आर्य धातुओं में सोने और चाँदी से परिचित थे और यजुर्वेद में लोहे के प्रयोग के भी निश्चित सन्दर्भ मिलते हैं. सिन्धु सभ्यता के लोग सोने, चाँदी का प्रयोग करते थे, किन्तु उन्होंने चांदी का उपयोग सोने से अधिक किया. ताम्बे और कांसे के विभिन्न आयुधों और उपकरणों का निर्माण करना वे जानते थे, किन्तु वे लोहे से परिचित नहीं थे.
  3. ऋग्वैदिक आर्यों के जीवन में अश्व का बड़ा महत्त्व था. किन्तु इस विषय में निश्चित साक्ष्य नहीं है कि सिन्धु सभ्यता के लोग अश्व से परिचित थे.
  4. वेदों में व्याघ्र का उल्लेख नहीं मिलता और हाथी का बहुत कम उल्लेख मिलता है. पर सिन्धु सभ्यता की मुद्राओं पर व्याघ्र और हाथी दोनों ही का पर्याप्त मात्रा में अंकन उपलब्ध है.
  5. आर्य विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण करते थे. वे रक्षा उपायों में कवच बनाना जानते थे, जबकि सिन्धु सभ्यता के किसी भी स्थल की खुदाई से निश्चित रूप से रक्षा सम्बन्धी कोई भी वस्तु अभी तक नहीं मिली.
  6. आर्य गाय को विशेष आदर देते थे. पर सिन्धु सभ्यता में मुद्राओं और अन्य कला-कृतियों से लगता है कि गाय की विशेष महत्ता नहीं थीं, गाय की अपेक्षा बैल का अधिक महत्त्व था.
  7. आर्य संभवतः मूर्तिपूजक नहीं थे. दूसरी ओर सिन्धु सभ्यता के लोग मूर्तिपूजक थे.
  8. सिन्धु सभ्यता के स्थलों से नारी मूर्तियाँ प्रभूत संख्या में उपलब्ध होने से प्रतीत होता है कि सिन्धु सभ्यता के देवताओं में मातृदेवी को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था. आर्यों में पुरुष देवता अधिक महत्त्वपूर्ण रहे हैं. देवियों का महत्त्व अपेक्षाकृत कम है.
  9. मार्शल ने मोहेनजोदड़ों और हड़प्पा में अग्निकुंडों के अवशेषों के नहीं मिलने से यह निष्कर्ष निकाला कि यहाँ पर यज्ञादि का प्रचलन नहीं रहा होगा. जबकि आर्यों के धार्मिक जीवन में यज्ञों का अत्यंत महत्त्व रहा है.
  10. सिन्धु सभ्यता की मुद्राओं और अन्य उपकरणों से स्पष्ट है कि लोग लिखना जानते थे किन्तु आर्यों के विषय में कुछ विद्वानों की धारणा है कि वे लिखना नहीं जानते थे किन्तु आर्यों के विषय में कुछ विद्वानों की धारणा है कि वे लिखना नहीं जानते थे और अध्ययन-अध्यापन मौखिक रूप से करते थे.
  11. ऋग्वेद में असुरों के दुर्गों का उल्लेख है और हम यह जानते हैं कि सिन्धु सभ्यता के सभी प्रमुख नगर दुर्ग में थे.
  12. अनार्यों को चपटी नाकवाला भी कहा गया है. हड़प्पा संस्कृति की कुछ मूर्तियों में भी चपटी नासिका दिखलाई गई हैं. आर्यों की नाक प्रखर होती थीं.

सातवाहन राजवंश

सातवाहन का युग

सातवाहन ने  भारतीय  राज्यों के  उनके शासकों की छवि के साथ वाले  सिक्के जारी किए | इन्होने सांस्कृतिक पुल का निर्माण किया और व्यापार में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की और अपने विचारों और संस्कृति को इंडो गंगा के मैदान से भारत के दक्षिण के सिरे तक आदान प्रदान किया |  

सातवाहन के लोग खेती और लोहे के बारे में पूर्ण रूप से परिचित थे |

सामाजिक संगठन

सातवाहन साम्राज्य का समाज चार वर्गों के अस्तित्व को दर्शाता है :

  • प्रथम वर्ग उन लोगों से बना है जो जिलों का देखरेख और नियंत्रण करते थे  |
  • द्वितीय वर्ग अधिकारियों से बना था |
  • तीसरा वर्ग में  किसान और वैद्यों आते थे |
  • चौथे वर्ग में आम नागरिक आते थे |

परिवार का मुखिया गृहपति था |

प्रशासन का स्वरूप

सातवाहन साम्राज्य पाँच प्रान्तों में विभाजित था | नासिक के पश्चिमी प्रांत पर अभिरस का शासन था | इक्ष्वाकू ने कृष्ण-गुंटूर प्रांत के पूर्वी प्रांत में शासन किया | चौतस ने दक्षिण पश्चिमी भाग पर कब्जा किया और अपने प्रांत का उत्तर  और पूर्व तक विस्तार किया | पहलाव ने दक्षिण पूर्वी भाग पर नियंत्रण किया |

अधिकारियों को आमात्य और महामंत्र के रूप में जाना जाता था | सेनापति को प्रांतीय राज्यपाल के तौर पर नियुक्त किया जाता था | गौल्मिका के पास सैन्य पलटनों का जिम्मा होता था जिसमे 9 हाथी, 9 रथ, 25 घोड़े और 45 पैदल सैनिक होते थे |

सातवाहन राज्य में तीन दर्जे के सामंत थे | उच्च दर्जा राजा का होता था जिसके पास सिक्कों के छापने का अधिकार था जबकि दूसरा दर्जा महाभोज का और तीसरा दर्जा सेनापति का था |

हमे कतक और स्कंधावरस जैसे शब्दों की जानकारी हमें इस युग  के अभिलेखों से मिलती है |

धर्म :

बौद्ध और ब्राह्मण धर्म दोनों सातवाहन शासन के दौरान प्रचलित हुए | विभिन्न संप्रदाय के लोगों के बीच राज्य में विभिन्न धर्म में धार्मिक सहिष्णुता का अस्तित्व रहा |

वास्तुकला

सातवाहन के शासन के दौरान, चैत्य और विहार बड़ी महीनता के साथ ठोस चट्टानों से काटे गए | चैत्य बौद्ध के मंदिर थे और मोनास्ट्री को विहार के नाम से भी जाना जाता था | सबसे प्रसिद्ध चैत्य पश्चिमी दक्कन के नाशिक, करले इत्यादि में स्थित है | इस समय में चट्टानों से काटकर बनाया गया वास्तुशिल्प भी मौजूद  था |  

भाषा

सातवाहना के शासकों ने दस्तावेज़ों पर आधिकारिक भाषा के रूप में प्राकृत भाषा का इस्तेमाल किया | सभी अभिलेखों को प्राकृत भाषा में बनाया गया और ब्रहमी लिपि में लिखा गया |

महत्व और पतन

सातवाहन ने शुंग और मगध के कनव के साथ अपना साम्राज्य को स्थापित करने के लिए मुक़ाबला किया | बाद में इन्होने भारत के बहुत बड़े हिस्से को विदेशी आक्रमणकारियों जैसे पहलाव, शक और यवना से बचाने के लिए एक बड़ी भूमिक अदा की | गौतमीपुत्र सत्कर्णी और श्री यजना सत्कर्णी इस राजवंश के  कुछ प्रमुख शासक थे |

कुछ समय के  लिए सातवाहन ने पश्चिमी क्षत्रपस के साथ संघर्ष किया | तीसरी सदी AD में साम्राज्य छोटे छोटे राज्यों में बाँट गया |

साम्राट अशोक का जीवन

सम्राट अशोक के विषय में व्यापक जानकारी, कलिंग आक्रमण और शिलालेख

अशोक (लगभग 273-232 ई.पू.) मौर्य वंश का तीसरा सम्राट था. मौर्य वंश के संस्थापक उसके पितामह चन्द्र गुप्त मौर्य (लगभग 322-298 ई.पू.) थे. चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद उसका पिता बिन्दुसार (लगभग 298 ई.पू.-273 ई.पू.) गद्दी पर बैठा था. सिंहली इतिहास में सुरक्षित जनश्रुतियों के अनुसार अशोक अपने पिता बिन्दुसार के अनेक पुत्रों में से एक था और जिस समय बिन्दुसार की मृत्यु हुई उस समय अशोक मालवा में उज्जैन में राजप्रतिनिधि था. कुछ इतिहासकार कहते हैं कि राजपद के उत्तराधिकार के लिए भयंकर भ्रातृयुद्ध हुआ जिसमें उसके 99 भाई मारे गए और अशोक गद्दी पर बैठा. वैसे अशोक के शिलालेखों में इस भ्रातृयुद्ध का कोई संकेत नहीं मिलता है. इसके विपरीत शिलालेख संख्या 5 से प्रकट होता है कि अशोक अपने भाई-बहनों, परिवार के प्रति शुभचिंतक था. गद्दी पर बैठने के चार वर्ष बाद तक उसका राज्यभिषेक नहीं हुआ. इसे इस बात का प्रमाण माना जाता है कि उसको राजा बनाने के प्रश्न पर कुछ विरोध हुआ होगा.

अशोक सीरिया के राजा Antiochus II (261-246 ई.पू.) और कुछ अन्य यवन (यूनानी) राजाओं का समसामयिक था जिनका उल्लेख शिलालेख संख्या 8 में है. इससे पता चलता है कि अशोक ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में राज किया किन्तु उसके राज्याभिषेक की सही समय का पता नहीं चलता है. उसने 40 वर्ष राज्य किया. इसलिए शायद राज्याभिषेक के समय वह युवक ही रहा होगा.

अशोक का पूरा नाम अशोकवर्धन था. उसके लेखों में उसे सदैव 'देवानामपिय” (देवताओं का प्रिय) और 'पियदर्शिन्” (प्रियदर्शी) संबोधित किया गया है. केवल यास्की के लघु शिलालेख में उसको 'देवानाम्-पिय अशोक” लिखा गया है.

कलिंग पर आक्रमण

अशोक के राज्यकाल के प्रारंभिक 12 वर्षों का कोई सुनिश्चित विवरण उपलब्ध नहीं है. इस काल में अपने पूर्ववर्ती राजाओं की तरह वह भी सामाजिक कार्यक्रमों, शिकार, मांस भोजन और यात्राओं में प्रवृत्त रहता था. किन्तु उसके राज्यकाल के 13वें वर्ष में उसके जीवन में एक बड़ा बदलाव आ गया. इस वर्ष राज्याभिषेक के आठ वर्ष बाद, उसने बंगाल की खाड़ी के तटवर्ती राज्य कलिंग पर आक्रमण किया. कलिंग राज्य उस समय महानदी और गोदावरी के बीच क्षेत्र में विस्तृत था. इस युद्ध के कारण का पता नहीं चलता है, लेकिन उसने कलिंग को विजय करके उसे अपने राज्य में मिला लिया. इस युद्ध में भयंकर रक्तपात हुआ. एक लाख व्यक्ति मारे गए और डेढ़ लाख बंदी बना लिए गए तथा कई लाख व्यक्ति युद्ध के आनेवाली अकाल, महामारी आदि विभीषिकाओं से नष्ट हो गए. अशोक को लाखों मनुष्यों के इस विनाश और उत्पीड़न से बहुत पश्चाताप हुआ और वह युद्ध से घृणा करने लगा. इसके  बाद ही अशोक अपने शिलालेखों के अनुसार 'धम्म” (धर्म) में प्रवृत्त हुआ. यहाँ धम्म का आशय बौद्ध धर्म लिया जाता है और वह शीघ्र ही बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया. बौद्ध मतावलंबी होने के बाद अशोक का व्यक्तित्व एक दम बदल गया.

आठवें शिलालेख में जो संभवतः कलिंग विजय के चार वर्ष बाद तैयार किया गया था, अशोक ने घोषणा की - 'कलिंग देश में जितने आदमी मारे गए, मरे या कैद हुए उसके सौवें या हजारवें हिस्से का नाश भी अब देवताओं के प्रिय को बड़े दुःख का, कारण होगा”. उसने यह भी घोषणा की कि '(आप) विश्वास रखें कि जहाँ तक क्षमा का व्यवहार हो सकता हैं, वहां तक राजा हम लोगों के साथ क्षमा का बर्ताव करेगा.”

बौद्ध धर्म का रुख

कलिंग-विजय के बाद अशोक व्यक्तिगत रूप से बौद्ध मतावलंबी हो गया था. यह बात इससे सिद्ध होती है कि उसने अपने को यास्की के लघु शिलालेख संख्या 1 में बौद्ध-शाक्य बतलाया है और भाब्रू के शिलालेख में तीन रत्नों (बुद्ध, धर्म और संघ) में अपनी आस्था व्यक्त  की है. सारनाथ के शिलालेख से स्पष्ट है कि उसने केवल बौद्ध तीर्थस्थलों की यात्राएँ कीं और बौद्ध भिक्षु संघ की एकता बनाए रखने का प्रयत्न किया. इससे भी यही प्रकट होता है कि वह बौद्ध मतावलंबी था.

सम्राट समुंद्रगुप्त

समुद्रगुप्त और उसकी विजयें - Samudragupta's Conquests in Hindi

समुद्रगुप्त महाराजा चन्द्रगुप्त का पुत्र और उत्तराधिकारी था. हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग स्तम्भ प्रशस्ति की चौथी पंक्ति में चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा Samudragupta को भरी सभा में राज्य प्रदान करने का वर्णन दिया हुआ है. विद्वानों की राय है कि संभवतः चन्द्रगुप्त प्रथम ने समुद्रगुप्त की योग्यता को ध्याम में रखकर और अपने पुत्रों में गृह-युद्ध को रोकने के लिए ऐसा किया होगा. सिंहासन प्राप्ति के बाद उसने विजय प्राप्ति का कार्यक्रम शुरू किया. वह एक कुशल योद्धा था. इतिहासकार वी.ए. स्मिथ ने उसे भारत का नेपोलियन (Napoleon of India) कहा है.

समुद्रगुप्त

समुद्रगुप्त की वीरता, सैनिक अभियानों व सफलताओं को देखकर उसे महान इतिहासकार द्वारा दी गई यह उपाधि ठीक प्रतीत होती है. जिस समय वह सिंहासन पर बैठा उस समय गुप्त राज्य बहुत छोटा था. सारा देश अनेक छोटे-छोटे भागों में बंटा हुआ था. इन राज्यों में पस्पर शत्रुता देखी जाती थी. समुद्रगुप्त ने उनमें से अनेक राज्यों को जीतकर एक शक्तिशाली साम्राज्य बनाने का निश्चय किया. उसने उत्तर-भारत के नौ राज्यों को हराकर अपने राज्य में मिलाया. उसने दक्षिण-भारत के 12 राज्यों से युद्ध किया परन्तु उन्हें अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया. इससे पता चलता है कि Samudragupta वीर होने के साथ-साथ दूरदर्शी भी था.

समुद्रगुप्त की विजयें (Conquests)

समुद्रगुप्त मौर्य वंश के महान शासक अशोक के ठीक विपरीत था. अशोक शान्ति व लोगों के दिल में राज करने पर विश्वास रखता था, परन्तु उसकी तुलना में समुद्रगुप्त अधिक क्रोध वाला और हिंसक था. कौशाम्बी में भी अशोक स्तम्भ है, उस पर समुद्रगुप्त की प्रशस्ति अंकित है. इस लेख में Samudragupta के जीवन के प्रायः सभी पहलुओं की जानकारी प्राप्त होती है. समुद्रगुप्त का दरबारी कवि श्री हरिषेण के प्रयाग प्रशस्ति लेख में उन जनगणों और देशों के नाम गिनाये हैं जिनको समुद्रगुप्त ने जीता था. उसकी प्रमुख विजयें कुछ इस प्रकार थीं -

उत्तर भारत की विजय

प्रयाग प्रशस्ति द्वारा जानकारी मिलती है कि समुद्रगुप्त ने उत्तर-भारत के नौ राज्यों को जीतकर अपने साम्राज्य में मिलाया. वे राज्य थे - वाकाटक राज्य, मतिल राज्य, नागवंश का राज्य, पुष्करण का राज्य, नागसेन, मथुरा के राज, नागसेन, रामनगर के राज्य, असम राकी, नागवंशी राज्य, नन्दिन और कोटवंशीय राज्य. कोटवंश के राजाओं ने तो समुद्रगुप्त के विरुद्ध कई राज्यों का एक संघ ही बना लिया था. परन्तु उन सभी राज्यों को हारना पड़ा. Samudragupta ने उत्तर-भारत के इन राज्यों को मिलाकर अपने साम्राज्य को बढ़ाया.

पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश की विजय

समुद्रगुप्त के लेख से मालूम पड़ता है कि समुद्रगुप्त के समय उत्तर-पश्चिमी भारत और पंजाब में अनेक गणतंत्रीय जातियाँ थीं. हरिषेण के कथनानुसार इन नौ जातियों ने Samudragupta की अधीनता स्वीकार कर ली थी. ये जातियाँ - मालवा, अमीर, काक, मुद्रक, यौधेय, सकानिक, नागार्जुन, खरपारिक और प्रार्जुन थीं.

मध्य भारत के अन्य नरेशों के राज्यों की विजय

त्तर भारत और दक्षिण भारत के मध्य राज्यों को समुद्रगुप्त ने हरकार भी अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया. वे उसके केवल अधीन राज्य थे क्योंकि वे उसे केवल कर देते थे. ये राज्य आदिवासियों के थे. ये राज्य उसे कर देने के साथ-साथ विशेष मौकों पर सैनिक सहायता भी देते थे.

सीमान्त कबीलाई राज्यों पर विजय

Samudragupta के लगातार राज्य और प्रभाव की बढ़ते देखकर बंगाल, असम, नेपाल आदि अनेक सीमान्त राज्यों ने उसको कर देना स्वीकार कर लिया और उसकी अधीनता स्वीकार कर ली.

दक्षिण भारत के राज्यों की विजय

एक विशाल सेना की सहायता से उसने दक्षिणी भारत के सभी राज्यों को हरा दिया. परन्तु उसने इनकी पाटलिपुत्र से दूरी के कारण अपने साम्राज्य में शामिल नहीं किया. वह इनसे केवल कर (tax) लेता था.

विदेशी शक्तियों व श्रीलंका से सम्बन्ध

कहा जाता है कि समुद्रगुप्त ने शक, कुषाण जैसी विदेशी शक्तियों और श्रीलंका से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए. गुप्त राज्यों की गरुड़ की मूर्ति से अंकित मुद्रा इन राज्यों ने स्वीकार की. इस शर्त को शायद Samudragupta ने उस पर लादा हो. इससे पता चलता है कि वह बराबर के राज्य नहीं थे. जहाँ तक श्रीलंका का प्रश्न है एक परवर्ती चीन (Later Chinese Source) में साक्ष्य मिलता है कि श्रीलंका के राजा मेघवर्ण (352-379 ई.) ने कुछ उपहार भेजकर गुप्त राजा (संभवतः Samudragupta) से गया में एक बौद्ध विहार बनवाने की अनुमति माँगी थी. आज्ञा मिल गई और बौद्ध गया में श्रीलंका के राजा महाबोधिसंघाराम नामक विहार बनवाया. इससे स्पष्ट है कि भारत और श्रीलंका में उस समय अच्छे सम्बन्ध थे और Samudragupta धर्मनिरपेक्षता की नीति में विश्वास रखता था. श्रीलंका के राजा ने अपना राजदूत उसके दरबार में भेजा. मेघवर्मन (श्रीलंका) ने उसकी अनुमति प्राप्त करके 'बौद्ध मंदिर” महाबोधिसंघाराम (Mahabodhi Sangharama) का निर्माण किया.

भारतीय वेदों का ज्ञान

वेदों के विषय में संक्षिप्त विवरण - Vedas in Hindi

वेद सनातन धर्म के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं. यहीं नहीं, ये विश्व के सबसे पुरानी कृतियाँ हैं. इन्हें संसार का आदिग्रंथ कहा जा सकता है. इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, मैं आपको बताना चाहूँगा कि वेद शब्द का अर्थ 'ज्ञान” होता है. मूलतः वेद एक ही था. कालांतर में व्यास के द्वारा चार भागों में बाँटा गया. ये भाग अर्थात् संहिताएँ हैं -  ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद (Rigveda, Samveda, Yajurveda and Atharvaveda - four vedas). इनके प्रधान विषय क्रमशः प्राथना-मन्त्र, ऋचा-गायन, यज्ञ-मन्त्र और औषधीय ज्ञान हैं. वेदों का काल निश्चित नहीं है. इन्हें अपौरुषेय बताया गया है अर्थात् ये मानव रचित नहीं हैं, ऐसा माना जाता है. परन्तु कई ऋचाओं के रचनाकार ऋषियों के नाम ऋचाओं में मिलते हैं. इनमें पुरुष और स्त्रियाँ दोनों सम्मिलित हैं. अतः वेदों के रचनाकार का निर्धारण एक कठिन कार्य है. कुछ लोग इन्हें ईशा के 6000 वर्ष पूर्व के मानते हैं और कुछ इनका रचनाकाल 1500 ई.पू. बतलाते हैं. प्रत्येक वेद के अपने-अपने ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् तथा उपवेद (Brahman, Aranyak, Upnishada and Upveda) हैं. इनका वर्णन नीचे द्रष्टव्य है -

ऋग्वेद (Rig Veda)

चार वेदों में ऋग्वेद सबसे प्राचीन है. ऋग्वेद शब्द ऋक् (ऋचा अथवा मन्त्र) तथा वेद (विद् अर्थात् ज्ञान) से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है ज्ञान के सूक्त. ऋग्वेद (Rig veda)की संहिता (text) में 10 मंडल, 1028 सूक्त और 10, 580 ऋचाएँ हैं. ऋग्वेद के अनेक मन्त्र यज्ञ से सम्बंधित हैं परन्तु उसमें कुछ ऐसे मन्त्र भी मिलते हैं जिन्हें आदिकालीन धार्मिक कविता का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण कहा जा सकता है.  ऋग्वेद (Rig veda) का रचनाकाल चाहे जो भी निर्धारित हो, इतना निश्चयपूर्ण कहा जा सकता है कि ऋग्वेद में भारतीय आर्यों के प्राचीनतम युग का इतिहास और उस युग की धार्मिक, सामजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक अवस्था का ज्ञान प्राप्त होता है.

i) ब्राह्मण - ऐतरेय ब्राह्मण और कौशीतकी ब्राह्मण

ii) आरण्यक - ऐतरेय आरण्यक, कौशीतकी

iii) उपनिषद् - ऐतरेय उपनिषद्

iv) उपवेद - आयुर्वेद

सामवेद (Samveda)

इस वेद में कुल 1549 ऋचाएँ हैं जिनमें से 75 को छोड़कर सभी ऋग्वेद संहिता (Rigved Samhita) से ली गई हैं. सामवेद (Samveda) की ऋचाओं का गान विविध वैदिक यज्ञों के अवसर पर होता था. सामवेद (Samveda) को संगीत-शास्त्र का आदि ग्रन्थ माना जाता है.

i) ब्राह्मण:-  पंचविश ब्राह्मण, जैमिनीय ब्राह्मण और सद्विंश ब्राह्मण

ii) आरण्यक:- तवलकर, छान्दोग्य

iii) उपनिषद्:- छान्दोग्य, जैमिनीय और केन उपनिषद्

iv) उपवेद:- गन्धर्ववेद

यजुर्वेद (Yajurveda)

यजुर्वेद (Yajurveda) की दो शाखाएँ हैं - कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद. कृष्ण यजुर्वेद दक्षिण भारत और शुक्ल यजुर्वेद उत्तर भारत में प्रचलित है. यजुर्वेद (Yajurveda) में 18 काण्ड हैं. यजुर्वेद में 3988 मन्त्र हैं. गायत्री मन्त्र और महामृत्युंजय मन्त्र यजुर्वेद में ही हैं. यजुर्वेद (Yajurveda) का प्रधान विषय यज्ञ कार्य है.

i) ब्राह्मण - तैत्तिरीय ब्राह्मण

ii) आरण्यक - वृहदारण्यक, तैत्तिरीय और मैत्रायणी

iii) उपनिषद् - मुण्डक उपनिषद्, ईशावास्योपनिषद्, माण्डुक्य उपनिषद् और प्रश्न उपनिषद्

iv) उपवेद:- धनुर्वेद

अथर्ववेद (Atharva Veda )

अथर्वेद में 20 अध्याय और 5687 मन्त्र हैं. अथर्ववेद (Atharvaveda) के 8 खंड हैं. अथर्वेद गद्य-पद्य-मिश्रित है. इसमें औषाधियों, जादू-टोनों आदि विषय हैं. कुछ विद्वानों के अनुसार इस वेद के कई अंश ऋग्वेद (Rig veda) से प्राचीनतर हैं.

i) ब्राह्मण - गोपथ ब्राह्मण

ii) आरण्यक - इसका कोई स्वतंत्र आरण्यक नहीं है. यजुर्वेद के आरण्यक के कुछ अंश अथर्ववेद (Atharvaveda) के आरण्यक के रूप में जाने जाते हैं.

iii) उपनिषद् - इसका कोई स्वतंत्र उपनिषद् भी नहीं है. यजुर्वेद (Yajurveda) के उपनिषद् के कुछ अंश अथर्ववेद (Atharvaveda) के उपनिषद् के रूप में जाने जाते हैं.

iv) उपवेद:- स्थापत्यवेद

विदेशी नागरिक जो भारत आये

विदेशी यात्री - Foreign Travellers in Indian History

List of foreign travellers who came in India in Hindi

मैगस्थनीज

मौर्यकालीन इतिहास (Mauryan History) जानने का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत मैगस्थनीज (Megasthenes) द्वारा लिखी गई पुस्तक इंडिका है. मैगस्थनीज यूनानी था, जिसे यूनानी शासक सेल्यूकस ने अपना दूत बनाकर चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा था. वह 302 ई.पू. से 298 ई.पू. तक मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में रहा. दुर्भाग्यवश उसका मूल ग्रन्थ नष्ट हो गया है, किन्तु बाद के यूनानी यात्रियों - स्ट्रेबो, प्लिनी, एरियन आदि के द्वारा दिए गए उद्धरणों से मैगस्थनीज के विवरण के सम्बन्ध में जानकारी मिलती है. शानबैक ने उसके द्वारा दिए गए विवरण का संग्रह कर अंग्रेजी अनुवाद किया है.

डायमेकस

इसे सीरिया के शासक एंटिओकस प्रथम (Antiochus I) के द्वारा बिंदुसार के दरबार में दूत बनाकर भेजा गया था. स्ट्रेबो के लेखों में हमें डायमेकस के द्वारा दिए गए विवरण प्राप्त होते हैं. उसके विवरण के अनुसार बिंदुसार ने सीरियन नरेश से अंजीर, मीठी शराब और यूनानी दार्शनिक मौर्य दरबार में भेजने को कहा था. सीरियन नरेश ने मीठी शराब और अंजीर तो भेज दी, पर यूनानी दार्शनिक भेजने में असमर्थता व्यक्त की.

डायोनिसियस (Dionysius)

यह मिस्र के राजा टॉलमी फिलाडेल्फस का राजदूत था, जो मौर्य सम्राट् बिंदुसार के दरबार में आया था. डायमेकस की ही भाँति स्ट्रैबो आदि परवर्ती यूनानी लेखकों के विवरणों में इसके तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक दशाओं पर उद्धरण मिलते हैं.

फाह्यान

Fahien नामक चीनी बौद्ध यात्री चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में भारत आया था. इसका मुख्य उद्देश्य बौद्ध ग्रन्थों का अध्ययन और अनुशीलन करना था. धार्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण इसने भारत की धार्मिक अवस्था विशेषकर बौद्ध धर्म की स्थिति पर विशेष प्रकाश डाला है. यहाँ तक कि अपने वृत्तान्त में वह भारतीय सम्राट् के नाम का उल्लेख तक नहीं करता. उस समय की सामाजिक व्यवस्था का इसके द्वारा विशेष वर्णन मिलता है.

ह्वेनसांग

यह बौद्ध चीनी यात्री (Chinese traveller) सम्राट हर्षवर्द्धन के शासनकाल में भारत आया था. यह चौदह (629-43 ई.) वर्ष भारत में रहा. उसने लगभग सम्पूर्ण भारत का परिभ्रमण किया. वह कुछ वर्ष सम्राट हर्षवर्धन के दरबार (कन्नौज) में रहा. उसने अपने अनुभवों को 'सी-यू-की” नामक पुस्तक में लेखबद्ध किया. ह्वेनसांग (Hwen Ts'ang) का विवरण ऐतिहासिक दृष्टिकोण से कहीं अधिक तथ्यात्मक है.  ह्वेनसांग के अनुसार - सम्राट शीलादित्य (हर्ष) अपने राज्य की 3/4 आय धार्मिक कार्यों पर व्यय करता था, सती प्रथा का चलन था, दंड विधान कठोर था, लोग ईमानदार थे और मांस, प्याज व मद्यपान का सेवन नहीं करते थे, जाति प्रथा कठोर थी. ह्वेनसांग को तीर्थयात्रियों का राजकुमार (prince of pilgrims) कहा जाता है.

इत्सिंग 

I-tsing चीनी (671-95 ई.) बौद्ध यात्री (Buddhist traveller) था. इसने अपनी पुष्तक प्रमुख बौद्ध भिक्षुओं की आत्मकथाएँ में समकालीन भारत का वर्णन किया है.

अलबरुनी

11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी का प्रमुख दरबारी उसके साथ भारत आया था. अपने ग्रन्थ 'तहकीक-ए-हिन्द” में इसने भारत के सबंध में अपना विस्तृत विवरण दिया है. Alberuni के अनुसार भारतीय समाज 16 जातियों में विभाजित था. उसकी किताब में ब्राह्मणों को विशेषाधिकार, वैश्य जाति की दशा में गिरावट, बाल विवाह, सती प्रथा और विधवा विवाह जैसी कुप्रथाओं का वर्णन है.

मार्को पोलो

मार्को पोलो एक इटली का यात्री (Italian traveller) था जो 13वीं शताब्दी में विश्व भ्रमण के उद्देश्य से निकला और 1292 ई. में भारत के पांड्य राज्य के कयाल बंदरगाह पर आया. उस समय वहाँ पांड्य शासिका रुद्रम्बा देवी शासन कर रही थी. उसने अपने यात्रा वृत्तांत को 'The Travels” नामक पुस्तक में लिखा, जिसमें दक्षिण के राज्यों की आश्चर्यजनक आर्थिक समृद्धि, विदेशी व्यापार और वाणिज्य का वर्णन किया गया है. इसने भारत भ्रमण 1292-93 ई. में किया था. इसकी एक अन्य पुस्तक सर मार्कोपोलो की पुस्तक में भारत के आर्थिक इतिहास (Economic history of India) का वर्णन है.

चाऊ जू कुआ

यह चीनी व्यापारी (1225-54 ई) था जिसने चु-फाण-ची नामक पुस्तक  में भारत का व्यापारिक वर्णन किया है.

निकोलो कोंटी

Niccolò de' Conti विजयनगर आने वाला पहला विदेशी यात्री था. निकोलो कोंटी इटली का निवासी था जिसने विजयनगर साम्राज्य की यात्रा की. वह विजयनगर के राजा देवराय प्रथम के शासनकाल में 1420-21 ई. में पहुँचा. उसने अपनी यात्रा के विवरणों को लैटिन भाषा में लिखा. मूल विवरण खो चुके हैं. उसने विजयनगर साम्राज्य के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी दी है. इसने यहाँ के शहर, राजदरबार, प्रथाओं, त्योहारों का वर्णन किया है.

अब्दुररज्जाक

यह फारस का राजदूत था और 1442-43 ई. में विजयनगर के राजा देवराज द्वितीय के दरबार में आया था. उसने अपने विवरण में विजयनगर राज्य के व्यापार, उद्योगों, बन्दरगाहों, कृषि, निवासियों के रहन-सहन और रीति-रिवाजों, खजाने आदि का अच्छा वर्णन किया है. उसने लिखा है, 'राजा के महल में कई तहखाने हैं और उनमें सोना इस प्रकार भरा हुआ है कि वह ढेर लगता है.” विजयनगर के विषय में इसने लिखा कि 'मैंने पूरे विश्व में इसके समान दूसरा नगर नहीं देखा.”

बारबोसा

पुर्तगाली यात्री (Portuguese traveller) डुआर्ट बारबोसा (Duarte Barbosa) कृष्णदेव राय के समय में विजयनगर की यात्रा पर आया था. यह (1510-16 ई.) पुर्तगाली गवर्नर अल्बुकर्क का दुभाषिया (translator) था. विजयनगर की सामाजिक दशा, अर्थव्यवस्था और राज्य की नीतियों आदि के बारे में उसके द्वारा दिया गया विवरण ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. कृष्णदेव राय की प्रशंसा करते हुए उसने लिखा है 'राजा इतनी स्वतंत्रता देता है कि कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से आ-जा सकता है.” इसने अपना यात्रा का वृत्तांत 'The book of Duarte Barbosa” नामक पुस्तक में लिखा है. इसने सती प्रथा का वर्णन है.

डोमिनगोस पेरेज

यह एक पुर्तगाली था जो 1510 ई. में विजयनगर के शासक कृष्णदेव राय के दरबार में आया. उसने अपने यात्रा विवरण में विजयनगर का तथ्यपूर्ण वर्णन किया है. उसने तत्कालीन सामाजिक बुराइयों का वर्णन अपनी पुस्तक डोमिनगोस की कथा (Story of Domingos) में - बलि प्रथा, पशु यज्ञों, सती प्रथा, जातिगत बंधन, वेश्यावृत्ति, देवदासी प्रथा आदि का स्पष्ट वर्णन किया है.

विलियम हॉकिन्स

विलियम हॉकिन्स इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम द्वारा भेजा गया राजदूत था जो 1608 ई.जहाँगीर के दरबार में पहुंचा. वह 1611 ई. तक जहाँगीर के दरबार में रहा.  में जहाँगीर के समय कौन यात्री हेक्टर नामक जहाज से अहमदाबाद आया था

विलियम फिंच

फिंच हाकिंस के साथ ही 1608 में सूरत बंदरगाह पर उतरा था. उसने 17वीं शताब्दी के भारत के व्यापारिक मार्गों, सूरत, बुरहारनपुर, उज्जैन, फतेहपुर सीकरी जैसे विख्यात नगरों, दुर्गों और जेलों, धार्मिक परम्पराओं आदि का विस्तृत वर्णन किया है. सलीम और अनारकली की कथा का उल्लेख करने वाला वह एकमात्र विदेशी यात्री था.

थॉमस रो

ब्रिटिश दूत था, जिसने 1615 ई. में जहाँगीर के साथ मांडू और अहमदाबाद की यात्रा की. उसने मुग़ल साम्राज्य और अपनी यात्रा का विवरण अपनी पुस्तक A voice to East Indies में दिया है. उसने मुग़ल दरबार में होने वाले षड्यंत्रों और भ्रष्टाचार के विषय में लिखा है. यह भारत में चार वर्ष रहा.

बर्नियर 

यह भारत में 1658-1668 ई. के बीच रहा. यह फ्रेंच यात्री (French traveller), जो पेशे से चिकित्सक था, औरंगजेब के शासनकाल में भारत आया. इसने लगभग पूरे भारत की यात्रा की थी. इसने अपने ग्रन्थ 'Travels in the Mughal Empire” में तत्कालीन हिंदू-मुस्लिम समाज के तौर-तरीकों और रस्म-रिवाजों और व्यापार-वाणिज्य आदि का सजीव और तथ्यपूर्ण विवरण लिखा है.

बिजयनगर साम्राज्य

विजयनगर साम्राज्य की स्थापना - Vijayanagara Empire

मुहम्मद तुगलक के शासनकाल (1324-1351 ई.) के अंतिम समय में (उसकी गलत नीतियों के कारण) जब अधिकाँश स्थानों पर अव्यवस्था फैली और अनेक प्रदेशों के शासकों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया तो दक्षिण के हिन्दू भी इससे लाभ उठाने से नहीं चूके. उन्होंने विजयनगर साम्राज्य (Vijayanagar Empire) की स्थापना सन 1336 ई. में पाँच भाइयों (हरिहर, कंपा प्रथम, बुक्का प्रथम, मारप्पा और मदुप्पा) के परिवार के दो सदस्यों, हरिहर और बुक्का के नेतृत्व में की.

विजयनगर साम्राज्य

अनेक शिलालेखों के अनुसार हरिहर और बुक्का याद परिवार किए किसी चन्द्रवंशी संगम के पुत्र थे. ये दोनों भाई वारंगल राज्य (warangal rajya) के शासक प्रतापरूद्र द्वितीय की सेवा में थे. जब गयासुद्दीन तुगलक ने वारंगल को 1323 ई. में जीत लिया तो वे काम्पलि चले आये. मुहम्मद तुगलक के विरुद्ध उसके चहेरे भाई बहाउद्दीन गुर्शप ने 1325 ई. में कर्नाटक में सागर नामक स्थान पर विद्रोह कर दिया और सुलतान ने स्वयं जाकर उसके विद्रोह को दबाया. उसने (बहाउद्दीन गुर्शप) कर्नाटक में स्थित काम्पलि को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया. मुहम्मद तुगलक जिन छः अधिकारियों को काम्पलि से बंदी बनाकर दिल्ली ले गया था उनमें से ये दोनों भाई थे संभवतः उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया (या जबरदस्ती स्वीकार करा लिया गया) और वे सुलतान के कृपा पात्र बन गए. मुहम्मद तुगलक के विरुद्ध 1327-28 ई. में दक्षिण राज्यों में विद्रोह की एक शृंखला शुरू (बीदर, दौलताबाद, गुलबर्गा, मुदरा, तेलंगाना आर काम्पलि) हो गई. मुहम्मद तुगलक ने हरिहर और बुक्का को दक्षिण के काम्पलि प्रांत में भेजा ताकि वे विद्रोही हिंदुओं को कुचलकर वहाँ से सूबेदार मालिक मुहम्मद से शासन अपने हाथों में लेले. इन दोनों के दक्षिण जाने के बाद सचमुच वहाँ क्या हुआ, यह मुस्लिम इतिहासकारों और हिन्दू परम्परागत कथाओं के परस्पर विरोधी वर्णनों के कारण बिल्कुल स्पष्ट नहीं है. फिर भी एक बात पर दोनों स्रोत सहमत हैं कि इन दोनों भाइयों ने इस्लाम को शीघ्र ही तिलांजलि दे दी और स्वतंत्र विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की.

उन्होंने अपने पिता विजय के नाम को अमर करने के लिए काम्पलि (आधुनिक कर्नाटक राज्य में) के विद्यारण्य नामक संत के प्रभाव में आकर इस राज्य की नींव रखी थी और मुहम्मद तुगलक से स्वतंत्रता की घोषणा कर दी.

चार राजवंश 

इस राज्य में 1336 ई. से लेकर 1565 ई. तक चार राजवंशों - संगम वंश (1336-1485), सालुव वंश/ Saluva dynasty (1485-1505), तुलुव वंश/Tuluva dynasty (1491-1570) और अरविडु वंश/Aravidu dynasty (1542-1646) ने शासन किया. इनमें से प्रथम दो राजवंश (अर्थात् संगम और सालुंव) संयुक्त बहमनी साम्राज्य के समकालीन थे जबकि तृतीय राजवंश (अर्थात् तुलुब) बहमनी राज्य के विघटन के बाद बनी पाँच मुस्लिम रियासतों (बीदर, बरार, बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुंडा) का समकालीन था.

मौर्य साम्राज्य के प्रसासनिक अधिकारी औऱ ब्यवस्था

मौर्यकालीन अधिकारी और उनके कार्य - Mauryan Officers

मौर्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था (Mauryan Administrative System) की जानकारी हमें मुख्य रूप से कौटिल्य के अर्थशास्त्र और आंशिक रूप से अशोक के शासनादेशों (शिलालेख, स्तम्भ लेख आदि) से मिलती है. यूनानी विवरणों में भी कुछ मौर्यकालीन अधिकारीयों (mauryan officers) के नाम आते हैं. अर्थशास्त्र में मौर्य शासन की विस्तृत जानकारी दी गई है. इससे पता चलता है कि उस समय शासन की एक सुदृढ़ व्यवस्था थी जिसके बल पर विशाल मौर्य सम्राज पर मगध सम्राट अपना नियंत्रण रखते थे. अर्थशास्त्र में कई अधिकारियों (mauryan officials) के नाम आते हैं और उनके अधीन विभागों (respective departments) और उनके कार्यों  (officers' powers) का ज्ञान होता है. अशोक के शिलालेखों में धम्ममहामात्र आदि अधिकारीयों का वर्णन है.

मौर्यकालीन अधिकारी और उनके कार्य

  1. समस्थाध्यक्ष - बाजार की निगरानी करना और व्यापारियों पर करना
  2. एग्रोनोमई (जिला अधिकारी) - मार्ग-निर्माण अधिकारी (मेगास्थनीज के अनुसार यह जिले का प्रमुख अधिकारी होता था). इसके कार्य सिंचाई और भूमि की पैमाइश का निरिक्षण, शिकारी का निरिक्षम, कृषि और वनसंपदा से सम्बंधित विभिन्न उद्योगों और लकड़ी के काम, धातु की ढलाई के कारखानों और खानों का निरीक्षण करना आदि थे.
  3. एस्टीनोमोई (नगर अधिकारी) - दूसरे प्रकार के अधिकारी, अर्थात् नगर के अधिकारी, एस्टिनोमोई 5-5 सदस्यों के छः मंडलों में विभाजित थे. इनके कार्य क्रमशः थे -1. कारखानों का निरीक्षण 2.विदेश से आनेवालों की देखभाल जिसमें सरायों पर पूर्ण नियंत्रण, सहायक अधिकारियों की व्यवस्था, रोगियों की देखभाल और मृत लोगों की अंतिम क्रिया शामिल थी 3. जन्म और मृत्यु का हिसाब रखना 4. बाजार पर नियंत्रण रखना. 5. नाप और तौर का निरीक्षण करना, तैयार माल का निरीक्षण करना, नई और पुरानी वस्तुओं की अलग-अलग बिक्री का प्रबंध करना 6. माल की बिक्री पर 10% कर वसूल करना.
  4. प्रदेष्टा/प्रादेशिक - मंडल का प्रधान अधिकारी.
  5. गोप - संग्रहण (10 ग्राम) का प्रधान अधिकारी.
  6. ग्रामिक - ग्राम का मुखिया.
  7. राजपुरुष - गणिकाध्यक्ष का सहयोगी.
  8. बन्धकी पोषक - वेश्याओं से सम्बंधित मामले.
  9. धम्ममहामात्र/धर्म महामात्र - धम्म से सम्बन्धित अधिकारी.
  10. अंत महामात्र - सीमा क्षेत्र.
  11. इतिझांक महामात्र - स्त्री और हरम से सम्बंधित मामले.
  12. सवधकाम महामात्र - मुख्यमंत्री 
  13. द्रोणमापक महामात्र - सर्वेक्षण
  14. रुपदर्शक - सिक्का/मुद्रा परीक्षण करने वाला अधिकारी.

मौर्य साम्राज्य का प्रशासन

मौर्य साम्राज्य: प्रशासन

पाटलिपुत्र की शाही राजधानी के साथ मौर्य साम्राज्य चार प्रांतों में विभाजित था। अशोक के शिलालेखों से प्राप्त  चार प्रांतीय राजधानियों के नाम, तोसली (पूर्व में), उज्जैन (पश्चिम), स्वर्णागिरी (दक्षिण में) और तक्षशिला (उत्तर में) थे। मेगस्थनीज के अनुसार, साम्राज्य के प्रयोग के लिए 600,000 पैदल सेना, 30,000 घुड़सवार सेना, और 9000 युद्ध हाथियों की समारिक सेना थी। आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के उद्देश्य के लिए एक विशाल जासूस प्रणाली थी जो अधिकारियों और दूतों पर नजर रखती थी। राजा ने चरवाहों, किसानों, व्यापारियों और कारीगरों आदि से कर लेने के लिए अधिकारियों को नियुक्त किया था। राजा प्रशासनिक अधिरचना का केंद्र होता था और मंत्रियों और उच्च अधिकारियों की नियुक्ति राजा करता था। प्रशासनिक ढांचा इस प्रकार था:

राजा को मंत्रीपरिषद (मंत्रियों की परिषद) द्वारा सहायता प्राप्त होती थी जिसके सदस्यों में अध्यक्ष और निम्नांकित सदस्य शामिल होते थे:

युवराज: युवराज

पुरोहित: मुख्य पुजारी

सेनापति: प्रमुख कमांडर

आमात्य: सिविल सेवक और कुछ अन्य मंत्रीगण।

विद्वानों द्वारा दिये गये सुझावों के बाद मौर्य साम्राज्य को आगे चलकर महत्वपूर्ण अधिकारियों के साथ विभिन्न विभागों में विभाजित कर दिया गया था:

राजस्व विभाग: - महत्वपूर्ण अधिकारीगण: सन्निधाता: मुख्य कोषागार, समहर्थ: राजस्व संग्राहक मुखिया

सैन्य विभाग: मेगस्थनीस ने सैन्य गतिविधियों के समन्वय के लिए इन छह उप समितियों के साथ एक समिति का उल्लेख किया है। पहले का काम नौसेना की देखभाल करना, दूसरे का काम परिवहन और प्रावधानों की देखरेख करना था, तीसरे के पास पैदल सैनिकों, चौथे के पास घोडों, पांचवे के पास रथों और छठे के पास हाथियों के देखरेख की जिम्मेदारी थी।

जासूसी विभाग: महामात्यपासारपा गुधापुरूषों को नियंत्रित करता था  (गुप्त एजेंट)

पुलिस विभाग: जेल को बंदीगृह के रूप में जाना जाता था और लॉक से भिन्न थी जिसे चरका कहा जाता था। यह सभी प्रमुख केंद्रों के पुलिस मुख्यालयों में होती थी।

प्रांतीय और स्थानीय प्रशासन: प्रादेशिका: आधुनिक जिला मजिस्ट्रेट, स्थानिका: प्रादेशिका के तहत कर संग्रह अधिकारी, दुर्गापाला: किले के गवर्नर, अकक्षापताला: महालेखाकार, लिपीकार: लेखक, गोप: लेखाकार आदि के लिए जिम्मेदार था।

नगर प्रशासन: महत्वपूर्ण अधिकारीगण: नगारका: शहर प्रशासन का प्रभारी, सीता- अध्यक्ष: कृषि पर्यवेक्षक, सामस्थ-अध्यक्ष: बाजार अधीक्षक, नवाध्यक्ष: जहाजों के अधीक्षक, शुल्काध्यक्ष: पथ-कर के अधीक्षक, लोहाध्यक्ष: लोहे के अधीक्षक, अकाराध्यक्ष: खानों के अधीक्षक, पौथवाध्यक्ष: वजन और माप आदि के अधीक्षक।

मेगस्थनीस ने छ समितियों का उल्लेख किया है जिसमें पांच पाटलिपुत्र का प्रशासनिक देखभाल करती थी। उद्योगों, विदेशियों,  जन्म और मृत्यु का पंजीकरण, व्यापार,  निर्माण और माल की बिक्री और बिक्री कर का संग्रह प्रशासन के नियंत्रण में था।

मौर्य साम्राज्य का विनाश

मौर्य साम्राज्य: इसका पतन और महत्व

अशोक/अशोका की मृत्यु के बाद मौर्य वंश के पतन के में तेजी आ गयी थी। इसका एक स्पष्ट कारण कमजोर राजाओं का उत्तराधिकार था। एक और तत्कालीक कारण साम्राज्य का दो भागों में विभाजन होना था। यदि बटवारा ना हुआ होता तो यूनानी आक्रमण को रोक कर मौर्य साम्राज्य को पहले की तरह दुबारा शक्तिशाली बनाया जा सकता था। 232 ईसा पूर्व में अशोक की मृत्यु के बाद से ही मौर्य साम्राज्य के पतन की शुरूआत हो गयी थी। अंतिम राजा बृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने कर दी थी जो  एक ब्राह्मण था।

मौर्य साम्राज्य के पतन के लिए जो नेतृत्व के कारक रहे थे वो निम्नलिखित हैं:

अशोक की धार्मिक नीति

अशोक की धार्मिक नीति का उसके साम्राज्य के ब्राह्मणों ने विरोध किया था। चूंकि अशोक ने पशु वध पर प्रतिबंध लगा दिया था जिससे ब्राह्मणों की आय बंद हो गयी थी जिससे उन्हें उपहार के रूप में विभिन्न प्रकार के बलिदानों के लिए पशु प्राप्त होते थे।

सेना और नौकरशाही पर भारी खर्च

मौर्य युग के दौरान सेना और नौकरशाही के निर्वहन पर एक विशाल व्यय खर्च किया जाता था। इसके अलावा, अशोक ने अपने शासनकाल के दौरान बौद्ध भिक्षुओं को भी भारी अनुदान दिया जिससे उसका शाही खजाना खाली हो गया था। मौर्य राजा जो अशोक के उत्तराधिकारी बने थे उन्हें भी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा था।

प्रांतों में दमनकारी शासन

मगध साम्राज्य में प्रांतीय शासक अक्सर भ्रष्ट और दमनकारी थे। इससे साम्राज्य के खिलाफ लगातार विद्रोह बढ़ता गया। बिन्दुसार के शासनकाल के दौरान, तक्षशिला के नागरिकों ने दुष्ट नौकरशाहों के कुशासन के खिलाफ शिकायत की थी। हालांकि बिन्दुसार और अशोक ने नौकरशाहों को नियंत्रित करने के कई उपाय किये थे लेकिन प्रांतों में उत्पीड़न की जांच करने में विफल रहे थे।

उत्तर पश्चिम सीमांत की उपेक्षा

अशोक हमारी धार्मिक गतिविधियों को आगे ले जाने में इतना व्यस्त था कि शायद ही कभी उसने मौर्य साम्राज्य के उत्तर-पश्चिम सीमांत की ओर ध्यान दिया था। और इसका फायदा यूनानियों ने उठाया तथा उत्तरी अफगानिस्तान में एक राज्य की स्थापना कर दी जिसे बैक्ट्रिया के रूप में जाना जाता था। इसके बाद कई विदेशी आक्रमण हुए जिससे साम्राज्य कमजोर हो गया था।

मौर्य काल का महत्व

मौर्य साम्राज्य की स्थापना के बाद भारतीय इतिहास में एक नए युग की शुरूआत हुई थी। यह इतिहास में पहला मौका था जिसमें पूरा भारत राजनीतिक तौर पर एकजुट रहा था। इसके अलावा, कालक्रम और स्रोतों में सटीकता की वजह से इस अवधि का इतिहास लेखन साफ- सुथरा था। इसके साथ स्वदेशी और विदेशी साहित्यिक स्रोत भी पर्याप्त रूप में भी उपलब्ध थे। यह साम्राज्य इस अवधि के इतिहास लेखन के लिए एक बड़ी संख्या में अभिलेख छोड़ गया था।

इसके अलावा, मौर्य साम्राज्य के साथ जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पुरातात्विक निष्कर्ष पत्थर की मूर्तियां थी जो अनूठी मौर्य कला का एक जबरदस्त उदाहरण थी। कुछ विद्वानों का मानना था कि अशोक शिलालेख पर मौजूद संदेश अधिकांश शासकों की तुलना में पूरी तरह से अलग थे जो अशोक के शक्तिशाली और मेहनती होने का प्रतीक थे तथा अन्य शासक जिन्होंने उत्कृष्ठ खिताब अंगीकृत किये थे, अशोक उनकी तुलना में अधिक विनम्र था। तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि देश के नेता उसे (अशोक) एक प्रेरक व्यक्तित्व के रूप याद करते थे।

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...