पाषाड़ काल, भारतीय इतिहास

पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण काल के विषय में स्मरणीय तथ्य

भारतीय विद्वान् अनुमानतः कहते हैं कि लगभग 5 लाख वर्ष ई.पू. के आसपास यह देश मानव का निवास स्थान बना. चूँकि इस युग के लोग अपनी सभी आवश्यकताओं को केवल पाषाण (पत्थर) के उपकरणों की सहायता से ही पूरा करते थे इसलिए इस युग को पाषाण युग कहते हैं. अब तक जितने भी प्रमाण प्राप्त हुए हैं, उनके आधार पर 5 लाख ई.पू. से 2500 ई. तक के काल को भारतीय मानव की प्रगति का प्रागैतिहासिक युग माना जाता है. इस पाषाण काल को विद्वानों ने निम्न तीन भागों में (भारतीय मानव द्वारा प्रयोग किये गए पाषाण उपकरणों और जीवन पद्धति में समय-समय पर आये परिवर्तनों के आधार पर) विभाजित किया है -

पुरापाषाण (Paleolithic Age)

आरम्भ में माना जाता था कि पृथ्वी ईश्वर द्वारा बनाई गई है. परन्तु, वैज्ञानिकों ने इस धारणा को बदला. पहले मानव बन्दर की तरह झुककर हाथ और पैर दोनों से चलता था. बाद में वह सीधे खड़े होकर आज शाहरुख खान जैसे चलने लगा. दोनों हाथों के free हो जाने से वह इनसे अनेक काम करने लगा. बाद में तो मस्तिष्क से सोचने का काम करने लगा और आज विज्ञान हमारे सामने है.

  1. जिस समय आरंभिक मानव पत्थर का प्रयोग करता था, उस समय को पुरातत्त्वविदों ने पुरापाषाण काल नाम दिया है.
  2. यह शब्द प्राचीन और पाषाण (पत्थर) से बना है.
  3. यह वह कल था जब मनुष्य ने पत्थरों का प्रयोग सबसे अधिक किया.
  4. पुरातत्त्वविदों के अनुसार, पुरापाषाण काल की अवधि बीस लाख साल पूर्व से बारह हजार साल पहले तक है.
  5. इस युग को तीन भागों में बाँटा गया है - आरंभिक, मध्य और उत्तर पुरापाषाण युग.
  6. माना जाता है कि मनुष्य इस युग में सबसे अधिक दिनों तक रहा है.
  7. इस युग में मनुष्य खेती नहीं करता था बल्कि पत्थरों का प्रयोग कर शिकार करता था.
  8. इस युग में लोग गुफाओं में रहते थे.
  9. इस युग में सबसे महत्त्वपूर्ण काम जो मानव ने सीखा, वह था आग को जलाना. आग का उपयोग विभिन्न कार्यों के लिए होने लगा.
  10. दक्षिण भारत में कुरनूल की गुफाओं में इस युग की राख के अवशेष प्राप्त हुए हैं.
  11. पुरातत्त्वविदों ने पुणे-नासिक क्षेत्र, कर्नाटक के हुँस्गी-क्षेत्र, आंध्र प्रदेश के कुरनूल-क्षेत्र में इस युग के स्थलों की खोज की है. इन क्षेत्रों में कई नदियाँ हैं, जैसे - ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा भीमा, वर्धा आदि. इन स्थानों में चूनापत्थर से बने अनेक पुरापाषाण औजार (weapons) मिले हैं.
  12. नदियों के कारण इन स्थलों के जलवायु में नमी रहती है. यहाँ गैंडा और जंगली बैल के अनेक कंकाल मिले हैं. इससे अनुमान लगाया गया है कि इन क्षेत्रों में इस युग में आज की तुलना में अधिक वर्षा होती होगी. ऐसा अनुमान इस आधार पर लगाया है कि गैंडा और जंगली बैल नमीवाले स्थानों में रहना पसंद करते हैं.
  13. अनुमान लगाया जाता है कि इस युग का अंत होते-होते जलवायु में परिवर्तन होने लगा. धीरे-धीरे इन क्षेत्रों के तापमान में वृद्धि हुई.
  14. इस युग का मनुष्य चित्रकारी करता था जिसका प्रमाण उन गुफाओं से मिलता है जहाँ वह रहता था.

पुरापाषाण काल लगभग एक लाख वर्ष तक रहा. उसके बाद मध्यपाषाण या मेसोलिथिक युग (Mesolithic Age) आया. बदले हुए युग में कई परिवर्तन हुए. जीवनशैली में बदलाव आया. तापमान में भी वृद्धि हुई. साथ-साथ पशु और वनस्पति में भी बदलाव आये. इस युग को मध्यपाषण युग (Mesolithic Age) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह युग पुरापाषाण युग और नवपाषाण युग के बीच का काल है. भारत में इस युग का आरम्भ 8000 ई.पू. से माना जाता है. यह काल लगभग 4000 ई.पू. के आस-पास उच्च पुरापाषाण युग का अंत हो गया और जलवायु उष्ण और शुष्क हो गया. परिणामस्वरूप बहुत सारे मौसमी जलस्रोत सूख गए होंगे और बहुत सारे जीव-जन्तु दक्षिण अथवा पूर्व की ओर प्रवास कर गए होंगे, जहाँ कम से कम मौसमी वर्षा के कारण लाभकारी और उपयुक्त घनी वनस्पति बनी रह सकती थी. जलवायु में परिवर्तनों के साथ-साथ वनस्पति व जीव-जन्तुओं में भी परिवर्तन हुए और मानव के लिए नए क्षेत्रों की ओर आगे बढ़ना संभव हुआ.

  1. तापमान में बदलाव आया. गर्मी बढ़ी. गर्मी बढ़ने के कारण जौ, गेहूँ, धान जैसी फसलें उगने लगीं.
  2. इस समय के लोग भी गुफाओं में रहते थे.
  3. पुरातत्त्वविदों को कई स्थलों से मेसोलिथिक युग के अवशेष मिले हैं.
  4. पश्चिम, मध्य भारत और मैसूर (कर्नाटक) में इस युग की कई गुफाएँ मिलीं हैं.
  5. मध्यपाषाण युग में लोग मुख्य रूप से पशुपालक थे. मनुष्यों ने इन पशुओं को चारा खिलाकर पालतू बनाया. इस प्रकार मध्यपाषाण काल में मनुष्य पशुपालक बना.
  6. इस युग में मनुष्य खेती के साथ-साथ मछली पकड़ना, शहद जमा करना, शिकार करना आदि कार्य करता था.

नवपाषाण काल (Neolithic Age)

मध्यपाषाण काल के बाद नवपाषाण युग में मनुष्य के जीवन में बहुत अधिक परिवर्तन आया. इस युग में वह भोजन का उत्पादक हो गया अर्थात् उसे कृषि पद्धति का अच्छा ज्ञान हो गया. यह पाषाणयुग की तीसरी और अंतिम कड़ी है. भारत में 4,000 ई.पू. से यह यह शुरू हुआ और संभवतः 2500 ई.पू. तक चलता रहा. इस युग में मनुष्य का मस्तिष्क अधिक विकसित हो चुका था. उसने अपने बौद्धिक विकास, अनुभव, परम्परा और स्मृति का लाभ उठाकर अपने पूर्व काल के औजारों व हथियारों को काफी सुधार लिया. दक्षिण भारत और पूर्व भारत में अनेक स्थलों पर इस संस्कृति के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं. दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के दक्षिण में ये साक्ष्य मिले हैं. इस युग में भारतीय मानव ने ग्रेनाइट की पहाड़ियों अथवा नदी तट के समीप बस्तियाँ स्थापित की थीं. पूर्वी भारत में गंगा, सोन, गंडक और घाघरा नदियों के डेल्टाओं में मानव रहता था.

  1. उसे पता लग गया कि बीज से वनस्पति बनता है. वह बीज बोने लगा.
  2. बीज बोने के साथ-साथ उसने सिंचाई करना भी सीखा.
  3. वह अनाज के पकने पर उसकी कटाई कर उसका भंडारण करना सीख गया.
  4. नवपाषाण काल (Neolithic Age) में मनुष्य कृषक और पशुपालक दोनों था.
  5. कई स्थलों पर इस युग के अनाज के दानें मिलें हैं. इन दानों से पता लगता है कि उस समय कई फसलें उगाई जाती थीं.
  6. उत्तर -पश्चिम में मेहरगढ़ (पाकिस्तान में), गुफकराल और बुर्जहोम (कश्मीर में), कोल्डिहवा और महागढ़ा (उत्तर प्रदेश में), चिरांद (बिहार में), हल्लूर और पैय्य्मपल्ली (आंध्र प्रदेश में) गेहूँ, जौ, चावल, ज्वार-बाजरा, दलहन, काला चना और हरा चना जैसी फसलें उगाने के प्रमाण मिले हैं.
  7. इस युग में मनुष्य कृषिकार्य के कारण एक स्थान पर स्थाई रूप से रहना शुरू कर दिया. कहीं-कहीं झोपड़ियों और घरों के अवशेष मिले हैं.
  8. बुर्जहोम में गड्ढे को घर बनाकर रहने के साक्ष्य मिले हैं. ऐसे घर को गर्तवास का नाम दिया गया.
  9. मेहरगढ़ में कई घरों के अवशेष मिले हैं, जो चौकोर और आयतकार हैं.
  10. नवपाषाण युग में कृषक और पशुपालक एक साथ एक स्थान पर छोटी-छोटी बस्तियाँ बनाकर रहने लगे.
  11. परिवारों के समूह ने जनजाति को जन्म दिया. जन्मजाति के सदस्यों को आयु, बुद्धिमत्ता और शारीरिक बल के आधार पर कार्य दिया जाता था.
  12. ज्येष्ठ और बलशाली पुरुष को जनजाति का सरदार बनाया जाता था.
  13. नवपाषाण काल (Neolithic Age) में जनजातियों की अपनी संस्कृति और परम्पराएँ होती थीं. भाषा, संगीत, चित्रकारी (Language, music, painting etc.) आदि से इनकी संस्कृति का ज्ञान होता है.
  14. इस काल में लोग जल, सूर्य, आकाश, पृथ्वी, गाय और सर्प की पूजा (worship) विशेष रूप से करते थे.
  15. इस काल में बने मिट्टी के बरतन कई स्थलों से प्राप्त हुए हैं. इन बरतनों पर रंग लगाकर और चित्र बनाकर उन्हें आकर्षक बनाने का प्रयास करते थे.

महर्षि वेद व्यास जी का लिखा 18 पुराण

पुराण - 18 Purana का संक्षिप्त विवरण in Hindi

प्राचीन संस्कृत-साहित्य में पुराण-साहित्य बहुत विशाल और गौरवमय है. वेदों के बाद पुराणों की ही मान्यता है. पुराणों को एक प्रकार से भारतीय सभ्यता, संस्कृति, राजनीति, भूगोल, इतिहास आदि का विश्वकोष कहा जा सकता है. चलिए जानते हैं पुराणों के बारे में. पुराणों के कितने भाग थे और उनकी संख्या कितनी थी. purana के 18 भागों की संक्षिप्त चर्चा भी हम करेंगे. उपपुराण क्या है, ये भी जानेंगे in Hindi.

रचनाकाल

पुराणों की रचना काल विवादास्पद है. यद्यपि इनकी रचना छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व से ही आरम्भ हो गई थी, तथापि गुप्त-युग में परिवर्धित और सम्बंधित होकर वर्त्तमान रूप में आ चुके थे.

पुराण : संख्या

भारतीय परम्पराओं के अनुसार purana की संख्या 18 है. पुराणों को दो भागों में बाँटा जा सकता है -

  • महापुराण
  • उपपुराण

महापुराणों की संख्या 18 है और उपपुराण भी 18 हैं.

महापुराण

महापुराण तीन भागों में बाँटे गए हैं -

  1. सात्विक पुराण - सात्विक पुराणों का सम्बन्ध विष्णु से है.
  2. राजस पुराण - राजस पुराणों का ब्रह्मा से है और
  3. तामस पुराण - तामस पुराणों का सम्बन्ध शिव से है.

18 महापुराण 

सात्विक महापुराण

  1. विष्णु purana
  2. भागवत purana
  3. नारद purana
  4. गरुड़ पुराण
  5. पदम पुराण
  6. वराह पुराण

राजस पुराण

  1. ब्रह्म पुराण
  2. ब्रह्मांड पुराण
  3. ब्रह्मवैवर्त पुराण
  4. मार्कण्डेयपुराण
  5. भविष्य पुराण
  6. वामन पुराण

तामस पुराण

  1. वायु पुराण
  2. लिंग पुराण
  3. स्कन्द पुराण
  4. अग्नि purana
  5. मत्स्य purana
  6. कूर्म purana

इन 18 पुराणों के अतिरिक्त 18 उपपुराण लिखे गए थे. इनकी दो सूचियां दी गईं. प्रथम और द्वितीय.

18 उपपुराण

आचार्य बलदेव उपाध्याय ने गरुड़ purana के आधार पर उपपुराणों की जो सूची दी है वह है -

  1. सनत्कुमार
  2. नरसिंह
  3. कपिल
  4. कालिका
  5. साम्ब
  6. पराशर
  7. महेश्वर
  8. सौर
  9. नारदीय
  10. शिव
  11. दुर्वासा
  12. मानव
  13. अनुशासन
  14. वरुण
  15. भसिष्ठा
  16. देवी-भागवत
  17. नंदी
  18. आदित्य

महत्त्वपूर्ण पुराणों का संक्षिप्त विवरण

विष्णु पुराण

इसमें विष्णु को अवतार मानकर उनकी उपासना की गई है.  प्रमाणिकता और प्राचीनता की दृष्टि से यह सबसे प्रमुख है. यह वैष्णव दर्शन का प्रतिपादन पुराण है. इसमें छः अंश (खंड), 126 अध्याय और 23 हजार श्लोक हैं.

श्रीमद् भागवत् पुराण

भागवत् पुराण वैष्णवों का सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय puranaa है. वे इसे पंचम वेद मानते हैं. इसमें विष्णु के अवतारों का विस्तृत वर्णन है. दसवें अध्याय में कृष्ण की रास लीलाओं का विस्तृत वर्णन होते हुए भी राधा का नाम कहीं नहीं आया. इसमें सांख्यदर्शन के प्रवर्तक कपिल और महात्मा बुद्ध को भी विष्णु अवतार माना गया है. इसमें 12 स्कन्ध और 18 हजार श्लोक हैं.

नारद पुराण

इसे बृहद् नारदीय भी कहते हैं. इसके दो भागों में क्रमशः 125 और 82 अध्याय और 25 हजार श्लोक हैं. इसके पूर्व भाग में वर्णाश्रम के आचार, श्राद्ध, प्रायश्चित, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष आदि का वर्णन है. इस वैष्णव purana का स्थान विश्वकोषात्मक पुराणों में अआता है. इसमें वैष्णवों के व्रतों और उत्सवों का वर्णन है. विष्णु भक्ति को ही मोक्ष का एकमात्र उपाय बतलाया गया है.

गरुड़ पुराण

इस पुराण में विष्णु ने गरुड़ को विश्व की सृष्टि बताई थी. इसमें दो खंड, 287 अध्याय और 18 हजार श्लोक हैं. पूर्वखंड में विष्णु के अवतारों का माहात्म्य है. इस purana का उत्तर-खंड प्रेतकल्प कहलाता है, जिसमें 45 अध्याय हैं. इसमें गर्भावस्था, नरक, यमनगर का मार्ग, प्रेतगण का वासस्थान, प्रेत-लक्षण और प्रेतयोनि से मुक्त, प्रेतों का रूप, मनुष्यों की आयु, यमलोक का विस्तार, सपिण्डीकरण की विधि, वृषोत्सर्ग विधान आदि का रोचक और विस्तृत वर्णन है. श्राद्ध के समय इस पुराण का पाठ किया जाता है.

पद्म पुराण

इसमें राधा का कृष्ण की प्रेयसी के रूप में उल्लेख है. मुख्य रूप से विष्णुपरक होते हुए भी यह purana ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीनों देवताओं में एकत्व की भावना स्थापित करना है. इस विशालकाय puranaa में 50 हजार श्लोक हैं.

वराह पुराण

इसमें 218 अध्याय व 24 हजार श्लोक हैं. इसमें विष्णु द्वारा वराह का रूप धारण कर पृथ्वी का उद्धार किये जाने का वर्णन है.

पुराण-विवरण

कुल पुरानों में 40,000 श्लोक हैं. पुराणों में विष्णु, वायु, मत्स्य और भागवत में ऐतिहासक वृत्त,, राजाओं की वंशावली आदि के रूप में बहुत कुछ मिलता है. विष्णु purana में सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर कलियुग के मौर्यवंश और गुप्तवंश तक का वर्णन मिलता है. पुराणों का उद्देश्य पुरानी कथाओं द्वारा उपदेश देना, देवमहिमा और तीर्थमहिमा का बखानकर जनसाधारण के हृदय में धर्म पर अडिग भावना बनाए रखना ही था.

पल्लव रियासत औऱ साम्राज्य, यादव वंश

पल्लव कौन थे? पल्लव वंश के शासक और उनकी उपलब्धियाँ

पल्लव कौन थे? प्रायः इसके बारे में कहा जाता है कि ये लोग स्थानीय कबीलाई थे. पल्लव का अर्थ होता है 'लता” और यह तमिल शब्द 'टोंडाई” का रूपांतरण है जिसका अर्थ भी लता होता है. इसलिए इन्हें मूलतः लताओं के प्रदेश का निवासी कहा जाता है. कुछ इतिहासकार उन्हें विदेशी-पहलव मानते हैं. इस मत का समर्थन करते हुए वे कहते हैं कि 'यह बात इससे सिद्ध होती है कि जब नन्दिवर्मन द्वितीय को सिंहासनारूढ़ होने के लिए चुना गया तो उसे हाथी की खोपड़ी के आकार का ताज दिया गया जो हिंदू-यूनानी राजा विभित्रयस के ताज की याद दिलाता है.” वस्तुतः वे विदेशी पहलाव (पार्थियन) के वंशज नहीं थे बल्कि मूलतः स्थानीय कबीलाई थे. सत्ता में आने से पहले इस वंश का संस्थापक बप्पदेव (Bappadevan) सातवाहन राजा के अधीन एक प्रांतीय शासक था. सातवाहनों की सत्ता का जब विघटन हो रहा था तभी वह स्वतंत्र शासक बन गया और धीरे-धीरे काँची की ओर अपनी सत्ता का विस्तार करने लगा. उनकी सत्ता के अधीन धीरे-धीरे आंध्रपथ (आंध्र प्रदेश) और तोंडैमंडलम दोनों  ही थे. उन्होंने अपनी राजधानी काँची बनायी, जो पल्लव शासन काल में वैदिक विद्या और मंदिरों का नगर बन गया. इनका उदय तीसरी या चौथी शताब्दी में शुरू हुआ. बप्पदेव के काल में प्राकृत भाषा फलीफूली. उसने जंगलों को काटकर और सिंचाई की सुविधाएँ देकर कृषि की प्रगति में योगदान दिया. उसके बाद उसी का पुत्र शिवस्कंदवर्मन उसका उत्तराधिकारी बना. उसने धर्म महाराज की उपाधि ग्रहण की और अश्वमेघ और वाजपेय जैसे यग्य कराये. उसके बाद का पल्लव वंश का इतिहास बहुत वर्षों तक अन्धकारमय है.

प्रयाग प्रशस्ति (समुद्रगुप्तकालीन) से पता चलता है कि समुद्रगुप्त दक्षिण अभियान के समय कांची में पल्लव नरेश विष्णुगोप शासन कर रहा था. पल्लव का प्रभाव शायद 575 ई. तक कम रहा. संभवतः वे वास्तविक साम्राज्यवादी शक्ति 575 ई.के आस-पास बने. इसलिए (काशाक्कुदि और बैलूर पालैयम से मिले) प्राप्त ताम्रपत्रों में उनकी वंश तालिका सिंह विष्णु से शुरू होती है (575-600 ई.) और अपराजित (879-897 ई.) के शासन काल से समाप्त होती है.

पल्लव शासक और उनकी उपलब्धियाँ

सिंहविष्णु (575-600 ई.)

उसके (Simhavishnu) सिंहासन पर बैठते ही पल्लव इतिहास का नया अध्याय शुरू हुआ क्योंकि उसने अपनी कई विजय यात्रायें आरम्भ की और पल्लव शक्ति का प्रभाव सम्पूर्ण तमिल प्रदेश में पूर्णतया छाता गया. उसने चोलों मलय, कलभ्रो, मालव, पांड्य और चेरों को पराजित किया. उसने अपने राज्य की सीमा को कावेरी नदी तक बढ़ा दिया.

महेंद्र वर्मन (600-630 ई.)

उसके (Mahendravarman I) काल में जहाँ एक ओर धर्म और साहित्य की प्रगति हुई तो दूसरी ओर पल्लवों के चालुक्यों और पांड्यों से ऐसे युद्ध शुरू हुए जो लगभग 150 वर्षों तक जारी रहे. वह सर्वगुण सम्पन्न व्यक्ति था इसलिए उसने मत्त विल्गस, विचित्र चित्त और गुणाभार आदि उपाधियाँ धारण की थी. यद्यपि उसके काल में चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय ने वेंगी पर अधिकार कर लिया था लेकिन वह कांची पर जब आक्रमण करने आया तो महेंद्रवर्मन ने उसे बुरी तरह पराजित किया.

नरसिंह वर्मन प्रथम (630-668 ई.)

वह (Narasimhavarman I) अपने पिता महेंद्र वर्मन की मृत्यु के बाद शासक बना. उसने चालुक्यों की राजधानी बादामी को जीता. उसने इस विजय के बाद ही 'महामल्ल” की उपाधि धारण की. संभवतः उसी के साथ युद्ध करते हुए चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय मारा गया. उसने अपने मित्र लंका के राजकुमार मणिवम्भ (मानववर्मन) लंका का राज्य दिलाने में सहायता प्रदान की. कुर्रम दानपत्र के अनुसार उसने चोल, पांड्य और केरल राज्यों को पराजित किया.

महेंद्र वर्मन द्वितीय (668-670 ई.)

नरसिंह वर्मन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र महेंद्र वर्मन द्वितीय (Mahendravarman II) राजा बना. उसने चालुक्य नरेश विक्रमादित्य को पराजित किया. वह शीघ्र ही मर गया.

परमेश्वर वर्मन प्रथम (670-680 ई.)

महेंद्र वर्मन द्वित्तीय के पश्चात परमेश्वर वर्मन शासक हुआ. उसके शासन काल में पल्लवों और चालुक्यों में भयंकर संघर्ष पुनः छिड़ गया. उसने चालुक्य नरेश विक्रमादित्य की लाखों की सेना को इतनी बुरी तरह से पराजित किया कि शत्रु राजा को तार-तार हुए कपड़ों में युद्ध क्षेत्र से भागना पड़ा. परन्तु विक्रमादित्य द्वित्तीय के अभिलेखों में पल्लव राजा परमेश्वरवर्मन की पराजय का उल्लेख मिलता है. विद्वानों की राय है कि संभवतः पहले चालुक्यों को और बाद में पल्लवों को एक-दूसरे के विरुद्ध सफलता मिली.

नरसिंह वर्मन द्वितीय (680 ई. -720 ई.)

परमेश्वर वर्मन प्रथम के बाद उसका पुत्र नरसिंह वर्मन द्वितीय 7वीं शताब्दी के अंत में राजा हुआ. उसने 'राजसिंह” और 'आगमप्रिय” (विद्या-प्रेमी) जैसी वीरता और विद्यानुराग सूचक उपाधियाँ ग्रहण की. उसके राज्यकाल में शांति रही.

परमेश्वर वर्मन द्वितीय (720-731 ई.)

नरसिंहवर्मन द्वितीय के उपरान्त उसका पुत्र परमेश्वर वर्मन द्वितीय (Paramesvaravarman II) राजा बना. उसके शासन काल में चालुक्य युवराज विक्रमादित्य ने गंग - राजकुमार एरेयप्प की मदद से कांची पर आक्रमण कर दिया और इस युद्ध में परमेश्वरवर्मन पराजित हुआ. अपनी इस पराजय का बदला लेने के लिए उसने गंग नरेश श्रीपुरुष पर आक्रमण किया. इस युद्ध में वह पुनः पराजित हुआ और मारा गया.

नंदिवर्मन द्वितीय (731-795 ई.)

परमेश्वरवर्मन द्वितीय के कोई सन्तान नहीं थी. इसलिए उसकी मृत्यु के बाद सिंहासन के लिए भीषण संघर्ष शुरू हो गए, जो पल्लवों के भावी पतन के द्योतक थे. दूसरे राजकुमार चित्रमाय को पांड्य नरेश मारवर्मन नरसिंह प्रथम का समर्थन मिला था. लेकिन जन-सहयोग और सेनापति उदयचन्द्र के सहयोग से नन्दिवर्मन द्वितीय (Narasimhavarman II) शासक बना. इसके समय में चालुक्यों, राष्ट्रकूटों, पांड्य और चोल राजाओं से बराबर युद्ध होता रहा. विक्रमादित्य द्वितीय चालुक्य ने इसके शासनकाल में कांची पर आक्रमण किया, पर नन्दिवर्मन ने इसे हरा दिया. पर कालांतर में नन्दिवर्मन राष्ट्रकूट दन्तिदुर्ग से पराजित हो गया. संभवतः 757 ई. में राष्ट्रकूटों ने पल्लवों का आधिपत्य समाप्त कर दिया.

दिल्ली का मुसलमान राज्य, गुलाम वंश

दिल्ली सल्तनत : गुलाम वंश का शासन (1206A . D. -1290 A . D .)

कुतब-उद-दीन ऐबक, मुहम्मद गौरी के सिपाहसालार के साथ उसका ग़ुलाम भी था | कुतब -उद-दीन ऐबक का जन्म मध्य एशिया के तुर्की परिवार में हुआ था और उसे बचपन में ही ग़ुलाम के तौर पर बेच दिया गया था | सुल्तान मुहम्मद गौरी के राजपाल होने के कारण कुतब-उद-दीन ने बनारस को 1194 A D में बर्खास्त कर दिया | इसने अजमेर के राजा को भी हराया | इसने ग्वालियर पर विजय प्राप्त करने के बाद राजा सोलंखोल से ज़बरदस्ती शुल्क अदा करवाया | इसके अलावा, इसने गुजरात के राज्यों पर भी विजय हासिल की |

इल्तुत्मिश, कुतब-उद-दीन ऐबक ( 1206-11) का उत्तराधिकारी बना जिसके बाद रज़िया (1236-40) और बलबन (1265-85) ने राजभार संभाला | कुतब-उद-दीन ऐबक ने क़ुतुब मीनार की नींव रखी परंतु इल्तुत्मिश ने इसे पूरा कराया था | चौगान खेलने के दौरान अपने घोड़े से गिरने के कारण कुतब-उद-दीन की मृत्यु हो गई |

1206 A D  में मुहम्मद गौरी की हत्या के बाद, कुतब-उद-दीन ऐबक भारत का सुल्तान बन गया और  ममेलुक वंश या दास वंश परंपरा की नींव रखी |1206 A D में इसे मुहम्मद गौरी के द्वारा नैब-उस-सल्तनत ( गौरी के भारतीय साम्राज्य के राजपाल ) के तौर पर नियुक्त कर दिया |

कुतब-उद-दीन ऐबक से जुड़े कुछ मुख्य तथ्य निम्न हैं:

  • इसने सिर्फ 4 साल के किए शासन किया | चौघन खेलने के दौरान 2010 में इसकी मृत्यु हो गई |
  • कुतब-उद-दीन दिल्ली सल्तनत का प्रथम शासक था |
  • वह अय्बक जाति का तुर्क था |
  • दयालु होने के कारण इसे सुल्तान “लाख बक्ष” भी कहा गया |
  • कुतब-उद-दीन ऐबक को कुतुब मीनार की नींव रखने का श्रेय जाता है जिसका नाम सूफी संत ख्वाजा कुतब –उद-दीन बख्तियार काकी के ऊपर रखा गया था |
  • इसने क़ुतुब अल इस्लाम मस्जिद का भी कार्यभार संभाला |
  • इसके दामाद इल्तुत्मिश ने इसकी मृत्यु के बाद कार्यभार संभाला |
  • कुतब-उद-दीन ऐबक का किला पाकिस्तान के लाहौर में है |

इल्तुत्मिश  :

यह इल्लाबरी जाति का तुर्क था | वह ऐबक का दामाद था और ऐबक की मृत्यु के बाद दिल्ली का अगला सुल्तान बना | उसके नाम से दिल्ली के निकट महरौली में हौज़-इ-शमशि नामक इमारत है | इसने क़ुतुब मीनार का कार्य पूरा कराया जिसे इसके पूर्वजों ने आरंभ किया था |

इल्तुत्मिश ने दिल्ली सल्तनत में इक्ता प्रणाली की भी शुरुआत की जिसमे खेती पर कर की प्रथा थी | इक्ता प्रणाली के अंतर्गत, एक अधिकारी को राज्य से तनख्वा के बदले  में राजस्व कर का अनुदान दिया जाता था |हालांकि, इक्ता प्रणाली वंशानुगत नहीं थी | इक्ता प्रणाली ने सल्तनत के दूर के भागों को केंद्र सरकार से जोड़ दिया था |

चांदी टांका और ताँबा जीटल की शुरुआत का श्रेय भी इल्तुत्मिश को जाता है | चाँदी टांके का वज़न 175 इकाई था |

इल्तुत्मिश के शासन के दौरान चेंगेज़ खान के नेतृत्व में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण किया | परंतु उन्होने जल्द ही भारत को छोड़ दिया और मुल्तान, सिंध और क़बचा की तरफ चले गए |

इल्तुत्मिश के देहांत के बाद रज़िया दिल्ली सल्तनत की सुल्तान बन गई | परंतु यह इसके लिए आसान नहीं था | सुल्तान बनने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि इल्तुत्मिश ने अपने सभी पुत्रों को अवगुणता पाई और रज़िया राजगद्दी को संभालने के लिए प्रत्येक रूप से उपयुक्त थी | इसलिए, इल्तुत्मिश ने रज़िया को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया | परंतु छिहल्गनी या मुख्य चालीस तुर्कियों ने इल्तुत्मिश की अंतिम इच्छा का विरोध किया और उसके पुत्र रुक्नउद दीन फिरूज़ को राजगद्दी पर बैठा दिया |

रुक्न उद दीन फिरूज़ अयोग्य था और अपने ही इंद्रिय आनंदों में ज्यादा व्यस्त हो गया तथा राज्य के मसले अव्यवस्थित हो गए | 7 महीनो के अंदर ही रुक्न उद दीन फिरूज़ की  हत्या कर दी गई | 1236 A D  में रज़िया ने  रुक्न उद दीन के बाद पदभार संभाला | रज़िया ने 1240 तक साड़े तीन साल तक शासन किया | यद्यपि, एक अच्छे शासक के सभी गुण रज़िया में मौजूद दे परंतु छिहल्गनी ( 40 तुर्की अधिकारियों का दल ) ने कभी भी औरत के शासन को स्वीकार नहीं किया |उन्होने रज़िया के खिलाफ विद्रोह किया जब उसने अपने पसंदीदा याक़ूत को अस्तबलों का संचालक नियुक्त कर दिया | याक़ूत अबिसीनियल था जिसने तुर्क-अफ़गान वंशों में ईर्ष्या जगाई |

विद्रोही मुखियों को  भटिंडा के राजपाल, मलिक अल्तुनीय का साथ मिला | जल्दी ही दो विद्रोही दलों के बीच में युद्ध हुआ जिसमे याक़ूत मारा गया और रज़िया को बंदी बना लिया गया |

रज़िया ने अल्तुनीय से विवाह किया और दोनों ने मिलकर दिल्ली सल्तनत को वापिस पाना चाहा जिस पर रज़िया के भाई मुईज़ुद्दीन बहराम शाह ने कब्जा कर रखा था | हालांकि, रज़िया और उसका शौहर हार गए और उन्हे वहाँ से भागने के लिए मजबूर कर दिया गया | कैथल की तरफ भागने के दौरान जाटों ने इन्हे पकड़ लिया और इनकी  हत्या कर दी |  

मुईज़ुद्दीन बहराम ने दो साल के लिए  शासन किया जो कि हत्याओं और धोखेबाज़ी से भरा था | बाद में उसकी सेना ने ही उसकी हत्या कर दी | परिणाम स्वरूप  इस काल ने दिल्ली सल्तनत के सिंहासन पर कुछ कठपुतली राजाओं को बैठे देखा  |

नसीर-उद-दीन महमूद , इल्तुत्मिश के सबसे छोटे पुत्र ने 1246 से 1266 तक शासन किया, जिसे तुर्क अधिकारी बलबन ने काम मे सहायता की | बाद में बलबन नसीर-उद-दीन महमूद का उत्तराधिकारी बना |

मुस्लिम लुटेरे, और तराइन की लड़ाई

तराइन की लड़ाई

सांकेतिक शब्द : तराइन की लड़ाई , तराइन की प्रथम लड़ाई , तराइन की दूसरी लड़ाई , तराइन का युद्ध

प्रधान भाग : राजपूतों द्वारा लड़ा गया पहला युद्ध तराइन की लड़ाई (1191 AD )  थी |इस युद्ध में चौहान राजवंश के पृथ्वी राज ने मुहम्मद गौरी को हरियाणा में थानेश्वर के निकट तराइन में पराजित कर दिया था | तराइन की दूसरी लड़ाई (1192 AD ) भी तराइन में ही लड़ी गई जिसमे मुहम्मद गौरी के द्वारा पृथ्वीराज को पराजित किया गया |

मुहम्मद गौरी कौन था ?

गौरी, गजनी के अधीन थे परंतु महमूद गजनी की मृत्यु के बाद उन्होने अपने आप को स्वाधीन घोषित कर दिया | मुईज़्ज़ुद्दीन मुहम्मद जिसे मुहम्मद गौरी के नाम से जाना जाता था, ने गज़्नाविद साम्राज्य के पतन के बाद गजनी को अपने नियंत्रण में कर लिया था | गजनी में अपना स्थान मजबूत और सुरक्षित करके मुहम्मद गौरी ने भारत पर ध्यान केन्द्रित किया और गजनी के महमूद की तरह भारत को जीतना चाहा था |

1175AD  में मुहम्मद गौरी ने मुल्तान  और  पूरे सिंध पर कब्जा कर लिया | 1186 में इसने पंजाब पर हमला किया और खुसरु मलिक से कब्ज़ा छीन लिया | उसके बाद इसने चौहान राज्य पर हमला किया |

तराइन की पहली लड़ाई (1191 AD)

पृथ्वीराज चौहान ने 1191 AD में दिल्ली के निकट तराइन की लड़ाई में गौरी को हरा दिया | इस हार का बदला लेने के लिए गौरी एक बड़ी सेना के साथ पेशावर और मुल्तान से होते हुए लाहौर आया और पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण कर दिया | चौहान ने बड़ी सेना एकत्रित की जिसमे 3,00,000 घोड़े, 3000 हाथी और पैदल सैनिकों की बड़ी फौज थी, कई हिन्दु राजा और प्रमुख भी उनके साथ जुड़ गए |   

तराइन की दूसरी लड़ाई (1192 AD)

1192 AD में तराइन की दूसरी लड़ाई में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज की सेना को बखूबी ढंग से पराजित किया | पृथ्वीराज को बंदी बना लिया और हत्या कर दी |

1206 में मुहम्मद गौरी की हत्या से पहले तुर्क ने गंगा यमुना दोआब और इसके पास के पड़ोसी क्षेत्रों बंगाल और बिहार को भी जीत लिया | तराइन की लड़ाई ने भारत के इतिहास में एक नए युग को जन्म दिया जैसे दास परंपरा  की शुरुआत  हुई |

तराइन की लड़ाई के प्रभाव

• राजपूतों की राजनीतिक प्रतिष्ठा को झटका लगा |
• भारत में पहला मुस्लिम राज्य की स्थापना हुई थी |
• मुहम्मद गौरी के प्रतिनिधि कुतब –उद-दीन ऐबक (1206-11) ने भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना की |
• भारत के जोखिम को भांपते हुए दूसरे विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत पर आक्रमण किया |

जैन धर्म में सम्प्रदाय

जैन साहित्य - Jain Literature Brief Info in Hindi

जैन साहित्य के प्रकार

जैन साहित्य (Jain literature) को मुख्यतः छः भागों में बाँटा जा सकता है -

  1. द्वादश अंग
  2. द्वादश उपांग
  3. दस प्रकीर्ण
  4. षट् छेद सूत्र
  5. चार मूल सूत्र
  6. विवध

द्वादश अंग

पहला अंग आचारंग सुत्त (आचारंग सूत्र)

इसमें उन नियमों का वर्णन है, जिन्हें जैन भिक्षुओं को अपनाना चाहिए. जैन भिक्षुओं को किस प्रकार तपस्या करनी चाहिए, किस प्रकार जीव रक्षा के लिए तत्पर रहना चाहिए, इत्यादि बातों का इसमें विस्तृत वर्णन किया गया है.

सूत्र कृदंग (सूत्र कृयाड़्क)

इसमें जैन भिन्न मतों की व्याख्या की गई है और जैन धर्म पर जो आक्षेप किए जा सकते हैं उनका उत्थान करके उचित उत्तर दिया गया है, जिससे भिक्षु अपने मत का भली-भांति पक्ष पोषण कर सके.

स्थानांग

इसमें जैन धर्म के सिद्धांतों का वर्णन किया गया है.

समवायांग

इसमें भी जैन धर्म के सिद्धांत हैं.

भगवती सूत्र

यह जैन धर्म का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है. इसमें जैन धर्म के सिद्धांतों के अतिरिक्त स्वर्ग और नरक के विषय में विस्तृत वर्णन किया गया है.

ज्ञान धर्म कथा

इसमें कथा, आख्यायिका और पहेली आदि द्वारा जैन धर्म के सिद्धांतों का उपदेश दिया गया है.

उवासंग दशाएँ (उपासक दशा)

इसमें दस समृद्ध व्यापारियों की कथा है जिन्होंने जैन धर्म स्वीकार कर मोक्ष को प्राप्त किया.

अंतः कृदृशाः

इसमें उन जैन भिक्षुओं का वर्णन है जिन्होंने विविध प्रकार की तपस्याओं द्वारा अपने शरीर का अंत कर दिया और इस प्रकार मोक्ष पद को प्राप्त किया.

अनुत्तरोपपादिक दशः

इसमें भी तपस्या द्वारा शरीर का अंत करने वाले भिक्षुओं का वर्णन है.

प्रश्न व्याकरण

इसमें जैन धर्म की दस शिक्षाओं और दस-निषेध आदि का वर्णन है.

विपाक श्रुतम

इस जन्म में किए गए अच्छे और बुरे कर्मों का मृत्यु के बाद किस प्रकार फल मिलता है, इस बात को इस अंग में कथाओं द्वारा प्रदर्शित किया गया है.

दृष्टिवाद

यह अंग इस समय अप्राप्य है. जैन लोग दृष्टिवाद में चौदह 'पूर्वाः” का परिगणन करते हैं. ये संस्कृत के पुरानों की तरह बहुत प्राचीन समय से विकसित हो रहे थे.

द्वादश उपांग

प्रत्येक अंग का एक-एक उपांग है, इनके नाम इस प्रकार हैं -

  1. औपपातिक
  2. राज प्रश्नीय
  3. जीवाभिगम्
  4. प्रज्ञापना
  5. जम्बू द्वीप प्रज्ञाप्ति
  6. चन्द्र प्रज्ञाप्ति
  7. सूर्य प्रज्ञाप्ति
  8. निरयावली
  9. कल्पावतशिका
  10. पुष्थिका
  11. पुष्प चूलिका
  12. वृष्णि दशाः

दश प्रकीर्ण:

इसमें जैन धर्म संबंधी विषयों का वर्णन है, जिनके नाम इस प्रकार हैं -

  1. चतु: शरण प्रकीर्ण
  2. संस्तारक प्रकीर्ण
  3. आतुर प्रत्याख्यानम्
  4. भक्ता परिज्ञा
  5. तंदुल वैचारिका
  6. चन्द्र वैद्यक
  7. गणि विद्य
  8. देवेन्द्र स्तव
  9. वीर स्तव
  10. महा-प्रत्याख्यान

षट छेद सूत्र

इन सूत्रों में जैन भिक्षु आर भिक्षुणियों के लिए विविध नियमों का वर्णन किया गया है. ये निम्नलिखित हैं -

  1. व्यावहार सूत्र
  2. वृहत कह्ल सूत्र
  3. दशा श्रुत स्कन्ध सूत्र
  4. निशीथ सूत्र
  5. महानिशीथ सूत्र
  6. जित कल्प सूत्र

चार मूल सूत्र

इनके नाम निम्नलिखित हैं -

  1. उत्तराध्यवन सूत्र
  2. दस वैकालिक सूत्र
  3. आवश्यक सूत्र
  4. ओकनिर्युक्ति सूत्र

विविध

नंदि सूत्र (Nandi Sutra)और अनुयोग द्वार सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं. यह विश्वकोष के जैसा है. इन धर्म ग्रन्थों पर अनेक टीकाएँ हुई हैं, जिनमें सबसे प्राचीन टीकाएँ निर्युक्ति कहलाती हैं. जैन टीकाकारों में सबसे प्रसिद्ध हरि-भद्र स्वामी हुआ. इसके अतिरिक्त शान्ति सूरी, देवेन्द्र गणी और अभय देव नाम के टीकाकारों ने भी महत्वपूर्ण भाष्य और टीकाएँ लिखीं. प्रायः सभी जैन धर्म के ग्रन्थ प्राकृत भाषा में हैं. जैन प्राकृत, आर्य अथवा अर्ध मागधी के नाम से प्रसिद्ध है.

जैनों के जिस धार्मिक साहित्य (Jain Sahitya) का ऊपर वर्णन किया गया है वह श्वेताम्बर सम्प्रदाय के हैं. दिगंबर सम्प्रदाय के धार्मिक ग्रन्थ अभी बहुत कम संख्या में मुद्रित हुए हैं. इसलिए उनका परिचय दे सकना संभव नहीं है.

जैन धर्म का इतिहास

जैन धर्म का इतिहास, नियम, उपदेश और सिद्धांत

जैन धर्म - 24 तीर्थंकर

जैन धर्म और बौद्ध धर्म  में बड़ी समानता है. किन्तु अब यह साबित हो चुका है कि बौद्ध धर्म की तुलना में जैन धर्म अधिक प्राचीन है. जैनों का मानना है कि हमारे 24 तीर्थंकर हो चुके हैं जिनके द्वारा जैन धर्म की उत्पत्ति और विकास हुआ. क्या आपको पता है कि जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर का नाम क्या है? यदि आप परीक्षा की तैयारी अच्छे से कर रहे हो तो आपको इसका जवाब मालूम होगा. उनका नाम है - पार्श्वनाथ. उनका जन्म ईसा के पूर्व 8वीं शताब्दी में हुआ. पार्श्वनाथ एक क्षत्रिय थे. उनके मुख्य सिद्धांत थे - सदैव सच बोलना, अहिंसा, चोरी न करना और धन का त्याग कर देना.

24 तीर्थंकर के नाम और उनके चिन्ह 

1. श्री ऋषभनाथ- बैल
2. श्री अजितनाथ- हाथी
3. श्री संभवनाथ- अश्व (घोड़ा)
4. श्री अभिनंदननाथ- बंदर
5. श्री सुमतिनाथ- चकवा
6. श्री पद्मप्रभ- कमल
7. श्री सुपार्श्वनाथ- साथिया (स्वस्तिक)
8. श्री चन्द्रप्रभ- चन्द्रमा
9. श्री पुष्पदंत- मगर
10. श्री शीतलनाथ- कल्पवृक्ष
11. श्री श्रेयांसनाथ- गैंडा
12. श्री वासुपूज्य- भैंसा
13. श्री विमलनाथ- शूकर
14. श्री अनंतनाथ- सेही
15. श्री धर्मनाथ- वज्रदंड,
16. श्री शांतिनाथ- मृग (हिरण)
17. श्री कुंथुनाथ- बकरा
18. श्री अरहनाथ- मछली
19. श्री मल्लिनाथ- कलश
20. श्री मुनिस्रुव्रतनाथ- कच्छप (कछुआ)
21. श्री नमिनाथ- नीलकमल
22. श्री नेमिनाथ- शंख
23. श्री पार्श्वनाथ- सर्प
24. श्री महावीर- सिंह

महावीर स्वामी

परन्तु जैन धर्म के मूलप्रवर्त्तक के विषय में यदि बात की जाए तो महावीर स्वामी का नाम सामने आता है. इनका जन्म 540 ई.पू. के आस-पास हुआ था. इनके बचपन का नाम वर्धमान था. वह लिच्छवी वंश के थे. वैशाली (जो आज बिहार के हाजीपुर जिले में है) में उनका साम्राज्य था. गौतम बुद्ध (गौतम बुद्ध << के बारे में पढ़ें) की ही तरह राजकुमार वर्धमान ने राजपाट छोड़ दिया और 30 वर्ष की अवस्था में कहीं दूर जा कर 12 वर्ष की कठोर तपस्या की. इस पूरी अवधि के दौरान वे अहिंसा के पथ से भटके नहीं और खान-पान में भी बहुत संयम से काम लिया. सच कहा जाए तो राजकुमार वर्धमान ने अपनी इन्द्रियों को सम्पूर्ण रूप से वश में कर लिया था. 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद, 13वें वर्ष में उनको महावीर और जिन (विजयी) के नाम से जाना जाने लगा. उन्हें परम ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी थी.

महावीर स्वामी जैन परम्परा के 24वें तीर्थंकर कहलाए. उनके उपदेशों में कोई नई बात नहीं दिखती. पार्श्वनाथ की चार प्रतिज्ञाओं में उन्होंने एक पाँचवी प्रतिज्ञा और शामिल कर दी और वह थी - पवित्रता से जीवन बिताना. उनके शिष्य नग्न घूमते थे इसलिए वे निर्ग्रन्थ कहलाये. बुद्ध की भाँति ही महावीर स्वामी ने शरीर और मन की पवित्रता, अहिंसा और मोक्ष को जीवन का अंतिम उद्देश्य माना. पर उनका मोक्ष बुद्ध के निर्वाण से भिन्न है. आत्मा का परमात्मा से मिल जाना ही जैन धर्म में मोक्ष माना जाता है. जबकि बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म से मुक्ति ही निर्वाण है. लगभग 30 वर्षों तक महावीर स्वामी ने इन्हीं सिद्धांतों का प्रचार किया और 72 वर्ष की आयु में उन्होंने राजगीर के निकट पावापुरी नामक स्थान में अपना शरीर त्याग दिया.

महावीर के उपदेश

महावीर कहते थे कि जो भी जैन निर्वाण को प्राप्त करना चाहता है उसको स्वयं के आचरण, ज्ञान और विश्वास को शुद्ध करना चाहिए और पाँच प्रतिज्ञाओं का पालन अवश्य करना चाहिये. जैन धर्म में तप की बहुत महिमा है. उपवास को भी एक तप के रूप में देखा गया है. कोई भी मनुष्य बिना ध्यान, अनशन और तप किये  अन्दर से शुद्ध नहीं हो सकता. यदि वह स्वयं की आत्मा की मुक्ति चाहता है तो उसे ध्यान, अनशन और तप करना ही होगा. महावीर ने पूर्ण अहिंसा पर जोर दिया और तब से ही 'अहिंसा परमो धर्मः” जैन धर्म में एक प्रधान सिद्धांत माना जाने लगा.

दिगंबर और श्वेताम्बर

300 ई.पू. के लगभग जैन धर्म दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया - दिगंबर और श्वेताम्बर. दिगम्बर नग्न मूर्ति की उपासना करते हैं और श्वेताम्बर अपनी मूर्तियों को श्वेत वस्त्र पहनाते हैं. 2011 के census के अनुसार भारत में जैन धर्म के अनुयायी 44 लाख 51 हजार हैं. इन्हें धनी और समृद्ध वर्ग में गिना जाता है. जैन धर्म के लोग अधिकांश व्यापारी वर्ग के हैं. जैन धर्म का प्रचार सब लोगों के बीच नहीं हुआ क्योंकि इसके नियम कठिन थे. राजाओं ने जैन धर्म को अपनाया और उनका प्रचार भी किया. अधिकांश वैश्य वर्गों ने जैन धर्म को अपनाया. जैन धर्म के अनुयायियों में बड़े-बड़े विद्वान् महात्मा भी शामिल हुए हैं.

भारतीय जैन धर्म

जैन तीर्थंकरों के बारे में कुछ तथ्य - Jainism

List of Jain Tirthankara

ऋषनाथ या आदिनाथ

पिता - अयोध्या नरेश

माता - मरूदेवी

पत्नी - सुनंदा और सुमंगला

उनका जन्म अयोध्या में हुआ. ऋषभ की मूर्तियाँ सर्वथम कुषानकाल में निर्मित मूर्ति मथुरा और चौसा से प्राप्त हुए हैं. कैलाश पर निर्वाण प्राप्त किया.

अजितनाथ

पिता - महाराज जितशत्रु

माता - विजय देवी

12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद अजित को अयोध्या में कैवल्य प्राप्त हुआ. अजितनाथ की प्रारम्भिकतम मूर्ति वाराणसी से मिली है.

संभवनाथ

पिता - श्रावस्ती के शासक जितारि

माता - सेना देवी या सुषेर्णा

दीक्षा के बाद श्रावस्ती में उन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ.

अभिनंदन

पिता - महाराजा संवर

माता - सिद्धार्था

10वीं शती ई. से पहले की अभिनंदन की एक भी मूर्ति नहीं मिली है. इनकी स्वतंत्र मूर्तियाँ केवल देवगढ़, खजुराहो और नवमुनि और बारभुजी गुफाओं से मिली है.

सुमतिनाथ

पिता - अयोध्या के शासक मेघ या मेघप्रभ

माता - मंगला

20 वर्षों की कठिन तपश्चर्या के  पश्चात् इन्हें कैवल्प प्राप्त हुआ. 10वीं शती ई. से पूर्व की सुमतिनाथ की कोई मूर्ति नहीं मिली है.

पद्मप्रभ

पिता - कौशाम्बी के शासक धर या धरण

माता - देवी सुशीला

कौशाम्बी के वन में कैवल्य प्राप्त हुआ. 10वीं शती ई. से पूर्व की पद्मप्रभ की एक भी मूर्ति नहीं मिली है. पद्मप्रभ की मूर्तियाँ केवल खुजराहो, छतरपुर, देवगढ़, ग्वालियर, कुम्भारिया और बारभुजी गुफा से मिली हैं.

सुपार्श्वनाथ

पिता - वाराणसी के शासक प्रतिष्ठ

माता - पृथ्वी देवी

वाराणसी के वन में वृक्ष के नीचे केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था. मूर्तियों में सुपार्श्वनाथ की पहचान मुख्य रूप से एक, पाँच या नौ सर्पफणों के छत्र के आधार पर की गई  है. अधिकांश उदाहरणों में तीर्थंकर के सर पर पांच सर्पफणों का छत्र ही दिखाया गया है. सुपार्श्वनाथ की सर्वाधिक मूर्तियाँ उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में शहडोल, मथुरा, देवगढ़ और खजुराहो से मिली हैं. इस क्षेत्र में पाँच सर्पफणों के छत्र से शोभित सुपार्श्वनाथ को सामान्यतः कार्योत्सर्ग में दिखाया गया है.

चन्द्रप्रभ

पिता - चन्द्रपुरी के शासक महासेन

माता - लक्ष्मणा या लक्ष्मी देवी

दीक्षा के बाद कठिन तपस्या द्वारा चन्द्रपुरी के वन में चन्द्रप्रभ को कैवल्य प्राप्त हुआ.

सुविधिनाथ (या पुषपदंत)

पिता - सुग्रीव

माता - वामदेवी

दीक्षा के बाद काकन्दी वन में इन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ.

शीतलनाथ

पिता - महाराज दृढ़रथ

माता - नंदादेवी

श्रेयांशनाथ

पिता - विष्णु

माता - विष्णुदेवी

वासुपूज्य 

पिता - वासुपूज्य

माता - जाया या विजय

विमलनाथ

पिता - कृतवर्मा

माता - श्यामा

अनंतनाथ 

पिता - सिंहसेन

माता - सुयशा

धर्मनाथ

पिता - भानु

माता - सुव्रता

शांति

पिता - हस्तिनापुर के शास विश्वसेन

माता - अचिरा

एक वर्ष की कठिन तपस्या के बाद कैवल्य प्राप्त किया.

कुन्थुनाथ

पिता - वसु या सूर्यसेन

माता - श्रीदेवी

अरनाथ

पिता - सुदर्शन

माता - महादेवी

तीन वर्षों की तपस्या के बाद आम्रवृक्ष के नीचे इन्हें कैवल्य प्राप्त हुआ.

मल्लिनाथ

पिता - मिथला के शासक कुम्भ

माता - प्रभावती

श्वेताम्बर परम्परा के अनुसार मल्लिनाथ नारी तीर्थंकर थीं, किन्तु दिगम्बर परम्परा में इन्हें पुरुष तीर्थंकर ही माना गया है. 11 वीं शताब्दी की उन्नाव से प्राप्त एक श्वेताम्बर मूर्ति राज्य संग्रहालय, लखनऊ में संगृहीत है. यह मल्लि की नारी मूर्ति है जिसमें वक्ष स्थल का उभार नारीवक्ष के समान है और केश-रचना भी वेणी के रूप में संवारी गई है. नारी के रूप में मल्लि के रूपायन का यह अकेला उदाहरण है. दिगम्बर परम्परा की कुछ मूर्तियाँ सतना, बारभुजी और त्रिशूल गुफाओं से मिली हैं.

मुनिसुव्रत

पिता - राजगृह के शासक सुमित्र

माता - पद्मावती

नमिनाथ 

पिता - विजय

माता - वपा

नेमिनाथ (या अरिष्टनेमि)

पिता - महाराज समुद्रविजय

माता - शिवा देवी

समुद्रविजय के अनुज वसुदेव थे जिनकी दो पत्नियों रोहिणी और देवकी से क्रमशः बलराम और कृष्ण उत्पन्न हुए. इस प्रकार कृष्ण और बलराम नेमिनाथ के चचेरे भाई थे. गिरनार पर निर्वाण उपलब्ध किया.

पार्श्वनाथ

पिता - वाराणसी के महाराज अश्वसेन

माता - वामा

पार्श्वनाथ जिस समय तपस्या में लीन थे तो उसी समय उनके पूर्वजन्म के वैरी मेघमाली (या कमठ) नाम के असुर ने उनकी तपस्या में तरह-तरह के विघ्न डाले. मेघमाली ने भयंकर वृष्टि द्वारा जब पार्श्वनाथ को जल में डुबो देना चाहा और वर्षा का जल पार्श्व की नासिका तक पहुँच गया. तब उनकी रक्षा के लिए नागराज धरणेंद्र नागदेवी पद्मावती के साथ वहाँ उपस्थित हुए. धरणेंद्र ने तीर्थंकर को अपनी कुंडलियों पर उठा लिया और उनके पूरे शारीर को ढंकते हुए सर के ऊपर सात सर्पफणों की छाया की थी. जैन ग्रन्थों में पार्श्वनाथ के सर पर तीन, सात या ग्यारह सर्पफणों का छत्र दिखाए जाने का उल्लेख मिलता है. इसी कारण कभी-कभी पार्श्वनाथ के सर पर तीन और 11 सर्पफणों का छत्र भी दिखाया जाता है.

महावीर 

पिता - सिद्धार्थ

माता - त्रिशला

पाव में निर्वाण उपलब्ध किया.

भारतीय जनपद

जनपद और महाजनपद

जनपद वैदिक भारत के प्रमुख राज्य थे | 6ठी सदी BC तक लगभग 22 विभिन्न जनपद थे |

जनपद और महाजनपद से जुड़े प्रमुख बिन्दु निम्न हैं :

  • जनपद वैदिक भारत के प्रमुख राज्य थे |
  • आर्यन सबसे प्रभावशाली जाति थी और ये अपने आप को ‘जन’ कहते थे  | इसने एक नई परिभाषा दी ‘जनपद’ जिसमे जन का मतलब ‘लोग’ और पद का मतलब ‘चरण’ था |
  • उत्तर प्रदेश और बिहार के भागों में लोहे के विकास के साथ, जनपद ओर ज़्यादा ताकतवर हो गए और महा जनपद में तब्दील हो गए |
  • छठी सदी BCE में, महाजनपद या महान देश के विकास में वृद्धि हुई | 600 BC से 325 BC के दौरान  भारत के उपमहाद्वीपों में इस तरह के 16 महाजनपद थे | राज्य दो प्रकार के थे : एकतांत्रिक और गणतांत्रिक | मल्ला, वज्जि, कम्बोज और कुरु गणतांत्रिक राज्य थे जबकि मगध, कोशल, वत्स, अवन्ती, अंग, काशी, गांधार, शूरसेना, चेदि  और मत्स्य स्वभाव से एकतांत्रिक थे |

600 BC से  325 BC  के दौरान 16 महाजनपद थे जिनका उल्लेख आरंभिक बौद्ध साहित्य (अंगुत्तरा, निकाया, महावस्तु ) और जैन साहित्य (भगवती सुत्त )में किया गया है, वे 16 महाजनपद निम्न थे :

क्रम संख्यामहाजनपद का नामराजधानीस्थान
1.अंगचंपाबिहार में मुंगेर और भागलपुर के आधुनिक जिलों को शामिल करना
2.मगधपहले राजगृह, बाद में पाटलीपुत्रपटना और गया के आधुनिक जिलों और शाहबाद के कुछ हिस्सों को समाविष्ट किया
3.मल्लाकुशिनारा  और पावा में राजधानी होनादेवरिया, बस्ती, गोरखपुर, और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सिद्धार्थनगर के आधुनिक जिलों को समाविष्ट किया
4.वज्जिवैशालीबिहार में गंगा नदी के उत्तर में स्थित था
5.कोशलश्रावस्तिवर्तमान के फ़रीदाबाद, गोंडा, पूर्वी उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले को समाविष्ट किया
6.काशीवाराणसीवाराणसी (आधुनिक बनारस ) के आसपास के क्षेत्रों में  स्थित था
7.चेदिशुक्तिमतिवर्तमान के बुंदेलखंड प्रांत को समाविष्ट किया
8.कुरुइंद्रप्रस्थआधुनिक हरियाणा और दिल्ली को समाविष्ट किया
9.वत्सकौशांभीआधुनिक  ज़िले इलाहाबाद और मिर्ज़ापुर को समाविष्ट किया
10.पांचालअहिछात्र (उत्तर पांचाल) और कंपिल्या (दक्षिण पांचाल)वर्तमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों से यमुना नदी के पूर्व से कोशल जनपद तक को समाविष्ट किया
11.मत्स्यविराटनगरराजस्थान में अलवर, भरतपुर और जयपुर के क्षेत्रों को समाविष्ट किया
12.शूरसेनामथुरामथुरा के आसपास के क्षेत्रों को समाविष्ट किया
13.अवन्तीउज्जयिनी और महिष्मतीपश्चिमी भारत को समाविष्ट किया
14.आष्मकपोटानाभारत के दक्षिणी हिस्से में नर्मदा और गोदावरी  नदियों के बीच स्थित था
15.कम्बोजआधुनिक कश्मीर के राजपुरा में राजधानीहिंदकुश (पाकिस्तान का आधुनिक हाज़रा ज़िला ) को समाविष्ट किया
16.गांधारतक्षिलापाकिस्तान के पश्चिमी भाग और पूर्वी अफ़्गानिस्तान को समाविष्ट किया

निष्कर्ष:

इन सभी में मगध, वत्स, अवन्ती और कोशल सबसे विशिष्ट थे | इन चारों में से मगध सबसे शक्तिशाली राज्य की तरह उभरा | मगध की जीत के कारण निम्न थे :

1) अच्छे लोहे की भारी उपलब्धता जिसका इस्तेमाल हथियार बनाने के लिए किया जाता था |

2) इसके स्थान का अच्छे और उपजाऊ गंगा के मैदान में होना |

3) हाथियों का सैन्य युद्ध में पड़ोसी देशों के खिलाफ इस्तेमाल करना |

 

वेद का वेदांग

छह वेदांग और उनका संक्षिप्त परिचय - Vedanga in Hindi

वेदांग के प्रकार

ये छह हैं -

  1. शिक्षा
  2. कल्प
  3. व्याकरण
  4. निरुक्त
  5. छंदस्
  6. ज्योतिष

शिक्षा

इस Vedanga में वेड के शुद्धपाठ के नियम सम्मिलित हैं. 'शिक्षा” वेदांग को हम ध्वनियों के शुद्ध उच्चारण की शिक्षा का प्राचीनतम शास्त्र कह सकते हैं. 'ऋक्प्रातिशाख्य” आदि अनेक प्रातिशाख्य-ग्रन्थ और 'पाणिनीयशिक्षा” आदि अनेक शिक्षा-ग्रन्थ और शिक्षा-वेदांग में परिगणित होते हैं.

कल्प

Kalpa Vedanga का सम्बन्ध वैदिक यज्ञों के विधि-विधान से है. कौन-सा यज्ञ कैसे किया जाए, इसी का नाम कल्प है. कल्प नाम के वेदांग में चार प्रकार के ग्रन्थ हैं, जो सूत्रशैली में रचित के कारण 'कल्पसूत्र” नाम से प्रसिद्ध हैं. कल्पसूत्र के चार प्रकार हैं -

  1. श्रोतसूत्र, जिनमें 'श्रुति” अर्थात् कहे गए बड़े-बड़े यज्ञों की विधियाँ मिलती हैं.
  2. गृह्यसूत्र, जिनमें गृह अर्थात् घरों में होने वाले यज्ञों की विधियाँ मिलती हैं.
  3. धर्मसूत्र, जिनमें व्यक्ति और समाक के आधार-व्यवहार के नियम मिलते हैं.
  4. शुल्वसूत्र, जिनमें यज्ञ की वेदी बनाने की विधि और नाम दी गयी है.

व्याकरण

Vyakarana Vedanga में वेदों में आये शब्दों और पदों की व्युत्पत्ति दी गई है और अनेक शुद्ध रूप को स्पष्ट किया गया है. इस वेदांग का प्रमुख ग्रन्थ 'पाणिनि” की 'अष्टाध्यायी” है.

निरुक्त

Nirukta Vedanga में वेड में आये कुछ कठिन पदों (शब्दों) का निर्वाचन किया गया है, जो वेद का अर्थज्ञान कराने में सहायक हैं. 'यास्क का निरुक्त” इस वेदांग का एकमात्र प्रतिनिधि ग्रन्थ है.

छन्दस्

Chanda Vedanga में वैदिक ऋचाओं में प्रयुक्त गायत्री, अनुष्टप् और जगती आदि छंदों का विवेचन किया गया है.

ज्योतिष

Jyotish Vedanga में यज्ञादि, वेदविहित कार्यों को करने के लिए उचित समय, मुहूर्त आदि का विचार किया गया है.

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...