एकीकृत भारत:– गौरवशाली परंपरा, पूरा वर्ल्ड भारत पार्ट 1

 एकीकृत भारत:–गौरवशाली परंपरा

इस कॉलम में शामिल किया है भारत का प्राचीनतम सभ्यता और संस्कृति

इस भारत को जो आज हम देखते हैं, इसे विश्व विख्यात जाना जाता था,

आज के भारत को हम 1971 के बाद का भारत देखते हैं वह ईसवी सन् 2071 ,

मै ज्ञात स्रोतों से आप को बता रहा हूं की पूरा वर्ल्ड भारत ही था, सभी सनातन धर्म संस्कृति के ही लोग थे,

बाद मे जैसे जैसे जनसंख्या वृद्धि होती गई, समाज सुधार आते गए, धर्म बनता गया और आज सभी एक दूसरे के खून के प्यासे हैं कि मैं सबसे बड़ा तो मैं सबसे बड़ा,

मेरे हिसाब से बड़ा कहा, अगर सनातन धर्म संस्कृति से पहले आय होते तो बात मानी जाती,

लेकिन आप आते हैं ईस्वी के पुर्व, या ईस्वी सन के बाद,

जबकि हमारी संस्कृति और सभ्यता कहती है कि इस पृथ्वी mins Earth 🌍 पर मानवीय का उद्भव सिंधु घाटी सभ्यता में हुई और यह भारत ही था,

सिंधु नदी के किनारे मानव जीवन को शुरुआत हुई थी,

मानव के पहले मानव का नाम मनु और औरत का नाम सतरूपा था,

मनु से मानव कहलाए,

Note:–

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एकीकृत भारत:–गौरवशाली परंपरा, मलेशिया


मलेशिया :
वर्तमान के जो देश चार ( 4) देश मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, वियतनाम और कंबोडिया प्राचीन भारत के मलय प्रायद्वीप के जनपद हुआ करते थे।
 मलय प्रायद्वीप का दक्षिणी भाग मलेशिया देश के नाम से जाना जाता है। 
इसके उत्तर में थाईलैंड, पूर्व में चीन का सागर तथा दक्षिण और पश्चिम में मलक्का का जलडमरूमध्य है। उत्तर मलेशिया में बुजांग घाटी तथा मरबाक के समुद्री किनारे के पास पुराने समय के अनेक हिन्दू तथा बौद्ध मंदिर आज भी हैं। 
मलेशिया अंग्रेजों की गुलामी से 1957 में मुक्त हुआ। वहां पहाड़ी पर बटुकेश्वर का मंदिर है जिसे बातू गुफा मंदिर कहते हैं। 
पहाड़ी पर कुछ प्राचीन गुफाएं भी हैं। पहाड़ी के पास स्थित एक बड़े मंदिर में हनुमानजी की भी एक भीमकाय मूर्ति लगी है। 
भारत में सनातन धर्म संस्कृति के लोग थे,
भारत उप महाद्वीप में शामिल यह सभी लोग सनातन धर्म संस्कृति यानी हिन्दू थे, लेकिन जैसे जैसे अन्य समाज या धर्म में परिवर्तन होते गए देश के टुकड़े टुकड़े होते गए,
मलेशिया वर्तमान में एक मुस्लिम राष्ट्र है। 

एकीकृत भारत :– श्री लंका

श्रीलंका :
'श्रीलंका' भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिण में हिन्द महासागर में स्थित एक बड़ा द्वीप है। यह भारत के चोल और पांडय, यादव जनपद के अंतर्गत आता था। 
5000 हजार वर्ष पूर्व तक श्रीलंका की संपूर्ण आबादी वैदिक धर्म का पालन करती थी।
 सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र को श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भेजा और वहां के सिंहल राजा ने बौद्ध धर्म अपनाकर इसे राजधर्म घोषित कर दिया। 
बौद्ध और हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार यहां पर प्राचीनकाल में शैव, यक्ष और नागवंशियों का राज था। 
श्रीलंका के प्राचीन इतिहास के बारे में जानने के लिए सबसे महत्वपूर्ण लिखित स्रोत सुप्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ 'महावंस' है।
 
 
श्रीलंका के आदिम निवासी और दक्षिण भारत के आदिमानव एक ही थे। 
भारत के एक राज्य तमिलनाडु और श्री लंका के तमिल एक ही जाति और गोत्र के लोग हैं आज भी अनेकों लोगो के शादी विवाह वाहा श्री लंका में होता रहता है,एक खुदाई से पता चला है कि श्रीलंका के शुरुआती मानव का संबंध उत्तर भारत के लोगों से था। 
भाषिक विश्लेषणों से पता चलता है कि सिंहली भाषा गुजराती और सिन्धी भाषा से जुड़ी है। 
ऐसी मान्यता है कि श्रीलंका को भगवान शिव ने बसाया था। 
बाद में उन्होंने इसे कुबेर को दे दिया था। 
कुबेर से रावण ने इसे अपने अधिकार में ले लिया था। ईसा पूर्व 9 लाख बर्ष पहले भगवान राम ने रावण का संहार कर श्रीलंका को भारतवर्ष का एक जनपद बना दिया था। 
 
श्रीलंका पर पहले पुर्तगालियों, फिर डच लोगों ने अधिकार कर शासन किया 
1800 ईस्वी के प्रारंभ में अंग्रेजों ने इस पर आधिपत्य जमाना शुरू किया और 1818 में इसे अपने पूर्ण अधिकार में ले लिया। अंग्रेज काल में अंग्रेजों ने 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत तमिल और सिंहलियों के बीच सांप्रदायिक एकता को बिगाड़ा। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 4 फरवरी 1948 को श्रीलंका को ब्रिटिश भारत से स्वतंत्र घोषित किया गया,

एकीकृत भारत :–म्यांमार


म्यांमार :
म्यांमार कभी ब्रह्मदेश हुआ करता था। 
इसे बर्मा भी कहते हैं, 
जो कि ब्रह्मा का अपभ्रंश है।
 म्यांमार प्राचीनकाल से ही भारत का ही एक राज्य रहा है। 
अशोक के काल में म्यांमार बौद्ध धर्म और संस्कृति का पूर्वी केंद्र बन गया था।
 यहां के बहुसंख्यक बौद्ध मतावलंबी ही हैं।
 मुस्लिम काल में म्यांमार शेष भारत से कटा रहा और तब तक यहां की राजवंश ने यहां पर  अपनी स्वतंत्र राजसत्ताएं कायम कर ली,
 1886 ई. में पूरा देश ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य के अंतर्गत आ गया था
 किंतु ब्रिटिशों ने 1935 ई. के भारतीय शासन विधान के अंतर्गत म्यांमार को भारत से अलग कर दिया।
 
 
1935 व 1937 में ईसाई ताकतों को लगा कि उन्हें कभी भी भारत व एशिया से जाना पड़ सकता है।
 समुद्र में अपना नौसैनिक बेड़ा बैठाने, उसके समर्थक राज्य स्थापित करने तथा स्वतंत्रता संग्राम से उन भू-भागों व समाजों को अलग करने हेतु सन् 1935 में श्रीलंका और 
 सन् 1937 में म्यांमार को अलग राजनीतिक देश की मान्यता दे दी।

एकीकृत भारत :– तिब्बत


तिब्बत को त्रिविष्टप कहा जाता था जहां रिशिका (Rishika) और तुशारा (East Tushara) नामक राज्य थे। 
त्रिविष्टप अर्थात तिब्बत या देवलोक से वैवस्वत मनु के नेतृत्व में प्रथम पीढ़ी के मानवों (देवों) का मेरु प्रदेश में अवतरण हुआ। 
वे देव स्वर्ग से अथवा अम्बर (आकाश) से पवित्र वेद पुस्तक भी साथ लाए थे। 
इसी से श्रुति और स्मृति की परंपरा चलती रही।
 वैवस्वत मनु के समय ही भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार हुआ।
 
 
तिब्बत में पहले हिन्दू फिर बाद में बौद्ध धर्म प्रचारित हुआ और यह बौद्धों का प्रमुख केंद्र बन गया। शाक्यवंशियों का शासनकाल 1207 ईस्वी में प्रांरभ हुआ। बाद में चीन के राजा का शासन रहा। 
19वीं शताब्दी तक तिब्बत ने अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए रखी। इस बीच लद्दाख पर कश्मीर के शासक ने तथा सिक्किम पर अंग्रेंजों ने आधिपत्य जमा लिया। 
 चीन और ब्रिटिश इंडिया के बीच 1907 के लगभग बैठक हुई और इसे दो भागों में विभाजित कर दिया। पूर्वी भाग चीन के पास और दक्षिणी भाग लामा के पास रहा।
 1951 की संधि के अनुसार यह साम्यवादी चीन के प्रशासन में एक स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया। इस दौरान स्वतंत्र भारत के नेता, 
भारतीय प्रधानमन्त ने जवाहर लाल नेहरू ने अपनी नोबल पुरस्कार के चक्कर मे तिब्बत को चीन का हिस्सा मानकर बड़ी भूल की थी। हालाकि नेहरू को नोबेल पुरस्कार नही मिला,
चीन के स्वतंत्र घोषित करना विश्व को धोखा देना था,
चीन की बिस्तारवादी नीति ने तिब्बत को भी हड़प लिया और बौध धर्म के धर्म गुरु दलाई लामा को जेल में डाल दिया, इससे पूरे विश्व में बौध धर्म अनुयायी लोग और देशों में खलबली मच गई, भारी दबाव में चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी ने दलाई लामा को देश छोड़ने पर बिवस कर दिया, दलाई लामा भारत आ गए, उधर चीन ने तिब्बत हड़प लिया,
दलाई लामा आज भारत में निर्वासित जीवन जीने को मजबूर है
आज विश्व में 56 देश बौध धर्म अनुयाई हैं, हालाकि आपको जान कर आश्चर्य होगा कि बौध धर्म का उदय बिहार के बोध गया में हुवा था,
बिहार के लिच्छवी गणराज के राजकुमार गौतम बुध ने इस संप्रदाय की शुरुआत की थी,
गौतम बुध सम्राट अशोक के समकालीन थे, 
आप जान कर आश्चर्य चकित हो जायेंगे की सम्राट अशोक के समय भारत में पुरा अरब देश, ईरान, इराक, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, भारत का दिल्ली, पटना, बंगाल,ओडिशा, बांग्लादेश, मध्यप्रदेश, म्यांमार,इंडोनेशिया, श्री लंका, भूटान, तिब्बत, चीन के हिस्से, तुर्की, ताइवान, हांगकांग, चिली तक के राज्य शामिल थे,


एकीकृत भारत :– भूटान


भूटान :
भूटान भी कभी भारतीय महाजनपदों के अंतर्गत एक जनपद था। संभवत: या विदेही जनपद का हिस्सा था। यहां वैदिक और बौद्ध मान्यताओं के मिले-जुले समाज हैं। यह सांस्कृतिक और धार्मिक तौर पर तिब्बत से ज्यादा जुड़ा हुआ है, क्योंकि यहां का राजधर्म बौद्ध है। तिब्बत कभी जम्बूद्वीप खंड का त्रिविष्‍टप क्षेत्र हुआ करता था, जो किंपुरुष का एक जनपद था। किंपुरुष भारतवर्ष के अंतर्गत नहीं आता है। जहां तक सवाल भूटान का है तो यह तिब्बत के अंतर्गत नहीं आता है तथा यह भौगोलिक रूप से भारत से जुड़ा हुआ है। भूटान संस्कृत के भू-उत्थान से बना शब्द है।
 
 
सिक्किम और भूटान को भी अंग्रेजों ने 1906 में स्वतंत्रता संग्राम से लगकर दिया और वहां पर अपनी एक प्रत्यक्ष नियंत्रण से रेजीडेंट स्थापित कर दी थी। ब्रिटिश प्रभाव के तहत 1907 में वहां राजशाही की स्थापना हुई। 
3 साल बाद एक और समझौता हुआ जिसके तहत ब्रिटिश इस बात पर राजी हुए कि वे भूटान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे लेकिन भूटान की विदेश नीति इंग्लैंड द्वारा तय की जाएगी।
 1947 में भारत आजाद हुआ और 1949 में भारत-भूटान समझौते के तहत भारत ने भूटान की वो सारी जमीन उसे लौटा दी, जो अंग्रेजों के अधीन थी। इस समझौते के तहत भारत ने भूटान को हर तरह की रक्षा और सामाजिक सुरक्षा का वचन भी दिया।
आज भी भूटान में भारतीय विदेश नीति ही लागू है,
भूटानी लोग भी पूरे भारत में कही भी व्यापार करने, मिलिट्री, पुलिस मे भर्ती होते हैं

एकिकृत भारत :– नेपाल

नेपाल : 
नेपाल को देवघर कहा जाता है। नेपाल यदुवंशी क्षत्रीय समाज के वीरों ने बसाया था,
यह भी कभी अखंड भारत का हिस्सा हुआ करता था। भगवान श्रीराम की पत्नी सीता का जन्म स्थल मिथिला नेपाल में है। 
नेपाल के जनकपुर में सीता जन्म स्थल पर सीता माता का विशाल मंदिर भी बना हुआ है। 
भगवान बुद्ध का जन्म भी नेपाल के लुंबिनी में हुआ था। यहां पर 1500 ईसा पूर्व से ही हिन्दू आर्य लोगों का शासन रहा है। 
250 ईसा पूर्व यह मौर्यों के साम्राज्य का एक हिस्सा था।  फिर चौथी शताब्दी में गुप्त वंश का एक जनपद रहा। 7वीं शताब्दी में इस पर तिब्बत का आधिपत्य हो गया था। 
11वीं शताब्दी में नेपाल में ठाकुरी वंश के राजा राज्य करते थे। 
उनके बाद यहां पर मल्ल वंश का शासन रहा, फिर गोरखाओं ने राज किया। 
मध्यकाल के रजवाड़ों की सदियों से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता को समाप्त करने का श्रेय जाता है गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह को। 
राजा पृथ्वी नारायण शाह ने 1765 में नेपाल की एकता की मुहिम शुरू की और मध्य हिमालय के 46 से अधिक छोटे-बड़े रियासतों के राजा जो कि अहीर समाज और यदुवंशी क्षत्रीय समाज में आते थे को संगठित कर 1768 तक इसमें सफल हो गए। यहीं से आधुनिक नेपाल का जन्म होता है।
 
 
स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी इस क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते समय-समय पर शरण लेते थे। 
 अंग्रेजों ने विचारपूर्वक 1904 में वर्तमान के बिहार स्थित सुगौली नामक स्थान पर उस समय के पहाड़ी राजाओं के नरेश से संधि कर नेपाल को एक आजाद देश का दर्जा प्रदान कर अपना रेजीडेंट बैठा दिया। इस प्रकार से नेपाल स्वतंत्र राज्य होने पर भी अंग्रेज के अप्रत्यक्ष अधीन ही था।
 रेजीडेंट के बिना महाराजा पृथ्वी नारायण शाह को कुछ भी खरीदने तक की अनुमति नहीं थी। इस कारण राजा-महाराजाओं में यहां तनाव था।
 
दरअसल, शाह राजवंश के 5 वें राजा राजेंद्र बिक्रम शाह के शासनकाल में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने नेपाल को भी कब्जे में लेने का प्रयास किया और सीमावर्ती कुछ इलाकों पर कब्जा भी कर लिया, लेकिन गोरखाओं ने 1815 में लड़ाई छेड़ दी। इसका अंत सुगौली संधि से हुआ। 
भारत में हुई 1857 की क्रांति में विद्रोहियों के खिलाफ नेपाल ने अंग्रेजों का साथ दिया था इसलिए उसकी स्वतंत्रता पर कभी आंच नहीं आई। 
1923 में ब्रिटेन और नेपाल के बीच एक संधि हुई जिसके अधीन नेपाल की स्वतंत्रता को स्वीकार कर लिया गया।
 1940 के दशक में नेपाल में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन की शुरुआत हुई यह आंदोलन बस्तुत। एक चीन समर्थित उग्रवादी संगठन के रुप मे मावोवाद के रूप में शामिल हैं उसने नेपाल में माओवादी नेता प्रचंड के रुप मे छापामार युद्ध शुरु कर दिया, और लाखो नेपाली आम जनता, मिलिट्री के लोग, यहां तक कि राजशाही परिवार के लोग की भी हत्या तक करने में सफल रहा,
 1991 में पहली बहुदलीय संसद का गठन हुआ और इस तरह राजशाही शासन के अंत की शुरुआत हुई। यह दुनिया का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र था लेकिन वर्तमान में वामपंथी वर्चस्व के कारण अब यह एक धर्मनिरपेक्ष देश है। 
नेपाल के राजवंश और भारत के राजवंशों का गहरा आपसी रिश्ता है, 
भारत के बहुत से रियासत के राजकुमार की शादी नेपाली राजकुमारी के साथ होने के वर्णन इतिहास में मिलते हैं,
नेपाल भी भारत और भारत के लोगो से नफरत सा करने लगा है, जबकि नेपाली लोग भारत के सेना, पुलिस, और व्यापार करने के लिए स्वतंत्र हैं, जबकि नेपाल में भारतीय जनता को यह सहूलियत नही मिलती है
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एकीकृत भारत :– मथुरा मंडल, यानी दिल्ली


दिल्ली पर इस्लामिक शासन की स्थापना :
जिस समय मथुरा मंडल के उत्तर-पश्चिम में पृथ्वीराज और दक्षिण-पूर्व में जयचन्द्र जैसे महान नरेशों के शक्तिशाली राज्य थे, उस समय भारत के पश्चिम-उत्तर के सीमांत पर शाहबुद्दीन मुहम्मद गौरी (1173 ई.-1206 ई.) नामक एक मुसलमान सरदार ने महमूद गजनवी के वंशजों से राज्याधिकार छीनकर एक नए इस्लामी राज्य की स्थापना की थी। गौरी ने भारत पर पहला आक्रमण 1175 ईस्वी में मुल्तान पर किया, दूसरा आक्रमण 1178 ईस्वी में गुजरात पर किया। इसके बाद 1179-86 ईस्वी के बीच उसने पंजाब पर फतह हासिल की। इसके बाद उसने 1179 ईस्वी में पेशावर तथा 1185 ईस्वी में सियालकोट अपने कब्जे में ले लिया। 1191 ईस्वी में उसका युद्ध पृथ्वीराज चौहान से हुआ। इस युद्ध में मुहम्मद गौरी को बुरी तरह पराजित होना पड़ा। इस युद्ध में गौरी को बंधक बना लिया गया, लेकिन पृथ्वीराज चौहान ने उसे छोड़ दिया। इसे तराइन का प्रथम युद्ध कहा जाता था। 
 
इसके बाद मुहम्मद गौरी ने अधिक ताकत के साथ पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण कर दिया। तराइन का यह द्वितीय युद्ध 1192 ईस्वी में हुआ था। अबकी बार इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान हार गए। इसके बाद गौरी ने कन्नौज के राजा जयचंद को हराया जिसे चंदावर का युद्ध कहा जाता है। माना जाता है कि दूसरे युद्ध में कन्नौज नरेश जयचंद की मदद से उसने पृथ्वीराज को हरा दिया था। बाद में उसने जयचंद को ही धोखा दे दिया था।
 
 
मुहम्मद गौरी ने अपना अभियान जारी रखा और अंतत: दिल्ली में गुलाम वंश का शासन स्थापित कर उत्तर भारत में इस्लामिक शासन की पुख्‍ता रूप में नींव डालकर वह पुन: अपने देश लौट गया। कुतुबुद्दीन ऐबक उसके सबसे काबिल गुलामों में से एक था जिसने एक साम्राज्य की स्थापना की जिसकी नींव पर दिल्ली सल्तनत तथा खिलजी, तुगलक, सैयद, लोदी, मुगल आदि राजवंशों की आधारशिला रखी गई थी। उक्त सभी ने भारत पर इस्लामिक शासन के विस्तार के लिए कई युद्ध लड़े, अत्याचार किए और समय-समय पर हिन्दू जनता का धर्मांतरण करवाया। हालांकि गुलाम वंश के शासकों ने तो 1206 से 1290 तक ही शासन किया, लेकिन उनके शासन की नींव पर ही दिल्ली के तख्‍त पर अन्य विदेशी मुस्लिमों ने शासन किया, जो लगभग ईस्वी सन् 1707 को औरंगजेब की मृत्यु तक चला।
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एकीकृत भारत :– पंजाब और मुल्तान

पंजाब और मुल्तान :
977 ई. में अलप्तगीन के दामाद सुबुक्तगीन के पुत्र महमूद गजनवी ने बगदाद के खलीफा के आदेशानुसार भारत के अन्य हिस्सों पर आक्रमण करना शुरू किए। उसने भारत पर 1001 से 1026 ई. के बीच 17 बार आक्रमण किए। महमूद ने सिंहासन पर बैठते ही पहले हिन्दूशाहियों के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया। उसने सन् 1001 में राजा जयपाल को हराया, फिर 1008 में आनंदपाल को हराया। इसके बाद वह मुल्तान और पंजाब को तहस-नहस करने के लिए निकल पड़ा। अफगान अभियान की लड़ाइयों में पंजाब पर अब गजनवियों का पूर्ण अधिकार हो गया। इसके बाद के आक्रमणों में उसने मुल्तान, लाहौर, नगरकोट और थानेश्वर तक के विशाल भू-भाग में खूब मारकाट की तथा बौद्ध और हिन्दुओं को जबर्दस्ती इस्लाम अपनाने पर मजबूर किया।
आज पंजाब पकिस्तान मे है और मुल्तान अफ़गानिस्तान के सीमा के नजदीक है,
अब 2022 तक पंजाब और मुल्तान में हिंदू 0.2% और सिख 3% ही रह गए हैं, 

एकीकृत भारत :– पाकिस्तान

सिन्ध (पाकिस्तान)
712 ईस्वी में इराकी शासक अल हज्जाज के भतीजे एवं दामाद मुहम्मद बिन कासिम ने 17 वर्ष की अवस्था में सिन्ध और बलूच पर कई अभियानों का सफल नेतृत्व किया। 
सिन्ध पर ईस्वी सन् 638 से 711 ई. तक के 74 वर्षों के काल में 9 खलीफाओं ने 15 बार आक्रमण किया।
 15वें आक्रमण का नेतृत्व मोहम्मद बिन कासिम ने किया। इस आक्रमण के दौरान सिन्ध के हिन्दू राजा राजा दाहिर (679 ईस्वी) और उनकी पत्नियां और पुत्रियां अपनी मातृभूमि और अस्मिता की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर शहीद हो गए।
और यह मुस्लिम आक्रमणकारी के हाथो में चला गया, परिणाम स्वरूप
 1947 ईसवी आते आते यहां हिंदू 3% ही बच गए, या तो धर्म परिवर्तन या फिर मार दिए गए,
सिख धर्म के गुरु नानक देव जी का धर्म स्थल ननकाना साहिब आज भी पाकिस्तान में ही है, 
भारत पाकिस्तान में सबसे ज्यादा सिख धर्म और हिंदू धर्म के लोग मारे गए थे अनुमानित संख्या 7 लाख है, 
3 लाख तो केवल औरत और लड़कियों के बलात्कार और मारे जाने के मामले मिले थे,
गांधी और नेहरू नामक लोकतांत्रिक नेताओं ने देश को एक और आग में झोंक दिया था,
जिसमे लाखो सिखो और हिंदू शहीद हुए,
आज भारत देश उन वीर शहीदों को याद कर रहा है और इनके लिए आसू बहा रहा है,
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एकीकृत भारत :– अफ़गानिस्तान

अफगानिस्तान
गंधार और कंबोज के कुछ हिस्सों को मिलाकर अफगानिस्तान बना। उक्त संपूर्ण क्षेत्र में हिन्दूशाही और पारसी राजवंशों का शासन रहा। बाद में यहां बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ और यहां के राजा बौद्ध हो गए। सिकंदर के आक्रमण के समय यहां पर फारसी और यूनानियों का शासन हो चला।
 
 
 7वीं सदी के बाद यहां पर अरब और तुर्क के मुसलमानों ने आक्रमण करना शुरू किए और
 870 ई. में अरब सेनापति याकूब एलेस ने अफगानिस्तान को अपने अधिकार में कर लिया था। हालांकि इसके खिलाफ लड़ाई चलती रही। बाद में
 यह दिल्ली के मुस्लिम शासकों के कब्जे में रहा और फिर ब्रिटिश इंडिया के अंतर्गत आ गया। 
1834 में एक प्रकिया के तहत 26 मई 1876 को रूसी व ब्रिटिश शासकों (भारत) के बीच गंडामक संधि के रूप में निर्णय हुआ और अफगानिस्तान नाम से एक बफर स्टेट अर्थात राजनीतिक देश को दोनों ताकतों के बीच स्थापित किया गया। 
इससे अफगानिस्तान अर्थात पठान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से अलग हो गए। 
18 अगस्त 1919 को अफगानिस्तान को ब्रिटिश शासन से आजादी मिली।
और भारत का एक टुकड़ा और हो गया
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भारत का गौरवशाली इतिहास एकीकृत भारत:–औरंगजेब के बाद का भारत

अंग्रेज, पुर्तगाली और फ्रांसीसी काल में भारत :
अखंड भारत पर अंग्रेजों, पुर्तगालियों और फ्रांसीसियों ने पहले व्यापार के माध्यम से अपनी पैठ जमाई फिर यहां के कुछ क्षेत्रों को सैन्य बल और नीति के माध्यम से अपने पुरअधीन करने का अभियान चलाया। अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने का अधिकार जहांगीर ने 1618 में दिया था। जहांगीर और अंग्रेजों ने मिलकर 1618 से लेकर 1750 तक भारत के अधिकांश हिन्दू रजवाड़ों को छल से अपने कब्जे में ले लिया था।
 
 
बंगाल उनसे उस समय तक अछूता था और उस समय बंगाल का नवाब था सिराजुद्दौला। बाद में 1757 उसे भी हरा दिया गया। इसके बाद कंपनी ने ब्रिटिश सेना की मदद से धीरे-धीरे अपने पैर फैलाना शुरू कर दिया और लगभग संपूर्ण भारत पर कंपनी का झंडा लहरा दिया। उत्तर और दक्षिण भारत के सभी मुस्लिम शासकों सहित सिख, मराठा, राजपूत और अन्य शासकों के शासन का अंत हुआ। अंग्रेजों ने अखंड भारत के अन्य क्षेत्र श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार आदि पर भी अपना अधिकार कर लिया। बाद में काल और परिस्थिति के अनुसार अंग्रेज, पुर्तगाली और फ्रांसीसियों ने धीरे धीरे अखंड भारत के अन्य हिस्सों से अपना अधिकार हटाते गए और इस तरह अखंड भारत के टूकड़े टूकड़े होते गए। 
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