मुस्लिम लुटेरे, और तराइन की लड़ाई

तराइन की लड़ाई

सांकेतिक शब्द : तराइन की लड़ाई , तराइन की प्रथम लड़ाई , तराइन की दूसरी लड़ाई , तराइन का युद्ध

प्रधान भाग : राजपूतों द्वारा लड़ा गया पहला युद्ध तराइन की लड़ाई (1191 AD )  थी |इस युद्ध में चौहान राजवंश के पृथ्वी राज ने मुहम्मद गौरी को हरियाणा में थानेश्वर के निकट तराइन में पराजित कर दिया था | तराइन की दूसरी लड़ाई (1192 AD ) भी तराइन में ही लड़ी गई जिसमे मुहम्मद गौरी के द्वारा पृथ्वीराज को पराजित किया गया |

मुहम्मद गौरी कौन था ?

गौरी, गजनी के अधीन थे परंतु महमूद गजनी की मृत्यु के बाद उन्होने अपने आप को स्वाधीन घोषित कर दिया | मुईज़्ज़ुद्दीन मुहम्मद जिसे मुहम्मद गौरी के नाम से जाना जाता था, ने गज़्नाविद साम्राज्य के पतन के बाद गजनी को अपने नियंत्रण में कर लिया था | गजनी में अपना स्थान मजबूत और सुरक्षित करके मुहम्मद गौरी ने भारत पर ध्यान केन्द्रित किया और गजनी के महमूद की तरह भारत को जीतना चाहा था |

1175AD  में मुहम्मद गौरी ने मुल्तान  और  पूरे सिंध पर कब्जा कर लिया | 1186 में इसने पंजाब पर हमला किया और खुसरु मलिक से कब्ज़ा छीन लिया | उसके बाद इसने चौहान राज्य पर हमला किया |

तराइन की पहली लड़ाई (1191 AD)

पृथ्वीराज चौहान ने 1191 AD में दिल्ली के निकट तराइन की लड़ाई में गौरी को हरा दिया | इस हार का बदला लेने के लिए गौरी एक बड़ी सेना के साथ पेशावर और मुल्तान से होते हुए लाहौर आया और पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण कर दिया | चौहान ने बड़ी सेना एकत्रित की जिसमे 3,00,000 घोड़े, 3000 हाथी और पैदल सैनिकों की बड़ी फौज थी, कई हिन्दु राजा और प्रमुख भी उनके साथ जुड़ गए |   

तराइन की दूसरी लड़ाई (1192 AD)

1192 AD में तराइन की दूसरी लड़ाई में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज की सेना को बखूबी ढंग से पराजित किया | पृथ्वीराज को बंदी बना लिया और हत्या कर दी |

1206 में मुहम्मद गौरी की हत्या से पहले तुर्क ने गंगा यमुना दोआब और इसके पास के पड़ोसी क्षेत्रों बंगाल और बिहार को भी जीत लिया | तराइन की लड़ाई ने भारत के इतिहास में एक नए युग को जन्म दिया जैसे दास परंपरा  की शुरुआत  हुई |

तराइन की लड़ाई के प्रभाव

• राजपूतों की राजनीतिक प्रतिष्ठा को झटका लगा |
• भारत में पहला मुस्लिम राज्य की स्थापना हुई थी |
• मुहम्मद गौरी के प्रतिनिधि कुतब –उद-दीन ऐबक (1206-11) ने भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना की |
• भारत के जोखिम को भांपते हुए दूसरे विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत पर आक्रमण किया |

जैन धर्म में सम्प्रदाय

जैन साहित्य - Jain Literature Brief Info in Hindi

जैन साहित्य के प्रकार

जैन साहित्य (Jain literature) को मुख्यतः छः भागों में बाँटा जा सकता है -

  1. द्वादश अंग
  2. द्वादश उपांग
  3. दस प्रकीर्ण
  4. षट् छेद सूत्र
  5. चार मूल सूत्र
  6. विवध

द्वादश अंग

पहला अंग आचारंग सुत्त (आचारंग सूत्र)

इसमें उन नियमों का वर्णन है, जिन्हें जैन भिक्षुओं को अपनाना चाहिए. जैन भिक्षुओं को किस प्रकार तपस्या करनी चाहिए, किस प्रकार जीव रक्षा के लिए तत्पर रहना चाहिए, इत्यादि बातों का इसमें विस्तृत वर्णन किया गया है.

सूत्र कृदंग (सूत्र कृयाड़्क)

इसमें जैन भिन्न मतों की व्याख्या की गई है और जैन धर्म पर जो आक्षेप किए जा सकते हैं उनका उत्थान करके उचित उत्तर दिया गया है, जिससे भिक्षु अपने मत का भली-भांति पक्ष पोषण कर सके.

स्थानांग

इसमें जैन धर्म के सिद्धांतों का वर्णन किया गया है.

समवायांग

इसमें भी जैन धर्म के सिद्धांत हैं.

भगवती सूत्र

यह जैन धर्म का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है. इसमें जैन धर्म के सिद्धांतों के अतिरिक्त स्वर्ग और नरक के विषय में विस्तृत वर्णन किया गया है.

ज्ञान धर्म कथा

इसमें कथा, आख्यायिका और पहेली आदि द्वारा जैन धर्म के सिद्धांतों का उपदेश दिया गया है.

उवासंग दशाएँ (उपासक दशा)

इसमें दस समृद्ध व्यापारियों की कथा है जिन्होंने जैन धर्म स्वीकार कर मोक्ष को प्राप्त किया.

अंतः कृदृशाः

इसमें उन जैन भिक्षुओं का वर्णन है जिन्होंने विविध प्रकार की तपस्याओं द्वारा अपने शरीर का अंत कर दिया और इस प्रकार मोक्ष पद को प्राप्त किया.

अनुत्तरोपपादिक दशः

इसमें भी तपस्या द्वारा शरीर का अंत करने वाले भिक्षुओं का वर्णन है.

प्रश्न व्याकरण

इसमें जैन धर्म की दस शिक्षाओं और दस-निषेध आदि का वर्णन है.

विपाक श्रुतम

इस जन्म में किए गए अच्छे और बुरे कर्मों का मृत्यु के बाद किस प्रकार फल मिलता है, इस बात को इस अंग में कथाओं द्वारा प्रदर्शित किया गया है.

दृष्टिवाद

यह अंग इस समय अप्राप्य है. जैन लोग दृष्टिवाद में चौदह 'पूर्वाः” का परिगणन करते हैं. ये संस्कृत के पुरानों की तरह बहुत प्राचीन समय से विकसित हो रहे थे.

द्वादश उपांग

प्रत्येक अंग का एक-एक उपांग है, इनके नाम इस प्रकार हैं -

  1. औपपातिक
  2. राज प्रश्नीय
  3. जीवाभिगम्
  4. प्रज्ञापना
  5. जम्बू द्वीप प्रज्ञाप्ति
  6. चन्द्र प्रज्ञाप्ति
  7. सूर्य प्रज्ञाप्ति
  8. निरयावली
  9. कल्पावतशिका
  10. पुष्थिका
  11. पुष्प चूलिका
  12. वृष्णि दशाः

दश प्रकीर्ण:

इसमें जैन धर्म संबंधी विषयों का वर्णन है, जिनके नाम इस प्रकार हैं -

  1. चतु: शरण प्रकीर्ण
  2. संस्तारक प्रकीर्ण
  3. आतुर प्रत्याख्यानम्
  4. भक्ता परिज्ञा
  5. तंदुल वैचारिका
  6. चन्द्र वैद्यक
  7. गणि विद्य
  8. देवेन्द्र स्तव
  9. वीर स्तव
  10. महा-प्रत्याख्यान

षट छेद सूत्र

इन सूत्रों में जैन भिक्षु आर भिक्षुणियों के लिए विविध नियमों का वर्णन किया गया है. ये निम्नलिखित हैं -

  1. व्यावहार सूत्र
  2. वृहत कह्ल सूत्र
  3. दशा श्रुत स्कन्ध सूत्र
  4. निशीथ सूत्र
  5. महानिशीथ सूत्र
  6. जित कल्प सूत्र

चार मूल सूत्र

इनके नाम निम्नलिखित हैं -

  1. उत्तराध्यवन सूत्र
  2. दस वैकालिक सूत्र
  3. आवश्यक सूत्र
  4. ओकनिर्युक्ति सूत्र

विविध

नंदि सूत्र (Nandi Sutra)और अनुयोग द्वार सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं. यह विश्वकोष के जैसा है. इन धर्म ग्रन्थों पर अनेक टीकाएँ हुई हैं, जिनमें सबसे प्राचीन टीकाएँ निर्युक्ति कहलाती हैं. जैन टीकाकारों में सबसे प्रसिद्ध हरि-भद्र स्वामी हुआ. इसके अतिरिक्त शान्ति सूरी, देवेन्द्र गणी और अभय देव नाम के टीकाकारों ने भी महत्वपूर्ण भाष्य और टीकाएँ लिखीं. प्रायः सभी जैन धर्म के ग्रन्थ प्राकृत भाषा में हैं. जैन प्राकृत, आर्य अथवा अर्ध मागधी के नाम से प्रसिद्ध है.

जैनों के जिस धार्मिक साहित्य (Jain Sahitya) का ऊपर वर्णन किया गया है वह श्वेताम्बर सम्प्रदाय के हैं. दिगंबर सम्प्रदाय के धार्मिक ग्रन्थ अभी बहुत कम संख्या में मुद्रित हुए हैं. इसलिए उनका परिचय दे सकना संभव नहीं है.

जैन धर्म का इतिहास

जैन धर्म का इतिहास, नियम, उपदेश और सिद्धांत

जैन धर्म - 24 तीर्थंकर

जैन धर्म और बौद्ध धर्म  में बड़ी समानता है. किन्तु अब यह साबित हो चुका है कि बौद्ध धर्म की तुलना में जैन धर्म अधिक प्राचीन है. जैनों का मानना है कि हमारे 24 तीर्थंकर हो चुके हैं जिनके द्वारा जैन धर्म की उत्पत्ति और विकास हुआ. क्या आपको पता है कि जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर का नाम क्या है? यदि आप परीक्षा की तैयारी अच्छे से कर रहे हो तो आपको इसका जवाब मालूम होगा. उनका नाम है - पार्श्वनाथ. उनका जन्म ईसा के पूर्व 8वीं शताब्दी में हुआ. पार्श्वनाथ एक क्षत्रिय थे. उनके मुख्य सिद्धांत थे - सदैव सच बोलना, अहिंसा, चोरी न करना और धन का त्याग कर देना.

24 तीर्थंकर के नाम और उनके चिन्ह 

1. श्री ऋषभनाथ- बैल
2. श्री अजितनाथ- हाथी
3. श्री संभवनाथ- अश्व (घोड़ा)
4. श्री अभिनंदननाथ- बंदर
5. श्री सुमतिनाथ- चकवा
6. श्री पद्मप्रभ- कमल
7. श्री सुपार्श्वनाथ- साथिया (स्वस्तिक)
8. श्री चन्द्रप्रभ- चन्द्रमा
9. श्री पुष्पदंत- मगर
10. श्री शीतलनाथ- कल्पवृक्ष
11. श्री श्रेयांसनाथ- गैंडा
12. श्री वासुपूज्य- भैंसा
13. श्री विमलनाथ- शूकर
14. श्री अनंतनाथ- सेही
15. श्री धर्मनाथ- वज्रदंड,
16. श्री शांतिनाथ- मृग (हिरण)
17. श्री कुंथुनाथ- बकरा
18. श्री अरहनाथ- मछली
19. श्री मल्लिनाथ- कलश
20. श्री मुनिस्रुव्रतनाथ- कच्छप (कछुआ)
21. श्री नमिनाथ- नीलकमल
22. श्री नेमिनाथ- शंख
23. श्री पार्श्वनाथ- सर्प
24. श्री महावीर- सिंह

महावीर स्वामी

परन्तु जैन धर्म के मूलप्रवर्त्तक के विषय में यदि बात की जाए तो महावीर स्वामी का नाम सामने आता है. इनका जन्म 540 ई.पू. के आस-पास हुआ था. इनके बचपन का नाम वर्धमान था. वह लिच्छवी वंश के थे. वैशाली (जो आज बिहार के हाजीपुर जिले में है) में उनका साम्राज्य था. गौतम बुद्ध (गौतम बुद्ध << के बारे में पढ़ें) की ही तरह राजकुमार वर्धमान ने राजपाट छोड़ दिया और 30 वर्ष की अवस्था में कहीं दूर जा कर 12 वर्ष की कठोर तपस्या की. इस पूरी अवधि के दौरान वे अहिंसा के पथ से भटके नहीं और खान-पान में भी बहुत संयम से काम लिया. सच कहा जाए तो राजकुमार वर्धमान ने अपनी इन्द्रियों को सम्पूर्ण रूप से वश में कर लिया था. 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद, 13वें वर्ष में उनको महावीर और जिन (विजयी) के नाम से जाना जाने लगा. उन्हें परम ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी थी.

महावीर स्वामी जैन परम्परा के 24वें तीर्थंकर कहलाए. उनके उपदेशों में कोई नई बात नहीं दिखती. पार्श्वनाथ की चार प्रतिज्ञाओं में उन्होंने एक पाँचवी प्रतिज्ञा और शामिल कर दी और वह थी - पवित्रता से जीवन बिताना. उनके शिष्य नग्न घूमते थे इसलिए वे निर्ग्रन्थ कहलाये. बुद्ध की भाँति ही महावीर स्वामी ने शरीर और मन की पवित्रता, अहिंसा और मोक्ष को जीवन का अंतिम उद्देश्य माना. पर उनका मोक्ष बुद्ध के निर्वाण से भिन्न है. आत्मा का परमात्मा से मिल जाना ही जैन धर्म में मोक्ष माना जाता है. जबकि बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म से मुक्ति ही निर्वाण है. लगभग 30 वर्षों तक महावीर स्वामी ने इन्हीं सिद्धांतों का प्रचार किया और 72 वर्ष की आयु में उन्होंने राजगीर के निकट पावापुरी नामक स्थान में अपना शरीर त्याग दिया.

महावीर के उपदेश

महावीर कहते थे कि जो भी जैन निर्वाण को प्राप्त करना चाहता है उसको स्वयं के आचरण, ज्ञान और विश्वास को शुद्ध करना चाहिए और पाँच प्रतिज्ञाओं का पालन अवश्य करना चाहिये. जैन धर्म में तप की बहुत महिमा है. उपवास को भी एक तप के रूप में देखा गया है. कोई भी मनुष्य बिना ध्यान, अनशन और तप किये  अन्दर से शुद्ध नहीं हो सकता. यदि वह स्वयं की आत्मा की मुक्ति चाहता है तो उसे ध्यान, अनशन और तप करना ही होगा. महावीर ने पूर्ण अहिंसा पर जोर दिया और तब से ही 'अहिंसा परमो धर्मः” जैन धर्म में एक प्रधान सिद्धांत माना जाने लगा.

दिगंबर और श्वेताम्बर

300 ई.पू. के लगभग जैन धर्म दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया - दिगंबर और श्वेताम्बर. दिगम्बर नग्न मूर्ति की उपासना करते हैं और श्वेताम्बर अपनी मूर्तियों को श्वेत वस्त्र पहनाते हैं. 2011 के census के अनुसार भारत में जैन धर्म के अनुयायी 44 लाख 51 हजार हैं. इन्हें धनी और समृद्ध वर्ग में गिना जाता है. जैन धर्म के लोग अधिकांश व्यापारी वर्ग के हैं. जैन धर्म का प्रचार सब लोगों के बीच नहीं हुआ क्योंकि इसके नियम कठिन थे. राजाओं ने जैन धर्म को अपनाया और उनका प्रचार भी किया. अधिकांश वैश्य वर्गों ने जैन धर्म को अपनाया. जैन धर्म के अनुयायियों में बड़े-बड़े विद्वान् महात्मा भी शामिल हुए हैं.

भारतीय जैन धर्म

जैन तीर्थंकरों के बारे में कुछ तथ्य - Jainism

List of Jain Tirthankara

ऋषनाथ या आदिनाथ

पिता - अयोध्या नरेश

माता - मरूदेवी

पत्नी - सुनंदा और सुमंगला

उनका जन्म अयोध्या में हुआ. ऋषभ की मूर्तियाँ सर्वथम कुषानकाल में निर्मित मूर्ति मथुरा और चौसा से प्राप्त हुए हैं. कैलाश पर निर्वाण प्राप्त किया.

अजितनाथ

पिता - महाराज जितशत्रु

माता - विजय देवी

12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद अजित को अयोध्या में कैवल्य प्राप्त हुआ. अजितनाथ की प्रारम्भिकतम मूर्ति वाराणसी से मिली है.

संभवनाथ

पिता - श्रावस्ती के शासक जितारि

माता - सेना देवी या सुषेर्णा

दीक्षा के बाद श्रावस्ती में उन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ.

अभिनंदन

पिता - महाराजा संवर

माता - सिद्धार्था

10वीं शती ई. से पहले की अभिनंदन की एक भी मूर्ति नहीं मिली है. इनकी स्वतंत्र मूर्तियाँ केवल देवगढ़, खजुराहो और नवमुनि और बारभुजी गुफाओं से मिली है.

सुमतिनाथ

पिता - अयोध्या के शासक मेघ या मेघप्रभ

माता - मंगला

20 वर्षों की कठिन तपश्चर्या के  पश्चात् इन्हें कैवल्प प्राप्त हुआ. 10वीं शती ई. से पूर्व की सुमतिनाथ की कोई मूर्ति नहीं मिली है.

पद्मप्रभ

पिता - कौशाम्बी के शासक धर या धरण

माता - देवी सुशीला

कौशाम्बी के वन में कैवल्य प्राप्त हुआ. 10वीं शती ई. से पूर्व की पद्मप्रभ की एक भी मूर्ति नहीं मिली है. पद्मप्रभ की मूर्तियाँ केवल खुजराहो, छतरपुर, देवगढ़, ग्वालियर, कुम्भारिया और बारभुजी गुफा से मिली हैं.

सुपार्श्वनाथ

पिता - वाराणसी के शासक प्रतिष्ठ

माता - पृथ्वी देवी

वाराणसी के वन में वृक्ष के नीचे केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था. मूर्तियों में सुपार्श्वनाथ की पहचान मुख्य रूप से एक, पाँच या नौ सर्पफणों के छत्र के आधार पर की गई  है. अधिकांश उदाहरणों में तीर्थंकर के सर पर पांच सर्पफणों का छत्र ही दिखाया गया है. सुपार्श्वनाथ की सर्वाधिक मूर्तियाँ उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में शहडोल, मथुरा, देवगढ़ और खजुराहो से मिली हैं. इस क्षेत्र में पाँच सर्पफणों के छत्र से शोभित सुपार्श्वनाथ को सामान्यतः कार्योत्सर्ग में दिखाया गया है.

चन्द्रप्रभ

पिता - चन्द्रपुरी के शासक महासेन

माता - लक्ष्मणा या लक्ष्मी देवी

दीक्षा के बाद कठिन तपस्या द्वारा चन्द्रपुरी के वन में चन्द्रप्रभ को कैवल्य प्राप्त हुआ.

सुविधिनाथ (या पुषपदंत)

पिता - सुग्रीव

माता - वामदेवी

दीक्षा के बाद काकन्दी वन में इन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ.

शीतलनाथ

पिता - महाराज दृढ़रथ

माता - नंदादेवी

श्रेयांशनाथ

पिता - विष्णु

माता - विष्णुदेवी

वासुपूज्य 

पिता - वासुपूज्य

माता - जाया या विजय

विमलनाथ

पिता - कृतवर्मा

माता - श्यामा

अनंतनाथ 

पिता - सिंहसेन

माता - सुयशा

धर्मनाथ

पिता - भानु

माता - सुव्रता

शांति

पिता - हस्तिनापुर के शास विश्वसेन

माता - अचिरा

एक वर्ष की कठिन तपस्या के बाद कैवल्य प्राप्त किया.

कुन्थुनाथ

पिता - वसु या सूर्यसेन

माता - श्रीदेवी

अरनाथ

पिता - सुदर्शन

माता - महादेवी

तीन वर्षों की तपस्या के बाद आम्रवृक्ष के नीचे इन्हें कैवल्य प्राप्त हुआ.

मल्लिनाथ

पिता - मिथला के शासक कुम्भ

माता - प्रभावती

श्वेताम्बर परम्परा के अनुसार मल्लिनाथ नारी तीर्थंकर थीं, किन्तु दिगम्बर परम्परा में इन्हें पुरुष तीर्थंकर ही माना गया है. 11 वीं शताब्दी की उन्नाव से प्राप्त एक श्वेताम्बर मूर्ति राज्य संग्रहालय, लखनऊ में संगृहीत है. यह मल्लि की नारी मूर्ति है जिसमें वक्ष स्थल का उभार नारीवक्ष के समान है और केश-रचना भी वेणी के रूप में संवारी गई है. नारी के रूप में मल्लि के रूपायन का यह अकेला उदाहरण है. दिगम्बर परम्परा की कुछ मूर्तियाँ सतना, बारभुजी और त्रिशूल गुफाओं से मिली हैं.

मुनिसुव्रत

पिता - राजगृह के शासक सुमित्र

माता - पद्मावती

नमिनाथ 

पिता - विजय

माता - वपा

नेमिनाथ (या अरिष्टनेमि)

पिता - महाराज समुद्रविजय

माता - शिवा देवी

समुद्रविजय के अनुज वसुदेव थे जिनकी दो पत्नियों रोहिणी और देवकी से क्रमशः बलराम और कृष्ण उत्पन्न हुए. इस प्रकार कृष्ण और बलराम नेमिनाथ के चचेरे भाई थे. गिरनार पर निर्वाण उपलब्ध किया.

पार्श्वनाथ

पिता - वाराणसी के महाराज अश्वसेन

माता - वामा

पार्श्वनाथ जिस समय तपस्या में लीन थे तो उसी समय उनके पूर्वजन्म के वैरी मेघमाली (या कमठ) नाम के असुर ने उनकी तपस्या में तरह-तरह के विघ्न डाले. मेघमाली ने भयंकर वृष्टि द्वारा जब पार्श्वनाथ को जल में डुबो देना चाहा और वर्षा का जल पार्श्व की नासिका तक पहुँच गया. तब उनकी रक्षा के लिए नागराज धरणेंद्र नागदेवी पद्मावती के साथ वहाँ उपस्थित हुए. धरणेंद्र ने तीर्थंकर को अपनी कुंडलियों पर उठा लिया और उनके पूरे शारीर को ढंकते हुए सर के ऊपर सात सर्पफणों की छाया की थी. जैन ग्रन्थों में पार्श्वनाथ के सर पर तीन, सात या ग्यारह सर्पफणों का छत्र दिखाए जाने का उल्लेख मिलता है. इसी कारण कभी-कभी पार्श्वनाथ के सर पर तीन और 11 सर्पफणों का छत्र भी दिखाया जाता है.

महावीर 

पिता - सिद्धार्थ

माता - त्रिशला

पाव में निर्वाण उपलब्ध किया.

भारतीय जनपद

जनपद और महाजनपद

जनपद वैदिक भारत के प्रमुख राज्य थे | 6ठी सदी BC तक लगभग 22 विभिन्न जनपद थे |

जनपद और महाजनपद से जुड़े प्रमुख बिन्दु निम्न हैं :

  • जनपद वैदिक भारत के प्रमुख राज्य थे |
  • आर्यन सबसे प्रभावशाली जाति थी और ये अपने आप को ‘जन’ कहते थे  | इसने एक नई परिभाषा दी ‘जनपद’ जिसमे जन का मतलब ‘लोग’ और पद का मतलब ‘चरण’ था |
  • उत्तर प्रदेश और बिहार के भागों में लोहे के विकास के साथ, जनपद ओर ज़्यादा ताकतवर हो गए और महा जनपद में तब्दील हो गए |
  • छठी सदी BCE में, महाजनपद या महान देश के विकास में वृद्धि हुई | 600 BC से 325 BC के दौरान  भारत के उपमहाद्वीपों में इस तरह के 16 महाजनपद थे | राज्य दो प्रकार के थे : एकतांत्रिक और गणतांत्रिक | मल्ला, वज्जि, कम्बोज और कुरु गणतांत्रिक राज्य थे जबकि मगध, कोशल, वत्स, अवन्ती, अंग, काशी, गांधार, शूरसेना, चेदि  और मत्स्य स्वभाव से एकतांत्रिक थे |

600 BC से  325 BC  के दौरान 16 महाजनपद थे जिनका उल्लेख आरंभिक बौद्ध साहित्य (अंगुत्तरा, निकाया, महावस्तु ) और जैन साहित्य (भगवती सुत्त )में किया गया है, वे 16 महाजनपद निम्न थे :

क्रम संख्यामहाजनपद का नामराजधानीस्थान
1.अंगचंपाबिहार में मुंगेर और भागलपुर के आधुनिक जिलों को शामिल करना
2.मगधपहले राजगृह, बाद में पाटलीपुत्रपटना और गया के आधुनिक जिलों और शाहबाद के कुछ हिस्सों को समाविष्ट किया
3.मल्लाकुशिनारा  और पावा में राजधानी होनादेवरिया, बस्ती, गोरखपुर, और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सिद्धार्थनगर के आधुनिक जिलों को समाविष्ट किया
4.वज्जिवैशालीबिहार में गंगा नदी के उत्तर में स्थित था
5.कोशलश्रावस्तिवर्तमान के फ़रीदाबाद, गोंडा, पूर्वी उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले को समाविष्ट किया
6.काशीवाराणसीवाराणसी (आधुनिक बनारस ) के आसपास के क्षेत्रों में  स्थित था
7.चेदिशुक्तिमतिवर्तमान के बुंदेलखंड प्रांत को समाविष्ट किया
8.कुरुइंद्रप्रस्थआधुनिक हरियाणा और दिल्ली को समाविष्ट किया
9.वत्सकौशांभीआधुनिक  ज़िले इलाहाबाद और मिर्ज़ापुर को समाविष्ट किया
10.पांचालअहिछात्र (उत्तर पांचाल) और कंपिल्या (दक्षिण पांचाल)वर्तमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों से यमुना नदी के पूर्व से कोशल जनपद तक को समाविष्ट किया
11.मत्स्यविराटनगरराजस्थान में अलवर, भरतपुर और जयपुर के क्षेत्रों को समाविष्ट किया
12.शूरसेनामथुरामथुरा के आसपास के क्षेत्रों को समाविष्ट किया
13.अवन्तीउज्जयिनी और महिष्मतीपश्चिमी भारत को समाविष्ट किया
14.आष्मकपोटानाभारत के दक्षिणी हिस्से में नर्मदा और गोदावरी  नदियों के बीच स्थित था
15.कम्बोजआधुनिक कश्मीर के राजपुरा में राजधानीहिंदकुश (पाकिस्तान का आधुनिक हाज़रा ज़िला ) को समाविष्ट किया
16.गांधारतक्षिलापाकिस्तान के पश्चिमी भाग और पूर्वी अफ़्गानिस्तान को समाविष्ट किया

निष्कर्ष:

इन सभी में मगध, वत्स, अवन्ती और कोशल सबसे विशिष्ट थे | इन चारों में से मगध सबसे शक्तिशाली राज्य की तरह उभरा | मगध की जीत के कारण निम्न थे :

1) अच्छे लोहे की भारी उपलब्धता जिसका इस्तेमाल हथियार बनाने के लिए किया जाता था |

2) इसके स्थान का अच्छे और उपजाऊ गंगा के मैदान में होना |

3) हाथियों का सैन्य युद्ध में पड़ोसी देशों के खिलाफ इस्तेमाल करना |

 

वेद का वेदांग

छह वेदांग और उनका संक्षिप्त परिचय - Vedanga in Hindi

वेदांग के प्रकार

ये छह हैं -

  1. शिक्षा
  2. कल्प
  3. व्याकरण
  4. निरुक्त
  5. छंदस्
  6. ज्योतिष

शिक्षा

इस Vedanga में वेड के शुद्धपाठ के नियम सम्मिलित हैं. 'शिक्षा” वेदांग को हम ध्वनियों के शुद्ध उच्चारण की शिक्षा का प्राचीनतम शास्त्र कह सकते हैं. 'ऋक्प्रातिशाख्य” आदि अनेक प्रातिशाख्य-ग्रन्थ और 'पाणिनीयशिक्षा” आदि अनेक शिक्षा-ग्रन्थ और शिक्षा-वेदांग में परिगणित होते हैं.

कल्प

Kalpa Vedanga का सम्बन्ध वैदिक यज्ञों के विधि-विधान से है. कौन-सा यज्ञ कैसे किया जाए, इसी का नाम कल्प है. कल्प नाम के वेदांग में चार प्रकार के ग्रन्थ हैं, जो सूत्रशैली में रचित के कारण 'कल्पसूत्र” नाम से प्रसिद्ध हैं. कल्पसूत्र के चार प्रकार हैं -

  1. श्रोतसूत्र, जिनमें 'श्रुति” अर्थात् कहे गए बड़े-बड़े यज्ञों की विधियाँ मिलती हैं.
  2. गृह्यसूत्र, जिनमें गृह अर्थात् घरों में होने वाले यज्ञों की विधियाँ मिलती हैं.
  3. धर्मसूत्र, जिनमें व्यक्ति और समाक के आधार-व्यवहार के नियम मिलते हैं.
  4. शुल्वसूत्र, जिनमें यज्ञ की वेदी बनाने की विधि और नाम दी गयी है.

व्याकरण

Vyakarana Vedanga में वेदों में आये शब्दों और पदों की व्युत्पत्ति दी गई है और अनेक शुद्ध रूप को स्पष्ट किया गया है. इस वेदांग का प्रमुख ग्रन्थ 'पाणिनि” की 'अष्टाध्यायी” है.

निरुक्त

Nirukta Vedanga में वेड में आये कुछ कठिन पदों (शब्दों) का निर्वाचन किया गया है, जो वेद का अर्थज्ञान कराने में सहायक हैं. 'यास्क का निरुक्त” इस वेदांग का एकमात्र प्रतिनिधि ग्रन्थ है.

छन्दस्

Chanda Vedanga में वैदिक ऋचाओं में प्रयुक्त गायत्री, अनुष्टप् और जगती आदि छंदों का विवेचन किया गया है.

ज्योतिष

Jyotish Vedanga में यज्ञादि, वेदविहित कार्यों को करने के लिए उचित समय, मुहूर्त आदि का विचार किया गया है.

चोल, चेरा और पंड्या राजवंश

चोल, चेरा और पाण्ड्या राजवंश

दक्षिण भारतीय की तीन राजवंशों के बारे में विवरण नीचे दिया गया है :

चेरा राजवंश

चेरा राजवंशों ने दो विभिन्न कालों में शासन किया | प्रथम चेरा राजवंशों ने संगम युग में शासन किया  जबकि द्वितीय चेरा राजवंश ने 9वीं शताब्दी A D के आगे शासन किया |हमें चेरा राजवंश के बारे में संगम लेख के द्वारा पता चलता है | चेराओं द्वारा शासित क्षेत्रों में कोचीन, उत्तर त्रावणकोर और दक्षिणी मलाबार थे | इनकी राजधानी किज़्हंथुर –कंदल्लुर और करूर-वांची में वांची मुथुर थी | बाद के चेराओं की राजधानी कुलशेकरपुरम और महोदयापुरम थी | इनका  राजचिन्ह धनुष व तीर था | इनके द्वारा जारी किए गए सिक्कों पर धनुष यंत्र का चिन्ह अंकित होता था |

उठियान चेराला

इसे चेरा के प्रथम राजा के रूप मे दर्ज़ किया गया है | चोलाओं से हारने के बाद उसने आत्महत्या कर ली |

सेंगुत्तुवन इस राजवंशों का सबसे प्रसिद्ध शासक था | वह प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य सिलापथिकरम का नायक था | इसने दक्षिण भारत से चीन को प्रथम राजदूत भेजा था | इसकी राजधानी करूर थी | इसकी जलसेना विश्व में सर्वोत्तम थी |

द्वितीय चेरा राजवंश

कुलशेखारा अलवर ने द्वितीय चेरा राजवंश की स्थापना की | इसकी राजधानी महोदयापुरम थी | द्वितीय चेरा राजवंश का रामा वर्मा कुलशेखरा अंतिम राजा था | इसने 1090 से 1102 A D तक शासन किया | इसके बाद चेरा राजवंश समाप्त हो गया |

चोल राजवंशों ने 300 B C से 13वीं शताब्दी के बाद तक शासन किया जबकि उनके प्रदेश बदलते रहे |  इनके शासन काल को तीन भागों मे विभाजित किया जा सकता है नामतः पूर्व चोल, मध्यकालीन चोल व बाद के चोला |

चोल राजवंश

पूर्व चोल

पूर्व चोलाओं के बारे में  ज़्यादातर जानकारी संगम साहित्य से मिली हैं | अन्य जानकारी हमें महावमसा , सीलॉन का बौद्ध लेख , अशोक के स्तंभों और एर्यथ्रेयान समुद्र के पेरिप्लुस से मिलती है |

कारिकला चोल पूर्व चोल का सबसे प्रसिद्ध राजा है | इसने 270 B C के लगभग शासन किया | इसने वेन्नी की मशहूर लड़ाई जीती जिसमे इसने पाण्ड्य और चेराओं को धोखे से हराया था | यह माना जाता है कि इसने पूर्ण सीलॉन को जीत किया था |

परंतु राजा होने के नाते इसने कावेरी नदी के कल्लानाइ पर पठार में विश्व का पहला जल नियंत्रक भवन बनाया था जो कि बहुत महत्वपूर्ण कार्य था | यह खेतीबाड़ी के मकसद से बनाया गया था |

मध्यकालीन चोल

चोलाओं ने अपनी शक्ति को 848 A D में पुनः प्रचलित किया और इनका शासन काल तीसरी शताब्दी A D से 9वीं शताब्दी A D के लंबी रुकावट के बाद दुबारा स्थापित हुआ | इसकी अपनी राजधानी थंजौर थी | यह पल्लवा का जागीरदार था | इसने पादुकोट्टाई मे सोलेसवारा मंदिर का निर्माण किया |

विजयालया चोल

मध्यकालीन का प्रथम चोल शासक विजयालया चोल था जिसे चोल शासन को पुनः स्थापित करने का  श्रेय जाता है| विजयालया की अपनी राजधानी थंजौर में थी | वह पल्लावाओं का दास था | इसने पादुकोट्टई में सोलेसवरा मंदिर बनाया |

अदित्या चोल 1

विजयालया का बेटा, अदित्या चोल उसकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी बना | शिव का बड़ा भक्त होने के कारण इसने कावेरी नदी के किनारों पर काफी शिव मंदिरों का निर्माण किया |

परांतका चोल 1

इसने पाण्ड्य राजा को हराया और मदुरकोण्डा का खिताब धारण किया |

राजराजा चोल 1

कुछ कम जानकार राजाओं के बाद, राजराजा चोल 1 ने राजगद्दी संभाली | इसका नाम जन्म के समय अरुल्मोज़्हि वर्मन था | इसे अरुन्मोज़्हि उदयर पेरिया उदयर के नाम से भी  जाना जाता है | इसके समय चोल साम्राज्य ने पूरा तमिलनाडु , कर्नाटक, उड़ीसा के भाग और आंध्र प्रदेश, पूर्ण केरल और श्रीलंका  को समाविष्ट कर लिया | राजराजा चोल 1 ने  थंजौर में राजराजेश्वरम मंदिर का निर्माण किया जो  अब यूनेस्को की विश्व धरोहर है | यह मंदिर पेरुवुडाइयर कोविल या बृहदीस्वरर मंदिर के नाम से जाना जाता है |

राजेंद्र चोल 1

राजराज चोल1 के बाद 1014 A D मे इसका बेटा राजेंद्र चोल1 उत्तराधिकारी बना जिसने 1044 A D तक शासन किया | वह राजराज चोल1 से भी  ज्यादा  महत्वाकांशी था | इसके मुख्य आक्रमण और विजय निम्न है :

  • इसने पूर्ण श्रीलंका को जीत किया और उसके राजा को 12 साल तक बंदी बनाए रखा |
  • पश्चिमी चौलक्य सम्राट को मसकी के युद्ध मे हारने के बाद पूर्वी चौलक्य को भी ज़बरदस्ती आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया |
  • इसकी सेनाओं ने कलिंग, पाल और गंगस पर विजय प्राप्त कि और इसने इससे गंगाईकोण्डा की उपाधि दी |
  • उल्लेखनीय ढंग से राजेंद्र 1की जल सेना ने मालया और सुमात्रा राज्यों को पराजित किया तथा केदाह पर कब्ज़ा कर लिया |
  • राजेंद्र चोल-1 ने चोल साम्राज्य की नई राजधानी गंगाईकोण्डा चोलपुरम, कलिंग , पल और गंगस के ऊपर विजय दर्शाने के लिए बनाई |

राजाधिराज चोल

राजेंद्र चोल-1 का उत्तराधिकारी राजाधिराज था | यह मैसूर के निकट कोप्पम के युद्ध मे मारा गया |

राजेन्द्र चोल-II

कविता और नृत्य का महान संरक्षक, इसने अपना समर्थन संगीत नृत्य नाटिका राजराजेस्वर नाटकम को दिया |

विराराजेन्द्र चोल

एक प्रभावकारी शासक जिसका शासन 1063-1070 A D तक था | वह राजेन्द्र चोल का छोटा भाई था | वह एक महान योद्धा के साथ साथ कला का महान प्रशंसक था |

इसके बाद अथिराजेन्द्र चोल के द्वारा पदभार संभाला गया जो अपने राज्य की रक्षा करने में ज्यादा शक्तिशाली नहीं था | उसके शासन में राष्ट्र विद्रोह हुआ जिसमे वह मारा गया | इसकी मृत्यु के बाद मध्यकालीन चोल राजवंश समाप्त हो गया |

बाद के चोल

बाद के चोलाओं का शासन काल 1070 A D से 1279 A D  तक रहा | इस समय तक, चोल साम्राज्य ने शिखर को प्राप्त किया और विश्व का  सबसे शक्तिशाली देश बन गया | चोलाओं ने दक्षिण पूर्व एशियन देश पर कब्ज़ा कर लिया और उस समय इनके पास विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना व जल सेना थी |

पाण्ड्य साम्राज्य 

पाण्ड्य राज्य दक्षिण भारत के तमिलनाडु में स्थित था | यह लगभग 6ठी शताब्दी B C में शुरू हुआ और लगभग 15वीं शताब्दी A D  में समाप्त हो गया |

पाण्ड्य राज्य  का संगम युग मे विकसित आज के मदुरै के जिले, तिरुनेल्वेली, तमिलनाडू में रामनद के साथ बढ़ा | मदुरै राजधानी शहर था और कोरकाई राज्य का मुख्य पोत था जोकि व्यापार और वाणिज्य का केंद्र बना | संगम साहित्य पाण्ड्य राजाओं की लंबी सूची बताता है जिसमें  कई राजा  बहुत प्रसिद्ध हुए | मधूकुदुमी ने अपनी जीत को मनाने के लिए कई बलिदान दिये | इसलिए , इसे पल्यागसलाई की उपाधि दी गई |

एक दूसरा पाण्ड्य राजा बूथा पंडिया एक महान योद्धा था और तमिल कवियों का प्रशंसक भी था | आरियाप्पडाइकदंथा नेडुंजेलियन भी एक प्रसिद्ध पाण्ड्य शासक थे | उन्होने सिलप्पाथिगरम (महाकाव्य) के नायक को गलती से मृत्युदंड दे दिया था जिसका सच जानने पर उन्होने अपना जीवन त्याग दिया |

एक अन्य महत्वपुर्ण शासक थालाइयलंगनथु नेदुंजेल्लियन था जिसका शासन लगभग 210 A D  तक रहा जिसने चेरा, चोल और पाँच अन्य छोटे राज्यों की संघटित सेना को थलाइयलंगनम नामक जगह पर पराजित किया, जिसका व्याख्या 10 वीं सदी के अभिलेख में की गई है | इसने कई तमिल कवियों को आश्रेय दिया जिसमे मंगुड़ी मरुथनर भी थे | पाण्ड्य राज्य का  रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार था जिसने व्यापारियों को लाभान्वित किया और राज्य को धन संपन्न और खुशहाल बनाया | जतवर्मन सुंदरा पाण्ड्य ने पाण्ड्य साम्राज्य पर 1251-61 A D तक शासन किया जिसे श्रीलंका के द्वीपों को जीतने की वजह से “द्वितीय राम” कहा गया |

पाण्ड्य का शासन 14वीं शताब्दी के शुरुआत से खत्म होने लगा जब राजगद्दी के उत्तराधिकारियों के दावे  लिए मतभेद शुरू हो गए और एक दावेदार ने दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी,से मदद मांगी जिसका नतीजा मलिक काफ़ुर के नेतृत्व में सुलतान का आक्रमण था | मुस्लिम आक्रमण की वजह से पाण्ड्यों का सफाया हो गया |

चोल साम्राज्य 4

चोल साम्राज्य (9वीं सदी A D से 12वीं सदी A D तक) : मध्यकालीन चोल

विजयालय चोल

विजयालय चोल प्रथम मध्यकालीन  चोल शासक था जिसे चोल राज्य के पुनः स्थापना का श्रेय जाता है | उसकी अपनी राजधानी थंजौर में थी | विजयालय पललवा का सामंत था | इसने पादुकोट्टई मे सोलेस्वरा मंदिर का निर्माण कराया था |

आदित्य चोल 1

विजयालय की मृत्यु के बाद उसके पुत्र आदित्य चोल ने पदभार संभाला | शिव का बड़ा भक्त होने के कारण आदित्य ने कावेरी नदी के किनारों पर कई शिव मंदिरों का निर्माण कराया था  |

परांतका चोल 1

इसने पाण्ड्य राजा को हराया और मदुरकोण्डा का खिताब को धारण किया |

राजराजा  चोल 1

कुछ कम प्रसिद्ध राजाओं के बाद राजराजा  चोल 1 ने राजगद्दी संभाली | इसका नाम जन्म के समय अरुल्मोज़्हि वर्मन था | इसे अरुन्मोज़्हि उदयर पेरिया उदयर के नाम से भी जाना जाता है | इसके समय चोल राज्य ने पूरा तमिलनाडु, कर्नाटक, उड़ीसा के भाग और आंध्र प्रदेश, पूर्ण केरल  और श्रीलंका को जीत लिया था | राजराजा  चोल 1 ने थंजौर में राजराजेश्वरम मंदिर का निर्माण कराया जो अब यूनेस्को की विश्व धरोहर है | यह मंदिर पेरुवुडाइयर कोविल या बृहदीस्वरर मंदिर के नाम से जाना जाता है |

राजेंद्र चोल -1

राजराजा  चोल 1 के बाद 1014 A D में इसका बेटा राजेंद्र चोल 1 उत्तराधिकारी बना जिसने 1014 A D  तक शासन किया | वह राजराजा  चोल1 से भी ज्यादा महत्वाकांशी था | इसके द्वारा किए गए मुख्य आक्रमण और विजय निम्न हैं :

  • राजेंद्र चोल 1 ने पूर्ण श्रीलंका को जीत लिया और उसके राजा को 12 साल तक बंदी बनाए रखा |
  • पश्चिमी चालुक्य  के सम्राट को मसकी के युद्ध में हराने के बाद पूर्वी चालुक्य को भी जबरदस्ती आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया |
  • राजेंद्र चोल 1 की सेनाओं ने कलिंग, पाल और गंगाओं पर विजय प्राप्त की और इस कारण  इसे गंगाईकोंडा की उपाधि मिली  |
  • उल्लेखनीय ढंग से राजेंद्र 1 की जल सेना ने मालया और सुमात्रा राज्यों को पराजित किया तथा केदाह पर कब्जा कर लिया |
  • राजेंद्र चोल 1 ने चोल साम्राज्य की नई राजधानी गंगाईकोण्डा चोलपुरम, कलिंग, पाल और गंगाओं  के ऊपर विजय दर्शाने के लिए बनाई |

राजाधिराज चोल

राजेंद्र चोल-1 के बाद राजाधिराज ने राजगद्दी संभाली | वह मैसूर के निकट कोप्पम के युद्ध में मारा गया |

राजेंद्र चोल-II

कविता और नृत्य का महान संरक्षक, इसने अपना समर्थन संगीत नृत्य नाटिका राजराजेस्वर नाटकम को दिया

विराराजेन्द्र चोल

एक प्रभावकारी शासक जिसका शासन 1063-1070 A D तक था | वह राजेन्द्र चोल का छोटा भाई था | वह एक महान योद्धा के साथ साथ कला का महान प्रशंसक था |

इसके बाद अथिराजेन्द्र चोल के द्वारा पदभार संभाला गया जो अपने राज्य की रक्षा करने में ज्यादा शक्तिशाली नहीं था | उसके शासन में राष्ट्र विद्रोह हुआ जिसमे वह मारा गया | इसकी मृत्यु के बाद मध्यकालीन चोल राजवंश समाप्त हो गया |

 

चोल साम्राज्य 3

चोल साम्राज्य ( 9वीं सदी A D से 12वीं सदी A D तक) : बाद के चोल

बाद के चोल का युग 1070 A D से 1279 A D  तक रहा | इस समय तक चोल साम्राज्य ने अपने मुकाम को पा लिया था और विश्व का सबसे शक्तिशाली देश बन गया था | चोलाओं ने दक्षिण पूर्वी एशियन देशों पर कब्ज़ा कर लिया और इस समय इनके पास विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना और जल सेना थीं |

चोल राज्य का पतन

चोल साम्राज्य मे संकट आने के साथ विराराजेन्द्र चोला का 1070 A D  में देहांत हो गया | आगे, विक्रमादित्य V I,उसके बेटे ने स्मरणीय प्रतिष्ठा हासिल की और जल्दी ही चोल समाज का उत्तरदायित्व संभालना  शुरू कर दिया | जब विराराजेन्द्र का स्वर्गवास हुआ था तब चोल साम्राज्य में एक विद्रोह(शायद धार्मिक ) था |  विक्रमादित्य V I गंगाईकोण्डा चोलपुरम में एक माह के लिए रहे और उसके बाद अपनी राजधानी में फिर दौरा किया |गंगाईकोण्डा चोलपुरम मे उन्होने अथिराजेन्द्र को नया राजा बना दिया | दूसरी तरफ, कुछ ही महीनों में अथिराजेन्द्र एक नए विद्रोह के झोंके में फंस गए | जब अथिराजेन्द्र की मृत्यु हो गई, तब राजेंद्र चोल ने चोल राजगद्दी को हथिया लिया | यह चोल राजाओं के आरंभ की एक नई लकीर थी जिसे बाद के चोलाओं के तौर पर जाना गया |

कुलोत्थुंगा चोल-I (1070-1120 A D )

राजेंद्र चोल-1 की पुत्री  अम्मानगा देवी का विवाह पूर्वी चौलक्याओं के वेंगी राजा राजराजा नरेंद्र के साथ हुआ | इस एकीकरण की संतान थी राजेंद्र चोल जोकि बाद मे कुलोत्थुंगा-1 बना | कुलोत्थुंगा चोल-1 ने कलिंग में 2 सैनिक कार्यवाही करीं | कुलोत्थुंगा के नेतृत्व में श्रीलंका को निकालकर पूर्ण साम्राज्य में एकीकरण रहा | फिर भी पश्चिमी चौलक्या और चोल के बीच तुंगभद्रा नदी एक बाह्य सतह की तरह थी | 1120 A D  में विक्रम चोल इसका उत्तराधिकारी बना | 

विक्रम चोल 1120- 1135 A D  

कुलोत्थुंगा चोल=1 ने विक्रम  चोल को वेंगी का राजपाल नियुक्त किया | इसका आहवान 1118 A D में हुआ और इसे राज्य प्रतिनिधि नियुक्त घोषित कर दिया गया | इसने अपने पिता कुल्लोत्थुंगा के साथ  शासन किया जब तक उसके पिता का देहांत 1122 A D  में नहीं हो गया | पश्चिमी चौल्क्या बहुत ऊंची उड़ान भर रहे थे और उन्होने पूर्वी चौलकयाओं पर आक्रमण कर वेंगी को जीत लिया | 1133 A D  में कुल्लोत्थुंगा चोल II, विक्रम चोल का उत्तराधिकारी बना |

कुलोत्थुंगा चोल II 1138 A D -1150 A D

कुलोत्थुंगा चोल II विक्रम चोल का बेटा व उत्तराधिकारी था | इसके खाते में कोई भी ऐतिहासिक लड़ाई नहीं है | वह चिदम्बरम मंदिरों की धन आदि से सहायता  करता था | 1150 A D में राजराज चोल II इसका उत्तराधिकारी बना |

राजाराज चोल II  1150 -1173 A D

कुल्लोथुंगा चोल III  ने राजाराज चोल को अपना वारिस 1146 A D मे बनाया | उसका पूरा नियंत्रण कलिंग, वेंगी, चेरा, पाण्ड्य आदि के क्षेत्रों  पर था और इसने श्रीलंका को भी हमला किया परंतु इसके प्रभुत्व के अंतिम सालों में इसके साम्राज्य, जो पहले पाण्ड्य का क्षेत्र था ने राजनैतिक अशांति देखी |उसके गुजर जाने से पहले, उसने राजाधिराज चोल II को 1163 A D में अपना वारिस बना दिया | इसका उत्तराधिकारी राजाधिराज चोल II बना | 

राजाधिराज चोल II 1166 A D – 1178 A D

राजाधिराज चोल II, राजराज चोल II का उत्तराधिकारी बना | इसका शासन काल में चोल राज्य को आगे के दोषों के लिए जाना गया  जिसमें  पाण्ड्य  के बीच आम जागीरदारों का आधिपत्य था | पाण्ड्य के बीच राजनैतिक युद्ध हो गया जिसमे चोलाओं के दखलंदाज़ी व देखरेख की आवश्यकता पड़ी | परंतु पाण्ड्य को  प्रसिद्धि मिलने शुरू हो गई और केंद्र चोल राज्य धीरे धीरे कमजोर पड़ने लगे | 1178 A D में कुलोथूङ्गा चोल II, राजराज चोल का उत्तराधिकारी बना |

कुलोत्थुंगा चोल III  1178 -1218 A D      

कुलोत्थुंगा चोल III वेनाद के चेराओं, मदुरै में पाण्ड्य, श्रीलंका के सिंहला राजाओं  और मैसूर के होयसलाओं को बंदी बनाने मे सक्षम हुआ  | सदी ने घुमाव लिया और चोल साम्राज्य के दस्ता युक्त राजा जतवर्मन कुलसेकरन I ने चोलाओं के विरूद्ध विद्रोह किया और साल 1290 में मदुरा  राजगद्दी पर जीत हासिल की |  चोलाओं ने उस पर आक्रमण किया और मदुरै को हथिया लिया | जतवर्मन कुलसेकरन I  ने अपनी पत्नी व बेटे के साथ चोल राजा कुलोत्थुंगा के सामने हथियार डाल दिये  और उसके आत्मसमर्पण  के बाद , वह अपनी राजधानी दोबारा गया | परंतु इसके दौरान, मदुरै में पहले  पाण्ड्य का राज्याभिषेक भवन नष्ट हो गया  और इसमें वे तमाम दस्तावेज भी नष्ट हो गए जिनमे पाण्ड्य की पहले की कुछ जानकारी थी | इस हमले का बदला लेने के लिए कुलसेकरन के छोटे भाई मारवर्मन सुंदरा पाण्ड्य, जो 1216 A D  में शासन में आया, ने चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया | सुंदरा पाण्ड्य के राजाओं ने चोल राजाओं के थ्ंजौर और उरईयूर के शहरों पर कब्जा कर लिया और चोल राजाओं को देश से निकाल दिया |उसकी सेना ने चिदम्बरम तक की पद यात्रा की और उसकी विजय की याद मे चिदम्बरम मंदिर मे तुलाभारम  किया और उसके वज़न के बराबर धन का दान दिया | परंतु, चोलाओं के ऊपर सुंदर पाण्ड्य की विजय के लिए होयसला सेना ने सरी रंगापट्टम की ओर पदयात्रा की | होयसला राजा वीरा बाल्लला III के दाखल के बाद चोल राज्यों को लौटा दिया गया परंतु, अब चोलाओं ने सुंदर पाण्ड्य का आधिपत्य स्वीकार कर लिया | यह द्वितीय पाण्ड्य साम्राज्य का पुनः जागरण और शक्तिशाली चोल सत्ता का पतन था |

राजाराज चोल III 1216-1256 A D      

जुलाई 1216 में जब राजाराज चोल III की सत्ता आई , पूर्व चोलाओं की तुलना में चोल राज्य एक संक्षिप्त प्रांत था | पाण्ड्य का दक्षिण और वेंगी में अहम नियंत्रण था और दूसरे क्षेत्र होयसलाओं के अंदर थे | पाण्ड्य की सेना ने चोल राजधानी मे प्रवेश कर लिया और राजराज चोल III भाग गए | उन्हें सेंदमंगलम में कैद कर लिया गया | होयसला के राजा नरसिंहा ने दखल डाला और तभी चोल राजा को रिहा किया गया | राजराज चोल III ने अपने बेटे राजेन्द्र चोल को 1246 A D में वारिस बनाया |

राजेंद्र चोल III  1246- 1280 A D     

राजेंद्र चोल की प्रभुता 1246 A D मे आई | उसने चोल राज्यों के तेज़ी से हो रहे पतन को रोकना चाहा पर इस समय होयसला विरोधात्मक हो गए थे और पाण्ड्य प्रभावशाली बन गए थे | चोल राज्य का पतन राजेंद्र चोल के साथ हो गया |

चोल साम्राज्य 2nd

चोल साम्राज्य ( 9वीं सदी A D से 12वीं सदी A D तक) : बाद के चोल

बाद के चोल का युग 1070 A D से 1279 A D  तक रहा | इस समय तक चोल साम्राज्य ने अपने मुकाम को पा लिया था और विश्व का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बन गया था | चोलाओं ने दक्षिण पूर्वी एशियन देशों पर कब्ज़ा कर लिया और इस समय इनके पास विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना और जल सेना थीं |

चोल राज्य का पतन

चोल साम्राज्य मे संकट आने के साथ विराराजेन्द्र चोला का 1070 A D  में देहांत हो गया | आगे, विक्रमादित्य V I,उसके बेटे ने स्मरणीय प्रतिष्ठा हासिल की और जल्दी ही चोल समाज का उत्तरदायित्व संभालना  शुरू कर दिया | जब विराराजेन्द्र का स्वर्गवास हुआ था तब चोल साम्राज्य में एक विद्रोह (शायद धार्मिक ) था |  विक्रमादित्य V I गंगाईकोण्डा चोलपुरम में एक माह के लिए रहे और उसके बाद अपनी राजधानी में फिर दौरा किया |गंगाईकोण्डा चोलपुरम मे उन्होने अथिराजेन्द्र को नया राजा बना दिया | दूसरी तरफ, कुछ ही महीनों में अथिराजेन्द्र एक नए विद्रोह के झोंके में फंस गए | जब अथिराजेन्द्र की मृत्यु हो गई, तब राजेंद्र चोल ने चोल राजगद्दी को हथिया लिया | यह चोल राजाओं के आरंभ की एक नई लकीर थी जिसे बाद के चोलाओं के तौर पर जाना गया |

कुलोत्थुंगा चोल-I (1070-1120 A D )

राजेंद्र चोल-1 की पुत्री  अम्मानगा देवी का विवाह पूर्वी चालुक्यों के वेंगी राजा राजराजा नरेंद्र के साथ हुआ | इस एकीकरण की संतान थी राजेंद्र चोल जोकि बाद मे कुलोत्थुंगा-1 बना | कुलोत्थुंगा चोल-1 ने कलिंग में 2 सैनिक कार्यवाही करीं | कुलोत्थुंगा के नेतृत्व में श्रीलंका को निकालकर पूर्ण साम्राज्य में एकीकरण रहा | फिर भी पश्चिमी चालुक्यों और चोल के बीच तुंगभद्रा नदी एक बाह्य सतह की तरह थी | 1120 A D  में विक्रम चोल इसका उत्तराधिकारी बना | 

विक्रम चोल 1120- 1135 A D  

कुलोत्थुंगा चोल-1 ने विक्रम  चोल को वेंगी का राजपाल नियुक्त किया | इसका आहवान 1118 A D में हुआ और इसे राज्य प्रतिनिधि नियुक्त घोषित कर दिया गया | इसने अपने पिता कुल्लोत्थुंगा के साथ  शासन किया जब तक उसके पिता का देहांत 1122 A D  में नहीं हो गया | पश्चिमी चालुक्य बहुत ऊंची उड़ान भर रहे थे और उन्होने पूर्वी चालुक्य  पर आक्रमण कर वेंगी को जीत लिया | 1133 A D  में कुल्लोत्थुंगा चोल II, विक्रम चोल का उत्तराधिकारी बना |

कुलोत्थुंगा चोल II 1133 A D -1150 A D

कुलोत्थुंगा चोल II विक्रम चोल का बेटा व उत्तराधिकारी था | इसके खाते में कोई भी ऐतिहासिक लड़ाई नहीं है | वह चिदम्बरम मंदिरों की धन आदि से सहायता  करता था | 1150 A D में राजराजा चोल II इसका उत्तराधिकारी बना |

राजराजा चोल II  1150 -1173 A D

कुल्लोथुंगा चोल III  ने राजराजा चोल को अपना वारिस 1146 A D मे बनाया | उसका पूरा नियंत्रण कलिंग, वेंगी, चेरा, पाण्ड्य आदि के क्षेत्रों  पर था और इसने श्रीलंका को भी हमला किया परंतु इसके प्रभुत्व के अंतिम सालों में इसके साम्राज्य, जो पहले पाण्ड्य का क्षेत्र था ने राजनैतिक अशांति देखी |उसके गुजर जाने से पहले, उसने राजाधिराज चोल II को 1163 A D में अपना वारिस बना दिया | इसका उत्तराधिकारी राजाधिराज चोल II बना | 

राजाधिराज चोल II 1166 A D – 1178 A D

राजाधिराज चोल II, राजराजा चोल II का उत्तराधिकारी बना | इसका शासन काल में चोल राज्य को आगे के दोषों के लिए जाना गया  जिसमें  पाण्ड्य  के बीच आम जागीरदारों का आधिपत्य था | पाण्ड्य के बीच राजनैतिक युद्ध हो गया जिसमे चोलाओं के दखलंदाज़ी व देखरेख की आवश्यकता पड़ी | परंतु पाण्ड्य को  प्रसिद्धि मिलने शुरू हो गई और केंद्र चोल राज्य धीरे धीरे कमजोर पड़ने लगे | 1178 A D में कुलोथूङ्गा चोल II, राजराजा चोल का उत्तराधिकारी बना |

कुलोत्थुंगा चोल III  1178 -1218 A      

कुलोत्थुंगा चोल III वेनाद के चेराओं, मदुरै में पाण्ड्य, श्रीलंका के सिंहला राजाओं  और मैसूर के होयसलाओं को बंदी बनाने मे सक्षम हुआ  | सदी ने घुमाव लिया और चोल साम्राज्य के दस्ता युक्त राजा जतवर्मन कुलसेकरन I ने चोलाओं के विरूद्ध विद्रोह किया और साल 1290 में मदुरा राजगद्दी पर जीत हासिल की |  चोलाओं ने उस पर आक्रमण किया और मदुरै को हथिया लिया | जतवर्मन कुलसेकरन I ने अपनी पत्नी व बेटे के साथ चोल राजा कुलोत्थुंगा के सामने हथियार डाल दिये  और उसके आत्मसमर्पण  के बाद , वह अपनी राजधानी दोबारा गया | परंतु इसके दौरान, मदुरै में पहले  पाण्ड्य का राज्याभिषेक भवन नष्ट हो गया  और इसमें वे तमाम दस्तावेज भी नष्ट हो गए जिनमे पाण्ड्य की पहले की कुछ जानकारी थी | इस हमले का बदला लेने के लिए कुलसेकरन के छोटे भाई मारवर्मन सुंदरा पाण्ड्य, जो 1216 A D  में शासन में आया, ने चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया | सुंदरा पाण्ड्य के राजाओं ने चोल राजाओं के थ्ंजौर और उरईयूर के शहरों पर कब्जा कर लिया और चोल राजाओं को देश से निकाल दिया |उसकी सेना ने चिदम्बरम तक की पद यात्रा की और उसकी विजय की याद मे चिदम्बरम मंदिर मे तुलाभारम  किया और उसके वज़न के बराबर धन का दान दिया | परंतु, चोलाओं के ऊपर सुंदर पाण्ड्य की विजय के लिए होयसला सेना ने सरी रंगापट्टम की ओर पदयात्रा की | होयसला राजा वीरा बाल्लला III के दाखल के बाद चोल राज्यों को लौटा दिया गया परंतु, अब चोलाओं ने सुंदर पाण्ड्य का आधिपत्य स्वीकार कर लिया | यह द्वितीय पाण्ड्य साम्राज्य का पुनः जागरण और शक्तिशाली चोल सत्ता का पतन था |

राजराजा चोल III 1216-1256 A D      

जुलाई 1216 में जब राजाराज चोल III की सत्ता आई , पूर्व चोलाओं की तुलना में चोल राज्य एक संक्षिप्त प्रांत था | पाण्ड्य का दक्षिण और वेंगी में अहम नियंत्रण था और दूसरे क्षेत्र होयसलाओं के अंदर थे | पाण्ड्य की सेना ने चोल राजधानी मे प्रवेश कर लिया और राजराजा चोल III भाग गए | उन्हें सेंदमंगलम में कैद कर लिया गया | होयसला के राजा नरसिंहा ने दखल डाला और तभी चोल राजा को रिहा किया गया | राजराजा चोल III ने अपने बेटे राजेन्द्र चोल को 1246 A D में वारिस बनाया |

राजेंद्र चोल III  1246- 1280 A     

राजेंद्र चोल की प्रभुता 1246 A D मे आई | उसने चोल राज्यों के तेज़ी से हो रहे पतन को रोकना चाहा पर इस समय होयसला विरोधात्मक हो गए थे और पाण्ड्य प्रभावशाली बन गए थे | चोल राज्य का पतन राजेंद्र चोल के साथ हो गया |

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...