बिजयनगर साम्राज्य

विजयनगर साम्राज्य की स्थापना - Vijayanagara Empire

मुहम्मद तुगलक के शासनकाल (1324-1351 ई.) के अंतिम समय में (उसकी गलत नीतियों के कारण) जब अधिकाँश स्थानों पर अव्यवस्था फैली और अनेक प्रदेशों के शासकों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया तो दक्षिण के हिन्दू भी इससे लाभ उठाने से नहीं चूके. उन्होंने विजयनगर साम्राज्य (Vijayanagar Empire) की स्थापना सन 1336 ई. में पाँच भाइयों (हरिहर, कंपा प्रथम, बुक्का प्रथम, मारप्पा और मदुप्पा) के परिवार के दो सदस्यों, हरिहर और बुक्का के नेतृत्व में की.

विजयनगर साम्राज्य

अनेक शिलालेखों के अनुसार हरिहर और बुक्का याद परिवार किए किसी चन्द्रवंशी संगम के पुत्र थे. ये दोनों भाई वारंगल राज्य (warangal rajya) के शासक प्रतापरूद्र द्वितीय की सेवा में थे. जब गयासुद्दीन तुगलक ने वारंगल को 1323 ई. में जीत लिया तो वे काम्पलि चले आये. मुहम्मद तुगलक के विरुद्ध उसके चहेरे भाई बहाउद्दीन गुर्शप ने 1325 ई. में कर्नाटक में सागर नामक स्थान पर विद्रोह कर दिया और सुलतान ने स्वयं जाकर उसके विद्रोह को दबाया. उसने (बहाउद्दीन गुर्शप) कर्नाटक में स्थित काम्पलि को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया. मुहम्मद तुगलक जिन छः अधिकारियों को काम्पलि से बंदी बनाकर दिल्ली ले गया था उनमें से ये दोनों भाई थे संभवतः उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया (या जबरदस्ती स्वीकार करा लिया गया) और वे सुलतान के कृपा पात्र बन गए. मुहम्मद तुगलक के विरुद्ध 1327-28 ई. में दक्षिण राज्यों में विद्रोह की एक शृंखला शुरू (बीदर, दौलताबाद, गुलबर्गा, मुदरा, तेलंगाना आर काम्पलि) हो गई. मुहम्मद तुगलक ने हरिहर और बुक्का को दक्षिण के काम्पलि प्रांत में भेजा ताकि वे विद्रोही हिंदुओं को कुचलकर वहाँ से सूबेदार मालिक मुहम्मद से शासन अपने हाथों में लेले. इन दोनों के दक्षिण जाने के बाद सचमुच वहाँ क्या हुआ, यह मुस्लिम इतिहासकारों और हिन्दू परम्परागत कथाओं के परस्पर विरोधी वर्णनों के कारण बिल्कुल स्पष्ट नहीं है. फिर भी एक बात पर दोनों स्रोत सहमत हैं कि इन दोनों भाइयों ने इस्लाम को शीघ्र ही तिलांजलि दे दी और स्वतंत्र विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की.

उन्होंने अपने पिता विजय के नाम को अमर करने के लिए काम्पलि (आधुनिक कर्नाटक राज्य में) के विद्यारण्य नामक संत के प्रभाव में आकर इस राज्य की नींव रखी थी और मुहम्मद तुगलक से स्वतंत्रता की घोषणा कर दी.

चार राजवंश 

इस राज्य में 1336 ई. से लेकर 1565 ई. तक चार राजवंशों - संगम वंश (1336-1485), सालुव वंश/ Saluva dynasty (1485-1505), तुलुव वंश/Tuluva dynasty (1491-1570) और अरविडु वंश/Aravidu dynasty (1542-1646) ने शासन किया. इनमें से प्रथम दो राजवंश (अर्थात् संगम और सालुंव) संयुक्त बहमनी साम्राज्य के समकालीन थे जबकि तृतीय राजवंश (अर्थात् तुलुब) बहमनी राज्य के विघटन के बाद बनी पाँच मुस्लिम रियासतों (बीदर, बरार, बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुंडा) का समकालीन था.

मौर्य साम्राज्य के प्रसासनिक अधिकारी औऱ ब्यवस्था

मौर्यकालीन अधिकारी और उनके कार्य - Mauryan Officers

मौर्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था (Mauryan Administrative System) की जानकारी हमें मुख्य रूप से कौटिल्य के अर्थशास्त्र और आंशिक रूप से अशोक के शासनादेशों (शिलालेख, स्तम्भ लेख आदि) से मिलती है. यूनानी विवरणों में भी कुछ मौर्यकालीन अधिकारीयों (mauryan officers) के नाम आते हैं. अर्थशास्त्र में मौर्य शासन की विस्तृत जानकारी दी गई है. इससे पता चलता है कि उस समय शासन की एक सुदृढ़ व्यवस्था थी जिसके बल पर विशाल मौर्य सम्राज पर मगध सम्राट अपना नियंत्रण रखते थे. अर्थशास्त्र में कई अधिकारियों (mauryan officials) के नाम आते हैं और उनके अधीन विभागों (respective departments) और उनके कार्यों  (officers' powers) का ज्ञान होता है. अशोक के शिलालेखों में धम्ममहामात्र आदि अधिकारीयों का वर्णन है.

मौर्यकालीन अधिकारी और उनके कार्य

  1. समस्थाध्यक्ष - बाजार की निगरानी करना और व्यापारियों पर करना
  2. एग्रोनोमई (जिला अधिकारी) - मार्ग-निर्माण अधिकारी (मेगास्थनीज के अनुसार यह जिले का प्रमुख अधिकारी होता था). इसके कार्य सिंचाई और भूमि की पैमाइश का निरिक्षण, शिकारी का निरिक्षम, कृषि और वनसंपदा से सम्बंधित विभिन्न उद्योगों और लकड़ी के काम, धातु की ढलाई के कारखानों और खानों का निरीक्षण करना आदि थे.
  3. एस्टीनोमोई (नगर अधिकारी) - दूसरे प्रकार के अधिकारी, अर्थात् नगर के अधिकारी, एस्टिनोमोई 5-5 सदस्यों के छः मंडलों में विभाजित थे. इनके कार्य क्रमशः थे -1. कारखानों का निरीक्षण 2.विदेश से आनेवालों की देखभाल जिसमें सरायों पर पूर्ण नियंत्रण, सहायक अधिकारियों की व्यवस्था, रोगियों की देखभाल और मृत लोगों की अंतिम क्रिया शामिल थी 3. जन्म और मृत्यु का हिसाब रखना 4. बाजार पर नियंत्रण रखना. 5. नाप और तौर का निरीक्षण करना, तैयार माल का निरीक्षण करना, नई और पुरानी वस्तुओं की अलग-अलग बिक्री का प्रबंध करना 6. माल की बिक्री पर 10% कर वसूल करना.
  4. प्रदेष्टा/प्रादेशिक - मंडल का प्रधान अधिकारी.
  5. गोप - संग्रहण (10 ग्राम) का प्रधान अधिकारी.
  6. ग्रामिक - ग्राम का मुखिया.
  7. राजपुरुष - गणिकाध्यक्ष का सहयोगी.
  8. बन्धकी पोषक - वेश्याओं से सम्बंधित मामले.
  9. धम्ममहामात्र/धर्म महामात्र - धम्म से सम्बन्धित अधिकारी.
  10. अंत महामात्र - सीमा क्षेत्र.
  11. इतिझांक महामात्र - स्त्री और हरम से सम्बंधित मामले.
  12. सवधकाम महामात्र - मुख्यमंत्री 
  13. द्रोणमापक महामात्र - सर्वेक्षण
  14. रुपदर्शक - सिक्का/मुद्रा परीक्षण करने वाला अधिकारी.

मौर्य साम्राज्य का प्रशासन

मौर्य साम्राज्य: प्रशासन

पाटलिपुत्र की शाही राजधानी के साथ मौर्य साम्राज्य चार प्रांतों में विभाजित था। अशोक के शिलालेखों से प्राप्त  चार प्रांतीय राजधानियों के नाम, तोसली (पूर्व में), उज्जैन (पश्चिम), स्वर्णागिरी (दक्षिण में) और तक्षशिला (उत्तर में) थे। मेगस्थनीज के अनुसार, साम्राज्य के प्रयोग के लिए 600,000 पैदल सेना, 30,000 घुड़सवार सेना, और 9000 युद्ध हाथियों की समारिक सेना थी। आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के उद्देश्य के लिए एक विशाल जासूस प्रणाली थी जो अधिकारियों और दूतों पर नजर रखती थी। राजा ने चरवाहों, किसानों, व्यापारियों और कारीगरों आदि से कर लेने के लिए अधिकारियों को नियुक्त किया था। राजा प्रशासनिक अधिरचना का केंद्र होता था और मंत्रियों और उच्च अधिकारियों की नियुक्ति राजा करता था। प्रशासनिक ढांचा इस प्रकार था:

राजा को मंत्रीपरिषद (मंत्रियों की परिषद) द्वारा सहायता प्राप्त होती थी जिसके सदस्यों में अध्यक्ष और निम्नांकित सदस्य शामिल होते थे:

युवराज: युवराज

पुरोहित: मुख्य पुजारी

सेनापति: प्रमुख कमांडर

आमात्य: सिविल सेवक और कुछ अन्य मंत्रीगण।

विद्वानों द्वारा दिये गये सुझावों के बाद मौर्य साम्राज्य को आगे चलकर महत्वपूर्ण अधिकारियों के साथ विभिन्न विभागों में विभाजित कर दिया गया था:

राजस्व विभाग: - महत्वपूर्ण अधिकारीगण: सन्निधाता: मुख्य कोषागार, समहर्थ: राजस्व संग्राहक मुखिया

सैन्य विभाग: मेगस्थनीस ने सैन्य गतिविधियों के समन्वय के लिए इन छह उप समितियों के साथ एक समिति का उल्लेख किया है। पहले का काम नौसेना की देखभाल करना, दूसरे का काम परिवहन और प्रावधानों की देखरेख करना था, तीसरे के पास पैदल सैनिकों, चौथे के पास घोडों, पांचवे के पास रथों और छठे के पास हाथियों के देखरेख की जिम्मेदारी थी।

जासूसी विभाग: महामात्यपासारपा गुधापुरूषों को नियंत्रित करता था  (गुप्त एजेंट)

पुलिस विभाग: जेल को बंदीगृह के रूप में जाना जाता था और लॉक से भिन्न थी जिसे चरका कहा जाता था। यह सभी प्रमुख केंद्रों के पुलिस मुख्यालयों में होती थी।

प्रांतीय और स्थानीय प्रशासन: प्रादेशिका: आधुनिक जिला मजिस्ट्रेट, स्थानिका: प्रादेशिका के तहत कर संग्रह अधिकारी, दुर्गापाला: किले के गवर्नर, अकक्षापताला: महालेखाकार, लिपीकार: लेखक, गोप: लेखाकार आदि के लिए जिम्मेदार था।

नगर प्रशासन: महत्वपूर्ण अधिकारीगण: नगारका: शहर प्रशासन का प्रभारी, सीता- अध्यक्ष: कृषि पर्यवेक्षक, सामस्थ-अध्यक्ष: बाजार अधीक्षक, नवाध्यक्ष: जहाजों के अधीक्षक, शुल्काध्यक्ष: पथ-कर के अधीक्षक, लोहाध्यक्ष: लोहे के अधीक्षक, अकाराध्यक्ष: खानों के अधीक्षक, पौथवाध्यक्ष: वजन और माप आदि के अधीक्षक।

मेगस्थनीस ने छ समितियों का उल्लेख किया है जिसमें पांच पाटलिपुत्र का प्रशासनिक देखभाल करती थी। उद्योगों, विदेशियों,  जन्म और मृत्यु का पंजीकरण, व्यापार,  निर्माण और माल की बिक्री और बिक्री कर का संग्रह प्रशासन के नियंत्रण में था।

मौर्य साम्राज्य का विनाश

मौर्य साम्राज्य: इसका पतन और महत्व

अशोक/अशोका की मृत्यु के बाद मौर्य वंश के पतन के में तेजी आ गयी थी। इसका एक स्पष्ट कारण कमजोर राजाओं का उत्तराधिकार था। एक और तत्कालीक कारण साम्राज्य का दो भागों में विभाजन होना था। यदि बटवारा ना हुआ होता तो यूनानी आक्रमण को रोक कर मौर्य साम्राज्य को पहले की तरह दुबारा शक्तिशाली बनाया जा सकता था। 232 ईसा पूर्व में अशोक की मृत्यु के बाद से ही मौर्य साम्राज्य के पतन की शुरूआत हो गयी थी। अंतिम राजा बृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने कर दी थी जो  एक ब्राह्मण था।

मौर्य साम्राज्य के पतन के लिए जो नेतृत्व के कारक रहे थे वो निम्नलिखित हैं:

अशोक की धार्मिक नीति

अशोक की धार्मिक नीति का उसके साम्राज्य के ब्राह्मणों ने विरोध किया था। चूंकि अशोक ने पशु वध पर प्रतिबंध लगा दिया था जिससे ब्राह्मणों की आय बंद हो गयी थी जिससे उन्हें उपहार के रूप में विभिन्न प्रकार के बलिदानों के लिए पशु प्राप्त होते थे।

सेना और नौकरशाही पर भारी खर्च

मौर्य युग के दौरान सेना और नौकरशाही के निर्वहन पर एक विशाल व्यय खर्च किया जाता था। इसके अलावा, अशोक ने अपने शासनकाल के दौरान बौद्ध भिक्षुओं को भी भारी अनुदान दिया जिससे उसका शाही खजाना खाली हो गया था। मौर्य राजा जो अशोक के उत्तराधिकारी बने थे उन्हें भी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा था।

प्रांतों में दमनकारी शासन

मगध साम्राज्य में प्रांतीय शासक अक्सर भ्रष्ट और दमनकारी थे। इससे साम्राज्य के खिलाफ लगातार विद्रोह बढ़ता गया। बिन्दुसार के शासनकाल के दौरान, तक्षशिला के नागरिकों ने दुष्ट नौकरशाहों के कुशासन के खिलाफ शिकायत की थी। हालांकि बिन्दुसार और अशोक ने नौकरशाहों को नियंत्रित करने के कई उपाय किये थे लेकिन प्रांतों में उत्पीड़न की जांच करने में विफल रहे थे।

उत्तर पश्चिम सीमांत की उपेक्षा

अशोक हमारी धार्मिक गतिविधियों को आगे ले जाने में इतना व्यस्त था कि शायद ही कभी उसने मौर्य साम्राज्य के उत्तर-पश्चिम सीमांत की ओर ध्यान दिया था। और इसका फायदा यूनानियों ने उठाया तथा उत्तरी अफगानिस्तान में एक राज्य की स्थापना कर दी जिसे बैक्ट्रिया के रूप में जाना जाता था। इसके बाद कई विदेशी आक्रमण हुए जिससे साम्राज्य कमजोर हो गया था।

मौर्य काल का महत्व

मौर्य साम्राज्य की स्थापना के बाद भारतीय इतिहास में एक नए युग की शुरूआत हुई थी। यह इतिहास में पहला मौका था जिसमें पूरा भारत राजनीतिक तौर पर एकजुट रहा था। इसके अलावा, कालक्रम और स्रोतों में सटीकता की वजह से इस अवधि का इतिहास लेखन साफ- सुथरा था। इसके साथ स्वदेशी और विदेशी साहित्यिक स्रोत भी पर्याप्त रूप में भी उपलब्ध थे। यह साम्राज्य इस अवधि के इतिहास लेखन के लिए एक बड़ी संख्या में अभिलेख छोड़ गया था।

इसके अलावा, मौर्य साम्राज्य के साथ जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पुरातात्विक निष्कर्ष पत्थर की मूर्तियां थी जो अनूठी मौर्य कला का एक जबरदस्त उदाहरण थी। कुछ विद्वानों का मानना था कि अशोक शिलालेख पर मौजूद संदेश अधिकांश शासकों की तुलना में पूरी तरह से अलग थे जो अशोक के शक्तिशाली और मेहनती होने का प्रतीक थे तथा अन्य शासक जिन्होंने उत्कृष्ठ खिताब अंगीकृत किये थे, अशोक उनकी तुलना में अधिक विनम्र था। तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि देश के नेता उसे (अशोक) एक प्रेरक व्यक्तित्व के रूप याद करते थे।

मौर्य साम्राज्य और भारत

मौर्य राजवंश

चौथी सदी BC में नन्दा के राजाओं ने मगध राजवंश पर शासन किया और यह राजवंश उत्तर का सबसे ताकतवर राज्य था | एक ब्राह्मण मंत्री चाणक्य जिसे कौटिल्य / विष्णुगुप्त ने नाम से भी जाना गया ने मौर्य परिवार से चन्द्रगुप्त नामक नवयुवक को प्रशिक्षण दिया | चन्द्रगुप्त ने अपने सेना का अपने आप संगठन किया और 322 BC  में नन्दा का तख़्ता पलट दिया |

अतः चन्द्रगुप्त मौर्य को मौर्य राजवंश का प्रथम राजा और संस्थापक माना जाता है| इसकी माता का नाम मुर था, इसीलिए इसे संस्कृत में मौर्य कहा जाता था जिसका अर्थ है मुर का बेटा और इसके राजवंश को मौर्य राजवंश कहा गया |

मगध साम्राज्य के कुछ महत्वपूर्ण शासक  :

चन्द्रगुप्त मौर्य (322-298 BC)

विद्वानों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य केवल 25 वर्ष का था जब उसने नन्दा के राजा धाना नन्द को पराजित कर पाटलीपुत्र पर कब्जा कर लिया था | सबसे पहले इसने अपनी शक्तियाँ भारत गंगा के मैदानो में स्थापित की और बाद में वह पश्चिमी उत्तर की तरफ बढ़ गया | चन्द्रगुप्त ने शीघ्र ही पंजाब के पूरे प्रांत पर विजय प्राप्त की | सेल्यूकस निकेटर, अलेक्जेंडर के यूनानी अधिकारी ने उत्तर के दूरत्तम में कुछ जमीन पर अपनी पकड़ बना ली | अतः, चन्द्रगुप्त मौर्य को उसके खिलाफ एक लंबा युद्ध करना पड़ा और अंत में 305 BC के लगभग उसे हरा दिया और एक संधि पर हस्ताक्षर किए गए | इस संधि के अनुसार, सेल्यूकस निकेटर ने सिंधु के पार के क्षेत्र सौंपे – नामतः आरिया(हृदय), अर्कोजिया (कंधार ), गेड्रोसिया(बालूचिस्तान ) और परोपनिशे (काबुल) को मौर्य साम्राज्य को दे दिया गया और बदले में चन्द्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 हाथी भेंट स्वरूप दिये | सेल्यूकस ने अपनी पुत्री भी मौर्य राजकुमार को दे दी या यह माना  जाता है कि चन्द्रगुप्त ने सेलेकुस की पुत्री ( यूनानी मकेदोनियन राजकुमारी ) से विवाह किया ताकि इस गठबंधन को पक्का कर ;लिया जाये |इस तरह उसने सिंधु प्रांत पर नियंत्रण पा लिया जिसका कुछ भाग अब आधुनिक अफगानिस्तान में है | बाद में चन्द्रगुप्त मौर्य मध्य भारत की तरफ चला गया और नर्मदा नदी के उत्तर प्रांत पर कब्ज़ा कर लिया |

इस संधि के अलावा, सेल्यूकस ने मगस्थेनेस को चन्द्रगुप्त मौर्य  और दैमकोस को बिन्दुसार के सभा में यूनानी दूत बनाकर भेजा | चन्द्रगुप्त ने अपने जीवन के अंत में जैन धर्म को अपना लिया और अपने पुत्र बिन्दुसार  के लिए राजगद्दी छोड़ दी  | बाद में चन्द्रगुप्त, भद्रबाहु के नेतृत्व में जैन संतों के साथ मैसूर के निकट स्रवना बेल्गोला चले गए  और अपने आप को भूखा रखकर जैन प्रथा के अनुसार मृत्यु ( संथारा)  प्राप्त की  |

बिन्दुसार (297-272 BC)

चन्द्रगुप्त ने 25 साल तक शासन किया और उसके बाद इसने अपने पुत्र बिन्दुसार के लिए राजगद्दी छोड़ दी |बिन्दुसार को यूनानियों द्वारा “अमित्रघटा “ कहा गया जिसका मतलब “दुश्मनों का कातिल” होता है | कुछ विद्वानों के अनुसार, बिन्दुसार ने दक्कन को मैसूर तक जीता | तारानाथ एक तिब्बत भिक्षु ने यह पुष्टि की है कि बिन्दुसार ने दो समुद्रों  के बीच की भूमि जिसमे 16 राज्य थे को जीत लिया था | संगम साहित्य के अनुसार मौर्य ने दूरतम दक्षिण तक हमला किया | अतः यह कहा जा सकता है कि मौर्य राजवंश का विस्तार मैसूर में दूर तक हुआ और इसलिए इसमे पूरे भारत को शामिल किया परंतु कलिंग के निकट के पास  बेरोजगार परीक्षण और वन क्षेत्रों और चरम दक्षिण के राज्यों में एक छोटे से हिस्से को साम्राज्य से बाहर रखा गया | बिन्दुसार के सेलेकुड सीरिया के राजा अंटिओचूस I के साथ संबंध थे, जिसने डैमचुस को दूत बनाकर इसकी (बिन्दुसार) सभा में भेजा था | बिन्दुसार ने अंटिओचूस को मदिरा, सूखे अंजीरों और कुतर्की देनी चाही | सब कुछ भेज दिया गया पर कुतर्की को नहीं भेजा गया क्यूंकि यूनानी कानून के अनुसार कुतर्की भेजने पर प्रतिबंध था | बिन्दुसार ने एक धर्म संप्रदाय, आजीविकास में अपनी रुचि बनाए रखी | बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को उज्जयिनी का राज्यपाल नियुक्त कर दिया जिसने बाद में तक्षिला के विद्रोह को दबा दिया |

महान अशोक(268-232 BC)

अशोक के शासन में मौर्य साम्राज्य चरम पर पहुंचा | पहली बार पूरे उपमहाद्वीप, दूरतम दक्षिण को छोड़कर, शाही नियंत्रण में थे |

अशोक के राजगद्दी पर बैठने (273 BC ) और उसके वास्तविक राजतिलक (269 (BC ) के बीच चार साल का अंतराल था | अतः उपलबद्ध साक्ष्यों से यह पता चलता है कि बिन्दुसार की  मृत्यु के बाद राजगद्दी  के लिए संघर्ष हुआ था |

हालांकि, अशोक का उत्तराधिकारी बनना एक विवाद था | अशोक के शासन की सबसे महत्वपूर्ण घटना उसका कलिंग के साथ 261 BC  में विजयी युद्ध था | युद्ध के असली कारणो का कोई साक्ष्य मौजूद नहीं था परंतु दोनों तरफ भारी नुकसान हुआ था | अशोक इन घावों से दुखी था और उसने खुद युद्ध के परिणामों का उल्लेख शिलालेख XIII में किया था | युद्ध के समाप्त होने के ठीक बाद मौर्य समाज से कलिंग को जोड़ लिया और आगे कोई भी  युद्ध न करने का निश्चय किया | कलिंग युद्ध का एक अन्य सबसे महत्वपूर्ण परिणाम था अशोक का बौद्ध भिक्षु उपगुप्ता से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म को अपना लेना | अशोक ने जबकि एक बड़ी और ताकतवर सेना को शांति और सत्ता के लिए बनाए रखा, उसने अपने दोस्ताना रिश्ते एशिया और यूरोपे के पार भी बनाए और बौद्ध धर्म के प्रचारक मंडलों को आर्थिक संरक्षण भी दिया | अशोक ने चोल और पाण्ड्य के राज्यों और यूनानी राजाओं द्वारा शासित पाँच प्रदेशों में धर्म प्रचारक मण्डल भेजे | इसने सीलोन और सुवर्णभूमि (बर्मा) और दक्षिण पूर्व एशिया के हिस्सों में भी धर्म प्रचारक मण्डल भेजे |

महेंद्र , तिवरा/ तिवला ( केवल एक जिसका अभिलेखों  में उल्लेख किया गया है ) कुनाल और तालुक अशोक के पुत्रों में विशिष्ट थे | इसकी दो पुत्रियाँ संघमित्रा  और चारुमति थीं |

बाद के मौर्य (232 -184 BC ) 

232 BC में अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य दो भागों में विभाजित हो गया | ये दो भाग थे पूर्वी और पश्चिमी | अशोक के पुत्र कुणाल ने पश्चिमी भाग पर शासन किया जबकि पूर्वी भाग पर अशोक के पोते दसरथ ने शासन किया और बाद में समराती, सलिसुक, देवरमन, सतधनवान और अंत में बृहदरथ ने शासन किया | बृहदरथ, (अंतिम मौर्य शासक), की पुष्यमित्रा शुंग के द्वारा 184 BC  में हत्या कर दी गई |पुष्यमित्रा शुंग ने बाद में शुंग राजवंश’ वंश की स्थापना की ‘|

मौर्य कालीन भारत

मौर्य युग के पूर्व विदेशी आक्रमण

ईरानी/फारसी आक्रमण

पूर्वोत्तर भारत में धीरे-धीरे छोटे गणराज्यों और रियासतों का विलय मगध साम्राज्य के साथ कर दिया था। लेकिन उत्तर-पश्चिम भारत में विदेशी आक्रमण से क्षेत्र की रक्षा करने keके लिए कोई भी मजबूत साम्राज्य नहीं था। यह क्षेत्र धनवान भी था और इसमें हिंदू कुश के माध्यम से आसानी से प्रवेश किया जा सकता था।

518 ई.पू. में ईरानी आक्रमण और 326 ई.पू. में मकदूनियाई आक्रमण के रूप में  भारतीय उप-महाद्वीप के दो प्रमुख विदेशी आक्रमण हुए थे।

आर्कमेनियन शासक डारियस प्रथम ने 518 ईसा पूर्व में भारत के उत्तर-पश्चिम सीमांत पर आक्रमण किया और राजनीतिक एकता के अभाव का लाभ लेते हुए पंजाब पर आक्रमण कर दिया।

ईरानी आक्रमण के प्रभाव

  • आक्रमण से इंडो-ईरानी व्यापार और वाणिज्य में वृद्धि हुई।
  • ईरानियों ने भारतीयों के लिए एक नई लेखन लिपि की शुरूआत की जिस खरोष्ठी के रूप में जाना जाता था।

मकदूनियाई/ सिकंदर के आक्रमण

सिकंदर 20 साल की उम्र में अपने पिता की जगह लेते हुए मैसेडोनिया के सिंहासन आसीन हुआ। उसका सपना विश्व विजेता बनने का था और 326 ईसा पूर्व भारत पर आक्रमण करने से पहले उसने कई क्षेत्रों पर विजय प्राप्त कर ली थी। अम्भी (तक्षशिला के शासक) और अभिसार ने उसके आगे आत्मसमर्पण कर दिया था लेकिन पंजाब के शासक ने ऐसा करने से मना कर दिया था।

सिकंदर और पोरस की सेनाओं के बीच झेलम नदी के पास शुरू हुए युद्ध को हेडास्पेस के युद्ध के नाम से जाना जाता है। हांलाकि इस युद्ध में पोरस हार गया था लेकिन सिकन्दर ने उसका उदारतापूर्वक व्यवहार किया था।

हालांकि, यह जीत भारत में उसकी आखिरी बड़ी जीत साबित हुई क्योंकि उसकी सेना ने इसके बाद आगे जाने से इनकार कर दिया था। वे सिकंदर के अभियान के साथ जाने से काफी थक गए थे और वापस घर लौटना चाहते थे। इसके अलावा, मगधियन साम्राज्य (नंदा शासक) की ताकत से भी वो भयभीत थे।

विजय प्राप्त प्रदेशों के लिए आवश्यक प्रशासनिक व्यवस्था करने के बाद सिकंदर 325 ईसा पूर्व वापस चले गया। 33 वर्ष की आयु में जब वह बेबीलोन में था तब उसका निधन हो गया।

आक्रमण के प्रभाव

  • इस आक्रमण से भारत में राजनीतिक एकता की जरूरत महसूस की गयी जिससे चंद्रगुप्त मौर्य और उसके वंश का उदय हुआ है जिन्होंनो अपने शासन के दौरान भारत को एकजुट किया।
  • सिकंदर के आक्रमण के परिणामस्वरूप, भारत में इंडो-बैक्टेरियन और इंडो-पर्थिनयन राज्य स्थापित किये गये  जिसने  भारतीय वास्तुकला, सिक्कों और खगोल विज्ञान को प्रभावित किया था।

निष्कर्ष:

व्यापार, वाणिज्य, कला और संस्कृति के विकास साथ विदेशी आक्रमणों ने भारतीय उपमहाद्वीप के राजनीतिक एकीकरण में मदद की।

300-600 ईशा पूर्व का भारत

महाजनपद

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में कुछ साम्राज्यों के विकास में वृद्धि हुयी थी जो बाद में प्रमुख साम्राज्य बन गये और इन्हें महाजनपद या महान देश के नाम से जाना जाने लगा था। इन्होंने उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी बिहार तक तथा हिमालय के पहाड़ी क्षेत्रों से दक्षिण में गोदावरी नदी तक अपना विस्तार किया। आर्य यहां की सबसे प्रभावशाली जनजाति थी जिन्हें 'जनस' कहा जाता था। इससे जनपद शब्द की उतपत्ति हुयी थी जहां जन का अर्थ "लोग" और पद का अर्थ "पैर" होता था। जनपद वैदिक भारत के प्रमुख साम्राज्य थे। महाजनपदों में एक नये प्रकार का सामाजिक-राजनीतिक विकास हुआ था। महाजनपद विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों में स्थित थे। 600 ईसा पूर्व से 300 ईसा पूर्व के दौरान भारतीय उप-महाद्वीपों में सोलह महाजनपद थे।

उनके नाम थे:-

  • अंग
  • अश्मक
  • अवंती
  • छेदी
  • गांधार
  • कम्बोज
  • काशी
  • कौशल
  • कुरु
  • मगध
  • मल्ल
  • मत्स्य
  • पंचाल
  • सुरसेन
  • वज्जि
  • वत्स

मगध साम्राज्य:

  • मगध साम्राज्य ने 684 ईसा पूर्व से 320 ईसा पूर्व तक भारत में शासन किया।
  • इसका उल्लेख महाभारत और रामायण में भी किया गया है।
  • यह सोलह महाजनपदों में सबसे अधिक शक्तिशाली था।
  • साम्राज्य की स्थापना राजा बृहदरथ द्वारा की गयी थी।
  • राजगढ (राजगिर) मगध की राजधानी थी, लेकिन बाद में चौथी सदी ईसा पूर्व इसे पाटलिपुत्र में स्थानांतरित कर दिया गया था।
  •  यहां लोहे का इस्तेमाल उपकरणों और हथियारों का निर्माण करने के लिए किया जाता था।
  • हाथी जंगल में पाये जाते थे जिनका इस्तेमाल सेना में किया जाता था।
  • गंगा और उसकी सहायक नदियों के तटीय मार्गों ने संचार को सस्ता और सुविधाजनक बना दिया था।
  • बिम्बिसार, अजातशत्रु और महापदम नंद जैसे क्रूर और महत्वाकांक्षी राजाओं की कुशल नौकरशाही द्वारा नीतियों के कार्यान्वयन से मगध समृद्ध बन गया था।
  • मगध का पहला राजा बिम्बिसार था जो हर्यंक वंश का था।
  • अवंती मगध का मुख्य प्रतिद्वंदी था, लेकिन बाद में एक गठबंधन में शामिल हो गया था।
  • शादियों ने राजनीतिक गठबंधनों के निर्माण में मदद की थी और राजा बिम्बिसार ने पड़ोसी राज्यों की कई राजकुमारियों से शादी की थी।

हर्यंक राजवंश:

  • यह बृहदरथ राजवंश के बाद मगध पर शासन करने वाला यह दूसरा राजवंश था।
  • शिशुनाग इसका उत्तराधिकारी था।
  • राजवंश की स्थापना बिम्बिसार के पिता राजा भाट्य द्वारा की गयी थी।
  • राजवंश ने 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 413 ईसा पूर्व तक मगध पर शासन किया था।
  • हर्यंक राजवंश के राजा इस प्रकार थे:
  • भाट्य
  • बिम्बिसार
  • अजातशत्रु
  • उदयभद्र
  • अनुरूद्ध
  • मुंडा
  • नागदशक

बिम्बिसार:

  • बिम्बिसार ने मगध पर 544 ईसा पूर्व से 492 ईसा पूर्व तक, 52 वर्ष शासन किया था।
  • उसने विस्तार की आक्रामक नीति का पालन किया और काशी, कौशल और अंग के पड़ोसी राज्यों के साथ कई युद्ध लड़े।
  • बिम्बिसार गौतम बुद्ध और वर्द्धमान महावीर का समकालीन था।
  • उसका धर्म बहुत स्पष्ट नहीं है। बौद्ध ग्रंथों में उल्लेख के अनुसार वह बुद्ध का एक शिष्य था, जबकि जैन शास्त्रों में उसका वर्णन महावीर के अनुयायी के रूप तथा राजगीर के राजा श्रेनीका के रूप में मिलता है।
  • बाद में बिम्बिसार को उसके पुत्र अ़जातशत्रु द्वारा कैद कर लिया गया जिसने मगध के सिंहासन पर आधिपत्य स्थापित कर लिया था। बाद में कारावास के दौरान बिम्बिसार की मृत्यु हो गई।

अजातशत्रु

  • अजातशत्रु ने 492- 460 ईसा पूर्व तक मगध पर शासन किया था।
  • उसने वैशाली के साथ 16 वर्षों तक युद्ध किया था और अंत में कैटापोल्ट्स की मदद से साम्राज्य को शिकस्त दी।
  • उसने काशी और वैशाली पर आधिपत्य स्थापित करने के बाद मगध साम्राज्य का विस्तार किया था।
  • उसने राजधानी राजगीर को मजबूत बनाया जो पाँच पहाड़ियों से घिरी हुई थी जिससे यह लगभग अभेद्य बन गयी थी।

उदयन:

  • उदयन या उदयभद्र अजातशत्रु का उत्तराधिकारी था।
  • उसका शासनकाल 460 ईसा पूर्व से 444 ईसा पूर्व तक चला था।
  • उसने पटना (पाटलिपुत्र) के किले का निर्माण कराया था जो मगध साम्राज्य का केंद्र था
  • उदयन का उत्तराधिकारी शिशुनाग था।
  • शिशुनाग ने अवंती साम्राज्य का विलय मगध में कर दिया था।
  • बाद में उसका उत्तराधिकारी नंद राजवंश बना।

नंद राजवंश:

  • राजवंश का शासनकाल 345 ईसा पूर्व से 321 ईसा पूर्व तक चला था।
  • महापदम नंद, नंद राजवंश का पहला राजा था जिसने कलिंग का विलय मगध साम्राज्य में कर दिया था।
  • उसे सबसे शक्तिशाली और क्रूर माना जाता था यहां तक कि सिकंदर भी उसके खिलाफ युद्ध लड़ना नहीं चाहता था।
  • नंद वंश बेहद अमीर बन गया था। उन्होंने अपने पूरे साम्राज्य में सिंचाई परियोजनाओं और मानकीकृत व्यापारिक उपायों की शुरूआत की थी।
  • हर्ष और कठोर कराधान प्रणाली ने नंदों को अलोकप्रिय बना दिया था।
  • अंतिम नंद राजा, घानानंद को चंद्रगुप्त मौर्य ने पराजित कर दिया था।

 

शक और कुसां काल का भारत

मध्य एशियाई संपर्कों का प्रभाव (शक-कुषाण काल के दौरान)

मिट्टी के बर्तन और संरचना

इस अवधि के दौरान (शक-कुषाण काल) मिट्टी के बर्तन लाल रंग के होते थे जो सादे और पॉलिश दोनों तरह से निर्मित होते थे। यह मध्य एशिया में कुषाण साम्राज्य के दौरान खोजे गये पतले कपड़ों और लाल मिट्टी के बर्तनों के समान थे।

इस काल को ईंट की दीवारों के निर्माण के लिए जाना जाता था। फर्श और छत दोनों के लिए टाइल्स के रूप में जलीं हुई ईंटों का उपयोग होता था।

शक और कुषाणों ने बेहतर घुड़सवार सेना की शुरुआत की

शक और कुषाण अवधि के दौरान घुड़सवार सेना का बेहतरीन उपयोग देखने को मिला था। घोड़े  की लगाम और पीठ पर सीट के प्रयोग की शुरूआत शकों और कुषाणों द्वारा शुरू की गयी थी। इसके अलावा, शक और कुषाणों ने अंगरखा,  पगड़ी और पतलून तथा भारी-भरकम लंबे कोट,  कैप,  हेलमेट की भी शुरूआत की गयी थी और इस अवधि के दौरान जूतों की भी शुरूआत हुई थी जो युद्ध में जीत के लिए मददगार साबित हुए थे।

कृषि और व्यापार

कुषाणों द्वारा कृषि को प्रोत्साहित किया गया था। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और पश्चिमी मध्य एशिया के कुछ हिस्सों में सिंचाई सुविधाओं के पुरातात्विक निशान प्राप्त हुए थे।

शक-कुषाण अवधि के दौरान भारत और मध्य एशिया के बीच सीधे संपर्क की शुरूआत हुई। कुषाणों द्वारा नियंत्रित रेशम मार्ग जिसकी शुरूआत चीन से हुई और यह मध्य एशिया एवं अफगानिस्तान के माध्यम से ईरान और पश्चिमी एशिया तक फैल गया था।

भारत ने मध्य एशिया में स्थित अल्ताई पहाड़ो के माध्यम से रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार कर अच्छी मात्रा में स्वर्ण प्राप्त किया था।

राजनीति पर प्रभाव

शकों और कुषाणों ने शासन के दिव्य मूल के विचार को प्रचारित किया। कुषाण राजाओं को ईश्वर का पुत्र कहा जाता था।

कुषाणों ने भारत में सरकार की तानाशाह प्रणाली शुरू की। पूरा साम्राज्य कई तानाशाही में विभाजित किया गया था और प्रत्येक तानाशाही को एक तानाशाह द्वारा नियंत्रित किया जाता था। वंशानुगत दोहरा शासन, जिसमें एक ही साम्राज्य में एक ही समय में दो राजाओं के शासन करना शामिल था की शुरूआत इसी काल के दौरान हुई थी।

सैन्य गवर्नर के पद की प्रथा भी यूनानियों द्वारा शुरू की गयी थी। यूनानियों द्वारा नियुक्त राज्यपालों को स्ट्राटेगोस कहा जाता था। ये नये विजय प्राप्त क्षेत्रों को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होते थे।

धर्म पर प्रभाव

कुषाण राजा बुद्ध और शिव दोनों की पूजा करते थे। दोनों राजाओं द्वारा जारी किये गये सिक्कों में इन दो देवताओं के चित्र दिखाई देते थे। प्रसिद्ध यूनानी शासक महेंन्द्र ने बौद्ध धर्म अपना लिया था।

कला

शक और कुषाण राजकुमारों ने काफी हद तक भारतीय कला को प्रोत्साहित किया। इसी कारण गांधार, मथुरा और मध्य एशियाई जैसे कला के कई स्कूलों का निर्माण हुआ। जिसकी वजह भारतीय कारीगरों का यूनानी, रोमन और मध्य एशियाई कारीगरों के साथ संपर्क में आना था।

गांधार कला का प्रभाव मथुरा तक पहुंच गया था। ईसाई युग की प्रारंभिक सदी में मथुरा कला स्कूल को विकसित किया गया था और इसके उत्पाद लाल बलुआ पत्थर से बनते थे।

साहित्य

संस्कृत साहित्य को विदेशी शासकों का संरक्षण प्राप्त था। अश्वघोष जैस महान लेखकों को कुषाणों का संरक्षण प्राप्त था। अश्वघोष बुद्ध चरित और सौंदारनंद के लेखक थे।

यूनानियों द्वारा पर्दे का प्रयोग शुरू करने के बाद से भारतीय रंगमंच भी यूनानी प्रभाव के साथ समृद्ध हो गया था।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

भारतीय ज्योतिष विद्या ग्रीक विचारों से प्रभावित थी जिसने होरोस्कोप (जन्मकुण्डली) शब्द से होराशास्त्र शब्द की उत्तपत्ति की। पंच-चिह्नित सिक्कों की तुलना में यूनानी सिक्कों का आकार बेहतर और मुद्राकिंत था जो भारत में काफी प्रचलित हुए थे। ड्रामा शब्द की उत्तपत्ति भी यूनानी शब्द ड्राचेमा से हुई थी।

भारतीयों ने इस अवधि के दौरान चमड़े के जूते बनाने की कला सीखी थी जो इसी कारण से संभव हुयी थी।

इस प्रकार, आक्रमणों और मध्य एशियाई शासकों के संपर्क में आने से इसका असर भारत के कई क्षेत्रों जैसे- मिट्टी के बर्तन, घुड़सवार सेना, साहित्य, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, धर्म और राजनीति में पड़ा।

मगध साम्राज्य राजधानी पाटलिपुत्र(पटना)

मगध का साम्राज्य

मगध साम्राज्य ने भारत में 684 BC – 320 BC तक शासन किया | मगध साम्राज्य का दो महान काव्य रामायण और महाभारत में उल्लेख किया गया है | मगध साम्राज्य पर 544 BC  से 322 BC तक शासन करने वाले  तीन राजवंश थे |  पहला था हर्यंका राजवंश (544 BC से 412 BC ), दूसरा था शिशुनाग राजवंश (412 BC से 344 BC ) और तीसरा था नन्दा राजवंश (344 BC से 322 BC )|

हर्यंका  राजवंश:

हर्यंका राजवंश में तीन महत्वपूर्ण राजा थे बिंबिसार, अजातशत्रु और उदयीन

बिंबिसार  (546-494 BC )

बिंबिसार ने 52 साल तक 544 BC से 492 BC तक शासन किया | इसको इसी के ही पुत्र अजातशत्रु (492-460 BC ) ने बंदी बना लिया और हत्या कर दी | बिंबिसार मगध का शासक था | वह हर्यंका राजवंश से था |

वैवाहिक गठबंधन के माध्यम से इसने अपनी स्थिति और समृद्धि को मजबूत किया | इसका पहला विवाह कोशल  देवी नामक महिला से कोशल  परिवार में हुआ | बिंबिसार को दहेज में काशी प्रांत दिया गया |

बिंबिसार ने वैशाली के लिच्छवि परिवार की चेल्लाना नामक राजकुमारी से विवाह किया |अब इस वैवाहिक गठबंधन ने इसे उत्तरी सीमा में सुरक्षित कर दिया | बिंबिसार ने दुबारा एक और विवाह मध्य पंजाब के मद्रा के शाही परिवार की खेमा से किया |इसने अंग के ब्रहमदत्ता को पराजित कर उसके साम्राज्य पर कब्जा कर लिया | बिंबिसार के अवन्ती  राज्य के साथ अच्छे तालुक थे |

अजातशत्रु (494 -462 BC )

अजात शत्रु ने अपने पिता की हत्या कर राज्य को  छीन लिया |  अजात शत्रु अपने पूरे शासन काल के दौरान तेज़ विस्तार के लिए आक्रामक नीति का पालन करता रहा | इस नीति ने उसे काशी और कौशल की तरफ धकेल दिया | मगध और कौशल के बीच लंबी अशांति शुरू हो गई |कौशल के राजा को मजबूरन शांति के लिए अपनी बेटी का विवाह अजातशत्रु से करना पड़ा और उसे काशी भी दे दिया |अजातशत्रु ने वैशाली के लिच्छवियों के खिलाफ भी युद्ध की घोषणा कर दी और वैशाली गणराज्य को जीत लिया | यह युद्ध 16 साल तक चला |

शुरुआत में वह जैन धर्म का अनुयायी था पर बाद में उसने बौद्ध धर्म को अपनाना शुरू कर दिया |अजातशत्रु ने कहा कि वह गौतम बुद्ध से मिला था | यह दृश्य बरहुत की मूर्तियों में दिखाया गया है | इसने कई  चैत्यों  और विहारों  का निर्माण करवाया | वह बौद्ध की मृत्यु के बाद राजगृह में प्रथम बौद्ध परिषद में भी था |

उदयीन

उदयीन, अजातशत्रु का उत्तराधिकारी बना | इसने पाटलीपुत्र की नींव राखी  और राजधानी को राजगृह से पाटलीपुत्र स्थानत्रित किया |

नाग –दसक हर्यंका राजवंश का अंतिम शासक था | इसे लोगों द्वारा शासन करने के लिए अयोग्य पाया गया और

उसे अपने मंत्री शिशुनाग के लिए राजगद्दी से हाथ पीछे खींचना पड़ा |

शिशुनाग राजवंश

शिशुनाग के शासन के दौरान अवन्ती  राज्य को जीत लिया गया और मगध साम्राज्य के कब्जे में लिया गया | शिशुनाग का उत्तराधिकारी कालाशोक बना | उसने 383 BC में वैशाली में दूसरी बौद्ध परिषद बुलाई |

नन्दा राजवंश

नन्दा राजवंश के संस्थापक महापद्म के द्वारा शिशुनाग राजवंश के अंतिम राजा का तख़्ता पलट कर दिया गया  था |

इसे सर्वक्षत्रांतक (पुराण ) और उग्रसेना (एक बड़ी सेना का स्वामी ) के नाम से भी जाना गया |  महापद्म को पुराण में  एक्राट (एकमात्र सम्राट) के नाम से भी जाना गया | यहाँ तक कि इसे भारतीय इतिहास में पहला साम्राज्य निर्माता के तौर पर जाना गया है | धन नन्द, नन्दा राजवंश का अंतिम शासक था | इसे यूनानी पुस्तकों में अग्राम्मेस या क्षाण्ड्रेमेस भी कहा गया | इसके शासन काल के दौरान अलेक्जेंडर ने भारत पर आक्रमण किया था |

निष्कर्ष

धन नन्दा का तख़्ता पलट चन्द्र गुप्त मौर्य द्वारा 322 BC में किया गया जिसने मगध के नए शासन की स्थापना की जिसे मौर्य राजवंश के नाम से जाना गया |

5 वी शताब्दी का भारत

भारतीय प्रायद्वीप में गुप्त के बाद के राजवंश

गुप्त काल के बाद (750 ई. पू. तक)

5वीं शताब्दी के अंत के दौरान गुप्त साम्राज्य का बिखराव शुरू हो गया था। शाही गुप्तों के समाप्त होने के साथ साथ मगध और इसकी राजधानी पाटलिपुत्र ने भी अपना महत्व खो दिया था। इसलिए, गुप्त काल के बाद की अवधि प्राकृतिक लिहाज से बहुत अशांत थी। गुप्तों के पतन के बाद उत्तर भारत में पांच प्रमुख शक्तियां फैल गयी थी। ये शक्तियां निम्नवत् थी:

हूण: हूण मध्य एशिया की वह दुर्लभ प्रजाति थी जिसका आगमन भारत में हुआ था। कुमारगुप्त के शासनकाल के दौरान, हूणों ने पहली बार भारत पर आक्रमण किया था। हालांकि, कुमारगुप्त और स्कन्दगुप्त राजवंश के दौरान वे भारत में प्रवेश करने में सफल नहीं हो सके थे। हूणों ने तीस साल की एक बेहद ही कम अवधि के लिए भारत पर राज किया था। हूणों का वर्चस्व उत्तर भारत में स्थापित हुआ था। तोरामन उनका एक सर्वश्रेष्ठ शासक था जबकि मिहिरकुल सबसे शक्तिशाली और सुसंस्कृत शासक था।

मौखरि: पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कन्नौज के आसपास के क्षेत्र पर मौखरियों का कब्जा था। उन्होंने मगध के कुछ हिस्से पर भी विजय प्राप्त की थी। धीरे-धीरे उन्होंने बाद में गुप्तों को सत्ताविहीन कर दिया और उन्हें मालवा जाने के लिए मजबूर कर दिया।

मैत्रक: शायद अधिकांश मैत्रक ईरानी मूल के थे और वल्लभी के रूप में राजधानी के साथ गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में शासन किया। भटरक के मार्गदर्शन में वल्लभी शिक्षा, संस्कृति और व्यापार तथा वाणिज्य का केंद्र बन गयी थी। इसने सबसे लंबे समय तक अरबों से रक्षा की थी।

पुष्यभूति: थानेश्वर (दिल्ली का उत्तरी भाग) पुष्यभूति की राजधानी थी। प्रभाकर वर्धन इस वंश का सबसे विशिष्ट शासक था जिसने परम भट्टारक महाराजाधिराज की पदवी धारण की थी। उसका मौखरियों के साथ एक वैवाहिक गठबंधन था। वैवाहिक गठबंधन ने दोनों साम्राज्यों को मजबूत बनाया था। हर्षवर्धन इसी गोत्र से संबंध रखते थे।

गौड: गौड़ों ने बंगाल के एक क्षेत्र पर शासन किया और बांकि चार साम्राज्य काफी कम प्रसिद्ध थे। शशांक इनका सबसे शक्तिशाली और महत्वाकांक्षी शासक था। उसने मौखरियों पर आक्रमण कर ग्रहवर्मन की हत्या कर दी थी तथा राज्यश्री को हिरासत में ले लिया था।

हर्षवर्धन का राजवंश:

हर्षवर्धन (606-647 ईस्वी): हर्षवर्धन ने लगभग 1400 साल पहले शासन किया था।

कई ऐतिहासिक स्त्रोत जो हर्षवर्धन के शासनकाल का हिस्सा थे: -

ह्वेनसांग: 'सी-यू-की' की रचना की।

बाण भट्ट: हर्षचरित, कादम्बरी और पार्वतिपरिणय (संस्कृत में हर्षवर्धन की शक्ति/ जीवनी के अभ्युदय का एक विवरण)।

हर्ष के स्वयं के नाटक: राजनीति के विषय में रत्नावली, नागभट्ट और प्रियदर्शिका। हरिदत्त और जयसेन को भी हर्ष का संरक्षण प्राप्त था।

हर्ष की शक्ति में वृद्धि: अपने बड़े भाई राज्यवर्मन की मृत्यु के बाद 606 ईस्वी में हर्ष सिंहासन पर विराजमान हुआ। बंगाल के शासक के खिलाफ अपने भाई की मौत का बदला लेने और अपनी बहन को रिहा करवाने के उसने सेना का नेतृत्व किया। गौड़ों के खिलाफ वह अपने पहले मिशन में असफल रहा था, लेकिन जल्द ही उसने अपने साम्राज्य का विस्तार कर लिया था।

हर्ष को आम तौर पर भारत के अंतिम महान हिन्दू सम्राट के रूप में जाना जाता था। लेकिन वह कट्टर हिंदू शासक नहीं था। उसने कश्मीर, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और उड़ीसा को छोड़ उत्तर भारत में ही अपनी शक्ति को सीमित कर दिया था जहां उसका सीधा नियंत्रण था।

हर्षवर्धन का प्रशासन:-

अधिकारी                    प्रशासनिक क्षेत्र
महासंधि ब्रिग्राहक           शांति और युद्ध के बारे में फैसला करने वाला अधिकारी
महाबलाधि कृत             थल सेना का प्रमुख अधिकारी
बलाधिकृत                  कमान्डर
आयुक्तक                   सामान्य अधिकारी
वृहदेश्वर                     अश्व सेना का प्रमुख
दूत राजस्थारुया              विदेश मंत्री
कौतुक                       हस्ती सेना का प्रमुख
उपरिक महाराज              राज्य प्रमुख

वाकटक साम्राज्य

वाकटक साम्राज्य मध्य तीसरी शताब्दी ईस्वी के दौरान डेक्कन में स्थित था। राज्य, पश्चिम में अरब सागर से पूर्वी छत्तीसगढ़ के कुछ भागों के साथ-साथ उत्तर में मालवा और गुजरात के दक्षिणी किनारों से दक्षिण में तुंगभद्रा नदी तक विस्तारित हो गया था। वाकटक डेक्कन में सातवाहन के उत्तराधिकारी थे और उत्तरी भारत में गुप्तों के समकालीन भी थे।

राजवंश का संस्थापक विध्याक्ति (250 ई.पूं -270 ई.पू.) था जिसका नाम विंध्य देवी से लिया गया था जिसके नाम पर बाद में पहाड़ नामित हुआ था।

चालुक्य

चालुक्यों ने रायचूर दोआब पर शासन किया था जो कृष्णा और तुंगभद्रा की नदियों के बीच स्थित था। ऐहोल (मंदिरों का शहर) चालुक्यों की पहली राजधानी होने के साथ-साथ व्यापर का केंद्र थी जिसे बाद में इसके चारों ओर मंदिरों की संख्या ज्यादा होने से धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। पुलकेसिन प्रथम के दौरान चालुक्यों की राजधानी बादामी स्थांतरित की गयी थी। बादामी को वातापी के रूप में भी जाना जाता था।

पल्लव

इस राज्य की राजधानी कांचीपुरम थी जो कावेरी डेल्टा चारों ओर फैली हुयी थी। पल्लवों ने सातवाहनों के पतन के बाद दक्षिण भारत में एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की और छठीं शताब्दी से आठवीं शताब्दी के अंत तक शासन किया था। तत्पश्चात् वे आंध्र और फिर वहां से कांची चले गये जहां उन्होंने शक्तिशाली पल्लव साम्राज्य की स्थापना की।

पल्लव की उत्पत्ति

पल्लवों की उत्पत्ति के संबंध में कई विवाद रहे हैं। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण निम्न प्रकार हैं-

• संभवतः वे यूनानी पारथीयों के वंशज थे जो सिकंदर के आक्रमण के बाद भारत आये थे।
• संभवत: वे एक स्थानीय आदिवासी कबीले के थे जिन्होंने तोंडैन्नाडु या लता भूमि पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था।
• वे चोल -नागों के विवाह से उत्पन्नित थे
• वे उत्तर के रूढ़िवादी ब्राह्मण थे और उनकी राजधानी कांची थी।

पल्लव राजवंश के महत्वपूर्ण शासक

सिंहविष्णु: इस वंश का प्रथम महत्वपूर्ण शासक था। सिंहविष्णु ने चोलों के क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित कर लिया था और बाद में सीलोन सहित अन्य दक्षिणी क्षेत्रों पर राज किया।

महेन्द्रवर्मन प्रथम: पुलकेशिन द्वितीय ने उसे पराजित कर दिया था। सेंट अप्पर और विद्वान भारवि द्वारा उसका संरक्षण किया गया था। महेन्द्रवर्मन प्रथम ने एक व्यंग्य नाटक 'मत्तविलास प्रहसन' की रचना की थी।

नरसिंहवर्मन प्रथम: वह पुलकेशिन द्वितीय पर अपनी जीत के लिए प्रसिद्ध था जिसने पुलकेशिन द्वितीय के साम्राज्य पर आधिपत्य स्थापित कर लिया था। उसने वातापिकोंड (वातापी को पराजित करने वाला) की उपाधि धारण की थी। बाद में नरसिंहवर्मन प्रथम ने चोल, चेर, और पांडंयों को भी पराजित किया। ह्वेनसांग ने उसके शासन काल के दौरान ही कांचीपुरम का दौरा किया था। नरसिंहवर्मन प्रथम ने महाबलीपुरम शहर (ममाल्लापुरम) और प्रसिद्ध शैलकृत विशालकाय (एकल पत्थर से बने मकबरा) मंदिरों की स्थापना की थी। दो अभियानों के लिए उसने नौसेना को सीलोन भेजा था।

महेन्द्रवर्मन द्वितीय: विक्रमादित्य प्रथम ने उसकी हत्या कर दी थी।

अन्य पल्लव राजाओं में परमेश्वरवर्मन प्रथम, नरसिंहवर्मन द्वितीय, परमेश्वरवर्मन द्वितीय और नंदीवर्मन द्वितीय शामिल थे।

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...