चोल साम्राज्य

चोल राज्य : प्रशासन, कला और वास्तु-कला

चोल प्रशासन

चोल की राजधानी तंजोर (तंजावुर ) थी | चोल साम्राज्य तीन प्रशासनिक इकाइयों में बंटा था जिसे केंद्र सरकार, अस्थायी सरकार तथा स्थानीय सरकार कहा गया | उत्तरामेरुर अभिलेख चोल के प्रशसन पर रोशनी डालते हैं |

प्रशासन का नेतृत्व राजा करता था | चोल शासन स्वरूप में  वंशानुगत था | चोल के शाही पारिवारिक परंपरा के अनुसार, चोल राजा की गद्दी का अनुगामी हकदार सबसे बड़ा बेटा होगा | स्पष्ट रूप से उत्तराधिकारी को युवराज कहा जाता था | चोल राजाओं का शाही चिन्ह शेर था | राजा की उसके काम में मदद उसके मंत्रियों की सभा करती थी | निम्न अधिकारियों को सिरुंतरम कहा जाता था जबकि उच्च अधिकारियों को पेरुंतरम कहा जाता था |

पूर्ण साम्राज्य नौ प्रान्तों में विभाजित था जिसे मंडलम कहा गया | हर एक प्रांत का नेतृत्व  राजपाल करता था जोकि राजा से आदेश प्राप्त करता था | हर मंडलों को कोट्टम्स या वलनदुस में विभाजित किया जाता था जिसे आगे नाडु में प्रविभाजित किया था | प्रत्येक नाडु आगे गाँव में विभाजित था जिसे  उर्स कहा गया |

चोल सरकार पूरी तरह से भूमि कर पर जोकि उनकी आय का मुख्य स्त्रोत था निर्भर थी | भूमि उपज का 1/6 भाग कर के रूप में इकट्ठा किया जाता था | भूमि राजस्व के अलावा आयात कर व पथ कर भी साम्राज्य के आय के स्त्रोत थे | इसके अलावा बंदरगाहों, वनों तथा खदानों के ऊपर  कर भी राजा के संपत्ति में  इकट्ठा किया जाता था |

चोलाओं के पास सक्षम सेना तथा जल सेना थी | सेना 70 रेजिमेंटों से बनी थी |  चोल राजा उच्च कोटी के अरबी घोड़ों का आयात ऊंची कीमत पर करते थे |

चोल राजा मुख्य न्यायाधीश का भी काम करते थे क्यूंकि बड़े मुकदमों की पैरवी वह अपने आप करते थे | ग्राम स्तर के छोटे विवाद ग्राम सभा में सुलझा लिए जाते थे |

चोलाओं की एक प्रमुख प्रशासनिक इकाई नाडु थी | प्रत्येक नाडु का नेतृत्व  नात्तर के द्वारा किया जाता था जबकि नाडु की सभा को नत्तवई कहा जाता था | ग्राम प्रशासन की पूरी ज़िम्मेदारी चोल प्रशासन की निम्न इकाई  जिसे ग्राम सभा के नाम से जाना गया  पर थी | यह सड़कों , तालाबों, मंदिरों तथा सार्वजनिक तालाबों का रख-रखाव करती थीं | ग्राम सभा गावों से बकाया कर अदा करने की प्रभारी थी जो राजा की संपत्ति में जाता था |

ग्राम प्रशासन को वरियंस के द्वारा प्रभावशाली तरीके से चलाया जाता था जिसमे समाज के पुरुष सदस्य थे | वारियंस दो प्रकार के होते थे | उदहारण  के लिए न्याय प्रशासन न्याय वरियम के द्वारा किया जाता था जबकि मंदिरों का  धर्म वारीयन द्वारा देख रेख किया जाता था | वित्त व्यवस्था की देखरेख की ज़िम्मेदारी पोण वरियम को दी गई थी |

चोल वास्तुकला

चोल साम्राज्य में वास्तुकला फलीफूली तथा इसका अंत  850 A D के बाद हुआ |  सबसे बड़ी इमारतें मंदिरों के रूप में इस युग के दौरान बनीं |

चोल वास्तुकला की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं :-

  • तंजौर / तंजावुर का शिव मंदिर, सभी भारतीय मंदिरों में सबसे बड़ा व लंबा मंदिर चोल युग में बना |
  • चोल मंदिरों में मंडप के प्रवेश द्वारों पर द्वारपाल या रक्षकों की आकृतियाँ बनी होती थीं  |
  • मंदिरों में पूरी तरह से द्रविड़ शैली विकसित थी |
  • मंदिरों में बनाए गए गणों के आकृतियाँ सबसे यादगार होती थीं |

विजयालया चोलीस्वरा मंदिर के दौरान बनाए गए कुछ  प्रसिद्ध मंदिर निम्न हैं :-

विजयालया चोल के शासन के दौरान नरथमलाई मे विजयालया चोलीस्वरा मंदिर पूरी तरह भगवान शिव को समर्पित है |

कावेरी नदी के किनारे पर कोरंगनाथ मंदिर,श्रीनिवासनल्लुर परांतका चोल – 1 के द्वारा बनाया गया | यह श्रीनिवासनल्लुर में स्थित है | चोल वास्तुकला के अनूठे व आवर्ती काल्पनिक पशु यजही को मंदिर के स्तंभों पर उकेरा जाता था | बृहदीस्वरर मंदिर या पेरुवुदाइयर कोविल या राजराजेश्वरम मंदिर पूरी तरह चट्टानों से बने हैं | राजराज चोल-1 के द्वारा बनाया गया यह विश्व का पहला मंदिर है साथ ही साथ यह यूनेस्को की विश्व धरोहर है | यह तंजावुर में  स्थित है |

गंगाईकोण्डाचोलापुरम राजाराज के बेटे राजेंद्र 1 के द्वारा बनाया गया | गंगाईकोण्डाचोलापुरम चौलक्य, गंगा , पाल तथा कलिंग पर राजेंद्र 1 के विजय प्राप्त करने पर एक नई राजधानी बनी |

गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म

गौतम बुद्ध : बौद्ध धर्म के विषय में संक्षिप्त जानकारी

गौतम बुद्ध का जन्म

बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध थे. गौतम बुद्ध का जन्म 567 ई.पू. कपिलवस्तु के लुम्बनी नामक स्थान पर हुआ था. इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था. गौतम बुद्ध का विवाह 16 वर्ष की अवस्था में यशोधरा के साथ हुआ. इनके पुत्र का नाम राहुल था.

गृह-त्याग और शिक्षा ग्रहण

सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की अवस्था में गृह-त्याग किया, जिसे बौद्धधर्म में 'महाभिनिष्क्रमण” कहा गया है. गृह-त्याग करने के बाद सिद्धार्थ (बुद्ध) ने वैशाली के आलारकलाम से सांख्य धर्षण की शिक्षा ग्रहण की. आलारकलाम सिद्धार्थ के प्रथम गुरु हुए थे. आलारकलाम के बाद सिद्धार्थ ने राजगीर के रुद्र्करामपुत्त से शिक्षा ग्रहण की.

ज्ञान प्राप्ति

35 वर्ष की आयु में वैशाख की पूर्णिमा की रात निरंजना (फल्गु) नदी के किनारे, पीपल के वृक्ष के नीचे, सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ था. ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जाने गए.

प्रथम उपदेश

बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ (ऋषिपतनम)  में दिया, जिसे बौद्ध ग्रंथों में 'धर्मचक्र प्रवर्त्तन” कहा गया है. बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए.

मृत्यु

बुद्ध की मृत्यु 80 वर्ष की अवस्था में 483 ई.पू. में कुशीनगर (देवरिया, उत्तर प्रदेश) में चुंद द्वारा अर्पित भोजन करने के बाद हो गयी, जिसे बौद्ध धर्म में 'महापरिनिर्वाण” कहा गया है.

निर्वाण-प्राप्ति

बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति के लिए निम्न दस शीलों पर बल दिया है. ये शील हैं -

  1. अहिंसा
  2. सत्य
  3. अस्तेय (चोरी नहीं करना)
  4. अपरिग्रह (किसी प्रकार की संपत्ति नहीं रखना)
  5. मदिरा सेवन नहीं करना
  6. असमय भोजन नहीं करना
  7. सुखप्रद बिस्तर पर नहीं सोना
  8. धन-संचय नहीं करना
  9. स्त्रियों से दूर रहना और
  10. नृत्य-गान आदि से दूर रहना

अष्टांगिक मार्ग (Astangik Marg)

बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग की बात कही है. ये मार्ग हैं -

  • सम्यक् कर्मान्त
  • सम्यक् संकल्प
  • सम्यक् वाणी
  • सम्यक् कर्मान्त
  • सम्यक् आजीव
  • सम्यक् व्यायाम
  • सम्यक् स्मृति एवं
  • सम्यक् समाधि

बौद्ध सभाएँ

सभासमयस्थानअध्यक्षशासनकाल
प्रथम बौद्ध संगति483 ई.पू.राजगृहमहाकश्यपअजातशत्रु
द्वितीय बौद्ध संगति383 ई.पू.वैशालीसबाकामीकालाशोक
तृतीय बौद्ध संगति255 ई.पू.पाटलिपुत्रमोग्गलिपुत्त तिस्सअशोक
चतुर्थ बौद्ध संगतिई. की प्रथम शताब्दीकुंडलवनवसुमित्र/अश्वघोषकनिष्क

 

'विश्व दुःखों से भरा है” का यह सिद्धांत बुद्ध ने उपनिषद् से लिया था. बौद्धसंघ में प्रविष्ट होने को 'उपसंपदा” कहा गया है. बौद्ध धर्म के तीन रत्न (त्रिरत्न) हैं - बुद्ध, धम्म और संघ. चतुर्थ बौद्ध संगीति के पश्चात् बौद्ध धर्म दो भागों में विभाजित हो गया - हीनयान और महायान.

गुप्त सामाज्य

गुप्त साम्राज्य - Gupt Empire के प्रमुख शासक

प्रशस्ति और चरित

गुप्तकाल में प्रशस्ति लेखन का विकास हुआ. प्रशस्ति लेख एक विशेष रूप का अभिलेख होता था, जिसमें राजा की प्रसंशा की जाती थी. इन प्रशस्तियों में राजा की उपलब्धियों के साथ-साथ उनकी महानता के विषय में भी लिखा जाता था. हरिसेन, वत्सभट्टि, वासुल आदि प्रमुख प्रशस्ति लेखक थे. इनकी प्रशस्तियाँ गुप्तकाल के इतिहास की जानकारी के प्रमुख स्रोत हैं. इसी प्रकार बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरित और कादम्बरी हर्षवर्धन काल के इतिहास की जानकारी मिलती है. रामपालचरित पाल शासक रामपाल के क्रियाकलापों का वर्णन करता है और तत्कालीन बंगाल की जानकारी देता है. चालुक्य राजा विक्रमादित्य पर विक्रमांकदेवचरित लिखा गया.

चन्द्रगुप्त प्रथम

कुषाणकाल में मगध की शक्ति और महत्ता समाप्त हो गई थी. चन्द्रगुप्त प्रथम ने इसको पुनः स्थापित किया. उसने साकेत (अयोध्या) और प्रयाग (इलाहाबाद) तक मगध का विस्तार किया. वह पाटलिपुत्र से शासन करता था. उसने लिच्छवी वंश की राजकुमारी से विवाह किया था. इस सम्बन्ध से मगध तथा लिच्छवियों के बीच सम्बन्ध अच्छे हुए और गुप्तवंश की प्रतिष्ठा बढ़ी. चन्द्रगुप्त ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी.

समुद्रगुप्त

समुद्रगुप्त चन्द्रगुप्त प्रथम का पुत्र था. सभी गुप्त शासकों में वह सबसे महान था. वह एक कुशल योद्धा, विद्वान, संगीतग्य और कवि था. इसके साथ ही वह एक कुशल शासक भी था. उसने खुद हिन्दू धर्म का अनुयायी होते हुए भी बौद्ध और जैन धर्मों का सम्मान किया. उन धर्मों के प्रति सहिष्णुता की नीति उसने अपनाई.

इतिहास में समुद्रगुप्त का नाम एक विजेता और साम्राज्य निर्माता के रूप में लिया जाता है. उसके विजय अभियान के विषय में हमें इलाहाबाद की प्रशस्ति से पता चलता है.एरण अभिलेख और सिक्कों से भी समुद्रगुप्त के समय की जानकारी मिलती है. उस समय की अधिकांश प्रशस्तियाँ राजाओं के पूर्वजों के सम्बन्ध में जानकारी देती हैं. इलाहाबाद प्रशस्ति के अलावा समुद्रगुप्त के बारे में चन्द्रगुप्त द्वितीय की 'वंशावली” (पूर्वजों की सूची) से भी जानकारी मिलती है. ये स्रोत हमें बताते हैं कि समुद्रगुप्त ने भी महाराजधिराज की उपाधि धारण की थी.

समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिसेण ने संस्कृत में प्रशस्ति लिखी है और बताया है कि समुद्रगुप्त ने उत्तर भारत के 9 राज्यों को हराया था. ये राज्य थे - दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र आदि, जिनको उसने अपने साम्राज्य में मिलाया था. समुद्रगुप्त ने दक्षिण के 12 राज्यों को भी जीता था. ये राज्य थे - उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, पल्लव आदि. अभिलेख (edicts) बताते हैं कि इन राज्यों के समर्पण के बाद समुद्रगुप्त ने इनका राज्य वापस कर दिया, परन्तु इस शर्त पर कि ये उसको नियमित कर और नजराना देते रहेंगे. समुद्रगुप्त ने मध्य भारत की जंगली जातियों को भी अपने अधीन किया. समुद्रगुप्त के बारे में और भी विस्तार से पढ़ें >> समुद्रगुप्त

चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य)

समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी उसका पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय हुआ. इसका दूसरा नाम देवराज या देवगुप्त भी था. यह चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नाम से भी जाना जाता था. महरौली लौह स्तम्भ से इसके बारे में जानकारी मिलती है. माना जाता है कि जब राज्गुप्त अपनी पत्नी ध्रुवदेवी को शक शासक को सौंपने के लिए तैयार हुआ तब चन्द्रगुप्त ने शक खेमे घुसकर शक शासक को मार डाला. बाद में उसने रामगुप्त को मार डाला और ध्रुवदेवी से शादी करके खुद राजा बन गया. उदयगिरि, साँची, मथुरा के अभिलेख, महरौली (दिल्ली) के लौह-स्तम्भ अभिलेख और सिक्के चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय की जानकारी के स्रोत हैं. इन स्रोतों से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय ने गुजरात, मालवा और सौराष्ट्र के शकों को हराकर उनके क्षेत्रों को अधीन कर लिया. इस सफलता से चन्द्रगुप्त द्वितीय को पश्चिमी समुद्रगुप्त प्राप्त हुआ. भड़ौंच, कैम्बे और सोपारा के बंदरगाह पर उसका नियंत्रण हो गया. इस कारण वह अपने राज्य के वाणिज्य-व्यापार को बढ़ा सका. उसने उज्जयिनी को अपनी दूसरी राजधानी बनाई.

कुमारगुप्त प्रथम

चन्द्रगुप्त प्रथम और द्वितीय और समुद्रगुप्त के समान कुमारगुप्त प्रथम भी गुप्त साम्राज्य का एक महान शासक था. उसने शासनकाल की जानकारी भितरी अभिलेख, भिल्साद स्तम्भ अभिलेख, गढ़वा अभिलेख और मनकुवार मूर्ति अभिलेख से मिलती है. अनेक गुप्त राजाओं की तरह कुमारगुप्त प्रथम ने भी सिक्के (coins) निकाले. इन सिक्कों से उसके शासनकाल के विषय में जरुरी जानकारी मिलती है. उसने 40 वर्षों तक शासन किया था. इन अभलेखों में कुमारगुप्त के अनेक नाम मिलते हैं - श्रीमहेन्द्र, अजितमहेंद्र, महेंद्रात्य, महेंद्रकुमार आदि.

स्कन्दगुप्त

कुमारगुप्त के पुत्र स्कन्दगुप्त ने शकों तथा हूणों को हराया था. उसने शकरादित्य की उपाधि धारण की थी. इस समय हूणों ने उत्तर पश्चिम से कई बार आक्रमण किया था. गुप्त शासकों ने साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की थी. इसका लाभ उठाकर हूणों ने भारत पर आक्रमण किया जिससे गुप्त साम्राज्य कमजोर हो गया और उसका पतन होने लगा. गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद कई राज्यों का उदय हुआ जिनमें प्रमुख थे - उत्तर भारत में कन्नौज के हर्षवर्धन का राज्य और दक्षिण भारत में वातापी के चालुक्य और काँचीपुरम के पल्लवों का राज्य.

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गुप्त काल के बाद आर्थिक, सामाजिक जीवन और मंदिर वास्तुकला

समाज का अवलोकन:  गुप्त काल के बाद भारतीय समाज में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। पांचवीं सदी ईस्वी के बाद से भारत में भूमि अनुदान ने सामंती विकास में मदद की। किसान सामंती अधिपतियों के लिए दी गई भूमि में रुके ठहरे रहे थे। इनमें जिन गांवो को स्थानांतरित कर दिया गया था उन्हें ‘स्थान-जन-सहिता’ और ‘समरिद्धा’ के नाम से जाना जाता था। गुप्त काल के बाद की अवधि में व्यापार और वाणिज्य में गिरावट के कारण वहां की अर्थव्यस्था एक बंद अर्थव्यवस्था में तब्दील हो चुकी थी।

सामंती समाज के विकास ने राजा की स्थिति कमजोर कर दी थी जिस कारण राजा को सामंती प्रमुखों पर ज्यादा अधिक निर्भर रहना पडता था। सामंती प्रमुखों का वर्चस्व बढ़ने लगा था जिसके परिणामस्वरूप गांव का स्वशासन कमजोर हो गया था।

ह्वेनसांग के लेखन में उल्लेखित चार वर्ण समाज में मौजूद थे। उस कई उप जातियां भी मौजूद थी जो उस समय और प्रबल हो गयीं थी। इस अवधि के दौरान महिलाओं की स्थिति बहुत बिगड़ गयी थी। सतीप्रथा और दहेजप्रथा आम हो गयी थी।

लड़कियों की शादी छह से आठ साल की उम्र के बीच होने लगी थी। सामान्य महिला पर विश्वास नहीं किया जाता था। उन्हे पृथक (अलग) रखा जाता था। आम तौर पर महिलाओं के जीवन को उनके पुरूष रिश्तेदारों जैसे- बेटे, पिता, और भाई द्वारा नियंत्रित किया जाता था।

अर्थव्यवस्था

हर्ष शासन की अवधि के दौरान साहित्यिक और शिलालेखीय साक्ष्यों से पता चलता है कि राज्य कृषि, व्यापार और अर्थव्यवस्था में किस प्रकार उन्नत था। शुरूआती अरब लेखकों ने भी मिट्टी की उर्वरता और अमीर खेती का वर्णन किया है। साहित्यकार अभिधन रत्नमल ने उल्लेखित किया है मिट्टी को विभिन्न प्रकारों में जैसे उपजाऊ, बंजर, रेगिस्तान, उत्कृष्ट आदि के रूप में वर्गीकृत किया गया था। उन्होंने यह भी उल्लेखित किया है कि विभिन्न प्रकार के फसलों के लिए विभिन्न मैदानों का चयन किया जाता था। 

उद्योग के क्षेत्र में कपड़ा सबसे पुराने उदयोगों में से एक था।  समकालीन साहित्य में बुनकर, रंगरेज, दर्जी आदि के पेशे का वर्णन किया गया है। इस अवधि के दौरान धातु का काम भी बेहद लोकप्रिय था। धातु उद्योग के कुछ केन्द्र प्रसिद्ध थे। सौराष्ट्र अपने घंटी (बेल) धातु उद्योग के लिए प्रसिद्ध था जबकि वंगा (बंगाल) अपने टिन उद्योग के लिए जाना जाता था।

गुप्त काल के बाद दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुयी थी। भारत के माध्यम से पूर्व और पश्चिम के बीच व्यापार के प्रवाह का उल्लेख अरब, चीनी और भारतीय स्त्रोतों में किया है। भारत, चंदन की लकड़ी, मोती, कपूर, कपास, धातु, कीमती और अर्द्ध कीमती पत्थरों का निर्यात करता था। आयातित वस्तुओं में किराए के घोड़े शामिल थे। घोड़ों को मध्य और पश्चिमी एशिया से आयात किया जाता था। गुप्त काल में श्राइन या निकाय महत्वपूर्ण होते थे।

कला और वास्तुकला

गुप्त काल के बाद मंदिरों को दो वर्गों में विभाजित किया गया था जैसे- उत्तर भारतीय शैली (नगारा) और दक्षिण भारतीय शैली (द्रविड़)। उड़ीसा के प्रसिद्ध मंदिर उत्तर भारतीय शैली (नगारा) के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ये मंदिर मुख्यत: दो भागों में हैं,  छत पर वक्रीय शिखर के साथ सेला या गर्भगृह और एक द्वारमंडप या पिरामिडीय छत आवरण। भुवनेश्वर का महान लिंगराज मंदिर और कोणार्क का सूर्य मंदिर इस प्रकार का सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं।

चंदेल शासकों द्वारा निर्मित खजुराहो के मंदिर, मंदिर वास्तुकला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान  दिया।

ममल्लापुरम में चट्टानों को काटकर बनाये गये मंदिर को रथ कहा जाता है और कांची के मंदिरों को कैलाशनाथ कहा जाता है तथा वैकुंठ पेरूमल दक्षिण भारतीय या द्रविड़ शैली का सबसे पहला उदाहरण हैं।

दक्षिण भारतीय या द्रविड़ शैली का सबसे पहला उदाहरण ममल्लापुरम में चट्टानों को काटकर बनाया गया मंदिर रथ के रूप में जाना जाता है, और कांची में संरचनात्मक मंदिरों को कैलाशनाथ और वैकुंठनाथ पेरूमल के रूप में जाना जाता है। ये सभी मंदिर पल्लव द्वारा निर्मित किये गये थे। तंजौर और गंगेईकोंडाचोलपुरम में दो भव्य मंदिर चोलों द्वारा बनाये गये थे।

दक्षिण भारतीय मंदिरों में शिखरों  या टावरों को पिरामिडीय टावर के रूप में चिह्नित किया गया था जो सीधे खड़े थे। गुप्तकाल के दौरान मूर्तिकला में तेजी से गिरावट आई। हालांकि,  पाल अवधि के दौरान पूर्वी भारत की मूर्तिकला में एक बेहतरीन उत्कृष्टता देखने को मिली। उड़ीसा की मूर्तिकला ने मानकता के उच्च मानदंड हासिल किये थे।

कन्नौज के लिए संघर्ष यदुवंशी साम्राज्य

कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष

8वीं सदी के दौरान, कन्नौज पर नियंत्रण के लिए भारत के तीन प्रमुख साम्राज्यों जिनके नाम पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट थे, के बीच संघर्ष हुआ था। पालों का भारत के पूर्वी भागों पर शासन था जबकि प्रतिहार के नियंत्रण में पश्चिमी भारत (अवंती-जालौर क्षेत्र) था। राष्ट्रकूटों ने भारत के डक्कन क्षेत्र पर शासन किया था। इन तीन राजवंशों के बीच कन्नौज पर नियंत्रण के लिए हुए संघर्ष को भारतीय इतिहास में त्रिपक्षीय संघर्ष के रूप में जाना जाता है।

कन्नौज के लिए दोनों धर्मपाल, पाल राजा और प्रतिहार राजा, वत्सराज एक दूसरे के खिलाफ भिड़ गए। प्रतिहार राजा, वत्सराज विजयी हुआ लेकिन उन्हें राष्ट्रकूट राजा ध्रुव प्रथम से हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, राष्ट्रकूट राजा दक्षिण में अपने राज्य को लौट गये, पाल राजा धर्मपाल ने स्थिति का फायदा उठाते हुए कन्नौज पर कब्जा कर लिया। लेकिन कन्नौज पर उसका नियंत्रण अस्थायी था।

इस प्रकार त्रिपक्षीय संघर्ष शुरू हुआ जो दो सदियों तक चला और इसने लंबे समय तक सभी तीन राजवंशों को कमजोर किया। इसके परिणामस्वरूप देश का राजनीतिक विघटन हुआ और इसका लाभ मध्य-पूर्व से इस्लामी आक्रमणकारियों को हुआ।

कन्नौज का महत्व

कन्नौज गंगा व्यापार मार्ग पर स्थित था और रेशम मार्ग से जुड़ा था। इससे कन्नौज रणनीतिक और व्यावसायिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण बन गया था। कन्नौज उत्तर भारत में हर्षवर्धन के साम्राज्य की तत्कालीन राजधानी भी थी।

यशोवर्मन ने कन्नौज में 730 ईस्वी के आसपास साम्राज्य स्थापित किया। वह वज्रायुध, इंद्रायुध और चक्रायुध नाम के तीन राजाओं का अनुगामी बना जिन्होंने कन्नौज पर 8वीं सदी के अंत से 9वीं शताब्दी के पहली तिमाही तक राज किया था।

दुर्भाग्य से, ये शासक कमजोर साबित हुए और कन्नौज की विशाल आर्थिक और सामरिक क्षमता का लाभ लेने के लिए कन्नौज के शासक,  भीनमल (राजस्थान) के गुर्जर-प्रतिहार,  बंगाल के पाल  और बिहार तथा मान्यखेत (कर्नाटक) के राष्ट्रकूट एक दूसरे के खिलाफ युद्ध करते रहे।

कन्नौज के लिए यह त्रिपक्षीय संघर्ष लगभग दो सौ वर्षों चला और अंतत: इसका परिणाम गुर्जर-प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय के पक्ष में रहने के साथ इस युद्ध का समापन हो गया। नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज को गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी बनाया। इस साम्राज्य ने लगभग तीन सदियों तक शासन किया।

सम्राट कनिष्क 78 वी ईस्वी पूर्व

कनिष्क: कुषाण राजवंश (78 ईस्वी - 103 ईस्वी)

कनिष्क कुषाण साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली शासक था। उसके साम्राज्य की राजधानी पुरूषपुर (पेशावर) थी। उसके शासन के दौरान, कुषाण साम्राज्य उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान से लेकर मथुरा और कश्मीर तक फैल गया था। रबातक शिलालेख से प्राप्त जानकारी के अनुसार कनिष्क विम कदफिसेस का उत्तराधिकारी था जिसने कुषाण राजाओं की एक प्रभावशाली वंशावली स्थापित की।

कनिष्क साम्राज्य का विस्तार:

कनिष्क साम्राज्य निश्चित रूप से बहुत बड़ा था। यह दक्षिणी उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान से उत्तर पश्चिम में अमू दरिया के उत्तर (ऑक्सस) से पश्चिम पाकिस्तान और उत्तरी भारत के साथ-साथ दक्षिण पूर्व में मथुरा (रबातक शिलालेख में यहां तक दावा किया गया है कि उसने पाटलिपुत्र और श्री चंपा को संघटित कर लिया था) तक फैल गया था और कश्मीर को भी अपने अधिकार क्षेत्र में शामिल कर लिया था जहां कनिष्कपुर नाम का एक शहर था। उसके नाम से बारामूला दर्रा ज्यादा दूर नहीं था जिसमें अभी भी एक बड़े स्तूप का आधार मौजूद है।

कनिष्क से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य निम्न प्रकार से हैं:

  • कनिष्क के शासनकाल के दौरान बौद्ध धर्म महायान और हीनयान में विभाजित किया गया था।
  • वह 78 ईस्वी शक युग का संस्थापक था।
  • उसने पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया था और पुरूषपुर से बौद्ध भिक्षु अश्वघोष को ले लिया था।
  • चरक और सुश्रुत कनिष्क के दरबार में रहते थे।
  • कनिष्क बौद्ध धर्म का संरक्षक था और उसने 78 ईस्वी में कश्मीर के कुंडलवन में चौथी बौद्ध परिषद बुलायी थी।
  • परिषद की अध्यक्षता वासुमित्र द्वारा की गयी थी और इस परिषद के दौरान बौद्ध ग्रंथों का संग्रह लाया गया था और टिप्पणियों को ताम्र पत्र पर उत्कीर्ण किया गया था।
  • कनिष्क के दरबार में रहने वाले विद्वानों में वासुमित्र, अश्वघोष, नागार्जुन, चरक और पार्श्व शामिल थे
  • कनिष्क ने चीन में हान राजवंश के राजा हान हो-ती के खिलाफ युद्ध किया। कनिष्क ने दूसरे प्रयास में चीनी राजा को पराजित किया था।

उत्तर कालीन बैदिक रीति रिवाज

उत्तरकालीन वैदिक युग में आर्थिक व सामाजिक जीवन

प्रधान भाग : वह काल जिसने ऋग वैदिक युग का अनुसरण किया वह उत्तरकालीन वैदिक के नाम से जाना गया |

I. उत्तरकालीन युग में आर्थिक जीवन

• वैदिक लेखों में समुद्र व समुद्री यात्राओं का उल्लेख है | यह ये दर्शाता है कि वर्तमान का समुद्री व्यापार आर्यन के द्वारा शुरुं किया गया था |
• धन उधार  देना एक फलता फूलता व्यापार था | श्रेस्थिन शब्द यह बताता है कि  इस युग में सम्पन्न व्यापारी थे और शायद वे सभा के रूप में संगठित थे |
• आर्यन ने सिक्कों का प्रयोग नहीं किया परंतु सोने की मुद्राओं के लिए विशेष सोने के वज़नों का प्रयोग किया गया | सतमाना, निष्का, कौशांभी, काशी और विदेहा प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र थे |
• जमीन पर बैल गाड़ी का प्रयोग सामान ले जाने के  लिए किया जाता था |विदेशी सामान के लिए नावों और समुद्री जहाजों का प्रयोग किया जाता था |
• चाँदी का इस्तेमाल बढ़ गया था और उससे आभूषण बनाए जाते थे |

II. उत्तरकालीन वैदिक युग में सामाजिक जीवन

• समाज 4 वर्णों  में विभाजित था : ब्राह्मण, राजन्य या क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र |
• प्रत्येक वर्ण का अपना कार्य निर्धारित था जिसे वे पूरे रीति रिवाज के साथ करते थे | हर एक को जन्म से ही वर्ण दे दिया जाता था |
• गुरुओं के 16 वर्गों मे से एक ब्राह्मण होते थे परंतु बाद में दूसरे संत दलों से भी श्रेष्ठ हो जाते थे | इन्हे सभी वर्गों में सबसे शुद्ध माना जाता था और ये लोग अपने तथा दूसरों के लिए बलिदान जैसी क्रियाएँ  करते थे |
• क्षत्रिय शासकों और राजाओं के वर्ग में आते थे और उनका कार्य लोगों की रक्षा करना और साथ ही साथ समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखना होता था |
• वैश्य लोग आम लोग होते थे जो व्यापार, खेतीबाड़ी और पशु पालना इत्यादि का कार्य करते थे | मुख्यतः यही लोग कर अदा करते थे |
• यद्यपि सभी तीनों वर्णों को उच्च स्थान मिला था और ये सभी पवित्र धागे को धारण कर सकते थे, पर शूद्रों को ये सभी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं और इनसे भेदभाव किया जाता था |
• पैतृक धन पित्रसत्तात्मक का नियम था जैसे चल अचल संपत्ति पिता से बेटे को चली जाती थी | औरतों को ज़्यादातर निचला स्थान दिया जाता था | लोगों ने गोत्र असवारन विवाह का चलन चलाया |एक ही गोत्र के या एक ही पूर्वजों के लोग आपस में विवाह नहीं कर सकते थे |
वैदिक लेखों के अनुसार जीवन के चार चरण या आश्रम थे :ब्रह्मचारी या विद्यार्थी, गृहस्थ, वनप्रस्थ या आधी निवृत्ति और सन्यास या पूर्ण निवृत्ति |

III. प्रशासन की व्यवस्था
• पूर्व वैदिक आर्यन जाति में संगठित रहते थे ना की राज्यों के रूप में | जाति के मुखिया को राजन कहते थे | राजन की अपनी स्वायत्तता उसकी जाति की सभा में प्रतिबंधित थी जिसे सभा या समिति कहा जाता था |
• राजन उनकी सहमति के बिना सिंहासन पर नहीं बैठ सकता था | सभा, जाति के कुछ प्रमुख लोगों की होती थी जबकि समिति में जाति का हर एक आदमी होता था |
• कुछ जातियों के वंशानुगत  मुखिया नहीं होते थे और इन्हे जातिय सभा की सरकार द्वारा चलाया जाता था | राजन की  प्राथमिक अदालत होती थी जिसमे उसकी जाति के सांसद और जाति के मुख्य लोग (ग्रामणि ) शामिल होते थे |
• राजन का मुख्य कार्य अपनी जाति की रक्षा करना था | उसकी सहायता उसके कई अधिकारियों द्वारा की जाति थी जिसमे पुरोहित, सेनानी(सेना का प्रमुख), दूत और जासूस शामिल थे |पुरोहित समारोह करते थे तथा युद्ध में जीत के लिए और शांति बनाए रखने के लिए मंत्रौच्चारण करते थे |
• राजन को समाज और जाति के संरक्षक के रूप में देखा जाता था| वंशानुगत शासन उभरना शुरू हुआ और जिसके फलस्वरूप प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई जैसे रथ दौड़, पशु की छाप और पासों का खेल जो की पहले निश्चय करते थे कि कौन राजा बनने योग्य है, बिलकुल भी महत्वपूर्ण नहीं  थे |इस युग के  रीति-रिवाज राजा के दर्जे को लोगों से ऊपर रखते थे | उसे प्रायः सम्राट कहा जाता था |
• राजन की बड़ी हुई राजनीतिक ताकतों ने  उसे उत्पादिक संसाधनों पर नियंत्रण करने की ताकत दे दी थी | ऐच्छिक रूप से दिया गया उपहार अनिवार्य भेंट बना दिया गया हालांकि कर के लिए कोई व्यवस्थित प्रणाली नहीं थी  |
• उत्तरकालीन वैदिक युग के अंत में, विभिन्न प्रकार की राजनीतिक ताकतों जैसे राज्य, गण राज्य और जातिय रियासतों का भारत में उत्थान हुआ |

IV. उत्तरकालीन वैदिक ईश्वर   

• सबसे महत्वपूर्ण वैदिक ईश्वर, इंद्र और अग्नि ने अपनी महत्वता  खो दी और इनके स्थान पर प्रजापति, विधाता की पूजा होने लगी  |
• कुछ सूक्ष्म  भगवान जैसे रुद्र, पशुओं के देवता और विष्णु, मनुष्य का पालक और रक्षक प्रसिद्ध हो गए |

V. रीति-रिवाज और दर्शन शास्त्र 

• बलिदान, प्रार्थनाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए और वे दोनों प्रजा और स्वदेशी को अपनाते थे  | जबकि लोग परिवार के बीच में ही बलिदान करते थे, जन बलिदान में राजा और उसकी प्रजा शामिल होते थे |
• यज्ञ या हवन करना उनके मुख्य धार्मिक कार्य होते थे | रोज़ाना के यज्ञ साधारण होते थे और परिवारों के बीच में ही होते थे |
• रोज़ के यज्ञों के अलावा वे त्योहार के दिनों में ख़ास यज्ञ करते थे | कभी कभार इन मौकों पर जानवरों का भी बलिदान दिया जाता था |

भारतीय उत्तर बैदिक काल

उत्तर वैदिक काल (1000 - 600 ई.पू.)

उत्तर वैदिक काल के दौरान (1000-600 ईसा पूर्व) आर्यों का यमुना, गंगा और सदनीरा जैसे सिंचिंत उपजाऊ मैदानों पर पूर्ण नियंत्रण था।

घटनाक्रम

  • 1500 ईसा पूर्व और 600 ईसा पूर्व की अवधि प्रारंभिक वैदिक काल (वैदिक काल) और उत्तर वैदिक काल के रूप में विभाजित थी।
  • वैदिक काल: 1500 ईसा पूर्व- 1000 ईसा पूर्व: इस अवधि के दौरान ही आर्य भारत पर आक्रमण करने वाले थे।
  • उत्तर वैदिक काल: 1000 ईसा पूर्व- 600 ईसा पूर्व

विशेषताएं

उत्तर वैदिक रचनाएं

  • यह अवधि वेद के बाद संकलित वैदिक ग्रंथों पर आधारित थी।
  • वैदिक भजन या मंत्रों के संग्रह को संहिता कहा जाता था।
  • भजन गाये जाने के बाद वेदों को धुनों पर स्थापित किया गया था और इसके बाद इन्हें साम वेद संहिता नामित किया गया था।
  • इस अवधि के दौरान दो और वेदों के संग्रहों, यजुरवेद वेद संहिता और अथर्ववेद संहिता की भी रचना हुई थी।
  • यजुर वेद में भजन अनुष्ठान के साथ होते थे जो समाज के सामाजिक-राजनीतिक संरचना को दर्शाते थे।
  • अथर्ववेद में आकर्षण और मंत्र होते थे जो विपदा से रक्षा करते थे। ये गैर-आर्यों के विश्वासों और प्रथाओं को प्रतिबिंबित करते थे।
  • संहिताओं के बाद ग्रंथों की एक श्रृखंला आयी थी जिसे ब्राह्मण कहा जाता था जिन्होंने अनुष्ठानों के सामाजिक और धार्मिक पहलुओं के बारे में विस्तृत जानकारी दी थी।

II- भूरे रंगीन बर्तन

  • ऊपरी गंगा बेसिन के उत्खनन ने मिट्टी के कटोरों और भूरी मिट्टी से चित्रित बर्तनों की खोज  को सुनिश्चित किया ।
  • ये उत्पाद एक ही क्षेत्र और एक ही अवधि (1000-600 ईसा पूर्व लगभग), उत्तर वैदिक संकलन का हिस्सा थे।
  • इस प्रकार,  इन स्थानों को पेंटेट ग्रे वेयर (पीजीडब्ल्यू) स्थान कहा जाने लगा था।
  • ये स्थान पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के आसपास के क्षेत्रों में पाये जा सकते हैं।

III. लौह चरण संस्कृति

  • 1000 ईसा पूर्व के आसपास पाकिस्तान और बलूचिस्तान में मिट्टी के अंदर   बहुत लौह भण्डार पाया गया था।
  • 800 ईसा पूर्व के आस-पास उत्तर प्रदेश में लोहे का उपयोग तीर-कमान और बरछी- भाला जैसे हथियार बनाने के लिए किया जाता था।
  • उत्तर वैदिक ग्रंथों में लोहे के लिए 'श्यामा' या 'कृष्णा अयास'  शब्दों का प्रयोग किया जाता था।
  • हालांकि कृषि साधारण होती थी लेकिन यह व्यापक होती थी और उत्तर वैदिक काल में चावल और गेहूं की व्यापकता में वृद्धि हुई थी।
  • धातुओं की विविध कला और शिल्प के प्रस्तुतीकरण में वृद्धि हुई। धातु गलाने वाले(स्मेल्टर), लोहे और तांबे के कारीगर तथा बढ़ई जैसे व्यवसाय अस्तित्व में आये थे।
  • उत्तर वैदिक काल में चार प्रकार के मिट्टी के बर्तन होते थे (काले और लाल-बर्तन, काले-स्खलित बर्तन, चित्रित भूरे बर्तन, और लाल बर्तन)।

आर्य औऱ भारत

आर्यों की जन्मभूमि और उनका प्रसार (साक्ष्य के साथ)

आर्यों  (Aryans) की जन्मभूमि कहाँ पर थी, इस विषय में इतिहास के विद्वानों में बड़ा मतभेद है. आर्य (Aryans) कहाँ से आये, वे कौन थे इसका पता ठीक से अभी तक चल नहीं पाया है. कुछ विद्वानों का मत है कि वे डैन्यूब नदी के पास ऑस्ट्रिया-हंगरी के विस्तृत मैदानों में रहते थे. कुछ लोगों का विचार है कि उनका आदिम निवास-स्थान दक्षिण रूस में था. बहुत-से विद्वान ये मत रखते थे कि आर्य (Aryans) मध्य एशिया के मैदानी भागों में रहते थे. फिर वहां से वे फैले. और कुछ लोगों का यह मानना है कि आर्य (Aryans) लोग भारत के आदिम निवासी थे और यही से वे संसार के अन्य भागों में फैले.

फिर भी, अधिकांश विद्वानों का मत है कि आर्य (Aryans) लोग मध्य एशिया के मैदानी भागों में रहते थे. उनके इधर-उधर फ़ैल जाने का कारण उनका चारागाह की तलाश करना माना जाता है. आर्य (Aryans) देखने में लम्बे-चौड़े और गोरे रंग के थे. वे घुमंतू प्रवृत्ति के होते थे. उनकी भाषा लैटिन, यूनानी आदि प्राचीन यूरोपीय भाषाओं तथा आज-कल की अंग्रेजी, फ्रांसीसी, रुसी तथा जर्मन भाषाओं से मिलती-जुलती थी. अधिकांश इतिहासकारों और विद्वानों के मत से तो यही लगता है कि यूरोप और भारत के आधुनिक निवासियों के पूर्वज एक ही स्थान में रहते थे और वह स्थान मध्य-एशिया में था.

आर्यों (Aryans) के Origin के कुछ साक्ष्य

एशिया में उनका उल्लेख सर्वप्रथम एक खुदे हुए लेख में पाया जाता है जो ई.पू. 2500 के लगभग का है. घोड़ों की सौदागिरी करने के लिए वे मध्य एशिया से एशियाई कोचक में आये. यहाँ आकर कोचक और मेसोपोटामिया को जीतकर उन्होंने अपना राज्य स्थापित किया. वेवीलोनिया (जो अभी Iraq में है) के इतिहास में आर्य (Aryans) 'मिटन्नी” नाम से प्रसिद्ध है. उनके राजाओं के नाम आर्यों (Aryans) के नामों से मिलते-जुलते जैसे 'दुशरत्त” (दुक्षत्र) और 'सुवरदत्त” (स्वर्दत्त). बोगाज-कोई (Bogl as-Koi) में पाये हुए और तेल-यल-अमर्ना (Tell-al-Amarna) के लेखों से यह सिद्ध होता है कि ये लोग भी आर्यों (Aryans) के जैसे सूर्य, वरुण, इंद्र तथा मरूत की पूजा करते थे. उनके देवताओं के 'शुरियस” और 'मरूत्तश ” संस्कृत के शब्द सूर्य तथा मरूत ही है. ज्ञात होता है कि ई.पू. 1500 के लगभग मेसोपोटामिया की सभ्यता को नष्ट करनेवाले लोग उन्हीं आर्य Aryans के पूर्वज थे जिन्होंने भारत के द्रविड़ों को हराया और वेदों की रचना की.

आर्यों (Aryans)की एक दूसरी शाखा भी थी जो फारस के उपजाऊ मैदानों में पाई जाती थी. उन्हें इंडो-ईरानियन कहा जाता था. पहले इन दोनों दलों के बीच कोई स्पष्ट अंतर नहीं दिखता था. जैसे वे एक ही देवताओं को पूजते थे, पूजा-पाठ का ढंग भी एक ही था. कालांतर में  इरानी दल बदल गया. उनके नामों में भी जो समानता थी, वे भी धीरे-धीरे नहीं रही. ई.पू. छठी शताब्दी के पहले ही उन्होंने अपना धर्म बदल डाला और सूर्य और अग्नि के उपासक बन गए.

आर्य लोगों (Aryans) का बाहर जाना

आर्य (Aryans) लोग अपनी जन्मभूमि को छोड़कर ऐसी जगह गए जहाँ कुछ लोग पहले से निवास करते थे. ऐसी दशा में उन्हें पहले से निवास कर रहे लोगों से लड़ना पड़ा. आर्य (Aryans) लोग अपने जन्म-स्थान से कभी-भी बड़ी संख्या में नहीं निकलते थे. वे टुकड़ों में बँट के ही इधर-उधर जाते थे. पर जहाँ भी जाते थे, उनका द्वंद्व पहले से रह रहे लोगों से होता था. कहीं-कहीं जो अनार्य थे उन्होंने आर्यों (Aryans) की भाषा को तो अपनाया ही, साथ-साथ उन्हीं के देवी-देवताओं को भी पूजने लगे. पर अधिकांश जगह यही हुआ कि आर्यों (Aryans) ने उनकी जमीन और संपत्ति छीन कर उन्हें अपनी प्रजा में शामिल कर लिया. आर्यों  (Aryans) के बाहर निकलने का समय ठीक तौर पर निश्चित नहीं किया जा सकता परन्तु विद्वानों का अनुमान है कि यह घटना 3000 ई.पू. से पहले की नहीं है.

आर्य भारतीय और संस्कृति

आर्यों का आगमन

वास्तव में आर्यन उन लोगों को कहा जाता था जो प्राचीन इंडो-युरोपियन भाषा बोलते थे और  जो प्राचीन ईरान और उत्तर भारतीय महाद्वीपों में बसने  की सोचते थे | आर्यन  भारत में पूर्व वैदिक काल मे बसे | इसे सप्तसिंधु या सात नदियों झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास, सतलुज, सिंधु और सरस्वती की धरा कहा गया |

घटना क्रम :

1500 B .C और 600 B .C के युग को पूर्व वैदिक युग (ऋग वैदिक काल) तथा बाद के वैदिक युग में विभाजित किया गया |

  • पूर्व वैदिक काल : 1500 B .C – 1000 B . C ; यह वह युग था जब आर्यन्स भारत पर आक्रमण कर सकते थे |
  • बाद का वैदिक युग : 1000 B . C – 600 B . C

वैदिक काल की विशेषताएँ

शब्दों की बुनियाद से निकला वेद शब्द का अर्थ है “जानना” या “उच्च विद्या” | चार प्रकार के महत्वपूर्ण वेद हैं:

  1. ऋगवेद : यह 10 किताबों से बना है और इसमे 1028 भजन हैं जिन्हे अलग अलग ईश्वरों के लिए गाया गया है | मण्डल II से VII को पारिवारिक पुस्तक के नाम से जानते थे क्यूंकि यह पारिवारिक कथाओं जैसे गृतसमदा, विश्वामित्र, बामदेव, आरती, भारद्व्जा और वसीष्ठा पर आधारित थे |
  2. यजुर्वेद : यह राजनीतिक जीवन, सामाजिक जीवन, नियम और कायदों के बारे में बताता है जिन्हे हमे मानना चाहिए | यह कृष्ण यजुर वेद और शुक्ल यजुर वेद में विभाजित हैं |
  3. सामवेद : यह कीर्तन व प्रार्थनाओं की किताब है और इसमे 1810 भजन हैं |
  4. अथर्ववेद : यह जादुई वचनों , भारतीय औषिधियों और लोक नृत्य पर आधारित है |  

ब्राह्मण

  • ये वेदों की द्वितीय क्ष्रेणी से तालुक्क रखते हैं और इनका संबंध प्रार्थना और बलिदानों के समारोहों से है |
  • तंद्यमहा ब्राह्मण को सबसे पुराने ब्राह्मण माना जाता था और इनकी कई पौराणिक कथाएँ  हैं |
  • व्रत्यसोमा एक समारोह है जिसमे इन पौराणिक कथाएँ के द्वारा गैर आर्यन को आर्यन में बदला जाता था |
  • सतपथा एक बहुत महत्वपूर्ण तथा विस्तीर्ण ब्राह्मण है | यह वैदिक काल के दर्शन शास्त्र, धर्म शास्त्र, शैली और रीति-रिवाज के बारे में बताता है |
  • ब्राह्मण का आखिरी भाग अरण्यकस था | इसके दो भाग ऋगवेद से जुड़े थे ; आइतारेय और कौसितकी |
  • 108 प्रकार के दर्शन शास्त्र हैं जिनका  सीधा संबंध आत्मा से है | इन्हे उपनिषद कहते हैं |
  • बृहदर्णयका और चंदोग्य सबसे पुराने उपनिषद हैं |
  • यह वचन “सत्यमेव जयते” मुंडका उपनिषद से लिया गया है|

आर्यन का संघर्ष

  • आर्यन के प्रथम दस्ते ने भारत में लगभग 1500 B . C  में आक्रमण किया |
  • उन्हें भारत के मूल निवासियों जैसे दास व दस्यु से संघर्ष करना पड़ा|
  • हालांकि दास को आर्यन की तरफ से कभी भी आक्रमण के लिए उत्तेजित नहीं किया गया, पर दस्यु हत्या का ऋग वेद में बारबार उल्लेख किया गया है |
  • इन्द्र को ऋग वेद में पुरान्द्र के नाम से भी उल्लेख किया गया है जिसे किलों का भंजक भी कहा गया है |
  • पूर्व आर्यन के किलों का उल्लेख हरप्पा संस्कृति की वजह से भी किया गया है |
  • आर्यन मूल निवासियों पर इसलिए भी विजय प्राप्त कर पाये क्यूंकि उनके पास बेहतर हथियार,वरमान, तथा घोड़े वाले रथ थे |
  • आर्यन् दो तरह के संघर्षों  में व्यस्त रहे  एक तो स्वदेशी लोग व अपने आप में |
  • आर्यन को पाँच आदिवासी जातियों में विभाजित किया गया जिसे पंचजन कहा गया तथा गैर आर्यन की भी मदद प्राप्त की |
  • आर्यन गोत्र के शासक भरत व त्रित्सु थे जिन्हे वसिष्ठ पुरोहित मदद करते थे |
  • भारतवर्ष देश का नाम राजा भरत के ऊपर रखा गया

      दसराजन युद्ध

      • भारत पर भरत गोत्र के राजा ने शासन किया तथा उन्हें दस राजाओं का विरोध भी झेलना पड़ा; पाँच आर्यन तथा पाँच गैर आर्यन|
      • इनके बीच में हुए युद्ध को दस राजाओं के युद्ध या दसराजन युद्ध के नाम से जाना  गया |
      • परुषनी या रावी नदी पर किया गया युद्ध सूद के द्वारा जीता गया |
      • बाद में भरत ने पुरू के साथ नाता जोड़ लिया जिससे कुरु नाम का नया गोत्र बना |
      • बाद के वैदिक युग में कुरु व पांचालों ने गंगा के ऊपरी पठारों की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जहाँ उन्होने एक साथ राज किया |

      वैदिक काल में नदियाँ

      • सप्त सिंधु शब्द  या सात मुख्य नदियों के समूह का भारत के ऋग वेद में उल्लेख किया गया है |
      • वे सात नदियाँ थीं:
          1. पूर्व में सरस्वती
          2. पश्चिम में सिंधु
          3. सतुद्रु (सतलुज)
          4. विपासा (ब्यास)
          5. असिक्नी(चेनाब)
          6. परुषनी(रावी) और
          7. वितस्ता( झेलम)

        सनातन

        फव्वारे, मकबरे और बिरियानी की हकीकत!! "ऊंट को काटकर उसमें गाय भरो, गाय में बकरा भरो, बकरे में मुर्गा भरो और मुर्गे में अंडे भरो! फिर इस...