चोल, चेरा और पंड्या राजवंश

चोल, चेरा और पाण्ड्या राजवंश

दक्षिण भारतीय की तीन राजवंशों के बारे में विवरण नीचे दिया गया है :

चेरा राजवंश

चेरा राजवंशों ने दो विभिन्न कालों में शासन किया | प्रथम चेरा राजवंशों ने संगम युग में शासन किया  जबकि द्वितीय चेरा राजवंश ने 9वीं शताब्दी A D के आगे शासन किया |हमें चेरा राजवंश के बारे में संगम लेख के द्वारा पता चलता है | चेराओं द्वारा शासित क्षेत्रों में कोचीन, उत्तर त्रावणकोर और दक्षिणी मलाबार थे | इनकी राजधानी किज़्हंथुर –कंदल्लुर और करूर-वांची में वांची मुथुर थी | बाद के चेराओं की राजधानी कुलशेकरपुरम और महोदयापुरम थी | इनका  राजचिन्ह धनुष व तीर था | इनके द्वारा जारी किए गए सिक्कों पर धनुष यंत्र का चिन्ह अंकित होता था |

उठियान चेराला

इसे चेरा के प्रथम राजा के रूप मे दर्ज़ किया गया है | चोलाओं से हारने के बाद उसने आत्महत्या कर ली |

सेंगुत्तुवन इस राजवंशों का सबसे प्रसिद्ध शासक था | वह प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य सिलापथिकरम का नायक था | इसने दक्षिण भारत से चीन को प्रथम राजदूत भेजा था | इसकी राजधानी करूर थी | इसकी जलसेना विश्व में सर्वोत्तम थी |

द्वितीय चेरा राजवंश

कुलशेखारा अलवर ने द्वितीय चेरा राजवंश की स्थापना की | इसकी राजधानी महोदयापुरम थी | द्वितीय चेरा राजवंश का रामा वर्मा कुलशेखरा अंतिम राजा था | इसने 1090 से 1102 A D तक शासन किया | इसके बाद चेरा राजवंश समाप्त हो गया |

चोल राजवंशों ने 300 B C से 13वीं शताब्दी के बाद तक शासन किया जबकि उनके प्रदेश बदलते रहे |  इनके शासन काल को तीन भागों मे विभाजित किया जा सकता है नामतः पूर्व चोल, मध्यकालीन चोल व बाद के चोला |

चोल राजवंश

पूर्व चोल

पूर्व चोलाओं के बारे में  ज़्यादातर जानकारी संगम साहित्य से मिली हैं | अन्य जानकारी हमें महावमसा , सीलॉन का बौद्ध लेख , अशोक के स्तंभों और एर्यथ्रेयान समुद्र के पेरिप्लुस से मिलती है |

कारिकला चोल पूर्व चोल का सबसे प्रसिद्ध राजा है | इसने 270 B C के लगभग शासन किया | इसने वेन्नी की मशहूर लड़ाई जीती जिसमे इसने पाण्ड्य और चेराओं को धोखे से हराया था | यह माना जाता है कि इसने पूर्ण सीलॉन को जीत किया था |

परंतु राजा होने के नाते इसने कावेरी नदी के कल्लानाइ पर पठार में विश्व का पहला जल नियंत्रक भवन बनाया था जो कि बहुत महत्वपूर्ण कार्य था | यह खेतीबाड़ी के मकसद से बनाया गया था |

मध्यकालीन चोल

चोलाओं ने अपनी शक्ति को 848 A D में पुनः प्रचलित किया और इनका शासन काल तीसरी शताब्दी A D से 9वीं शताब्दी A D के लंबी रुकावट के बाद दुबारा स्थापित हुआ | इसकी अपनी राजधानी थंजौर थी | यह पल्लवा का जागीरदार था | इसने पादुकोट्टाई मे सोलेसवारा मंदिर का निर्माण किया |

विजयालया चोल

मध्यकालीन का प्रथम चोल शासक विजयालया चोल था जिसे चोल शासन को पुनः स्थापित करने का  श्रेय जाता है| विजयालया की अपनी राजधानी थंजौर में थी | वह पल्लावाओं का दास था | इसने पादुकोट्टई में सोलेसवरा मंदिर बनाया |

अदित्या चोल 1

विजयालया का बेटा, अदित्या चोल उसकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी बना | शिव का बड़ा भक्त होने के कारण इसने कावेरी नदी के किनारों पर काफी शिव मंदिरों का निर्माण किया |

परांतका चोल 1

इसने पाण्ड्य राजा को हराया और मदुरकोण्डा का खिताब धारण किया |

राजराजा चोल 1

कुछ कम जानकार राजाओं के बाद, राजराजा चोल 1 ने राजगद्दी संभाली | इसका नाम जन्म के समय अरुल्मोज़्हि वर्मन था | इसे अरुन्मोज़्हि उदयर पेरिया उदयर के नाम से भी  जाना जाता है | इसके समय चोल साम्राज्य ने पूरा तमिलनाडु , कर्नाटक, उड़ीसा के भाग और आंध्र प्रदेश, पूर्ण केरल और श्रीलंका  को समाविष्ट कर लिया | राजराजा चोल 1 ने  थंजौर में राजराजेश्वरम मंदिर का निर्माण किया जो  अब यूनेस्को की विश्व धरोहर है | यह मंदिर पेरुवुडाइयर कोविल या बृहदीस्वरर मंदिर के नाम से जाना जाता है |

राजेंद्र चोल 1

राजराज चोल1 के बाद 1014 A D मे इसका बेटा राजेंद्र चोल1 उत्तराधिकारी बना जिसने 1044 A D तक शासन किया | वह राजराज चोल1 से भी  ज्यादा  महत्वाकांशी था | इसके मुख्य आक्रमण और विजय निम्न है :

  • इसने पूर्ण श्रीलंका को जीत किया और उसके राजा को 12 साल तक बंदी बनाए रखा |
  • पश्चिमी चौलक्य सम्राट को मसकी के युद्ध मे हारने के बाद पूर्वी चौलक्य को भी ज़बरदस्ती आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया |
  • इसकी सेनाओं ने कलिंग, पाल और गंगस पर विजय प्राप्त कि और इसने इससे गंगाईकोण्डा की उपाधि दी |
  • उल्लेखनीय ढंग से राजेंद्र 1की जल सेना ने मालया और सुमात्रा राज्यों को पराजित किया तथा केदाह पर कब्ज़ा कर लिया |
  • राजेंद्र चोल-1 ने चोल साम्राज्य की नई राजधानी गंगाईकोण्डा चोलपुरम, कलिंग , पल और गंगस के ऊपर विजय दर्शाने के लिए बनाई |

राजाधिराज चोल

राजेंद्र चोल-1 का उत्तराधिकारी राजाधिराज था | यह मैसूर के निकट कोप्पम के युद्ध मे मारा गया |

राजेन्द्र चोल-II

कविता और नृत्य का महान संरक्षक, इसने अपना समर्थन संगीत नृत्य नाटिका राजराजेस्वर नाटकम को दिया |

विराराजेन्द्र चोल

एक प्रभावकारी शासक जिसका शासन 1063-1070 A D तक था | वह राजेन्द्र चोल का छोटा भाई था | वह एक महान योद्धा के साथ साथ कला का महान प्रशंसक था |

इसके बाद अथिराजेन्द्र चोल के द्वारा पदभार संभाला गया जो अपने राज्य की रक्षा करने में ज्यादा शक्तिशाली नहीं था | उसके शासन में राष्ट्र विद्रोह हुआ जिसमे वह मारा गया | इसकी मृत्यु के बाद मध्यकालीन चोल राजवंश समाप्त हो गया |

बाद के चोल

बाद के चोलाओं का शासन काल 1070 A D से 1279 A D  तक रहा | इस समय तक, चोल साम्राज्य ने शिखर को प्राप्त किया और विश्व का  सबसे शक्तिशाली देश बन गया | चोलाओं ने दक्षिण पूर्व एशियन देश पर कब्ज़ा कर लिया और उस समय इनके पास विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना व जल सेना थी |

पाण्ड्य साम्राज्य 

पाण्ड्य राज्य दक्षिण भारत के तमिलनाडु में स्थित था | यह लगभग 6ठी शताब्दी B C में शुरू हुआ और लगभग 15वीं शताब्दी A D  में समाप्त हो गया |

पाण्ड्य राज्य  का संगम युग मे विकसित आज के मदुरै के जिले, तिरुनेल्वेली, तमिलनाडू में रामनद के साथ बढ़ा | मदुरै राजधानी शहर था और कोरकाई राज्य का मुख्य पोत था जोकि व्यापार और वाणिज्य का केंद्र बना | संगम साहित्य पाण्ड्य राजाओं की लंबी सूची बताता है जिसमें  कई राजा  बहुत प्रसिद्ध हुए | मधूकुदुमी ने अपनी जीत को मनाने के लिए कई बलिदान दिये | इसलिए , इसे पल्यागसलाई की उपाधि दी गई |

एक दूसरा पाण्ड्य राजा बूथा पंडिया एक महान योद्धा था और तमिल कवियों का प्रशंसक भी था | आरियाप्पडाइकदंथा नेडुंजेलियन भी एक प्रसिद्ध पाण्ड्य शासक थे | उन्होने सिलप्पाथिगरम (महाकाव्य) के नायक को गलती से मृत्युदंड दे दिया था जिसका सच जानने पर उन्होने अपना जीवन त्याग दिया |

एक अन्य महत्वपुर्ण शासक थालाइयलंगनथु नेदुंजेल्लियन था जिसका शासन लगभग 210 A D  तक रहा जिसने चेरा, चोल और पाँच अन्य छोटे राज्यों की संघटित सेना को थलाइयलंगनम नामक जगह पर पराजित किया, जिसका व्याख्या 10 वीं सदी के अभिलेख में की गई है | इसने कई तमिल कवियों को आश्रेय दिया जिसमे मंगुड़ी मरुथनर भी थे | पाण्ड्य राज्य का  रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार था जिसने व्यापारियों को लाभान्वित किया और राज्य को धन संपन्न और खुशहाल बनाया | जतवर्मन सुंदरा पाण्ड्य ने पाण्ड्य साम्राज्य पर 1251-61 A D तक शासन किया जिसे श्रीलंका के द्वीपों को जीतने की वजह से “द्वितीय राम” कहा गया |

पाण्ड्य का शासन 14वीं शताब्दी के शुरुआत से खत्म होने लगा जब राजगद्दी के उत्तराधिकारियों के दावे  लिए मतभेद शुरू हो गए और एक दावेदार ने दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी,से मदद मांगी जिसका नतीजा मलिक काफ़ुर के नेतृत्व में सुलतान का आक्रमण था | मुस्लिम आक्रमण की वजह से पाण्ड्यों का सफाया हो गया |

चोल साम्राज्य 4

चोल साम्राज्य (9वीं सदी A D से 12वीं सदी A D तक) : मध्यकालीन चोल

विजयालय चोल

विजयालय चोल प्रथम मध्यकालीन  चोल शासक था जिसे चोल राज्य के पुनः स्थापना का श्रेय जाता है | उसकी अपनी राजधानी थंजौर में थी | विजयालय पललवा का सामंत था | इसने पादुकोट्टई मे सोलेस्वरा मंदिर का निर्माण कराया था |

आदित्य चोल 1

विजयालय की मृत्यु के बाद उसके पुत्र आदित्य चोल ने पदभार संभाला | शिव का बड़ा भक्त होने के कारण आदित्य ने कावेरी नदी के किनारों पर कई शिव मंदिरों का निर्माण कराया था  |

परांतका चोल 1

इसने पाण्ड्य राजा को हराया और मदुरकोण्डा का खिताब को धारण किया |

राजराजा  चोल 1

कुछ कम प्रसिद्ध राजाओं के बाद राजराजा  चोल 1 ने राजगद्दी संभाली | इसका नाम जन्म के समय अरुल्मोज़्हि वर्मन था | इसे अरुन्मोज़्हि उदयर पेरिया उदयर के नाम से भी जाना जाता है | इसके समय चोल राज्य ने पूरा तमिलनाडु, कर्नाटक, उड़ीसा के भाग और आंध्र प्रदेश, पूर्ण केरल  और श्रीलंका को जीत लिया था | राजराजा  चोल 1 ने थंजौर में राजराजेश्वरम मंदिर का निर्माण कराया जो अब यूनेस्को की विश्व धरोहर है | यह मंदिर पेरुवुडाइयर कोविल या बृहदीस्वरर मंदिर के नाम से जाना जाता है |

राजेंद्र चोल -1

राजराजा  चोल 1 के बाद 1014 A D में इसका बेटा राजेंद्र चोल 1 उत्तराधिकारी बना जिसने 1014 A D  तक शासन किया | वह राजराजा  चोल1 से भी ज्यादा महत्वाकांशी था | इसके द्वारा किए गए मुख्य आक्रमण और विजय निम्न हैं :

  • राजेंद्र चोल 1 ने पूर्ण श्रीलंका को जीत लिया और उसके राजा को 12 साल तक बंदी बनाए रखा |
  • पश्चिमी चालुक्य  के सम्राट को मसकी के युद्ध में हराने के बाद पूर्वी चालुक्य को भी जबरदस्ती आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया |
  • राजेंद्र चोल 1 की सेनाओं ने कलिंग, पाल और गंगाओं पर विजय प्राप्त की और इस कारण  इसे गंगाईकोंडा की उपाधि मिली  |
  • उल्लेखनीय ढंग से राजेंद्र 1 की जल सेना ने मालया और सुमात्रा राज्यों को पराजित किया तथा केदाह पर कब्जा कर लिया |
  • राजेंद्र चोल 1 ने चोल साम्राज्य की नई राजधानी गंगाईकोण्डा चोलपुरम, कलिंग, पाल और गंगाओं  के ऊपर विजय दर्शाने के लिए बनाई |

राजाधिराज चोल

राजेंद्र चोल-1 के बाद राजाधिराज ने राजगद्दी संभाली | वह मैसूर के निकट कोप्पम के युद्ध में मारा गया |

राजेंद्र चोल-II

कविता और नृत्य का महान संरक्षक, इसने अपना समर्थन संगीत नृत्य नाटिका राजराजेस्वर नाटकम को दिया

विराराजेन्द्र चोल

एक प्रभावकारी शासक जिसका शासन 1063-1070 A D तक था | वह राजेन्द्र चोल का छोटा भाई था | वह एक महान योद्धा के साथ साथ कला का महान प्रशंसक था |

इसके बाद अथिराजेन्द्र चोल के द्वारा पदभार संभाला गया जो अपने राज्य की रक्षा करने में ज्यादा शक्तिशाली नहीं था | उसके शासन में राष्ट्र विद्रोह हुआ जिसमे वह मारा गया | इसकी मृत्यु के बाद मध्यकालीन चोल राजवंश समाप्त हो गया |

 

चोल साम्राज्य 3

चोल साम्राज्य ( 9वीं सदी A D से 12वीं सदी A D तक) : बाद के चोल

बाद के चोल का युग 1070 A D से 1279 A D  तक रहा | इस समय तक चोल साम्राज्य ने अपने मुकाम को पा लिया था और विश्व का सबसे शक्तिशाली देश बन गया था | चोलाओं ने दक्षिण पूर्वी एशियन देशों पर कब्ज़ा कर लिया और इस समय इनके पास विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना और जल सेना थीं |

चोल राज्य का पतन

चोल साम्राज्य मे संकट आने के साथ विराराजेन्द्र चोला का 1070 A D  में देहांत हो गया | आगे, विक्रमादित्य V I,उसके बेटे ने स्मरणीय प्रतिष्ठा हासिल की और जल्दी ही चोल समाज का उत्तरदायित्व संभालना  शुरू कर दिया | जब विराराजेन्द्र का स्वर्गवास हुआ था तब चोल साम्राज्य में एक विद्रोह(शायद धार्मिक ) था |  विक्रमादित्य V I गंगाईकोण्डा चोलपुरम में एक माह के लिए रहे और उसके बाद अपनी राजधानी में फिर दौरा किया |गंगाईकोण्डा चोलपुरम मे उन्होने अथिराजेन्द्र को नया राजा बना दिया | दूसरी तरफ, कुछ ही महीनों में अथिराजेन्द्र एक नए विद्रोह के झोंके में फंस गए | जब अथिराजेन्द्र की मृत्यु हो गई, तब राजेंद्र चोल ने चोल राजगद्दी को हथिया लिया | यह चोल राजाओं के आरंभ की एक नई लकीर थी जिसे बाद के चोलाओं के तौर पर जाना गया |

कुलोत्थुंगा चोल-I (1070-1120 A D )

राजेंद्र चोल-1 की पुत्री  अम्मानगा देवी का विवाह पूर्वी चौलक्याओं के वेंगी राजा राजराजा नरेंद्र के साथ हुआ | इस एकीकरण की संतान थी राजेंद्र चोल जोकि बाद मे कुलोत्थुंगा-1 बना | कुलोत्थुंगा चोल-1 ने कलिंग में 2 सैनिक कार्यवाही करीं | कुलोत्थुंगा के नेतृत्व में श्रीलंका को निकालकर पूर्ण साम्राज्य में एकीकरण रहा | फिर भी पश्चिमी चौलक्या और चोल के बीच तुंगभद्रा नदी एक बाह्य सतह की तरह थी | 1120 A D  में विक्रम चोल इसका उत्तराधिकारी बना | 

विक्रम चोल 1120- 1135 A D  

कुलोत्थुंगा चोल=1 ने विक्रम  चोल को वेंगी का राजपाल नियुक्त किया | इसका आहवान 1118 A D में हुआ और इसे राज्य प्रतिनिधि नियुक्त घोषित कर दिया गया | इसने अपने पिता कुल्लोत्थुंगा के साथ  शासन किया जब तक उसके पिता का देहांत 1122 A D  में नहीं हो गया | पश्चिमी चौल्क्या बहुत ऊंची उड़ान भर रहे थे और उन्होने पूर्वी चौलकयाओं पर आक्रमण कर वेंगी को जीत लिया | 1133 A D  में कुल्लोत्थुंगा चोल II, विक्रम चोल का उत्तराधिकारी बना |

कुलोत्थुंगा चोल II 1138 A D -1150 A D

कुलोत्थुंगा चोल II विक्रम चोल का बेटा व उत्तराधिकारी था | इसके खाते में कोई भी ऐतिहासिक लड़ाई नहीं है | वह चिदम्बरम मंदिरों की धन आदि से सहायता  करता था | 1150 A D में राजराज चोल II इसका उत्तराधिकारी बना |

राजाराज चोल II  1150 -1173 A D

कुल्लोथुंगा चोल III  ने राजाराज चोल को अपना वारिस 1146 A D मे बनाया | उसका पूरा नियंत्रण कलिंग, वेंगी, चेरा, पाण्ड्य आदि के क्षेत्रों  पर था और इसने श्रीलंका को भी हमला किया परंतु इसके प्रभुत्व के अंतिम सालों में इसके साम्राज्य, जो पहले पाण्ड्य का क्षेत्र था ने राजनैतिक अशांति देखी |उसके गुजर जाने से पहले, उसने राजाधिराज चोल II को 1163 A D में अपना वारिस बना दिया | इसका उत्तराधिकारी राजाधिराज चोल II बना | 

राजाधिराज चोल II 1166 A D – 1178 A D

राजाधिराज चोल II, राजराज चोल II का उत्तराधिकारी बना | इसका शासन काल में चोल राज्य को आगे के दोषों के लिए जाना गया  जिसमें  पाण्ड्य  के बीच आम जागीरदारों का आधिपत्य था | पाण्ड्य के बीच राजनैतिक युद्ध हो गया जिसमे चोलाओं के दखलंदाज़ी व देखरेख की आवश्यकता पड़ी | परंतु पाण्ड्य को  प्रसिद्धि मिलने शुरू हो गई और केंद्र चोल राज्य धीरे धीरे कमजोर पड़ने लगे | 1178 A D में कुलोथूङ्गा चोल II, राजराज चोल का उत्तराधिकारी बना |

कुलोत्थुंगा चोल III  1178 -1218 A D      

कुलोत्थुंगा चोल III वेनाद के चेराओं, मदुरै में पाण्ड्य, श्रीलंका के सिंहला राजाओं  और मैसूर के होयसलाओं को बंदी बनाने मे सक्षम हुआ  | सदी ने घुमाव लिया और चोल साम्राज्य के दस्ता युक्त राजा जतवर्मन कुलसेकरन I ने चोलाओं के विरूद्ध विद्रोह किया और साल 1290 में मदुरा  राजगद्दी पर जीत हासिल की |  चोलाओं ने उस पर आक्रमण किया और मदुरै को हथिया लिया | जतवर्मन कुलसेकरन I  ने अपनी पत्नी व बेटे के साथ चोल राजा कुलोत्थुंगा के सामने हथियार डाल दिये  और उसके आत्मसमर्पण  के बाद , वह अपनी राजधानी दोबारा गया | परंतु इसके दौरान, मदुरै में पहले  पाण्ड्य का राज्याभिषेक भवन नष्ट हो गया  और इसमें वे तमाम दस्तावेज भी नष्ट हो गए जिनमे पाण्ड्य की पहले की कुछ जानकारी थी | इस हमले का बदला लेने के लिए कुलसेकरन के छोटे भाई मारवर्मन सुंदरा पाण्ड्य, जो 1216 A D  में शासन में आया, ने चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया | सुंदरा पाण्ड्य के राजाओं ने चोल राजाओं के थ्ंजौर और उरईयूर के शहरों पर कब्जा कर लिया और चोल राजाओं को देश से निकाल दिया |उसकी सेना ने चिदम्बरम तक की पद यात्रा की और उसकी विजय की याद मे चिदम्बरम मंदिर मे तुलाभारम  किया और उसके वज़न के बराबर धन का दान दिया | परंतु, चोलाओं के ऊपर सुंदर पाण्ड्य की विजय के लिए होयसला सेना ने सरी रंगापट्टम की ओर पदयात्रा की | होयसला राजा वीरा बाल्लला III के दाखल के बाद चोल राज्यों को लौटा दिया गया परंतु, अब चोलाओं ने सुंदर पाण्ड्य का आधिपत्य स्वीकार कर लिया | यह द्वितीय पाण्ड्य साम्राज्य का पुनः जागरण और शक्तिशाली चोल सत्ता का पतन था |

राजाराज चोल III 1216-1256 A D      

जुलाई 1216 में जब राजाराज चोल III की सत्ता आई , पूर्व चोलाओं की तुलना में चोल राज्य एक संक्षिप्त प्रांत था | पाण्ड्य का दक्षिण और वेंगी में अहम नियंत्रण था और दूसरे क्षेत्र होयसलाओं के अंदर थे | पाण्ड्य की सेना ने चोल राजधानी मे प्रवेश कर लिया और राजराज चोल III भाग गए | उन्हें सेंदमंगलम में कैद कर लिया गया | होयसला के राजा नरसिंहा ने दखल डाला और तभी चोल राजा को रिहा किया गया | राजराज चोल III ने अपने बेटे राजेन्द्र चोल को 1246 A D में वारिस बनाया |

राजेंद्र चोल III  1246- 1280 A D     

राजेंद्र चोल की प्रभुता 1246 A D मे आई | उसने चोल राज्यों के तेज़ी से हो रहे पतन को रोकना चाहा पर इस समय होयसला विरोधात्मक हो गए थे और पाण्ड्य प्रभावशाली बन गए थे | चोल राज्य का पतन राजेंद्र चोल के साथ हो गया |

चोल साम्राज्य 2nd

चोल साम्राज्य ( 9वीं सदी A D से 12वीं सदी A D तक) : बाद के चोल

बाद के चोल का युग 1070 A D से 1279 A D  तक रहा | इस समय तक चोल साम्राज्य ने अपने मुकाम को पा लिया था और विश्व का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बन गया था | चोलाओं ने दक्षिण पूर्वी एशियन देशों पर कब्ज़ा कर लिया और इस समय इनके पास विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना और जल सेना थीं |

चोल राज्य का पतन

चोल साम्राज्य मे संकट आने के साथ विराराजेन्द्र चोला का 1070 A D  में देहांत हो गया | आगे, विक्रमादित्य V I,उसके बेटे ने स्मरणीय प्रतिष्ठा हासिल की और जल्दी ही चोल समाज का उत्तरदायित्व संभालना  शुरू कर दिया | जब विराराजेन्द्र का स्वर्गवास हुआ था तब चोल साम्राज्य में एक विद्रोह (शायद धार्मिक ) था |  विक्रमादित्य V I गंगाईकोण्डा चोलपुरम में एक माह के लिए रहे और उसके बाद अपनी राजधानी में फिर दौरा किया |गंगाईकोण्डा चोलपुरम मे उन्होने अथिराजेन्द्र को नया राजा बना दिया | दूसरी तरफ, कुछ ही महीनों में अथिराजेन्द्र एक नए विद्रोह के झोंके में फंस गए | जब अथिराजेन्द्र की मृत्यु हो गई, तब राजेंद्र चोल ने चोल राजगद्दी को हथिया लिया | यह चोल राजाओं के आरंभ की एक नई लकीर थी जिसे बाद के चोलाओं के तौर पर जाना गया |

कुलोत्थुंगा चोल-I (1070-1120 A D )

राजेंद्र चोल-1 की पुत्री  अम्मानगा देवी का विवाह पूर्वी चालुक्यों के वेंगी राजा राजराजा नरेंद्र के साथ हुआ | इस एकीकरण की संतान थी राजेंद्र चोल जोकि बाद मे कुलोत्थुंगा-1 बना | कुलोत्थुंगा चोल-1 ने कलिंग में 2 सैनिक कार्यवाही करीं | कुलोत्थुंगा के नेतृत्व में श्रीलंका को निकालकर पूर्ण साम्राज्य में एकीकरण रहा | फिर भी पश्चिमी चालुक्यों और चोल के बीच तुंगभद्रा नदी एक बाह्य सतह की तरह थी | 1120 A D  में विक्रम चोल इसका उत्तराधिकारी बना | 

विक्रम चोल 1120- 1135 A D  

कुलोत्थुंगा चोल-1 ने विक्रम  चोल को वेंगी का राजपाल नियुक्त किया | इसका आहवान 1118 A D में हुआ और इसे राज्य प्रतिनिधि नियुक्त घोषित कर दिया गया | इसने अपने पिता कुल्लोत्थुंगा के साथ  शासन किया जब तक उसके पिता का देहांत 1122 A D  में नहीं हो गया | पश्चिमी चालुक्य बहुत ऊंची उड़ान भर रहे थे और उन्होने पूर्वी चालुक्य  पर आक्रमण कर वेंगी को जीत लिया | 1133 A D  में कुल्लोत्थुंगा चोल II, विक्रम चोल का उत्तराधिकारी बना |

कुलोत्थुंगा चोल II 1133 A D -1150 A D

कुलोत्थुंगा चोल II विक्रम चोल का बेटा व उत्तराधिकारी था | इसके खाते में कोई भी ऐतिहासिक लड़ाई नहीं है | वह चिदम्बरम मंदिरों की धन आदि से सहायता  करता था | 1150 A D में राजराजा चोल II इसका उत्तराधिकारी बना |

राजराजा चोल II  1150 -1173 A D

कुल्लोथुंगा चोल III  ने राजराजा चोल को अपना वारिस 1146 A D मे बनाया | उसका पूरा नियंत्रण कलिंग, वेंगी, चेरा, पाण्ड्य आदि के क्षेत्रों  पर था और इसने श्रीलंका को भी हमला किया परंतु इसके प्रभुत्व के अंतिम सालों में इसके साम्राज्य, जो पहले पाण्ड्य का क्षेत्र था ने राजनैतिक अशांति देखी |उसके गुजर जाने से पहले, उसने राजाधिराज चोल II को 1163 A D में अपना वारिस बना दिया | इसका उत्तराधिकारी राजाधिराज चोल II बना | 

राजाधिराज चोल II 1166 A D – 1178 A D

राजाधिराज चोल II, राजराजा चोल II का उत्तराधिकारी बना | इसका शासन काल में चोल राज्य को आगे के दोषों के लिए जाना गया  जिसमें  पाण्ड्य  के बीच आम जागीरदारों का आधिपत्य था | पाण्ड्य के बीच राजनैतिक युद्ध हो गया जिसमे चोलाओं के दखलंदाज़ी व देखरेख की आवश्यकता पड़ी | परंतु पाण्ड्य को  प्रसिद्धि मिलने शुरू हो गई और केंद्र चोल राज्य धीरे धीरे कमजोर पड़ने लगे | 1178 A D में कुलोथूङ्गा चोल II, राजराजा चोल का उत्तराधिकारी बना |

कुलोत्थुंगा चोल III  1178 -1218 A      

कुलोत्थुंगा चोल III वेनाद के चेराओं, मदुरै में पाण्ड्य, श्रीलंका के सिंहला राजाओं  और मैसूर के होयसलाओं को बंदी बनाने मे सक्षम हुआ  | सदी ने घुमाव लिया और चोल साम्राज्य के दस्ता युक्त राजा जतवर्मन कुलसेकरन I ने चोलाओं के विरूद्ध विद्रोह किया और साल 1290 में मदुरा राजगद्दी पर जीत हासिल की |  चोलाओं ने उस पर आक्रमण किया और मदुरै को हथिया लिया | जतवर्मन कुलसेकरन I ने अपनी पत्नी व बेटे के साथ चोल राजा कुलोत्थुंगा के सामने हथियार डाल दिये  और उसके आत्मसमर्पण  के बाद , वह अपनी राजधानी दोबारा गया | परंतु इसके दौरान, मदुरै में पहले  पाण्ड्य का राज्याभिषेक भवन नष्ट हो गया  और इसमें वे तमाम दस्तावेज भी नष्ट हो गए जिनमे पाण्ड्य की पहले की कुछ जानकारी थी | इस हमले का बदला लेने के लिए कुलसेकरन के छोटे भाई मारवर्मन सुंदरा पाण्ड्य, जो 1216 A D  में शासन में आया, ने चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया | सुंदरा पाण्ड्य के राजाओं ने चोल राजाओं के थ्ंजौर और उरईयूर के शहरों पर कब्जा कर लिया और चोल राजाओं को देश से निकाल दिया |उसकी सेना ने चिदम्बरम तक की पद यात्रा की और उसकी विजय की याद मे चिदम्बरम मंदिर मे तुलाभारम  किया और उसके वज़न के बराबर धन का दान दिया | परंतु, चोलाओं के ऊपर सुंदर पाण्ड्य की विजय के लिए होयसला सेना ने सरी रंगापट्टम की ओर पदयात्रा की | होयसला राजा वीरा बाल्लला III के दाखल के बाद चोल राज्यों को लौटा दिया गया परंतु, अब चोलाओं ने सुंदर पाण्ड्य का आधिपत्य स्वीकार कर लिया | यह द्वितीय पाण्ड्य साम्राज्य का पुनः जागरण और शक्तिशाली चोल सत्ता का पतन था |

राजराजा चोल III 1216-1256 A D      

जुलाई 1216 में जब राजाराज चोल III की सत्ता आई , पूर्व चोलाओं की तुलना में चोल राज्य एक संक्षिप्त प्रांत था | पाण्ड्य का दक्षिण और वेंगी में अहम नियंत्रण था और दूसरे क्षेत्र होयसलाओं के अंदर थे | पाण्ड्य की सेना ने चोल राजधानी मे प्रवेश कर लिया और राजराजा चोल III भाग गए | उन्हें सेंदमंगलम में कैद कर लिया गया | होयसला के राजा नरसिंहा ने दखल डाला और तभी चोल राजा को रिहा किया गया | राजराजा चोल III ने अपने बेटे राजेन्द्र चोल को 1246 A D में वारिस बनाया |

राजेंद्र चोल III  1246- 1280 A     

राजेंद्र चोल की प्रभुता 1246 A D मे आई | उसने चोल राज्यों के तेज़ी से हो रहे पतन को रोकना चाहा पर इस समय होयसला विरोधात्मक हो गए थे और पाण्ड्य प्रभावशाली बन गए थे | चोल राज्य का पतन राजेंद्र चोल के साथ हो गया |

चोल साम्राज्य

चोल राज्य : प्रशासन, कला और वास्तु-कला

चोल प्रशासन

चोल की राजधानी तंजोर (तंजावुर ) थी | चोल साम्राज्य तीन प्रशासनिक इकाइयों में बंटा था जिसे केंद्र सरकार, अस्थायी सरकार तथा स्थानीय सरकार कहा गया | उत्तरामेरुर अभिलेख चोल के प्रशसन पर रोशनी डालते हैं |

प्रशासन का नेतृत्व राजा करता था | चोल शासन स्वरूप में  वंशानुगत था | चोल के शाही पारिवारिक परंपरा के अनुसार, चोल राजा की गद्दी का अनुगामी हकदार सबसे बड़ा बेटा होगा | स्पष्ट रूप से उत्तराधिकारी को युवराज कहा जाता था | चोल राजाओं का शाही चिन्ह शेर था | राजा की उसके काम में मदद उसके मंत्रियों की सभा करती थी | निम्न अधिकारियों को सिरुंतरम कहा जाता था जबकि उच्च अधिकारियों को पेरुंतरम कहा जाता था |

पूर्ण साम्राज्य नौ प्रान्तों में विभाजित था जिसे मंडलम कहा गया | हर एक प्रांत का नेतृत्व  राजपाल करता था जोकि राजा से आदेश प्राप्त करता था | हर मंडलों को कोट्टम्स या वलनदुस में विभाजित किया जाता था जिसे आगे नाडु में प्रविभाजित किया था | प्रत्येक नाडु आगे गाँव में विभाजित था जिसे  उर्स कहा गया |

चोल सरकार पूरी तरह से भूमि कर पर जोकि उनकी आय का मुख्य स्त्रोत था निर्भर थी | भूमि उपज का 1/6 भाग कर के रूप में इकट्ठा किया जाता था | भूमि राजस्व के अलावा आयात कर व पथ कर भी साम्राज्य के आय के स्त्रोत थे | इसके अलावा बंदरगाहों, वनों तथा खदानों के ऊपर  कर भी राजा के संपत्ति में  इकट्ठा किया जाता था |

चोलाओं के पास सक्षम सेना तथा जल सेना थी | सेना 70 रेजिमेंटों से बनी थी |  चोल राजा उच्च कोटी के अरबी घोड़ों का आयात ऊंची कीमत पर करते थे |

चोल राजा मुख्य न्यायाधीश का भी काम करते थे क्यूंकि बड़े मुकदमों की पैरवी वह अपने आप करते थे | ग्राम स्तर के छोटे विवाद ग्राम सभा में सुलझा लिए जाते थे |

चोलाओं की एक प्रमुख प्रशासनिक इकाई नाडु थी | प्रत्येक नाडु का नेतृत्व  नात्तर के द्वारा किया जाता था जबकि नाडु की सभा को नत्तवई कहा जाता था | ग्राम प्रशासन की पूरी ज़िम्मेदारी चोल प्रशासन की निम्न इकाई  जिसे ग्राम सभा के नाम से जाना गया  पर थी | यह सड़कों , तालाबों, मंदिरों तथा सार्वजनिक तालाबों का रख-रखाव करती थीं | ग्राम सभा गावों से बकाया कर अदा करने की प्रभारी थी जो राजा की संपत्ति में जाता था |

ग्राम प्रशासन को वरियंस के द्वारा प्रभावशाली तरीके से चलाया जाता था जिसमे समाज के पुरुष सदस्य थे | वारियंस दो प्रकार के होते थे | उदहारण  के लिए न्याय प्रशासन न्याय वरियम के द्वारा किया जाता था जबकि मंदिरों का  धर्म वारीयन द्वारा देख रेख किया जाता था | वित्त व्यवस्था की देखरेख की ज़िम्मेदारी पोण वरियम को दी गई थी |

चोल वास्तुकला

चोल साम्राज्य में वास्तुकला फलीफूली तथा इसका अंत  850 A D के बाद हुआ |  सबसे बड़ी इमारतें मंदिरों के रूप में इस युग के दौरान बनीं |

चोल वास्तुकला की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं :-

  • तंजौर / तंजावुर का शिव मंदिर, सभी भारतीय मंदिरों में सबसे बड़ा व लंबा मंदिर चोल युग में बना |
  • चोल मंदिरों में मंडप के प्रवेश द्वारों पर द्वारपाल या रक्षकों की आकृतियाँ बनी होती थीं  |
  • मंदिरों में पूरी तरह से द्रविड़ शैली विकसित थी |
  • मंदिरों में बनाए गए गणों के आकृतियाँ सबसे यादगार होती थीं |

विजयालया चोलीस्वरा मंदिर के दौरान बनाए गए कुछ  प्रसिद्ध मंदिर निम्न हैं :-

विजयालया चोल के शासन के दौरान नरथमलाई मे विजयालया चोलीस्वरा मंदिर पूरी तरह भगवान शिव को समर्पित है |

कावेरी नदी के किनारे पर कोरंगनाथ मंदिर,श्रीनिवासनल्लुर परांतका चोल – 1 के द्वारा बनाया गया | यह श्रीनिवासनल्लुर में स्थित है | चोल वास्तुकला के अनूठे व आवर्ती काल्पनिक पशु यजही को मंदिर के स्तंभों पर उकेरा जाता था | बृहदीस्वरर मंदिर या पेरुवुदाइयर कोविल या राजराजेश्वरम मंदिर पूरी तरह चट्टानों से बने हैं | राजराज चोल-1 के द्वारा बनाया गया यह विश्व का पहला मंदिर है साथ ही साथ यह यूनेस्को की विश्व धरोहर है | यह तंजावुर में  स्थित है |

गंगाईकोण्डाचोलापुरम राजाराज के बेटे राजेंद्र 1 के द्वारा बनाया गया | गंगाईकोण्डाचोलापुरम चौलक्य, गंगा , पाल तथा कलिंग पर राजेंद्र 1 के विजय प्राप्त करने पर एक नई राजधानी बनी |

गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म

गौतम बुद्ध : बौद्ध धर्म के विषय में संक्षिप्त जानकारी

गौतम बुद्ध का जन्म

बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध थे. गौतम बुद्ध का जन्म 567 ई.पू. कपिलवस्तु के लुम्बनी नामक स्थान पर हुआ था. इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था. गौतम बुद्ध का विवाह 16 वर्ष की अवस्था में यशोधरा के साथ हुआ. इनके पुत्र का नाम राहुल था.

गृह-त्याग और शिक्षा ग्रहण

सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की अवस्था में गृह-त्याग किया, जिसे बौद्धधर्म में 'महाभिनिष्क्रमण” कहा गया है. गृह-त्याग करने के बाद सिद्धार्थ (बुद्ध) ने वैशाली के आलारकलाम से सांख्य धर्षण की शिक्षा ग्रहण की. आलारकलाम सिद्धार्थ के प्रथम गुरु हुए थे. आलारकलाम के बाद सिद्धार्थ ने राजगीर के रुद्र्करामपुत्त से शिक्षा ग्रहण की.

ज्ञान प्राप्ति

35 वर्ष की आयु में वैशाख की पूर्णिमा की रात निरंजना (फल्गु) नदी के किनारे, पीपल के वृक्ष के नीचे, सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ था. ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जाने गए.

प्रथम उपदेश

बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ (ऋषिपतनम)  में दिया, जिसे बौद्ध ग्रंथों में 'धर्मचक्र प्रवर्त्तन” कहा गया है. बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए.

मृत्यु

बुद्ध की मृत्यु 80 वर्ष की अवस्था में 483 ई.पू. में कुशीनगर (देवरिया, उत्तर प्रदेश) में चुंद द्वारा अर्पित भोजन करने के बाद हो गयी, जिसे बौद्ध धर्म में 'महापरिनिर्वाण” कहा गया है.

निर्वाण-प्राप्ति

बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति के लिए निम्न दस शीलों पर बल दिया है. ये शील हैं -

  1. अहिंसा
  2. सत्य
  3. अस्तेय (चोरी नहीं करना)
  4. अपरिग्रह (किसी प्रकार की संपत्ति नहीं रखना)
  5. मदिरा सेवन नहीं करना
  6. असमय भोजन नहीं करना
  7. सुखप्रद बिस्तर पर नहीं सोना
  8. धन-संचय नहीं करना
  9. स्त्रियों से दूर रहना और
  10. नृत्य-गान आदि से दूर रहना

अष्टांगिक मार्ग (Astangik Marg)

बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग की बात कही है. ये मार्ग हैं -

  • सम्यक् कर्मान्त
  • सम्यक् संकल्प
  • सम्यक् वाणी
  • सम्यक् कर्मान्त
  • सम्यक् आजीव
  • सम्यक् व्यायाम
  • सम्यक् स्मृति एवं
  • सम्यक् समाधि

बौद्ध सभाएँ

सभासमयस्थानअध्यक्षशासनकाल
प्रथम बौद्ध संगति483 ई.पू.राजगृहमहाकश्यपअजातशत्रु
द्वितीय बौद्ध संगति383 ई.पू.वैशालीसबाकामीकालाशोक
तृतीय बौद्ध संगति255 ई.पू.पाटलिपुत्रमोग्गलिपुत्त तिस्सअशोक
चतुर्थ बौद्ध संगतिई. की प्रथम शताब्दीकुंडलवनवसुमित्र/अश्वघोषकनिष्क

 

'विश्व दुःखों से भरा है” का यह सिद्धांत बुद्ध ने उपनिषद् से लिया था. बौद्धसंघ में प्रविष्ट होने को 'उपसंपदा” कहा गया है. बौद्ध धर्म के तीन रत्न (त्रिरत्न) हैं - बुद्ध, धम्म और संघ. चतुर्थ बौद्ध संगीति के पश्चात् बौद्ध धर्म दो भागों में विभाजित हो गया - हीनयान और महायान.

गुप्त सामाज्य

गुप्त साम्राज्य - Gupt Empire के प्रमुख शासक

प्रशस्ति और चरित

गुप्तकाल में प्रशस्ति लेखन का विकास हुआ. प्रशस्ति लेख एक विशेष रूप का अभिलेख होता था, जिसमें राजा की प्रसंशा की जाती थी. इन प्रशस्तियों में राजा की उपलब्धियों के साथ-साथ उनकी महानता के विषय में भी लिखा जाता था. हरिसेन, वत्सभट्टि, वासुल आदि प्रमुख प्रशस्ति लेखक थे. इनकी प्रशस्तियाँ गुप्तकाल के इतिहास की जानकारी के प्रमुख स्रोत हैं. इसी प्रकार बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरित और कादम्बरी हर्षवर्धन काल के इतिहास की जानकारी मिलती है. रामपालचरित पाल शासक रामपाल के क्रियाकलापों का वर्णन करता है और तत्कालीन बंगाल की जानकारी देता है. चालुक्य राजा विक्रमादित्य पर विक्रमांकदेवचरित लिखा गया.

चन्द्रगुप्त प्रथम

कुषाणकाल में मगध की शक्ति और महत्ता समाप्त हो गई थी. चन्द्रगुप्त प्रथम ने इसको पुनः स्थापित किया. उसने साकेत (अयोध्या) और प्रयाग (इलाहाबाद) तक मगध का विस्तार किया. वह पाटलिपुत्र से शासन करता था. उसने लिच्छवी वंश की राजकुमारी से विवाह किया था. इस सम्बन्ध से मगध तथा लिच्छवियों के बीच सम्बन्ध अच्छे हुए और गुप्तवंश की प्रतिष्ठा बढ़ी. चन्द्रगुप्त ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी.

समुद्रगुप्त

समुद्रगुप्त चन्द्रगुप्त प्रथम का पुत्र था. सभी गुप्त शासकों में वह सबसे महान था. वह एक कुशल योद्धा, विद्वान, संगीतग्य और कवि था. इसके साथ ही वह एक कुशल शासक भी था. उसने खुद हिन्दू धर्म का अनुयायी होते हुए भी बौद्ध और जैन धर्मों का सम्मान किया. उन धर्मों के प्रति सहिष्णुता की नीति उसने अपनाई.

इतिहास में समुद्रगुप्त का नाम एक विजेता और साम्राज्य निर्माता के रूप में लिया जाता है. उसके विजय अभियान के विषय में हमें इलाहाबाद की प्रशस्ति से पता चलता है.एरण अभिलेख और सिक्कों से भी समुद्रगुप्त के समय की जानकारी मिलती है. उस समय की अधिकांश प्रशस्तियाँ राजाओं के पूर्वजों के सम्बन्ध में जानकारी देती हैं. इलाहाबाद प्रशस्ति के अलावा समुद्रगुप्त के बारे में चन्द्रगुप्त द्वितीय की 'वंशावली” (पूर्वजों की सूची) से भी जानकारी मिलती है. ये स्रोत हमें बताते हैं कि समुद्रगुप्त ने भी महाराजधिराज की उपाधि धारण की थी.

समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिसेण ने संस्कृत में प्रशस्ति लिखी है और बताया है कि समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत के 9 राज्यों को हराया था. ये राज्य थे - दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र आदि, जिनको उसने अपने साम्राज्य में मिलाया था. समुद्रगुप्त ने दक्षिण के 12 राज्यों को भी जीता था. ये राज्य थे - उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, पल्लव आदि. अभिलेख (edicts) बताते हैं कि इन राज्यों के समर्पण के बाद समुद्रगुप्त ने इनका राज्य वापस कर दिया, परन्तु इस शर्त पर कि ये उसको नियमित कर और नजराना देते रहेंगे. समुद्रगुप्त ने मध्य भारत की जंगली जातियों को भी अपने अधीन किया. समुद्रगुप्त के बारे में और भी विस्तार से पढ़ें >> समुद्रगुप्त

चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य)

समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय हुआ. इसका दूसरा नाम देवराज या देवगुप्त भी था. यह चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नाम से भी जाना जाता था. महरौली लौह स्तम्भ से इसके बारे में जानकारी मिलती है. माना जाता है कि जब राज्गुप्त अपनी पत्नी ध्रुवदेवी को शक शासक को सौंपने के लिए तैयार हुआ तब चन्द्रगुप्त ने शक खेमे घुसकर शक शासक को मार डाला. बाद में उसने रामगुप्त को मार डाला और ध्रुवदेवी से शादी करके खुद राजा बन गया. उदयगिरि, साँची, मथुरा के अभिलेख, महरौली (दिल्ली) के लौह-स्तम्भ अभिलेख और सिक्के चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय की जानकारी के स्रोत हैं. इन स्रोतों से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय ने गुजरात, मालवा और सौराष्ट्र के शकों को हराकर उनके क्षेत्रों को अधीन कर लिया. इस सफलता से चन्द्रगुप्त द्वितीय को पश्चिमी समुद्रगुप्त प्राप्त हुआ. भड़ौंच, कैम्बे और सोपारा के बंदरगाह पर उसका नियंत्रण हो गया. इस कारण वह अपने राज्य के वाणिज्य-व्यापार को बढ़ा सका. उसने उज्जयिनी को अपनी दूसरी राजधानी बनाई.

कुमारगुप्त प्रथम

चन्द्रगुप्त प्रथम और द्वितीय और समुद्रगुप्त के समान कुमारगुप्त प्रथम भी गुप्त साम्राज्य का एक महान शासक था. उसने शासनकाल की जानकारी भितरी अभिलेख, भिल्साद स्तम्भ अभिलेख, गढ़वा अभिलेख और मनकुवार मूर्ति अभिलेख से मिलती है. अनेक गुप्त राजाओं की तरह कुमारगुप्त प्रथम ने भी सिक्के (coins) निकाले. इन सिक्कों से उसके शासनकाल के विषय में जरुरी जानकारी मिलती है. उसने 40 वर्षों तक शासन किया था. इन अभलेखों में कुमारगुप्त के अनेक नाम मिलते हैं - श्रीमहेन्द्र, अजितमहेंद्र, महेंद्रात्य, महेंद्रकुमार आदि.

स्कन्दगुप्त

कुमारगुप्त के पुत्र स्कन्दगुप्त ने शकों तथा हूणों को हराया था. उसने शकरादित्य की उपाधि धारण की थी. इस समय हूणों ने उत्तर पश्चिम से कई बार आक्रमण किया था. गुप्त शासकों ने साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की थी. इसका लाभ उठाकर हूणों ने भारत पर आक्रमण किया जिससे गुप्त साम्राज्य कमजोर हो गया और उसका पतन होने लगा. गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद कई राज्यों का उदय हुआ जिनमें प्रमुख थे - उत्तर भारत में कन्नौज के हर्षवर्धन का राज्य और दक्षिण भारत में वातापी के चालुक्य और काँचीपुरम के पल्लवों का राज्य.

#गुप्त काल का जीवन, #पाटलीपुत्र, #बिहार,# भारत

गुप्त काल के बाद आर्थिक, सामाजिक जीवन और मंदिर वास्तुकला

समाज का अवलोकन:  गुप्त काल के बाद भारतीय समाज में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। पांचवीं सदी ईस्वी के बाद से भारत में भूमि अनुदान ने सामंती विकास में मदद की। किसान सामंती अधिपतियों के लिए दी गई भूमि में रुके ठहरे रहे थे। इनमें जिन गांवो को स्थानांतरित कर दिया गया था उन्हें ‘स्थान-जन-सहिता’ और ‘समरिद्धा’ के नाम से जाना जाता था। गुप्त काल के बाद की अवधि में व्यापार और वाणिज्य में गिरावट के कारण वहां की अर्थव्यस्था एक बंद अर्थव्यवस्था में तब्दील हो चुकी थी।

सामंती समाज के विकास ने राजा की स्थिति कमजोर कर दी थी जिस कारण राजा को सामंती प्रमुखों पर ज्यादा अधिक निर्भर रहना पडता था। सामंती प्रमुखों का वर्चस्व बढ़ने लगा था जिसके परिणामस्वरूप गांव का स्वशासन कमजोर हो गया था।

ह्वेनसांग के लेखन में उल्लेखित चार वर्ण समाज में मौजूद थे। उस कई उप जातियां भी मौजूद थी जो उस समय और प्रबल हो गयीं थी। इस अवधि के दौरान महिलाओं की स्थिति बहुत बिगड़ गयी थी। सतीप्रथा और दहेजप्रथा आम हो गयी थी।

लड़कियों की शादी छह से आठ साल की उम्र के बीच होने लगी थी। सामान्य महिला पर विश्वास नहीं किया जाता था। उन्हे पृथक (अलग) रखा जाता था। आम तौर पर महिलाओं के जीवन को उनके पुरूष रिश्तेदारों जैसे- बेटे, पिता, और भाई द्वारा नियंत्रित किया जाता था।

अर्थव्यवस्था

हर्ष शासन की अवधि के दौरान साहित्यिक और शिलालेखीय साक्ष्यों से पता चलता है कि राज्य कृषि, व्यापार और अर्थव्यवस्था में किस प्रकार उन्नत था। शुरूआती अरब लेखकों ने भी मिट्टी की उर्वरता और अमीर खेती का वर्णन किया है। साहित्यकार अभिधन रत्नमल ने उल्लेखित किया है मिट्टी को विभिन्न प्रकारों में जैसे उपजाऊ, बंजर, रेगिस्तान, उत्कृष्ट आदि के रूप में वर्गीकृत किया गया था। उन्होंने यह भी उल्लेखित किया है कि विभिन्न प्रकार के फसलों के लिए विभिन्न मैदानों का चयन किया जाता था। 

उद्योग के क्षेत्र में कपड़ा सबसे पुराने उदयोगों में से एक था।  समकालीन साहित्य में बुनकर, रंगरेज, दर्जी आदि के पेशे का वर्णन किया गया है। इस अवधि के दौरान धातु का काम भी बेहद लोकप्रिय था। धातु उद्योग के कुछ केन्द्र प्रसिद्ध थे। सौराष्ट्र अपने घंटी (बेल) धातु उद्योग के लिए प्रसिद्ध था जबकि वंगा (बंगाल) अपने टिन उद्योग के लिए जाना जाता था।

गुप्त काल के बाद दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुयी थी। भारत के माध्यम से पूर्व और पश्चिम के बीच व्यापार के प्रवाह का उल्लेख अरब, चीनी और भारतीय स्त्रोतों में किया है। भारत, चंदन की लकड़ी, मोती, कपूर, कपास, धातु, कीमती और अर्द्ध कीमती पत्थरों का निर्यात करता था। आयातित वस्तुओं में किराए के घोड़े शामिल थे। घोड़ों को मध्य और पश्चिमी एशिया से आयात किया जाता था। गुप्त काल में श्राइन या निकाय महत्वपूर्ण होते थे।

कला और वास्तुकला

गुप्त काल के बाद मंदिरों को दो वर्गों में विभाजित किया गया था जैसे- उत्तर भारतीय शैली (नगारा) और दक्षिण भारतीय शैली (द्रविड़)। उड़ीसा के प्रसिद्ध मंदिर उत्तर भारतीय शैली (नगारा) के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ये मंदिर मुख्यत: दो भागों में हैं,  छत पर वक्रीय शिखर के साथ सेला या गर्भगृह और एक द्वारमंडप या पिरामिडीय छत आवरण। भुवनेश्वर का महान लिंगराज मंदिर और कोणार्क का सूर्य मंदिर इस प्रकार का सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं।

चंदेल शासकों द्वारा निर्मित खजुराहो के मंदिर, मंदिर वास्तुकला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान  दिया।

ममल्लापुरम में चट्टानों को काटकर बनाये गये मंदिर को रथ कहा जाता है और कांची के मंदिरों को कैलाशनाथ कहा जाता है तथा वैकुंठ पेरूमल दक्षिण भारतीय या द्रविड़ शैली का सबसे पहला उदाहरण हैं।

दक्षिण भारतीय या द्रविड़ शैली का सबसे पहला उदाहरण ममल्लापुरम में चट्टानों को काटकर बनाया गया मंदिर रथ के रूप में जाना जाता है, और कांची में संरचनात्मक मंदिरों को कैलाशनाथ और वैकुंठनाथ पेरूमल के रूप में जाना जाता है। ये सभी मंदिर पल्लव द्वारा निर्मित किये गये थे। तंजौर और गंगेईकोंडाचोलपुरम में दो भव्य मंदिर चोलों द्वारा बनाये गये थे।

दक्षिण भारतीय मंदिरों में शिखरों  या टावरों को पिरामिडीय टावर के रूप में चिह्नित किया गया था जो सीधे खड़े थे। गुप्तकाल के दौरान मूर्तिकला में तेजी से गिरावट आई। हालांकि,  पाल अवधि के दौरान पूर्वी भारत की मूर्तिकला में एक बेहतरीन उत्कृष्टता देखने को मिली। उड़ीसा की मूर्तिकला ने मानकता के उच्च मानदंड हासिल किये थे।

कन्नौज के लिए संघर्ष यदुवंशी साम्राज्य

कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष

8वीं सदी के दौरान, कन्नौज पर नियंत्रण के लिए भारत के तीन प्रमुख साम्राज्यों जिनके नाम पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट थे, के बीच संघर्ष हुआ था। पालों का भारत के पूर्वी भागों पर शासन था जबकि प्रतिहार के नियंत्रण में पश्चिमी भारत (अवंती-जालौर क्षेत्र) था। राष्ट्रकूटों ने भारत के डक्कन क्षेत्र पर शासन किया था। इन तीन राजवंशों के बीच कन्नौज पर नियंत्रण के लिए हुए संघर्ष को भारतीय इतिहास में त्रिपक्षीय संघर्ष के रूप में जाना जाता है।

कन्नौज के लिए दोनों धर्मपाल, पाल राजा और प्रतिहार राजा, वत्सराज एक दूसरे के खिलाफ भिड़ गए। प्रतिहार राजा, वत्सराज विजयी हुआ लेकिन उन्हें राष्ट्रकूट राजा ध्रुव प्रथम से हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, राष्ट्रकूट राजा दक्षिण में अपने राज्य को लौट गये, पाल राजा धर्मपाल ने स्थिति का फायदा उठाते हुए कन्नौज पर कब्जा कर लिया। लेकिन कन्नौज पर उसका नियंत्रण अस्थायी था।

इस प्रकार त्रिपक्षीय संघर्ष शुरू हुआ जो दो सदियों तक चला और इसने लंबे समय तक सभी तीन राजवंशों को कमजोर किया। इसके परिणामस्वरूप देश का राजनीतिक विघटन हुआ और इसका लाभ मध्य-पूर्व से इस्लामी आक्रमणकारियों को हुआ।

कन्नौज का महत्व

कन्नौज गंगा व्यापार मार्ग पर स्थित था और रेशम मार्ग से जुड़ा था। इससे कन्नौज रणनीतिक और व्यावसायिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण बन गया था। कन्नौज उत्तर भारत में हर्षवर्धन के साम्राज्य की तत्कालीन राजधानी भी थी।

यशोवर्मन ने कन्नौज में 730 ईस्वी के आसपास साम्राज्य स्थापित किया। वह वज्रायुध, इंद्रायुध और चक्रायुध नाम के तीन राजाओं का अनुगामी बना जिन्होंने कन्नौज पर 8वीं सदी के अंत से 9वीं शताब्दी के पहली तिमाही तक राज किया था।

दुर्भाग्य से, ये शासक कमजोर साबित हुए और कन्नौज की विशाल आर्थिक और सामरिक क्षमता का लाभ लेने के लिए कन्नौज के शासक,  भीनमल (राजस्थान) के गुर्जर-प्रतिहार,  बंगाल के पाल  और बिहार तथा मान्यखेत (कर्नाटक) के राष्ट्रकूट एक दूसरे के खिलाफ युद्ध करते रहे।

कन्नौज के लिए यह त्रिपक्षीय संघर्ष लगभग दो सौ वर्षों चला और अंतत: इसका परिणाम गुर्जर-प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय के पक्ष में रहने के साथ इस युद्ध का समापन हो गया। नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज को गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी बनाया। इस साम्राज्य ने लगभग तीन सदियों तक शासन किया।

सम्राट कनिष्क 78 वी ईस्वी पूर्व

कनिष्क: कुषाण राजवंश (78 ईस्वी - 103 ईस्वी)

कनिष्क कुषाण साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली शासक था। उसके साम्राज्य की राजधानी पुरूषपुर (पेशावर) थी। उसके शासन के दौरान, कुषाण साम्राज्य उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान से लेकर मथुरा और कश्मीर तक फैल गया था। रबातक शिलालेख से प्राप्त जानकारी के अनुसार कनिष्क विम कदफिसेस का उत्तराधिकारी था जिसने कुषाण राजाओं की एक प्रभावशाली वंशावली स्थापित की।

कनिष्क साम्राज्य का विस्तार:

कनिष्क साम्राज्य निश्चित रूप से बहुत बड़ा था। यह दक्षिणी उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान से उत्तर पश्चिम में अमू दरिया के उत्तर (ऑक्सस) से पश्चिम पाकिस्तान और उत्तरी भारत के साथ-साथ दक्षिण पूर्व में मथुरा (रबातक शिलालेख में यहां तक दावा किया गया है कि उसने पाटलिपुत्र और श्री चंपा को संघटित कर लिया था) तक फैल गया था और कश्मीर को भी अपने अधिकार क्षेत्र में शामिल कर लिया था जहां कनिष्कपुर नाम का एक शहर था। उसके नाम से बारामूला दर्रा ज्यादा दूर नहीं था जिसमें अभी भी एक बड़े स्तूप का आधार मौजूद है।

कनिष्क से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य निम्न प्रकार से हैं:

  • कनिष्क के शासनकाल के दौरान बौद्ध धर्म महायान और हीनयान में विभाजित किया गया था।
  • वह 78 ईस्वी शक युग का संस्थापक था।
  • उसने पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया था और पुरूषपुर से बौद्ध भिक्षु अश्वघोष को ले लिया था।
  • चरक और सुश्रुत कनिष्क के दरबार में रहते थे।
  • कनिष्क बौद्ध धर्म का संरक्षक था और उसने 78 ईस्वी में कश्मीर के कुंडलवन में चौथी बौद्ध परिषद बुलायी थी।
  • परिषद की अध्यक्षता वासुमित्र द्वारा की गयी थी और इस परिषद के दौरान बौद्ध ग्रंथों का संग्रह लाया गया था और टिप्पणियों को ताम्र पत्र पर उत्कीर्ण किया गया था।
  • कनिष्क के दरबार में रहने वाले विद्वानों में वासुमित्र, अश्वघोष, नागार्जुन, चरक और पार्श्व शामिल थे
  • कनिष्क ने चीन में हान राजवंश के राजा हान हो-ती के खिलाफ युद्ध किया। कनिष्क ने दूसरे प्रयास में चीनी राजा को पराजित किया था।

सनातन

फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...