राजाराम मोहन राय और ब्रम्हा समाज

राममोहन रॉय और ब्रह्म समाज

सामाजिक और धार्मिक जीवन के कुछ पहलुओं के सुधार से प्रारंभ होने वाला जागरण ने समय के साथ देश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और  राजनीतिक जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित किया|18वीं सदी के उत्तरार्ध में कुछ यूरोपीय और भारतीय विद्वानों ने प्राचीन भारतीय दर्शन,विज्ञान,धर्म और साहित्य का अध्ययन प्रारंभ किया| इस अध्ययन के द्वारा भारतीय अपने प्राचीन भारतीय ज्ञान से परिचित हुए,जिसने उनमें अपनी सभ्यता के प्रति गौरव का भाव जाग्रत किया|

इसने सुधारकों को उनके सामाजिक और धार्मिक सुधारों के कार्य में भी सहयोग प्रदान किया| उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों और अमानवीय व्यवहारों व परम्पराओं के प्रति अपने संघर्ष में जनमत तैयार करने के लिए प्राचीन भारतीय ग्रंथों के ज्ञान का उपयोग किया| ऐसा करने के दौरान, उनमें से अधिकांश ने विश्वास और आस्था के स्थान पर तर्क का सहारा लिया| अतः भारतीय सामाजिक व धार्मिक सुधारकों ने अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक तरफ अपने पाश्चात्य ज्ञान का प्रयोग किया तो दूसरी तरफ प्राचीन भारतीय विचारों को भी महत्व प्रदान किया|

राजा राममोहन राय

राजा राममोहन राय का जन्म,संभवतः1772 ई. में,बंगाल के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था| उन्होंने पारंपरिक संस्कृत शिक्षा बनारस में और पारसी व अरबी का ज्ञान पटना में प्राप्त किया| बाद में उन्होंने अंग्रेजी,ग्रीक और हिब्रू भाषा भी सीखी |वे फ्रेंच और लैटिन भाषा के भी जानकार थे| उन्होंने न केवल हिन्दू बल्कि इस्लाम,ईसाई और यहूदी धर्म का भी गहन अध्ययन किया था| उन्होंने संस्कृत,बंगाली,हिंदी,पारसी और अंग्रेजी भाषा में अनेक पुस्तकें लिखी थी| उन्होंने एक बंगाली भाषा में और एक पारसी भाषा में अर्थात दो समाचार पत्र भी निकाले| मुग़ल शाशकों ने उन्हें ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की और अपने दूत के रूप में इंग्लैंड भेजा| वे 1831 ई. में इंग्लैंड पहुचे और वहीँ 1833 में उनकी मृत्यु हो गयी| वे भारत में अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक थे और मानते थे कि नवजागरण के प्रसार और विज्ञान की शिक्षा के लिए अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है|वे प्रेस की स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर थे और इसी कारण उन्होंने प्रेस पर लगे प्रतिबंधों को हटाने के लिए आन्दोलन भी चलाया|

राजा राममोहन राय का मानना था कि हिन्दू धर्म में प्रवेश कर चुकी बुराईयों को दूर करने के लिए और उसके शुध्दिकरण के लिए उस धर्म के मूल ग्रंथों के ज्ञान से लोगों को परिचित करना आवश्यक है| इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ही उन्होनें वेदों व उपनिषदों का बंगाली भाषा में अनुवाद कर प्रकाशित करने का कठिन कार्य किया|

वे एक ऐसे सार्वभौमिक धर्म के समर्थक थे जोकि एक परम-सत्ता के सिद्धांत पर आधारित था| उन्होनें मूर्ति-पूजा और अंधविश्वासों व पाखंडों का विरोध किया|

ब्रह्म समाज

धार्मिक सुधारों के क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा योगदान उनके द्वारा 1928 ई. में ब्रहम समाज की स्थापना करना था जोकि धार्मिक सुधार आन्दोलन के तहत स्थापित प्रथम महत्वपूर्ण संगठन था| उन्होनें मूर्ति-पूजा और अतार्किक अंधविश्वासों व पाखंडों का विरोध किया| ब्रहम समाज के सदस्य किसी भी धर्म पर हमले के खिलाफ थे|

सामाजिक सुधारों के अंतर्गत ब्रहम समाज का सबसे बड़ा योगदान 1829 ई. में सती प्रथा का उन्मूलन था|उन्होंने देखा था कि कैसे उनके बड़े भाई की पत्नी को जबरदस्ती सती होने के लिए विवश किया गया था| उन्हें सती प्रथा का विरोध करने के कारण रूढ़िवादी हिन्दुओं का तीव्र विरोध भी झेलना पड़ा था| राममोहन राय के अनुसार सती प्रथा का प्रमुख कारण हिन्दू महिलाओं की  अत्यधिक निम्न स्थिति थी| वे बहुविवाह के खिलाफ थे और महिलाओं को शिक्षित करने तथा उन्हें पैतृक संपत्ति प्राप्त करने के अधिकार प्रदान के पक्षधर थे|

ब्रहम समाज का प्रभाव बढता गया और देश के विभिन्न भागों में ब्रहम समाज शाखाएं खुल गयीं| ब्रहम समाज के दो महत्वपूर्ण नेता देवेन्द्रनाथ टैगोर और केशवचंद्र सेन थे| ब्रहम समाज के सन्देश को प्रसारित करने के लिए केशवचंद्र सेन ने मद्रास और बम्बई प्रेसिडेंसी की यात्राएँ की और बाद में उत्तर भारत में भी यात्राएँ कीं|1866 ई. में ब्रहम समाज का विभाजन हो गया क्योकि केशवचंद्र सेन के विचार मूल ब्रहम समाज के विचारों की तुलना में अत्यधिक क्रांतिकारी व उग्र थे|वे जाति व रीति-रिवाजों के बंधन और धर्म-ग्रंथों के प्राधिकार से मुक्ति के पक्षधर थे |उन्होंने अंतर-जातीय विवाह और विधवा-पुनर्विवाह की वकालत की और ऐसे अनेक विवाह सम्पन्न भी करायें,पर्दा-प्रथा का विरोध किया और जाति-गत विभाजन की आलोचना की|उन्होंने जाति-गत कठोरता पर हमला किया,तथाकथित हिन्दू निम्न जातियों व अन्य धर्मों के व्यक्तियों के यहाँ भोजन करने लगे,खान-पान पर लगे प्रतिबंधों का विरोध किया,अपना संपूर्ण जीवन शिक्षा के प्रसार हेतु समर्पित कर दिया और समुद्री यात्राओं पर प्रतिबन्ध जैसे पुराने हिन्दू विचारों का विरोध किया|इस आन्दोलन ने देश के अन्य भागों में भी ऐसे ही अनेक सुधार-आन्दोलनों को प्रेरित किया |लेकिन इस समूह का प्रभाव बढ़ता गया जबकि अन्य समूह,जोकि सामाजिक सुधारों के प्रति उनके उतने अधिक प्रतिबद्ध नहीं थे, का पतन हो गया|

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद

रामकृष्ण और विवेकानंद

19 वीं सदी के धार्मिक मानवों ने न तो किसी सम्प्रदाय का समर्थन किया और न ही मोक्ष का कोई नया रास्ता दिखलाया| उन्होंने ईश्वरीय चेतना का सन्देश दिया|उनके अनुसार ईश्वरीय चेतना के आभाव में परम्पराएँ रूढ़ और दमनात्मक हो जाती है और धार्मिक शिक्षाएं अपनी परिवर्तनकारी शक्ति को खोने लगती है|

रामकृष्ण मिशन (1836-1886 ई.)

रामकृष्ण परमहंस कलकत्ता के पास स्थित दक्षिणेश्वर मंदिर के पुजारी थे| अन्य धर्मों के नेताओं के संपर्क में आने के बाद उन्होंने सभी तरह के विश्वासों की पवित्रता को स्वीकार किया| उनके समय के लगभग सभी धार्मिक सुधारक, जिनमें केशवचंद्र सेन और दयानंद भी शामिल थे, उनके पास धार्मिक चर्चाएँ करने और मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए आते थे| समकालीन भारतीय विद्वानों, जिनकी अपनी संस्कृति पर आस्था पश्चिम द्वारा प्रस्तुत चुनौती के कारण डगमगाने लगी थी,के मन में रामकृष्ण की शिक्षाओं के कारण पुनः अपनी संस्कृति के प्रति आस्था का भाव मजबूत हुआ| रामकृष्ण की शिक्षाओं का प्रचार करने और उन्हें व्यवहार में लाने के लिए उनके प्रिय शिष्य विवेकानंद ने 1897 ई. में रामकृष्ण मिशन  की स्थापना की थी| मिशन का उद्देश्य समाज सेवा थी क्योकि उसका मानना था की ईश्वर की सेवा करने का सबसे बेहतर तरीका मानवों की सेवा करना है| रामकृष्ण मिशन अपनी स्थापना के समय से ही जन-गतिविधियों के शक्तिशाली केंद्र के रूप में स्थापित हो गया था| इन जन-गतिविधियों में बाढ़,सूखा और महामारी जैसी आपदाओं के समय सहायता पहुँचाना,अस्पतालों की स्थापना करना और शिक्षा संस्थाओं की स्थापना जैसे कार्य शामिल थे|

विवेकानंद(1863-1902 ई.)

विवेकानंद का चरित्र अपने गुरू के चरित्र से बिल्कुल अलग था| उन्होंने भारतीय व पश्चिमी दर्शनों का अध्ययन किया लेकिन जब तक वे रामकृष्ण से नहीं मिले उन्हें मानसिक शांति नहीं प्राप्त हुई | उनका मन केवल अध्यात्म से ही नहीं जुड़ा था  बल्कि अपनी मातृभूमि की तत्कालीन परिस्थितियाँ भी उनके मन को आंदोलित करती रहती थीं|संपूर्ण भारत में भ्रमण करने के बाद उन्होंने पाया कि गरीबी,गन्दगी,मानसिक उत्साह का अभाव और भविष्य के प्रति आशान्वित न होने जैसी परिस्थितियां हर कहीं व्याप्त है|

विवेकानंद ने स्पष्ट रूप से कहा की-“अपनी सभी प्रकार की गरीबी और पतन के लिए स्वयं हम ही जिम्मेदार हैं| उन्होंने अपने देशवासियों को अपनी मुक्ति के लिए स्वयं प्रयास करने का सन्देश दिया| उन्होंने स्वयं भी अपने देशवासियों को जाग्रत करने और उनकी कमजोरियों की ओर उनका ध्यान दिलाने का दायित्व संभाला| उन्होंने उन्हें जीवन भर संघर्ष करने और मृत्यु द्वारा नया रूप धारण करने,गरीबों के प्रति दया-भाव रखने,भूखों को भोजन उपलब्ध कराने और वृहद् स्तर पर लोगों को जागृत करने के लिए प्रेरित किया|

विवेकानंद ने 1893 ई. में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सभा में भाग लिया| इनके द्वारा वहां दिए गए भाषण ने अन्य देशों के लोगों के मन को गहराई तक प्रभावित किया और विश्व की नजर में भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा में वृद्धि की|

निष्कर्ष

रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद का दर्शन धार्मिक सौहार्द्र पर आधारित था और इस सौहार्द्र का अनुभव व्यक्तिगत ईश्वरीय चेतना के आधार पर ही किया जा सकता है|

1944 राजगोपालाचारी योजना

राजगोपालाचारी फार्मूला (1944 ई.)

द्विराष्ट्र सिद्धांत और ब्रिटिशों से भारत की स्वतंत्रता को लेकर मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अलग अलग विचारों के कारण पैदा हुए मतभेदों को सुलझाने के उद्देश्य से राजगोपालाचारी फार्मूला लाया गया था| सी. राजगोपालाचारी, जोकि कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता थे, ने मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच के राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए एक फार्मूला तैयार किया| यह फार्मूला, जिसे महात्मा गाँधी का समर्थन प्राप्त था, वास्तव में लीग की पाकिस्तान मांग की मौन स्वीकृति थी|

राजगोपालाचारी फार्मूला

• मुस्लिम लीग कांग्रेस की स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करे

• लीग कांग्रेस को केंद्र में अस्थायी सरकार के गठन में सहयोग प्रदान करे

• युद्ध की समाप्ति के बाद एक आयोग गठित किया जायेगा जो उन जिलों की पहचान करेगा जहाँ मुस्लिमों का स्पष्ट बहुमत है और इन क्षेत्रों (गैर मुस्लिमों को शामिल कर) में, यह जानने के लिए कि वे पृथक संप्रभु राज्य का गठन चाहते हैं या नहीं, वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराये जायेंगे|

• सभी दलों को चुनाव या मतदान से पूर्व विभाजन के सम्बन्ध में अपने मत और अपने विचारों को व्यक्त करने की अनुमति होगी|

• यदि विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकृति मिल जाती है तो रक्षा, वाणिज्य और संचार आदि विषयों को लेकर एक संयुक्त समझौता किया जायेगा|

• ऊपर दी गयी सभी शर्तें तभी लागू होगी जब इंग्लैंड सम्पूर्ण सत्ता भारत को हस्तांतरित कर दे|

निष्कर्ष

राजगोपालाचारी फार्मूले की मूल संकल्पना द्विराष्ट्र सिद्धांत और ब्रिटिशों से भारत की स्वतंत्रता को लेकर मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अलग अलग विचारों के कारण पैदा हुए मतभेदों को सुलझाने की थी|

1919 भारत सरकार अधिनियम

मोंटेंग्यु-चेम्सफोर्ड सुधार अर्थात भारत सरकार अधिनियम-1919

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन और उसके सहयोगी देशों द्वारा यह प्रचार किया गया की वे अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता का युद्ध लड़ रहे है |बहुत से भारतीय नेताओं ने ऐसा विश्वास किया कि ब्रिटेन युद्ध की समाप्ति पर भारत को स्वराज प्रदान किया जायेगा लेकिन ब्रिटिश सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं थी| युद्ध के बाद भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में जो बदलाव लाये गए वे मोंटेंग्यु-चेम्सफोर्ड सुधार ,जिसे भारत सरकार अधिनियम-1919 भी कहा जाता है,के परिणाम थे| इन सुधारों द्वारा केंद्रीय विधान-मंडल को द्विसदनीय बना दिया गया |इनमें से एक सदन को राज्य परिषद् और दुसरे सदन को केंद्रीय विधान सभा कहा गया |दोनों सदनों में निर्वाचित सदस्यों का बहुमत था| केंद्रीय विधायिका की शक्तियों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया ,सिवाय केंद्र में दो सदनों की स्थापना के|कार्यकारी परिषद् के सदस्य, जोकि मंत्रियों के समान थे, विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं थे अर्थात वे सत्ता में बने रह सकते थे चाहे  विधायिका के सदस्यों के बहुमत का समर्थन उन्हें प्राप्त हो या नहीं|पेंतिया विधान मंडलों की संख्या में भी वृद्धि की गयी और उनमे निर्वाचित सदस्यों को बहुमत प्रदान किया गया| प्रान्तों में प्रयुक्त द्वैध शासन प्रणाली द्वारा प्रांतीय विधान मंडलों को अधिक शक्तियां प्रदान की गयीं|

इस व्यवस्था के तहत शिक्षा और जन स्वास्थ्य जैसे विभागों को विधायिका के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों को सौंपा गया और पुलिस व वित्त जैसे महत्वपूर्ण विभागों को गवर्नर के सीधे नियंत्रण में बने रहे|गवर्नर को मंत्रियों द्वारा लिए गए किसी  भी निर्णय को अस्वीकार करने की शक्ति प्रदान की गयी| प्रान्तों में मंत्रियों और विधान मंडलों, जिनके प्रति मंत्री उत्तरदायी थे,की शक्तियां सीमित ही थी| जैसे की अगर कोई मंत्री शिक्षा के प्रसार की योजना बनता है तो उसके लिए आवश्यक धन का अनुमोदन गवर्नर द्वारा ही किया जायेगा और गवर्नर चाहे तो उस मंत्री के निर्णय को अस्वीकार भी कर सकता था|

इसके अतिरिक्त गवर्नर जनरल भी किसी प्रान्त द्वारा लिए गए निर्णय को अस्वीकार कर सकता था| केंद्रीय विधायिका के दोनों सदनों और प्रांतीय विधान मंडलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों का चुनाव करने वाले मतदाताओं की संख्या अत्यंत सीमित थी|उदहारण के लिए केंद्रीय विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों के निर्वाचन हेतु मत देने का अधिकार ब्रिटिश भारत की कुल व्यस्क जनसंख्या के केवल 1% भाग को ही प्राप्त था|सभी महत्वपूर्ण शक्तियां सपरिषद गवर्नर जनरल में निहित थी ,जोकि ब्रिटिश सरकार के प्रति उत्तरदायी बना रहा न कि भारतीय लोगों के प्रति|प्रान्तों में गवर्नर भी अपनी व्यापक शक्तियों का प्रयोग करता था|

जो भी परिवर्तन किये गए थे वे कहीं से भी स्वराज की स्थापना में सहायक नहीं थे,जिसकी उम्मीद भारतीयों को युद्ध के बाद प्राप्त होने की थी| पूरे देश में असंतोष की लहर थी और इसे दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने दमन का सहारा लिया| इसी क्रम में मार्च 1919 ई. में ,रौलेट आयोग की रिपोर्ट के आधार पर, रौलेट अधिनियम पारित किया गया|सदन ने इसका विरोध किया|

बहुत से नेताओं ने ,जोकि सदन के सदस्य थे,विरोधस्वरूप अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया| मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने त्यागपत्र में कहा कि शांति काल में कोई भी सरकार अगर इस तरह के कानून पारित करती है तो उसे किसी भी रूप में सभ्य सरकार नहीं कहा जा सकता है| इस अधिनियम के पारित होने से भारतीय जनता में रोष को बढ़ावा दिया| दमन के इस नए अधिनियम को काला कानून  कहा गया|

गाँधी,जिन्होंने रौलेट अधिनियम के विरोध हेतु सत्याग्रह सभा का निर्माण किया था, ने देशव्यापी विरोध का आह्वाहन किया| पूरे देश में 6 अप्रैल 1919 को राष्ट्रीय अवमानना दिवस  के रूप में मनाया गया| इस दिन पूरे देश में विरोध प्रदर्शनों और हड़तालों का आयोजन किया गया|पूरे देश का व्यापार थम गया| भारत में इससे पूर्व कभी भी इस तरह का संगठित विरोध प्रदर्शन देखने को नहीं मिला था|सरकार ने भी इसे दबाने के लिए कई स्थानों पर लाठी-चार्ज और गोली चलाने जैसे क्रूर उपायों का प्रयोग किया था|

अधिनियम के प्रावधान

• भारत में प्रांतीय द्वैध शासन प्रणाली की स्थापना की गयी |यह एक ऐसी व्यवस्था थी मनोनीत पार्षदों और निर्वाचित सदस्यों द्वारा शासन किया जाता था| गवर्नर अभी भी प्रांतीय प्रशासन का मुखिया बना रहा|

• प्रांतीय विषयों को दो भागों- आरक्षित और हस्तांतरित में बांटा गया था|

• विधायिकाओं  का विस्तार किया गया और उसके 70% सदस्यों का निर्वाचित होना जरुरी किया| प्रथक निर्वाचन मंडलों का वर्गीय और सांप्रदायिक आधार पर विस्तार किया|

• महिलाओं को मत देने का अधिकार प्रदान किया गया|

• केंद्रीय सरकार अभी भी उत्तरदायित्वविहीन बनी रही|

निष्कर्ष

यह अधिनियम भारतीयों की आकांक्षाओं की पूर्ति करने में असफल रहा |यह वास्तव में भारत का आर्थिक शोषण करने और उसे लम्बे समय तक गुलाम बनाये रखने के उद्देश्य से लाया गया था|

1565 मैसूर

मैसूर

विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद, 1565 ई। में हिन्दू वोडियार वंश द्वारा मैसूर राज्य को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया। वोडियार वंश के अंतिम शासक चिक्का कृष्णराज द्वितीय के शासनकाल में वास्तविक सत्ता देवराज (दलवाई या सेनापति) और नंजराज (सर्वाधिकारी या वित्त एवं राजस्व नियंत्रक) के हाथों में आ गयी थी।ये क्षेत्र पेशवा और निज़ाम के बीच विवाद का विषय बन गया था। नंजराज द्वितीय कर्नाटक युद्ध में अंग्रेजों के साथ मिल गया और त्रिचुरापल्ली(तमिलनाडु) पर कब्ज़ा कर लिया।

1761 ई. में हैदर अली ,जिसने अपने जीवन की शुरुआत एक सैनिक के रूप में की थी,ने मैसूर के राजवंश को हटाकर  राज्य पर अपना कब्ज़ा कायम कर लिया। हैदर अली(1760-1782) ने मैसूर राज्य की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया ,जो  दो वोडियार भाइयों –देवराज और नंजराज द्वारा शासित था। उसे अपने राज्य की स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए निज़ाम और मराठों से भी लड़ना पड़ा।उसने निज़ाम और फ्रांसीसियों के साथ मिलकर 1767-1769 के मध्य हुए प्रथम आंग्ल –मैसूर युद्ध मे अंग्रेजों को करारी शिकस्त दी और अप्रैल 1769 में उन्हें मद्रास की संधि के रूप में अपनी शर्तें मानने पर मजबूर कर दिया। 1780-1784 ई के मध्य हुए द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध में भी उसने निज़ाम और मराठों के साथ मिलकर 1782 ई में  अंग्रेजों को हराया लेकिन युद्ध में घायल हो जाने के कारण 1782 ई में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसके पुत्र टीपू सुल्तान (1782-1799 ई) ने कमान संभाली ,जिसने वीरतापूर्वक अंग्रेजों से युद्ध लड़कर अपने राज्य की रक्षा की। टीपू सुल्तान पहला शासक था जिसने पश्चिमी पद्धतियों को अपने प्रशासन में लागू करने का प्रयास किया। उसने सैन्य प्रशिक्षण में आधुनिक तकनीकों का प्रयोग किया और आधुनिक हथियारों के उत्पादन के लिए एक कारखाना भी स्थापित किया ।उसने अंग्रेजों और निजाम व मराठों की संयुक्त सेना के विरुद्ध तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध लड़ा  अंतत; उसे श्रीरंगपट्टनम की संधि  करनी पड़ी और संधि की शर्तों के तहत टीपू को अपना आधा राज्य अंग्रेजों और उनके सहयोगियों को देना पड़ा। चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799) के दौरान लड़ते हुए उसकी मृत्यु हो गयी।

टीपू सुल्तान से जुडी महत्वपूर्ण जानकारियाँ

1.  वह श्रंगेरी के जगतगुरु शंकराचार्य का महान प्रशंसक था और उसने मराठों द्वारा नष्ट की गयी देवी शारदा  की मूर्ति के निर्माण के लिए उन्हें धन प्रदान किया।

2.  उसकी आत्मकथा का नाम तारीख-ए-खुदाई  था।

3.  उसने फ़ताहुल मुजाहिदीन नाम से एक सैन्य पुस्तक भी लिखी जिसमे राकेट साइंस और राकेट ब्रिगेड से सम्बंधित जानकारी दी गयी है।

4.  उसने अपने पिता हैदर अली द्वारा प्रारंभ की गयी लाल बाग परियोजना (बैंगलोर) को पूरा किया और कावेरी नदी पर कृष्णराज सागर बांध का निर्माण कराया।

औरंगजेब की मौत और उत्तराधिकारी

मुग़ल उत्तराधिकारी

औरंगजेब की मृत्यु ने मुग़ल साम्राज्य के पतन की नींव डाली क्योंकि उसकी मृत्यु के पश्चात उसके तीनों पुत्रों-मुअज्जम,आज़म और कामबक्श के मध्य लम्बे समय तक चलने वाले उत्तराधिकार के युद्ध ने शक्तिशाली मुग़ल साम्राज्य को कमजोर कर दिया. औरंगजेब ने अपने तीनों पुत्रों को प्रशासनिक उद्देश्य से अलग अलग क्षेत्रों का गवर्नर बना दिया था,जैसे-मुअज्ज़म काबुल का,आज़म गुजरात और कामबक्श बीजापुर का गवर्नर था .इसी कारण इन तीनों के मध्य मतभेद पैदा हुए,जिसने उत्तराधिकार को लेकर गुटबंदी को जन्म दिया.औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तरवर्ती मुग़लों के मध्य होने वाले उत्तराधिकार-युद्ध का विवरण निम्नलिखित है-

मुअज्ज़म(1707-1712 ई.)

  • वह शाह आलम प्रथम के नाम से जाना जाता था, जिसे खफी खां ने ‘शाह-ए–बेखबर’ भी कहा है क्योंकि वह शासकीय कार्यों के प्रति बहुत अधिक लापरवाह था.  
  • वह अपने दो भाइयों की हत्या करने और कामबक्श को जाजऊ के युद्ध में हराने के बाद 1707 ई. में मुग़ल राजगद्दी पर बैठा.वह अपने शासकीय अधिकारों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने वाला अंतिम मुग़ल शासक था.
  • उसने सिक्खों एवं मराठों के साथ मधुर सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया.उसने इसीलिए मराठों को दक्कन की सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार दे दिया लेकिन चौथ वसूलने का अधिकार नहीं दिया.
  • मुअज्ज़म की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों- जहाँदार शाह ,अज़ीम-उस-शाह, रफ़ी-उस-शाह और जहाँशाह, के मध्य नए सिरे से उत्तराधिकार को लेकर युद्ध प्रारंभ हो गया

जहाँदार शाह(1712-1713 ई.)

  • उसने मुगल दरबार में ईरानी गुट के नेता जुल्फिकार खान के सहयोग से अपने तीन भाइयों की हत्या के बाद राजगद्दी प्राप्त की .
  • वह जुल्फिकार खान ,जो वास्तविक शासक के रूप में कार्य करता था ,के हाथों की कठपुतली मात्र था.यहीं से शासक निर्माताओ की संकल्पना का उदय हुआ .वह अपनी प्रेमिका लाल कुंवर के भी प्रभाव में था जोकि मुग़ल शासन पर नूरजहाँ के प्रभाव की याद दिलाता है .
  • उसने मालवा के जय सिंह को ‘मिर्जा राजा’ और मारवाड़ के अजित सिंह को ‘महाराजा’ की उपाधि प्रदान की.
  • उसके द्वारा मराठों को चौथ और सरदेशमुखी वसूलने के अधिकार प्रदान करने के कदम ने मुग़ल शासन के प्रभुत्व को कमजोर बनाने की शुरुआत की.
  • उसने इजारा पद्धति अर्थात् राजस्व कृषि/अनुबंध कृषि को बढावा दिया और जजिया कर को बंद किया.
  • वह प्रथम मुग़ल शासक था जिसकी हत्या सैय्यद बंधुओं-अब्दुल्लाह खान और हुसैन अली(जो हिन्दुस्तानी गुट के नेता थे) के द्वारा कैदखाने  में की गयी थी.

फर्रुखसियर(1713-1719 ई.)

  • वह ‘साहिद-ए-मजलूम’ के नाम से जाना जाता था और  अज़ीम-उस-शाह का पुत्र था.
  • वह  सैय्यद बंधुओं के सहयोग से मुग़ल शासक बना था.
  • उसने ‘निज़ाम-उल-मुल्क’ के नाम से मशहूर चिनकिलिच खान को दक्कन का गवर्नर नियुक्त किया,जिसने बाद में स्वतंत्र राज्य-हैदराबाद की स्थापना की .
  • उसके समय में ही पेशवा बालाजी विश्वनाथ मराठा-क्षेत्र पर सरदेशमुखी और चौथ बसूली के अधिकार को प्राप्त करने के लिया मुग़ल दरबार में उपस्थित हुए थे.

रफ़ी-उद-दरजात(1719 ई.)

  • वह कुछ महीनों तक ही शासन करने वाले मुग़ल शासकों में से  एक  था.
  • उसने निकुस्सियर के विद्रोह के दौरान आगरा के किले पर कब्ज़ा कर लिया और खुद को शासक घोषित कर दिया.

रफ़ी-उद-दौला(1719 ई.)

  • वह ‘शाहजहाँ द्वितीय’ के नाम से जाना जाता है.
  • उसके शासनकाल के दौरान ही अजित सिंह अपनी विधवा पुत्री को मुग़ल हरम से वापस ले गए थे और बाद में उसने हिन्दू धर्म अपना लिया .

मुहम्मद शाह(1719-1748 ई.)

  • उसका नाम रोशन अख्तर था जोकि प्रभाव-हीन और आराम-पसंद मुग़ल शासक था.अपनी आराम-पसंदगी की प्रवृत्ति के कारण ही वह ‘रंगीला’ नाम से भी जाना जाता था.
  • उसके शासनकाल के दौरान ही मराठों ने बाजीराव के नेतृत्व में ,मुग़ल इतिहास में पहली बार,  दिल्ली पर धावा बोला.
  • इसी के शासनकाल में फारस के नादिर शाह ने ,सादत खान की सहायता से ,दिल्ली पर आक्रमण किया और करनाल के युद्ध में मुग़ल सेना को पराजित किया.

अहमद शाह(1748-1754 ई.)

  • इसके शासनकाल के दौरान नादिरशाह के पूर्व सेनापति अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर पांच बार आक्रमण किया .
  • इसे इसी के वजीर इमाद-उल-मुल्क द्वारा शासन से अपदस्थ कर आलमगीर द्वितीय को नया शासक नियुक्त किया गया .

आलमगीर द्वितीय(1754-1759ई.)

  • वह ‘अजीजुद्दीन’ के नाम से जाना जाता था .
  • इसी के शासनकाल के दौरान प्लासी का युद्ध हुआ .
  • इसे इसी के वजीर इमाद-उल-मुल्क द्वारा शासन से अपदस्थ कर शाहआलम द्वितीय को नया शासक नियुक्त किया गया

शाहआलम द्वितीय(1759-1806.)

  •  ‘अली गौहर’ के नाम से प्रसिद्ध इस मुग़ल शासक की बक्सर के युद्ध (1764ई .)में हार हुई थी .
  • इसी के शासनकाल के दौरान पानीपत की तीसरा युद्ध हुआ .
  • बक्सर के युद्ध के बाद इलाहाबाद की संधि के तहत मुगलों द्वारा बंगाल ,बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार अंग्रेजो को दे दिए जिन्हें 1772 ई. के बाद महादजी सिंधिया के सहयोग से पुनः मुगलों ने प्राप्त किया .
  • वह प्रथम मुग़ल शासक था जो ईस्ट इंडिया कम्पनी का पेंशनयाफ्ता था .

अकबर द्वितीय(1806-1837ई.)

  • वह अंग्रेजो के संरक्षण में बनने वाला प्रथम मुग़ल बादशाह था.
  • इसके शासनकाल में मुग़ल सत्ता लालकिले तक सिमटकर रह गई .

बहादुरशाह द्वितीय( 1837-1862ई.)

  • वह अकबर द्वितीय और राजपूत राजकुमारी लालबाई का पुत्र एवम् मुग़ल साम्राज्य का अंतिम शासक था.
  • इसके शासनकाल के दौरान 1857 की क्रांति हुई और उसी के बाद इसे बंदी के रूप में रंगून निर्वासित कर दिया गया जहाँ 1862 ई.में इसकी मृत्यु हो गई.
  • वह ‘जफ़र’ उपनाम से बेहतरीन उर्दू शायरी लिखा करता था.

मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारण

मुग़ल साम्राज्य का पतन एकाएक न होकर क्रमिक रूप में हुआ था,जिसके प्रमुख कारण निम्नलिखित  थे-

  • साम्राज्य का बृहद विस्तार: इतने विस्तृत साम्राज्य पर सहकारी संघवाद के बिना शासन करना आसान नहीं था. अतः मुग़ल साम्राज्य अपने आतंरिक कारणों से ही डूबने लगा .
  • केंद्रीकृत प्रशासन:इतने वृहद् साम्राज्य को विकेंद्रीकरण और विभिन्न शासकीय इकाइयों के  आपसी सहयोग के आधार पर ही शासित किया जा सकता था.
  • औरंगजेब की नीतियाँ: उसकी धार्मिक नीति,राजपूत नीति और दक्कन नीति ने असंतोष को जन्म दिया जिसके कारण मुग़ल साम्राज्य का विघटन प्रारंभ हो गया.
  • उत्तराधिकार का युद्ध: उत्तराधिकार को लेकर लम्बे समय तक चलने वाले युद्धों ने मुग़लों की प्रशासनिक इकाइयों में दरार पैदा कर दी.
  • उच्च वर्ग की कमजोरी: मुग़ल उच्च वर्ग मुग़लों के प्रति अपनी वफ़ादारी के लिए जाना जाता था लेकिन उत्तराधिकार के युद्धों के कारण उनकी वफ़ादारी बंट गयी.

निष्कर्ष

अतः शक्तिशाली मुग़ल साम्राज्य औरंगजेब की मृत्यु के बाद पतन की ओर अग्रसर हुआ जिसमें जल्दी जल्दी होने वाले सत्ता परिवर्तनों और उत्तराधिकार के युद्धों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.

मुस्लिम सुधार आंदोलन

मुस्लिम सुधार आन्दोलन

19 वीं सदी के आरम्भ में मुस्लिम उद्बोधन के चिन्ह उत्तर प्रदेश में बरेली के सर सैय्यद अहमद खां और बंगाल के शरीयतुल्ला के नेतृत्व में उभरकर सामने आये|ऐसा ईसाई मिशनरियों,पश्चिमी विचारों के प्रभाव और आधुनिक शिक्षा के कारण संभव हो सका| उन्होंने स्वयं को इस्लाम के शुद्धिकरण व उसे मजबूत बनाने और इस्लामिक शिक्षाओं के प्रोत्साहन के लिए समर्पित कर दिया था|

शरीयतुल्ला ने बंगाल के फरायजी आंदोलन की शुरुआत की, जिसने कृषकों के हित में कई कदम उठाये थे| उन्होंने मुस्लिम समाज की जाति-व्यवस्था का तीव्र विरोध किया था|

शरीयतुल्ला ने बंगाल के फरायजी आंदोलन की शुरुआत की, जिसने कृषकों के हित में कई कदम उठाये थे| उन्होंने मुस्लिम समाज में प्रचलित जाति-व्यवस्था का तीव्र विरोध किया था| 19 वीं सदी के प्रथम पचास वर्षों के दौरान दिल्ली व कलकत्ता के कुछ मुट्ठी भर लोग ही अंग्रेजी शिक्षा हासिल कर पाए थे| अधिकांश मुस्लिमों ने स्वयं को अंग्रेजी शिक्षा से दूर ही रखा, जिसका कारण उलेमाओं व मुस्लिम काजियों का रवैया और उच्च मुस्लिम वर्ग की ब्रिटिश राज के साथ मेल-मिलाप बढाने के प्रति रूचि का न होना था| सन 1857 के विद्रोह में मुस्लिमों की सक्रिय भागीदारी ने ब्रिटिशों के मन में मुस्लिमों के प्रति असंतोष का भाव पैदा कर दिया|

फिर भी जागृत और शिक्षित मुस्लिमों का एक हिस्सा के नाते शरीयतुल्ला ने शासकों के प्रति सहयोगपूर्ण नीति को अपनाने और ब्रिटिशों की सहायता से मुस्लिम समाज की सामाजिक स्थिति में सुधार लाने की जरुरत महसूस की| आधुनिक शिक्षा के प्रसार और पर्दा व बहुविवाह जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए कुछ आन्दोलन भी चलाये गए थे| नवाब अब्दुल लतीफ़ (1828-1893) द्वारा 1863 ई. में स्थापित कलकत्ता की मोहम्मदन लिटरेसी सोसाइटी उन कुछेक प्रारंभिक संस्थाओं में से एक थी जिसने इस दिशा में कदम बढाये थे|इसने शिक्षा के प्रसार,विशेष रूप से बंगाल के मुस्लिमों के बीच,के साथ साथ हिन्दू-मुस्लिम एकता को भी बढावा दिया|

वहाबी आन्दोलन

इसे ‘वलीउल्लाह आन्दोलन’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसकी शुरुआत पश्चिमी प्रभावों की प्रतिक्रियास्वरुप हुई थी| यह आन्दोलन शाह वलीउल्लाह, जिन्हें प्रथम भारतीय मुस्लिम नेता भी माना जाता है, की शिक्षाओं से प्रेरित था| यह पूरा का पूरा आन्दोलन कुरान और हदीस की शिक्षाओं पर आधारित था|

अहमदिया आन्दोलन

इस आन्दोलन की शुरुआत मिर्ज़ा गुलाम अहमद द्वारा 1889 ई. में भारतीय मुसलमानों के बीच पश्चिमी शिक्षा के प्रसार के उद्देश्य से की गयी थी|यह आन्दोलन,ब्रहम समाज के समान,उदारवादी मूल्यों पर आधारित था|

देवबंद स्कूल

यह उदारवादी आन्दोलन के विरोध में कुछ रूढ़िवादी मुस्लिम उलेमाओं द्वारा शुरू किया गया आन्दोलन था जोकि कुरान और हदीस के आधार पर इस्लाम के वास्तविक सार की शिक्षा देना चाहता था और इन्होने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जिहाद की संकल्पना का भी प्रतिपादन किया|

निष्कर्ष

19वीं सदी न केवल हिन्दू-मुस्लिम बल्कि देश के संपूर्ण समाज के लिए जागरण का काल थी| इस काल में सभी धर्मों में धर्म के नाम पर प्रचलित कुप्रथाओं को दूर करने के लिए अनेक सुधारक सामने आये और भारतीय संस्कृति व दर्शन की महानता का प्रतिपादन किया| राष्ट्रीय गौरव, आत्म-सम्मान, आत्म-निर्भरता जैसे विचारों का प्रचार-प्रसार किया गया|

माउंटबेटन योजना औऱ भारत विभाजन

माउंटबेटन योजना और भारत के विभाजन

लॉर्ड माउंटबेटन, भारत के विभाजन और सत्ता के त्वरित हस्तांतरण के लिए भारत आये। प्रारम्भ में यह सत्ता हस्तांतरण विभाजित भारत की भारतीय सरकारों को डोमिनियन के दर्जे के रूप में दी जानी थीं। 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने अपनी योजना प्रस्तुत की जिसमे भारत की राजनीतिक समस्या को हल करने के विभिन्न चरणों की रुपरेखा प्रस्तुत की गयी थी। प्रारम्भ में यह सत्ता हस्तांतरण विभाजित भारत की भारतीय सरकारों को डोमिनियन के दर्जे के रूप में दी जानी थीं।

माउंटबेटन योजना

• भारत को भारत और पाकिस्तान में विभाजित किया जायेगा

• बंगाल और पंजाब का विभाजन किया जायेगा और उत्तर पूर्वी सीमा प्रान्त और असम के सिलहट जिले में जनमत संग्रह कराया जायेगा।

• पाकिस्तान के लिए संविधान निर्माण हेतु एक पृथक संविधान सभा का गठन किया जायेगा।

• रियासतों को यह छूट होगी कि वे या तो पाकिस्तान या भारत में सम्मिलित हो जाये या फिर खुद को स्वतंत्र घोषित कर दें।

• भारत और पाकिस्तान को सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त 1947 का दिन नियत किया गया।

ब्रिटिश सरकार ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 को जुलाई 1947 में पारित कर दिया। इसमें ही वे प्रमुख प्रावधान शामिल थे जिन्हें माउंटबेटन योजना द्वारा आगे बढ़ाया गया था|

विभाजन और स्वतंत्रता

• सभी राजनीतिक दलों ने माउंटबेटन योजना को स्वीकार कर लिया|

• सर रेडक्लिफ की अध्यक्षता में दो आयोगों का ब्रिटिश सरकार ने गठन किया जिनका कार्य विभाजन की देख-रेख और नए गठित होने वाले राष्ट्रों की अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं को निर्धारित करना था|

• स्वतंत्रता के समय भारत में 562 छोटी और बड़ी रियासतें थीं

• भारत के प्रथम गृहमंत्री बल्लभभाई पटेल ने इस सन्दर्भ में कठोर नीति का पालन किया| 15 अगस्त 1947 तक जम्मू कश्मीर, जूनागढ़ व हैदराबाद जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर सभी रियासतों ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे| गोवा पर पुर्तगालियों और पुदुचेरी पर फ्रांसीसियों का अधिकार था|

निष्कर्ष

माउंटबेटन योजना, केवल भारत के विभाजन को कार्यरूप देने के लिए ही नहीं थी बल्कि पाकिस्तान की मांग द्वारा प्रभावित क्षेत्रों के लिए एक तंत्र की स्थापना की| यह तय किया कि पाकिस्तान में शामिल होने वाले क्षेत्रों का निर्णय विधान सभा के प्रतिनिधियों द्वारा किया जायेगा या फिर जनमत-संग्रह द्वारा साथ ही कैबिनेट मिशन के अनुरूप एक ही संविधान सभा होगी या फिर नए गठित राष्ट्र के लिए अलग से संविधान सभा बनायी जाएगी| अतः हम कह सकते है कि माउंटबेटन योजना का मुख्य उद्देश्य भारत का विभाजन और सत्ता का  त्वरित हस्तांतरण था। प्रारम्भ में यह सत्ता हस्तांतरण विभाजित भारत की भारतीय सरकारों को डोमिनियन के दर्जे के रूप में दी जानी थीं।

1906 मुस्लिम लीग की स्थापना

मुस्लिम लीग की स्थापना

बंगाल के विभाजन ने सांप्रदायिक विभाजन को भी जन्म दे दिया| 30 दिसंबर,1906 को ढाका के नवाब आगा खां और नवाब मोहसिन-उल-मुल्क  के नेतृत्व में भारतीय मुस्लिमों के अधिकारों की रक्षा के लिए मुस्लिम लीग का गठन किया गया| प्रारंभ में इसे ब्रिटिशों द्वारा काफी सहयोग मिला लेकिन जब इसने स्व-शासन के विचार को अपना लिया,तो ब्रिटिशों से मिलने वाला सहयोग समाप्त हो गया|1908 में लीग के अमृतसर अधिवेशन में सर सैय्यद अली इमाम की अध्यक्षता में मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की गयी जिसे ब्रिटिशों ने 1909 के मॉर्ले-मिन्टो सुधारों द्वारा पूरा कर दिया|मौलाना मुहम्मद अली ने अपने लीग विरोधी विचारों का प्रचार-प्रसार करने के लिए  अंग्रेजी जर्नल ‘कामरेड’  और उर्दू पत्र ‘हमदर्द’  को प्रारंभ किया| उन्होंने ‘अल-हिलाल’ की भी शुरुआत की जोकि उनके राष्ट्रवादी विचारों का मुखपत्र था|

मुस्लिम लीग को प्रोत्साहित करने वाले कारक

• ब्रिटिश योजना- ब्रिटिश भारतीयों को साम्प्रदायिक आधार पर बाँटना चाहते थे और इसीलिए उन्होंने भारतीय राजनीति में विभाजनकारी प्रवृत्ति का समावेश किया,इसका प्रमाण पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था करना  और ब्राह्मणों व गैर-ब्राह्मणों के बीच जातिगत राजनीति का खेल खेलना थे|

• शिक्षा का अभाव-मुस्लिम पश्चिमी व तकनीकी शिक्षा से अछूते थे|

• मुस्लिमों की संप्रभुता का पतन-1857 की क्रांति ने ब्रिटिशों को यह सोचने पर मजबूर किया कि मुस्लिम उनकी औपनिवेशिक नीतियों के लिए खतरा हो सकते है क्योकि मुग़ल सत्ता को हटाकर ही उन्होंने अपने शासन की नींव रखी थी|

• धार्मिक भावनाओं की अभिव्यक्ति-अधिकतर इतिहासकारों और उग्र-राष्ट्रवादियों ने भारतीय सामासिक संस्कृति के एक पक्ष को ही महिमामंडित किया| उन्होंने शिवाजी,राणा प्रताप आदि की तो प्रशंसा की लेकिन अकबर,शेरशाह सूरी,अलाउद्दीन खिलजी,टीपू सुल्तान आदि के बारे  में मौन बने रहे|

• भारत का आर्थिक पिछड़ापन- औद्योगीकीकरण के अभाव में बेरोजगारी ने भीषण रूप धारण कर लिया था और घरेलु उद्योगों के प्रति ब्रिटिशों का रवैया दयनीय था|

लीग के गठन के उद्देश्य

• भारतीय मुस्लिमों में ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा को प्रोत्साहित करना

• भारतीय मुस्लिमों के राजनीतिक व अन्य अधिकारों की रक्षा करना और उनकी जरुरतों व उम्मीदों को सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना

• मुस्लिमों में अन्य समुदायों के प्रति विरोध भाव को कम करना

1924 मुडिमैन समिति

मुडीमैन समिति (1924)

भारतीय नेताओं की मांगों को पूरा करने और 1920 के दशक के आरंभिक वर्षों में स्वराज पार्टी द्वारा स्वीकृत किये गए प्रस्ताव को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश सरकार ने सर अलेक्जेंडर मुडीनमैन की अध्यक्षता में एक समिति,जिसे मुडीनमैन समिति के नाम से भी जाना जाता है,गठित की| समिति में ब्रिटिशों के अतिरिक्त चार भारतीय सदस्य भी शामिल थे| भारतीय सदस्यों में निम्नलिखित शामिल थे-

a. सर शिवास्वामी अय्यर,

b. डॉ.आर.पी.परांजपे,

c. सर तेज बहादुर सप्रे

d. मोहम्मद अली जिन्ना

इस समिति के गठन के पीछे का कारण भारतीय परिषद् अधिनियम,1919 के तहत 1921 में स्थापित संविधान और द्वैध शासन प्रणाली की कामकाज की समीक्षा करना था| इस समिति की रिपोर्ट को 1925 में प्रस्तुत किया गया जो दो भागों में विभाजित थी-अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक रिपोर्ट|

• बहुसंख्यक/बहुमत रिपोर्ट: इसमें सरकारी कर्मचारी और निष्ठावान लोग शामिल थे| इन्होने घोषित किया कि द्वैध शासन स्थापित नहीं हो सका है | उनका यह भी मानना था कि प्रणाली को सही तरह से मौका नहीं दिया गया है अतः केवल छोटे-मोटे बदलावों की अनुशंसा की|

• अल्पसंख्यक/अल्पमत रिपोर्ट: इसमें केवल गैर-सरकारी भारतीय शामिल थे | इसका मानना था कि 1919 का एक्ट असफल साबित हुआ है| इसमें यह भी बताया गया कि स्थायी और भविष्य की प्रगति को स्वयं प्रेरित करने वाले संविधान में क्या क्या शामिल होना चाहिए|

अतः इस समिति ने शाही आयोग/रॉयल कमीशन की नियुक्ति की सिफारिश की| भारत सचिव लॉर्ड बिर्केनहेड ने कहा कि बहुमत/बहुसंख्यक की रिपोर्ट के आधार पर कदम उठाये जायेंगे|

1935 का भारत सरकार अधिनियम जो बाद में आजाद भारत का संविधान बना

भारत सरकार अधिनियम - 1935

भारत सरकार अधिनियम -1935 ब्रिटिश संसद द्वारा अगस्त,1935 में भारत शासन हेतु पारित किया सर्वाधिक विस्तृत अधिनियम था| इसमें वर्मा सरकार अधिनियम-1935 भी शामिल था| भारत सरकार अधिनियम-1935  में यह अधिकथित था कि,यदि आधे भारतीय राज्य संघ में शामिल होने के लिए सहमत होते है तो, भारत को एक संघ बनाया जा सकता है| इस स्थिति में उन्हें केंद्रीय विधायिका के दोनों सदनों में अधिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया जायेगा, लेकिन संघ से सम्बंधित प्रावधानों को लागू नहीं किया जा सका| इस अधिनियम में स्वतंत्रता की बात तो दूर , भारत को डोमिनियन का दर्जा देने की भी कोई चर्चा नहीं की गयी थी|

1935 के अधिनियम ने प्रान्तों की तत्कालीन स्थिति में सुधार किया था क्योंकि इसमें प्रांतीय स्वायत्तता  के प्रावधान को शामिल किया गया था| इस व्यवस्था के अनुसार प्रांतीय सरकारों के मंत्रियों को विधायिका के प्रति उत्तरदायी बनाया गया, साथ ही विधायिका के अधिकारों में वृद्धि भी की गयी| हालाँकि पुलिस जैसे कुछ विषय अभी भी सरकार के प्राधिकार में ही थे| मतदान के अधिकार भी सीमित ही रहे क्योंकि अभी भी कुल जनसंख्या के 14% भाग को ही मतदान करने का अधिकार प्राप्त था| गवर्नर जनरल और गवर्नरों की नियुक्ति अभी भी ब्रिटिश सरकार के द्वारा की जाती थी और वे विधायिका के प्रति उत्तरदायी भी नहीं थे| यह अधिनियम कभी भी उन उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर पाया जिनकी प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय आन्दोलन संघर्ष कर रहा था|

अधिनियम के प्रावधान

• इस अधिनियम ने द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त किया|

• ब्रिटिश भारत और कुछ या सभी रियासतों के लिए भारत संघ की स्थापना का प्रयास किया|

• प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की स्थापना की और मत देने के अधिकार का विस्तार किया गया और 35 मिलियन लोगों को मत देने का अधिकार प्रदान कर दिया|

• प्रान्तों को भी आंशिक रूप से पुनर्संगठित किया|

• सिंध प्रान्त को बम्बई से अलग कर दिया गया|

• बिहार एवं उड़ीसा प्रांत को बिहार और उड़ीसा नाम के दो अलग-अलग प्रान्तों में बाँट दिया गया|

• बर्मा को भारत से पूर्णतः अलग कर दिया गया|

• अदन को भी भारत से अलग कर एक स्वतंत्र उपनिवेश बना दिया|

• प्रांतीय सदनों की सदस्यता में भी बदलाव किया गया ताकि और अधिक निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों को उसमें शामिल किया जा सके| अब ये भारतीय सदस्य बहुमत प्राप्त कर सरकार भी बना सकते थे|

• संघीय न्यायालय की स्थापना की गयी|

निष्कर्ष

इस अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य भारत सरकार को ब्रिटिश सम्राट के अधीन लाना था| अतः भारत सरकार के अधिकारों का स्रोत ब्रिटिश सम्राट था| यह संकल्पना ,जोकि डोमिनियन संविधान से मिलती-जुलती थी, पूर्व में पारित किये गए भारतीय अधिनियमों में अनुपस्थित थी|

हालाँकि 1935 के अधिनियम में प्रांतीय स्वंत्रता जैसे कुछ उपयोगी और महत्वपूर्ण सुधार शामिल थे लेकिन फिर भी भारत सरकार अधिनियम-1935 भारत के संवैधानिक विकास के इतिहास का वह बिंदु था जहाँ से पीछे की ओर नहीं लौटा जा सकता था|

19 वी सदी और भारत में ब्रिटिश शासन

ब्रिटिश शासन में सामाजिक अधिनियम

19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिशों की नीतियों ने हालाँकि तत्कालीन सामाजिक समाज में व्याप्त बुराइयों के उन्मूलन में सहयोग दिया लेकिन धीरे-धीरे भारत की सामाजिक-धार्मिक बुनावट को कमजोर करने का कार्य भी किया क्योकि वे मुख्यतः अंग्रेजी सोच व समझ पर आधारित थीं|
प्राच्यवाद के व्याख्याताओं ने कहा कि भारतीय समाज को आधुनिकीकरण और पश्चिमीकरण की आवश्यकता है|उन्हें अनेक विचारधाराओं की तीव्र आलोचना का सामना करना पड़ा|विलियम विल्बरफोर्स व चार्ल्स ग्रांट जैसे व्यक्तियों के अनुसार ‘भारतीय समाज अंधविश्वासों,मूर्ति पूजा व पुजारियों की तानाशाही से भरा पड़ा है|’
उन्होंने भारत का आधुनिकीकरण ईसाई मिशनरियों के माध्यम से करना चाहा | ब्रिटिशों ने भारत के सामाजिक व्यवहारों में अनेक परिवर्तन किये| ब्रिटिशों ने महिलाओं की स्थिति को सुधारने और अनेक सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाये-
बालिका भ्रूण हत्या:यह प्रथा उच्च वर्ग के बंगालियों व राजपूतों, जोकि महिलाओं को आर्थिक बोझ मानते थे, में बहुत प्रचलित थी| अतः भारतीय समाज की सोच में सुधार लाने के क्रम में 1795 व 1804 के बंगाल रेगुलेशन एक्ट ने बालिका शिशु की हत्या को अवैध घोषित किया और 1870 में बालिका शिशु हत्या पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए एक अधिनियम भी पारित किया गया था| इस अधिनियम के द्वारा माता-पिता द्वारा सभी बच्चों के जन्म का पंजीकरण कराना अनिवार्य बना दिया गया और बालिका शिशु के सन्दर्भ में जन्म के बाद के कुछ वर्षों तक भी निगरानी  रखने की व्यवस्था थी| इसे वैसे क्षेत्रों में विशेष रूप से लागू किया गया जहाँ यह प्रथा अधिक प्रचलन में थी|
सती प्रथा की समाप्ति: यह राजा राममोहन राय के प्रयासों से प्रभावित था| ब्रिटिश सरकार ने सती प्रथा या विधवा स्त्री को जिन्दा जलाने की प्रथा को समाप्त करने का निर्णय लिया और इसे आपराधिक हत्या घोषित कर दिया|1829 का सती प्रथा उन्मूलन कानून पहले बंगाल तक सीमित था लेकिन 1830  में उसे कुछ संसोधनों के साथ मद्रास व बम्बई प्रेसिडेसियों में भी लागू कर दिया गया|
दास प्रथा का उन्मूलन: यह एक अन्य कुप्रथा थी जो ब्रिटिशों की नजर में आई और उन्होंने 1833 के चार्टर अधिनियम द्वारा भारत में दास प्रथा को समाप्त कर दिया तथा 1843 के पांचवे एक्ट द्वारा इस प्रथा को क़ानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया और गैर-क़ानूनी घोषित किया गया|
विधवा पुनर्विवाह: ब्रहम समाज ने इसे सर्वाधिक महत्व प्रदान किया और लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया| विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक महिला कॉलेज,विश्वविद्यालय ,संगठनों की स्थापना की गयी और वैदिक युग से विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में प्रमाण जुटाए गए |
बाल विवाह पर रोक: 1872 का नेटिव मैरिज एक्ट (सिविल मैरिज एक्ट) इसे रोकने के उद्देश्य से ही लाया गया था लेकिन वह अधिक प्रभावी नहीं रहा क्योकि वह हिन्दू,मुस्लिम व अन्य कई धर्मों पर लागू नहीं होता था|1891 ई. में बी.एम.मालाबारी के प्रयासों से एज ऑफ़ कंसेंट एक्ट पारित किया गया और 12 वर्षा से कम उम्र की लड़की के विवाह पर रोक लगा दी गयी| अंततः स्वतंत्रता के बाद बाल विवाह निरोध (संशोधन) अधिनियम द्वारा इसमें बदलाव किया गया और विवाह की आयु लड़की के लिए 18 वर्ष व लड़के के लिए 21 वर्ष निर्धारित की गयी|

1927 की बटलर समिति

बटलर समिति (1927 ई.)

भारतीय राज्य समिति ने सर हार्टकोर्ट बटलर की अध्यक्षता में 1927 में एक समिति गठित की, जिसे बटलर समिति भी कहा जाता है| इस समिति का गठन परमसत्ता और देशी राजाओं के बीच के संबंधों की जांच और स्पष्टीकरण के लिया किया गया था| समिति ने 16 राज्यों का दौरा किया और 1929 में अपनी रिपोर्ट दाखिल की|

समिति की अनुशंसाएं

• परमसत्ता और राज्यों के बीच के सम्बन्ध केवल समझौता भर नहीं है बल्कि जीवित और वृद्धिशील सम्बन्ध हैं,जिनका निर्धारण परिस्थितियों और नीतियों के तहत हुआ है जिसमे इतिहास और सिद्धांत भी शामिल है|

• ब्रिटिश परमसत्ता रियासतों की रक्षा करती है|

• राज्य का स्थानांतरण स्वयं उनके समझौते के बिना भारतीय विधायिका के प्रति उत्तरदायी ब्रिटिश भारत की नयी सरकार को नहीं करना चाहिए|

निष्कर्ष

इसके गठन के उद्देश्य परमसत्ता और भारतीय राजाओं के मध्य के संबंधों की जाँच करना और उनके मध्य के इन संबंधों की बेहतरी के लिए सुझाव देना था ताकि ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों के बीच संतोषजनक संबंधों की स्थापना की जा सके|

1764 बकसर (बिहार) की लड़ाई

बक्सर की लड़ाई

बक्सर का युद्ध बंगाल के नवाब मीर कासिम,अवध के नवाब सुजाउद्दौला व मुग़ल शासक शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना और अंग्रेजों के मध्य लड़ा गया था | यही वह निर्णायक युद्ध था जिसने अंग्रेजों को अगले दो सौ वर्षों के लिए भारत के शासक के रूप में स्थापित कर दिया| यह युद्ध अंग्रेजों द्वारा फरमान और दस्तक के दुरुपयोग और उनकी विस्तारवादी व्यापारिक आकांक्षाओं का परिणाम था|

22 अक्टूबर,1764 ई.   को लड़े गए बक्सर के युद्ध में संयुक्त भारतीय सेना की पराजय हुई| बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई |1765 ई. में सुजाउद्दौला और शाह आलम ने इलाहाबाद में कंपनी गवर्नर क्लाइव के साथ संधि पर हस्ताक्षर किये| इस संधि के तहत,कंपनी को बंगाल,बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार प्रदान कर दिए गए, जिसने कंपनी को इन क्षेत्रों से राजस्व वसूली के लिए अधिकृत कर दिया|कंपनी ने अवध के नवाब से कड़ा और इलाहाबाद के क्षेत्र लेकर मुग़ल शासक को सौंप दिए,जोकि अब इलाहाबाद में अंग्रेजी सेना के संरक्षण में रहने लगा था|कंपनी ने मुगल शासक को प्रतिवर्ष 26 लाख रुपये के भुगतान का वादा किया लेकिन थोड़े समय बाद ही कंपनी द्वारा इसे बंद कर दिया गया|कंपनी ने नवाब को किसी भी आक्रमण के विरुद्ध सैन्य सहायता प्रदान करने का वादा किया लेकिन इसके लिए नवाब को भुगतान करना होगा|अतः अवध का नवाब कंपनी पर निर्भर हो गया| इसी बीच मीर जाफर को दोबारा बंगाल का नवाब बना दिया गया| उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र को नवाब की गद्दी पर बैठाया गया| कंपनी के अफसरों ने नवाब से धन ऐंठ कर व्यक्तिगत रूप से काफी लाभ कमाया|

युद्ध के लिए जिम्मेदार घटनाएँ

  • ब्रिटिशों द्वारा दस्तक और फरमान का दुरुपयोग,जिसने मीर कासिम के प्राधिकार और प्रभुसत्ता को चुनौती दी
  • ब्रिटिशों के आतंरिक व्यापार पर सभी तरह के शुल्कों की समाप्ति
  • कंपनी के कर्मचारियों का दुर्व्यवहार : उन्होंने भारतीय दस्तकारों, किसानोंऔर व्यापारियों को अपना माल सस्ते में बेचने के लिए बाध्य किया और रिश्वत व उपहार लेने की परंपरा की भी शुरुआत कर दी|
  • ब्रिटिशों का लुटेरों जैसा व्यवहार जिसने न केवल व्यापार के नियमों का उल्लंघन किया बल्कि नवाब के प्राधिकार को भी चुनौती दी|

निष्कर्ष

बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास की युगांतरकारी घटना साबित हुई | ब्रिटिशों की रूचि तीन तटीय क्षेत्रों कलकत्ता ,बम्बई और मद्रास में अधिक थी| अंग्रेजों व फ्रांसीसियों के बीच लड़े  गए कर्नाटक युद्ध ,प्लासी के युद्ध और बक्सर के युद्ध ने भारत में ब्रिटिश सफलता के दौर को प्रारंभ कर दिया|1765 ई. तक ब्रिटिश बंगाल,बिहार और उड़ीसा के वास्तविक शासक बन गए| अवध और कर्नाटक के नवाब(जिसे उन्होंने ही नवाब बनाया था) उन पर निर्भर हो गए|

1717 में बंगाल(बांग्लादेश भी शामिल)

बंगाल

औरंगजेब द्वारा मुर्शिद कुली खां को बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया था। गवर्नर मुर्शिद कुली खां (1717-1727 ई.) ने बंगाल की राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित कर दी। उसने अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजस्व वसूली को रोककर अपने राज्य के हितों की रक्षा का प्रयास किया। उसका दामाद शुजाउद्दीन खां उसका उत्तराधिकारी बना जिसने बिहार के सूबे  को बंगाल राज्य में मिला लिया। मुर्शिद कुली खां और उसके उत्तराधिकारी नवाबों द्वारा बंगाल, बिहार और उड़ीसा का प्रशासन स्वतंत्र शासकों की तरह किया गया फिर भी उन्होंने मुग़ल शासक को राजस्व भेजना जारी रखा। बंगाल के नवाबों का विवरण निम्नलिखित है-

  • मुर्शिद कुली खां  को औरंगजेब द्वारा बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया था। उसने अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजस्व वसूली को रोककर अपने राज्य के हितों की रक्षा का प्रयास किया।
  • शुजाउद्दीन खां  जो मुर्शिद कुली खां का दामाद था ,उसका उत्तराधिकारी बना और उसने बिहार के सूबे  को बंगाल राज्य में मिला लिया।
  • सरफराज खां  ,जो शुजा का पुत्र था , ने आलम-उद-दौला हैदर जंग की उपाधि धारण की ।
  • अली बर्दी खां  ने मुग़ल शासक को दो करोड़ रुपये का भुगतान कर फरमान प्राप्त किया और अपने शासन को वैधानिक आधार प्रदान किया। उसने अपनी सबसे छोटी पुत्री के पुत्र सिराज-उद-दौला  को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया ।
  • सिराज-उद-दौला  ने कलकत्ता में अंग्रेजों को अपनी फैक्ट्रियों की किलेबंदी करने से रोका लेकिन अंग्रेजों द्वारा उसके आदेश को न मानने के परिणामस्वरूप अंग्रेजों और सिराज-उद-दौला के मध्य प्लासी का युद्ध लड़ा गया।
  • मीर कासिम ने बर्दवान,मिदनापुर  और चिटगांव की जमींदारी अंग्रेजों को सौंप दी। उसने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए अनेक राजस्व और सैन्य सुधारों को लागू किया ।
  • मीर जाफर ने बंगाल,बिहार और उड़ीसा में मुक्त व्यापार करने का अधिकार और चौबीस परगना की ज़मींदारी  ब्रिटिशों को प्रदान कर दी। मीर कासिम से युद्ध प्रारंभ होने के बाद 1763 ई.में उसे ब्रिटिशों द्वारा दुबारा गद्दी पर बिठाया गया।
  • नज़्म-उद-दौला  मीर जाफर का पुत्र था और द्वैध शासनकाल के दौरान अंग्रेजों के हाथों की  कठपुतली मात्र था।

निष्कर्ष

औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य के पतन के साथ ही बंगाल मुर्शिद कुली खां के नेतृत्व  से स्वतंत्र हो गया। मुर्शिद कुली खां ने अपनी योग्य प्रबंधन क्षमता के द्वारा बंगाल को समृद्धता के शिखर तक पहुँचाया।

पिट्स इंडिया एक्ट 1784

पिट्स इंडिया एक्ट 1784

1773 ई. के रेग्युलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने और कंपनी के भारतीय क्षेत्रों के प्रशासन को अधिक सक्षम और उत्तरदायित्वपूर्ण बनाने के लिये अगले एक दशक के दौरान जाँच के कई दौर चले और ब्रिटिश संसद द्वारा अनेक कदम उठाये गए|

इनमें सबसे महत्पूर्ण कदम 1784 ई. में पिट्स इंडिया एक्ट को पारित किया जाना था,जिसका नाम ब्रिटेन के तत्कालीन  युवा प्रधानमंत्री विलियम पिट के नाम पर रखा गया था| इस अधिनियम द्वारा ब्रिटेन में बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल की स्थापना की गयी जिसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार भारत में कंपनी के नागरिक,सैन्य और राजस्व सम्बन्धी कार्यों पर पूर्ण नियंत्रण रखती थी|

अभी भी भारत के साथ व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार बना रहा और उसे कंपनी के अधिकारीयों को नियुक्त करने  या हटाने का अधिकार प्राप्त था |अतः ब्रिटिश  भारत पर ब्रिटिश सरकार और कंपनी दोनों के शासन अर्थात द्वैध शासन की स्थापना की गयी|

गवर्नर जनरल को महत्वपूर्ण मुद्दों पर परिषद् के निर्णय को न मानने की शक्ति प्रदान की गयी| मद्रास व बम्बई प्रेसीड़ेंसी को उसके अधीन कर दिया गया और उसे भारत में ब्रिटिश सेना,कंपनी और ब्रिटिश सरकार दोनों की सेना,का सेनापति बना दिया गया |

1784 ई. के एक्ट द्वारा स्थापित सिद्धांतों ने भारत में ब्रिटिश प्रशासन का आधार तैयार किया | सेना,पुलिस,नागरिक सेवा और न्यायालय वे प्रमुख एजेंसियां/निकाय थी जिनके माध्यम से गवर्नर जनरल शक्तियों का प्रयोग और उत्तरदायित्वों का निर्वाह करता था| कंपनी की सेना में एक बड़ा भाग भारतीय सैनिकों का भी था जिसका आकार ब्रिटिश क्षेत्र के विस्तार के साथ बढता गया और एक समय इन सिपाहियों की संख्या लगभग 200,000 हो गयी थी| इन्हें नियमित रूप से वेतन प्रदान किया जाता था और अत्याधुनिक हथियारों के प्रयोग हेतु प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता था| भारतीय शासकों के यहाँ नौकरी करने वाले सैनिकों को प्रायः ये सुविधाएँ प्राप्त नहीं थीं| आगे चलकर एक के बाद एक सफलता प्राप्त  करने के कारण कंपनी की सेना के सम्मान में वृद्धि होती गयी जिसने नए रंगरूटों को इसकी ओर आकर्षित किया| लेकिन सेना के सभी अफसर यूरोपीय थे| भारत में कंपनी की सेना के अतिरिक्त ब्रिटिश सैनिकों की भी उपस्थिति थी|

हालाँकि कंपनी की सेना में नियुक्त भारतीय सैनिकों ने अत्यधिक सक्षम होने की ख्याति अर्जित की थी ,लेकिन वे औपनिवेशिक शक्ति के भाड़े के सैनिक मात्र थे क्योकि न तो उनमे वह गर्व की भावना थी जो किसी भी राष्ट्रीय सेना के सैनिक को उत्साह प्रदान करती है और न ही पदोन्नति के बहुत अधिक अवसर उन्हें प्राप्त थे| इन्हीं कारकों ने कई बार उन्हें विद्रोह करने के लिए उकसाया जिनमें सबसे महान विद्रोह 1857 का विद्रोह था|

पिट्स इंडिया एक्ट में एक प्रावधान विजयों की नीति पर रोक लगाने से भी सम्बंधित था लेकिन उस प्रावधान को नज़रअंदाज़ कर दिया गया क्योंकि ब्रिटेन के आर्थिक हितों ,जैसे ब्रिटेन की फैक्ट्रियों से निकलने वाले तैयार माल के लिए बाज़ार बनाने और  कच्चे माल के नए स्रोतों की खोज करने, के लिए नए क्षेत्रों पर विजय प्राप्त करना जरूरी था| साथ ही इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए नए विजित क्षेत्रों पर जल्द से जल्द कानून-व्यवस्था की स्थापना करना भी आवश्यक था| अतः एक नियमित पुलिस बल की व्यवस्था की गयी ताकि कानून एवं व्यवस्था को बनाये रखा जाये|

कार्नवालिस के समय में इस बल को एक नियमित रूप प्रदान किया गया |1791 ई. में कलकत्ता के लिए पुलिस अधीक्षक की नियुक्ति की गयी और जल्दी ही अन्य शहरों में भी कोतवालों की नियुक्त किया गया |जिलों  को थानों में विभाजित किया गया और प्रत्येक थाने का प्रभार एक दरोगा को सौंपा गया|गावों के वंशानुगत पुलिस कर्मचारियों को चौकीदार बना दिया गया | बाद में जिला पुलिस अधीक्षक का पद सृजित किया गया |

हालाँकि पुलिस ने कानून एवं व्यवस्था की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन वह कभी भी लोकप्रिय नहीं बन पाई बल्कि उसने भ्रष्टाचार और सामान्य जनता को तंग करने की प्रवृत्ति के कारण बदनामी ही अर्जित की |अतः यह पूरे देश में सरकारी प्राधिकार का प्रतीक बन गयी| इसके निचले दर्जे के सिपाही को बहुत ही कम वेतन दिया जाता था सेना की ही तरह यहाँ भी उच्च पदों पर केवल यूरोपीय व्यक्ति को नियुक्त किया जाता था|

निष्कर्ष

यह एक्ट इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है कि इसने कंपनी की गतिविधियों और प्रशासन के सम्बन्ध में ब्रिटिश सरकार को सर्वोच्च नियंत्रण शक्ति प्रदान कर दी | यह पहला अवसर था जब कंपनी के अधीन क्षेत्रों को ब्रिटेन के अधीन क्षेत्र कहा गया|

फ्रांस उपनिवेश

फ्रांसीसी उपनिवेश की स्थापना

भारत आने वाले अंतिम यूरोपीय व्यापारी फ्रांसीसी थे। फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1664 ई में लुई सोलहवें के शासनकाल में भारत के साथ व्यापार करने के उद्देश्य से की गयी थी। फ्रांसीसियों ने 1668 ई में सूरत में पहली फैक्ट्री स्थापित की और 1669 ई में मसुलिपत्तनम में एक और फैक्ट्री स्थापित की।1673 ई में बंगाल के मुग़ल सूबेदार ने फ्रांसीसियों को चन्द्रनगर में बस्ती बनाने की अनुमति प्रदान कर दी।

पोंडिचेरी और फ्रांसीसी वाणिज्यिक वृद्धि: 1674 ई में  फ्रांसीसियों ने बीजापुर के सुल्तान से पोंडिचेरी नाम का गाँव प्राप्त किया और एक सम्पन्न शहर की स्थापना की जो बाद में भारत में फ्रांसीसियों का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। धीरे धीरे फ़्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी ने माहे,कराइकल, बालासोर और कासिम बाज़ार में अपनी व्यापारिक बस्तियां स्थापित कर लीं। फ्रांसीसियों का भारत आने का प्रमुख उद्देश्य व्यापर एवं वाणिज्य था।  भारत आने से लेकर 1741 ई तक फ्रांसीसियों का प्रमुख उद्देश्य ,ब्रिटिशों के समान,पूर्णतः वाणिज्यिक ही था। फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1723 ई में यनम, 1725 ई में मालाबार तट पर माहे और 1739 ई में कराइकल पर कब्ज़ा कर लिया।

फ्रांसीसियों के राजनीतिक उद्देश्य और महत्वाकांक्षा: समय के गुजरने के साथ साथ फ्रांसीसियों का उद्देश्यों में भी परिवर्तन होने लगा और भारत को अपने एक उपनिवेश के रूप में मानने लगे। 1741 ई में जोसफ फ़्रन्कोइस डूप्ले को फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी का गवर्नर बनाया जाना इस (उपनिवेश) वास्तविकता और उद्देश्य की तरफ उठाया गया पहला कदम था। उसके काल में कंपनी के राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट रूप से सामने आने लगे और कहीं कहीं तो उन्हें कंपनी के वाणिज्यिक उद्देश्यों से ज्यादा महत्व दिया जाने लगा। डूप्ले अत्यधिक बुद्धिमान था जिसने स्थानीय राजाओं की आपसी दुश्मनी का फायदा उठाया और इसे भारत में फ्रासीसी साम्राज्य की स्थापना हेतु भगवान द्वारा दिए गए मौके के रूप में स्वीकार किया। उसने अपनी चतुरता और कूटनीति के बल पर भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में सम्मानित स्थान प्राप्त किया। लेकिन ब्रिटिशों ने डूप्ले और फ्रांसीसियों के समक्ष चुनौती प्रस्तुत की जो बाद में दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष का कारण बना। डूप्ले की सेना ने मार्क्विस दी बुस्सी के नेतृत्व में हैदराबाद और केप कोमोरिन के मध्य के क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया। 1744 ई में ब्रिटिश अफसर रोबर्ट क्लाइव भारत आया जिसने डूप्ले को पराजित किया। इस पराजय के बाद 1754 ई में डूप्ले को वापस फ्रांस बुला लिया गया।

कुछ क्षेत्रों पर फ्रांसीसी प्रतिबन्ध: लाली, जिसे फ्रांसीसी सरकार द्वारा भारत से ब्रिटिशों को बाहर करने लिए भेजा गया था, को प्रारंभ में कुछ सफलता जरुर मिली ,जैसे 1758 ईमें कुद्दलौर जिले के  फोर्ट सेंट डेविड  पर विजय प्राप्त करना। लेकिन ब्रिटिशों और फ्रांसीसियों के मध्य हुई बांदीवाश की लड़ाई में हैदराबाद क्षेत्र को खो देने के कारण फ्रांसीसियों की कमर टूट गयी और इसी का फायदा उठाकर 1760 ई में ब्रिटिशों ने पोंडिचेरी की घेराबंदी कर दी। 1761 ई में ब्रिटिशों ने पोंडिचेरी को नष्ट कर दिया और अंततः फ्रांसीसी दक्षिण भारत पर पकड़ खो बैठे । बाद में 1763 ई में ब्रिटिशों के साथ हुई शान्ति-संधि की शर्तों के अधीन 1765 ई में पोंडिचेरी को फ्रांसीसियों को लौटा दिया । 1962 ई में भारत और फ्रांस के मध्य हुई एक संधि के तहत भारत में स्थित फ्रांसीसी क्षेत्रों को वैधानिक रूप से पुनः भारत में मिला लिया गया

पुर्तगाली उपनिवेश

पुर्तगाली उपनिवेश की स्थापना

पुर्तगाली पहले यूरोपीय थे जिन्होंने भारत तक सीधे समुद्री मार्ग की खोज की । 20 मई 1498 को पुर्तगाली नाविक वास्को-डी-गामा कालीकट पहुंचा, जो दक्षिण-पश्चिम भारत में स्थित एक महत्वपूर्ण समुद्री बंदरगाह है। स्थानीय राजा जमोरिन ने उसका स्वागत किया और कुछ विशेषाधिकार प्रदान किये। भारत में तीन महीने रहने के बाद वास्को-डी-गामा सामान से लदे एक जहाज के साथ वापस लौट गया और उस सामान को उसने यूरोपीय बाज़ार में अपनी यात्रा की कुल लागत के साठ गुने दाम में बेचा।

1501 ई.में वास्को-डी-गामा दूसरी बार फिर भारत आया और उसने कन्नानौर में एक व्यापारिक फैक्ट्री स्थापित की। व्यापारिक संबंधों की स्थापना हो जाने के बाद भारत में कालीकट, कन्नानौर और कोचीन प्रमुख पुर्तगाली केन्द्रों के रूप में उभरे। अरब व्यापारी, पुर्तगालियो की सफलता और प्रगति से जलने लगे और इसी जलन ने स्थानीय राजा जमोरिन और पुर्तगालियो के बीच शत्रुता को जन्म दिया। यह शत्रुता इतनी बढ़ गयी कि उन दोनों के बीच सैन्य संघर्ष की स्थिति पैदा हो गयी। राजा जमोरिन को पुर्तगालियों ने हरा दिया और इसी जीत के साथ पुर्तगालियों की सैनिक सर्वोच्चता स्थापित हो गयी।

भारत में पुर्तगाली शक्ति का उदय

1505 ई में फ्रांसिस्को दे अल्मीडा को भारत का पहला पुर्तगाली गवर्नर बनाया गया। उसकी नीतियों को ब्लू वाटर पालिसी कहा जाता था क्योकि उनका मुख्य उद्देश्य हिन्द महासागर को नियंत्रित करना था। 1509 ई में फ्रांसिस्को दे अल्मीडा की जगह अल्बुकर्क भारत में पुर्तगाली गवर्नर बनकर आया जिसने 1510 ई.में बीजापुर के सुल्तान से गोवा को अपने कब्जे में ले लिया। उसे भारत में पुर्तगाली शक्ति का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। बाद में गोवा भारत में पुर्तगाली बस्तियों का मुख्यालय बन गया। तटीय क्षेत्रों पर पकड़ और नौसेना की सर्वोच्चता ने भारत में पुर्तगालियों के स्थापित होने में काफी मदद की ।16  वीं सदी के अंत तक पुर्तगालियों ने न केवल गोवा,दमन,दीव और सालसेट पर कब्ज़ा कर लिया बल्कि भारतीय तट के सहारे विस्तृत बहुत बड़े क्षेत्र को भी अपने प्रभाव में ले लिया।

पुर्तगाली शक्ति का पतन

भारत में पुर्तगाली शक्ति अधिक समय तक टिक नहीं सकी क्योकि नए यूरोपीय व्यापारिक प्रतिद्वंदियों ने उनके सामने चुनौती पेश कर दी। विभिन्न व्यापारिक प्रतिद्वंदियों के मध्य हुए संघर्ष में पुर्तगालियों को अपने से शक्तिशाली और व्यापारिक दृष्टि से अधिक सक्षम प्रतिद्वंदी के समक्ष समर्पण करना पड़ा और धीरे धीरे वे सीमित क्षेत्रों तक सिमट कर रह गए।

पुर्तगाली शक्ति के पतन के मुख्य कारण

भारत में पुर्तगाली शक्ति के पतन के प्रमुख कारणों में निम्नलिखित शामिल है-

  • पुर्तगाल एक देश के रूप में इतना छोटा था कि वह अपने देश से दूर स्थित व्यापारिक कॉलोनी के भार को वहन नही कर सकता था।
  • उनकी समुद्री डाकुओं के रूप में प्रसिद्धि ने स्थानीय शासकों के मन में उनके विरुद्ध शत्रुता का भाव पैदा कर  दिया।
  • पुर्तगालियो की कठोर धार्मिक नीति ने उन्हें भारत के हिन्दू और मुसलमानों दोनों से दूर कर दिया।
  • इसके अतिरिक्त डच और ब्रिटिशो के भारत में आगमन ने भी पुर्तगालियो के पतन में योगदान दिया।

विडंबना यह है कि पुर्तगाली शक्ति, जो भारत में सबसे पहले आने वाली यूरोपीय शक्ति थी ,वही 1961 ई.में भारत से लौटने वाली अंतिम यूरोपीय शक्ति भी थी, जब भारत सरकार ने गोवा ,दमन और दीव को उनसे पुनः अपने कब्जे में ले लिया।

भारत को पुर्तगालियो की देन

  • उन्होंने भारत में तंबाकू की कृषि आरंभ की।
  • उन्होंने भारत के पश्चिमी और पूर्वी तट पर कैथोलिक धर्म का प्रसार किया।
  • उन्होंने 1556 ई.में गोवा में भारत की पहली प्रिंटिग प्रेस की स्थापना की। द इंडियन मेडिसनल प्लांट्स  पहला वैज्ञानिक कार्य था जिसका प्रकाशन 1563 ई.में गोवा से किया गया ।
  • सर्वप्रथम उन्होंने ही कार्टेज प्रणाली के माध्यम से यह बताया कि कैसे समुद्र और समुद्री व्यापार पर सर्वोच्चता स्थापित की जाए। इस प्रणाली के तहत कोई भी जहाज अगर पुर्तगाली क्षेत्रोँ से गुजरता है तो उसे पुर्तगालियों से परमिट लेना पडेगा अन्यथा उन्हें पकड़ा जा सकता है।
  • वे भारत और एशिया में ईसाई धर्म का प्रचार करने वाले प्रथम यूरोपीय थे।

पच्छिमी भारत में समाज सुधार

पश्चिमी भारत में सुधार आन्दोलन

सन 1867 ई. में बम्बई में प्रार्थना समाज की स्थापना की गई| महादेव गोविन्द रानाडे और रामकृष्ण भंडारकर इसके मुख्य संस्थापक थे| प्रार्थना समाज के नेता ब्रहम समाज से प्रभावित थे|उन्होंने जाति-प्रथा और छुआछुत के व्यवहार का विरोध किया| उन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए कार्य किया और विधवा-पुनर्विवाह की वकालत की| रानाडे,जोकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भी संस्थापकों में से एक थे,ने 1887 ई. में इंडियन नेशनल सोशल कांफ्रेंस  की स्थापना की जिसका उद्देश्य संपूर्ण भारत में सामाजिक सुधार के लिए प्रभावशाली तरीके से कार्य करना था| इस कांफ्रेंस का आयोजन भी प्रतिवर्ष सामाजिक समस्याओं पर चर्चा के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों के साथ ही होता था| रानाडे का मानना था कि सामाजिक सुधारों के बिना राजनीतिक व आर्थिक क्षेत्र में उन्नति संभव नहीं है| वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के बड़े समर्थक थे और घोषित किया कि भारत जैसा विशाल देश तभी कोई उन्नति कर सकता है जब हिन्दू व मुस्लिम दोनों हाथ मिलाकर एक साथ आगे बढ़ें| पश्चिमी भारत के दो अन्य महान सुधारक गोपाल हरि देशमुख लोकहितवादी और ज्योतिराव गोविंदराव फुले  ,जो ज्योतिबा या महात्मा फुले के नाम से प्रसिद्ध रहे,थे| लोकहितवादी अनेक सामजिक सुधार संगठनों से जुड़े हुए थे| उन्होंने महिलाओं की स्थिति में उत्थान के लिए कार्य किया और जाति-प्रथा की आलोचना की|

महात्मा फुले ने अपना संपूर्ण जीवन समाज के शोषित व दलित वर्गों के उत्थान और महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने को समर्पित कर दिया| उन्होंने 1848 ई. में तथाकथित निम्न वर्ग की बालिकाओं के लिए स्कूल की स्थापना की और अपनी पत्नी को शिक्षित किया ताकि वे उस स्कूल में पढ़ा सकें| 1873 ई. में उन्होंने सत्यशोधक समाज  की स्थापना की जिसमें जाति व धर्म के भेदभाव के बिना कोई भी प्रवेश पा सकता था| ये समाज के दलित व पिछड़े वर्ग के लोगों को समान अधिकार दिलाने के लिए कार्य करती थी| महात्मा फुले ने ब्राह्मणों की सर्वोच्चता का विरोध किया और ब्राह्मणों के बिना ही विवाह सम्पन्न कराने की परंपरा का प्रारंभ किया| दलितों के लिए उनके द्वारा किये गए कार्यों के कारण ही उन्हें महात्मा की उपाधि प्रदान की गयी थी|

दयानंद सरस्वती और आर्य समाज

दयानंद सरस्वती, जिनका वास्तविक नाम मूल शंकर था, का जन्म काठियाबाढ़ में 1824 ई. में हुआ था| चौदह वर्ष की उम्र में ही उन्होंने मूर्ति पूजा करने से मना कर अपने विद्रोही स्वभाव का परिचय दे दिया था| उसके तुरंत बाद उन्होंने घर छोड़ दिया और ज्ञान की खोज में अपने जीवन को समर्पित कर दिया| इस दौरान उन्होंने संस्कृत भाषा और साहित्य में प्रवीणता हासिल की 1863 ई. में उन्होंने अपने इस सिद्धांत का उपदेश देना प्रारंभ कर दिया कि ईश्वर केवल एक है जिसकी पूजा मूर्तियों के रूप में नहीं बल्कि अंतर्मन के करनी चाहिए| उन्होंने इस मत का प्रचार किया की वेदों में वह ज्ञान समाहित है जिसे ईश्वर ने मनुष्य को प्रदान किया है और आधुनिक विज्ञान से सम्बंधित जरुरी बातों को भी उनमें खोजा जा सकता है| अपने इस सन्देश के साथ उन्होंने संपूर्ण भारत का भ्रमण किया और 1875 ई. में बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की| दयानंद ने अपने उपदेशों व लेखन की भाषा के रूप में हिंदी को चुना| सत्यार्थ प्रकाश उनके द्वारा लिखी गयी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है|

हिंदी भाषा के प्रयोग के कारण उनके विचार उत्तर भारत के सामान्य जन तक पहुचनें में सक्षम हो सके| उत्तर प्रदेश, राजस्थान,गुजरात में आर्य समाज का बहुत तेजी से प्रसार हुआ और पंजाब में तो यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक व राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा| आर्य समाज के सदस्य दस सिद्धांतों का अनुसरण करते थे,जिनमें सबसे पहला सिद्धांत वेदों का अध्ययन था| अन्य सिद्धांत सदाचार व नैतिकता से सम्बंधित थे|दयानंद ने इनके लिए एक सामाजिक व्यवहार संहिता भी तैयार की थी,जिसमें जातिगत भेदभाव व सामाजिक असमानता के लिए कोई जगह नहीं थी|

आर्य समाजवादियों बाल विवाह का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया| पूरे उत्तर भारत में शिक्षा के प्रसार हेतु उन्होंने बालकों व बालिकाओं के लिए स्कूलों व कॉलेजों के एक तंत्र की स्थापना की जिसकी शुरुआत लाहौर के दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल से हुई थी,जो जल्द ही पंजाब के प्रमुख कॉलेज के रूप में विकसित हो गया| यहाँ आधुनिक तर्ज पर अंग्रेजी व हिंदी में शिक्षा प्रदान की जाती थी| दयानंद के कुछ शिष्य जो दयानंद के मूल अभिप्राय को बनाये रखना चाहते थे,ने शिक्षा की प्राचीन आश्रम पद्धति के आधार पर हरिद्वार में गुरुकुल की स्थापना की| दयानंद ने वेदों को परमसत्य माना क्योकि वे हिन्दुओं को धार्मिक विश्वासों का एक निश्चित ढांचा प्रदान करना चाहते थे| उन्होंने इस्लाम व इसाई धर्म स्वीकार कर चुके हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लेन के लिए शुद्धि आन्दोलन भी चलाया| अनेक सुधारकों ने अपने सामाजिक व धार्मिक विचारों को पुष्ट करने के लिए वेदों व अन्य प्राचीन धर्म-ग्रंथों से उदहारण प्रस्तुत किये| उन्होंने तर्क के आधार पर अपने विचारों को बल दिया जबकि कुछ अन्य ने खुले तौर पर इन प्राचीन धर्म-ग्रंथों की आलोचना भी की|शिक्षा के प्रोत्साहन,स्त्रियों के उत्थान और जाति-प्रथा के बंधनों को कमजोर करने के सन्दर्भ में दयानंद और आर्य समाज का योगदान किसी भी अन्य सुधार आन्दोलन की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण था|

पंजाब का इतिहास

पंजाब

दसवें एवं अंतिम गुरु गुरु गोविन्द सिंह  सिक्खों को एक लड़ाकू समूह के रूप में संगठित तो कर दिया था लेकिन औरंगजेब के शासनकाल तक वे कोई भी राज्य प्राप्त करने में सफल न हो सके। उनकी मृत्यु के बाद सिक्खों को बंदा बहादुर (1708-1716 ई।) के रूप में एक एक योग्य नेता प्राप्त हुआ। उन्होंने बड़ी संख्या में सिक्खों को संगठित किया और  सरहिंद  पर कब्ज़ा कर लिया। उसने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना का प्रयास किया और गुरुनानक व गुरु गोविन्द सिंह के नाम पर सिक्के चलवाए तथा अपनी मुहर लगे हुए आदेश जारी किये। उसके नेतृत्व में सिक्खों ने मुग़लों का बहादुरीपूर्वक विरोध किया और लाहौर से दिल्ली के बीच के पूरे क्षेत्र पर जमकर लूटपाट की। मुगलों के विरुद्ध अपने संघर्ष के दौरान उसे गुरुदासपुर के किले में बंदी लिया गया। उसके बाद बंदा बहादुर और उसके समर्थकों को दिल्ली भेज दिया गया जहाँ उनके साथ बहुत अमानवीय व्यवहार किया गया। बंदा बहादुर के युवा पुत्र की हत्या कर दी गयी और स्वयं उसे भी अनेक तरह से उत्पीड़ित किया और उसकी भी हत्या कर दी गयी। बंदा बहादुर के समर्थक उसे ‘सच्चा पादशाह’ (सच्चा बादशाह) कहते थे।

गुरुनानक और गुरु गोविन्द सिंह के मतों/सिद्धांतों ने लोगों के दिलों में गहरी जड़ें जमा ली थी। सिक्खों ने स्वयं को धीरे धीरे एक सिख राज्य के रूप में संगठित कर लिया।पंजाब में नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों के बाद उपजी अव्यवस्था और संदेह की स्थिति ने सिखों को एक शक्ति के रूप में उभरने में मदद की। 1764 ई में सिख अमृतसर में इकट्ठे हुए और पहली बार ‘देग,तेग और फ़तेह’ नाम से शुद्ध चांदी के सिक्के ढाले।ये पंजाब राज्य में सिख-सम्प्रभुता की पहली उद्घोषणा थी। उन्होंने स्वयं को बारह मिसलों (लोकतांत्रिक ढांचे पर आधारित सैन्य भाईचारा) में संगठित किया और पंजाब क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।इन मिसलों के प्रमुखों ने आपस में क्षेत्रों का बंटवारा कर लिया था।यहाँ तक की अहमदशाह अब्दाली भी इन मिसलों को नष्ट करने में सफल नहीं हो पाया और उसके भारत से लौटने के दो सालों के भीतर ही सरहिंद और लाहौर में उसके द्वारा नियुक्त किये गए गवर्नरों को बाहर खदेड़ दिया गया। नाभा, पटियाला और कपूरथला जैसी छोटी –छोटी जागीरों का उदय हुआ। 18वीं सदी के अंत में महाराजा रणजीत सिंह ने मिसलों को संयुक्त कर एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की।

मिसल का नाम

मिसल का संस्थापक

सिंहपुरिया मिसल

नवाब कपूर सिंह

अहलुवालिया मिसल

जस्सा सिंह

रामगढ़िया मिसल

जस्सा सिंह रामगढ़िया

फुलकियाँ मिसल

फूल सिंह

कन्हीवा मिसल

जय सिंह

भागी मिसल

हरी सिंह

सुकरचकिया मिसल

चरत सिंह

निशानवालिया मिसल

सरदार सांगत सिंह

करोढ़ सिंघिया मिसल

भगेल सिंह

नकी मिसल

हीरा सिंह

शहीदी मिसल

बाबा दीप सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध

  • अंग्रेजों ने दलीप सिंह के शासनकाल में पंजाब पर आक्रमण किया और लाहौर पर कब्ज़ा कर लिया तथा 9 मार्च 1846 ई में लाहौर की संधि  पर हस्ताक्षर हुए।
  • युद्ध हर्जाने का भुगतान न कर पाने के कारण पंजाब दरबार कंपनी को स्थानांतरित कर दिया गया। कंपनी ने समझोते में प्रमुख भूमिका निभाने वाले गुलाब  सिंह  को कश्मीर सौंप दिया।

द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध

  • संधि की शर्तों और समझौते के बावजूद पंजाब की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ था जिसने द्वितीय आंग्ला- सिख युद्ध का आधार तैयार कर दिया।
  • युद्ध के पश्चात्,लार्ड डलहौजी द्वारा पंजाब को कंपनी में मिला लिया गया और लॉरेंस को पंजाब का प्रथम कमिश्नर बनाया गया।

निष्कर्ष:

18 वीं सदी में मुग़ल साम्राज्य के विघटन और पतन का पूर्व में अधीन किये गए राजाओं और उन क्षेत्रीय नेताओं द्वारा स्वागत किया गया जो अपना खुद का एक राज्य निर्मित करना चाहते थे।पंजाब एक ऐसा ही क्षेत्र था जिसका मुग़ल साम्राज्य के कमजोर पड़ने के बाद उदय हुआ।

1928 मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट

नेहरू रिपोर्ट

12 फरवरी, 1928 को डॉ.एम.ए.अंसारी की अध्यक्षता में दिल्ली में सर्वदलीय सम्मलेन बुलाया गया जिसमे 29 संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे|इस सम्मलेन का आयोजन भारत सचिव लॉर्ड बिर्केन्हेड की चुनौती और साइमन आयोग के प्रत्युत्तर में किया गया था| बम्बई में 19मई1928 को इस सम्मलेन की बैठक में मोतीलाल नेहरु की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी जिसका उद्देश्य भारत के संविधान के की रुपरेखा व सिद्धांतों का निर्धारण करना था|

नेहरु रिपोर्ट की अनुशंसाएं

• भारत को डोमिनियन का दर्जा दिया जाये और संसदीय रूप की सरकार स्थापित की जाये जिसमे द्विसदनीय विधायिका- सीनेट और प्रतिनिधि सदन,हो|

• सीनेट का गठन सात साल के लिए चुने जाने वाले दो सौ सदस्यों से मिलकर हो और प्रतिनिध सदन में पांच साल के लिए चुने जाने वाले पांच सौ सदस्य शामिल हों|गवर्नर जनरल कार्यकारी परिषद् की सलाह पर कार्य करे जो सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी हो|

• भारत में संघीय रूप की सरकार स्थापित की जाये जिसमे अवशिष्ट शक्तियां केंद्र को प्रदान की गयीं हों |अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त कर दिया जाये क्योकि यह सांप्रदायिक भावनाओं को जाग्रत करती है और संयुक्त निर्वाचन प्रणाली स्थापित की जाये|

• पंजाब व बंगाल में समुदायों के लिए कोई सीट आरक्षित नहीं हो लेकिन उन राज्यों में,जहाँ मुस्लिम जनसंख्या उस राज्य की कुल जनसंख्या के दस प्रतिशत से भी कम है,मुस्लिमों के लिए सीटों का आरक्षण किया जा सकता है|

• न्यायपालिका विधायिका से स्वतंत्र हो|

• केंद्र में एक चौथाई मुस्लिम प्रतिनिधित्व होना चाहिए|

• सिंध को बम्बई प्रान्त से अलग किया जाये|

निष्कर्ष

नेहरु रिपोर्ट में कहा गया कि भारत के लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता है| इस रिपोर्ट ने अमेरिका के अधिकार पत्र से प्रेरणा ग्रहण की, जिसने भारत के संविधान में मूल अधिकारों सम्बन्धी प्रावधानों की आधारशिला रखी थी|

दक्षिण भारत में समाज सुधार

दक्षिण भारत में सुधार

बंगाल से शुरू होकर धार्मिक व सामाजिक सुधार आन्दोलन भारत के अन्य भागों में भी फैल गए|ब्रहम समाज से प्रेरित होकर 1864 ई. में मद्रास में वेद समाज की स्थापना की गयी| इसने जातिगत भेदभाव का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह व स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहित किया| ब्रहम समाज के समान,वेद समाज ने भी अंधविश्वासों व हिन्दू धर्म के रूढ़िवादी रीति-रिवाजों का विरोध किया और एक परमसत्ता में विश्वास व्यक्त किया| वेद समाज के सबसे प्रमुख नेता चेम्बेती श्रीधरालू नायडू थे| उन्होंने ब्रहम समाज की पुस्तकों का तमिल और तेलगू भाषा में अनुवाद किया|बाद में आंध्र प्रदेश,कर्नाटक व तमिलनाडु के कुछ शहरों में ब्रहम समाज की शाखाएं स्थापित हुईं और इसके तुरंत बाद प्रार्थना समाज की भी शाखाएं स्थापित हुईं| इन दोनों समाजों ने मिलकर सामाजिक व धार्मिक सुधारों को प्रोत्साहित करने का कार्य किया|

दक्षिण भारत के सुधार आंदोलनों के सबसे प्रमुख नेता कन्दुकुरी वीरेसलिंगम थे| इनका जन्म 1848 ई. में आंध्र प्रदेश के एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ था| उन्होंने ब्रहम समाज,विशेष रूप से केशवचन्द्र सेन,के विचारों से प्रभावित होकर स्वयं को सामाजिक सुधारों के प्रति समर्पित कर दिया| 1876 ई. में उन्होंने एक तेलगू पत्र निकाला जो लगभग पूरी तरह से सामाजिक सुधारों के प्रति समर्पित था|उनका सबसे बड़ा योगदान महिलाओं की मुक्ति के क्षेत्र में था जिसमें स्त्री शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह भी शामिल था|

केरल में नारायण गुरु द्वारा विशेष रूप से समाज के दलितों व शोषितों के उत्थान के लिए एक आन्दोलन शुरू किया गया|नारायण गुरु का जन्म 1854ई. में एक एजावा परिवार में हुआ था| एजावा व कुछ अन्य जातियों को केरल में तथाकथित हिन्दु उच्च जातियों द्वारा अछूत माना जाता था| नारायण गुरु ने संस्कृत शिक्षा प्राप्त की और स्वयं के जीवन को एजावा व अन्य दलित लोगों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया| उन्होंने ऐसे मंदिरों की स्थापना की जो जिनमें भगवान व उनकी मूर्तियों के लिए कोई स्थान नहीं था| इन्होनें प्रथम ऐसे मंदिर की स्थापना पास में रहने वाली नदी से पत्थर निकाल कर की गयी थी| इस पत्थर पर निम्नलिखित शब्द लिखे थे-“यह एक ऐसा स्थान है जहाँ सभी लोग जातिगत भेदभाव व धार्मिक शत्रुता के बिना भाईचारे के साथ रहते है| नारायण गुरु ने 1903 ई. में नारायण धर्म परिपालन योगम की स्थापना की,जो सामाजिक सुधार के लिए एक महत्वपूर्ण संगठन बन गया| उन्होंने सभी के लिए ‘एक जाति,एक धर्म और एक ईश्वर’ की वकालत की|

दक्षिण भारत के अनेक समाज सुधारकों ने स्वयं को हिन्दू मंदिरों से सम्बंधित सुधारों के साथ सम्बद्ध किया| इसी क्रम में उन्होंने हिन्दू मंदिरों में प्रचलित देवदासी प्रथा के उन्मूलन की वकालत की| उन्होंने यह मांग भी की कि मंदिरों की संपत्ति पर पुजारियों का अधिकार न होकर जनता का अधिकार होना चाहिए| बहुत से मंदिरों में तथाकथित निम्न जातियों को प्रवेश का अधिकार नहीं था,यहाँ तक कि मंदिरों से सटी हुई सड़कें भी उनके लिए प्रतिबंधित थीं| सुधारकों ने मंदिर-प्रवेश व मंदिरों से जुड़ी अन्य अनेक कुप्रथाओं को समाप्त करने के लिए सशक्त आन्दोलन चलाया|

यंग बंगाल

डेजेरियो और यंग बंगाल

बंगाल में आधुनिक आन्दोलनों की शुरुआत करने में 1817 में स्थापित कलकत्ता के हिन्दू कॉलेज की महत्वपूर्ण भूमिका थी| डेविड हेयर,जोकि राम मोहन राय के सहायक थे,ने इस कॉलेज को प्रारंभ करने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया| वे घड़ियों को बेचने के लिए स्कॉटलैंड से कलकत्ता आये थे,लेकिन बाद में बंगाल में आधुनिक शिक्षा का प्रसार ही उनके जीवन का उद्देश्य बन गया|

1826 ई. में 17 साल के युवा हेनरी विवियन डेरेजियो,जिनके पिता पुर्तगाली मूल के थे और माता एक अंग्रेज थी, ने शिक्षक के रूप में हिन्दू कॉलेज में प्रवेश किया| उन्होंने कुछ ही समय मं  कॉलेज के सबसे बेहतरीन लड़कों को अपने अपनी ओर आकर्षित कर लिया और उन्हें लगातार बंधनों से मुक्त होकर सोचने के लिए प्रेरित करते रहे और स्थापित सत्यों व प्राधिकारों के प्रति प्रश्नाकुलता का भाव जगाते रहे| डेरेजियो ने अपनी शिक्षाओं और विज्ञान,इतिहास,दर्शन, साहित्य आदि पर चर्चाओं के आयोजन के माध्यम से क्रांतिकारी विचारों को प्रोत्साहित किया| अपनी इन गतिविधियों के द्वारा डेरेजियो ने कलकत्ता के युवाओं को व्यवहारिक रूप से प्रभावित किया और उनके बीच एक बौद्धिक आन्दोलन की शुरुआत की|

डेरेजियो और यंग बंगाल

डेरेजियो के छात्रों,जिन्हें सम्मिलित रूप से यंग बंगाल कहा जाता था,ने सभी पुरानी सामाजिक परम्पराओं व रीति-रिवाजों का उपहास उड़ाया,ईश्वर के अस्तित्व को लेकर चर्चाएँ आयोजित कीं,सामाजिक व धार्मिक रूढ़ियों को चुनौती दी,विचारों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग की और महिलाओं के लिए शिक्षा की वकालत की| उन्होंने फ्रांस की क्रांति के आदर्शों और इंग्लैंड की  उदारवादी सोच को महत्व दिया|इस समूह के अत्यधिक उग्रवादी विचारों व धार्मिक मूर्तियों के प्रति आदर प्रदर्शित न करने जैसे उनके कार्यों ने बंगाल के रूढ़िवादी हिन्दुओं को नाराज कर दिया| उनका मानना था की यंग बंगाल की इस उग्र सोच के लिए डेरेजियो की शिक्षाएं जिम्मेदार है और उन्होंने हिन्दू कॉलेज के सक्षम अधिकारियों पर डेरेजयो को बर्खास्त करने के लिए दबाव डाला| डेरेजियो की बर्खास्तगी और 1831 ई. में अचानक उनकी मृत्यु के बाद भी यंग बंगाल आन्दोलन जारी रहा| नेतृत्व के आभाव में भी इस समूह के सदस्य शिक्षा व पत्रकारिता के माध्यम से अपने उग्र विचारों का प्रसार करते रहे|

विचार एवं शिक्षाएं

• डेरेजियो ने अपनी शिक्षाओं और विज्ञान,इतिहास,दर्शन, साहित्य आदि पर चर्चाओं के आयोजन के माध्यम से क्रांतिकारी विचारों को प्रोत्साहित किया|

• डेरेजियो युवा छात्रों के बीच बौद्धिक क्रांति का प्रसार करना चाहते थे|

• वे उदारवादी सोच के प्रबल समर्थक थे|

• वे विचारों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और महिलाओं के लिए शिक्षा के भी प्रबल समर्थक थे |

• सामाजिक व धार्मिक रूढ़ियों का विरोध किया |

• उन्होंने कहा कि उग्र या क्रांतिकारी विचार धर्म-दर्शन का मूल थे|

• उन्होंने पुरानी सामाजिक परम्पराओं व रीति-रिवाजों का उपहास उड़ाया,ईश्वर के अस्तित्व को लेकर चर्चाएँ आयोजित कीं|

डच उपनिवेश की स्थापना भारत में

डच उपनिवेश की स्थापना

हॉलैंड (वर्त्तमान नीदरलैंड) के निवासी डच कहलाते है। पुर्तगालियो के बाद डचों ने भारत में अपने कदम रखे। ऐतिहासिक दृष्टि से डच समुद्री व्यापार में निपुण थे। 1602 ईमें नीदरलैंड की यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गयी और डच सरकार द्वारा उसे भारत सहित ईस्ट इंडिया के साथ व्यापार करने की अनुमति प्रदान की गयी।

डचों का उत्थान

1605 ई में डचों ने आंध्र प्रदेश के मुसलीपत्तनम में अपनी पहली फैक्ट्री स्थापित की। बाद में उन्होंने भारत के अन्य भागों में भी अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित किये। डच सूरत और डच बंगाल की स्थापना क्रमशः 1616 और 1627 में की गयी थी। डचों ने 1656 ई में पुर्तगालियों से सीलोन जीत लिया और 1671 ई में पुर्तगालियों के मालाबार तट पर स्थित किलों पर भी कब्ज़ा कर लिया। पुर्तगालियों से नागापट्टिनम जीतने के बाद डच काफी सक्षम गए और दक्षिण भारत में अपने पैर जमा लिए। उन्होंने काली मिर्च और मसालों के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक लाभ कमाया। कपास, अफीम, नील, रेशम और चावल वे प्रमुख भारतीय वस्तुएं है जिनका व्यापार डचों द्वारा किया जाता था।

डच सिक्के

डचों ने भारत में रहने के दौरान सिक्कों की ढलाई पर भी हाथ आजमाए। जैसे जैसे उनके व्यापार में वृद्धि होती गयी उन्होंने कोचीन, मूसलीपत्तनम, नागापट्टिनम , पोंडिचेरी और पुलीकट में टकसालों की स्थापना की। पुलीकट स्थित टकसाल से भगवान वेंकटेश्वर (भगवान विष्णु) के चित्र वाले सोने के पैगोडा  सिक्के जारी किये गए। डचों द्वारा जारी किये गए सभी सिक्के स्थानीय सिक्का ढलाई के नमूनों पर आधारित थे।

डच शक्ति का पतन

भारतीय उप-महाद्वीप पर डचों की उपस्थिति 1605 ई से लेकर 1825 ई तक रही थी। पूर्व के साथ व्यापार में ब्रिटिश शक्ति के उदय ने डचों के व्यापारिक हितों के प्रति एक चुनौती प्रस्तुत की जिसके परिणामस्वरूप दोनों के मध्य खूनी संघर्ष हुए। इन संघर्षों में स्पष्ट रूप से ब्रिटिशों की विजय हुई क्योकि उनके पास अधिक संसाधन थे। अम्बोयना में डचों द्वारा कुछ ब्रिटिश व्यापारियों की नृशंस हत्या ने परिस्थितियों को और बिगाड़ दिया। ब्रिटिशों द्वारा एक के बाद एक लगभग सभी डच क्षेत्रों को अपने कब्जे में ले लिया गया।

मालाबार क्षेत्र में डच शक्ति की घोर पराजय

डच-अंग्रेज संघर्ष के मध्य त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा द्वारा 1741 ई में कोलाचेल के युद्ध में डच ईस्ट इंडिया कंपनी को पराजित करने के साथ ही मालाबार क्षेत्र में डच शक्ति का पूर्णतः पतन हो गया।

ब्रिटिशों के साथ संधियाँ और संघर्ष

हालाँकि 1814 ई की एंग्लो-डच संधि के तहत डच कोरोमंडल और डच बंगाल पुनः डच शासन के अधीन आ गए थे लेकिन 1824 ई में हस्ताक्षरित एंग्लो-डच संधि के प्रावधानों के तहत फिर से ब्रिटिश शासन के अधीन आ गए क्योकि इस संधि के तहत डचों के लिये 1 मार्च 1825 ई तक सारी संपत्ति और क्षेत्रों को हस्तांतरित करना बाध्यकारी बना दिया गया। 1825 ई के मध्य तक डच भारत में अपने सभी व्यापारिक क्षेत्रों से वंचित हो चुके थे। एक समझौते के तहत ब्रिटिशों ने आपसी अदला-बदली के तरीके के आधार पर खुद को  इंडोनेशिया के साथ व्यापार से अलग कर लिया और बदले में डचों ने भारत के साथ अपना व्यापार बंद कर दिया।

भारत में डेनिश औपनिवेशिक क्षेत्र

डेनमार्क से सम्बंधित किसी भी व्यक्ति या वस्तु को डेनिश  कहा जाता है। डेनमार्क द्वारा लगभग  225 वर्षों तक भारत में अपने उपनिवेश बनाये रखे गए। भारत में स्थापित डेनिश बस्तियों मे त्रंकोबार (तमिलनाडु) ,सेरामपुर (पश्चिम बंगाल) और निकोबार द्वीप शामिल थे।

डेनिश व्यापारिक एकाधिकार की स्थापना

एक डच साहसी मर्सलिस दे बोशौवेर ने भारतीय उप-महाद्वीप में डेनिश हस्तक्षेप के लिए प्रेरणा प्रदान की। वह सहयोगी दलों से सभी तरह के व्यापार पर एकाधिकार के वादे के साथ पुर्तगालियों के विरुद्ध सैन्य सहयोग चाहता था। उसकी अपील ने डेनमार्क-नॉर्वे के राजा क्रिस्चियन चतुर्थ को प्रभावित किया  जिसने बाद में 1616 ई में एक चार्टर जारी किया जिसके तहत डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी को डेनमार्क और एशिया के मध्य होने वाले व्यापार पर बारह वर्षों के लिए एकाधिकार प्रदान कर दिया गया।

डेनिश चार्टर्ड कंपनियां

दो डेनिश चार्टर्ड कंपनियां थी। प्रथम कंपनी डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी  थी ,जिसका कार्यकाल 1616 ई से लेकर  1650 ई तक था। डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी और स्वीडिश ईस्ट इंडिया कंपनी मिलकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से ज्यादा चाय का आयात करती थीं और उसमे से अधिकांश को अत्यधिक लाभ पर अवैध तरीके से ब्रिटेन में बेचता था। इस कंपनी का 1650 ई में विलय कर दिया गया। दूसरी कंपनी 1670  ई से लेकर 1729 ई तक सक्रिय रही । 1730  ई में एशियाटिक कंपनी के रूप में इसकी पुनः स्थापना की गयी। 1732 ई में इसे शाही लाइसेंस प्रदान कर अगले चालीस वर्षों के लिए आशा अंतरीप के पूर्व से होने वाले डेनिश व्यापार पर एकाधिकार प्रदान कर दिया गया। 1750 ई तक भारत से 27 जहाज भेजे गए जिनमे से 22 जहाज सफलतापूर्वक यात्रा पूरी कर कोपेनहेगेन पहुचे। लेकिन 1722 ई में कंपनी ने अपना एकाधिकार खो दिया।

सेरामपुर मिशन प्रेस

यहाँ यह उल्लेख करना जरुरी है कि सेरामपुर मिशन प्रेस की स्थापना ,जोकि एक ऐतिहासिक एवं युगांतरकारी  कदम था, सेरामपुर में डेनिश मिशनरी द्वारा  1799 ई में की गयी थी। 1801 ई से लेकर 1832 ई तक सेरामपुर मिशन प्रेस ने 40 विभिन्न भाषाओं में  किताबों की 212,000  प्रतियाँ छापीं।

भारत में डेनिश बस्तियों की समाप्ति

नेपोलियन युद्ध (1803-1815 ई।) के दौरान ब्रिटिशों ने डेनिश जहाजों पर हमला कर डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत के साथ होने वाले व्यापर को नष्ट कर दिया और अंततः डेनिश बस्तियों पर कब्ज़ा कर उन्हें ब्रिटिश भारत का हिस्सा बना लिया। अंतिम डच बस्ती सेरामपुर  को 1845 ई में डेनमार्क द्वारा ब्रिटेन को हस्तांतरित कर दिया गया।

राजपूत

राजपूत

औरंगजेब की धार्मिक और प्रशासनिक नीतियों से असंतुष्ट होकर मेवाड (उदयपुर) ,मारवाड (जोधपुर) और आमेर (जयपुर) जैसे प्रमुख राजपूत राज्य मुग़ल साम्राज्य से अलग हो गए।जोधपुर और जयपुर के शासकों को गुजरात और मालवा का मुग़ल गवर्नर नियुक्त किया गया था। एक समय तो ऐसा लगा कि राजपूत मुगल साम्राज्य में अपनी स्थिति और प्रभाव को फिर से प्राप्त कर रहें है और जाटों एवं मराठों के विरुद्ध मुग़ल साम्राज्य के प्रमुख सहयोगी के रूप में उभर रहे है। जोधपुर और जयपुर के राजाओं ने उत्तरवर्ती मुगलों के काल में मुग़ल साम्राज्य के काफी बड़े हिस्से को अपने प्रभाव में ले लिया।औरंगजेब की मृत्यु के बाद जोधपुर और जयपुर के राजा दिल्ली की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाने लगे।

इस समय के सबसे प्रमुख राजपूत राजा आमेर के सवाई राजा जय सिंह थे जिन्हें पहले सूरत और बाद में आगरा का गवर्नर नियुक्त किया गया था। उन्होंने जयपुर जैसे सुन्दर शहर की स्थापना की और दिल्ली, जयपुर ,वाराणसी ,उज्जैन और मथुरा में नक्षत्र वेधशालाओं (जंतर-मंतर) का निर्माण कराया। आगरा से लेकर सूरत तक के क्षेत्र का उनके हाथों में होने से उन्हें अपने राज्य को मजबूत और समृद्ध बनाने में मदद मिली।जाटों,मराठों और अन्य क्षेत्रीय राज्यों के उदय होने से अपने राज्य के बाहर उनकी जागीरें कम होने लगी और उनका प्रभाव भी धीरे-धीरे कम होने लगा।

हालाँकि, राजपूतों की राजनीतिक शक्ति का ह्रास हो गया था लेकिन एक राजस्थानी समूह का देश की अर्थव्यवस्था में प्रभाव बढ़ गया था। ये वे व्यापारी थे जो उस समय गुजरात ,दिल्ली,आगरा के महत्वपूर्ण केन्द्रों के बीच होने वाले व्यापार में शामिल थे।साम्राज्य के पतन के साथ ही इन केन्द्रों का व्यवसायिक महत्व भी कम होने लगा। अतः ये व्यापारी नए केन्द्रों की और बढ़े और बंगाल, अवध एवं दक्कन में व्यापार और वाणिज्य को नियंत्रित करने लगे।

निष्कर्ष

राजपूतों ने सम्राट औरंगजेब की नीतियों से असंतुष्ट होकर स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। मुग़ल साम्राज्य के टूटने से संपूर्ण भारत की राजनीतिक परिस्थितियाँ बदल गयीं ।इन बदलती परिस्थितियों के कारण पूरे भारत के राजनीतिक,आर्थिक और सैन्य गठबंधनों में आमूल-चूल बदलाव आ गया।

जाट

जाट

मुग़ल शासक औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह करने के बाद 17 वीं सदी में शक्तिशाली भरतपुर राज्य की स्थापना के साथ जाट राज्य अस्तित्व में आया। विद्रोही मुख्यतः हरियाणा,पंजाब और गंगा दोआब के पश्चिमी भाग के ग्रामीण इलाकों में केन्द्रित थे और पूर्वी क्षेत्र में अनेक छोटे छोटे राज्य मिलते थे। ये प्राचीन व मध्यकालीन कृषक के साथ साथ महान योद्धा भी थे जिन्हें हिन्दू और मुस्लिम शासकों द्वारा सैनिक के रूप भर्ती किया गया था।

आगरा क्षेत्र के कुछ महत्वाकांक्षी जाट ज़मींदारों का मुग़ल,राजपूत और अफगानों के साथ संघर्ष भी हुआ क्योकि वे जाट जमींदार एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना करना चाहते थे। सूरजमल एकमात्र जाट नेता था,  जिसने बिखरे हुए जाटों को एक शक्तिशाली राज्य के रूप में संगठित किया। कुछ प्रमुख जाट नेताओं का विवरण निम्नलिखित है-

  • गोकला: वह तिलपत का जमींदार था जिसने 1669 ई.में जाट विद्रोह का नेतृत्व किया था।लेकिन मुग़ल गवर्नर हसन अली द्वारा विद्रोह को दबा दिया गया और गोकला की मृत्यु हो गयी।
  • राजाराम: वह सिंसना का जमींदार था जिसने 1685 ई.में जाट विद्रोह का नेतृत्व किया।अमर के रजा बिशन सिंह कछवाहा द्वारा इस विद्रोह को दबा दिया गया।
  • चुडामन: वह राजाराम का भतीजा था जिसने 1704 ई.में मुगलों को हराकर सिंसनी पर कब्ज़ा कर लिया। इसने भरतपुर राज्य की स्थापना की और बहादुर शाह ने इसे मनसब प्रदान किया था। इसने बंदा बहादुर के विरुद्ध मुग़ल अभियान में मुगलों का साथ दिया था।
  • बदन सिंह: वह चुडामन का भतीजा था जिसे अहमद शाह अब्दाली ने राजा की उपाधि प्रदान की थी। उसे जाट राज्य भरतपुर का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
  • सूरजमल: वह बदनसिंह द्वारा गोद लिया गया पुत्र था ।उसे जाट शक्ति का प्लेटो  और जाट अफलातून  भी कहा जाता है क्योंकि उसने जाट राज्य को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया था। उसने दिल्ली,आगरा और मेवाड के क्षेत्रों में जाट अभियानों का नेतृत्व किया और पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों की सहायता करने के लिए भी सहमत हुआ। पठानों द्वारा दिल्ली के पास उसकी हत्या कर दी गयी।

निष्कर्ष

17 वीं सदी में मुगलों के विघटन के कारण जाटों के रूप में एक नयी लड़ाकू जाति का उदय हुआ,जिन्होंने स्वयं को  मध्य एशिया से भारत में प्रवेश करने वाले इंडो-सीथियन का वंशज घोषित किया। हालाँकि उन्होंने राज्य का गठन तो किया लेकिन उनकी आतंरिक संरचना जनजातीय संघ जैसी ही बनी रही।

1905 का बंगाल बिभाजन

उग्रपंथ और बंगाल विभाजन

उग्रपंथियों का राजनीतिक उदय कांग्रेस के अन्दर ही बंगाल विभाजन विरोधी प्रदर्शनों से हुआ था|जब ब्रिटिश सरकार ने बंगाल के लोगों द्वारा किये जा रहे जन प्रदर्शनों के बावजूद बंगाल के विभाजन को रद्द करने से मना कर दिया तो अनेक युवा नेताओं का सरकार से मोहभंग हो गया, इन्हें ही नव-राष्ट्रवादी या उग्रपंथी कहा गया| लाला लाजपत राय,बाल गंगाधर तिलक,बिपिन चंद्र पाल और अरविन्द घोष प्रमुख उग्रपंथी नेता थे|उन्हें उग्रपंथी कहा गया क्योकि उनका मानना था कि सफलता केवल उग्र माध्यमों से ही प्राप्त की जा सकती है|

उग्रपंथ के उदय के कारण

1.नरमपंथियों/उदारवादियों द्वारा सिवाय भारतीय परिषद् अधिनियम(1909) के तहत विधान परिषदों के विस्तार के,कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल न कर पाना |

2.1896-97 के प्लेग और अकाल,जो भारत के लोगों की आर्थिक स्थिति में ह्रास का कारण बना,के बाद भी ब्रिटिशों की शोषणकारी नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया|

3.दक्षिण अफ्रीका में भारतियों के साथ रंग-भेद|

4.1904-05 की रूस-जापान युद्ध की घटना ने राष्ट्रीय जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी|

प्रमुख उग्रपंथी/गरमपंथी

• बाल गंगाधर तिलक: इन्हें ‘लोकमान्य’  भी कहा जाता है| इनके द्वारा निकाले गए ‘मराठा’(अंग्रेजी में) व ‘केसरी’(हिंदी में) नाम के साप्ताहिक पत्रों ने ब्रिटिश शासन पर हमलों में क्रांतिकारी भूमिका निभाई|1916 में इन्होने पूना में होमरूल लीग की स्थापना की और नारा दिया कि “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मै इसे लेकर रहूँगा”|

• लाला लाजपत राय:इन्हें ‘शेरे-पंजाब’ या ‘पंजाब का शेर’ कहा जाता था|इन्होने स्वदेशी आन्दोलन  में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी| ‘साइमन वापस जाओ’ का नारा इन्होने ही दिया था|

• बिपिन चन्द्र पाल:ये पहले उदारवादी थे लेकिन बाद में उग्रपंथी बन गए| इन्होने स्वदेशी आन्दोलन  में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी|अपने प्रभावशाली भाषणों व लेखन के द्वारा इन्होनें राष्ट्रवाद के विचार को देश के कोने-कोने तक पहुँचाया|

• अरविन्द घोष:ये एक अन्य उग्रपंथी नेता थे जिन्होनें स्वदेशी आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई थी|

बंगाल का विभाजन

बंगाल विभाजन भारत में ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्जन ने 1905 में लागू किया किया था जिसके कारण निम्नलिखित थे-

• बंगाली राष्ट्रवाद की ताकत को तोड़ना क्योकि बंगाल भारतीय राष्ट्रवाद का केंद्र था|

• बंगाल में हिन्दुओं व मुस्लिमों को विभाजित करना|

• यह दर्शाना की ब्रिटिश सरकार इतनी शक्तिशाली है कि वह जो चाहे कर सकती है|

लेकिन विभाजन ने स्वतंत्रता संग्राम के प्रति जन को जागृत कर जन-आन्दोलन का रूप दे दिया जिसका परिणाम बहिष्कार और स्वदेशी आन्दोलन के रूप में दिखाई दिया|

जलियांवाला बाग

जलियाँवाला बाग

जलियांवाला बाग हत्याकांड ने ब्रिटिशों के अमानवीय चेहरे को सामने ला दिया |ब्रिटिश सैनिकों ने एक लगभग बंद मैदान में हो रही जनसभा में एकत्रित निहत्थी भीड़ पर, बगैर किसी चेतावनी के, जनरल डायर के आदेश पर गोली चला दी  गई क्योकि  वे प्रतिबन्ध के बावजूद जनसभा कर रहे थे|

13 अप्रैल को यहाँ एकत्रित यह भीड़ दो राष्ट्रीय नेताओं –सत्यपाल और डॉ.सैफुद्दीन किचलू ,की गिरफ्तारी का विरोध कर रही थी| अचानक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी जनरल डायर ने अपनी सेना को निहत्थी भीड़ पर,तितर-बितर होने का मौका दिए बगैर, गोली चलाने के आदेश दे दिए और 10 मिनट तक या तब तक गोलियां चलती रहीं जब तक वे ख़त्म नहीं हो गयीं| इन 10 मिनटों, (कांग्रेस की गणना के अनुसार) एक हजार लोग मारे गए और लगभग दो हजार लोग घायल हुए| गोलियों के निशान अभी भी जलियांवाला बाग़ में देखे जा सकते है,जिसे कि अब राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया है| यह नरसंहार पूर्व-नियोजित था और जनरल डायर ने गर्व के साथ घोषित किया कि उसने ऐसा सबक सिखाने के लिए किया था और अगर वे लोग सभा जारी रखते तो उन सबको वह मार डालता| उसे अपने किये पर कोई शर्मिंदगी नहीं थी| जब वह इंग्लैंड गया तो कुछ अंग्रेजों ने उसका स्वागत करने के लिए चंदा इकट्ठा किया| जबकि कुछ अन्य डायर के इस जघन्य कृत्य से आश्चर्यचकित थे और उन्होंने जांच की मांग की | एक ब्रिटिश अख़बार ने इसे आधुनिक इतिहास का सबसे ज्यादा खून-खराबे वाला नरसंहार कहा|

21 वर्ष बाद ,13 मार्च,1940 को,एक क्रांतिकारी भारतीय ऊधम सिंह ने माइकल ओ डायर की गोली मारकर ह्त्या कर दी क्योंकि जलियांवाला हत्याकांड की घटना के समय वही पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर था| नरसंहार ने भारतीय लोगों में गुस्सा भर दिया जिसे दबाने के लिए सरकार को पुनः बर्बरता का सहारा लेना पड़ा| पंजाब के लोगों पर अत्याचार किये गए,उन्हें खुले पिंजड़ों में रखा गया और उन पर कोड़े बरसाए गए| अख़बारों पर प्रतिबन्ध लगा दिए गए और उनके संपादकों को या तो जेल में डाल दिया गया या फिर उन्हें निर्वासित कर दिया गया| एक आतंक का साम्राज्य ,जैसा कि 1857 के विद्रोह के दमन के दौरान पैदा हुआ था,चारों तरफ फैला हुआ था| रविन्द्रनाथ टैगोर ने अंग्रेजों द्वारा उन्हें प्रदान की गयी नाईटहुड की उपाधि वापस कर दी| ये नरसंहार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ|

दिसंबर,1919 में अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ| इसमें किसानों सहित बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया| यह स्पष्ट है कि इस नरसंहार ने आग में घी का काम किया और लोगों में दमन के विरोध और स्वतंत्रता के प्रति इच्छाशक्ति को और प्रबल कर दिया|

1793 का चार्टर अधिनियम

चार्टर अधिनियम,1793

1793 ई. में पारित चार्टर अधिनियम द्वारा कंपनी के भारत के साथ व्यापारिक एकाधिकार को अगले बीस वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया और गवर्नर जनरल के अधिकार क्षेत्र में बम्बई और मद्रास के गवर्नर को भी शामिल कर दिया| सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को खुले सागर तक बढ़ा दिया |वे नागरिक सेवा के किसी भी सदस्य को शांति –न्यायाधीश के रूप में नियुक्त कर सकते थे|वे प्रेसीडेंसी नगरों के लिए सफाई कर्मचारी भी नियुक्त कर सकते थे और बिना लाइसेंस के शराब की बिक्री पर प्रतिबन्ध भी लगा सकते थे|
अधिनियम की विशेषताएं
• अधिनियम कम्पनी को व्यापारिक विशेषाधिकार प्रदान करता है और अगले बीस वर्षों के लिए उन्हें नवीनीकृत करता है|
•  गवर्नर जनरल के अधिकार क्षेत्र में बम्बई और मद्रास के गवर्नर को भी शामिल कर दिया |

खिलाफत और असहयोग आंदोलन

खिलाफ़त और असहयोग आन्दोलन

ब्रिटिश शासन के प्रति बढ़ते क्रोध ने खिलाफत आन्दोलन और असहयोग आन्दोलन को जन्म दिया| तुर्की ने प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन के विरुद्ध भाग लिया था| तुर्की,जोकि पराजित देशों में से एक था,के साथ ब्रिटेन ने अन्याय किया|1919 ई. में मोहम्मद अली और शौकत अली (अली बंधुओं के नाम से प्रसिद्ध), मौलाना अबुल कलाम आज़ाद,हसरत मोहानी व कुछ अन्य के नेतृत्व में तुर्की के साथ हुए अन्याय के विरोध में खिलाफत आन्दोलन चलाया गया| तुर्की के सुल्तान को खलीफा अर्थात मुस्लिमों का धर्मगुरु भी माना जाता था| अतः तुर्की के साथ हुए अन्याय के मुद्दे को लेकर जो आन्दोलन शुरू हुआ,उसे ही खिलाफत आन्दोलन कहा गया| इसने असहयोग का आह्वाहन किया| खिलाफत के मुद्दे को लेकर शुरू हुआ आन्दोलन जल्द ही स्वराज और पंजाब में दमन के विरोध में चलाये जा रहे आन्दोलन के साथ मिल गया| गाँधी जी नेतृत्व में 1920 ई. में कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में पहली बार और बाद में नागपुर के कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में सरकार के विरुद्ध संघर्ष हेतु एक नए कार्यक्रम को स्वीकृत किया गया | नागपुर अधिवेशन,जिसमे 15000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था,में कांग्रेस के संविधान में संशोधन किया गया और “वैधानिक व शांतिपूर्ण तरीकों से भारतीयों के द्वारा स्वराज्य की प्राप्ति” को कांग्रेस के संविधान का प्रथम प्रावधान बना दिया गया|

यह आन्दोलन तुर्की और पंजाब में हुए अन्याय के विरोध और स्वराज्य की प्राप्ति के लिए शुरू हुआ था| इसमें अपनाये गए तरीकों के कारण इसे असहयोग आन्दोलन कहा गया, इसकी शुरुआत ब्रिटिशों द्वारा भारतीयों को प्रदान की जाने वाली ‘सर’ की उपाधि की वापसी के साथ हुई| सुब्रमण्यम अय्यर और रबिन्द्रनाथ टैगोर पहले ही ऐसा कर चुके थे| अगस्त 1920 में गाँधी ने अपनी कैसर-ए-हिन्द की उपाधि लौटा दी | अन्य लोगों ने भी ऐसा ही किया| ब्रिटिश सरकार से इन उपाधियों का प्राप्त करना अब भारतीयों के लिए सम्मान का विषय नहीं रह गया अतः सरकार के साथ असहयोग किया गया| बाद में विधायिकाओं का भी बहिष्कार किया गया|

अनेक लोगों ने विधायिकाओं के चुनाव में अपना मत देने से इंकार कर दिया| हजारों छात्रों व शिक्षकों ने स्कूलों व कॉलेजों को छोड़ दिया| जामिया मिलिया इस्लामिया,अलीगढ (जो बाद में दिल्ली में स्थापित हो गया था) और कशी विद्यापीठ,बनारस जैसे नए शिक्षा संस्थानों की स्थापना राष्ट्रवादियों द्वारा की गयी| सरकारी कर्मचारियों ने अपनी नौकरी छोड़ दी,वकीलों ने न्यायालयों का बहिष्कार किया,विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गयी और पूरे देश में बंद व हड़तालों का आयोजन किया गया| आन्दोलन को अपार सफलता मिली और गोलीबारी व गिरफ्तारियां इसे रोक न सकीं|

वर्ष 1921 की समाप्ति से पूर्व तक लगभग 30,000 लोगों को जेल में डाल दिया गया था| इनमे कई प्रमुख नेता भी शामिल थे| गाँधी जी को किसी भी तरह से अभी गिरफ्तार नहीं किया जा सका था| केरल के कुछ हिस्सों में विद्रोह भड़क गया जिसमे ज्यादातर विद्रोही मोपला किसान थे,इसीलिए इसे मोपला विद्रोह कहा गया| विद्रोह को क्रूर तरीकों से दबा दिया गया | 2000 से ज्यादा मोपला विद्रोही मार दिए गए और 45,000 को गिरफ्तार कर लिया गया| एक स्थान से दुसरे स्थान पर ले जाते समय 67 कैदियों की एक रेलवे वैगन में दम घुटने से हुई मृत्यु इस क्रूरता का ही जीता जागता उदाहरण था|

1921 का कांग्रेस अधिवेशन अहमदाबाद में आयोजित हुआ था जिसकी अध्यक्षता हकीम अजमल खान  ने की थी| इस अधिवेशन में आन्दोलन को जारी रखने का निर्णय किया गया और असहयोग आन्दोलन के अंतिम चरण की शुरुआत करने का भी निर्णय किया गया|इस चरण की शुरुआत लोगों से कर अदा न करने की अपील के साथ होनी थी| इसकी शुरुआत गांधीजी ने गुजरात के बारदोली से की | यह चरण बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि जब लोग सरकार को कर अदा करना से मन कर देंगे तो सरकार की वैधानिकता पर ही प्रश्नचिह्न लग जायेगा| गाँधी जी हमेशा इस बात पर बल दिया कि पूरा आन्दोलन शंतिपूर्ण ढंग से होना चाहिए| लेकिन लोग स्वयं को संयमित नहीं रख सके |उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में 5 फरवरी ,1922 को पुलिस ने बगैर किसी पूर्व सूचना के प्रदर्शन कर रही भीड़ पर गोली चला दी | लोगों ने गुस्से में आकर पुलिस स्टेशन पर धावा बोल दिया और उसमे आग लगा दी| पुलिस स्टेशन के अन्दर कैद 22 पुलिस वाले इस आग में मारे गए| चूँकि गाँधी जी ने यह शर्त रखी थी कि पूरा आन्दोलन शंतिपूर्ण होगा अतः इस घटना की खबर सुनने के बाद ही उन्होंने आन्दोलन को वापस ले लिया |

10 मार्च,1922 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और छह साल की सजा सुनाई गयी| इस आन्दोलन को वापस लेने के साथ ही राष्ट्रवादी आन्दोलन का एक और चरण समाप्त हो गया| इस आन्दोलन में पुरे देश से लोगों ने बड़ी संख्या में भाग लिया था| यह गावों तक फ़ैल गया था| लोगों ने खुलकर सरकार का विरोध किया और स्वराज्य की मांग की | आन्दोलन ने हिन्दुओं व मुस्लिमों के बीच एकता को मजबूत किया | इस आन्दोलन का प्रसिद्द नारा ‘हिन्दू मुसलमान की जय’ था|

क्रिप्स मिशन

क्रिप्स मिशन

सन 1942 की शुरुआत में युद्ध की परिस्थियों ने ब्रिटिशों को भारतीय नेताओं से बात करने पर मजबूर कर दिया| दक्षिण पूर्व एशिया के विभिन्न देशों में जापानी सेना के हाथों ब्रिटिश सेना को हार का सामना करना पड़ा था|जापानियों ने भारत के भी कई क्षेत्रों पर हवाई हमले किये थे|इसी समय ब्रिटिश मंत्रिमंडल के सदस्य सर स्टैफोर्ड क्रिप्स को भारतीय नेताओं  के साथ बात करने के लिए भारत भेजा गया| इसे क्रिप्स मिशन के नाम से जाना गया| यह वार्ता विफल रही| ब्रिटिश,भारत में वास्तविक राष्ट्रीय सरकार की स्थापना करने के इच्छुक नहीं थे| उन्होंने रजवाड़ों के हितों को बढावा देने का भी प्रयास किया| हालाँकि उन्होंने संविधान सभा की मांग स्वीकार ली थी लेकिन इस बात पर जोर दिया कि सभा में भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व रजवाड़ों द्वारा नामित सदस्यों के द्वारा किया जाये और राज्यों की जनता का इसमें कोई प्रतिनिधितित्व न हो|

क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव

• डोमिनियन के दर्जे के साथ एक भारतीय संघ की स्थापना की जाएगी जो कि राष्ट्रमंडल के साथ संबंधों को तय करने के लिए स्वतंत्र होगा साथ संयुक्त राष्ट्र व अन्य अंतर्राष्ट्रीय निकायों में भागीदारी के लिए वह स्वतंत्र होगा|

• युद्ध की समाप्ति के बाद एक नए संविधान का निर्माण करने के लिए संवैधानिक सभा बुलाई जाएगी|इस सभा के सदस्य आंशिक रूप से प्रांतीय सभाओं के द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार चुने जायेंगे और आंशिक रूप से रजवाड़ों द्वारा नामित किये जायेंगे|

• ब्रिटिश सरकार नए संविधान को निम्नलिखित शर्तों पर ही स्वीकार करेगी: (क) जो भी प्रान्त संघ में शामिल नहीं होना चाहता है वह अपना अलग संघ और अलग संविधान निर्मित कर सकता है| (ब) नए संविधान का निर्माण करने वाला निकाय और ब्रिटिश सरकार शक्तियों के हस्तांतरण और प्रजातीय व धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए एक संधि करेगा|

• गवर्नर जनरल का पद यथावत रहेगा और भारत की रक्षा का दायित्व ब्रिटिश हाथों में ही बना रहेगा|

निष्कर्ष

क्रिप्स मिशन द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिशों के प्रति भारतीयों का पूर्ण सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य भेजा गया था| जब स्टैफोर्ड क्रिप्स वापस गए तो अपने पीछे हताशा और कड़वाहट से भरे भारतीयों को छोड़ गये, जिनके मन में अभी भी फासीवादी आक्रोश के शिकार लोगों के प्रति संवेदना थी, जो यह महसूस करते थे कि देश की वर्तमान परिस्थितियाँ असहनीय हो चुकी है और अब समय आ गया है कि साम्राज्यवाद पर अंतिम और निर्णायक प्रहार किया जाये|

कैबिनेट मिसन प्लान

कैबिनेट मिशन प्लान

22 जनवरी को कैबिनेट मिशन को भेजने का निर्णय लिया गया था और 19 फरवरी, 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री सी.आर.एटली की सरकार ने हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में कैबिनेट मिशन के गठन और भारत छोड़ने की योजना की घोषणा की| तीन ब्रिटिश कैबिनेट सदस्यों का उच्च शक्ति सम्पन्न मिशन, जिसमे भारत सचिव लॉर्ड पैथिक लारेंस, बोर्ड ऑफ़ ट्रेड के अध्यक्ष सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और नौसेना प्रमुख ए.वी.अलेक्जेंडर शामिल थे, 24 मार्च, 1946 को दिल्ली पहुँचा|

मिशन के प्रस्ताव

• मिशन ने ब्रिटिश भारत के निर्वाचित प्रतिनिधियों और भारतीय रजवाड़ों से संविधान के निर्माण के सम्बन्ध में विचार-विमर्श कर एक समझौते को तैयार करने का प्रस्ताव रखा|

• संवैधानिक निकाय के गठन का प्रस्ताव

• प्रमुख भारतीय दलों के समर्थन से एक कार्यकारी परिषद् के गठन का प्रस्ताव

मिशन का उद्देश्य

• भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के मध्य के राजनीतिक गतिरोध को दूर करना और साम्प्रदायिक विवादों को रोकना था| इन दोनों में इस बात को लेकर मतभेद था कि एकीकृत या विभाजित कौन सा विकल्प ब्रिटिश भारत के लिए बेहतर होगा?

• कांग्रेस पार्टी चाहती थी कि केंद्र में एक सशक्त सरकार हो जिसकी शक्तियां प्रांतीय सरकारों की तुलना में अधिक हों|

• जिन्ना के नेतृत्व में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग भारत को अविभाजित रखना चाहती थी लेकिन तभी जब मुस्लिमों को कुछ राजनीतिक सुरक्षोपाय प्रदान किये जाये, जैसे कि विधायिकाओं में समानता की गारंटी|

• 1945 में हुए शिमला सम्मलेन के बाद 16 मई,1946 को कैबिनेट मिशन योजना की घोषणा की गयी|

मिशन की अनुशंसाएं

• भारत की एकता को बनाये रखा जाये|

• इसने सभी भारतीय क्षेत्रों को मिलाकर एक बहुत ही कमजोर संघ के गठन का प्रस्ताव रखा, जिसे केवल रक्षा, विदेशी मामलों और संचार पर ही नियंत्रण प्राप्त था|संघ को यह शक्ति प्राप्त होगी कि वह इन सभी विषयों के प्रबंधन के लिए आवश्यक वित्त जुटा सके|

• संघीय शक्तियों के अतिरिक्त अन्य सभी शक्तियां और अवशिष्ट शक्तियां ब्रिटिश भारत के प्रान्तों को प्रदान की गयीं|

• एक संविधान निर्मात्री निकाय या संविधान सभा का चुनाव किया जाये जिसमे सभी राज्यों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में निश्चित सीटें प्रदान की जाएँ|

• इसने प्रस्तावित संविधान सभा में 292 सदस्यों को ब्रिटिश भारत से और 93 सदस्यों को रियासतों से शामिल करने का प्रस्ताव रखा |

• मिशन ने केंद्र में तत्काल अंतरिम सरकार के गठन को प्रस्तावित किया,जिसे सभी राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त हो और जिसके सभी विभाग भारतीय के पास हों|

निष्कर्ष

कैबिनेट मिशन का प्रमुख उद्देश्य भारत में सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण के तरीकों को खोजना और संविधान का निर्माण करने वाले तंत्र के बारे में सुझाव देना था| अंतरिम सरकार का गठन करना भी इसका एक उद्देश्य था|

उत्तर भारत का एक राज्य अवध

अवध

अवध उत्तर भारत का ऐतिहासिक क्षेत्र  था , जिसमे वर्त्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तर पूर्वी भाग शामिल था। प्राचीन कोसल प्रदेश  के नाम की राजधानी अयोध्या  के नाम पर इसका नाम  अवध पड़ा था। सोलहवीं सदी में यह मुग़ल साम्राज्य का हिस्सा बन गया और 1856 ई. में इसे ब्रिटिश  साम्राज्य में मिला लिया गया। 1722 ई. में ,मुग़ल बादशाह मुहमदशाह द्वारा फारस के शिया सादत खां  को अवध का सूबेदार बनाये जाने के बाद अवध सूबे  को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया। सादत खां ने सैय्यद बंधुओं  को हटाने में सहयोग दिया। बादशाह ने सादत खां को नादिरशाह के साथ वार्ता के लिए नियुक्त किया ताकि वह एक बड़ी रकम के भुगतान के एवज में अपने देश लौट जाये और शहर को तबाह करने से उसे रोका जा सके। लेकिन जब नादिरशाह को उस रकम का भुगतान नहीं किया गया तो उसका परिणाम दिल्ली की जनता को नरसंहार के रूप में भुगतना पड़ा। सादत खां ने भी शर्म और अपमान के कारण आत्महत्या कर ली ।

सादत खां के बाद अवध का अगला नवाब सफदरजंग बना जिसे मुग़ल साम्राज्य का वजीर भी नियुक्त किया गया था। उसका पुत्र शुजाउद्दौला उसका उत्तराधिकारी बना। अवध ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया जिसमे मुस्लिमों के साथ साथ हिन्दू ,नागा,सन्यासी  भी शामिल थे।अवध के शासक का प्राधिकार दिल्ली के पूर्व में स्थित रूहेलखंड क्षेत्र तक था। उत्तर –पश्चिमी सीमान्त की पर्वत श्रंखलाओं से  बड़ी संख्या में अफ़ग़ान ,जिन्हें रोहिल्ला कहा जाता था ,वहाँ आकर बस गए थे।अवध के नवाबों का विवरण निम्नलिखित है-

  • सादत खां बुरहान-उल-मुल्क (1722-1739 ई।): इन्होने 1722 ई. में अवध की स्वायत्त राज्य के रूप में स्थापना की उसे मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह द्वारा गवर्नर नियुक्त किया गया था ।उसने नादिरशाह के आक्रमण के समय साम्राज्य की गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अंततः इज्ज़त और सम्मान की खातिर आत्महत्या कर ली।
  • सफ़दर जंग अब्दुल मंसूर (1739-1754 ई।): वह सादत खां का दामाद था जिसने 1748 ई. में अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध मानपुर के युद्ध में भाग लिया था।
  • शुजाउद्दौला (1754-1775 ई।): वह सफदरजंग का पुत्र और अहमदशाह अब्दाली का सहयोगी था। उसने अंग्रेजों के सहयोग से रोहिल्लों को हराकर 1755 ई. में रूहेलखंड को अपने साम्राज्य में मिला लिया था।
  • आसफ-उद-दौला: वह लखनऊ की संस्कृति को प्रोत्साहित करने और इमामबाड़ा तथा रूमी दरवाजा जैसी ऐतिहासिक इमारतें बनवाने के लिए प्रसिद्ध है। उसने 1755 ई. में अंग्रेजों के साथ फ़ैजाबाद की संधि की।
  • वाजिद अली शाह: वह अवध का अंतिम नवाब था जिसे अख्तरप्रिया और जान-ए-आलम नाम से जाना जाता है। उसके समय में ही ब्रिटिश गवेर्नर जनरल लार्ड डलहौजी द्वारा अवध को कुशासन के आधार पर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया था। वह शास्त्रीय संगीत और नृत्य का शौक़ीन था जिसने कालका-बिंदा जैसे कलाकार भाइयों को अपने दरबार में शरण दी थी।

निष्कर्ष

अवध अपनी उपजाऊ भूमि के कारण के हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है । अंग्रेजों ने भी अपने स्वार्थ के लिए इसकी उपजाऊ भूमि का दोहन किया।  इसीलिए अंग्रेजों ने 1856 ई. में इसे अपने साम्राज्य में मिला लिया।