भारत में आर्यो का सामाजिक जीवन

भारत में आर्यों का भौतिक और सामाजिक जीवन

यह माना गया है कि आर्य भारत के मूल निवासी नहीं थे | कुछ इतिहासविद कहते हैं कि आर्यन का वास्तविक घर मध्य  एशिया में था | दूसरे इतिहासविदों का मत था कि इनका वास्तविक घर दक्षिणी रूस ( कैस्पियन समुद्र के पास ) या दक्षिण-पूर्व यूरोप (ऑस्ट्रिया और हंगरी) में  था | वे आर्य जो  भारत में बस गए थे, इंडो-आर्यन कहलाए | बाल गंगाधर तिलक कहते थे कि आर्यन साइबेरिया में बसे थे परंतु गिरते तापमान की वजह से उन्होने हरियाली के लिए साइबेरिया छोड़ दिया था |

भौतिक जीवन

• ऋग वैदिक आर्यन अपनी सफलता का श्रेय उनके घोड़ो, रथों और पीतल के हथियारों के प्रति समझ को देते थे  |
• वे राजस्थान के खेत्री प्रांत से तांबे का कारोबार करते थे |
• बुवाई, कटाई और खलिहान के लिए आर्यन लकड़ी के हलों का हिस्सेदारी में प्रयोग करते थे |
• आर्यन की सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति गाय थी |
• आर्य जोकि देहाती थे, इनकी ज़्यादातर लड़ाइयाँ गाय के तबेलों पर नियंत्रण के लिए होती थीं | इन लड़ाइयों को ऋग्वेद में गवीस्थि या गायों की खोज कहा जाता था |
• जमीन को निजी संपत्ति के रूप में नहीं देखा जाता था |
• तांबा, लोहा और पीतल जैसे धातुओं का प्रयोग होता था |
• कुछ लोग सुनार, कुम्हार, सूत कातने वाले और बढ़ई का काम करते थे |

आदिवासी राजनीति

• आदिवासी मुखिया को राजन कहा जाता था और उसका स्थान वंशानुगत होता था |
• राजा के साथ आदिवासी सभाएं  जैसे सभा, समिति, गण और विधाता भी निर्णय लेनी की ताकत रखते थे |
• पूर्व वैदिक काल में महिलाएं भी सभा और विधाता में भाग ले सकती थीं |
• दो मुख्य पदाधिकारी जो राजा की मदद कर सकते थे :

I. पुरोहित या मुख्य पंडित
II. सेनान्त या सेना प्रमुख

• वैदिक युग में लगाए गए कर बाली व भाग थे |
• गलत काम करने वालों पर नज़र रखने के लिए जासूस नियुक्त किए गए थे |
• वे अधिकारी जो गाँव में बस गए थे और ज़मीन पर कब्जा कर लिया था उन्हे व्रजपति कहते थे |
• व्रजपति क्षेत्र सेना की नियंत्रण में थे और परिवारों (कुलपा )के मुखिया  और युद्ध के लिए सेना बटालियनों (ग्रामणि कहते थे) का नेतृत्व करते थे |
• आर्यन के पास स्थायी सेना नहीं थी पर वे कुशल सेनानी थे |
• वे प्रकृति से आदिवासी थे और इसलिए इनकी निश्चित प्रशासनिक व्यवस्था नहीं थी क्यूंकि वे लगातार घूमते रहते थे |

आदिवासी और परिवार

• लोगों को उनकी जाति से पहचाना जाता था|
• आर्यन के जीवन में आदिवासी (जन या विस ) एक महत्वपूर्ण किरदार अदा करते थे |
• विस आगे ग्राम या योद्धाओं से बनी हुई छोटी आदिवासी इकाइयों में विभाजित था |
• जब दो ग्राम आपस में एक दूसरे से लड़ते थे, उससे संग्राम या युद्ध कहा जाता था |
• ऋग्वेद में परिवार के लिए कुल या गृह शब्द प्रयोग किया गया है |
• आर्य सयुंक्त परिवार में रहते थे |
• रोमन की तरह वे पितृसत्ता को मानते थे जैसे परिवार का मुखिया पिता होता था |
• लोग बेटों को बेटियों से ज्यादा पसंद करते थे और बलिदान के समय इसके लिए प्रार्थना भी करते थे |
• महिलाएं राजनीतिक सभाओं में भाग ले सकती थीं और अपने पतियों के साथ बलिदान भी कर सकती थीं |
• ऋग्वेद में एक से अधिक पति रखने का भी वैवाहिक नियम था और ऐसे कई घटनाएँ हैं जिसमे मृत भाई की पत्नी से विवाह किया गया हो और विधवा का दोबारा विवाह किया गया हो |
• बाल विवाह के कोई भी साक्ष्य मौजूद नहीं हैं और विवाह के लिए 16 या 17 वर्ष उपयुक्त मानी गई है |

सामाजिक विभाजन

• आर्य वर्ण के प्रति सचेत थे और उन्होने वर्ण के आधार पर जातिय भेदभाव शुरू कर दिया |(शाब्दिक अर्थ रंग )
• आर्य मूल निवासियों से रंगरूप में गोरे थे जिसने सामाजिक प्रणाली को जन्म दिया |
• दास और दस्यु से गुलामों की तरह व्यवहार किया जाता था और शूद्र को जाति प्रणाली में सबसे निम्न दर्जा दिया गया था |
• आदिवासी मुखिया युद्ध में लूटे गए माल में सबसे ज्यादा हिस्सा प्राप्त करता था और ताकतवर हो जाता था |
• ईरान की तरह आदिवासी समाज तीन दलों में विभाजित हो गया :

I. योद्धा   
II. पुरोहित
III. आम लोग

गंगा के मैदानी क्षेत्रों में हूणों का आगमन, भारत के पठारी भागो से

भारत पर हूणों का आक्रमण और उसका प्रभाव- Huna Invasions Explained

हूण कौन थे?

हूण मूलतः मध्य एशिया की एक जंगली और बर्बर जाति थे. जनसंख्या बढ़ जाने के कारण और कुछ अन्य कारणों से उनको मध्य एशिया छोड़कर भागना पड़ा. ये लोग दो  भागों में बंट गए. इनका एक दल वोल्गा नदी की ओर गया और दूसरा वक्षनद (आक्सस) की घाटी की ओर बढ़ा. जो दल वक्षनद की घाटी की ओर आया था, वह धीरे धीरे फारस में घुस गया. वहां से वे लोग अफगानिस्तान में आये और उन्होंने गांधार पर कब्ज़ा कर लिया. इसके बाद उन्होंने भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित शक और कुषाण राज्यों को नष्ट कर दिया. तत्पश्चात् इन लोगों ने भारत में प्रवेश किया. थोड़े ही समय में इन लोगों ने भारत के उत्तर-पश्चिम में अपना अधिकार कर लिया.

भारत पर आक्रमण

भारत पर हूणों का पहला आक्रमण 458 ई. में हुआ. उस समय गुप्त सम्राट कुमार गुप्त गद्दी पर था. उसने युवराज स्कन्दगुप्त को हूणों का सामना करने का उत्तरदायित्व सौंपा. स्कन्दगुप्त ने हूणों को बुरी तरह पराजित कर दिया. इसी विजय की याद में उसने विष्णु स्तम्भ बनवाया. भारत से हारकर हूण बहुत निराश हुए. जब तक स्कन्दगुप्त जीवित रहा, हूण भारत में अपने पैर नहीं जमा सके. उन्होंने फिर ईरान की ओर ध्यान दिया. सारे ईरान को नष्ट करके उन्होंने अपनी शक्ति और भी मजबूत कर ली. इस प्रकार शक्ति एकत्रित करके हूणों ने 30 वर्ष बाद भारत पर फिर आक्रमण किया. हूणों के प्रमुख सरदार तोरमाण और उसका पुत्र मिहिरकुल थे. लेकिन स्कन्दगुप्त के बाद कोई शक्तिशाली शासक नहीं हुआ, जो हूणों का सामना कर सकता. अतः छठी शताब्दी के आरम्भ तक हूणों ने भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में एक बहुत बड़े भाग पर अधिकार कर लिया. धीरे-धीरे हूणों ने गुप्त साम्राज्य को लूटकर उसे छिन्न-भिन्न कर दिया.

हूणों के आक्रमणों का प्रभाव

यद्यपि हूणों का अधिकार भारत में एक छोटे से भाग पर तथा थोड़े समय तक ही रहा, पर उसका प्रभाव भारत के राजनैतिक और सामजिक क्षेत्र में पड़े बिना नहीं रह सका. भारत पर हूणों का जो प्रभाव पड़ा, उसका वर्णन नीचे दिया गया है.

ऐतिहासिक प्रकरणों का विनाश

हूण असभ्य और बर्बर थे. उन्होंने अपने आक्रमण और शासन की अवधि में अनेक मठ, मंदिर और ईमारतें नष्ट कर दीन और अनेक ऐतिहासिक ग्रन्थों का विनाश कर दिया. इस प्रकार ऐसी बहुत-सी सामग्री समाप्त हो गई, जिससे उस समय के इतिहास के बारे में बहुत मूल्यवान जानकारी प्राप्त की जा सकती थी.

राजनीतिक प्रभाव

हूणों के आक्रमण का सबसे बुरा प्रभाव गुप्त साम्राज्य पर पड़ा. अनेक आक्रमणों ने उसे नष्ट कर दिया. स्कंदगुप्त के समय में हूणों को पहली बार करारी हार खानी पड़ी. जब तक स्कन्दगुप्त जीवित रहा, हूणों की दाल नहीं गल पाई. पर उसकी मृत्यु के बाद कोई भी ऐसी शक्तिशाली गुप्त शासक नहीं हुआ जो उनका सामना कर सकता था. हूणों ने स्थिति का लाभ उठाया और विशाल गुप्त सम्राट नष्ट हो गया. इतना ही नहीं, गुप्त साम्राज्य के नष्ट होने से भारत की राजनैतिक एकता भी नष्ट हो गई और सारा साम्राज्य छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो गया.

सांस्कृतिक प्रभाव

हूणों की बर्बरता ने भारत के सांस्कृतिक जीवन को काफी ठेस पहुँचाई. विद्वानों और कलाकारों का वध करके, साहित्यिक, सांस्कृतिक पुस्तकें जलाकर मठों, विहारों और इमारतों को नष्ट करके उन्होंने भारत की संस्कृति को बहुत क्षति पहुँचाई.

मोहनजोदड़ो भारत की प्राचीन सभ्यता

भारत के ऐतिहासिक स्थल - Historical Places of India in Hindi

1. मोहनजोदड़ो (Mohenjo-daro)

मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ है मृतकों का टीला. इसे सिंध का नखलिस्तान  या सिंध का बाग़  भी कहते हैं. मोहनजोदड़ो सिंध प्रांत के लरकाना जिले (पाकिस्तान) में सिन्धु नदी के तट पर स्थित है. इसकी सर्वप्रथम खोज राखालदास बनर्जी (Rakhaldas Banerjee) ने 1922 ई. में की थी. मोहनजोदड़ो का सबसे महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल है विशाल स्नानागार, जिसका जलाशय दुर्ग के टीले में है, जबकि मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत विशाल अन्नागार है, जो 45.71 मित्र लम्बा और 15.23 मीटर चौड़ा है. यहाँ अनेक अन्य सार्वजनिक भवन स्थित थे जिसमें महाविद्यालय भवन, सभा भवन प्रमुख हैं. मोहनजोदड़ो से प्राप्त अन्य पुरातात्त्विक साक्ष्यों में नृत्यरत नारी की कांस्य मूर्ति, मुद्रा पर अंकित पशुपति नाथ शिव, गीली मिट्टी पर कपड़े का साक्ष्य मिला है.

२. अहमदनगर (Ahmednagar)

अहमदनगर की स्थापना 1490 ई. में मलिक अहमद निजामशाही ने की थी. यह महाराष्ट्र में है. यह निजामशाही सुल्तानों की राजधानी रहा. यह 13वीं शताब्दी में बहमनी साम्राज्य के अंतर्गत था. अहमदनगर यादवों से लेकर मराठों तक की गतिविधि का प्रमुख केंद्र रहा है. अकबर ने जब इस पर आक्रमण किया तो चाँदबीबी ने उसकी सेनाओं का डटकर मुकाबला किया, पर अंत में अकबर ही जीता. मुगलों को अहमदनगर की स्वतंत्र सत्ता का बराबर प्रतिरोध झेलना पड़ा. अंततः 1637 ई. में शाहजहाँ ने अहमदनगर को मुग़ल सत्ता में मिला लिया. औरंगजेब के बाद यह मराठों के अधीन आ गया.

३. नचना (Nachna)

नचना नामक स्थल मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में स्थित है. इसे नचना-कुठार के नाम से भी जाना जाता है. यहाँ गुप्तकालीन पार्वती मंदिर अपनी नागर शैली के लिए प्रसिद्ध है. यहाँ एक अन्य चतुर्मुखी महादेव मंदिर भी प्रसिद्ध है.

४. थानेश्वर (Thaneshwar)

थानेश्वर वर्तमान में अम्बाला एवं करनाल के मध्य में स्थित है. संस्कृत साहित्य विशेषकर हर्षचरित में थानेश्वर का बृहद उल्लेख मिलता है. यह नगर सरस्वती तथा दृषद्वती नदी के मध्य बसा हुआ था. इसे ब्रह्मावर्त क्षेत्र का केंद्र-बिंदु माना जाता था. आर्यों ने सबसे पहले यहीं निवास किया था. छठी शताब्दी के उत्तरार्ध में थानेश्वर पुष्यभूति वंश के शासकों की राजधानी बना था. पुष्यभूति शासक प्रभाकरवर्धन ने थानेश्वर को मालवा, उत्तर-पश्चिमी पंजाब एवं राजपूताना का केन्द्रीय नगर बनाया. 1014 ई. में थानेश्वर पर महमूद गजनवी ने आक्रमण कर यहाँ स्थित पवित्र चक्रस्वामी मंदिर को नष्ट कर दिया. तृतीय मराठा युद्ध के पश्चात् यह ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत आ गया.

५. बनवाली (Banawali)

बनवाली हरियाणा के हिसार जिले में स्थित है. इस स्थल का उत्खनन 1973 ई. में आर.एस.विष्ट ने करवाया था. यहाँ से प्राक्-हड़प्पा एवं हड़प्पा दोनों संस्कृतियों  के साक्ष्य मिले हैं. उत्खनन के दौरान यहाँ से हल की आकृति का खिलौना, तिल, सरसों एवं जौ के ढेर तथा मनके, मातृदेवी की मूर्तियाँ, ताँबे के बाणाग्र आदि भी प्राप्त हुए हैं.

६. चेदि (Chedi)

प्राचीनकाल में चेदि महाजनपद यमुना नदी के किनारे स्थित था (बुंदेलखंड, मध्य प्रदेश). इसकी सीमा कुरु महाजनपद के साथ जुड़ी हुई थी. इसकी राजधानी सोत्थिवती या शक्तिमती या सुक्तिमती थी. जातक कथाओं एवं महाभारत में इस राज्य का उल्लेख किया गया है. यहाँ का सबसे प्रसिद्ध राज शिशुपाल था, जिसकी चर्चा महाभारत में भी मिलती है.

7. चंपानेर (Champaner)

यह गुजरात राज्य में बड़ौदा के निकट स्थित है. गुजरात के शासक महमूद बेगड़ा ने 1484 ई. में चंपानेर पर अधिकार कर उसे मुहम्मदाबाद नाम दिया था. 1535 ई. में हुमायूँ ने गुजरात के शासक बहादुरशाह को पराजित कर चंपानेर दुर्ग पर अधिकार प्राप्त कर लिया था. चंपानेर गुजरात में खम्भात की खाड़ी में पहुँचने वाले मार्ग पर स्थित था. यहाँ स्थित पावागढ़ पुरातत्व पार्क के स्मारकों को वर्ष 2004 ई में UNESCO द्वारा विश्व विरासत स्थलों की सूची में सम्मिलित किया गया है.

8. गजनी (Ghazni)

गजनी अफगानिस्तान में स्थित एक पहाड़ी नगर है जो याकूब इब्न लेस नामक एक अरबी व्यक्ति द्वारा स्थापित किया गया था. 962 ई. में अलप्तगीन नामक तुर्क ने यहाँ एक छोटे से राज्य की स्थापना कर गजनी को राजधानी बनाया.  उसका पौत्र सुल्तान महमूद था जो महमूद गजनवी के नाम से प्रसिद्ध हुआ. इसी महमूद गजनवी ने 1000 ई. से 1027 ई. तक भारत पर 17 बार आक्रमण किया. गजनी व्यापारिक केंद्र तथा बड़े-बड़े भवनों, चौड़ी सड़कों और संग्रहालयों से परिपूर्ण था. लेकिन 1151 ई. में गोर वंश के अलाउद्दीन हुसैन ने इस नगर पर आक्रमण कर उसे जलाकर ख़ाक कर दिया. इसके लिए उसे जहांसोज की उपाधि दी गई. बाद में मो.गौरी ने इसे फिर से बनाया. 1739 ई. में नादिरशाह ने गजनी  पर अधिकार कर लिया था.

9. देवगिरि (Devagiri)

देवगिरि की स्थापना दक्षिण भारत के यादव वंशीय शासक भिल्लम चतुर्थ (Bhillama IV) ने महाराष्ट्र में की थी. सल्तनतकाल में अलाउद्दीन खिलजी ने यहाँ के शासक रामचंद्र देव को हराकर इस नगर को खूब लूटा. सुलतान मुहम्मद तुगलक जब दिल्ली की गद्दी पर बैठा तो उसे दक्षिण भारत में देवगिरि की केन्द्रीय स्थिति पसंद आई. सुलतान ने देवगिरि का नाम दौलताबाद रखा तथा 1327 ई.  में अपनी राजधानी दिल्ली से स्थानांतरित कर के दौलताबाद ले गया. बाद में राजधानी पुनः दिल्ली ले आई गई. तुगलक को जिन कारणों से पागल कहा जाता है उन कारणों में देवगिरि को राजधानी बनाना भी एक कारण माना जाता है. 3 मार्च, 1707 ई. में अहमदनगर में औरंगजेब की मृत्यु होने पर उसके शव को दौलताबाद में ही दफनाया गया.

10. रामेश्वरम् (Rameshwaram)

रामेश्वरम् हिन्दुओं का एक पवित्र तीर्थ स्थल है. यह तमिलनाडु के रामनाथपुरम् जिले में स्थित है. यह तीर्थ हिंदुओं के चार धामों में से एक है. (आशा है कि आप चारों धाम के नाम जानते होंगे, नहीं जानते तो गूगल में सर्च करें). इसके अलावा यहाँ स्थापित शिवलिंग बारह (द्वादश) ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है. रामेश्वरम् चेन्नई से लगभग सवा चार सौ मील दक्षिण-पूर्व में है. यह हिन्द महासागर और बंगाल की खाड़ी के चारों ओर से घिरा हुआ सुन्दर शंख आकार का एक द्वीप है. यहाँ भगवान् राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व पत्थरों के एक सेतु का निर्माण करवाया था जिस पर चलकर  वानर सेना लंका पहुंची थी. यहाँ के मंदिर का गलियारा विश्व के मंदिरों का सबसे लम्बा गलियारा है (longest corridor among all temples in world). 

प्राचीन भारत का प्राचीन ज्ञान

भारत का प्राचीन दर्शन-शास्त्र

भारत में दर्शन- शास्त्र के छः विद्यालयों का विकास ईस्वी युग के शुरुआत के साथ ही हो गया था | ये निम्न के  प्रकार थे: 1) योग, 2) न्याय, 3) मीमांसा, 4) वेदांता, 5) वैशेशिखा, 6) संख्या

संख्या

संख्या का वास्तविक मतलब गिनना है | संख्या का दर्शन शास्त्र बताता है:-

  • विश्व को प्रकृति द्वारा बनाया गया |
  • चौथी सदी A D के दौरान पुरुष को जोड़ा गया और विश्व के सृजन में प्रकृति तथा पुरुष का योगदान था |
  • संख्या विद्यालय के दर्शन शस्त्र के अनुसार, मनुष्य द्वारा वास्तविक  विद्या प्राप्त करके ही  मोक्ष  की प्राप्ति हो सकती है और उसके कष्ट समाप्त हो सकते हैं | वास्तविक विद्या अनुमान, शब्द और प्रत्यक्ष के द्वारा ही हो सकती है |

योग

योग विद्यालय के अनुसार, मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति शारीरिक आवेदन व ध्यान से हो सकती है |

  • योग  आनंद के ऊपर नियंत्रण के अभ्यास पर बल देता है | शारीरिक अंग व इंद्रियाँ इस प्रणाली का केंद्र हैं |
  • यह विद्यालय  शारीरिक कसरत के विभिन्न अवस्थाएँ जिसे आसान व श्वसन कसरत जिसे प्राणायाम कहा जाता है पर बल देता है |

न्याय

न्याय विश्लेषण का स्कूल है | यह तर्क की प्रणाली के रूप में विकसित हुआ |

  • यह विद्यालय बताता है कि मोक्ष की प्राप्ति विद्या को पाकर ही की जा सकती है |
  • इस विद्यालय ने तर्क-वितर्क व अनुमान की नींव रखी |

वैशेशिका

  • वैशेशिका विद्यालय ने द्रव्य की चर्चा पर नींव राखी | असल में, इस विद्यालय ने अणु के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया |
  • इस सिद्धान्त के अनुसार, द्रव्य वस्तु अणु से बनीं हैं | यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वैशेशिका ने  भारत में भौतिकी की शुरुआत की |
  • इस विद्यालय ने दोनों मोक्ष व जन्नत में पूर्ण विश्वास डाला क्यूंकि  आध्यात्मिक विश्वास और ईश्वर पर विश्वास दोनों वैज्ञानिक दृष्टिकोण में घुल गया था |

मीमांसा

  • मीमांसा का शाब्दिक अर्थ है व्याख्या व तर्क-वितर्क की कला |
  • मीमांसा के अनुसार वेदों में अनन्त सत्य को शामिल किया गया  | मीमांसा का उद्देश्य मोक्ष तथा स्वर्ग को पाना है |
  • मोक्ष को प्राप्त करने के लिए वैदिक बलिदानो के प्रदर्शन को सुझाया |
  • ब्राह्मणो ने संस्कारों के अधिकारों को बचाने की कोशिश की और मीमांसा के प्रचार के दौरान सामाजिक वर्गीकरण को बनाए रखा |

वेदांता 

वेदांता का शाब्दिक अर्थ वेद का अंत है | इस दर्शन शास्त्र का बुनियादी विषय ब्रहमसूत्र था |

  • वेदांता दर्शन शास्त्र के अनुसार, ब्रह्मा ही वास्तविकता है और बाकी सभी माया है |
  • ब्रह्मा आत्मा के जैसा है |
  • यदि कोई आत्मा के बारे में जानकारी पा ले तो वह ब्रह्मा की जानकारी पा सकता है तथा मोक्ष प्राप्त कर सकता है |
  • कर्म का सिद्धान्त वेदांता दर्शन शास्त्र से जुड़ा हुआ है |
  • वेदांता पुनर्जन्म में भी विश्वास रखता है |
  • यह संकेत करता है कि लोगों उन कर्मों के कारण कष्ट सहते हैं जिनकी उन्हें जानकारी ही नहीं होती और ना ही उन्हें रोक सकते हैं |

बौद्ध धर्म की शिक्षा भाग 1

बौद्ध धर्म के विषय में स्मरणीय तथ्य : Part 1

बौद्ध धर्म के विषय में स्मरणीय तथ्य : Part 1

  1. बुद्ध के जन्म पर कालदेव और कौण्डिन्य ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक चक्रवर्ती सम्राट होगा या फिर महान संन्यासी बनेगा.
  2. कनिष्क महायान सम्प्रदाय का महान संरक्षक था. उसने पेशावर में एक बौद्ध सभा का आयोजन किया था. यहाँ पर उसने बौद्ध शिक्षाओं को ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण करके एक स्तूप के नीचे गाड़ दिया था.
  3. चीन में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का श्रेय कश्यप मातंग (Kasyapa Matanga) नामक एक भिक्षु को दिया जाता है.
  4. अनाथपिंडक और यश नामक श्रेष्ठियों द्वारा बौद्ध धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा प्रकट की गई थी.
  5. आर्यमंजुश्री मूलकल्प (Mañjuśrī-mūla-kalpa) में बौद्ध दृष्टिकोण से गुप्त-सम्राटों का वर्णन मिलता है.
  6. बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय (सुत्त पिटक) में 16 महाजनपदों का विवरण प्राप्त होता है.
  7. बौद्ध ग्रन्थ सुत्तनिपात में गाय को अन्नदा, वन्नदा और सुखदा कहा गया है.
  8. योगाचार सम्प्रदाय का प्राचीनतम ग्रन्थ सूत्रालंकार है.
  9. बौद्ध तर्कशास्त्र का पर्वर्तक दिग्नाग को माना जाता है.
  10. मध्यकालीन न्याय शास्त्र का जनक दिग्नाग था.
  11. Buddhism पर सांख्य दर्शन का प्रभाव दिखाई देता है.
  12. तिब्बत में बौद्ध धर्म को प्रतिष्ठित करने का श्रेय पद्सम्भव को दिया जाता है.
  13. भारत में निर्मित स्तूपों का अवरोही कालक्रम है - साँची, भरहुत, गया, अमरावती, सारनाथ, नालंदा, अजंता, एलोरा और बाघ की गुफाएँ.
  14. बौद्ध शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र नालंदा, विक्रमशील, उदयन्तपूरी/ओदंतपुरी थे.
  15. प्रथम सदी में नालंदा विहार का प्रमुख नागार्जुन था.
  16. ह्वेनसांग के भारत भ्रमण के दौरान नालंदा विहार का प्रमुख शीलभद्र था.
  17. बौद्ध विहार, विक्रमशिला वज्रयान सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र था.
  18. संस्कृत भाषा का प्राचीनतम नाटक सारिपुत्र प्रकरण है.
  19. बौद्ध मत में त्रिशूल निर्वाण का प्रतीक है.
  20. बुद्ध के पंचशील सिद्धांत का वर्णन छान्दोग्य उपनिषद् (Chandogya Upanishad) में मिलता है.
  21. बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का स्रोत ग्रन्थ तैत्तरीय उपनिषद् (Taittiriya Upanishadहै.
  22. सुत्तपिटक को प्रारम्भिक बौद्ध धर्म का encyclopedia कहा जाता है.
  23. बौद्ध ग्रन्थों में संस्कृत का प्रयोग अभिधम्म पिटक से शुरू होता है.
  24. थेरवाद के महत्वपूर्ण पंथ सर्वास्तिवाद की स्थापना राहुल भद्र ने  की थी.
  25. बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार कोसल राज्य (बुद्ध ने यहाँ सर्वाधिक 21 वास किये थे)में  हुआ था.
  26. मैत्रेयनाथ विज्ञानवाद का प्रवर्तक था.
  27. नागार्जुन शून्यवाद का प्रवर्तक था.
  28. पाणिनी द्वारा प्रयुक्त 'भण्ट्रा” शब्द चमड़े की बनी धौंकनी के प्रयोग का प्रमाण मिलता है.
  29. यवन शासक मिनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के मध्य प्रश्नोत्तर मिलिंदपन्हो (Milinda Panha)  में है.
  30. सुत्तविभंग (Suttavibhangaनामक बौद्ध ग्रन्थ में अपराधों की सूची व उनके प्रायश्चित का वर्णन है.
  31. उदान नामक बौद्ध ग्रन्थ में छोटे-छोटे उल्लेख हैं.
  32. दिव्यावदान ग्रन्थ (Divyavadana - Buddhist talesमें पुष्यमित्र शुंग को मौर्य शासक बताया गया है.
  33. धम्मपद को बौद्ध साहित्य को गीता कहा गया है.
  34. ललिताविस्तार (Lalitavistara) में सिद्धार्थ बुद्ध की पत्नी का नाम गोपा बताया गया है.
  35. सुत निकाय में बुद्ध के धर्मोपदेश गद्य रूप में और गेय निकाय में गद्य-पद्य रूप में मिलते हैं. वेदाल्ला में बुद्ध के उपदेश प्रश्नोत्तर रूप में है.
  36. बिन्दुसार के समय तक्षशिला के विद्रोह को दबाने हेतु अशोक को भेजे जाने का उल्लेख अशोकावदान में है.
  37. धार्मिक शिक्षाओं का सबसे पुराना संग्रह सुत्त निपात माना गया है.
  38. अभिधम्मपिटक (abhidhamma pitaka) में मूल ग्रन्थ धम्म संगणि है.
  39. महाजनपदों का उल्लेख सर्वप्रथम 'अंगुत्तर निकाय” में मिलता है.
  40. प्रज्ञा पारमिता नामक महायान सम्प्रदाय की पुष्तक को देवताओं का विभाग भी कहते हैं.
  41. वामस्थापकसिनी (Vamsathapakasini) नामक बौद्ध ग्रन्थ में मौर्यों की उत्पत्ति का वर्णन है.
  42. गणराज्यों का उल्लेख आचरांग सूत्र (acharanga sutra) में मिलता है.
  43. रक्त शुद्धता के लिए क्षत्रियों में विशेष गर्व का वर्णन दीर्घनिकाय के अम्दष्ठसुत्त में मिलत है.
  44. ओबाइय सूत्र (Obaiya Sutra) में अजातशत्रु को महावीर का भक्त बताया गया है.

बौद्ध धर्म की शिक्षा

बौद्ध धर्म के विषय में स्मरणीय तथ्य : Part 1

बौद्ध धर्म के विषय में स्मरणीय तथ्य : Part 1

  1. बुद्ध के जन्म पर कालदेव और कौण्डिन्य ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक चक्रवर्ती सम्राट होगा या फिर महान संन्यासी बनेगा.
  2. कनिष्क महायान सम्प्रदाय का महान संरक्षक था. उसने पेशावर में एक बौद्ध सभा का आयोजन किया था. यहाँ पर उसने बौद्ध शिक्षाओं को ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण करके एक स्तूप के नीचे गाड़ दिया था.
  3. चीन में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का श्रेय कश्यप मातंग (Kasyapa Matanga) नामक एक भिक्षु को दिया जाता है.
  4. अनाथपिंडक और यश नामक श्रेष्ठियों द्वारा बौद्ध धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा प्रकट की गई थी.
  5. आर्यमंजुश्री मूलकल्प (Mañjuśrī-mūla-kalpa) में बौद्ध दृष्टिकोण से गुप्त-सम्राटों का वर्णन मिलता है.
  6. बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय (सुत्त पिटक) में 16 महाजनपदों का विवरण प्राप्त होता है.
  7. बौद्ध ग्रन्थ सुत्तनिपात में गाय को अन्नदा, वन्नदा और सुखदा कहा गया है.
  8. योगाचार सम्प्रदाय का प्राचीनतम ग्रन्थ सूत्रालंकार है.
  9. बौद्ध तर्कशास्त्र का पर्वर्तक दिग्नाग को माना जाता है.
  10. मध्यकालीन न्याय शास्त्र का जनक दिग्नाग था.
  11. Buddhism पर सांख्य दर्शन का प्रभाव दिखाई देता है.
  12. तिब्बत में बौद्ध धर्म को प्रतिष्ठित करने का श्रेय पद्सम्भव को दिया जाता है.
  13. भारत में निर्मित स्तूपों का अवरोही कालक्रम है - साँची, भरहुत, गया, अमरावती, सारनाथ, नालंदा, अजंता, एलोरा और बाघ की गुफाएँ.
  14. बौद्ध शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र नालंदा, विक्रमशील, उदयन्तपूरी/ओदंतपुरी थे.
  15. प्रथम सदी में नालंदा विहार का प्रमुख नागार्जुन था.
  16. ह्वेनसांग के भारत भ्रमण के दौरान नालंदा विहार का प्रमुख शीलभद्र था.
  17. बौद्ध विहार, विक्रमशिला वज्रयान सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र था.
  18. संस्कृत भाषा का प्राचीनतम नाटक सारिपुत्र प्रकरण है.
  19. बौद्ध मत में त्रिशूल निर्वाण का प्रतीक है.
  20. बुद्ध के पंचशील सिद्धांत का वर्णन छान्दोग्य उपनिषद् (Chandogya Upanishad) में मिलता है.
  21. बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का स्रोत ग्रन्थ तैत्तरीय उपनिषद् (Taittiriya Upanishadहै.
  22. सुत्तपिटक को प्रारम्भिक बौद्ध धर्म का encyclopedia कहा जाता है.
  23. बौद्ध ग्रन्थों में संस्कृत का प्रयोग अभिधम्म पिटक से शुरू होता है.
  24. थेरवाद के महत्वपूर्ण पंथ सर्वास्तिवाद की स्थापना राहुल भद्र ने  की थी.
  25. बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार कोसल राज्य (बुद्ध ने यहाँ सर्वाधिक 21 वास किये थे)में  हुआ था.
  26. मैत्रेयनाथ विज्ञानवाद का प्रवर्तक था.
  27. नागार्जुन शून्यवाद का प्रवर्तक था.
  28. पाणिनी द्वारा प्रयुक्त 'भण्ट्रा” शब्द चमड़े की बनी धौंकनी के प्रयोग का प्रमाण मिलता है.
  29. यवन शासक मिनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के मध्य प्रश्नोत्तर मिलिंदपन्हो (Milinda Panha)  में है.
  30. सुत्तविभंग (Suttavibhangaनामक बौद्ध ग्रन्थ में अपराधों की सूची व उनके प्रायश्चित का वर्णन है.
  31. उदान नामक बौद्ध ग्रन्थ में छोटे-छोटे उल्लेख हैं.
  32. दिव्यावदान ग्रन्थ (Divyavadana - Buddhist talesमें पुष्यमित्र शुंग को मौर्य शासक बताया गया है.
  33. धम्मपद को बौद्ध साहित्य को गीता कहा गया है.
  34. ललिताविस्तार (Lalitavistara) में सिद्धार्थ बुद्ध की पत्नी का नाम गोपा बताया गया है.
  35. सुत निकाय में बुद्ध के धर्मोपदेश गद्य रूप में और गेय निकाय में गद्य-पद्य रूप में मिलते हैं. वेदाल्ला में बुद्ध के उपदेश प्रश्नोत्तर रूप में है.
  36. बिन्दुसार के समय तक्षशिला के विद्रोह को दबाने हेतु अशोक को भेजे जाने का उल्लेख अशोकावदान में है.
  37. धार्मिक शिक्षाओं का सबसे पुराना संग्रह सुत्त निपात माना गया है.
  38. अभिधम्मपिटक (abhidhamma pitaka) में मूल ग्रन्थ धम्म संगणि है.
  39. महाजनपदों का उल्लेख सर्वप्रथम 'अंगुत्तर निकाय” में मिलता है.
  40. प्रज्ञा पारमिता नामक महायान सम्प्रदाय की पुष्तक को देवताओं का विभाग भी कहते हैं.
  41. वामस्थापकसिनी (Vamsathapakasini) नामक बौद्ध ग्रन्थ में मौर्यों की उत्पत्ति का वर्णन है.
  42. गणराज्यों का उल्लेख आचरांग सूत्र (acharanga sutra) में मिलता है.
  43. रक्त शुद्धता के लिए क्षत्रियों में विशेष गर्व का वर्णन दीर्घनिकाय के अम्दष्ठसुत्त में मिलत है.
  44. ओबाइय सूत्र (Obaiya Sutra) में अजातशत्रु को महावीर का भक्त बताया गया है.

भगवान बुद्ध जो बिहार में ज्ञान प्राप्त किये और आज 27 बौद्ध देश है, पूरे विश्व के

बुद्ध के उपदेश - Teachings of Buddha in Hindi

बुद्ध ने बहुत ही सरल और उस समय बोली जाने वाली भाषा पाली में अपना उपदेश दिया था. यदि आपको परीक्षा में सवाल आये कि बुद्ध ने उपदेश किस भाषा में दिया था तो उसका उत्तर पाली होगा, नाकि संस्कृत या हिंदी. चूँकि पाली भाषा उस समय की आम भाषा थी तो इसके चलते बुद्ध के उपदेश का प्रसार दूर-दूर तक हुआ. बुद्ध ने कहा कि मनुष्य को सभी प्रकार के दुःखों से दूर रहना चाहिए. उन्होंने जीवन के ऐसे चार सत्यों का वर्णन किया जिन्हें उन्होंने हमेशा याद रखने की सलाह दी. वे चार सत्य हैं -

बुद्ध के उपदेश

  1. जन्म, मृत्यु, रोग, इच्छा आदि सभी दुःख देते हैं.
  2. किसी प्रकार की इच्छा सभी दुःखों का कारण है.
  3. तृष्णाओं पर नियंत्रण करना चाहिए ताकि हम दुःख से बच सकें.
  4. सांसारिक दुःखों को दूर करने के आठ मार्ग हैं. इन्हें आष्टांगिक मार्ग या मध्यम मार्ग कहा गया है. मध्यम मार्ग को अपनाकर मनुष्य निर्वाण प्राप्त करने में सक्षम है.

आष्टांगिक मार्ग

  1. सम्यक् (शुद्ध) दृष्टि -  सत्य, असत्य, पाप-पुण्य आदि के भेड़ों को समझना
  2. सम्यक् संकल्प - इच्छा और हिंसा के विचारों का त्याग करना
  3. सम्यक् वाणी - सत्य और विनम्र वाणी बोलना
  4. सम्यक् कर्म - सदा सही और अच्छे कार्य करना
  5. सम्यक् आजीव - जीविका के उपार्जन हेतु सही तरीके से धन कमाना
  6. सम्यक् व्यायाम - बुरी भावनाओं से दूर रहना
  7. सम्यक् स्मृति - अच्छी बातों तथा अच्छे आचरण का प्रयोग करना
  8. सम्यक् समाधि - किसी विषय पर एकाग्रचित होकर विचार करना

बुद्ध ने अनेक बौद्ध संघ की स्थापना की. इन्हें विहार कहा जाता था. संघ में सभी जाति के लोगों को प्रवेश करने की अनुमति थी. ये अत्यंत सादा जीवन जीते थे. भिक्षा माँगकर अपनी आवश्यकताओं को पूरा करते थे. इसलिए ये भिक्षु या भिक्षुणी कहलाते थे.

सरल और प्रभावी उपदेश के चलते बौद्ध धर्म देश-विदेश में अत्यंत लोकप्रिय हुआ. बौद्ध धर्म का पहला सम्मलेन (संगीति) मगध की राजधानी राजगृह (राजगीर) में हुआ. इसमें त्रिपिटक नामक बौद्धग्रन्थ का संग्रह किया गया. इस धर्म ने महान अशोक को बहुत प्रभावित किया. राजा अशोक ने इसी धर्म के प्रभाव से अपनी साम्राज्यवादी नीति का त्याग कर दिया और अपना शेष जीवन प्रजा की भलाई और बौद्ध धर्म का देश-विदेश में प्रचार-प्रसार में लगाया.

बौद्ध धर्म ने बहुत हद तक ब्राह्मणवाद और प्रचलित धार्मिक कर्मकांड जैसे यज्ञ, बलि आदि की निंदा की. बौद्ध विहारों के चलते नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का विकास हुआ, जहाँ दूर-दूर से देश विदेश से लोग अध्ययन हेतु आते थे.

सम्राट बिंदुसार ईसा मसीह के जन्म से पहले

बिंदुसार (298 ई.पू. - 273 ई.पू.) का जीवन

चन्द्रगुप्त के बाद उसका पुत्र बिंदुसार (Bindusara) सम्राट बना. आर्य मंजुश्री मूलकल्प के अनुसार जिस समय चन्द्रगुप्त ने उसे राज्य दिया उस समय वह अल्प-व्यस्क था. यूनानी लेखकों ने उसे अमित्रोचेडस (Amitrochades) अथवा अमित्राचेटस (Amitrachates) या अलित्रोचेडस (Allitrochades) के नाम से पुकारा है. विद्वानों के अनुसार इन शब्दों का संस्कृत रूप अमित्रघात अथवा अमित्रखाद (शत्रुओं का विनाश करने वाला) है.

इतिहासकारों का मत

तारानाथ ने लिखा है कि बिन्दुसार और चाणक्य ने लगभग 16 नगरों के राजाओं को नष्ट किया और पूर्वी और पश्चिमी समुद्रों के बीच के सारे प्रदेश को अपने आधिपत्य में ले लिया. इससे प्रतीत होता है कि दक्षिण भारत की विजय बिन्दुसार ने की, किन्तु जैन अनुश्रुति के अनुसार यह कार्य चन्द्रगुप्त ने ही कर लिया था. अशोक के अभिलेखों से यह स्पष्ट है कि दक्षिण भारत मौर्य साम्राज्य में सम्मिलित था, अशोक ने केवल कलिंग को जीता. इसलिए दक्षिण भारत की विजय चन्द्रगुप्त या बिंदुसार ने ही की होगी. बिन्दुसार कुछ आनंदप्रिय शासक प्रतीत होता है इसलिए यह अधिक संभव प्रतीत होता है कि यह कार्य चन्द्रगुप्त ने ही किया हो.

बिंदुसार का राज्यकाल

बिंदुसार के राज्यकाल में प्रांतीय अधिकारियों के अत्याचार के कारण तक्षशिला के प्रांत में विद्रोह हुआ. बिंदुसार का बड़ा पुत्र सुषीम उस प्रांत का शासक था. जब वह इस विद्रोह को न दबा सका तो अशोक को इस काम के लिए भेजा गया. उसने पूर्णतया विद्रोह को दबाकर शांति स्थापित की.

विद्रोहों का दमन

दिव्यावदान (बौद्ध कथाओं का ग्रंथ) के अनुसार उत्तरापथ की राजधानी तक्षशिला में दो विद्रोह हुए. प्रथम विद्रोह को शांत करने के लिए बिंदुसार ने अपने पुत्र अशोक को भेजा. जब अशोक तक्षशिला पहुँचा तो वहाँ के लोगों ने आग्रह किया कि ” न तो हम कुमार के विरुद्ध हैं और न ही सम्राट बिंदुसार के. परन्तु दुष्ट अमात्य हमारा अपमान करते हैं.” ऐसा प्रतीत होता है कि सीमान्त प्रदेशों का शासन दमनपूर्ण था और वहाँ के लोग अपने प्रांतीय गवर्नरों से असंतुष्ट थे. इसी प्रांत में दूसरे विद्रोह को दबाने के लिए बिंदुसार ने कुमार सुसीम को भेजा था. एक अन्य विद्रोह का उल्लेख मिलता है जो स्वश (रवस्या) राज्य में हुआ. स्टीन महोदय के अनुसार यह स्वश राज्य कश्मीर के दक्षिण-पश्चिम फैला हुआ था. कुछ भारतीय इतिहासकारों के अनुसार यह नेपाल के नजदीक था.

विदेशी देशों से संबंध

बिंदुसार ने विदेशों से भी शांतिपूर्ण समबन्ध रखे. यूनान के राजा डेइमेकस नामक राजदूत को और मिस्र के राजा ने डायनीसियस (Dionisias) नामक राजदूत को बिंदुसार के दरबार में भेजा. कहा जाता है कि उसने सीरिया के राजा एंटिओकस (Antiochus) को लिखा था कि वह अपने देश से कुछ मधुर मदिरा, सूखे अंजीर और एक दार्शनिक भेज दे. उत्तर में सीरिया के शासक ने लिखा कि पहली दो वस्तुएँ तो वह बड़ी प्रसन्नता से भेज देगा, किन्तु सीरिया के नियमों को ध्यान में रखते हुए दार्शनिक भेजना संभव नहीं है. पत्र-व्यवहार से स्पष्ट है कि बिंदुसार को दर्शन-शास्त्र में रूचि थी और उसके समय में भारत और पश्चिमी देशों में सामाजिक, व्यापारिक और कूटनीतिक सम्बन्ध विद्यमान थे.

मृत्यु

पुराणों के अनुसार बिंदुसार ने 25 वर्ष तक राज्य किया. इस तथ्य के आधार पर कहा जाता है कि उसने 298 ई.पू. से 273 ई.पू. तक राज्य किया. किन्तु महावंश (पाली भाषा में लिखी पद्य रचना) के अनुसार उसने 27 वर्ष तक राज्य किया.

प्राचीन भारतीय ग्रंथ और उनके भारतीय लेखक

प्राचीन भारत के ग्रन्थ और उनके लेखक (Ancient Indian Writers)

List of Important Books and Writers (Ancient India)

  1. अष्टाध्यायी - पाणिनि
  2. रामायण - वाल्मीकि
  3. महाभारत - वेदव्यास
  4. अष्टसाहस्त्रिक सूत्र, प्रज्ञापारमिता सूत्रशास्त्र, माध्यमिका सूत्र - नागार्जुन
  5. बुद्धचरित, सारिपुत्र प्रकरण, सूत्रालंकार वज्रसूचि, सौंदर्यानन्द, श्रद्धोत्पाद - अश्वघोष
  6. मुद्राराक्षस, देवीचन्द्रगुप्त - विशाखदत्त
  7. अर्थशास्त्र - चाणक्य
  8. महाभाष्य - पतंजलि
  9. कुमारसंभवम्, अभिज्ञानशाकुंतलम्, विक्रमोर्वशीयम्, मेघदूतम्, रघुवंशम्, मालविकाग्निमित्रम्, ऋतुसंहारम् - कालिदास
  10. स्वप्नवासवदत्तम्, प्रतिज्ञायौगंधरायण - भास
  11. नागानंद, रत्नावली, प्रियदर्शिका - हर्षवर्धन
  12. हर्षचरित, कादंबरी - बाणभट्ट
  13. विक्रमांक चरित - बिल्हण
  14. पृथ्वीराज रासो - चंदबरदाई 
  15. राजतरंगिणी - कल्हण
  16. चौरपंचाशिका - बिल्हण
  17. रसमाला, कीर्ति कौमुदी - सोमेश्वर
  18. कर्पूरमंजरी - राजशेखर
  19. इंडिका - मैगस्थनीज
  20. चरकसंहिता - चरक
  21. सुश्रुत संहिता - सुश्रुत
  22. मृच्छकटिकम् - शूद्रक
  23. संगीतरत्नाकर - शांर्गदेव
  24. मीताक्षरा - विज्ञानेश्वर
  25. किरातार्जुनीयम् - भारवि
  26. पंचतंत्र - विष्णु शर्मा
  27. न्याय भाष्य, कामसूत्र - वात्स्यायन
  28. काव्यादर्श, दशकुमारचरित - दंडी
  29. वासवदत्ता - सुबंधु
  30. सूर्य सिद्धांत - आर्यभट्ट
  31. बृहत् संहिता, पञ्च सिद्धान्तिका, बृहज्जातिका, लघुजातिका - वाराहमिहिर
  32. गीतगोविन्दम् - जयदेव
  33. अनर्घराघव - मुरारि
  34. आयुर्वेद सर्वस्व, राजमार्तंड, व्यवहार समुच्चय, शब्दानुशासन, युक्तिकल्पतरु, राजमृगिका - राजा भोज
  35. भोजप्रबंध - बल्लाल
  36. शिशुपाल वध - माघ
  37. नैषधीयचरितम् - श्रीहर्ष
  38. मालती माधव, महावीर चरित, उत्तररामचरितं - भवभूति
  39. साहित्यदर्पण:- भामह
  40. ध्वन्यालोक:, प्रमोदचन्द्र - आनंदवर्धन
  41. व्यक्तिविवेक: - महिमभट्ट
  42. काव्यादर्श - मम्मट
  43. वेणिसंहार (Venisamhara) - भट्ट नारायण
  44. प्रमाण मीमांसा - हेमचन्द्र
  45. बृहत्कथामंजरी - क्षेमेन्द्र
  46. कातन्त्र (व्याकरण) - सर्ववर्मन्
  47. अष्टांगसंग्रह, सिद्धांत शिरोमणि, लीलावती (first book of algebra) - भास्कराचार्य
  48. माधव निदान - माधवकर
  49. निघंटु - यास्क
  50. रसरत्नाकर - नागार्जुन
  51. तत्त्व कौमुदी, तत्त्व शारदी, न्यायवर्तिका, न्यायसूत्र धारा, न्यायकणिका, योगसारसंग्रह - वाचस्पति मिश्र
  52. योगवर्तिका, योगसारसमग्र - विज्ञान भिक्षु 
  53. तिलकमंजरी, यशस्तिलक - धनपाल
  54. कुट्टनीमतम् -दामोदरगुप्त
  55. तत्त्वशुद्धि - उदयन
  56. न्यायमंजरी - जयंत
  57. न्यायतत्त्व योगरहस्य - नाथमुनि
  58. गीतसंग्रह, महापुरुष निर्णय, सिद्धत्रय, अगम प्रामाण्य - यामुनाचार्य
  59. धूर्तव्यामा, समरादित्य कथा - हरिभद्र 
  60. कुवलयमाला - उद्द्योतनसूरि
  61. अजित शान्तिस्तव - नंदिसेण
  62. सतसई - हाल
  63. बृहत्कथा - गुणाढ्य
  64. मुनि

प्राचीन भारतीय बंदरगाह,

प्रमुख भारतीय बंदरगाह : Important Ports in Indian History

अति प्राचीन काल में ही मनुष्य ने नाव बनाना सीख लिया था और इसका प्रयोग कर समुद्री यात्रा करना आरम्भ कर दिया था. इसकी यात्राओं का उद्देश्य मुख्यतः व्यापार ही होता था.  ये नावें जिन तटों से निकलती थीं उन तटों की आकृति ऐसी थी कि उन्हें आसानी से स्थिर जल में लगाया जा सके. ऐसे स्थानों को बंदरगाह कहा जाता था. सिन्धु घाटी सभ्यता से ही बंदरगाह बनने लगे थे जिसमें आज भी कुछ देखे जा सकते हैं. यह क्रम प्राचीन इतिहास के प्रत्येक कालखंड में चलता रहा.

List of Ancient Ports in Indian History

बंदरगाहस्थलसमयविशेष
सुतकागेन डोर (Sutkagan Dor)बलूचिस्तानहड़प्पा सभ्यतायह दाश्क नदी के किनारे बंदरगाह नगर व हड़प्पा सभ्यता से परिचित था.
सोख्ता कोह (Sokhta Koh )बलूचिस्तानहड़प्पा सभ्यतायह शादी कोर नदी के मुहाने पर था.
बालाकोट (Balakot)बलूचिस्तानहड़प्पा सभ्यतायह सोनमियानी खाड़ी के पूर्व में विदार नदी के मुहाने पर था.
अल्लादिनोअरब सागरहड़प्पा सभ्यता---
लोथल (Lothal)गुजरातहड़प्पा सभ्यतायह हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख बंदरगाह था जहाँ से फारस की मुद्रा, जहाज आकृति, टैरोकोटा पर व गोदीबाड़ा मिलता है.
कैन्नोर (Kannur)पश्चिमी तटसंगम---
तोंडीपश्चिमी तटसंगमयह आधुनिक पौन्नानी में स्थित था, यहाँ रोम से व्यापार होता था. यह चेरों का था.
मुजिरिस (Muziris Port)पश्चिमी तटसंगमयह अरब सागर और ग्रीस के मध्य व्यापार केंद्र था. यह चेरों का था.
कोट्टायम (kottayam port/नेस्लिडा)पश्चिमी तटसंगम---
कोर्कई (Korkai Port)पूर्वी तटसंगमयह ताम्रणि नदी पर स्थित पांड्यों की राजधानी बंदरगाह था.
पोडुका (अरिकामेडु/ArikameduPort)पांडिचेरी (पूर्वी तट)संगम---
पुहार (Puhar Port)पूर्वी तटसंगमइसे कावेरीपट्टम भी कहते हैं. यह चोलों का था.
शालियूर (Shaliyur Port)पूर्वी तटसंगमयह चोल बंदरगाह था
भृगुकच्छ (bhrigukachchha)भड़ौच (पश्चिमी तट)मौर्य व मौर्योत्तर काल---
ताम्रलिप्ति (Tamralipti port)तामलुक (पूर्वी तट)गुप्तकाल---
बारबेरीकमपश्चिमी तटमौर्योत्तरयह बंदरगाह सिंध के मुहाने पर था.
सोपारा (Sopara Port)पश्चिमी तटमौर्योत्तरPeriplus of the Erythraean Sea में वर्णित बंदरगाह
सेमिल्लापश्चिमी तटमौर्योत्तरPeriplus of the Erythraean Sea में वर्णित बंदरगाह
बाइजेंटियनपश्चिमी तटमौर्योत्तरPeriplus of the Erythraean Sea में वर्णित बंदरगाह
नेलसिंडापश्चिमी तटमौर्योत्तरPeriplus of the Erythraean Sea में वर्णित बंदरगाह
मसालियापश्चिमी तटमौर्योत्तरPeriplus of the Erythraean Sea में वर्णित बंदरगाह
पिटोड्रापूर्वी तटमौर्योत्तर---
देवलपश्चिमी तटगुप्तकाल---
खम्भातपश्चिमी तटगुप्तकाल---

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...