बौद्ध धर्म की शिक्षा भाग 1

बौद्ध धर्म के विषय में स्मरणीय तथ्य : Part 1

बौद्ध धर्म के विषय में स्मरणीय तथ्य : Part 1

  1. बुद्ध के जन्म पर कालदेव और कौण्डिन्य ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक चक्रवर्ती सम्राट होगा या फिर महान संन्यासी बनेगा.
  2. कनिष्क महायान सम्प्रदाय का महान संरक्षक था. उसने पेशावर में एक बौद्ध सभा का आयोजन किया था. यहाँ पर उसने बौद्ध शिक्षाओं को ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण करके एक स्तूप के नीचे गाड़ दिया था.
  3. चीन में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का श्रेय कश्यप मातंग (Kasyapa Matanga) नामक एक भिक्षु को दिया जाता है.
  4. अनाथपिंडक और यश नामक श्रेष्ठियों द्वारा बौद्ध धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा प्रकट की गई थी.
  5. आर्यमंजुश्री मूलकल्प (Mañjuśrī-mūla-kalpa) में बौद्ध दृष्टिकोण से गुप्त-सम्राटों का वर्णन मिलता है.
  6. बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय (सुत्त पिटक) में 16 महाजनपदों का विवरण प्राप्त होता है.
  7. बौद्ध ग्रन्थ सुत्तनिपात में गाय को अन्नदा, वन्नदा और सुखदा कहा गया है.
  8. योगाचार सम्प्रदाय का प्राचीनतम ग्रन्थ सूत्रालंकार है.
  9. बौद्ध तर्कशास्त्र का पर्वर्तक दिग्नाग को माना जाता है.
  10. मध्यकालीन न्याय शास्त्र का जनक दिग्नाग था.
  11. Buddhism पर सांख्य दर्शन का प्रभाव दिखाई देता है.
  12. तिब्बत में बौद्ध धर्म को प्रतिष्ठित करने का श्रेय पद्सम्भव को दिया जाता है.
  13. भारत में निर्मित स्तूपों का अवरोही कालक्रम है - साँची, भरहुत, गया, अमरावती, सारनाथ, नालंदा, अजंता, एलोरा और बाघ की गुफाएँ.
  14. बौद्ध शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र नालंदा, विक्रमशील, उदयन्तपूरी/ओदंतपुरी थे.
  15. प्रथम सदी में नालंदा विहार का प्रमुख नागार्जुन था.
  16. ह्वेनसांग के भारत भ्रमण के दौरान नालंदा विहार का प्रमुख शीलभद्र था.
  17. बौद्ध विहार, विक्रमशिला वज्रयान सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र था.
  18. संस्कृत भाषा का प्राचीनतम नाटक सारिपुत्र प्रकरण है.
  19. बौद्ध मत में त्रिशूल निर्वाण का प्रतीक है.
  20. बुद्ध के पंचशील सिद्धांत का वर्णन छान्दोग्य उपनिषद् (Chandogya Upanishad) में मिलता है.
  21. बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का स्रोत ग्रन्थ तैत्तरीय उपनिषद् (Taittiriya Upanishadहै.
  22. सुत्तपिटक को प्रारम्भिक बौद्ध धर्म का encyclopedia कहा जाता है.
  23. बौद्ध ग्रन्थों में संस्कृत का प्रयोग अभिधम्म पिटक से शुरू होता है.
  24. थेरवाद के महत्वपूर्ण पंथ सर्वास्तिवाद की स्थापना राहुल भद्र ने  की थी.
  25. बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार कोसल राज्य (बुद्ध ने यहाँ सर्वाधिक 21 वास किये थे)में  हुआ था.
  26. मैत्रेयनाथ विज्ञानवाद का प्रवर्तक था.
  27. नागार्जुन शून्यवाद का प्रवर्तक था.
  28. पाणिनी द्वारा प्रयुक्त 'भण्ट्रा” शब्द चमड़े की बनी धौंकनी के प्रयोग का प्रमाण मिलता है.
  29. यवन शासक मिनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के मध्य प्रश्नोत्तर मिलिंदपन्हो (Milinda Panha)  में है.
  30. सुत्तविभंग (Suttavibhangaनामक बौद्ध ग्रन्थ में अपराधों की सूची व उनके प्रायश्चित का वर्णन है.
  31. उदान नामक बौद्ध ग्रन्थ में छोटे-छोटे उल्लेख हैं.
  32. दिव्यावदान ग्रन्थ (Divyavadana - Buddhist talesमें पुष्यमित्र शुंग को मौर्य शासक बताया गया है.
  33. धम्मपद को बौद्ध साहित्य को गीता कहा गया है.
  34. ललिताविस्तार (Lalitavistara) में सिद्धार्थ बुद्ध की पत्नी का नाम गोपा बताया गया है.
  35. सुत निकाय में बुद्ध के धर्मोपदेश गद्य रूप में और गेय निकाय में गद्य-पद्य रूप में मिलते हैं. वेदाल्ला में बुद्ध के उपदेश प्रश्नोत्तर रूप में है.
  36. बिन्दुसार के समय तक्षशिला के विद्रोह को दबाने हेतु अशोक को भेजे जाने का उल्लेख अशोकावदान में है.
  37. धार्मिक शिक्षाओं का सबसे पुराना संग्रह सुत्त निपात माना गया है.
  38. अभिधम्मपिटक (abhidhamma pitaka) में मूल ग्रन्थ धम्म संगणि है.
  39. महाजनपदों का उल्लेख सर्वप्रथम 'अंगुत्तर निकाय” में मिलता है.
  40. प्रज्ञा पारमिता नामक महायान सम्प्रदाय की पुष्तक को देवताओं का विभाग भी कहते हैं.
  41. वामस्थापकसिनी (Vamsathapakasini) नामक बौद्ध ग्रन्थ में मौर्यों की उत्पत्ति का वर्णन है.
  42. गणराज्यों का उल्लेख आचरांग सूत्र (acharanga sutra) में मिलता है.
  43. रक्त शुद्धता के लिए क्षत्रियों में विशेष गर्व का वर्णन दीर्घनिकाय के अम्दष्ठसुत्त में मिलत है.
  44. ओबाइय सूत्र (Obaiya Sutra) में अजातशत्रु को महावीर का भक्त बताया गया है.

बौद्ध धर्म की शिक्षा

बौद्ध धर्म के विषय में स्मरणीय तथ्य : Part 1

बौद्ध धर्म के विषय में स्मरणीय तथ्य : Part 1

  1. बुद्ध के जन्म पर कालदेव और कौण्डिन्य ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक चक्रवर्ती सम्राट होगा या फिर महान संन्यासी बनेगा.
  2. कनिष्क महायान सम्प्रदाय का महान संरक्षक था. उसने पेशावर में एक बौद्ध सभा का आयोजन किया था. यहाँ पर उसने बौद्ध शिक्षाओं को ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण करके एक स्तूप के नीचे गाड़ दिया था.
  3. चीन में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का श्रेय कश्यप मातंग (Kasyapa Matanga) नामक एक भिक्षु को दिया जाता है.
  4. अनाथपिंडक और यश नामक श्रेष्ठियों द्वारा बौद्ध धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा प्रकट की गई थी.
  5. आर्यमंजुश्री मूलकल्प (Mañjuśrī-mūla-kalpa) में बौद्ध दृष्टिकोण से गुप्त-सम्राटों का वर्णन मिलता है.
  6. बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय (सुत्त पिटक) में 16 महाजनपदों का विवरण प्राप्त होता है.
  7. बौद्ध ग्रन्थ सुत्तनिपात में गाय को अन्नदा, वन्नदा और सुखदा कहा गया है.
  8. योगाचार सम्प्रदाय का प्राचीनतम ग्रन्थ सूत्रालंकार है.
  9. बौद्ध तर्कशास्त्र का पर्वर्तक दिग्नाग को माना जाता है.
  10. मध्यकालीन न्याय शास्त्र का जनक दिग्नाग था.
  11. Buddhism पर सांख्य दर्शन का प्रभाव दिखाई देता है.
  12. तिब्बत में बौद्ध धर्म को प्रतिष्ठित करने का श्रेय पद्सम्भव को दिया जाता है.
  13. भारत में निर्मित स्तूपों का अवरोही कालक्रम है - साँची, भरहुत, गया, अमरावती, सारनाथ, नालंदा, अजंता, एलोरा और बाघ की गुफाएँ.
  14. बौद्ध शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र नालंदा, विक्रमशील, उदयन्तपूरी/ओदंतपुरी थे.
  15. प्रथम सदी में नालंदा विहार का प्रमुख नागार्जुन था.
  16. ह्वेनसांग के भारत भ्रमण के दौरान नालंदा विहार का प्रमुख शीलभद्र था.
  17. बौद्ध विहार, विक्रमशिला वज्रयान सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र था.
  18. संस्कृत भाषा का प्राचीनतम नाटक सारिपुत्र प्रकरण है.
  19. बौद्ध मत में त्रिशूल निर्वाण का प्रतीक है.
  20. बुद्ध के पंचशील सिद्धांत का वर्णन छान्दोग्य उपनिषद् (Chandogya Upanishad) में मिलता है.
  21. बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का स्रोत ग्रन्थ तैत्तरीय उपनिषद् (Taittiriya Upanishadहै.
  22. सुत्तपिटक को प्रारम्भिक बौद्ध धर्म का encyclopedia कहा जाता है.
  23. बौद्ध ग्रन्थों में संस्कृत का प्रयोग अभिधम्म पिटक से शुरू होता है.
  24. थेरवाद के महत्वपूर्ण पंथ सर्वास्तिवाद की स्थापना राहुल भद्र ने  की थी.
  25. बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार कोसल राज्य (बुद्ध ने यहाँ सर्वाधिक 21 वास किये थे)में  हुआ था.
  26. मैत्रेयनाथ विज्ञानवाद का प्रवर्तक था.
  27. नागार्जुन शून्यवाद का प्रवर्तक था.
  28. पाणिनी द्वारा प्रयुक्त 'भण्ट्रा” शब्द चमड़े की बनी धौंकनी के प्रयोग का प्रमाण मिलता है.
  29. यवन शासक मिनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के मध्य प्रश्नोत्तर मिलिंदपन्हो (Milinda Panha)  में है.
  30. सुत्तविभंग (Suttavibhangaनामक बौद्ध ग्रन्थ में अपराधों की सूची व उनके प्रायश्चित का वर्णन है.
  31. उदान नामक बौद्ध ग्रन्थ में छोटे-छोटे उल्लेख हैं.
  32. दिव्यावदान ग्रन्थ (Divyavadana - Buddhist talesमें पुष्यमित्र शुंग को मौर्य शासक बताया गया है.
  33. धम्मपद को बौद्ध साहित्य को गीता कहा गया है.
  34. ललिताविस्तार (Lalitavistara) में सिद्धार्थ बुद्ध की पत्नी का नाम गोपा बताया गया है.
  35. सुत निकाय में बुद्ध के धर्मोपदेश गद्य रूप में और गेय निकाय में गद्य-पद्य रूप में मिलते हैं. वेदाल्ला में बुद्ध के उपदेश प्रश्नोत्तर रूप में है.
  36. बिन्दुसार के समय तक्षशिला के विद्रोह को दबाने हेतु अशोक को भेजे जाने का उल्लेख अशोकावदान में है.
  37. धार्मिक शिक्षाओं का सबसे पुराना संग्रह सुत्त निपात माना गया है.
  38. अभिधम्मपिटक (abhidhamma pitaka) में मूल ग्रन्थ धम्म संगणि है.
  39. महाजनपदों का उल्लेख सर्वप्रथम 'अंगुत्तर निकाय” में मिलता है.
  40. प्रज्ञा पारमिता नामक महायान सम्प्रदाय की पुष्तक को देवताओं का विभाग भी कहते हैं.
  41. वामस्थापकसिनी (Vamsathapakasini) नामक बौद्ध ग्रन्थ में मौर्यों की उत्पत्ति का वर्णन है.
  42. गणराज्यों का उल्लेख आचरांग सूत्र (acharanga sutra) में मिलता है.
  43. रक्त शुद्धता के लिए क्षत्रियों में विशेष गर्व का वर्णन दीर्घनिकाय के अम्दष्ठसुत्त में मिलत है.
  44. ओबाइय सूत्र (Obaiya Sutra) में अजातशत्रु को महावीर का भक्त बताया गया है.

भगवान बुद्ध जो बिहार में ज्ञान प्राप्त किये और आज 27 बौद्ध देश है, पूरे विश्व के

बुद्ध के उपदेश - Teachings of Buddha in Hindi

बुद्ध ने बहुत ही सरल और उस समय बोली जाने वाली भाषा पाली में अपना उपदेश दिया था. यदि आपको परीक्षा में सवाल आये कि बुद्ध ने उपदेश किस भाषा में दिया था तो उसका उत्तर पाली होगा, नाकि संस्कृत या हिंदी. चूँकि पाली भाषा उस समय की आम भाषा थी तो इसके चलते बुद्ध के उपदेश का प्रसार दूर-दूर तक हुआ. बुद्ध ने कहा कि मनुष्य को सभी प्रकार के दुःखों से दूर रहना चाहिए. उन्होंने जीवन के ऐसे चार सत्यों का वर्णन किया जिन्हें उन्होंने हमेशा याद रखने की सलाह दी. वे चार सत्य हैं -

बुद्ध के उपदेश

  1. जन्म, मृत्यु, रोग, इच्छा आदि सभी दुःख देते हैं.
  2. किसी प्रकार की इच्छा सभी दुःखों का कारण है.
  3. तृष्णाओं पर नियंत्रण करना चाहिए ताकि हम दुःख से बच सकें.
  4. सांसारिक दुःखों को दूर करने के आठ मार्ग हैं. इन्हें आष्टांगिक मार्ग या मध्यम मार्ग कहा गया है. मध्यम मार्ग को अपनाकर मनुष्य निर्वाण प्राप्त करने में सक्षम है.

आष्टांगिक मार्ग

  1. सम्यक् (शुद्ध) दृष्टि -  सत्य, असत्य, पाप-पुण्य आदि के भेड़ों को समझना
  2. सम्यक् संकल्प - इच्छा और हिंसा के विचारों का त्याग करना
  3. सम्यक् वाणी - सत्य और विनम्र वाणी बोलना
  4. सम्यक् कर्म - सदा सही और अच्छे कार्य करना
  5. सम्यक् आजीव - जीविका के उपार्जन हेतु सही तरीके से धन कमाना
  6. सम्यक् व्यायाम - बुरी भावनाओं से दूर रहना
  7. सम्यक् स्मृति - अच्छी बातों तथा अच्छे आचरण का प्रयोग करना
  8. सम्यक् समाधि - किसी विषय पर एकाग्रचित होकर विचार करना

बुद्ध ने अनेक बौद्ध संघ की स्थापना की. इन्हें विहार कहा जाता था. संघ में सभी जाति के लोगों को प्रवेश करने की अनुमति थी. ये अत्यंत सादा जीवन जीते थे. भिक्षा माँगकर अपनी आवश्यकताओं को पूरा करते थे. इसलिए ये भिक्षु या भिक्षुणी कहलाते थे.

सरल और प्रभावी उपदेश के चलते बौद्ध धर्म देश-विदेश में अत्यंत लोकप्रिय हुआ. बौद्ध धर्म का पहला सम्मलेन (संगीति) मगध की राजधानी राजगृह (राजगीर) में हुआ. इसमें त्रिपिटक नामक बौद्धग्रन्थ का संग्रह किया गया. इस धर्म ने महान अशोक को बहुत प्रभावित किया. राजा अशोक ने इसी धर्म के प्रभाव से अपनी साम्राज्यवादी नीति का त्याग कर दिया और अपना शेष जीवन प्रजा की भलाई और बौद्ध धर्म का देश-विदेश में प्रचार-प्रसार में लगाया.

बौद्ध धर्म ने बहुत हद तक ब्राह्मणवाद और प्रचलित धार्मिक कर्मकांड जैसे यज्ञ, बलि आदि की निंदा की. बौद्ध विहारों के चलते नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का विकास हुआ, जहाँ दूर-दूर से देश विदेश से लोग अध्ययन हेतु आते थे.

सम्राट बिंदुसार ईसा मसीह के जन्म से पहले

बिंदुसार (298 ई.पू. - 273 ई.पू.) का जीवन

चन्द्रगुप्त के बाद उसका पुत्र बिंदुसार (Bindusara) सम्राट बना. आर्य मंजुश्री मूलकल्प के अनुसार जिस समय चन्द्रगुप्त ने उसे राज्य दिया उस समय वह अल्प-व्यस्क था. यूनानी लेखकों ने उसे अमित्रोचेडस (Amitrochades) अथवा अमित्राचेटस (Amitrachates) या अलित्रोचेडस (Allitrochades) के नाम से पुकारा है. विद्वानों के अनुसार इन शब्दों का संस्कृत रूप अमित्रघात अथवा अमित्रखाद (शत्रुओं का विनाश करने वाला) है.

इतिहासकारों का मत

तारानाथ ने लिखा है कि बिन्दुसार और चाणक्य ने लगभग 16 नगरों के राजाओं को नष्ट किया और पूर्वी और पश्चिमी समुद्रों के बीच के सारे प्रदेश को अपने आधिपत्य में ले लिया. इससे प्रतीत होता है कि दक्षिण भारत की विजय बिन्दुसार ने की, किन्तु जैन अनुश्रुति के अनुसार यह कार्य चन्द्रगुप्त ने ही कर लिया था. अशोक के अभिलेखों से यह स्पष्ट है कि दक्षिण भारत मौर्य साम्राज्य में सम्मिलित था, अशोक ने केवल कलिंग को जीता. इसलिए दक्षिण भारत की विजय चन्द्रगुप्त या बिंदुसार ने ही की होगी. बिन्दुसार कुछ आनंदप्रिय शासक प्रतीत होता है इसलिए यह अधिक संभव प्रतीत होता है कि यह कार्य चन्द्रगुप्त ने ही किया हो.

बिंदुसार का राज्यकाल

बिंदुसार के राज्यकाल में प्रांतीय अधिकारियों के अत्याचार के कारण तक्षशिला के प्रांत में विद्रोह हुआ. बिंदुसार का बड़ा पुत्र सुषीम उस प्रांत का शासक था. जब वह इस विद्रोह को न दबा सका तो अशोक को इस काम के लिए भेजा गया. उसने पूर्णतया विद्रोह को दबाकर शांति स्थापित की.

विद्रोहों का दमन

दिव्यावदान (बौद्ध कथाओं का ग्रंथ) के अनुसार उत्तरापथ की राजधानी तक्षशिला में दो विद्रोह हुए. प्रथम विद्रोह को शांत करने के लिए बिंदुसार ने अपने पुत्र अशोक को भेजा. जब अशोक तक्षशिला पहुँचा तो वहाँ के लोगों ने आग्रह किया कि ” न तो हम कुमार के विरुद्ध हैं और न ही सम्राट बिंदुसार के. परन्तु दुष्ट अमात्य हमारा अपमान करते हैं.” ऐसा प्रतीत होता है कि सीमान्त प्रदेशों का शासन दमनपूर्ण था और वहाँ के लोग अपने प्रांतीय गवर्नरों से असंतुष्ट थे. इसी प्रांत में दूसरे विद्रोह को दबाने के लिए बिंदुसार ने कुमार सुसीम को भेजा था. एक अन्य विद्रोह का उल्लेख मिलता है जो स्वश (रवस्या) राज्य में हुआ. स्टीन महोदय के अनुसार यह स्वश राज्य कश्मीर के दक्षिण-पश्चिम फैला हुआ था. कुछ भारतीय इतिहासकारों के अनुसार यह नेपाल के नजदीक था.

विदेशी देशों से संबंध

बिंदुसार ने विदेशों से भी शांतिपूर्ण समबन्ध रखे. यूनान के राजा डेइमेकस नामक राजदूत को और मिस्र के राजा ने डायनीसियस (Dionisias) नामक राजदूत को बिंदुसार के दरबार में भेजा. कहा जाता है कि उसने सीरिया के राजा एंटिओकस (Antiochus) को लिखा था कि वह अपने देश से कुछ मधुर मदिरा, सूखे अंजीर और एक दार्शनिक भेज दे. उत्तर में सीरिया के शासक ने लिखा कि पहली दो वस्तुएँ तो वह बड़ी प्रसन्नता से भेज देगा, किन्तु सीरिया के नियमों को ध्यान में रखते हुए दार्शनिक भेजना संभव नहीं है. पत्र-व्यवहार से स्पष्ट है कि बिंदुसार को दर्शन-शास्त्र में रूचि थी और उसके समय में भारत और पश्चिमी देशों में सामाजिक, व्यापारिक और कूटनीतिक सम्बन्ध विद्यमान थे.

मृत्यु

पुराणों के अनुसार बिंदुसार ने 25 वर्ष तक राज्य किया. इस तथ्य के आधार पर कहा जाता है कि उसने 298 ई.पू. से 273 ई.पू. तक राज्य किया. किन्तु महावंश (पाली भाषा में लिखी पद्य रचना) के अनुसार उसने 27 वर्ष तक राज्य किया.

प्राचीन भारतीय ग्रंथ और उनके भारतीय लेखक

प्राचीन भारत के ग्रन्थ और उनके लेखक (Ancient Indian Writers)

List of Important Books and Writers (Ancient India)

  1. अष्टाध्यायी - पाणिनि
  2. रामायण - वाल्मीकि
  3. महाभारत - वेदव्यास
  4. अष्टसाहस्त्रिक सूत्र, प्रज्ञापारमिता सूत्रशास्त्र, माध्यमिका सूत्र - नागार्जुन
  5. बुद्धचरित, सारिपुत्र प्रकरण, सूत्रालंकार वज्रसूचि, सौंदर्यानन्द, श्रद्धोत्पाद - अश्वघोष
  6. मुद्राराक्षस, देवीचन्द्रगुप्त - विशाखदत्त
  7. अर्थशास्त्र - चाणक्य
  8. महाभाष्य - पतंजलि
  9. कुमारसंभवम्, अभिज्ञानशाकुंतलम्, विक्रमोर्वशीयम्, मेघदूतम्, रघुवंशम्, मालविकाग्निमित्रम्, ऋतुसंहारम् - कालिदास
  10. स्वप्नवासवदत्तम्, प्रतिज्ञायौगंधरायण - भास
  11. नागानंद, रत्नावली, प्रियदर्शिका - हर्षवर्धन
  12. हर्षचरित, कादंबरी - बाणभट्ट
  13. विक्रमांक चरित - बिल्हण
  14. पृथ्वीराज रासो - चंदबरदाई 
  15. राजतरंगिणी - कल्हण
  16. चौरपंचाशिका - बिल्हण
  17. रसमाला, कीर्ति कौमुदी - सोमेश्वर
  18. कर्पूरमंजरी - राजशेखर
  19. इंडिका - मैगस्थनीज
  20. चरकसंहिता - चरक
  21. सुश्रुत संहिता - सुश्रुत
  22. मृच्छकटिकम् - शूद्रक
  23. संगीतरत्नाकर - शांर्गदेव
  24. मीताक्षरा - विज्ञानेश्वर
  25. किरातार्जुनीयम् - भारवि
  26. पंचतंत्र - विष्णु शर्मा
  27. न्याय भाष्य, कामसूत्र - वात्स्यायन
  28. काव्यादर्श, दशकुमारचरित - दंडी
  29. वासवदत्ता - सुबंधु
  30. सूर्य सिद्धांत - आर्यभट्ट
  31. बृहत् संहिता, पञ्च सिद्धान्तिका, बृहज्जातिका, लघुजातिका - वाराहमिहिर
  32. गीतगोविन्दम् - जयदेव
  33. अनर्घराघव - मुरारि
  34. आयुर्वेद सर्वस्व, राजमार्तंड, व्यवहार समुच्चय, शब्दानुशासन, युक्तिकल्पतरु, राजमृगिका - राजा भोज
  35. भोजप्रबंध - बल्लाल
  36. शिशुपाल वध - माघ
  37. नैषधीयचरितम् - श्रीहर्ष
  38. मालती माधव, महावीर चरित, उत्तररामचरितं - भवभूति
  39. साहित्यदर्पण:- भामह
  40. ध्वन्यालोक:, प्रमोदचन्द्र - आनंदवर्धन
  41. व्यक्तिविवेक: - महिमभट्ट
  42. काव्यादर्श - मम्मट
  43. वेणिसंहार (Venisamhara) - भट्ट नारायण
  44. प्रमाण मीमांसा - हेमचन्द्र
  45. बृहत्कथामंजरी - क्षेमेन्द्र
  46. कातन्त्र (व्याकरण) - सर्ववर्मन्
  47. अष्टांगसंग्रह, सिद्धांत शिरोमणि, लीलावती (first book of algebra) - भास्कराचार्य
  48. माधव निदान - माधवकर
  49. निघंटु - यास्क
  50. रसरत्नाकर - नागार्जुन
  51. तत्त्व कौमुदी, तत्त्व शारदी, न्यायवर्तिका, न्यायसूत्र धारा, न्यायकणिका, योगसारसंग्रह - वाचस्पति मिश्र
  52. योगवर्तिका, योगसारसमग्र - विज्ञान भिक्षु 
  53. तिलकमंजरी, यशस्तिलक - धनपाल
  54. कुट्टनीमतम् -दामोदरगुप्त
  55. तत्त्वशुद्धि - उदयन
  56. न्यायमंजरी - जयंत
  57. न्यायतत्त्व योगरहस्य - नाथमुनि
  58. गीतसंग्रह, महापुरुष निर्णय, सिद्धत्रय, अगम प्रामाण्य - यामुनाचार्य
  59. धूर्तव्यामा, समरादित्य कथा - हरिभद्र 
  60. कुवलयमाला - उद्द्योतनसूरि
  61. अजित शान्तिस्तव - नंदिसेण
  62. सतसई - हाल
  63. बृहत्कथा - गुणाढ्य
  64. मुनि

प्राचीन भारतीय बंदरगाह,

प्रमुख भारतीय बंदरगाह : Important Ports in Indian History

अति प्राचीन काल में ही मनुष्य ने नाव बनाना सीख लिया था और इसका प्रयोग कर समुद्री यात्रा करना आरम्भ कर दिया था. इसकी यात्राओं का उद्देश्य मुख्यतः व्यापार ही होता था.  ये नावें जिन तटों से निकलती थीं उन तटों की आकृति ऐसी थी कि उन्हें आसानी से स्थिर जल में लगाया जा सके. ऐसे स्थानों को बंदरगाह कहा जाता था. सिन्धु घाटी सभ्यता से ही बंदरगाह बनने लगे थे जिसमें आज भी कुछ देखे जा सकते हैं. यह क्रम प्राचीन इतिहास के प्रत्येक कालखंड में चलता रहा.

List of Ancient Ports in Indian History

बंदरगाहस्थलसमयविशेष
सुतकागेन डोर (Sutkagan Dor)बलूचिस्तानहड़प्पा सभ्यतायह दाश्क नदी के किनारे बंदरगाह नगर व हड़प्पा सभ्यता से परिचित था.
सोख्ता कोह (Sokhta Koh )बलूचिस्तानहड़प्पा सभ्यतायह शादी कोर नदी के मुहाने पर था.
बालाकोट (Balakot)बलूचिस्तानहड़प्पा सभ्यतायह सोनमियानी खाड़ी के पूर्व में विदार नदी के मुहाने पर था.
अल्लादिनोअरब सागरहड़प्पा सभ्यता---
लोथल (Lothal)गुजरातहड़प्पा सभ्यतायह हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख बंदरगाह था जहाँ से फारस की मुद्रा, जहाज आकृति, टैरोकोटा पर व गोदीबाड़ा मिलता है.
कैन्नोर (Kannur)पश्चिमी तटसंगम---
तोंडीपश्चिमी तटसंगमयह आधुनिक पौन्नानी में स्थित था, यहाँ रोम से व्यापार होता था. यह चेरों का था.
मुजिरिस (Muziris Port)पश्चिमी तटसंगमयह अरब सागर और ग्रीस के मध्य व्यापार केंद्र था. यह चेरों का था.
कोट्टायम (kottayam port/नेस्लिडा)पश्चिमी तटसंगम---
कोर्कई (Korkai Port)पूर्वी तटसंगमयह ताम्रणि नदी पर स्थित पांड्यों की राजधानी बंदरगाह था.
पोडुका (अरिकामेडु/ArikameduPort)पांडिचेरी (पूर्वी तट)संगम---
पुहार (Puhar Port)पूर्वी तटसंगमइसे कावेरीपट्टम भी कहते हैं. यह चोलों का था.
शालियूर (Shaliyur Port)पूर्वी तटसंगमयह चोल बंदरगाह था
भृगुकच्छ (bhrigukachchha)भड़ौच (पश्चिमी तट)मौर्य व मौर्योत्तर काल---
ताम्रलिप्ति (Tamralipti port)तामलुक (पूर्वी तट)गुप्तकाल---
बारबेरीकमपश्चिमी तटमौर्योत्तरयह बंदरगाह सिंध के मुहाने पर था.
सोपारा (Sopara Port)पश्चिमी तटमौर्योत्तरPeriplus of the Erythraean Sea में वर्णित बंदरगाह
सेमिल्लापश्चिमी तटमौर्योत्तरPeriplus of the Erythraean Sea में वर्णित बंदरगाह
बाइजेंटियनपश्चिमी तटमौर्योत्तरPeriplus of the Erythraean Sea में वर्णित बंदरगाह
नेलसिंडापश्चिमी तटमौर्योत्तरPeriplus of the Erythraean Sea में वर्णित बंदरगाह
मसालियापश्चिमी तटमौर्योत्तरPeriplus of the Erythraean Sea में वर्णित बंदरगाह
पिटोड्रापूर्वी तटमौर्योत्तर---
देवलपश्चिमी तटगुप्तकाल---
खम्भातपश्चिमी तटगुप्तकाल---

पाषाड़ काल, भारतीय इतिहास

पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण काल के विषय में स्मरणीय तथ्य

भारतीय विद्वान् अनुमानतः कहते हैं कि लगभग 5 लाख वर्ष ई.पू. के आसपास यह देश मानव का निवास स्थान बना. चूँकि इस युग के लोग अपनी सभी आवश्यकताओं को केवल पाषाण (पत्थर) के उपकरणों की सहायता से ही पूरा करते थे इसलिए इस युग को पाषाण युग कहते हैं. अब तक जितने भी प्रमाण प्राप्त हुए हैं, उनके आधार पर 5 लाख ई.पू. से 2500 ई. तक के काल को भारतीय मानव की प्रगति का प्रागैतिहासिक युग माना जाता है. इस पाषाण काल को विद्वानों ने निम्न तीन भागों में (भारतीय मानव द्वारा प्रयोग किये गए पाषाण उपकरणों और जीवन पद्धति में समय-समय पर आये परिवर्तनों के आधार पर) विभाजित किया है -

पुरापाषाण (Paleolithic Age)

आरम्भ में माना जाता था कि पृथ्वी ईश्वर द्वारा बनाई गई है. परन्तु, वैज्ञानिकों ने इस धारणा को बदला. पहले मानव बन्दर की तरह झुककर हाथ और पैर दोनों से चलता था. बाद में वह सीधे खड़े होकर आज शाहरुख खान जैसे चलने लगा. दोनों हाथों के free हो जाने से वह इनसे अनेक काम करने लगा. बाद में तो मस्तिष्क से सोचने का काम करने लगा और आज विज्ञान हमारे सामने है.

  1. जिस समय आरंभिक मानव पत्थर का प्रयोग करता था, उस समय को पुरातत्त्वविदों ने पुरापाषाण काल नाम दिया है.
  2. यह शब्द प्राचीन और पाषाण (पत्थर) से बना है.
  3. यह वह कल था जब मनुष्य ने पत्थरों का प्रयोग सबसे अधिक किया.
  4. पुरातत्त्वविदों के अनुसार, पुरापाषाण काल की अवधि बीस लाख साल पूर्व से बारह हजार साल पहले तक है.
  5. इस युग को तीन भागों में बाँटा गया है - आरंभिक, मध्य और उत्तर पुरापाषाण युग.
  6. माना जाता है कि मनुष्य इस युग में सबसे अधिक दिनों तक रहा है.
  7. इस युग में मनुष्य खेती नहीं करता था बल्कि पत्थरों का प्रयोग कर शिकार करता था.
  8. इस युग में लोग गुफाओं में रहते थे.
  9. इस युग में सबसे महत्त्वपूर्ण काम जो मानव ने सीखा, वह था आग को जलाना. आग का उपयोग विभिन्न कार्यों के लिए होने लगा.
  10. दक्षिण भारत में कुरनूल की गुफाओं में इस युग की राख के अवशेष प्राप्त हुए हैं.
  11. पुरातत्त्वविदों ने पुणे-नासिक क्षेत्र, कर्नाटक के हुँस्गी-क्षेत्र, आंध्र प्रदेश के कुरनूल-क्षेत्र में इस युग के स्थलों की खोज की है. इन क्षेत्रों में कई नदियाँ हैं, जैसे - ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा भीमा, वर्धा आदि. इन स्थानों में चूनापत्थर से बने अनेक पुरापाषाण औजार (weapons) मिले हैं.
  12. नदियों के कारण इन स्थलों के जलवायु में नमी रहती है. यहाँ गैंडा और जंगली बैल के अनेक कंकाल मिले हैं. इससे अनुमान लगाया गया है कि इन क्षेत्रों में इस युग में आज की तुलना में अधिक वर्षा होती होगी. ऐसा अनुमान इस आधार पर लगाया है कि गैंडा और जंगली बैल नमीवाले स्थानों में रहना पसंद करते हैं.
  13. अनुमान लगाया जाता है कि इस युग का अंत होते-होते जलवायु में परिवर्तन होने लगा. धीरे-धीरे इन क्षेत्रों के तापमान में वृद्धि हुई.
  14. इस युग का मनुष्य चित्रकारी करता था जिसका प्रमाण उन गुफाओं से मिलता है जहाँ वह रहता था.

पुरापाषाण काल लगभग एक लाख वर्ष तक रहा. उसके बाद मध्यपाषाण या मेसोलिथिक युग (Mesolithic Age) आया. बदले हुए युग में कई परिवर्तन हुए. जीवनशैली में बदलाव आया. तापमान में भी वृद्धि हुई. साथ-साथ पशु और वनस्पति में भी बदलाव आये. इस युग को मध्यपाषण युग (Mesolithic Age) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह युग पुरापाषाण युग और नवपाषाण युग के बीच का काल है. भारत में इस युग का आरम्भ 8000 ई.पू. से माना जाता है. यह काल लगभग 4000 ई.पू. के आस-पास उच्च पुरापाषाण युग का अंत हो गया और जलवायु उष्ण और शुष्क हो गया. परिणामस्वरूप बहुत सारे मौसमी जलस्रोत सूख गए होंगे और बहुत सारे जीव-जन्तु दक्षिण अथवा पूर्व की ओर प्रवास कर गए होंगे, जहाँ कम से कम मौसमी वर्षा के कारण लाभकारी और उपयुक्त घनी वनस्पति बनी रह सकती थी. जलवायु में परिवर्तनों के साथ-साथ वनस्पति व जीव-जन्तुओं में भी परिवर्तन हुए और मानव के लिए नए क्षेत्रों की ओर आगे बढ़ना संभव हुआ.

  1. तापमान में बदलाव आया. गर्मी बढ़ी. गर्मी बढ़ने के कारण जौ, गेहूँ, धान जैसी फसलें उगने लगीं.
  2. इस समय के लोग भी गुफाओं में रहते थे.
  3. पुरातत्त्वविदों को कई स्थलों से मेसोलिथिक युग के अवशेष मिले हैं.
  4. पश्चिम, मध्य भारत और मैसूर (कर्नाटक) में इस युग की कई गुफाएँ मिलीं हैं.
  5. मध्यपाषाण युग में लोग मुख्य रूप से पशुपालक थे. मनुष्यों ने इन पशुओं को चारा खिलाकर पालतू बनाया. इस प्रकार मध्यपाषाण काल में मनुष्य पशुपालक बना.
  6. इस युग में मनुष्य खेती के साथ-साथ मछली पकड़ना, शहद जमा करना, शिकार करना आदि कार्य करता था.

नवपाषाण काल (Neolithic Age)

मध्यपाषाण काल के बाद नवपाषाण युग में मनुष्य के जीवन में बहुत अधिक परिवर्तन आया. इस युग में वह भोजन का उत्पादक हो गया अर्थात् उसे कृषि पद्धति का अच्छा ज्ञान हो गया. यह पाषाणयुग की तीसरी और अंतिम कड़ी है. भारत में 4,000 ई.पू. से यह यह शुरू हुआ और संभवतः 2500 ई.पू. तक चलता रहा. इस युग में मनुष्य का मस्तिष्क अधिक विकसित हो चुका था. उसने अपने बौद्धिक विकास, अनुभव, परम्परा और स्मृति का लाभ उठाकर अपने पूर्व काल के औजारों व हथियारों को काफी सुधार लिया. दक्षिण भारत और पूर्व भारत में अनेक स्थलों पर इस संस्कृति के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं. दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के दक्षिण में ये साक्ष्य मिले हैं. इस युग में भारतीय मानव ने ग्रेनाइट की पहाड़ियों अथवा नदी तट के समीप बस्तियाँ स्थापित की थीं. पूर्वी भारत में गंगा, सोन, गंडक और घाघरा नदियों के डेल्टाओं में मानव रहता था.

  1. उसे पता लग गया कि बीज से वनस्पति बनता है. वह बीज बोने लगा.
  2. बीज बोने के साथ-साथ उसने सिंचाई करना भी सीखा.
  3. वह अनाज के पकने पर उसकी कटाई कर उसका भंडारण करना सीख गया.
  4. नवपाषाण काल (Neolithic Age) में मनुष्य कृषक और पशुपालक दोनों था.
  5. कई स्थलों पर इस युग के अनाज के दानें मिलें हैं. इन दानों से पता लगता है कि उस समय कई फसलें उगाई जाती थीं.
  6. उत्तर -पश्चिम में मेहरगढ़ (पाकिस्तान में), गुफकराल और बुर्जहोम (कश्मीर में), कोल्डिहवा और महागढ़ा (उत्तर प्रदेश में), चिरांद (बिहार में), हल्लूर और पैय्य्मपल्ली (आंध्र प्रदेश में) गेहूँ, जौ, चावल, ज्वार-बाजरा, दलहन, काला चना और हरा चना जैसी फसलें उगाने के प्रमाण मिले हैं.
  7. इस युग में मनुष्य कृषिकार्य के कारण एक स्थान पर स्थाई रूप से रहना शुरू कर दिया. कहीं-कहीं झोपड़ियों और घरों के अवशेष मिले हैं.
  8. बुर्जहोम में गड्ढे को घर बनाकर रहने के साक्ष्य मिले हैं. ऐसे घर को गर्तवास का नाम दिया गया.
  9. मेहरगढ़ में कई घरों के अवशेष मिले हैं, जो चौकोर और आयतकार हैं.
  10. नवपाषाण युग में कृषक और पशुपालक एक साथ एक स्थान पर छोटी-छोटी बस्तियाँ बनाकर रहने लगे.
  11. परिवारों के समूह ने जनजाति को जन्म दिया. जन्मजाति के सदस्यों को आयु, बुद्धिमत्ता और शारीरिक बल के आधार पर कार्य दिया जाता था.
  12. ज्येष्ठ और बलशाली पुरुष को जनजाति का सरदार बनाया जाता था.
  13. नवपाषाण काल (Neolithic Age) में जनजातियों की अपनी संस्कृति और परम्पराएँ होती थीं. भाषा, संगीत, चित्रकारी (Language, music, painting etc.) आदि से इनकी संस्कृति का ज्ञान होता है.
  14. इस काल में लोग जल, सूर्य, आकाश, पृथ्वी, गाय और सर्प की पूजा (worship) विशेष रूप से करते थे.
  15. इस काल में बने मिट्टी के बरतन कई स्थलों से प्राप्त हुए हैं. इन बरतनों पर रंग लगाकर और चित्र बनाकर उन्हें आकर्षक बनाने का प्रयास करते थे.

महर्षि वेद व्यास जी का लिखा 18 पुराण

पुराण - 18 Purana का संक्षिप्त विवरण in Hindi

प्राचीन संस्कृत-साहित्य में पुराण-साहित्य बहुत विशाल और गौरवमय है. वेदों के बाद पुराणों की ही मान्यता है. पुराणों को एक प्रकार से भारतीय सभ्यता, संस्कृति, राजनीति, भूगोल, इतिहास आदि का विश्वकोष कहा जा सकता है. चलिए जानते हैं पुराणों के बारे में. पुराणों के कितने भाग थे और उनकी संख्या कितनी थी. purana के 18 भागों की संक्षिप्त चर्चा भी हम करेंगे. उपपुराण क्या है, ये भी जानेंगे in Hindi.

रचनाकाल

पुराणों की रचना काल विवादास्पद है. यद्यपि इनकी रचना छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व से ही आरम्भ हो गई थी, तथापि गुप्त-युग में परिवर्धित और सम्बंधित होकर वर्त्तमान रूप में आ चुके थे.

पुराण : संख्या

भारतीय परम्पराओं के अनुसार purana की संख्या 18 है. पुराणों को दो भागों में बाँटा जा सकता है -

  • महापुराण
  • उपपुराण

महापुराणों की संख्या 18 है और उपपुराण भी 18 हैं.

महापुराण

महापुराण तीन भागों में बाँटे गए हैं -

  1. सात्विक पुराण - सात्विक पुराणों का सम्बन्ध विष्णु से है.
  2. राजस पुराण - राजस पुराणों का ब्रह्मा से है और
  3. तामस पुराण - तामस पुराणों का सम्बन्ध शिव से है.

18 महापुराण 

सात्विक महापुराण

  1. विष्णु purana
  2. भागवत purana
  3. नारद purana
  4. गरुड़ पुराण
  5. पदम पुराण
  6. वराह पुराण

राजस पुराण

  1. ब्रह्म पुराण
  2. ब्रह्मांड पुराण
  3. ब्रह्मवैवर्त पुराण
  4. मार्कण्डेयपुराण
  5. भविष्य पुराण
  6. वामन पुराण

तामस पुराण

  1. वायु पुराण
  2. लिंग पुराण
  3. स्कन्द पुराण
  4. अग्नि purana
  5. मत्स्य purana
  6. कूर्म purana

इन 18 पुराणों के अतिरिक्त 18 उपपुराण लिखे गए थे. इनकी दो सूचियां दी गईं. प्रथम और द्वितीय.

18 उपपुराण

आचार्य बलदेव उपाध्याय ने गरुड़ purana के आधार पर उपपुराणों की जो सूची दी है वह है -

  1. सनत्कुमार
  2. नरसिंह
  3. कपिल
  4. कालिका
  5. साम्ब
  6. पराशर
  7. महेश्वर
  8. सौर
  9. नारदीय
  10. शिव
  11. दुर्वासा
  12. मानव
  13. अनुशासन
  14. वरुण
  15. भसिष्ठा
  16. देवी-भागवत
  17. नंदी
  18. आदित्य

महत्त्वपूर्ण पुराणों का संक्षिप्त विवरण

विष्णु पुराण

इसमें विष्णु को अवतार मानकर उनकी उपासना की गई है.  प्रमाणिकता और प्राचीनता की दृष्टि से यह सबसे प्रमुख है. यह वैष्णव दर्शन का प्रतिपादन पुराण है. इसमें छः अंश (खंड), 126 अध्याय और 23 हजार श्लोक हैं.

श्रीमद् भागवत् पुराण

भागवत् पुराण वैष्णवों का सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय puranaa है. वे इसे पंचम वेद मानते हैं. इसमें विष्णु के अवतारों का विस्तृत वर्णन है. दसवें अध्याय में कृष्ण की रास लीलाओं का विस्तृत वर्णन होते हुए भी राधा का नाम कहीं नहीं आया. इसमें सांख्यदर्शन के प्रवर्तक कपिल और महात्मा बुद्ध को भी विष्णु अवतार माना गया है. इसमें 12 स्कन्ध और 18 हजार श्लोक हैं.

नारद पुराण

इसे बृहद् नारदीय भी कहते हैं. इसके दो भागों में क्रमशः 125 और 82 अध्याय और 25 हजार श्लोक हैं. इसके पूर्व भाग में वर्णाश्रम के आचार, श्राद्ध, प्रायश्चित, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष आदि का वर्णन है. इस वैष्णव purana का स्थान विश्वकोषात्मक पुराणों में अआता है. इसमें वैष्णवों के व्रतों और उत्सवों का वर्णन है. विष्णु भक्ति को ही मोक्ष का एकमात्र उपाय बतलाया गया है.

गरुड़ पुराण

इस पुराण में विष्णु ने गरुड़ को विश्व की सृष्टि बताई थी. इसमें दो खंड, 287 अध्याय और 18 हजार श्लोक हैं. पूर्वखंड में विष्णु के अवतारों का माहात्म्य है. इस purana का उत्तर-खंड प्रेतकल्प कहलाता है, जिसमें 45 अध्याय हैं. इसमें गर्भावस्था, नरक, यमनगर का मार्ग, प्रेतगण का वासस्थान, प्रेत-लक्षण और प्रेतयोनि से मुक्त, प्रेतों का रूप, मनुष्यों की आयु, यमलोक का विस्तार, सपिण्डीकरण की विधि, वृषोत्सर्ग विधान आदि का रोचक और विस्तृत वर्णन है. श्राद्ध के समय इस पुराण का पाठ किया जाता है.

पद्म पुराण

इसमें राधा का कृष्ण की प्रेयसी के रूप में उल्लेख है. मुख्य रूप से विष्णुपरक होते हुए भी यह purana ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीनों देवताओं में एकत्व की भावना स्थापित करना है. इस विशालकाय puranaa में 50 हजार श्लोक हैं.

वराह पुराण

इसमें 218 अध्याय व 24 हजार श्लोक हैं. इसमें विष्णु द्वारा वराह का रूप धारण कर पृथ्वी का उद्धार किये जाने का वर्णन है.

पुराण-विवरण

कुल पुरानों में 40,000 श्लोक हैं. पुराणों में विष्णु, वायु, मत्स्य और भागवत में ऐतिहासक वृत्त,, राजाओं की वंशावली आदि के रूप में बहुत कुछ मिलता है. विष्णु purana में सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर कलियुग के मौर्यवंश और गुप्तवंश तक का वर्णन मिलता है. पुराणों का उद्देश्य पुरानी कथाओं द्वारा उपदेश देना, देवमहिमा और तीर्थमहिमा का बखानकर जनसाधारण के हृदय में धर्म पर अडिग भावना बनाए रखना ही था.

पल्लव रियासत औऱ साम्राज्य, यादव वंश

पल्लव कौन थे? पल्लव वंश के शासक और उनकी उपलब्धियाँ

पल्लव कौन थे? प्रायः इसके बारे में कहा जाता है कि ये लोग स्थानीय कबीलाई थे. पल्लव का अर्थ होता है 'लता” और यह तमिल शब्द 'टोंडाई” का रूपांतरण है जिसका अर्थ भी लता होता है. इसलिए इन्हें मूलतः लताओं के प्रदेश का निवासी कहा जाता है. कुछ इतिहासकार उन्हें विदेशी-पहलव मानते हैं. इस मत का समर्थन करते हुए वे कहते हैं कि 'यह बात इससे सिद्ध होती है कि जब नन्दिवर्मन द्वितीय को सिंहासनारूढ़ होने के लिए चुना गया तो उसे हाथी की खोपड़ी के आकार का ताज दिया गया जो हिंदू-यूनानी राजा विभित्रयस के ताज की याद दिलाता है.” वस्तुतः वे विदेशी पहलाव (पार्थियन) के वंशज नहीं थे बल्कि मूलतः स्थानीय कबीलाई थे. सत्ता में आने से पहले इस वंश का संस्थापक बप्पदेव (Bappadevan) सातवाहन राजा के अधीन एक प्रांतीय शासक था. सातवाहनों की सत्ता का जब विघटन हो रहा था तभी वह स्वतंत्र शासक बन गया और धीरे-धीरे काँची की ओर अपनी सत्ता का विस्तार करने लगा. उनकी सत्ता के अधीन धीरे-धीरे आंध्रपथ (आंध्र प्रदेश) और तोंडैमंडलम दोनों  ही थे. उन्होंने अपनी राजधानी काँची बनायी, जो पल्लव शासन काल में वैदिक विद्या और मंदिरों का नगर बन गया. इनका उदय तीसरी या चौथी शताब्दी में शुरू हुआ. बप्पदेव के काल में प्राकृत भाषा फलीफूली. उसने जंगलों को काटकर और सिंचाई की सुविधाएँ देकर कृषि की प्रगति में योगदान दिया. उसके बाद उसी का पुत्र शिवस्कंदवर्मन उसका उत्तराधिकारी बना. उसने धर्म महाराज की उपाधि ग्रहण की और अश्वमेघ और वाजपेय जैसे यग्य कराये. उसके बाद का पल्लव वंश का इतिहास बहुत वर्षों तक अन्धकारमय है.

प्रयाग प्रशस्ति (समुद्रगुप्तकालीन) से पता चलता है कि समुद्रगुप्त दक्षिण अभियान के समय कांची में पल्लव नरेश विष्णुगोप शासन कर रहा था. पल्लव का प्रभाव शायद 575 ई. तक कम रहा. संभवतः वे वास्तविक साम्राज्यवादी शक्ति 575 ई.के आस-पास बने. इसलिए (काशाक्कुदि और बैलूर पालैयम से मिले) प्राप्त ताम्रपत्रों में उनकी वंश तालिका सिंह विष्णु से शुरू होती है (575-600 ई.) और अपराजित (879-897 ई.) के शासन काल से समाप्त होती है.

पल्लव शासक और उनकी उपलब्धियाँ

सिंहविष्णु (575-600 ई.)

उसके (Simhavishnu) सिंहासन पर बैठते ही पल्लव इतिहास का नया अध्याय शुरू हुआ क्योंकि उसने अपनी कई विजय यात्रायें आरम्भ की और पल्लव शक्ति का प्रभाव सम्पूर्ण तमिल प्रदेश में पूर्णतया छाता गया. उसने चोलों मलय, कलभ्रो, मालव, पांड्य और चेरों को पराजित किया. उसने अपने राज्य की सीमा को कावेरी नदी तक बढ़ा दिया.

महेंद्र वर्मन (600-630 ई.)

उसके (Mahendravarman I) काल में जहाँ एक ओर धर्म और साहित्य की प्रगति हुई तो दूसरी ओर पल्लवों के चालुक्यों और पांड्यों से ऐसे युद्ध शुरू हुए जो लगभग 150 वर्षों तक जारी रहे. वह सर्वगुण सम्पन्न व्यक्ति था इसलिए उसने मत्त विल्गस, विचित्र चित्त और गुणाभार आदि उपाधियाँ धारण की थी. यद्यपि उसके काल में चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय ने वेंगी पर अधिकार कर लिया था लेकिन वह कांची पर जब आक्रमण करने आया तो महेंद्रवर्मन ने उसे बुरी तरह पराजित किया.

नरसिंह वर्मन प्रथम (630-668 ई.)

वह (Narasimhavarman I) अपने पिता महेंद्र वर्मन की मृत्यु के बाद शासक बना. उसने चालुक्यों की राजधानी बादामी को जीता. उसने इस विजय के बाद ही 'महामल्ल” की उपाधि धारण की. संभवतः उसी के साथ युद्ध करते हुए चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय मारा गया. उसने अपने मित्र लंका के राजकुमार मणिवम्भ (मानववर्मन) लंका का राज्य दिलाने में सहायता प्रदान की. कुर्रम दानपत्र के अनुसार उसने चोल, पांड्य और केरल राज्यों को पराजित किया.

महेंद्र वर्मन द्वितीय (668-670 ई.)

नरसिंह वर्मन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र महेंद्र वर्मन द्वितीय (Mahendravarman II) राजा बना. उसने चालुक्य नरेश विक्रमादित्य को पराजित किया. वह शीघ्र ही मर गया.

परमेश्वर वर्मन प्रथम (670-680 ई.)

महेंद्र वर्मन द्वित्तीय के पश्चात परमेश्वर वर्मन शासक हुआ. उसके शासन काल में पल्लवों और चालुक्यों में भयंकर संघर्ष पुनः छिड़ गया. उसने चालुक्य नरेश विक्रमादित्य की लाखों की सेना को इतनी बुरी तरह से पराजित किया कि शत्रु राजा को तार-तार हुए कपड़ों में युद्ध क्षेत्र से भागना पड़ा. परन्तु विक्रमादित्य द्वित्तीय के अभिलेखों में पल्लव राजा परमेश्वरवर्मन की पराजय का उल्लेख मिलता है. विद्वानों की राय है कि संभवतः पहले चालुक्यों को और बाद में पल्लवों को एक-दूसरे के विरुद्ध सफलता मिली.

नरसिंह वर्मन द्वितीय (680 ई. -720 ई.)

परमेश्वर वर्मन प्रथम के बाद उसका पुत्र नरसिंह वर्मन द्वितीय 7वीं शताब्दी के अंत में राजा हुआ. उसने 'राजसिंह” और 'आगमप्रिय” (विद्या-प्रेमी) जैसी वीरता और विद्यानुराग सूचक उपाधियाँ ग्रहण की. उसके राज्यकाल में शांति रही.

परमेश्वर वर्मन द्वितीय (720-731 ई.)

नरसिंहवर्मन द्वितीय के उपरान्त उसका पुत्र परमेश्वर वर्मन द्वितीय (Paramesvaravarman II) राजा बना. उसके शासन काल में चालुक्य युवराज विक्रमादित्य ने गंग - राजकुमार एरेयप्प की मदद से कांची पर आक्रमण कर दिया और इस युद्ध में परमेश्वरवर्मन पराजित हुआ. अपनी इस पराजय का बदला लेने के लिए उसने गंग नरेश श्रीपुरुष पर आक्रमण किया. इस युद्ध में वह पुनः पराजित हुआ और मारा गया.

नंदिवर्मन द्वितीय (731-795 ई.)

परमेश्वरवर्मन द्वितीय के कोई सन्तान नहीं थी. इसलिए उसकी मृत्यु के बाद सिंहासन के लिए भीषण संघर्ष शुरू हो गए, जो पल्लवों के भावी पतन के द्योतक थे. दूसरे राजकुमार चित्रमाय को पांड्य नरेश मारवर्मन नरसिंह प्रथम का समर्थन मिला था. लेकिन जन-सहयोग और सेनापति उदयचन्द्र के सहयोग से नन्दिवर्मन द्वितीय (Narasimhavarman II) शासक बना. इसके समय में चालुक्यों, राष्ट्रकूटों, पांड्य और चोल राजाओं से बराबर युद्ध होता रहा. विक्रमादित्य द्वितीय चालुक्य ने इसके शासनकाल में कांची पर आक्रमण किया, पर नन्दिवर्मन ने इसे हरा दिया. पर कालांतर में नन्दिवर्मन राष्ट्रकूट दन्तिदुर्ग से पराजित हो गया. संभवतः 757 ई. में राष्ट्रकूटों ने पल्लवों का आधिपत्य समाप्त कर दिया.

दिल्ली का मुसलमान राज्य, गुलाम वंश

दिल्ली सल्तनत : गुलाम वंश का शासन (1206A . D. -1290 A . D .)

कुतब-उद-दीन ऐबक, मुहम्मद गौरी के सिपाहसालार के साथ उसका ग़ुलाम भी था | कुतब -उद-दीन ऐबक का जन्म मध्य एशिया के तुर्की परिवार में हुआ था और उसे बचपन में ही ग़ुलाम के तौर पर बेच दिया गया था | सुल्तान मुहम्मद गौरी के राजपाल होने के कारण कुतब-उद-दीन ने बनारस को 1194 A D में बर्खास्त कर दिया | इसने अजमेर के राजा को भी हराया | इसने ग्वालियर पर विजय प्राप्त करने के बाद राजा सोलंखोल से ज़बरदस्ती शुल्क अदा करवाया | इसके अलावा, इसने गुजरात के राज्यों पर भी विजय हासिल की |

इल्तुत्मिश, कुतब-उद-दीन ऐबक ( 1206-11) का उत्तराधिकारी बना जिसके बाद रज़िया (1236-40) और बलबन (1265-85) ने राजभार संभाला | कुतब-उद-दीन ऐबक ने क़ुतुब मीनार की नींव रखी परंतु इल्तुत्मिश ने इसे पूरा कराया था | चौगान खेलने के दौरान अपने घोड़े से गिरने के कारण कुतब-उद-दीन की मृत्यु हो गई |

1206 A D  में मुहम्मद गौरी की हत्या के बाद, कुतब-उद-दीन ऐबक भारत का सुल्तान बन गया और  ममेलुक वंश या दास वंश परंपरा की नींव रखी |1206 A D में इसे मुहम्मद गौरी के द्वारा नैब-उस-सल्तनत ( गौरी के भारतीय साम्राज्य के राजपाल ) के तौर पर नियुक्त कर दिया |

कुतब-उद-दीन ऐबक से जुड़े कुछ मुख्य तथ्य निम्न हैं:

  • इसने सिर्फ 4 साल के किए शासन किया | चौघन खेलने के दौरान 2010 में इसकी मृत्यु हो गई |
  • कुतब-उद-दीन दिल्ली सल्तनत का प्रथम शासक था |
  • वह अय्बक जाति का तुर्क था |
  • दयालु होने के कारण इसे सुल्तान “लाख बक्ष” भी कहा गया |
  • कुतब-उद-दीन ऐबक को कुतुब मीनार की नींव रखने का श्रेय जाता है जिसका नाम सूफी संत ख्वाजा कुतब –उद-दीन बख्तियार काकी के ऊपर रखा गया था |
  • इसने क़ुतुब अल इस्लाम मस्जिद का भी कार्यभार संभाला |
  • इसके दामाद इल्तुत्मिश ने इसकी मृत्यु के बाद कार्यभार संभाला |
  • कुतब-उद-दीन ऐबक का किला पाकिस्तान के लाहौर में है |

इल्तुत्मिश  :

यह इल्लाबरी जाति का तुर्क था | वह ऐबक का दामाद था और ऐबक की मृत्यु के बाद दिल्ली का अगला सुल्तान बना | उसके नाम से दिल्ली के निकट महरौली में हौज़-इ-शमशि नामक इमारत है | इसने क़ुतुब मीनार का कार्य पूरा कराया जिसे इसके पूर्वजों ने आरंभ किया था |

इल्तुत्मिश ने दिल्ली सल्तनत में इक्ता प्रणाली की भी शुरुआत की जिसमे खेती पर कर की प्रथा थी | इक्ता प्रणाली के अंतर्गत, एक अधिकारी को राज्य से तनख्वा के बदले  में राजस्व कर का अनुदान दिया जाता था |हालांकि, इक्ता प्रणाली वंशानुगत नहीं थी | इक्ता प्रणाली ने सल्तनत के दूर के भागों को केंद्र सरकार से जोड़ दिया था |

चांदी टांका और ताँबा जीटल की शुरुआत का श्रेय भी इल्तुत्मिश को जाता है | चाँदी टांके का वज़न 175 इकाई था |

इल्तुत्मिश के शासन के दौरान चेंगेज़ खान के नेतृत्व में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण किया | परंतु उन्होने जल्द ही भारत को छोड़ दिया और मुल्तान, सिंध और क़बचा की तरफ चले गए |

इल्तुत्मिश के देहांत के बाद रज़िया दिल्ली सल्तनत की सुल्तान बन गई | परंतु यह इसके लिए आसान नहीं था | सुल्तान बनने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि इल्तुत्मिश ने अपने सभी पुत्रों को अवगुणता पाई और रज़िया राजगद्दी को संभालने के लिए प्रत्येक रूप से उपयुक्त थी | इसलिए, इल्तुत्मिश ने रज़िया को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया | परंतु छिहल्गनी या मुख्य चालीस तुर्कियों ने इल्तुत्मिश की अंतिम इच्छा का विरोध किया और उसके पुत्र रुक्नउद दीन फिरूज़ को राजगद्दी पर बैठा दिया |

रुक्न उद दीन फिरूज़ अयोग्य था और अपने ही इंद्रिय आनंदों में ज्यादा व्यस्त हो गया तथा राज्य के मसले अव्यवस्थित हो गए | 7 महीनो के अंदर ही रुक्न उद दीन फिरूज़ की  हत्या कर दी गई | 1236 A D  में रज़िया ने  रुक्न उद दीन के बाद पदभार संभाला | रज़िया ने 1240 तक साड़े तीन साल तक शासन किया | यद्यपि, एक अच्छे शासक के सभी गुण रज़िया में मौजूद दे परंतु छिहल्गनी ( 40 तुर्की अधिकारियों का दल ) ने कभी भी औरत के शासन को स्वीकार नहीं किया |उन्होने रज़िया के खिलाफ विद्रोह किया जब उसने अपने पसंदीदा याक़ूत को अस्तबलों का संचालक नियुक्त कर दिया | याक़ूत अबिसीनियल था जिसने तुर्क-अफ़गान वंशों में ईर्ष्या जगाई |

विद्रोही मुखियों को  भटिंडा के राजपाल, मलिक अल्तुनीय का साथ मिला | जल्दी ही दो विद्रोही दलों के बीच में युद्ध हुआ जिसमे याक़ूत मारा गया और रज़िया को बंदी बना लिया गया |

रज़िया ने अल्तुनीय से विवाह किया और दोनों ने मिलकर दिल्ली सल्तनत को वापिस पाना चाहा जिस पर रज़िया के भाई मुईज़ुद्दीन बहराम शाह ने कब्जा कर रखा था | हालांकि, रज़िया और उसका शौहर हार गए और उन्हे वहाँ से भागने के लिए मजबूर कर दिया गया | कैथल की तरफ भागने के दौरान जाटों ने इन्हे पकड़ लिया और इनकी  हत्या कर दी |  

मुईज़ुद्दीन बहराम ने दो साल के लिए  शासन किया जो कि हत्याओं और धोखेबाज़ी से भरा था | बाद में उसकी सेना ने ही उसकी हत्या कर दी | परिणाम स्वरूप  इस काल ने दिल्ली सल्तनत के सिंहासन पर कुछ कठपुतली राजाओं को बैठे देखा  |

नसीर-उद-दीन महमूद , इल्तुत्मिश के सबसे छोटे पुत्र ने 1246 से 1266 तक शासन किया, जिसे तुर्क अधिकारी बलबन ने काम मे सहायता की | बाद में बलबन नसीर-उद-दीन महमूद का उत्तराधिकारी बना |

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...